मायामृग - 10

मायामृग

(10)

उदित पहले किसी गैर-सरकारी कार्यालय में काम कर रहा था, उसके अन्दर बड़ा बनकर जीने की एक तृष्णा थी | बड़े बनने की एक भूख! जिसने उसे कई बार असफ़लताओं के मार्ग दिखाए थे | उदय की इच्छा थी उनका बेटा जिस नौकरी में लगा है, वहीं जमा रहे | कंपनियाँ उसे सहर्ष काम करने के लिए आमंत्रित करतीं और उसके काम को खूब सराहा जाता, कुछ दिनों में वह ‘प्रोजेक्ट-हैड’ बना दिया जाता किन्तु उदित को स्वयं को बड़ा बनने, देखने-दिखाने की भूख कुछ अधिक ही थी पता नहीं यह उसके मित्रों के वातावरण के कारण था अथवा उसके प्रारब्ध में ही यह सब था| हम कहाँ समझते, जानते हैं जीवन को ! कुछ तो होता ही है जो लिखा रहता है और बहता रहता है समय की धारा के साथ ! पहले वह कुछ दिनों तक तो गैर-सरकारी नौकरी में लगा रहा फिर उसने महसूस किया कि यदि इतना श्रम ही करना है तो वह अपने लिए क्यों न करे ? बहुत समझाने के उपरान्त भी उसने अपने काम शुरू कर दिए | काम भी उसे छोटे-मोटे नहीं चाहिए थे, उसे बड़े काम और बड़ी कंपनियों के साथ काम करने में ही रूचि थी | कुछ लोग ऐसे भी टकराए जिन्होंने उदित को दिवा-स्वप्न दिखाए और वह उन स्वप्नों में रहने लगा जिससे उदय के संचित धन की हानि हुई | उदित के ठीक प्रकार जमने की चिंता उदय व स्वयं उदित को भी हर पल लगी रहती, वह घोर परिश्रम करता किन्तु कुछ न कुछ ऐसा हो जाता, पर्याप्त श्रम के पश्चात भी जहाँ से वह चलता वही आ जाता| उदित टूटने की कगार पर भी आकर स्वयं को संभाले रखता, इतना धन तो उसके पिता के पास था नहीं कि वह अपने मंसूबों के महल उनके सहारे खड़ा कर पाता| हाँ, वह किसी नई तलाश में जुट जाता और पुन:उतना ही श्रम शुरू कर देता | जब टूटने लगता तब घर में देखा हुआ एक सहारा उसके पास खिसक आता और वह पीने में अपना ग़म ग़लत करने लगता | उदय यह देखकर बेटे से नाराज़ तो रहते किन्तु उसे कुछ बोल न पाते और इसी प्रकार सब–कुछ चलता रहता | घर का खर्चा तो उदय, शुभ्रा, गर्वी तथा उदित को जो कुछ व्यवसाय से प्राप्त होता, उससे निकल ही जाता | किन्तु उदित का पीना व पूरी प्रकार न जमने के कारण उदय चिंता के सागर में डूब जाते | वे बहुधा पत्नी के समक्ष चिंता करते किन्तु शुभ्रा के पास कहाँ कोई समाधान होता था, उसने कभी अपने ही लिए निर्णय नहीं लिए थे तब वह क्या बोल सकती थी | कैसी शिक्षित मूर्ख थी वह ! आज उसे महसूस होता है जब पूरा जीवन काई पर से फिसल गया है | शुभ्रा को पीने-पिलाने से सदा ही आपत्ति रही थी किन्तु जब पिता-पुत्र दोनों ने ही उन संस्कारों को अपने भीतर पल्लवित कर लिया था तब वह भी कितना और क्या करती ? भारतीय स्त्री अपने परिवार में शान्ति बनाए रखने के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी भी देने के लिए तत्पर रहती है किन्तु बिना बात स्वयं पर किसीको भी हावी होने देना भी तो अपरिपक्वता का ही एक अंग है |

शुभ्रा को अपनी बहू के लिए मन में बहुत कचोट भरी रहती, उसकी पीड़ा उसे स्वयं की पीड़ा लगती | वह सोचती;

