मायामृग - 9

मायामृग

(9)

उदय प्रकाश के विदेश में रहने वाले भाई के कोई सन्तान नहीं थी | वे प्रत्येक वर्ष अथवा दो वर्षों में एक बार भारत आते थे | उनकी पत्नी बंगाली से इसाई धर्म में परिवर्तित परिवार से थीं | कुल मिलाकर उदय प्रकाश पाँच भाई थे जिनमें बड़े भाई साहब वर्षों से विदेश में रह रहे थे | वे सभी भाईयों के परिवारों में जाकर अपना स्नेह दिखाने व अपनी संपत्ति के बारे में बघारने का प्रयास करते| पिछले कई वर्षों से वे भारत आ रहे थे जबकि उनकी पत्नी भारत आना कम पसंद करती थीं| हाँ, विवाह-शादियों में वे कई बार अवश्य आई थीं किन्तु शादी के घर में एक-दो दिन रहकर अधिकतर सभी लोग उदय के घर आकर पन्द्रह-बीस दिन, कभी-कभी महीने भर भी ठहरते थे, जिसमें उदय तथा शुभ्रा को बहुत प्रसन्नता प्राप्त होती थी | इसका कारण यह था कि अधिकांश सभी बड़े भाई-बहन सेवा-निवृत्त थे और जब वे दिल्ली, उत्तर-प्रदेश आदि इतने दूर स्थानों से आते तब स्वाभाविक था कि भाई-बहनों के साथ आनन्दपूर्ण समय व्यतीत करने की उनकी इच्छा होती, जिसका सब सम्मान करते थे और स्नेह व आदर के वशीभूत होकर सब उदय के घर में एकत्रित हो जाते थे | जब सब आकर शुभ्रा के घर ठहरते, इसमें कोई संशय नहीं था कि शुभ्रा को बहुत प्रसन्नता मिलती थी किन्तु थकान होना भी स्वाबाविक था | ऐसे समय में शुभ्रा को एक बात बहुत चुभती थी, वह यह कि बड़े भाई साहब के साथ उदय का ड्रिंक करना बढ़ जाता था | वैसे उदय शौकीन थे और पहले से लेते तो थे ही किन्तु बड़े भई के आने के बाद तो उनका प्रतिदिन का कार्यक्रम हो जाता था| अपनी लाई हुई लिकर खत्म होने के बाद बड़े भाई साहब इधर-उधर हाथ-पैर मारते बाद में उन्होंने उदित से ही लिकर मंगवानी शुरू कर दी थी| शुभ्रा को बहुत अटपटा लगता | एक-दो बार शुभ्रा ने उदय को टोका भी था और इस बात पर उदय से भी नाराज़गी प्रगट की थी किन्तु वे तो बड़े भाईसाहब थे, उनके पास अपार धन-दौलत थी जिसके स्वप्न उन्होंने अपने से जुड़े हुए सभी भाई-बहनों के परिवारों को दिखा रखे थे | सबके मुख में लार भरी रहती, चाहे कितना कुछ गलत होता सब उनके सामने मुख पर टेप चिपकाए ही नज़र आते |

“”ये क्या ताऊ जी ----- इतना पीना ठीक तो नहीं है –---”युवा होते उदित ने कई बार उन ताऊ जी को टोका भी था जिनके बडप्पन के समक्ष सब बौना ही महसूस करते थे| उसे कहीं न कहीं अपने पिता को प्रतिदिन शराब का सेवन करते देखकर अच्छा नहीं लगता था फिर उससे बोतलें भी मंगवाई जाने लगी थी | कई बार तो बड़े भाई साहब के अनुरोध पर शुभ्रा को भी पति व जेठ का साथ देना पड़ा | कैसी होती है न स्त्री की स्थिति ! वह अधिकांश रूप से दो पाटों के बीच में फंसी रहती है, उसमें से निकलने का प्रयत्न करे तब भी मुश्किल, मन के अंदर की बात खोलकर किसी के साथ साँझा नहीं कर सकती और न खोले तो मन ही मन कुढ़ती रहे | बिलकुल अच्छा नहीं लगता था शुभ्रा को इस प्रकार का वातावरण !

