पल जो यूँ गुज़रे - 12

पल जो यूँ गुज़रे

लाजपत राय गर्ग

(12)

तेईस दिसम्बर को दस बजे वाली बस से वह शिमला पहुँच गया। जाह्नवी अपने ड्राईवर गोपाल के साथ बस स्टैंड पर प्रतीक्षारत मिली। निर्मल को देखते ही उसे कुछ इस तरह की तृप्ति का अहसास हुआ जैसे मरुस्थल में भटके मुसाफिर को जल दिखने पर होता है। लंच करते समय श्रद्धा ने कहा — ‘निर्मल, आज कितने दिनों बाद जाह्नवी के चेहरे पर खुशी के चिह्न दिखे हैं, नहीं तो ये उदास चेहरा लिये अपने स्टडी—रूम में सारा दिन किताबों में ही उलझी रहती थी। कितनी बार इसे बाहर घूमने—फिरने के लिये कहती, लेकिन इसका एक ही जवाब होता था, भाभी जी मैं पढ़ रही हूँ, मेरा मन नहीं कहीं जाने का। अब इसे दो—तीन दिन घुमाओ ताकि इसका मन बहल जाये। अगर थकावट न हो तो आज कुफरी घूम आओ, कल चैल या तॅतापानी जा आना और परसों हम सभी मॉल रोड पर क्रिसमस का आनन्द लेंगे।'

निर्मल ने हल्के से मज़ाकिया लहज़े में कहा — ‘भाभी जी, आपने तो टूर आपरेटग कम्पनी के ट्रेवल मैनेजर की तरह पूरा टूर प्लान कर रखा है।'

श्रद्धा ने निर्मल के मज़ाकिया लहज़े की ओर ध्यान नहीं दिया था। उसे लगा कि निर्मल को मेरी बात अच्छी नहीं लगी, सम्भवतः जाह्नवी और उसके व्यक्तिगत मामले में मेरा इतना दखल देना उसे उचित न लगा हो, अतः उसने गम्भीर स्वर में कहा — ‘मैंने तो केवल सुझाव दिया है। आप लोग जैसे घूमना चाहो, घूम सकते हो। ड्राईवर भी न ले जाना हो तो भी कोई बात नहीं। जाह्नवी अच्छी ड्राईवग कर लेती है।'

‘भाभी जी, मैंने तो मज़ाक में कहा था। मेरा और कोई मतलब नहीं था। आपको बुरा लगा हो तो माफ कर देना। जाह्नवी की खुशी के लिये मैं यहाँ आया हूँ। वैसे तॅतापानी को छोड़कर बाकी सारे टूरिस्ट स्पॉट मेरे देखे हुए हैं।'

‘अच्छा, फिर तो और भी अच्छी बात है। तुम दोनों डिसाइड कर लो कि आज की शाम और कल का सारा दिन तुम लोगों ने कैसे बिताना है? फिर भी कल तॅतापानी जाना चाहोगे तो लंच पैक करवा दूँगी। इन दिनों वहाँ का मौसम भी बढ़िया रहता है। परसों तो हम सभी मॉल रोड पर क्रिसमस का आनन्द लेंगे।'

लंच हो चुका था। श्रद्धा ने टेबल से उठते हुए कहा — ‘जाह्नवी, निर्मल सफर करके आये हैं। थोड़ा रिलैक्स करना चाहते हों तो इन्हें रिलैक्स करने दो, मैं मीनू को देख लूँ।'

निर्मल — ‘ऐसी कोई रिलैक्स करने की आवश्यकता नहीं है भाभी जी। हम ड्राईंग रूम में ही बैठते हैं।'

‘जैसा तुम चाहो।'

श्रद्धा के जाने के बाद जाह्नवी ने कहा — ‘यहाँ ठंडी है। मेरे रूम में चलते है।'

कमरे में पहुँच कर रज़ाई में घुसते हुए जाह्नवी ने निर्मल को वहीं आने के लिये संकेत किया, किन्तु निर्मल कुर्सी बेड के पास खींचकर बैठ गया।

‘कम—से—कम पैर तो रज़ाई में कर लो।'

जैसा जाह्नवी ने कहा निर्मल ने वैसा ही किया। दस पन्द्रह मिनट तक जब जाह्नवी चुप रही तो निर्मल बोला — ‘एकदम चुप हो गयी। कोई बात तो करो।'

‘मुझे कुछ नहीं कहना, न कोई बात करनी है। तुम इसी तरह बैठो रहो, तुम्हारी उपस्थिति मात्र से मेरे अन्दर ऊर्जा का संचार हो रहा है। इसे कम—से—कम दस—पन्द्रह मिनट और भंग न करो।'

‘तथास्तु।'

लगभग आधे घंटे बाद जाह्नवी ने ही मौन तोड़ते हुए पूछा — ‘अगर मन हो तो मॉल रोड़ पर चलते हैं। कुछ देर भीड़ का हिस्सा बनेंगे, इस समय वहाँ अच्छी—खासी भीड़ होगी। भीड़ का हिस्सा बनकर अपना अस्तित्व विलीन करने पर एक अलग किस्म की अनुभूति होती है, मैं कुछ वैसा ही महसूस करना चाहती हूँ। डिनर वहीं कहीं कर लेंगे। मैं भाभी जी को बोल देती हूँ।'

