Aaspas se gujarate hue - 3 in Hindi Moral Stories by Jayanti Ranganathan books and stories PDF | आसपास से गुजरते हुए - 3

आसपास से गुजरते हुए - 3

आसपास से गुजरते हुए

(3)

खुशबू का जिस्म नहीं होता

मेरी आई निशिगन्धा नाइक महाराष्ट्र की सारस्वत ब्राह्मण थीं। पुणे में उने बाबा थियेटर कम्पनी चलाते थे। आई भी थियेटर में काम करती थीं। उनका पूरा परिवार नाटक में मगन रहता था। मेरे अप्पा गोपालन स्वामी केरल के पालक्काड जिले के नायर सम्प्रदाय के थे। वे छोटी उम्र में घर से भागकर पहले मुम्बई आए, फिर वहां से पुणे आ गए। उस समय शायद वे दसवीं भी पास नहीं थे। टाइपिंग-शार्टहैंड सीखने के बाद वे नौकरी पर लगे और प्राइवेट बारहवीं, बी.ए. और फिर एम.ए. किया।

अप्पा पुणे में आई के घर में एक कमरे में किराए पर रहते थे। उन दोनों के बीच उम्र का अच्छा-खासा फासला था। अप्पा अट्ठाईस बरस के होंगे और आई सत्रह साल की। उन दोनों ने मंदिर में शादी की। आई बताती हैं कि उनके बाबा ने तो अप्पा को पीट ही दिया था। बाद में जब पता चला कि आई को दो महीने का गर्भ है, तो वे शांत हो गए। हालांकि आई ने अपने मुंह से यह बात कभी नहीं कही कि वे शादी से पहले गर्भवती थीं। आई की दीदी, सुल्लू मौसी ने बहुत बाद में बताया था। जाहिर है, आई को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। वे तो हमेशा विद्या दीदी को सतमासा बच्चा कहती थीं।

पता नहीं कैसे, अप्पा नौकरी में आगे बढ़ते चले गए। मेरे जन्म के समय वे रिचर्डसन एण्ड क्रूडास कम्पनी में हैड एकाउंटेंट थे। मुझे तो बस बचपन की झलक-भर याद है, दफ्तर से घर लौटते ही आई का अप्पा के जूते-मौजे उतारना, गर्म पानी में टॉवेल भिगोकर उनके पांव पोंछना और उनकी गालियां सुनना। अप्पा मलयालम में भयंकर गालियां देते थे। आई खामोश सुनतीं। विद्या दीदी पुणे में ही रहकर पढ़ीं। मुझे और सुरेश भैया को छुटपन से पंचगनी हॉस्टल में भेज दिया। विद्या दीदी ज्यादातर समय सुल्लू मौसी के घर बिताती थीं। तभी तो जब अप्पा को पता चला कि वे सुल्लू मौसी के नाअक में काम रही हैं, उन्होंने आई और दीदी को धुनकर रख दिया। सप्ताह-भर तक दीदी कराहती रहीं। फिर अप्पा ने कभी उन्हें मौसी के घर नहीं जाने दिया।

ऐसा नहीं था कि अप्पा कठोर दिल इंसान थे। वे अपने तरीके से बहुत प्यार करते थे हम तीनों बच्चों को। कभी उनका प्यार अनुशासित होता तो कभी बेलौस! जब भी वे पुणे से बाहर हाते, लौटते समय हमारे लिए ढेरों उपहार लाते। लगभग हर शनिवार को वे मुझसे मिलने हॉस्टल आते, घुड़सवारी, आइसक्रीम, खिलौन-उफ मैं बेसब्री से सप्ताहान्त का इंतजार करती। वे परियों की कहानी सुनाते। मुझे बुलाते-एपल! मेरी चोटी बनाते तो मैं दो दिन तक और किसी को अपने बाल बनाने नहीं देती थी। छुट्टियों में घर जाती, तो अप्पा कभी धोती को घुटना तक खींच कंधे पर अंगोछा डालकर स्पेशल मसाला दोशै तो कभी उड़द दाल की जांगरी। आई ने उस वक्त तक कभी मुझे उस तरह से प्यार नहीं किया था। होश आने के बाद मुझे यह तक याद नहीं कि आई ने कभी मुझे चूमा हो या मैंने अपना सिर उनकी गांद में रखा हो।