“”अरे बेटा ! भाई मिले हैं, परिवार मिला है तो एन्जॉय करने दे न बेटा | क्या पता कल हम कहाँ, ये कहाँ ? चल, तू भी आजा | ” किन्तु उदय बेटे को साथ बैठाने के विरुद्ध थे | बड़े भाई कहते ;

“”अरे ! अब तो बेटे का पैर तुमसे बड़ा हो गया है, अब क्या है ? दोस्त समझो उसे –----”” बड़े भाई साहब अपनी भावनात्मक संवेदना से सबको निढाल कर देते | किन्तु उदय इतने अधिक स्वतंत्र विचारों के भी नहीं थे कि बेटे को अपने साथ बैठाने में अपनी शान समझते| वे बच्चों से एक सीमा तक दूरी बनाकर रखते थे | इस बारे में उदय ठीक थे क्योंकि जब एक बार शर्म की सीमा पर हो जाती है उसके पश्चात बेशर्मी बढ़ती ही जाती है | इसकी कोई सीमा नहीं रहती और पीने के बाद तो वैसे भी पीने वाला हवाई जहाज़ से नीचे उतरता ही नहीं है, अधर में लटकते हुए अंग्रेज़ी और बोलना और शुरू कर देता है |

आम जीवन की व्यवहारिक बातों के बारे में शुभ्रा सोचती कि उदय को बेटे के करीब होना बहुत आवश्यक है जिससे वह पिता से खुल सके और जीवन में आने वाली परेशानियों के बारे में चर्चा कर जीवन को भली-भांति जी सके | एक माँ की भांति वह नहीं चाहती थी कि उसके बेटे का कोई व्यर्थ ही में उपयोग कर सके| उदित से अपने एन्जॉयमेंट के लिए ‘लिकर’ मंगवाना उसे किसी भी तौर से उचित नहीं लगता था|

जब उदित से कई बार बोतलें मंगवाई गईं तब उसने भी बड़े ताऊ जी के समक्ष अपने विचार प्रगट करने में संकोच नहीं किया था;

“”यह तो कोई बात नहीं है ताऊ जी कि मिलें तो खुशी में पीएं और बिछड़ने पर गम में--–””ये सब बातें उस समय की हैं जब उदित कॉलेज के प्रथम वर्ष में आया था, उसने न जाने कितनी बार इस प्रकार से पिता व ताऊजी को टोका था| शुभ्रा को लगता था कि बड़े भाईसाहब के अपने तो कोई सन्तान है नहीं फिर उसके बेटे को बलि का बकरा क्यों बनाया जाता है ? वह बहुत अच्छी प्रकार समझती थी कि इस उम्र में नकारात्मक चीज़ें कितना बुरा प्रभाव डाल सकती हैं ! उस समय तो उदय भी कहाँ समझते थे, वैसे उन्होंने उदित को बहुत लाड़-प्यार से पाला था | शुभ्रा को याद नहीं कि उदय ने अन्य पिताओं की भांति कभी अपने बच्चों को डांटा-मारा हो अथवा कभी अधिक चीखाचिल्ली की हो | हाँ, यह उदय के स्वभाव में था कि वे एक बार ही कुछ ऐसे स्वर में बोलते कि उनके सामने कोई कुछ उत्तर ही न दे पाता, मौन हो जाते सब |

आज जब उदित पर अधिक पीने के लांछन लगाए जा रहे हैं तब शुभ्रा का सीना छलनी होने से नहीं बच पा रहा, सब कोई अपराध देखते हैं किन्तु यह किसीको नहीं दिखाई देता कि उस अपराध के पीछे और किस-किसका हाथ है ? शुभ्रा ने उदय को बच्चों के प्रति कभी भी कठोर होते हुए नहीं देखा था सिवाय एक बार के-----