‘आखिर इस बच्ची के भाग्य में ऐसा क्यों है कि उसके अपने बचपन पर पिता के पीने से जख्म लगे होंगे और विवाह के पश्चात श्वसुर गृह में उसे वही वातावरण प्राप्त हुआ | आखिर गर्वी को ही ईश्वर ने यह सज़ा क्यों दी? उसकी क्या त्रुटि थी? यदि बच्चे के हाथ में हो कि वह जन्म से पूर्व अपने माता-पिता का चयन कर सके तब कोई भी बच्चा अपने लिए पीने-पिलाने वाले माता-पिता का चयन नहीं करेगा | ’शुभ्रा बहुत-बहुत पीड़ित रहती लेकिन कुछ कर पाने में उसने स्वयं को सदा असमर्थ पाया था| एक यह भी अहम कारण था कि वह गर्वी के पक्ष में ही सदा खड़ी रहती, वह उसे बिलकुल भी चोट नहीं पहुंचाना चाहती थी, उसका मन होता वह गर्वी को एक फूल की तरह संभालकर रख सके, जहाँ तक होता वह सबकी बातों पर आवरण डालती रही, परिवार में अशांति पसरने का भय उसे भीतर तक खंगाल जाता और वह चुप्पी साध लेती | आज वह जिन अंधेरों में खड़ी है, उसके साक्षी उसके भीतर के वे उजले दिन हैं जिन्हें कभी उसने बड़ी मुहब्बत से सजाया था|

गर्वी दुबारा परीक्षा देकर सफल हो गई थी और उसने अपना ‘क्लिनिक’खोल लिया था | वास्तव में उसने नहीं खोला था, उसके पिता का ही दवाखाना था जिसमें उन्होंने गर्वी के लिए भी एक चैंबर बनवा दिया था | दोनों पिता-पुत्री एक साथ काम करना चाहते थे किन्तु ईश्वर की मर्ज़ी को आज तक कौन जान सका है ? हम कितना भी अभिमान क्यों न कर लें, कितने भी अन्तर्यामी बनने का प्रयास क्यों न कर लें, हमें उस सर्वोच्च शक्ति के प्रति नमन करना ही होता है जो हमें कहीं दिखाई तो नहीं देती किन्तु हर पल हमारे भीतर बनी रहती है, हमें अवसर भी प्रदान करती है अच्छे और बुरे मार्ग में से किसी एक को चुनने का लेकिन हम ही कमज़ोर पड़ जाते हैं | गर्वी के पिता को पेट की कोई ऎसी बीमारी थी जिसके ऑपरेशन में सफलता के कम ही अवसर थे इसीलिए उसका ऑपरेशन वे अपनी छोटी बेटी के विवाह के पश्चात ही करवाना चाहते थे | ईश्वर की कृपा से उनकी छोटी बेटी का विवाह हुआ और उन्होंने अपने व गर्वी के लिए क्लिनिक भी बनवा लिया किन्तु उसका उपयोग वे स्वयं नहीं कर सके, ईश्वर से उनका बुलावा आ गया | उन्होंने क्लिनिक के मुहूर्त के लिए तारीख़ सुनिश्चित कर दी थी| उनका देहावसन होने के अधिक दिन व्यतीत नहीं हुए थे किन्तु गर्वी की माँ ने पति के द्वारा सुनिश्चित दिन पर ही ऑफिस का मुहूर्त करवा दिया था | गर्वी की माँ भी बहुत ‘स्ट्रांग’ महिला थीं अन्यथा दो पाटों के बीच में कैसे रह पातीं ? उनके ऊपर अपने तीन सौतेले बच्चों का दबाव भी बराबर बना रहता था किन्तु वे लगातार डटी रहीं, बहुत तुक्का फ़जीती के बाद गर्वी के हाथ में उसके पिता का क्लिनिक आ ही गया | इस प्रकार गर्वी को वह क्लिनिक पिता के आशीर्वाद के रूप में प्राप्त हुआ था | अपने पति के देहावसन के लगभग पन्द्रह दिनों के अन्दर ही गर्वी की माँ ने क्लिनिक को किस कदर फूलों से सजवाया था, स्थानीय तथा आस-पास के शहरों में निवास करने वाले सभी संबंधियों को आमंत्रित किया था और खूब धूमधाम से मुहूर्त करने के पश्चात दोपहर के भोजन की भी होटल में व्यवस्था की थी | दोनों बेटियों के ससुराल वालों को भी होटल में चलने की बात जब सामने आई तब उदय ने झुरझुरी ली, उनके समक्ष गर्वी के पिता की तस्वीर बार-बार उभरकर मानो पुकार रही थी, अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए और दावतें उड़नी शुरू हो गईं! आदमी कितना व्यवहारिक हो जाता है कि उसमें संवेदना का कोई चिन्ह तक नज़र नहीं आता| उदय ने पत्नी शुभ्रा से कहा था ;