‘मेरा मन तो वही चाहेगा जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो।'

‘मैं भाभी जी को कह कर आती हूँ। तुम फ्रेश होना चाहो तो हो लो।'

पन्द्रह मिनट में वह कपड़े बदलकर तथा हल्का—सा मेकॲप करके आई और आते ही बोली — ‘आओ चलें।'

बाहर ड्राईवर गाड़ी स्टार्ट किये प्रतीक्षा में था। मॉल रोड पर जब वे पहुँचे तो सूर्यदेव ग्लोब के दूसरे हिस्से को आलोकित करने के लिये यहाँ से विदा ले चुके थे। सुरमई अँधेरे की ओट में साँझ रात्रि में तबदील होने को आतुर थी। कृत्रिम प्रकाश के लिये बिजली के बल्ब और टयूबें जला दी गयी थीं। सबसे पहले जाह्नवी निर्मल को ‘तृप्ति' रेस्तरां में कॉफी पीने के लिये ले गयी, क्योंकि घर में उन्होंने चायादि नहीं पी थी। जब वेटर बिल लाया और निर्मल बिल चुकाने लगा तो जाह्नवी ने बिल पकड़ते हुए कहा — ‘जब तक तुम यहाँ पर हो, बिल मैं ‘पे' करूँगी। तुम मेरे दोस्त होने के साथ मेरे मेहमान भी हो।'

‘लेकिन मैं तो दोस्त की हैसियत से ही आया हूँ। दोस्ती आपसी स्नेह और लगाव पर आधारित होती है। अगर मुझे पता होता कि तुम मुझे मेहमान मानोगी तो शायद मैं न भी आता।'

‘ओह्‌ह निर्मल, तुम मेरे हो। कुछ मुझे भी मन की कर लेने दो। नो मोर बहस।'

और वे बिल अदा करके बाहर ‘रिज़' पर टहलने लगे। जैसे—जैसे सँध्या रात्रि में परिवर्तित हो रही थी, लाईटों की जगमगाहट मुखर होने लगी थी, उसी अनुपात में सैलानियों का सैलाब भी बढ़ता जा रहा था। कुछ युवाओं, जो चढ़ती जवानी के नशे में सिर्फ एक—आध गर्म कपड़े में थे, को छोड़कर शेष सभी सैलानी ठंड के प्रकोप का सामना करने के लिये सिर से पाँव तक पूरी तरह गर्म कपड़ों में लिपटे हुए थे। घंटा—एक बीता। कोहरा धीरे—धीरे नीचे उतरने लगा। सँध्या को कहीं पीछे छोड़कर रात की रहस्यमयता फैलने लगी थी। अधिकतर पर्यटक अपने—अपने होटलों में गर्म रज़ाइयों और कम्बलों की गरमाहट का आनन्द लेने हेतु लौट गये थे। बहुत थोड़े—से नव—विवाहित युगल और युवा लड़के—लड़कियाँ ही इस कड़कड़ाती ठंड की चुनौती का सामना करते हुए टहल रहे थे, और इसलिये उनके शरीरों के बीच की दूरियाँ भी सिमटी हुई थीं, एक—दूसरे के शरीर की गर्मी पाने का प्रयास स्पष्ट परिलक्षित था। अधिकतर लड़कियों व स्त्रियों, जिन्होंने दस्ताने नहीं पहने हुए थे, ने अपना एक हाथ अपने साथी के ओवरकोट / कोट की जेब में डाला हुआ था। कोहरे के गहराने से लाईटों की रोशनी सिमटने लगी थी। सड़क पर रोशनी बहुत कम पड़ रही थी। स्कैंडल प्वाइंट — मॉल रोड और रिज़ का संधिस्थल — पर खड़े हुए जाह्नवी ने पूछा — ‘निर्मल, तुम्हें पता है, क्यों इस जगह को स्कैंडल प्वाइंट कहा जाता है?'

‘नहीं। इसका भी कोई इतिहास होगा। तुम्हें मालूम है तो बता दो।'

‘इसका इतिहास लिखित इतिहास की तरह स्पष्ट नहीं है, रहस्य की परतों से ढँका हुआ है। कवदंती है कि पटियाला रियासत के महाराजा राजिन्दर सह ने 1892 या 93 में तत्कालीन वॉयसराय की लड़की का यहाँ से अपहरण कर उससे विवाह रचा लिया था। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने शिमला में महाराजा के प्रवेष पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। तब महाराजा पटियाला ने चैल को, जो ऐंग्लो—नेपाली युद्ध में ब्रिटिश राज की सहायता करने हेतु महाराजा पटियाला को पुरस्कार—स्वरूप मिला था, अपने गीष्मकालीन आवास के लिये विकसित किया। चैल की ऊँचाई शिमला से सौ मीटर अधिक है। कुछ लोग इस घटना को महाराजा भूपिन्दर सह से भी जोड़ कर बताते हैं।'

निर्मल ने मज़ाकिया लहज़े में कहा — ‘आज अगर मैं भी महाराजा पटियाला जैसी गुस्ताखी कर लूँ तो तुम क्या करोगी?'