शुभ्रा को केवल एक बार की घटना की स्मृति हो आती है जब उदित संभवत: छटी कक्षा में पढ़ता था और उसे नई-नई साइकिल मिली थी | एक दिन वह सुबह से शाम तक गायब हो गया था | उन दिनों मोबाईल की सुविधा नहीं थी | एक किराए के मकान में उनका परिवार रहता था, उनके पास सबसे पहले ‘फाल्कन’ ब्रैंड का एक स्कूटर था जिस पर बैठकर शुभ्रा व उदय उदित के तमाम मित्रों के यहाँ चक्कर लगा आए थे| उदित का कुछ पता नहीं चला था | दीति को घर पर ही छोड़कर गए थे | वह उस समय शायद पाँचवी कक्षा में पढ़ रही थी और भाई के न मिलने से उसने रो-रोकर घर सिर पर उठा लिया था | थक-हारकर जब शुभ्रा मायूस होकर उदित के साथ घर पहुंची दीति डाइनिंग-टेबल पर बैठी थी जो ज़ीने की दीवार से सटाकर रखी गई थी | दीति ने अपने दोनों पैर खिड़की के सींचकों में से बाहर लटकाए हुए थे और उसका सिर रोते-रोते खिड़की के सींकचों पर टिक गया था, दोनों आँखें बंद थीं, गालों पर आँसुओं के सूखे पड़े निशान चुगली कर रहे थे कि वह छोटी सी बच्ची न जाने कितनी देर तक रोती रही थी, फिर उसकी ऑंखें बंद हो गईं थीं और सिर खिड़की के सींकचों पर टिक गया था | उसे देखकर उदय बहुत बेचैन हो उठे, उन्होंने बहुत प्यार से दीति को अपनी गोदी में समेटा, शुभ्रा ने कोमलता से उसके दोनों पैर खिड़की के जंगले में से निकाले थे | गोदी में भरकर उदय ने बिटिया को चूम लिया था और कुछ ऐसे अपनी गोदी में बच्ची को छिपाकर अपने सीने से चिपका लिया था जैसे उनसे कोई उनकी बिटिया को छीनने आ रहा हो | अचानक दीति ने आँखें खोल दीं थीं और ज़ोर से ‘भैया’ कहकर फिर से आँसू उसके नर्म गालों पर रपटने लगे थे| उदय बिटिया को लेकर अंदर की तरफ़ गए, देखा उदित बड़े आराम से प्लेट हाथ में पकड़कर खिचड़ी खा रहा था | शायद उसे खिचड़ी शंकर ने दे दी थी| क्रोध से उदित का सिर घूम गया, वे असहज हौठे और काँपने लगे थे| उन्होंने रोती हुई दीति को बिस्तर पर बैठाकर एक ज़ोरदार तमाचा उदित के गाल पर लगाया था| प्लेट बच्चे के हाथ से इतनी दूर व ऊँची उछली कि कमरे की दीवार से जा टकराई और कुछ खिचड़ी सीलिंग पर जा चिपकी थी | दीति हतप्रभ सी हो मुख खोले कभी पिता की ओर तो कभी भैया की ओर देखने लगी थी | उसकी आँख के आँसू थम गए थे, गालों पर पहले के आँसुओं के काले निशान जो ठोढ़ी तक बने हुए थे वे बड़ी सी रोशनी में अधिक चमकने लगे थे और घबराहट के कारण वह पूरी तरह काँपने लगी थी | अचानक दोनों भाई-बहन एक दूसरे से चिपककर, बिसुरकर रोने लगे थे | शुभ्रा ने उदय को कभी भी बच्चों पर क्रोध करते हुए देखा ही नहीं था | उदय के इस रूप से वह स्वयं भी सहम गई थी | उदय बहुत अनमने थे जैसे उम्र के इस दौर में से गुज़रते हुए बच्चों की चिंता उनके मुख मंडल पर मंडरा रही थी | दो-चार घंटे की शांति के बाद उदय स्वयं बच्चों को अपने दोनों ओर बैठाकर उन्हें समझा रहे थे और उदित को इस प्रकार की गलती न दोहराने का अहसास कराने की चेष्टा कर रहे थे |

