मायामृग - 11

मायामृग

(11)

उदित अपने स्वभावानुसार नौकरियाँ बदलता रहा था, विवाह के लगभग दो वर्षों के बाद शहर से बाहर भी दो-तीन वर्ष दोनों पति-पत्नी रह आए थे | पास ही थे अत: या तो वे दोनों आ जाते अथवा उदय व गर्वी उनके पास एक-दो दिन के लिए चले जाते | ठीक ही कट रहा था समय ! समय आवाज़ नहीं करता, बेआवाज़ ही सबका मोल-भाव चुका लेता है | उदित जिस कंपनी में जाता, अपना स्थान बहुत जल्दी बना लेता और वहाँ एक ऊँची ‘पोज़ीशन’बना लेता | शनै: शनै: यहीं से ही उसे अपना स्वयं का काम करने की धुन सवार हो चुकी थी, कितना समझाया गया किन्तु उसकी समझ में आया ही नहीं | तब तक उदय भी नौकरी कर रहे थे और शुभ्रा भी | अत: घर चलाने में कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई | वैसे भी शुभ्रा घर में स्वयं को परिवार की चक्की के पाटों में मानो पीस ही डालती थी, यह उसका स्वभाव बन चुका था अत:उसने बेटी की भांति बहू से भी कोई अपेक्षा नहीं रखी व उसको कुछ समझा भी नहीं पाई, यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि शुभ्रा में एक ऐसा सरल, ममतापूर्ण सम्मोहन था जो सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेता था, बाहर के लोगों को वह खूब आसानी से बातें समझा भी सकती थी और उनकी समस्याओं के समाधान भी न जाने कैसे उसके माध्यम से निकल आते थे किन्तु अपने ही घर में वह एक कठपुतली सी बनी रही | ऐसा नहीं था कि इस बात में उदय उसका साथ नहीं देना चाहते थे, वे तो स्वयं उसके बारे में चिंतित रहते थे किन्तु शायद स्वभाववश ही वह अपने परिवार को संभालने में संलग्न रही | आज जो कुछ भी हुआ है वह स्वयं को ही सबके लिए ज़िम्मेदार ठहराती है, सबमें अपनी ही त्रुटि मानती है किन्तु लकीर पीटने से कहाँ कुछ लाभ होता है ? उसे यह समझना चाहिए था कि मनुष्य का स्वभाव है कि वह चीजों को ‘ग्रांटेड’ ले लेता है ! यह शुभ्रा का ही कर्तव्य था कि गर्वी के परिवार में सम्मिलित होने पर उसे ही जीवन की वास्तविकता और अपने परिवार के मूल्यों के बारे में समझाना चाहिए था | कोई भी क्यों न हो, जीवन में समतल रूप से जीने के लिए यह बात परमावश्यक है कि उसे अपनी स्थिति से अवगत होना चाहिए अथवा यह कहें परिवार के मुखिया का यह कर्तव्य है कि बाहर से आने वाले व्यक्ति को अपने परिवार की सीमाओं के बारे में परिचित करवाए, यह परिवार के हित में ही लाभकारी है | बाहर से आने वाली लड़की का नए वातावरण में आना और उसमें घुल-मिल जाना सही था किन्तु जीवन की महत्वपूर्ण बातों के बारे में भी तो अपनी लाडली बहू का मार्ग-दर्शन करना शुभ्रा के ही हिस्से में आता था न कि उदय के हिस्से में | यहाँ तो उदय व शुभ्रा बेटे को ही यह बात समझा नहीं पाए थे कि परिवार उन लोगों का समूह होता है जो उसमें रहते हैं, भागीदारी करते हैं, एक-दूसरे के प्रति कर्तव्य निभाएं, एक-दूसरे की परवाह करें, ख्याल रखें |