‘तुम वैसा कुछ नहीं कर सकते। ऐसा कुछ तुम्हारे चरित्र में है ही नहीं। थोड़ा—बहुत भी कुछ ऐसा—वैसा होता तो इस समय हम इस जगह इकट्ठे न होते।'

‘मुझ पर इतना विश्वास है?'

‘हाँ और मुझे विश्वास है कि मैं गलत नहीं हूँ।.....अब डिनर लें?'

‘हाँ और पिफर वापस चलें, भाई साहब और भाभी जी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।'

जब अनुराग घर पर आया तो उसने चाय पीते हुए श्रद्धा से पूछा — ‘जाह्नवी और निर्मल दिखाई नहीं दे रहे, कहीं गये हैं क्या?'

‘मैंने ही उन्हें घूम—फिर आने के लिये कहा। वे मॉल रोड तक गये हैं। जाह्नवी कह गयी है कि वे डिनर करके आयेंगे। निर्मल के आने से आज बहुत दिनों बाद जाह्नवी के चेहरे पर हर वक्त छाई रहने वाली उदासी की जगह खुशी के चिह्न दिखाई दिये हैं।'

‘श्रद्धा, जाह्नवी बहुत सेंसिबल तथा मच्योर है, और जाह्नवी के कहे अनुसार निर्मल भी संस्कारी लड़का प्रतीत होता है, फिर भी पापा के न रहने पर हमारा दायित्व बढ़ गया है। हमें निगाह रखनी होगी कि सब ठीक—ठाक रहे।'

‘अनुराग, आपने ठीक कहा है कि हमारी जाह्नवी मच्योर है। मैंने पापा की डेथ के समय भी देखा था और आज भी ऑब्जर्ब किया कि जब वे लोग कमरे में बैठते हैं तो दरवाज़ा खुला ही होता है और टयूब—लाईट भी जल रही होती है। मुझे जाह्नवी पर विश्वास तो है ही, निर्मल के चरित्र में भी आम लड़कों की भाँति कोई छिछोरापन दिखाई नहीं देता। उनमें सम्बन्धों को लेकर किसी प्रकार का दुराव—छिपाव प्रतीत नहीं हुआ।'

‘मुझे खुशी है कि मेरे कहने से पहले ही तुम सतर्क हो। तुम स्त्रियों में लड़कों को परखने की सूझबूझ हम पुरुषों से कहीं अधिक होती है, यह मैं मानता हूँ।'

अगले दिन नाश्ता आदि करके घर से जाने के बाद शाम होने के करीब ही जाह्नवी और निर्मल तॅतापानी से वापस आये। लगभग डेढ घंटा जाने का और उतना ही समय वापसी का निकालने के बाद वे लगभग ढाई—तीन घंटे वहाँ रहे।

मॉल रोड, शिमला के भीड़—भरे माहौल के पूर्णतः विपरीत तॅतापानी में सैलानियों की सँख्या नगण्य थी। कारण शिमला से यहाँ की दूरी तथा सार्वजनिक परिवहन—व्यवस्था की कमी, वरना प्राकृतिक सौन्दर्य की यहाँ कमी नहीं। यहाँ सतलुज नदी के किनारे गर्म पानी के चश्मे हैं। ऐसा कहा जाता है कि इन झरनों के पानी में कई शारीरिक व्याधियों यथा जोड़ों के दर्द, तनाव और मुटापे से मुक्ति, तथा त्वचा—रोगों को दूर करने के गुण पाये जाते हैं। यह जगह घाटी में है अर्थात्‌ समुद्र—तल से यह जगह लगभग 2200—2250 फीट की ऊँचाई पर ही है, जबकि शिमला समुद्र—तल से लगभग 7000 फीट ऊँचा है। मशोबरा की आरे की तरह शरीर को चीरती शीत—लहर के विपरीत यहाँ की पीली—पीली, मीठी—मीठी धूप बदन को सुख का अहसास करवा रही थी। दूर—दूर तक फैली हरी—हरी घास, ऊँचे—लम्बे वृक्षों की परछाइयाँ, नदी के इर्द—गिर्द के नयनाभिराम व मनमोहक प्राकृतिक पर्वतीय दृश्य सहज में ही किसी अदृश्य अलौकिक सत्ता का स्मरण करवा देते हैं, जिसने अपनी ही रसिकता में इन अद्‌भुत नज़ारों का सृजन किया है। हिमाचल देवभूमि है। हो सकता है, देवता और अप्सराएँ अब भी अदृश्य रूप में यहाँ आकर अपने हृदयों के भेद एक—दूसरे से साझा करते हों। कभी—कभी परदों का चहचहाना सुनाई पड़ जाता था, वरना वातावरण पूर्णतः शान्त था। कुछ देर गर्म पानी में पैर लटका कर बैठने के उपरान्त उन्होंने मेंहदी—रचे खुले हाथ—सी धरा पर चटाई बिछाई, चटाई के ऊपर चादर बिछाकर तकिये रखे। निर्मल तुरन्त लेट गया। वह आँखें मूँदे प्रकृति के उन विस्मयकारी दृश्यों को अपने अन्तस पर अंकित करने में लगा था, जो उसने खुली आँखों से देखे थे। जाह्नवी बैठी सोच रही थी कि बचपन से अब तक हिमाचल में पली—बढ़ी हूँ, जन्म से लेकर अब तक की जीवनावधि में से कुल मिलाकर आठ—दस महीने हिमाचल से बाहर रहना पड़ा है, लेकिन जिस तरह की अनुभूति की गहरी नदी—सी अन्तर्मन में प्रवाहित होती आज प्रतीत हो रही है, वैसा पहले तो कभी अनुभव नहीं हुआ था। मन में सतरंगी भावनाएँ उमड़—घुमड़ रही हैं। क्या यह सब इसलिये कि आज निर्मल मेरे साथ है? निर्मल की आवाज़ से उसकी तन्द्रा भंग हुई। निर्मल कह रहा था — ‘जाह्नवी, तुम भी थोड़ी देर लेट जाओ। लेटे—लेटे मैंं तुम्हें दो साल पहले के अपने शिमला ट्रिप के बारे में बताता हूँ, यदि सुनने का मूड हो तो।'