“ “भई! हम तो घर चलकर खाएँगे, मैं तो इस समय होटल में नहीं खा सकता, इतने असंवेदनशील कैसे हो सकते हैं हम ! ”” उदय के समक्ष बार-बार अपने समधी की तस्वीर आकर खड़ी हो रही थी और मानो झंझोड़कर पूछ रही थी कि अपने आदमी की बस यही औकात है क्या ? संबंधों में संवेदना का जुड़ाव बहुत महत्वपूर्ण है, हम कितने भी व्यवहारिक क्यों न हो जाएं हमें कुछ तो अटपटा लगता ही है | कुछ भी कहो जिस वातावरण में मनुष्य जन्मता है, बड़ा होता है, उसकी संवेदनाओं से पूरी तरह से छूट नीं सकता | इसीको शायद मूल स्वभाव कहते हैं कि चाहते हुए भी आदमी उसके आवरण को निकालकर नहीं फेंक सकता, बेशक वह कुछ समय के लिए कितने मुखौटे ओढ़ ले किन्तु उसका असली मुखौटा कभी न कभी चीत्कार भरता ही है |

“”नहीं, आपको खाना तो खाकर जाना ही पड़ेगा | ”” जैसे कोई बहुत बड़ी खुशी हो और खाना न खाकर उदय उनका अपमान कर रहे हों | प्रसन्नता थी गर्वी के क्लिनिक की परन्तु उदय के समक्ष हर पल अपने समधी का चेहरा घूम रहा था | बहुत टालमटोल के पश्चात भी स्थिति ऎसी हुई कि पूरे परिवार को होटल में जाना ही पड़ा | उस दिन उदय बहुत दुखी हुए थे और उन्हें माँ के ये शब्द बारंबार स्मरण हो रहे थे ;

“”अरे भई ! आदमी का है क्या? आज मरे कल दूसरा दिन ! कौन किसीकी याद में बैठा रहता है? ””माँ के कथन पर उदय उद्वेलित हो उठते थे, सोचते ‘ऐसा कैसे हो सकता है आखिर मनुष्य में संवेदना नामक चिड़िया भी तो होती है जो किसी अपने के बिछड़ जाने पर बार-बार स्मृति की टहनी पर बिसुरती हुई आ बैठती है, आँखों से ओझल होते ही एकदम से उड़ तो नहीं जाती | बड़े बेमन से उदय ने उस दिन होटल में खाना खाया था और फिर घर पर आकर मुह लपेटकर पड़ गए थे | अनमनी शुभ्रा भी थी परन्तु उसका स्वभाव था, वह स्वयं को प्रत्येक परिस्थिति के अनुसार ढाल लेती थी| एक अजीब सी कमज़ोर संवेदना से घिरकर वह भीतर ही भीतर सिहरती रही थी |

