आसपास से गुजरते हुए - 1

आसपास से गुजरते हुए

(1)

गलियां अनजानी

साल: 1999

मुझे पता चल गया था कि मैं प्रेग्नेंट हूं। मैं शारीरिक रूप से पूरी तरह सामान्य थी। ना शरीर में कोई हलचल हो रही थी, ना मन में। मैं अपनी लम्बी कोचीन यात्रा के लिए सामान बांध रही थी। बहुत दिनों बाद मैंने अटारी में से अपना सबसे बड़ा सूटकेस निकाला। झाड़-झूड़कर बैठी, तो चाय पीने की तलब हो आई। मैंने लिस्ट बना रखी है कि मुझे क्या-क्या लेकर जाना है। वरना पता नहीं कितनी चीजें मिस कर दूंगी। चाय का पानी गैस पर खौलाने रखा और मैं लिस्ट पर नजर दौड़ाने लगी। दूसरे ही नम्बर पर था सेनेटरी...। फरवरी की ठंडी दोपहरी में भी मेरी नसों में पसीना दौड़ गया। पिछले बीस-पच्चीस दिनों से रोज तैयारी करके बाहर जा रही हूं। यानी, यानी...मैं एकदम से उठकर खड़ी हो गई। शर्ली भाभी दो-तीन घंटे में कलकत्ता से दिल्ली मेरे घर पहुंचती ही होगी, यानी मेरे पास तो डॉक्टर के पास जाने तक का समय नहीं है।

पता नहीं कितने दिन रहना पड़ेगा कोचीन में। हो सकता है, अप्पा खुद हमें वहीं ठहरने ना दें। कोचीन जाने की योजना भी अचानक ही बनी थी। कभी सोचा नहीं था कि अप्पा ऐसा करेंगे। पिछले हफ्ते देर रात गए सुरेश भैया का फोन आया था, उनकी आवाज बैठी हुई थी। वे पूछ रहे थे, ‘तुझे इन्वीटेशन कार्ड मिला?’

‘कैसा इन्वीटेशन?’ मैं अचकचा गई। मैंने चार दिनों से अपनी डाक नहीं देखी थी, हो सकता है, आया पड़ा हो।

‘अप्पा शादी कर रहे हैं! सुरेश भैया ने रुककर कहा।’

मैं सन्न रह गई। अट्ठावन साल की उम्र में अप्पा शादी कर रहे हैं? लेकिन उन्होंने आई से तलाक कहां लिया है? क्या आई को पता भी है?

‘सुन रही है अनु? हमें कुछ करना होगा, आई के लिए। अप्पा को शादी से रोकना होगा।’

‘लेकिन अप्पा क्यों कर रहे हैं शादी?’ मैं पूछे बिना नहीं रह सकी।

‘ये मैं कैसे बताऊं? फिलहाल तो मैं सोच रहा हूं कि हमें जल्द-से-जल्द कोचीन पहुंचकर अप्पा से मिलना होगा। वे करेंगे तो अपने मन की, पर अगर हमने अप्पा को मना लिया....’

‘जरूर अप्पा की बड़ी बहनों ने उन्हें उकसाया होगा!’

‘अनु, मैंने कल आई से बात की। उन्हें तो पता भी नहीं। अप्पा ने हम तीनों भाई-बहनों को अपनी शादी पर बुलाया है। विद्या दीदी भी आ रही है दुबई से। मुझे लगता है, अगर हम वहां पहले पहुंच जाएं, तो शादी रोक सकते हैं। तू अपने ऑफिस से छुट्टी ले ले। मैं और शर्ली कल या परसों की ट्रेन से दिल्ली पहुंच जाएंगे। फिर हम सब साथ में कोचीन चलेंगे।’ सुरेश भैया की आवाज कांप रही थी।

मैं बहुत ज्यादा डिस्टर्ब हो गई। अप्पा को क्या हो गया? मन के कोने में यह बात भी आई कि करने दो उनको शादी, वैसे भी आई और अप्पा सालों पहले दिल से अलग हो चुके हैं। अप्पा की दूसरी शादी से आई को क्या फर्क पड़ जाएगा? यही ना कि वे अब किसी के नाम का सिन्दूर नहीं लगा पाएंगी, गले में पड़ा मंगलसूत्र मतलब खो देगा? पर शायद फिर पापा पुणे का घर भी आई से छीन लेंगे। वही तो एकमात्र सम्बल है आई का। अपने घर के बल पर वे ना जाने कितनी लड़ाइयां लड़ जाती हैं, कभी अपना आंगन नहीं छोड़तीं। आई के लिए दिल पिघलने-सा लगा। क्या मिला उनको अप्पा से शादी करके? बस तीन बच्चे और जिन्दगी-भर का दुख!