‘हाँ—हाँ, जरूर सुनाओ। हम एक—दूसरे से बतियाने के लिये ही तो घर से यहाँ आये हैं।'

‘दो साल पहले क्रिसमस की छुट्टियों में मैं और मेरा दोस्त सुरेन्द्र दो दिन के लिये शिमला घूमने के लिये आये थे। तुम्हें सुनकर हैरानी होगी कि हमने चण्डीगढ़ से आने—जाने के किराये समेत दो दिन के शिमला ट्रिप में मात्रा सौ रुपये खर्च किये थे, जबकि कल केवल डिनर पर ही हमने सौ से अधिक खर्च कर दिये थे।'

‘रियली! यकीन नहीं होता, हैरानी वाली बात ही है।'

‘बात तो यकीन न होने वाली ही है, किन्तु यह सच्चाई है। हमने रात बिताई जैन धर्मशाला में। खर्च हुए केवल चार रुपये। पहले दिन जाखू मन्दिर देखा, शाम को रिज़ पर घूमे। दूसरे दिन सुबह सरदार जी के ढाबे पर पाँच रुपये में आलू के पराँठे मक्खन के साथ खाये। उसके बाद पर्यटन विभाग की बस में तीस रुपये की दो टिकटें ली और वाईल्ड फ्लॉवर हॉल, कुफरी, नालडेरा गोल्फ ग्राऊण्ड तथा फागू देखे। दो दिन के इस तरह घूमने में बहुत आनन्द आया था।'

‘और अब, मेरे साथ कैसा लग रहा है?'

‘इस आनन्द का तो कहना ही क्या है! ऐसे लगता है जैसे जत में हों! कभी कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसी हसीन वादियों में इतनी प्यारी साथी के साथ समय बिताने का मौका मिलेगा।'

‘मैं तो निःशब्द हूँ......खाना खायें?'

‘श्योर।'

श्रद्धा ने खाना पैक करके कार में रखवा दिया था। निर्मल का उत्तर सुनते ही जाह्नवी, कार जो थोड़ी दूर खड़ी थी, तक गयी और ड्राईवर गोपाल को टिफिन लाने के लिये बोला। सबसे पहले जाह्नवी ने गोपाल को एक थाली में खाना डालकर दिया और फिर निर्मल और स्वयं के लिये एक ही थाली में खाना लगाया। उसे ऐसा करता देखकर निर्मल ने कहा — ‘थाली तो एक और भी है।'

जाह्नवी ने चुहलबाजी के अन्दाज़ में उत्तर दिया — ‘हाँ है, किन्तु आज हम निश्चत होकर एक थाली में खाना खा सकते हैं, क्योंकि यहाँ किसी ‘मनोज' के देख लेने पर तुम्हारे नर्वस होने का डर नहीं है।'

जाह्नवी की बात सुनकर निर्मल का अन्तःमन प्रफुल्लित हो उठा, किन्तु बिना कोई प्रत्युत्तर दिये वह दत्तचित्त होकर खाना खाने लग गया।

खाना समाप्त होने पर गोपाल ने सारे बर्तन गर्म पानी से धोये और पैक करके कार में रखकर स्वयं भी घूमने—फिरने के लिये इधर—उधर हो गया। खाना खाने के उपरान्त निर्मल और जाह्नवी काफी देर तक प्रकृति की गोद में एकान्त एवं शान्त वातावरण तथा सूर्य की ठंड़ी—मीठी धूप सेंकते हुए खामोश बैठे रहे। एकाएक हवा चलने लगी। हवा के झोंकों से जाह्नवी के धूप में चमकते सुनहरी बालों की लटें उड़ती हुई उसके माथे पर बिखर गर्इं। निर्मल घुटनों के बल आगे बढ़कर उन लटों को ठीक करने लगा। उसे ऐसा करते देख जाह्नवी बोली — ‘यह क्या कर रहे हो?'