उदित स्वयं तो कोई भागीदारी करता नहीं था, उदय के कारण वह सदा मस्ती में ही रहा, गर्वी के आने के बाद वह उसके रंग में रंग गया अथवा गर्वी उसके रंग में रंग गई, यह बात तो वह कभी नहीं समझ पाई, ये तो वे दोनों ही जान सकते थे | उसकी समझ में तो बस एक बात आती थी कि उसका पुत्र व पुत्रवधू आपस में प्यार व स्नेह से रहें | कभी समझ ही नहीं आया कि उसके व उसके पति के बारे में भी बच्चों का कर्तव्य होना चाहिए था, यहाँ कर्तव्यों की वेदी उसने केवल अपने लिए निश्चित कर ली थी मुस्कुराते हुए, फिर पुत्रवधू को समझाने की बात कहाँ से आती ? कुछ परिवार ऐसे भी देखे जाते हैं जिनमें पुत्रवधू के परिवार में प्रवेश करते ही वधू को उसका कार्य, उसकी सीमा सब कुछ स्पष्ट रूप से समझा दी जाती हैं जिनसे बाहर से आने वाली बच्ची को अपना वातावरण तैयार करने में सहूलियत रहती है| लेकिन यहाँ तो कुछ ऐसा हो ही नहीं पाया था | दोनों पति-पत्नी तो इसी बात से प्रसन्न थे कि उनकी पुत्रवधू ने आते ही अपनी सास का अनुसरण करते हुए बड़ों के पाँव छूने शुरू कर दिए थे | उदय इस बात से सबके समक्ष गर्वित हो उठते थे कि उनकी पुत्रवधू विनम्र होकर बाहर से आने वालों के चरण स्पर्श करती थी | शुभ्रा कितनी मूर्ख साबित हुई थी कि उसे अपनी पुत्रवधू के मूल स्वभाव की पहचान लंबे बीस वर्षों तक नहीं हो पाई थी ! ! वैसे ऐसा नहीं था शुभ्रा गर्वी का स्वभाव तो पहले से ही पहचान तो गई ही थी | शादी के शुरू शुरू में एक बार जब साक्षी अपने पिता के घर गई हुई थी तब उदय ने किसी काम से उसे फोन किया था, उस समय वह घर से बाहर गई हुई थी| उदय ने साक्षी के पिता से कहा कि जब साक्षी आए तब उससे तुरंत बात कराएं, कुछ आवश्यक कार्य होने के कारण उन्हें साक्षी से बात करनी बहुत आवश्यक थी | बहुत देर तक जब साक्षी का फोन नहीं आया तब शुभा का दिल घबराने लगा | उदय उथल-पुथल हो रहे थे, उन्हें इस प्रकार का अपमान बिलकुल बर्दाश्त नहीं था | उनकी कभी घर में उपेक्षा हुई नहीं थी और वे साक्षी के फोन न करने से स्वयं को प्रताड़ित व अपमानित महसूस कर रहे थे | शुभ्रा पति के अन्तस से भली-भांति परिचित थी, इतनी सी छोटी बात में उदय के मन में गर्वी के प्रति कोई नकारात्मकता पैदा हो, उसे बिलकुल ठीक नहीं लगता था | शुभ्रा को उदय के भीतर चलने वाला असहज बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था | शुभ्रा का दिल घबराने लगा, वह बाहर घूमने के बहाने सामने के घर में चली गई थी और कुछ देर में घर में आकर उसने उदय से पूछा था जो वास्तव में उसके लिए गलत ही साबित हुआ क्योंकि उदय की तीक्ष्ण बुद्धि के सामने कहाँ कभी उसकी चली थी;

“”बात हो गई गर्वी से ----? ””शुभ्रा ने पति से कुछ इस प्रकार पूछा मानो वह कुछ जानती ही न हो |

“”कह आईं अपनी लाड़ली बहू से फ़ोन करने के लिए ---? ””उदय भड़के हुए थे |

““क्या कह आई ? आप भी न ---आपको नहीं पता मैं चक्कर काटने गई थी ? ””

“”सामने वाले घर में नहीं गईं तुम ? ”” उदय उबल रहे थे, वे अधिकतर क्रोध में आते नहीं थे किन्तु जब कभी क्रोध आता तब भीतर से निकलकर मुख पर पसर जाता था उनका क्रोध |

““हाँ, तो क्या हुआ? मैं और मधु तो मिलते ही रहते हैं | ”” शुभ्रा ने बड़ी ही सह्जता से उत्तर दिया था, मधु सामने वाले घर में रहती थीं और उसकी अच्छी मित्र थीं |