हमारे बीच बड़ा इन्र्फार्मल-सा संबंध रहा। आई एक गज दूरी से पूछतीं- ‘सब ठीक है?’मैं उतनी ही दूरी से कहती- ‘हां’।

बचपन से मैंने किशोरावस्था में कब कदम रखा, पता ही नहीं चला। आई ने पहले से कोई चेतावनी नहीं दी, कुछ नहीं समझाया। विद्या दीदी का मन होता तो कभी-कभार मुझे लड़कियोंवाली कोई बात बता देतीं, वरना वे भी अपने में मगन रहतीं।

मेरा प्यारा भाई सुरेश-हमारे दिल के तार कितने जुढ़े हुए थे! मैं अपने दिल की हर बात सुरेश भैया से कर पाती थी। हम दोनों एक साथ बड़े हुए थे, एक साथ अप्पा का अनुशासन और आई की उदासीनता झेली थी। जब कभी अप्पा आई से नाराज होते, मैं और सुरेश भागकर स्टोर रूम में छिप जाते। उस अंधेरे भयानक कोने में सुरेश के हाथों का गर्म स्पर्श मुझे अब तक याद है। अप्पा जब सुरेश भैया पर हाथ उठाते, उनकी मुट्ठियां तनी रहतीं। बस उस दिन वे मुझसे कतराते। मैं उनके पीछे-पीछे पूछती घूमती, ‘बहुत दर्द हो रहा है क्या? कहां मारा अप्पा ने?’

वे कुछ नहीं कहते। आई कभी उन्हें बचाने नहीं जातीं। सुरेश भैया दांत भींचे घंटों घर के बाहर चबूतरे पर बैठे रहते। रात को घर लौटते। रसोई में स्टील की प्लेट में आई उनके लिए दो चपाती, आमटी और चटनी ढककर रख जातीं, वे खा लेते।

बाद में मुझे सुरेश भैया पर बहुत दया आने लगी। जब कभी हम दोनों हॉस्टल से आते, अप्पा दो-चार बार जरूर उन्हें पीटते। वजह होती, मोहल्ले के लड़कों के साथ कंचे खेलना या खाते समय थाली में खाना छोड़ देना। तब सिर्फ पन्द्रह साल के थे सुरेश भैया, जब उन्होंने छुट्टियों में घर जाने से मना कर दिया। पूरे दो महीने वह अकेले पंचगनी हॉस्टल में रहे, पर घर नहीं आए।

उस साल मैं तेरह की हो गई थी। पहली बार अकेली बस से पंचगनी से पुणे आ रही थी। सुरेश भैया मुझे बस में खिड़की के पासवाली सीट पर बिठाकर चले गए। उनके बिना घर जाने का मेरा बिल्कुल मन नहीं था। बस में उल्टियां करते, चूरन की गोली चूसते जब पुणे पहुंची, तो देखा बस स्टॉप पर कोई लेने नहीं आया था। पता नहीं, अप्पा को खबर थी भी कि नहीं। मैं डरते हुए ऑटो से घर तक गई। घर में सन्नाटा था। शाम के सात बज रहे थे, बरामदे में बत्ती भी नहीं जल रही थी। मैंने दस मिनट तक दरवाजा खटखटाया, तब जाकर आई ने दरवाजा खोला। घर में वे अकेली थीं। विद्या दीदी की तबीयत खराब थी, अप्पा उन्हें लेकर डॉक्टर के पास गए थे।