‘कुछ नहीं। ये लटें तुम्हारे ललाट को ढक रही थीं और मुझे तुम्हारा उत ललाट बहुत अच्छा लगता है।'

‘तुम भी अज़ीब हो! अक्सर तो लड़के उड़ती हुई लटों के दीवाने होते हैं।'

‘कितने—एक लड़के दीवाने हैं तेरी लटों के?'

‘मेरी कँवारी प्रीत का दीवाना तो मेरे सामने बैठा है।'

‘सच कहती हो?'

जाह्नवी ने निर्मल के बढ़े हुए हाथ को पकड़कर चूमते हुए उत्तर दिया — ‘मुझ से क्या पूछते हो, अपने हृदय से पूछ लो।'

इसके बाद कहने—पूछने को कुछ न रहा।

निर्मल अपनी पूर्वावस्था में लौट आया। एक बार फिर खामोशी का आलम छा गया। एक—दूसरे के सािध्य में बैठे हुए जाह्नवी को अप्रतिम आनन्द की जो अनुभूति हो रही थी, जीवन में ऐसी अनुभूति पहले कभी नहीं हुई थी। इसी आनन्दानुभूति में उसे अज्ञेय की एक कविता स्मरण हो आई। उसने निर्मल से पूछा — ‘वैसे तो मुझे यह खामोशी बहुत भा रही है, लेकिन यदि तुम बोर हो रहे हो तो अज्ञेय की एक कविता सुनाऊँ?'

‘नेकी और पूछ—पूछ। कौन—सी कविता सुनाओगी?'

‘हरी घास पर क्षण—भर।'

‘यह तो लम्बी कविता है।'

‘हाँ, लम्बी कविता है। तुमने पढ़ी है?'

‘पढ़ी तो नहीं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में अज्ञेय पर आलेख में इस कविता का उल्लेख आया था।......तुम्हें सारी कविता याद है?'

‘याद तो है, हो सकता है, कोई पंक्ति आगे—पीछे हो जाये।'

‘मैंने कौन—सी पढ़ रखी है। पंक्तियाँ आगे—पीछे भी हो जायेंगी तो भी मुझे तो पता चलना नहीं। कविता का रसास्वादन करवाने में अब देर न करो।'

जाह्नवी ने याद करते हुए सुनाना आरम्भ कियाः

‘आओ बैठें

इसी ढाल की हरी घास पर।

माली—चौकीदारों का यह समय नहीं है,

और घास तो अधुनातन मानव—मन की

भावना की तरह

सदा बिछी है — हरी, न्योतती,

कोई आकर रौंदे।

आओ बैठो

तनिक और सटकर, कि हमारे बीच

स्नेह—भर का व्यवधान रहे, बस,

नहीं दरारें सभ्य शिष्ट जीवन की।

चाहे बोलो, चाहे धीरे—धीरे बोलो,

स्वगत गुनगुनाओ,

चाहे चुप रह जाओ —

हो प्रकृतस्थः तनो मत कटी—छँटी

उस बाड़ सरीखी,

नमो, खुल खिलो, सहज मिलो

अन्तःस्मित, अन्तःसंयत हरी घास—सी।

क्षण—भुला सकें हम

नगरी की बेचैन बुदकती गड्‌ड—मड्‌ड

अकुलाहट —

और न मानें उसे पलायन;

क्षण—भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,

पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते,

तितली—भुनगे,

फुनगी पर पूँछ उठा कर इतराती

छोटी—सी चिड़िया —

और न सहसा चोर कह उठे मन में —

प्रकृतिवाद है स्खलन

क्योंकि युग जनवादी है।

क्षण—भर हम न रहें रह कर भीः

सुनें गूँज भीतर के सूने साटे में किसी

दूर सागर की लोल लहर की

जिसकी छाती की हम दोनों छोटी—सी

सिहरन हैं —

जैसे सीपी सदा सुना करती है।

क्षण—भर लय हों—मैं भी, तुम भी,

और न सिमटें सोच कि हमने

अपने से भी बड़ा किसी भी अपर को

क्यों माना!