“ “तुमने फ़ोन नहीं किया गर्वी को? ””उदय भभक उठे थे |

“”गर्वी ---घर पर ही थी न वो, थोड़ी ही देर में वापिस आ गई थी बाहर से पर उसने या उसके पिता ने इस बात को कोई महत्व नहीं दिया कि उसे तुरंत फ़ोन करके बात करनी चाहिए | क्या यह ज़रा सी बात है ? तुम इसी तरह गर्वी को सिर पर चढ़ाओगी तो बाद में सिर पकड़कर रोना| ””उदय बहुत झल्लाए हुए थे | उन्हें अपना, अपने घर का अपमान बर्दाश्त नहीं हो रहा था | वे अपनी पत्नी की सरलता पर इतने खीज जाते थे कि कभी-कभी अनाप-शनाप बोलने लगते थे| उन्हें इस बात की बहुत चिंता रहती थी कि यदि उन्हें कुछ हो गया तो शुभ्रा का क्या होगा ? चीर-फाड़कर खा जाएंगे उसे सब ---और शुभ्रा अपने में मस्त, बिना किसी अपमान को महसूस किए वह उन कार्यों के लिए भी स्वयं को ही उत्तरदायी समझती जो उसके हिस्से में आते भी नहीं थे, इस सबके पीछे बस एक ही भावना थी कि घर में प्रफ़्फुलता तथा शांति का वातावरण बना रहे | खिलखिलाते फूल भला किसको अच्छे नहीं लगते पर उन्हें खिलखिलाने के लिए मुहब्बत की हवा तथा स्नेह के पानी की ज़रुरत होती है न ? ऐसा नहीं है कि वह कुछ समझती नहीं थी किन्तु वह तो बस एक बात जानती थी कि मनुष्य अपने प्रेमल व स्नेहल स्वभाव से दुनिया को अपनी ओर खींच सकता है, यदि चाहे तो | फिर गर्वी उसके सामने तो बच्ची ही तो थी | शुभ्रा कभी भी उसके अथवा उसके परिवार के प्रति वैमनस्य नहीं पाल सकी किन्तु कई बार अपने मनोनुकूल स्थितियाँ न देखकर उदय भभक उठते थे |

शुभ्रा गर्वी की माँ को एक बड़ी बहन की भांति सम्मान देती रही | गर्वी की सौतेली बहनें, भाई व माँ सब लोग गर्वी के विवाह में सम्मिलित हुए थे | गर्वी की एक बड़ी बहन उसके कॉलेज में एम.ए कर रही थी और उसे दीदी कहती थी | यह बाद में पता चला कि उसी दीदी के बेटे से उसकी सौतेली बहन गर्वी का विवाह हो रहा है | फिर तो वह घर में चक्कर लगाने लगी थी और परिवार के सदस्य की भांति अपना अधिकार जताने का प्रयास करने लगी थी | उदय तो वैसे ही उस परिवार के निकट नहीं जा पाए थे, वे गर्वी के परिवार से किसीके घर पर आने पर उनका अपमान तो नहीं करते थे किन्तु ह्रदय से सम्मान भी नहीं कर पाए थे जबकि शुभ्रा ने अपने मन में किसी के प्रति कोई गलत भावना नहीं पाली थी | उदय के मन में गर्वी के परिवार के प्रति एक ग्रन्थि बनी हुई थी जिससे वे कभी छूट ही नहीं पाए| हाँ, उन्होंने गर्वी का कभी अपमान नहीं किया, उसे सदा अपनी बेटी जैसी ही समझा परन्तु एक शुद्ध, सात्विक भाव वे कभी भी उस परिवार के लिए अपने मन में नहीं संजो पाए| ऊपर से गर्वी का अहं भरा व्यवहार जो उदय को कभी नहीं पच पाया था | उदित कहाँ कम था, उसकी कल्पना तो सात लोकों को चीरकर न जाने कहाँ पहुंचती थी | शुभ्रा के गर्वी व उदित के व्यवहार को सहन करने के कई प्रमुख कारण थे जिनमें सर्वप्रथम घर की शांति बनाए रखना था किन्तु वह अपने पति को समझाने में असमर्थ थी अत: सब कुछ मौन होकर देखती, सुनती रही |

