आसपास से गुजरते हुए - 7

आसपास से गुजरते हुए

(7)

जिन्दगी ही तो है!

साल-भर बाद मैंने उस नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। बाटलीवाला मुझे छोड़ना नहीं चाहते थे, पर मैं अड़ गई कि मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। सुरेश भैया ने मुझे इस बात पर लम्बी झाड़ लगाई। हम दोनों उनकी कार में चर्चगेट से अंधेरी आ रहे थे। हाल ही में भैया ने सेकेण्ड हैंड मारुति गाड़ी खरीदी थी। रास्ते में मैंने उन्हें बताया कि मैंने नौकरी छोड़ दी है। सुरेश भैया के माथे पर बल पड़ गए।

‘अनु, तू बहुत जल्दबाज होती जा रही है। ऐसे तो तू कभी किसी नौकरी में जम नहीं पाएगी।’

‘ऐसा नहीं है। मैं जिन्दगी-भर सिर्फ एक कंप्यूटर ऑपरेटर बनकर नहीं रहना चाहती।’ मैंने तर्क दिया।

‘तुम नौकरी करते हुए भी तो आगे पढ़ सकती हो, ईवनिंग क्लास में जा सकती हो।’

मैं चुप रही। सुरेश भैया ने कुछ सख्त आवाज में कहा, ‘तुम अपने निर्णय खुद लेती हो, यह अच्छी बात है। पर तुम कभी अपने गलत निर्णय से नहीं सीखतीं। क्या तुमने यह जरूरी नहीं समझा कि नौकरी छोड़ने से पहले मुझसे डिस्कस कर लेतीं?’

‘मैंने जानकर कुछ नहीं किया। बस, वहां मेरा दम घुटने लगा था। मैं और भी कुछ कर सकती हूं।’ मैंने जिद भरे स्वर में कहा।

‘मुझे पता है। अब तुम चौबीस साल की हो गई हो। तुम्हें अपनी जिंदगी के बारे में संजीदगी से सोचना चाहिए। शादी करनी है, तो कर लो।’

‘नहीं! बिल्कुल नहीं, कभी नहीं।’

‘ठीक है, मैं तुम्हारे लिए नहीं रुकूंगा। मैं शर्ली से शादी कर रहा हूं।’

‘क्या शादी के बाद मैं तुम्हारे साथ रह सकती हूं? मुझे पुणे वापस नहीं जाना।’

सुरेश भैया की आंखों में मेरे लिए ममता छलक आई, ‘पगली है! तू मेरे पास नहीं रहेगी, तो और कहां रहेगी? अच्छा, तुझे आगे पढ़ना है, तो पढ़ ले, मैं फीस के पैसे दूंगा।’

मैं निश्चिंत हो गई। महीने-भर तक मैंने शर्ली के साथ उनकी शादी की शॉपिंग की। इस बीच मैंने एपटेक कंप्यूटर में एडवान्स कोर्स में दाखिला ले लिया।

इन दिनों मेरे अंदर भी मंथन चल रहा था कि वाकई मुझे गंभीरता से और जल्द-से-जल्द अपनी जिंदगी का कुछ करना होगा। सुरेश भैया ने शादी से बस दस दिन पहले अप्पा और आई को खबर की। अप्पा ने तो फोन पर ही उन्हें डांटना शुरू कर दिया।

भैया ने शांत स्वर में कहा, ‘अप्पा आप चाहे जो भी कहिए, उन्नीस जनवरी को मैं शर्ली से शादी कर रहा हूं।’

उन्नीस जनवरी-दो साल पहले इन्हीं दिनों अमरीश की शादी हुई थी! इतनी जल्दी दो साल बीत गए।

अप्पा अगले ही दिन मुंबई आ गए। भैया ऑफिस गए हुए थे। उन्होंने मुझे लताड़ना शुरू कर दिया, ‘सुरेश इतने दिनों से एक क्रिश्चियन लड़की के साथ घूम-फिर रहा है, तुमने यह बात मुझे क्यों नहीं बताई?’

मैं अचकचा गई, ‘मुझे नहीं पता था अप्पा, कि आपको बताना है।’

अप्पा आगबबूला हो गए, ‘तुम सब अपनी मर्जी की कर रहे हो। भूल गए कि तुम्हारा बाप अभी जिन्दा है। मैं देखता हूं, कैसे सुरेश उस लड़की से शादी करता है। मैं उसकी शादी अपनी बहन की बेटी श्रीलेखा से कराऊंगा।’

दिन-ब-दिन अप्पा के प्रिय रिश्तेदारों की फेहरिस्त बढ़ती जा रही थी। पहले मेरे लिए अप्पू, अब भैया के लिए श्रीलेखा!

जब शाम को भैया घर आए, तो अप्पा ने कोहराम मचा दिया, ‘डेय, रास्कल! मुझसे परमीशन लिए बिना तूने शादी का फैसला कैसे कर लिया?’

भैया उखड़ गए, ‘शादी मेरी है। फैसला आपका कैसे होगा?’

अप्पा बुरी तरह से बौखला गए, ‘मैं देखता हूं, तू कैसे करेगा शादी?’

भैया की आवाज धीमी हो गई, ‘अप्पा बचपन में तो आपने मार-मारकर मुझसे काम करवा लिया। अब क्या करेंगे?’