क्षण—भर अनायास हम याद करेंः

तिरती नाव नदी में,

धूल—भरे पथ पर असाढ़ की भभक,

झील में साथ तैरना,

हँसी अकारण खड़े महावट की छाया में,

वदन घाम से लाल,

स्वेद से जमी अलक—लट,

चीड़ों का वन, साथ—साथ

दुलकी चलते दो घोड़े,

गीली हवा नदी की, फूले नथुने,

भर्रायी सीटी स्टीमर की,

खँडहर, ग्रसित अँगुलियाँ,

बाँसे का मधु,

डाकिये के पैरों की चाप,

अधजानी बबूल की धूल मिली—सी गन्ध,

झरा रेशम शिरीष का, कविता के पद,

मस्जिद के गुम्बद के पीछे सूर्य डूबता

धीरे—धीरे,

झरने के चमकीले पत्थर, मोर—मोरनी,

घुँघरू,

सन्थाली झूमुर का लम्बा कसक—भरा

आलाप,

रेल की आह की तरह धीरे—धीरे खचना,

लहरें, आँधी—पानी,

नदी किनारे की रेती पर बित्ते—भर की

छाँह झाड़ की

अँगुल—अँगुल नाप—नाप कर तोड़े

तिनकों का समूह,

लू

मौन।

याद कर सकें अनायासः

और न मानें हम अतीत के शरणार्थी हैं;

स्मरण हमारा—जीवन के अनुभव का

प्रत्यवलोकन —

हमें न हीन बनावे प्रत्यभिमुख होने के

पाप—बोध से।

आओ बैठोः क्षण—भरः

यह क्षण हमें मिला है नहीं नगर—सेठों

की फैयाजी से। (फैयाजी — दानशीलता, उदारता)

हमें मिला है ब्याज सरीखा।

आओ बैठोः क्षण—भर तुम्हें निहारूँ

अपनी जानी एक—एक रेखा पहचानूँ

चेहरे की, आँखों की—अर्न्तमन की

और—हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों कीः

तुम्हें निहारूँ,

झिझक न हो कि निरखना दबी वासना

की विकृति है!

धीरे—धीरे

धुँधले में चेहरे की रेखाएँ मिट जाएँ—

केवल नेत्र जगेंः उतनी ही धीरे

हरी घास की पत्ती—पत्ती भी मिट जावे

लिपट झाड़ियों के पेरों में

और झाड़ियाँ भी घुल जावें क्षिति—रेखा

के मसृण ध्वान्त में; (मसृण — कोमल, ध्वान्त— अंधकार)

केवल बना रहे विस्तार—हमारा बोध

मुक्ति का,

सीमाहीन खुलेपन का ही।

चलो, उठें अब,

अब तक हम थे बन्धु सैर को आये—

(देखे हैं क्या कभी घास पर लोट—पोट

होते सतभैये शोर मचाते?) (सतभइया — एक प्रकार की मैना)

और रहे बैठे तो लोग कहेंगे

धुँधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं।

—वह हम हों भी तो यह हरी घास ही जानेः

(जिस के खुले निमन्त्राण के बल जग ने

सदा उसे रौंदा है

और वह नहीं बोली),

नहीं सुनें हम वह नगरी के नागरिकों से

जिन की भाषा में अतिशय चिकनाई है

साबुन की

किन्तु नहीं है करुणा।

उठो, चलें, प्रिय!'

‘दाद देनी पड़ेगी तुम्हारी याददाश्त की, मुझे तो दो—चार लाइनों से अधिक की कोई कविता, गीत, गज़ल याद ही नहीं रहती। ऊँची—ऊँची पहाड़ियों के बीच फैली यह घाटी, और घाटी के बीच से कलकल कर बहती सतलुज के किनारे दूर—दूर तक बिछी मखमली घास पर बैठे हुए ऐसे लगता है, जैसे कि यह कविता हमारे ही मनोभावों की अभिव्यक्ति है। तुम्हें नहीं लगता ऐसा?'

‘निर्मल, किसी भी साहित्यिक रचना की सार्थकता इसी में है कि पाठक अथवा श्रोता स्वयं को उससे जुड़ा हुआ महसूस करे।'

निर्मल ने घड़ी की तरफ देखते हुए कहा — ‘अब हमें चलना चाहिये, क्योंकि कविता में भी तो कवि ने कहा है — उठो, चलें, प्रिय!'

‘तुम्हारी याददाश्त पर तो कमेंट नहीं करूँगी, किन्तु इतना जरूर कहूँगी कि तुम्हारी पकड़ बड़ी मज़बूत है।'

इसके साथ ही उन्होंने चादर—चटाई समेटी और गाड़ी की तरफ हो लिये। यह दिन उनके लिये असीम आनन्द का दिन रहा।