गर्वी की सौतेली बहन गीता शुभ्रा को अपने शीशे में उतारने में लगी रहती | वह गर्वी के सामने तो शुभ्रा से उसकी तरफदारी की बातें करती किन्तु वैसे शुभ्रा के मन में गर्वी की माँ के प्रति ज़हर उगलने में कोई कसर न छोड़ती | एक दिन गीता का फ़ोन आया, बहुधा वह फ़ोन पर बातें करती रहती थी अत: उसका फोन आना कुछ नया नहीं था |

“”वो जो फ़्लैट वाली है न, वह आपके बारे में कुछ ऐसा कह रही थी ----”वह चुप हो गई थी | ”

“”कौन फ़्लैट वाली ? ”” शुभ्रा को यह सांकेतिक भाषा समझ में नहीं आई थी |

“”अरे ! आपकी बहू की माँ---आप इतना भी नहीं समझतीं दीदी ---“” गीता ने शुभ्रा पर एक प्रहार सा कर दिया था |

“”हाँ, बताओ क्या कहना चाहती हो ? ”” शुभ्रा को पहले से ही कुछ अंदाज़ा था कि यह लड़की बेकार ही मनों में भेद उत्पन्न कर देगी | उदय ने पहले ही कहा था कि विवाह तो हो गया है किन्तु हमें गर्वी के घर की बेकार की बातों से दूर रहना चाहिए | व्यर्थ में ही दो पाटों के बीच में पिसना ! फ़ोन कान पर लगाए हुए शुभ्रा को पति की चेतावनी याद आ गई थी |

“ “दीदी ! कहाँ चली गईं –-सुन रही हैं न ? ”” उधर से आवाज़ आई |

“”हाँ, बोलो –“”शुभ्रा ने बेमन से कहा |

“”नहीं दीदी, ऐसे नहीं –आपसे मिलकर बताऊँगी | कल आपके घर आ जाऊँ? ””

“देखो गीता ! अगर आपको वैसे ही आना हो तो आपका स्वागत है परन्तु गर्वी की माँ मेरे बारे में क्या कह रही थीं, यह बताना हो तो मुझे माफ़ करना| वो जो भी कह रही हों, मुझे सुनना ही नही है| ” कहकर शुभ्रा ने फ़ोन नीचे रख दिया था | उसका मन व्याकुल हो उठा, व्यर्थ की बातें सुनने में उसकी कोई रूचि नहीं थी | ऑंखें उठाकर देखा तो गर्वी खड़ी थी |

“”गीता का फोन था न ? क्या कह रही थी? ””गर्वी ने स्पष्ट प्रश्न किया, वह शुरू से ही स्पष्ट वक्ता थी|

“”तुम जानती हो मेरा उत्तर, मैं नहीं सुनना चाहती वह मुझे क्या बताना चाहती है| ””शुभ्रा ने अनमने से होकर उत्तर दिया था| गीता कई बार व्यर्थ की बातें करने लगती जिससे शुभ्रा के मन में खीज उत्पन्न होने लगी थी |

“”मैं जानती हूँ, वह मेरे और आपके बीच में कड़वाहट पैदा करना चाहती है –“”गर्वी ने कटुता से कहा|

“”कड़वाहट तो तब होगी न जब मैं उसकी बातें सुनूंगी, मुझे कुछ सुनना ही नहीं है | ”” शुभ्रा ने पुन: दोहराया |

शनै:शनै:गर्वी के सौतेले भाई बहन ---गीता, उसकी दूसरी बहन व भाई सबका घर पर आना बंद हो गया | शुभ्रा को किसी और से मतलब भी क्या था, उसे अपना परिवार संभालकर चलना था | किसी की भी काली दृष्टि से उसे सहेजकर रखना था उसके पास व्यर्थ की बातों के लिए न तो समय था और न ही इच्छा | वैसे अब उसे हँसी भी आती है और सोचती भी है ‘आखिर क्या होती है काली दृष्टि? ’

जब तक उदय नौकरी में थे, सब कुछ ठीक ही चल रहा था | वे बहुधा कहा करते ;

“”भई ! मैं तो अपने पलंग के नीचे अपना बक्सा रख लूँगा, उसमें रखे हुए पैसे बजाता रहूँगा, अब उसमें कम हो या ज्यादा, खनक सुनकर रोटी तो मिलती रहेगी”

