पीताम्बरी - 2

पीताम्बरी

मीना पाठक

(2)

जेठ की तपती दुपहरी की गर्म लू शरीर को झुलसा रही थी, सूरज अपने यौवन के चरम पर आग उगल वसुधा को दहका रहा था, सड़क पर इक्का-दुक्का लोग ही आते जाते दिख रहे थे बाकी कभी-कभी जीप फर्राटे भरती हुयी निकल जाती थी | ऐसे में गमछा सिर पर बाँधे रामनारायण ओझा सायकिल से चले जा रहे थे | पसीने से तर–ब-तर, उन्हें लग रहा था कि ये रिश्ता गया हाथ से ! बुरे-बुरे ख्याल आ रहे थे मन में, वह किसी भी कीमत पर ये रिश्ता चाहते थे | एक बहन के लिए वह हमेशा दुखी रहते थे अब और कोई बेटी ये सब ना सहे, यही चाहते थे | लंबा सफर तय कर जब वह उनके द्वार पर पहुँचे तब उनकी अच्छी आवभगत हुई | पहले चिटोरा गुड़ के साथ पानी आया फिर बाल्टी भर पानी में मीठउआ आम भर कर उनके सामने रख दिया गया | उन्होंने अपने सूखे हलक को पानी से तर किया पर और किसी चीज को हाथ नहीं लगाया | पल्लू की ओट से कलावती ने उन्हें आश्वासन दिया और उन्हें निश्चिन्त रहने को कहा | बस दामादों के आने की देर थी, उनके आते ही कोई शुभ मुहूर्त निकलवा कर वो खबर करेंगी, ये कह कर उनको शाम के समय विदा कर दिया |

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घर के पुरुष बाहर कुँएं से पानी खींच कर वहीँ बने चबूतरे पर स्नान करते थे |

चबूतरे के पास ही रातरानी का पेड़ था जो चबूतरे से गिरने वाले पानी से सिंचित हो कर हमेशा हरा-भरा रहता था | अँजोरिया रात में जब सभी बच्चे उस चबूतरे पर बैठ कर पचीसी खेलते या अक्कड़-बक्कड़ खेलते तो सफ़ेद फूलों से लक-दक रातरानी का पेड़ झूम कर अपनी भीनी-भीनी सुगंध से वातावरण सुवासित कर रहा होता | कुँए का चबूतरा बच्चों के खेलने के लिए अच्छा स्थान था तिस पर चाँदनी रात हो तो क्या बात ! वो खेलने लग जाते तो समय का पता ही नहीं चलता |
कभी-कभी जब बच्चे खेल बंद नहीं करते तब इरावती बुआ उन्हें ये कह कर डरा देती थीं कि रातरानी के पेड़ के पास आधी रात को नाग-नागिन खेलने के लिए आते हैं तब सारे बच्चे डर कर सोने चले जाया करते थे | अँधेरिया रात में तो क्या मज़ाल कि कोई बच्चा रातरानी के पास फटक जाए !
आज भी सभी बच्चे वहीँ छुपा-छुपउअल खेल रहे थे | रात गहराती जा रही थी; पर उन दोनों का मन कहीं और था इस लिए बच्चे अभी तक आजादी से खेल रहे थे | ननद-भौजाई दोनों चिंतित बैठीं थीं, अभी तक बड़का बाबूजी वापस नहीं आए थे |

“अबहिन ले राउर भाई नाही अइनी, हमार जियरा डेराता, का जाने का भयिल ओहिजा |” निराश सी बोलीं बड़की अम्मा |

“भाई के आवते सब पता चल जाई, आप ढेर चिंता मति करीं भौजी, सब ठीक होई |” इरावती अपनी मन की आशंका को छुपाते हुए उन्हें समझाती है |

अँजोरिया रात थी सभी बच्चे धमाचौकड़ी मचा रहे थे ओसारा में ननद-भौजाई बैठ कर रामनारायण ओझा की प्रतीक्षा कर रही थीं अचानक बच्चों के झगड़ने की आवाज से दोनों का ध्यान उनकी ओर जाता है | खेल में हार-जीत को ले कर लड़ाई हो रही थी | इरावती ने जा कर सब को डांटा और वहीं बिछी खटिया पर सुला दिया और फिर से वहीं आ कर बैठ गई तभी सायकिल की घंटी की आवाज आई |