क्रिसमस की पूर्व रात्रि में रेडियो पर मौसम की पूर्व सूचना में हल्की बूँदाबाँदी की आशंका जताई गयी थी। सुबह आकाश मेघाच्छादित था। ब्रेकफास्ट करते हुए अनुराग ने सुझाया कि मौसम को देखते हुए मॉल रोड पर जाने का कोई औचित्य नहीं; कहीं बरसात हो गयी तो घूमना—फिरना बीच में ही रह जायेगा। लेकिन मीनू की जिद्द के आगे उन्हें झुकना पड़ा। अभी वे लोग ‘रिज़' पर पहुँचे ही थे कि झमाझम बरसात होने लगी। वे लोग भागकर चर्च में चले गये। चर्च पहले से ही भरा हुआ था। बहुत बड़ा क्रिसमस ट्री स्टेज की शोभा बढ़ा रहा था। क्रिसमस ट्री के नीचे और आसपास गिफ्टस के ढेर लगे हुए थे। दीवारों पर ईसा मसीह और मरियम के जीवन को दर्शाते चित्ताकर्षक तैल चित्र प्रदर्शित थे। क्रिसमस कैरल्‌स की मधुर संगीत लहरियाँ वातावरण को दिव्यता प्रदान कर रही थीं। उपस्थित जनसमुदाय में बहुत—से लोगों, विशेषकर बच्चों ने सान्ता क्लॉज़ वाली टोपियाँ पहनी हुई थीं। यह देखकर मीनू ने अनुराग का हाथ झँझोड़ते हुए कहा — ‘पापा, हम भी सांता वाली कैप लेेंगे।'

अनुराग इधर—उधर देखने लगा कि सान्ता क्लॉज़ जो बच्चों को गिफ्टस देकर उनसे हाथ मिला रहा था, ने देखा कि मीनू अपने पापा से कुछ लेने का आग्रह कर रही है। वह उनके पास आया और मीनू से पूछा — ‘मेरी लिटल ऐंजिल को क्या चाहिये?'

‘अंकल, हम पापा से आप जैसी कैप लेने की रिक्वैस्ट कर रहे हैं।'

सांता ने अपने कोट की जेब में हाथ डाला, एक छोटी टोपी निकाली और मीनू के सिर पर रखते हुए उसे एक गिफ्ट—पैक भी थमा दिया। उसकी गाल थपथपाते हुए पूछा — ‘लिटिल ऐंजिल हैप्पी?'

मीनू ने झूमते हुए कहा — ‘वैरी हैप्पी, अंकल। थैंक यू।'

मीनू ने तुरन्त गिफ्ट—पैक खोला और डॉल देखकर खुशी के मारे नाच उठी और बोली — ‘पापा, हम नहीं आते तो सांता क्लॉज़ मेरी गिफ्ट मुझे कैसे देता?'

‘हाँ बेटे, हम इसीलिये पहले यहाँ आये हैं।'

और फिर डॉल जाह्नवी को दिखाते हुए मीनू बोली — ‘देखो बुआ, कितनी सुन्दर डॉल है, है ना?'

जाह्नवी— ‘हाँ बेटे, लेकिन तुमसे सुन्दर नहीं है।'

मीनू की खुशी को देखकर अनुराग को लगा कि न आना वास्तव में गलत होता। बच्चों को छोटी—छोटी बातों में जो खुशी मिलती है, बहुधा हम उसका आकलन नहीं कर पाते। बच्चों की चाहना का संसार बड़ा सीमित होता है। छोटी—सी प्राप्ति भी उन्हें बड़ी खुशी दे देती है जबकि बड़ों की चाहना असीमित होती है। कई बार बड़ी प्राप्ति / उपलब्धि भी उनकी अपेक्षाओं से कम रह जाती है और प्राप्ति / उपलब्धि की खुशी होने की बजाय रह गयी कमी उन्हें अधिक अखरती है।

बाहर बरसात निरन्तर हो रही थी। इसलिये प्रत्येक रेस्तरां सैलानियों से भरा हुआ था। अन्ततः यही फैसला हुआ कि घर जाकर ही लंच करेंगे।

मशोबरा में बरसात नहीं थी, किन्तु शिमला की बरसात की वजह से यहाँ का तापमान भी काफी गिरा हुआ था और ठंड बहुत बढ़ गयी थी। लंच के पश्चात्‌ निर्मल गेस्टरूम में आ गया और कपड़े बदलकर बाहर की ठंड को रज़ाई की गर्मी से दूर करने का प्रयास करने

लगा। थोड़ी देर में जाह्नवी बहादुर को लेकर आई। बहादुर ने फायरप्लेस में लकड़ियाँ सैट करके रखीं और आग जला दी। कुछ ही देर में आग की लपटों से फायरप्लेस जगमगा उठा और कमरे में पसरी ठंड छूमंतर हो गयी।

निर्मल — ‘सोने या बैठने के कमरों में आग जलते तथा उसके इर्द—गिर्द बैठे लोगों के दृश्य फिल्मों में तो देखे थे, किन्तु आज उस दृश्य का स्वयं एक हिस्सा बनना मेरे लिए स्मरणीय रहेगा।'

कुर्सी पर बैठते हुए जाह्नवी बोली — ‘अब मैं आराम से बैठ सकती हूँ। कहो तो पैर रज़ाई में कर लूँ?'

‘मुझे क्या एतराज़ हो सकता है? बल्कि कल वाली कविता की पंक्तियाँ दुहराऊँ तो —

आओ बैठोः क्षण—भर तुम्हें निहारूँ

अपनी जानी एक—एक रेखा पहचानूँ

चेहरे की, आँखों की—अर्न्तमन की

और—हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों कीः

तुम्हें निहारूँ,

झिझक न हो कि निरखना दबी वासना

की विकृति है!'