मैंने दफ्तर से दस दिन की छुट्टी ले लीँ। वैसे भी पिछले दो सालों से मैंने बहुत कम छुट्टी ली थी, सिवाय पिछले महीने के वो दिन। पिछले दिनों मैं लगातार काम कर रही थी, मन-मन थक चुका था। मुझे भी एक ब्रेक की सख्त जरूरत थी। मैंने अगले ही दिन मंगलम एक्सप्रेस से दिल्ली से कोचीन जाने के लिए तीन टिकट बुक करा लिए। फरवरी का महीना था, मुझे आराम से टिकट मिल गया।

कल रात सुरेश भैया का फोन आ गया कि वे शर्ली के साथ दिल्ली नहीं आ पाएंगे। उन्हें कुछ जरूरी काम आ गया है। वे कलकत्ता से भोपाल हवाई जाज से आ जाएंगे और वहां से मंगलम एक्सप्रेस ले लेंगे। कल सबेरे लगभग नौ बजे की ट्रेन है, शर्ली भाभी के घर पहुंचने से पहले अगर मैं डॉक्टर के पास हो आऊं? अगर डॉक्टर ने कह दिया कि मैं प्रेगनेंट हूं, तो...! मेरे अंदर तक सिहरन दौड़ गई।

31 दिसम्म्बर की रात को जब मैं शेखर के साथ इक्कीसवीं सदी में कदम रख रह थी, तब शायद पल-भर को भी यह ख्याल दिमाग में नहीं आया था कि मुझे या उसे आगे की सोच लेनी चाहिए। कभी सोचा भी नहीं था कि शेखर इस तरह दफ्तर की पार्टी के बाद मुझे घर छोड़ने आएगा और हम दोनों ऐसे मोड़ पर आ खड़े होंगे, जहां और कुछ मुमकिन ना होगा। पार्टी में शेखर की मंगेतर माना हमारे साथ ही थी। उसका भाई कल सबेरे की फ्लाइट से न्यूयॉर्क जा रहा था। वह रात को किसी भी हालत में घर जाना चाहती थी। शेखर ने अपनी नई सान्त्रो में पहले उसे छोड़ा। माना चाहती थी कि शेखर कुछ देर उसके घरवालों के साथ बिताए। शेखर गाड़ी से नीचे उतर आया, ‘रहने दो। अनु को भी घर छोड़ना है।’

माना ने कुछ जोर देकर कहा, ‘तुम भी आओ न अनु! आज तो घर में सभी हैं।’

मैं बेमन से नीचे उतर आई। अपरिचित लोगों से मिलना कोई खास पसन्द नहीं है। माना मेरा परिचय शेखर के बॉस के रूप में करा रही थी। मैं असहज महसूस कर रही थी। शेखर उस घर का होनेवाला दामाद था। माना के पापा निखालिस दिल्लीवाले अन्दाज में अपने दामाद को इम्प्रेस करने में जुटे हुए थे। मैंने अपना चेहरा फेर लिया। भले मैं चाहे जो कर लूं, दिल्ली की कभी नहीं हो पाऊंगी।

एक तरफ दिलेर मेहन्दी का नया एलबम बज रहा था, दूसरी तरफ राजस्थान के लोक गायक ढपली पर तान अलाप रहे थे। मैं लॉन में जाकर बैठ गई। कड़कती ठंड मेरी हड्डियों में जमने लगी। मैं बीच में अलाव में आंच तापने लगी। माना मेरे लिए जिन ले आई। और कोई दिन होता, तो मैं मना कर देती। आज तो लग रहा था जैसे कुछ गर्म या तेज ना पिया तो बस अगले क्षण मैं बर्फ बन जाऊंगी।

मैंने लगातार तीन-चार पैग जिन पी ली। शेखर मुझसे पूछ गया कि मैं कम्फर्टेबल तो हूं। आधे घंटे बाद लगने लगा जैसे गर्म हवा चलने लगी हो। मैं उठ खड़ी हुई। दरवाजे से बाहर आई, तो पीछे शेखर दौड़ता हुआ आया, ‘कहां जा रही हो अनु?’

मैंने धीरे से कहा, ‘घर।’

‘इस वक्त अकेली जाओगी? रुको, मैं छोड़ देता हूं।’

रात के ग्यारह बज रहे थे। मैं नहीं चाहती थी कि माना मुझे लेकर कुछ गलत सोचे। शेखर ने जिद करते हुए कहा, ‘मेरी वजह से तुम अपनी कार लेकर नहीं आई। दिल्ली इन दिनों बिल्कुल सेफ नहीं है। या तो तुम यहीं रुक जाओ रात को।’

‘नहीं, मुझे घर जाना है। अच्छा, तुम ड्रॉप कर दो।’

शेखर बना किसी से कहे अपनी गाड़ी निकाल लाया। मैंने पूछा भी, ‘माना से नहीं कहना?’

‘बस, तुम्हें छोड़कर मैंने वापस यहीं आना है।’

शेखर ने फुर्ती से कार आगे बढ़ा ली। ग्रेटर कैलाश से मालवीय नगर की आधे घंटे की दूरी उसने पंद्रह मिनट में पूरी कर ली। और दिनों की अपेक्षा आज धुंध भी कम थी। मैं रास्ते भर नहीं बोली। कहीं यह महसूस कर रही थी कि आज रात जब पूरी दुनिया अगली सदी में प्रवेश कर रही होगी, मैं अपने दो कमरे के घर में बिल्कुल अकेली होऊंगी। शेखर ने घर के सामने गाड़ी रोक दी। मैं उतर गई। जिन का असर अब तक बरकरार था। मैं लड़खड़ाती हुई सीढ़ियां चढ़ने लगी। शेखर ने पीछे से आकर मुझे थाम लिया, ‘तुम ठीक तो हो?’