इतने वर्षों में उदय सोचते ही रह गए कि बहू के लिए एक सुन्दर सा क्लिनिक बनवाकर देंगे परन्तु जब उदित के व्यवसाय से कुछ बच पाता तब ही तो वे उसके लिए कुछ कर पाते | वे गर्वी के लिए अपनी इच्छानुसार कुछ भी न कर पाए थे और उन्हें बहुत दिनों तक यह बात कचोटती रही थी कि वे अपनी पुत्र-वधू के लिए चाहते हुए भी कुछ न कर सके थे | वैसे भीतरी चाहत को कोई कैसे समझ सकता है ? आज तो जहाँ माल है, वहीं सब-कुछ है | संवेदना की टोकरी उठाए घूमते रहो रिश्तों के बाज़ार में, कोई खरीदार नहीं | अब गर्वी को अपने पिता का तैयार क्लिनिक मिल गया था| कौन माता-पिता अपने साथ घर को उठाकर ले जाते हैं ? अपनी सगी माँ से गर्वी व उसकी छोटी बहन केवल दो बेटियाँ ही थीं और जिसमें गर्वी व पिता का विषय एक ही था अत: स्वाभाविक था कि गर्वी को अपने पिता का क्लिनिक मिलता और उसकी बहन को फ़्लैट ! गर्वी अपने पिता के स्थान पर बैठने लगी थी किन्तु उसके सौतेले भाई-बहनों की आँखों में काँटा बनकर चुभने भी लगी थी| इस स्थान के लिए भी न जाने कितना युद्ध करना पड़ा था जिसमें उदित को भी अपना काफ़ी समय, पैसा व उर्जा का व्यय करना पड़ा था जिसमें बाद में उसे गालियाँ ही मिली थीं| काफ़ी कशमकश के बाद गर्वी की विजय हुई थी | यह केस काफ़ी उलझा हुआ था और उदित अपने जल्दबाज़ व अधिक उग्र स्वभाव के कारण अपने लिए परेशानी मोल लेते था | उदित को कभी किसी प्रकार का उत्तरदायित्व नहीं सौंपा गया अत: उसमें उत्तरदायित्व की भावना ही नहीं पनप सकी, वह माता-पिता के रहते आश्वस्त था और अब तो गर्वी भी काम करने लगी थी | चाहता बहुत कुछ था करना किन्तु होता और कुछ था इसलिए सबकी आँखों में नालायक का दर्ज़ा पाता रहा और गर्वी पर पूरे घर की सहानुभूति व प्यार उंडेला जाता रहा |

किसी भी बच्चे पर किशोरावस्था से ही उत्तरदायित्व डालना बहुत आवश्यक होता है जो उदय नहीं कर पाए थे | बच्चों की किशोरावस्था में भी जब कभी दही-दूध लाने की ज़रुरत होती और उस समय कोई लाने वाला न होता, शुभ्रा बच्चों को खरीदारी करने के लिए भेजना चाहती किन्तु उदय नाराज़ होने लगते;

“”पता है तुम्हें कितनी गाड़ियाँ चलती हैं सड़क पर ----? ””

“”अरे ! पर सबके बच्चे ही जाते हैं छोटे-मोटे काम करने---“”शुभ्रा कहती तो उदय भड़क जाते|

“”जब कुछ हो जाएगा न तब पता चलेगा”” उदय फट से बोल उठते | न जाने क्यों जब कभी उदय इस प्रकार के शब्द बोल जाते, शुभ्रा को बहुत कष्ट होता, उसे बहुत चोट पहुंचती | वह एक चरमराती लकड़ी की भांति अशक्त होती जाती किन्तु पति के सम्मुख कुछ बोल न पाती | न बोलने का कारण केवल उदय को कष्ट न पहुंचाना ही था परन्तु न बोलने से भी बातें इतनी बड़ी हो जाती हैं कि उनका कोई समाधान ही नहीं मिल पाता ! वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी | शुभ्रा न तो अपनी सास के समक्ष कुछ बोल पाई थी और न ही ननदों के समक्ष ! वैसे बोलने में वह हिचकती हो ऐसा भी नहीं था, संभवत: घर में शांति बनाए रखने का यह सरल व कारगार उपाय था |