‘तुम तो कहते थे कि दो—चार से अधिक पंक्तियाँ तुम्हें याद नहीं रहतीं। लेकिन मैंने जो कहा था — तुम्हारी पकड़ बड़ी मज़बूत है — प्रमाणित हो गया है।'

‘काव्य—जगत्‌ के इस माधुर्य से भरपूर कल्पना—लोक से हटाकर, जाह्नवी, मैं तुम्हें ठोस धरातल के यथार्थ से रूबरू करवाना चाहता हूँ। मैंने प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया है कि भाई साहब और भाभी जी की निगाहों में मैं तुम्हारे लिये पूर्णतः योग्य हूँ। फिर भी दो दिन से शंका का फन मुझे बार—बार डस रहा है। मुझे नहीं पता कि तुमने मेरे परिवार की आर्थिक

स्थिति से अपने भइया और भाभी को कहाँ तक अवगत कराया है। मैंने तुमसे अपने या परिवार के बारे में कुछ छिपाया नहीं है। खुदा—ना खास्ता, मैं कम्पीटिशन में रह जाता हूँ, क्या तब भी तेरा और मेरा यह सम्बन्ध उन्हें स्वीकार होगा?'

‘निर्मल, तुम एक सौ एक प्रतिशत सेलेक्ट होगे।'

‘मैं भी अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त हूँ। मैं केवल एक हाइपोथैटिकल प्रॅपोजिशन का हल चाहता हूँ। मान लो, मैं पास नहीं होता, तो?'

‘निर्मल, मैं तुम्हारी हूँ, तुम्हारी रहूँगी, कम व्हॉट मे। और अगर तुम्हें अब भी यकीन नहीं है तो आज ही पूर्ण रूप से सर्म्पण करती हूँ,' कहने के साथ ही जाह्नवी कुर्सी से उठ खड़ी हुई और रज़ाई का किनारा उठाकर अपने लिये जगह बनाने लगी।

‘जाह्नवी, तुम और तुम्हारी भावनाएँ गंगा—सी पवित्र हैं। तुम्हें लेकर मेरे मन में रत्ती—भर भी शंका नहीं है। ऐसा कुछ मत करो कि तुम्हारी पवित्रता और हमारे नाजुक रिश्ते पर किसी को अँगुली उठाने का अवसर मिले।'

जह्नवी पीछे हट गयी और कुर्सी पर धड़ाम से बैठ गयी।

‘मैंने नहीं सोचा था कि तुम इतने निष्ुर भी हो सकते हो!'

जह्नवी की आँखों से अश्रुधरा बह निकली। निर्मल ककर्त्तव्यविमूढ़ कुछ क्षण देखता रहा। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि क्या करे। जाह्नवी अपने पापा के निधन के बाद से जिस तरह भीतर तक टूट गई थी, उस सारी स्थिति पर विचार करके आखिरकार वह उठा। उसने अपनी अँगुलियों से उसके आँसुओं को पौंछा और थोड़ा—सा झुककर उसके होंठों को चूम लिया। जैसे ही निर्मल पीछे हटा, जाह्नवी ने होठों को अन्दर की ओर सिकोड़कर जीभ से चाट लिया मानो निर्मल के होठों की छूअन का कोई भी अंश बाहर न रहने देना चाहती हो। इस छूअन ने उसके अंतस्तल को भिगो दिया। वह शान्त हो गयी। निर्मल वापस बेड पर बैठ गया।

बाहर बादल छाये हुए होने से कमरे में नीम—अँधेरा था। फायरप्लेस में आग की बलखाती, इठलाती लपटों के कारण कमरे में तिलस्मी—से वातावरण का आभास होने लगा। समय का अस्तित्व जैसे था ही नहीं। बहादुर की आवाज़ ने सचेत किया। बहादुर कमरे के बाहर खड़ा कह रहा था — ‘मेम सा'ब, मालिक चाय के लिये बुला रहे हैं।'

क्रिसमस से अगले दिन निर्मल जब कार में बैठने लगा तो बहादुर सेबों की पेटी उठा लाया। श्रद्धा, अनुराग और जाह्नवी कार के पास ही खड़े थे। बहादुर को देख निर्मल ने कार में रखा पाँव बाहर निकाला और अनुराग को सम्बोधित करते हुए कहा — ‘भाई साहब, इसकी क्या जरूरत थी?'

‘कहीं से खरीदे तो हैं नहीं, अपने बाग के हैं। अंकल—आंटी के लिये हैं। उन्हें हमारी नमस्ते कहना। निर्मल, तुम्हारे आने से जाह्नवी बहुत सम्भल गयी है, धन्यवाद।'

निर्मल ने एक बार फिर से अनुराग और श्रद्धा को नमस्ते की और जाह्नवी को हाथ हिलाकर ‘बॉय' करते हुए कहा — ‘मीनू जब जाग जाये तो मेरी ओर से प्यार करना।'

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