मैं जबर्दस्ती मुस्कुराई, ‘हां, अब तुम जाओ।’

शेखर ने मेरी बात नहीं सुनी, वह मेरी बांह पकड़कर मुझे ऊपर ले आया। उसकी आवाज सपाट थी, ‘चाबी कहां रखती हो तुम?’ मैंने किसी तरह अपने जैकेट की जेब से चाबी निकालकर उसे दे दी। दरवाजा उसने ही खोला, जैसे वह इस घर में रहता हो और मैं मेहमान हूं। मुझे सच में चढ़ गई थी। पूरा बदल हल्का हो गया था, दिमाग मेरे काबू में रहा ही नहीं। मैं पता नहीं क्या अनर्गल बोले जा रही थी। शेखर चुपचाप सेटी पर मेरे पास आकर बैठ गया।

फिर पता नहीं क्या हुआ, हो सकता है, मैंने ही उसे कुछ कहा हो, वह मेरे पास आ गया, उसने मेरी बांह थाम ली और मुलायम स्वर में कहा, ‘तुम डर क्यों रही हो? मैं हूं न!’

मैं भावुक हो गई, ‘मुझे कोई प्यार नहीं करता शेखर,’ मैं रौ में बहकती चली गई, ‘देखो, आज रात भी मैं बिल्कुल अकेली हूं। किसी को मेरी सुध लेने की फुर्सत नहीं।’

शेखर ने बिल्कुल हेडमास्टर की तरह मेरे सिर पर हल्की चपत लगाई, ‘तुम्हें चले जाना था उनके पास। वैसे तुम तो पुणे जाने वाली थीं न मां से मिलने! क्या हुआ?’

‘आई अपनी दीदी के साथ कोल्हापुर गई हैं नया साल मनाने। मैं वहां क्या करती?’ मेरे स्वर में उदासी थी, ‘कहने को तो सब हैं शेखर, अप्पा, आई, दीदी, भाई, पर सबकी अपनी जिन्दगी है। मैं जब भी उनके पास रहने जाती हूं, दो ही दिन में वापस आने के लिए छटपटाने लगती हूं।’

शेखर ने हाथ पकड़कर मुझे बिस्तर पर बिठा दिया, उसने मेरे पास बैठते हुए सहजता से पूछा, ‘अनु, तुम शादी क्यों नहीं कर लेती?’

मैं क्षण-भर को चुप रही और हमेशा वाला उत्तर दोहरा दिया, ‘क्या करूं, कोई मिलता ही नहीं!’

‘मैं नहीं मानता। सच कहो...’

‘सच...’ मैं थम गई, मैंने ईमानदारी से बताना शुरू किया, ‘मैं अठारह साल की थी। सेकेण्ड इयर में पढ़ रही थी। मेरे कॉलेज का एक सीनियर था, मेरा दो-तीन साल उससे अफेयर रहा। फिर...उसने कहीं और शादी कर ली। मैं बुरी तरह हिल गई। कुछ सालों के लिए मर्दों से नफरत-सी हो गई। अब भी अन्दर एक डर-सा बना हुआ है कि अगर मैं किसी को बहुत पास आने दूंगी, तो वह मुझे दगा दे जाएगा। मैं एक बार फिर उस दौर से गुजरने को तैयार नहीं।’

शेयर ने एक दोस्त की तरह मेरी बांहें थामीं, हाथ दबाया। मैं शेखर को सिर्फ छह महीने से जानती थी। शायद मुझसे तीन-चार साल छोटा होगा। ऑफिस में वह मुझे मैडम कहता था। धीरे-धीरे दूसरों की देखा-देखी अनु कहने लगा। मेरे नीचे चार सिस्टम अनालिस्ट काम करते थे। मैं प्रोजेक्ट मैनेजर थी। उन चारों में शेखर सबसे शांत रहता था। दूसरे हर वक्त चुटकुले सुनाते रहे, इंटरनेट पर ‘हॉट साइट’ की बात करते, शेखर बस दूर से मुस्कुरा-भर देता। महीने-भर बाद उसने खुद बताया कि उसकी गर्ल फ्रेंड है माना। वह उससे शादी करने जा रहा है। सुनकर अच्छा लगा था। मैंने उसकी तुलना अपने प्रेमी अमरीश से की थी। कायर, डरपोक, कमीना! अब भी मेरे अन्दर कितना गुस्सा भरा था अमरीश के लिए।

फिर पता नहीं क्या हुआ, शेखर ने मेरे बाल सहलाते हुए कहा, ‘तुम मर्दों पर विश्वास करना सीखो, अपने आप वे तुम्हारे पास खिंचे चले आएंगे।’

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बेहतरीन शुरुवात आपके उपन्यास की