दरवाज़ा खोलकर सहायिका पानी लेकर आई और शुभ्रा का ध्यान भूत से लौटकर पुन: वर्तमान स्थिति पर आ टिका | आज युवा होते उदित से इस प्रकार लिकर मंगवाना क्या बेटे के हित में सही था? अपने क्षणिक मज़े के लिए क्या उसके बेटे को ‘यूज़’ नहीं किया जा रहा था ? शुभ्रा के मन में यह विचार बारंबार कौंधता रहता था किन्तु सबके द्वारा सम्मानित होने वाले आदरणीय बड़े भाई साहब के सामने जब कोई भी कुछ नहीं बोल पाता था तो वह क्या बोलती? मनुष्य अनजाने में कुछ ऐसा कर बैठता है जिसके परिणाम के बारे में वह कभी कल्पना भी नहीं कर पाता | परन्तु जब परिणाम समक्ष आता है तब वह पछताता है किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है | कच्ची माटी को किसी भी आकार में ढाला जा सकता है, पकने के बाद तो मटका फूटता ही है, उसे जोड़ा नहीं जा सकता | शुभ्रा को जो भय था वही तो हुआ, उदित को पीने-पिलाने का ऐसा चस्का लगा और नौकरी में आने के बाद तो इतना अधिक कि यह पीना शौक से अधिक एक ‘स्टैंडर्ड’ बन गया | अब उदय बेटे की इस आदत के लिए शुभ्रा को सुनाने लगे थे | शुभ्रा को तो पहले से ही खटका था, वह जानती थी कि उसका कोई अपराध न था किन्तु बेटे को बिगाड़ने का लांछन उसी पर आना था किन्तु क्या बेटे के पीने के शौक को हवा देने में शुभ्रा का कोई हाथ था ? यह प्रश्न नासूर बनकर पूरी उम्र उसे कुरेदता रहा था | हम स्वयं क्या कर रहे हैं हमें पहले यह देखना होता है, इसका प्रभाव अनजाने में ही परिवार के बच्चों व वातावरण पर पड़ता ही है | क्या इसमें पिता का कहीं कोई दोष न था ? सब कुछ उसकी ही गलती थी | किसी भी गलत बात पर तमाचा न लगाकर उदय व शुभ्रा ने बच्चे साथ लाड़ न करके अन्याय ही किया था | सामने वाले घर के सहगल साहब अपने बेटे के साथ खाली समय में चैस खेलते, उसे अपने साथ घुमाने ले जाते, उससे अपनी किशोरावस्था के अनुभव साँझा करते, शुभ्रा को बहुत अच्छा लगता, वह कितनी बार उदय से कहती भी कि इस उम्र में उदित के साथ कुछ बातें साँझा करना बहुत आवश्यक है किन्तु उदित उसे घूरकर कहते ;

“”अब ये भी तुम ही बताओगी कि मुझे अपने बेटे से कैसे व्यवहार करना चाहिए? ”” शुभ्रा गुम होकर बैठ जाती | क्या उत्तर देती जब उसकी कोई पकड़ ही नहीं थी रिश्तों पर | अधिक बोलने का अर्थं घर का वातावरण दूषित करना ही था |