आई के ठंडे स्वागत ने मेरे रहे-सहे उत्साह पर पानी फेर दिया। विद्या को पीलिया हो गया था, इसलिए घर में सिर्फ मूंग की दाल की फीकी खिचड़ी बनी थी। इतना बेस्वाद खाना था कि मेरे गले उतरा ही नहीं। छुट्टियों में मेरा पलंग विद्या दीदी के कमरे में लगता था। इस बार आई ने अपने कमरे में मेरा पलंग लगवाया। जब से होश संभाला है, अप्पा और आई को अलग-अलग कमरे में सोते देखा, कभी अजीब नहीं लगा। बल्कि जब कभी अप्पा रात को आई के कमरे से निकलते, तो खलनायक से कम नहीं लगते। मेरे पलंग की स्प्रिंग रात-भर बजती रही। अगली रात को मुझसे रहा नहीं गया। मैंने डरते-डरते आई से पूछ लिया, ‘मैं तुम्हारे साथ सो जाऊं?’

आई ने विचित्र निगाहों से मुझे देखा, ‘मेरे साथ सोएगी? चल आजा!’

मैं लपककर उनकी रजाई में दुबक गई। कितनी अच्छी खुशबू आ रही थी आई के बदन से! क्या चन्दन घिसकर लगाया था? मैं उनसे सट गई, आई ने दोनों हाथों से मुझे घेर लिया। उस एक क्षण में हम मां-बेटी इतने करीब आ गए जैसे हमारे बीच कभी दूरी थी ही नहीं।

उनका संग बहुत कुछ समझा गया मुझे। दुबली-पतली चूड़ियों भरी कलाई, बांह पर स्पष्ट दिखती हरी नसें, लम्बी सुतवां नाक पर हीरे की लौंग! कितनी भव्य लग रहीं आई! रात के अंधेरे में उनकी खुली आंख की पुतलियां चमक रही थीं, मैंने उनकी आंखें दूनी चाहीं, मेरे हाथ गीले हो गए। रो रही थीं आई!

मैं उन्हें भींचकर लेट गई। आई ने आज तक मुझे दूर क्यों रखा अपने से?

सुबह उठी तो मैंने मचलकर आई से कहा, ‘आज कुछ चटपटा बना दो न, दो दिन से खिचड़ी खाते-खाते जीभ कड़वी हो गई है।’

‘सोल कढ़ी बनाऊं? आज ही मंगाया है ताजा कोकम।’

आई खास मेरे लिए नारियल का दूध, लहसुन और कोकम से सोल कढ़ी बनाने लगीं। मैं पूरे वक्त उनके पास बैठी स्कूल की बातें सुनाती रही। अचानक मैंने कहा, ‘मैं आठवीं के बाद पुणे आ जाऊं आगे पढ़ने?’

आई गंभीर हो गई, ‘मुलगी, तू दसवीं कर ले, फिर कॉलेज की पढ़ाई के लिए पुणे आ जाना। मेरा मन है तुझे मुंबई भेजूं। पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होगी, तो जिन्दगी हमेशा तेरे हाथ में रहेगी।’

आई का वह एक वाक्य ब्रह्मसत्य बनकर मेरे अंदर बैठ गया। पढ़-लिखकर नौकरी करनी है! मैं बिना चूं-चपड़ किए छुट्टियों के बाद हॉस्टल वापस आ गई। ये छुट्टियां बहुत अलग तरह से बीतीं। मैं आई के साथ सब्जी खरीदने हाट जाती, कभी सब्जी काटने, चावल-दाल चुनने में उनकी मदद करती, तो कभी यूं ही उनके पास बैठकर दुनिया-भर की बातें करती। मैंने पहली बार यह महसूस किया कि आई सोचती-समझती हैं, दुनिया के बारे में जानती हैं। विद्या दीदी अपनी दुनिया में मस्त थीं। दिन-भर रोमांटिक उपन्यास लेकर अपने कमरे में पढ़ती रहतीं।

मैंने आई के साथ लगकर आंगन में मिट्टी ठीक की, खाद-पानी डाला, पौधे लगाए। जब मैं हॉस्टल जाने को हुई, तो कुछेक पौधों में कोंपल फूट पड़े थे। कितना अच्छा लगा था देखकर!

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S Nagpal

S Nagpal 3 years ago