“तब तो उसमें रेज़गारी ही होगी पापा? ”दीति हँसती |

“ जो कुछ भी हो, ये पत्ते थोड़े ही खोलूँगा, अब खनक तो खनक ही होती है, नोट थोड़े ही बजते हैं | ”

“और खिलखिलाकर हँसने लगते थे| उनकी हँसी की खनक में सबकी हँसी सम्मिलित हो जाती | आज भी शुभ्रा के कानों में उदय की हँसी की खनक छ्नछ्नाने लगती है | कितना कम खुलकर हँसते थे उदय, उसी हँसी ने तो शुभ्रा के दिल पर एक मुहर लगा रखी है जो कभी भी चुभने लगती है और उसकी आँखें पनीली हो जाती हैं |

उदित को पिता की वास्तविक आर्थिक स्थिति का भान नहीं हुआ था, वह समझ ही नहीं पाया कि उसके पिता के पास कितना धन है | उसे यही लगता रहा कि सरकारी नौकरी में ‘क्लास वन’ अफ़सर पिता के पास अवश्य ही काफ़ी पैसा है | संभवत: इसी कारण वह नौकरी न करके व्यवसाय की ओर भागा जिसका परिणाम कुछ ठीक नहीं हुआ था और उदय का काफी पैसा उदित के व्यवसाय के न चलने के कारण नष्ट हो गया | अब तक गर्वी ने दो बेटियों को जन्म दे दिया था | उदय बहुधा बातों ही बातों में कहा करते थे ;

“”आज के जमाने में एक ही बच्चा काफ़ी है, वह लड़का है या लड़की ---क्या फ़र्क पड़ता है –”

जबकि गर्वी का मन्तव्य था कि घर में दो बच्चे तो होने ही चाहिएं जिससे वे अपनी बातें एक-दूसरे से साँझा कर सकें | उसकी बात अपने स्थान पर बहुत ठीक थी किन्तु उदय प्रकाश कहीं न कहीं किसी अनभिज्ञ घबराहट से भरे रहते थे | आज के ज़माने में मध्यम वर्ग का आदमी भी अपने बच्चों को जिस प्रकार की शिक्षा तथा वातावरण देना चाहता है, उसके लिए तैयारी की भी तो पूरी तरह ज़रूरत होती है | वे अपने बेटे उदित की तैयारी नहीं देख पा रहे थे और चिंतित हो उठते थे |

“ “माँ, साक्षी प्रेग्नेंट है -----” एक दिन उदित ने शुभ्रा को फ़ोन किया, उसकी आवाज़ उछल रही थी | वह साक्षी के साथ हस्पताल में था| यह दूसरे गर्भ की बात है |

“ “इस ज़िम्मेदारी को उठा पाओगे तुम? ”” बेटे को बधाई देने के स्थान पर शुभ्रा के मुख से ये ही शब्द निकले थे |

“”हाँ, माँ आपके आशीर्वाद से सब ठीक हो जाएगा | ”” शुभ्रा ने कुछ ख़ास खुशी महसूस नहीं की थी| वह जानती थी कि बड़ी बच्ची का कितना उत्तरदायित्व वह संभाल रही है ! गर्वी को छूट थी वह कहीं भी जा सकती थी | घर पर सास तो थी ही बच्ची को संभालने वाली | गर्वी मित्रों में घूमे, पति के साथ घूमे, घर पर खाना कैसे बन रहा है ? सबकी पसंद के खाद्य-पदार्थ कैसे तैयार हो रहे हैं, गर्वीकी पसंद क्या है ? इन सबका खूब ध्यान रखा जाता और सबको सब कुछ समय पर तैयार मिलता| उदित ने भी कभी इन सब बातों पर ध्यान नहीं दिया, घर का काम सब समय पर हो ही रहा था | पहले बच्चे के जन्म के समय ही शुभ्रा ने गर्वी की माँ से कहा था ;