उदय की इस बात से शुभ्रा सदा ही अनमनी हो जाती थी | ऐसा तो क्या है कि बच्चों से छोटे-मोटे काम भी नहीं करवाए जा सकते ? कभी कोई उत्तरदायित्व नहीं दिए जाने पर पहले से मस्तमौला उदित और भी स्वछन्द हो गया | शुभ्रा बहुत चाहती थी कि उदित को उसकी आयु के अनुसार उत्तरदायित्व सौंपे जाएं किन्तु ऐसा हो नहीं सका | उदित पहले से ही खिलंदड़ा था जबकि बेटी दीति अपने ऊपर प्रत्येक उत्तरदायित्व को ओढ़ लेती थी| वह सदा पिता के साथ बनी रही | शुभ्रा भी अपने घर की एकमात्र सन्तान होने के कारण कुछ अधिक ही लाड़ में पाली गई थी, वह हिसाब-किताब में अधिकतर चूक ही कर जाती | इसीलिए उदय बेटी दीति को ही सब कुछ बताकर, समझाकर रखते | वह पापा का हिसाब-किताब रखने लगी थी और शुभ्रा को इस झंझट से मुक्ति मिल गई थी, वह तो पहले से ही हिसाब-किताब रखने की चोर थी | उसे तो तब पता चलता जब उसके पर्स के पैसे खत्म हो जाते | उसकी स्वयं की तनख्वाह भी अच्छी-खासी थी किन्तु कभी उसने अपने लिए बचत करने की सोची ही नहीं | उदित थे ही सब कुछ संभालने वाले, वे उदित के सामने कई बार कह भी जाते थे; ‘रोटी की कोई परेशानी नहीं होगी, बाक़ी रही लक्ज़री, वह तुम लोग देख लेना ‘ फिर उसे चिंता करने की क्या ज़रुरत थी? सच तो यह था कि उसमें बचत करने जैसा गृहलक्ष्मी का कोई विशेष गुण था ही नहीं | काम तो वह लगातार करती ही रही थी, पैसों की उसे कोई कमी नहीं होनी चाहिए थी किन्तु वे पैसे वह बच्चों के मौज-शौक व अतिथियों के स्वागत में खर्च कर देती | हाँ, वह सबका ध्यान रखकर सबको समय पर खाना-पीना देना, सबके स्वास्थ्य का ध्यान रखने में कुछ अधिक ही गंभीरता से अपने कर्तव्य का पालन करती रही थी इसीलिए पाँच बहुएँ होते हुए भी उसकी सास सदा उसके पास ही रहना चाहती थीं | शुभ्रा भी चाहती थी कि कभी खुलकर स्वतन्त्रता से अपनी माँ के घर रहकर आए, अपने मित्रों में उठे-बैठे किन्तु जब वह मायके जाती तब भी उसकी सास अधिकांशत: उसके साथ ही जाती थीं |

जब शुभ्रा का विवाह हुआ तब उसे ठीक प्रकार से खाना बनाना भी नहीं आता था, इस बात से उसके मायके में भी सभी परिचित थे | एक बार जब शुभ्रा की सास उसके साथ उसकी माँ के घर गईं, शुभ्रा की नानी ने शुभ्रा की सास से मज़ाक में पूछ ही तो लिया था ;

“”बहन जी ! ये शुभ्रा आपको रोटी बनाकर खिला भी देती है या नहीं ? ””

सास ने शुभ्रा की ओर देखते हुए उत्तर दिया था;

“”हाँ----खिला तो देवे भारतवर्ष का नक्शा बनाकर ---“” इस बात पर उपस्थित सबने ठहाका लगाया था किन्तु इस बात से सबने तसल्ली भी महसूस की थी कि वह घर में सबका ध्यान रखती है और खाना तो सबको समय पर खिला देती है |

शुभ्रा का यह मूल स्वभाव बन चुका था कि वह स्वयं कितनी भी भूखी क्यों न हो किन्तु पहले सबके लिए खाना बनाकर, जो उपस्थित हों उन्हें खिलाकर बाद में ही कौर मुख में डालती थी | यह मानवता उसने अपने मायके से ली थी | उसने अपनी दादी को तो कभी देखा नहीं था, हाँ ! नानी एक गीत की कड़ियाँ गुनगुनाती रहती थीं ;

“”भूखा –प्यासा पड़ा पड़ौसी, तूने रोटी खाई क्या ? ? ””

नन्ही शुभ्रा के द्वारा इसका अर्थ पूछने पर नानी जिन्हें सब ‘माता जी’ कहते थे उन्होंने उसे समझाया था कि जब हमारे पड़ौस में किसी व्यक्ति के पास किसी भी कारण से खाने के लिए कुछ न हो तब हमने यदि अपना पेट भर भी लिया तो कौनसा तीर मार लिया ? अपना पेट तो सभी भरते हैं, बात तो तब बनती है जब हम दूसरों का भी ध्यान रखें कि उन्होंने खाया है या नहीं ? शुभ्रा के मस्तिष्क में ये विचार इतने कूट-कूटकर भरे हुए थे कि वह उनसे इतर कुछ सोच ही नहीं सकती थी| जब तक शुभ्रा अपने काम में व्यस्त रही तब उसने खाना बनाने वाले से लेकर सारे अन्य काम करने तक सबके लिए कई सहायक रखे हुए थे | प्रयास करती थी कि उनकी सहायता से वह स्वयं अपने पति, घर तथा अतिथियों की देखभाल कर सके |