बच्चों को संस्कार सिखाए नहीं जाते, वे संस्कार अपने वातावरण से स्वाभाविक रूप में लेते हैं | नौकरी छोड़ने के बाद बड़े बनने का स्वप्न उदित को प्रतिदिन पीने-पिलाने के वातावरण में खींचकर ले गया | व्यवसाय के लिए पार्टी को पिलाना, एक फैशन सा हो गया | प्रारंभ में तो उदित में थोड़ी सी हया रही भी, वह प्रयत्न करता कि अस्वस्थ अवस्था में माता-पिता के समक्ष न आए किन्तु कुछ समय बाद पहले माँ व फिर पिता के सामने भी उसकी झिझक खुल गई| समय रहते किसी भी समस्या का निदान हो जाए तो ठीक है अन्यथा देरी ही हो जाती है और हम लकीर पीटते रह जाते हैं | उदय कभी बेटे का हाथ पकड़कर उसे अपने पास बैठाकर एक मित्र की भांति न तो उससे बातें कर सके और न ही उसके गलत काम पर उसे तमाचा लगा सके | दोनों के बीच में पिसती रही शुभ्रा ! उदय शुभ्रा के सामने भुनभुन करते, शुभ्रा कहती कि उन्हें सीधे उदित से बात करनी चाहिए किन्तु न जाने क्यों वे कभी भी उदित के समक्ष कुछ नहीं कह पाते थे| हाँ, एक-दो बार कभी पिता-पुत्र की बातें चुपके से हुई भी तो शुभ्रा के पूछने पर दोनों ने यही कहा कि यह हम दोनों के बीच की बात है | शुभ्रा माँ थी, वह चाहती थी कि उसके सामने कुछ बातों का खुलासा हो जाए किन्तु उसे चुप होकर रह जाना पड़ता था | अपने घर में एकमात्र सन्तान होने के कारण उसे कभी इस प्रकार की स्थिति का सामना करना नहीं पड़ा था, माँ ने भी उसे सबके साथ मिलजुलकर रहने की सीख ही दी थी इसीलिए वह रिश्तों के बीच में कुछ अधिक नहीं बोल पाती थी| किसी भी प्रकार की परेशानी टालने के चक्कर में वह प्रयास करती कि किसी भी रिश्ते में, किसी भी बात में कुछ न बोले | उदय वैसे सबके लिए बहुत समर्पित थे किन्तु जब अपने बहन-भाईयों के साथ होते तब शुभ्रा अकेली पड़ जाती | स्वभाव से कुछ अधिक ही सरल थी शुभ्रा जिसे आज की भाषा में बेवकूफ़ कहा जाता है, बेकार का प्रदर्शन न तो शुभ्रा के स्वभाव में था न ही उसे पसंद था अत: सबके सम्मुख शुभ्रा की अच्छी –खासी मज़ाक बना दी जाती| शुभ्रा सब काम करती परन्तु जब तक कोई न पूछे किसी के सामने अपनी सलाह देने का प्रयत्न न करती अन्यथा वह मूर्ख ही साबित कर दी जाती | वैसे तो उससे सब लोग प्रभावित ही रहते थे, सबके काम हँस-हँसकर करने वाली शुभ्रा अपने खुद के सबसे समीपी रिश्तों में चुप ही बनी रही |

शुभ्रा की यह चुप्पी ही उसे और कमज़ोर, और शिथिल बनाने लगी | बड़े भाई साहब बार-बार शुभ्रा के खुले विचारों, शिक्षा व ‘मॉडर्न’ होने की दुहाई देकर उसे अपने साथ बैठने का निमन्त्रण देते | शुभ्रा खुले विचारों की थी किन्तु इतनी भी नहीं कि वह उन्हें मदिरा-पान में कम्पनी देती| शर्माशर्मी एकाध बार बैठी, एकाध ड्रिंक लिया पर कलेजा ही तो चिर गया उसका फिर ’कोल्ड-ड्रिंक’ लेकर बैठने लगी और बाद में किसी न किसी काम का बहाना बनाकर उसने उन दोनों के साथ शाम को बैठना ही छोड़ दिया | बहुत अनुग्रह करने के बाद भी वह टस से मस नहीं हुई और स्वयं को किसी न किसी काम में व्यस्त दिखाने की चेष्टा करने लगी | वैसे भी वह उनकी शेखचिल्लियों वाली बातों से परेशान हो जाती थी | पहले भी वह उनके साथ ग्लास पकड़े बैठी रहती थी और उन दोनों के बीच आधी बोतल रम ख़त्म हो जाती थी | कैसा होता है न ज़िंदगी का सफ़र ! जो हम कभी सोचते ही नहीं वे बातें हमारी ज़िंदगी में तेज़ाब की तरह उतरकर अंतर जलाने लगती हैं | न पूरी तरह मौत आती है और न शिद्दत से जीया जाता है |

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