“”हमारे यहाँ ससुराल में ही डिलीवरी होती है –” शुभ्रा ने दोनों बच्चों के जन्म के समय गर्वी की माँ से डिलीवरी अपने पास ही करने के लिए कहा था | इसका सीधा सा अर्थ यह था कि जब बच्चा इस परिवार का है तब उसका खर्च व श्रम दूसरों पर डालना ठीक नहीं | ”तब गर्वी के पिता जीवित थे, वे किसी परंपरा के प्रति अधिक रूढ़िवादी नहीं थे, जैसे मन करे, वैसे करो | शुभ्रा के संस्कार भी परंपराओं में जकड़े हुए नहीं थे| उसे तो सीधी सी यह बात समझ में आती थी कि बच्चा जब इस परिवार का है तब उसका जन्म व देखभाल भी इसी परिवार के सदस्यों का कर्तव्य है | अत: उसने बड़ी प्रसन्नता से इस दुह्तर कार्य को अपने ऊपर ले लिया था अन्यथा यहाँ के रीति-रिवाज़ों के अनुसार तो कम से कम पहले बच्चे का जन्म लड़की के मायके में ही होता है और लड़की लगभग पाँच-छह माह अपने मायके रहकर आती है| इसका कारण जो उसकी समझ में आया था वह यह था कि लोगों के मन में कुछ इस प्रकार की धारणाएँ पली हुईं थीं कि ससुराल में बहू की देखरेख व सार-संभाल उतनी ठीक से नहीं हो सकती जितना मायके में हो सकती है | शुभ्रा ने इस बात को एक चेलेंज के रूप में स्वीकार किया था और गर्वी का कमरा ऊपर होने के बावज़ूद वह उसे एक-एक गर्म रोटी ऊपर भिजवाती रही थी | गोंद व निरे मेवे के लड्डू उसने कई बार बनाकर रख लिए थे और साक्षी के ना-नुकुर करने के उपरांत भी वह स्वयं ऊपर जाकर प्रतिदिन गर्म दूध के साथ गर्वी को लड्डू खिलाकर आती थी | कितना सुख मिलता था उसे यह सब करने में ! उसके पास शब्द तो नहीं हैं किन्तु उस भाव को उसने आज भी अपने मन में किसी जागीर की भांति संजोकर रखा है| जो भाव व संवेदना आज धीरे-धीरे फटकर चिंदी-चिंदी बने उसकी आँखों के समक्ष उड़ रहे हैं |

गर्वी अपने काम पर जाती थी और शुभ्रा अपने काम के अतिरिक्त बच्चियों की देखभाल भी करती रही थी किन्तु इन सबमें कहीं कोई अपेक्षा नहीं थी | यदि था तो केवल प्यार, एक –दूसरे के प्रति आदर व शुभ की कामना ! शुभ्रा ‘विजिटिंग फैकल्टी’थी अत: जीवन यदि बहुत अमीरी में नहीं था तो किसी बात की कमी भी नहीं थी| वैसे धन की कोई सीमा नहीं होती, एक वस्तु प्राप्त होने के पश्चात मनुष्य का मन दूसरी वस्तु प्राप्त करने के लिए लालायित होने लगता है | हम कितना ही स्वयं को बचाकर रखने की चेष्टा करें किन्तु आज के वातावरण को देखकर मन दूसरी वस्तुओं पर फिसलने ही लगता है बेशक अपने लिए न सही, अपनों से जुड़ों के लिए ही सही और मन में यह आने लगता है कि काश ! हमारे पास यह वस्तु होती, न होने की स्थिति में वह कभी-कभी दुखी भी होने लगता है |

“क्या करें, हमारा तो भाग्य ही ऐसा है ----“

शुभ्रा को कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ, ताउम्र अपने कर्तव्यों की डोरी लपेटते हुए उसके मुख पर एक स्वाभाविक मुस्कान बनी रही | ऐसा कभी लगा ही नहीं कि उसके पास यह होना चाहिए था, वह होना चाहिए था अथवा काश ! उसके जैसा हमारे पास भी होता | एक संतुलित जीवन चलता रहा बिना किसी अपेक्षा के | ऊपर से सोने में सुहागा कि यदि वह घर के बारे में उदय से कुछ बात करती, कुछ व्यवस्था का प्रयास भी करती तब उदय कहते ;

“”ये घर है, कोई होटल नहीं -----” और शुभ्रा अपने मुड़े-तुड़े तकियों को तथा बैठक में सजे हुए कुशनों को उल्टा-पुल्टा देखकर मुह बनाकर बुदबुदाती रह जाती |

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