अप्पा गुस्से में बिना खाना खाए चले गए। एन्टाप हिल में उनके भाई के दोस्त रहते थे, वे वहीं रुके थे। आई सप्ताह भर बाद आईं, खाली हाथ। मुझे एक कोने में ले जाकर बोलीं, ‘मैं सुरेश की नवरी के लिए कुछ लेकर नहीं आई।’ वे अपने दाएं हाथ की मध्यमा उंगली से अपनी शादी की अंगूठी उतारती हुई निर्विकार भाव से बोलीं, ‘इसे बेचकर नवरी के लिए कुछ ले आऊंगी।’ मैंने मना नहीं किया। अगले दिन मेरे साथ दादर में सेठ ज्वेलनर्स के पास अंगूठी बेचकर उन्होंने नई अंगूठी खरीदी। शादीवाले दिन आई ने अपनी दस साल पुरानी सूती नीली चन्देरी पहनी। मैंने सुरेश भैया की शादी के लिए स्पेशल लाचा बनवाया था। मेरून रंग के क्रेप सिल्क पर सुनहरे मोतियों और दबके का काम था। शर्ली ने क्रीम रंग की जरी की साड़ी पहन रखी थी। भैया सुरेश ने उसे सोने का एक सेट दिलवाया था। सादी-सी दुलहन और सजी-धजी ननदिया!

शादी के मण्डप तक पहुंचते-पहुंचते मुझे खुद अजीब लगने लगा। भैया के कहने पर शर्ली के परिवारवाले हिन्दू रीति से शादी करने को तैयार हो गए। शादी के बाद दोनों पादरी का आशीर्वाद लेने चर्च भी गए। बस दो घंटे में शादी की सारी रस्में पूरी हो गईं। अप्पा नहीं आए। आई खुद रात की बस पकड़कर पुणे लौटना चाहती थी।

आई से मैं इस बार सात-आठ महीने बाद मिली थी। पिछली बार उन्होंने मुझसे कहा था कि अप्पा की हिंसात्मक प्रवृत्तियां बढ़ती जा रही हैं। एक बार उन्होंने आई के सिर पर कप दे मारा था। मैं परेशान थी। अब तो उस घर में आई का पक्ष लेनेवाला भी कोई नहीं रहा। अप्पा के रिश्तेदार घर में कब्जा जमाते जा रहे थे, आई बिल्कुल अकेली पड़ती जा रही थी। मैंने आई को रोकने की बहुत कोशिश की, ‘आई, कुछ दिन रुक जाओ। कल भैया और शर्ली हनीमून मनाने गोआ जा रहे हैं। मैं अकेली रह जाऊंगी।’

आई फीकी-सी हंसी हंसती हुई बोलीं, ‘मुलगी, उधर मेरे पेड़-पौधे भी तो अकेले हैं। एक दिन पानी ना डालो तो सूख जाते हैं। इन दिनों फूलगोभी के पौधे लगाए हैं, कल खाद डालनी है। अशी-कशी थाम्बेल भी! अग...तुइच ये णा।’

आई अब ज्यादातर मराठी में बोलने लगी थीं। मैं उन्हें छोड़ने बस स्टैंड तक गई। आधा किलो सेब और चार केले खरीदकर मैंने उनके हाथों में देते हुए कहा, ‘आई, रास्ते में खा लेना। तुमने दोपहर को शादी में भी ठीक से नहीं खाया!’

‘हां, आजकल मैं मांस-मछली नहीं खाती। सामने बैठकर कोई खाता है, तो भी उबकाई-सी आती है।’

‘तो तुम अप्पा के लिए मछली कैसे बनाती हो?’

‘अब मैं कहां बनाती हूं तेरे अप्पा का खाना?’ आई की आंखें भर आईं। मुझे अंदर से कुछ पिघलता हुआ महसूस हुआ। यही एकमात्र सूत्र था, जो उन्हें अप्पा से जोड़े हुए था। अप्पा मछली सिर्फ आई के हाथ की ही खाते थे। अब आई घर में अपने लिए खाना अलग बनाती थीं, अप्पा का खाना शान्तम्मा बनाती थी।

मैंने अपने दोनों हाथों से आई का दायां हाथ भींच लिया, ‘आई, तुम अपना ख्याल रखना। अप्पा की ज्यादतियां मत सहना। तुम्हारी अपनी भी जिन्दगी है। तुम यहां आ जाओ, मुंबई, हमारे पास।’

‘अपना घर छोड़कर कैसे आऊं?’ आई ने अपने कमजोर हाथ की पकड़ मजबूत की, ‘मुलगी, अब सुरेश ने भी लगन कर ली, तू भी अपने लिए अच्छा लड़का देख ले।’ मैंने सिर झुकाकर ‘हां’ कहा। आई कुछ देर रुकीं, फिर अचानक पूछ लिया, ‘तू अभी तक नहीं भूली है न उसे?’

मैं चौंक गई। आई को मेरे और अमरीश के रिश्ते के बारे में पता था, पर उन्होंने कभी जताया नहीं था। मैंने जल्दी से कहा, ‘नहीं आई, ऐसा कुछ नहीं है!’

आई ने चलते-चलते मेरे सिर पर हाथ फेरा और बस में जाकर बैठ गईं। मेरा दिल भर आया। मन हुआ, दौड़कर उनके पास चली जाऊं। बस के जाने के बाद भी देर तक मैं स्टॉप पर खड़ी रही। अचानक अहसास हुआ कि मैं बिल्कुल अकेली हूं, सबकी अपनी-अपनी दुनिया है, मेरा कोई नहीं है!

***

***