यही रवैया उसने गर्वी के आने बाद भी अपनाए रखा | उसके मस्तिष्क में कभी छू तक नहीं गया कि गर्वी उसकी बेटी दीति जैसी नहीं है, उसने गर्वी के आने के बाद यही समझा कि दीति अब दूसरे घर की बेटी हो गई है और गर्वी ही अब इस घर की शोभा है | तेवर तो उसके प्रारंभ से ही कसे हुए रहते थे किन्तु सामने वाला कुछ उत्तर ही न दे और सब बातों का ध्यान रखने की चेष्टा करता रहे तब चाहे कितने भी तीखे तेवर वाला मनुष्य हो एक बार तो कुछ गलत बोलने में ठिठक ही जाता है | इस क्षण उसे लगता है उससे यह बहुत ही बड़ी गलती हो गई थी | यहीं पता चलता है कि बेटी और बहू में क्या अंतर है ? वैसे तो हम यह कहते हैं कि बहू बेटी जैसी है लेकिन उदय उसे सदा यह बात समझाने की चेष्टा करते रहे कि बहू आपके गर्भ से नहीं निकली है, आप कितना भी उसे लाड़ दो वह आपका हाथ पकड़कर खड़ी नहीं होगी| इस बात पर शुभ्रा और उदय की ठनक जाती थी, वह कहती कि क्या उसने उदय की माँ का ध्यान नहीं रखा था ? पाँच बेटे होने के उपरान्त भी उसकी सास की इच्छा सदा शुभ्रा के पास ही रहने की बनी रहती और उदय उसे कहते ;

“”जब कभी ज़रुरत पड़ी न तो मेरी बात याद रखना गर्वी कभी तुम्हारा हाथ पकड़कर खड़ी हो जाए तो मेरा नाम बदल देना ---”” शुभ्रा को बहुत खीज आती थी उनके इस कथन पर | किन्तु उदय गर्वी के स्वभाव की इतनी छोटी-छोटी बातों को, उसके व्यवहार को परखते थे जो शुभ्रा की तो बुद्धि से कोसों दूर की बात थी | आज शुभ्रा की सोची हुई बातें गलत पर गलत निकलती जा रही हैं और उदय की कही बातें सौ प्रतिशत सही प्रमाणित हो रही हैं | फूलों सी नाज़ुक खिली-खुली व सुगन्धित ज़िन्दगी में रेगिस्तान की भयंकर तरेड़ें पड़ने लगी हैं जिन्हें देखने पर भी घबराहट होती है | शुभ्रा का मन होता है आँखें मींच कर पड़ जाए किन्तु चूहे के आँखें मींच लेने से बिल्ली उसे अपना आहार बनाना तो नहीं छोड़ती | कितनी बार उदय अपना माथा पकड़कर दीति से कहते;

“इस तेरी माँ का क्या करूं मैं ? सबको अपने जैसा ही समझती है ! ! ”

यह बात कहते क्या सोचते हुए भी शुभ्रा को खेद होता है जो स्त्री सदा स्त्रियों की पक्षधर रही, जिसने सदा स्त्रियों के सम्मान को संभालकर रखा उसकी सोच आज परिवर्तित हो रही है? शुभ्रा के लिए यह बहुत अधिक कष्टकर था | किस समाज में रह रहे हैं हम जहाँ किसी भी चीज़ का संतुलन नहीं है और अब तो प्रकृति भी हमारा साथ छोड़ती जा रही है| भीतर से एकतारा टहोके मारता रहता है सदा की भांति वह प्रतिदिन मन से क्षीण होती जा रही है ! कितने बड़े भँवर में चक्कर काटती रही है शुभ्रा! उसे स्वयं पर ही विश्वास नहीं होता, उसका स्वप्न टूटकर चूरा बनकर बुरक गया है और उसे प्रतिपल यह महसूस होता है कि वह एक भ्रमजाल में फँसी रही है | एक मायामृग सा जीवन जीया है उसने, उदय की अनुपस्थिति से पूर्व ही उनके हाथ में बंधी परिवार की इज्ज़त की रेत भुरभुराने लगी थी |

***

***

Rate & Review

Verified icon

pradeep Tripathi 1 month ago