अदृश्य हमसफ़र - 9

अदृश्य हमसफ़र…

भाग 9

अनुराग के मुंह से उनके मन की बात सुनकर बाबा को दुख के साथ बेहद गर्व भी महसूस हो रहा था। उनका चयन गलत नही था। अनुराग सुशील और होनहार ही नही मर्यादा पालन के लिए किसी भी हद तक दर्द को सहने का सामर्थ्य रखते थे। बाबा ने गर्वीले अंदाज से अनुराग की पीठ थपथपाई।

अनुराग ने बाबा को फिर से आराम कुर्सी पर बैठाकर कहना आरम्भ किया-" बाबा, मुन्नी की नजर में मैं महज उसके परिवार पर एक आश्रित ही रहा हमेशा। अगर आप बचपन में उसे नही डांटते तो शायद वह मुझसे उतनी इज्जत से पेश नही आती जितनी इज्जत से हमेशा आई। मैं तो उसकी नजरों में सदैव खटकता ही रहा क्योकिं उसके बाबा का प्यार जो बंटा वह भी एक अजनबी के साथ। उसने मुझे सिर्फ अपने सहायक के तौर पर देखा। धीरे धीरे मैं उसकी आदत बन गया। अपने हर काम के लिए उसे सिर्फ अनु दा दिखाई देते थे। इसमें कोई शक नही कि उसने मुझे बहुत इज्जत दी लेकिन उसके मन मे मेरे प्रति प्रेम लेशमात्र भी नही था। मुझसे बेहतर उसे कौन जान सकता है। "

बाबा अचानक से हल्की सी हंसी हंस दिए और कहने लगे-" सही कह रहे हो बेटे, तुम्हारे आने के बाद जब मैंने तुम्हें उसका ध्यान रखते देखा तो मैं स्वयं ही कितना निश्चिंत रहने लगा था। तभी तो तुम्हारी भावनाएं भी नही पकड़ पाया। "

अनुराग ने गहरी सांस लेते हुए कहा-" मुझे उसकी यही आदत छुड़ानी थी बाबा। ससुराल में हर बात पर उसके अनु दा सामने नही खड़े हो सकते। जब तक उसका यह सहारा नही हटेगा वह किसी और की तरफ न तो देखेगी,

न प्रेम को समझेगी और न ही स्वयंसिद्धा बन पाएगी और शायद न ही मनोहर जी को"- कहते कहते एक पल को चुप हो गए। एक पल रुककर फिर से कहने लगे

अनुराग-" उसमें बदलाव लाने के लिए मुझे खुद के प्रति उसमें गुस्सा पैदा बेहद जरूरी था। इससे बेहतर अवसर मुझे और नही मिलता। अब जब भी उसे मेरी याद आएगी उस पर मेरे प्रति आया क्रोध हावी हो जाएगा। "

बाबा की आंखे विस्मय से बड़ी होती जा रही थी। अनुराग मनोविज्ञान को इतना ज्यादा समझते हैं उन्हें इसका जरा भी भान भी नही था।

उधर अनुराग सर झुकाए हुए कहते जा रहे थे-" बाबा, अब जब भी मुझे आवाज लगाने का मन होगा उसके अंतर्मन से यही आवाज आएगी "हुंह जाने दो, जैसे मैं यह काम कर ही नही सकती। " उसकी दृढ़ निश्चयता और समझदारी देखिये, गाड़ी के शीशे में मुझे देख कर भी कैसे खुद पर काबू किया। आप देखिएगा, मुन्नी अब बदल जाएगी। उसकी शरारतें कम हो जाएगी। ससुराल से कभी शिकायत नही आने देगी। "

अनुराग ने नजरें उठाकर बाबा की तरफ देखा तो सकपका गया। बाबा की आंखे नम हो रखी थी।

आंसू रोकने की जंग जारी थी जिसकी वजह से लाली झलकने लगी थी।

"बाबा"- तड़प कर कह उठे अनुराग।

बाबा-" अनुराग तुम बहुत बड़ा दिल रखते हो मेरे बच्चे। मैं तो कल्पना भी नही कर सकता उन बातों की जिन बातों को तुम जीवन में जी गए। उफ्फ, कितना दर्द तुमने सहा है और सहोगे, यह सोचकर दिल बैठने लगता है। मैं तो ईश्वर से तुम्हारे लिए हर सुख की कामना करता हूँ। तुम्हे ऐसी जीवन संगिनी मिले जो मुन्नी को हटाकर तुम्हारे दिल में जगह बना सके। "

"बाबा"- कहते हुए अनुराग बाबा के चरण पकड़ कर सुबकने लगे, "मुन्नी की जगह कोई नही ले सकता इसीलिए मैं विवाह नही करूंगा। किसी और के साथ ये अत्याचार कभी नही कर सकता। जब मैं जीवन संगिनी को पूर्ण समर्पण नही दे सकता तो मुझे विवाह का भी अधिकार नही। दो दिन बाद मुन्नी पग फेरे के लिए आएगी। उसके आने से पहले मैं वापस नौकरी पर चला जाऊंगा। उसके सामने आकर उसका गुस्सा ठंडा नही होने दूंगा। "

इतना कहते ही अनुराग उठे और तेज कदमों से बाबा के कमरे से बाहर चले गए।

बाबा न जाने कितनी देर तक दरवाजे की तरफ देखते रहे, पलक तक झपकना भूल गए थे। अनुराग के कमरे से जाते ही सन्नाटा छा गया। रह रह कर बाबा को कुछ कचोट रहा था। कंही अनजाने में उनसे अनुराग के साथ अन्याय तो नही हो गया। नही, कोई अन्याय नही किया है मैंने। आखिर अनुराग की कही बातों का कोई तोड़ भी तो नही मेरे पास। ये लड़का उम्र का भले ही कच्चा है लेकिन समझदारी में तो सभी का गुरु निकला। क्या दूरदृष्टि पाई है। हर अच्छाई बुराई को सोच कर चलता है। हे मेरी माँ, इस लड़के को जीवन मे सारी खुशियाँ देना। उनका मन अनुराग के लिए दुआओं में जुट गया और वहीं आरामकुर्सी पर झूलते झूलते नींद के आगोश में चले गए।

सुबह जब आंख खुली तो दोपहर के 12 बज चुके थे। हैरान थे जब खुद को पलंग पर पाया तो। उन्होंने अनुराग को आवाज लगानी चाही लेकिन इतने में अनुराग हाथ में पानी का गिलास लेकर कमरे में दाखिल हुआ।

बाबा मुस्कुरा उठे। नहा धोकर तैयार था अनुराग। बाबा ने गौर से देखा उसे, किसी फिल्म के हीरो से कमतर न था छोरा।

बाबा-" अनुराग, मैं तो कुर्सी पर सो गया था। पलंग पर कैसे आया। "

अनुराग-" बाबा, थोड़ी देर बाद मैं आपको देखने आया था। तभी आपको पलंग पर लिटाकर गया मैं।

आप बहुत गहरी नींद में थे तो आपको पता नही चला। "

बाबा-" जुग जुग जीयो मेरे बच्चे। हर खुशी मिले तुम्हें। "

अनुराग एक फीकी सी हंसी हंस कर रह गए।

अनुराग-" बाबा, मैं 3 बजे की गाड़ी से जा रहा हूँ। रोज शाम को 5 बजे डाकघर के फोन पर आपको फोन करूंगा। आप डाकखाने समय से पहुंच जाया करना। आपको कसम है बाबा, किसी से नही कहेंगे कि मेरा फोन आता है और मुन्नी से तो कतई न कहना। कल जब आएगी तो उसे सम्भाल लीजिएगा, आप ही सम्भाल सकते हैं। "

बाबा फिर से निशब्द हो गए। हर बात का कितनी बारीकी से ध्यान रखता है। ये लड़का कैसे भूल पायेगा मुन्नी को।

अनुराग की वापसी की बात सुनकर घर में सन्नाटा छा गया। सभी स्तब्ध थे कि इतनी जल्दी वापस क्यों जा रहे हैं अनुराग। बड़ी माँ ने खुलकर विरोध किया-" जब तक मुन्नी का पगफेरा न हो जाये तू नही जाएगा। " लेकिन अनुराग तय कर चुके थे सो अपनी बातों से सभी को बहला लिया। आखिर 2 बजे अनुराग घर से स्टेशन के लिए निकल गए। बड़े भैया उन्हें छोड़ने गए थे। सभी की आंखे नम थी। घर की रौनक ममता और अनुराग की तू तू मैं मैं से ही ज्यादा लगती थी और आज दोनो ही नही थे।

बाबा सारी रात करवटें बदलते रहे। बेचैनी हावी थी कि कल मुन्नी आएगी और अनुराग को पूछेगी तो कैसे संभालेंगे।

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