“भाई आ गए !” इरावती खुश होती हुई बोली और ओसारे में बच्चों के पास पड़ी हुई अपनी खटिया की तरफ बढ़ गई | उत्सुकता तो थी मन में ये जानने की कि क्या हुआ वहाँ | पर इस समय उसने भौजी को भाई के साथ अकेला छोड़ना ही उचित समझा |

“अपनी साथे हमरो के डेरवा दिहले रहलू, सूत ना कपास जुलाहे में लट्ठमलट्ठा, उंहाँ कौनों बिशेष बात नाहीं अऊर तूँ हमार मूड़ी खा गईल रहलू |” रामनारायण ओझा कुर्ता उतारते हुए बोले फिर सारी बार एक-एक कर बाताने लगे | खुशी से पत्नी की ओर देखते हुए कहते है और सारी बात बताते हैं | बड़की अम्मा के मन में ख़ुशी के लड्डू फूट रहे थे | सुबह पूरे घर में खुशी का माहौल था |

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पीतो अपना मन हार बैठी थी, छत पर लेटे हुए आशुतोश के ख्यालों में गुम थी, उसकी देह यहाँ थी; पर मन आशुतोष के पास, रह-रह कर आशुतोष का वो स्पर्श उसे गुदगुदा जाता था पर वो डर उसके मन में भी बैठा था जो पूरे घर वालों के मन में बैठा था | उसकी आँखों की नींद उड़ी थी | आशुतोष के खयालों में डूबी थी कि सायकिल की घंटी सुन कर दुआर की तरफ झाँक कर देखा बाबूजी सायकिल खड़ी कर रहे थे | उसका मन होनी-अनहोनी के बीच उलझा था जैसे ही वो लोग घर के भीतर गए वह भी दुआर की तरफ से आँगन की तरफ ठीक अम्मा के दरवाजे के ऊपर कान लगा कर लेट गयी ताकि उनकी बात-चीत सुन सके और जैसे ही उसने खबर सुनी, उसका मन पंख लगा कर नीले आसमां में उड़ान भर रहा था, वह अम्बर के सारे तारे अपनी ओढ़नी में टाँक लेना चाहती थी, इन्द्रधनुष के सातों रंग अपने दामन में भर लेना चाहती थी, चन्दा को बिंदिया बना अपने माथे पर सजा लेना चाहती थी, मन में अनगिनत स्वप्न सजाये वह आसमान में विचरण कर रही थी कि अचानक ही इंदू और रूपा ने आ कर उसे झकझोर दिया, सन्न-गन्न मारे वो दोनों भी नीचे कान लगाए थीं | वह चौंक कर अपने ख्यालों से बाहर आ गई | बिना मुंह से बोले ही इंदू और रूपा उसे छेड़ने लगीं, उसका चेहरा शर्म से सिन्दूरी हो रहा था, अपने-अपने भीतर खुशियों का समन्दर सम्भाले आपस में लिपट गईं तीनों | हवा के हल्के व सुखद स्पर्श के साथ उसकी निगाहें आसमान की ओर उठ गई | उन्हें देख चाँद भी मुस्कुरा रहा था |

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धीरे-धीरे समय गुजरने लगा | ग्रीष्म ऋतु खत्म होने को थी और वर्षा ऋतु का आगमन होने वाला था |

आज फिर सुबह से छत पर कौआ काँव-काँव कर रहा था, बाहर नीम के वृक्ष पर कोयल भोर से ही कूक रही थी | धीरे-धीरे दिन सरकता जा रहा था, अचानक इरावती बाहर से दौड़ी आई |

“भौजी ! बेलापुर से नाऊ कौनों खबर ले आईल बा |”

बड़की अम्मा का चेहरा खिल उठा, बड़का बाबूजी ड्यूटी गए थे सो बाहर से हल्दी लगी चिट्ठी इरावती ही ले आई थी | खबर पढ़ कर सभी के चेहरे खिल उठे थे | नाऊ को जलपान करा उसे नेग दे कर विदा कर दिया गया | बड़की अम्मा की देह में उर्जा का संचार हो गया था, ‘गोधन’ के बाद ब्याह की तारीख निकली थी | अब घर में सभी लोग पीतो के ब्याह की तैयारी में जुट गए |

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दिवाली नजदीक आ रही थी..देव के उठने की तैयारी थी..त्यौहार का तो बहाना था..पीताम्बरी की ब्याह की तैयारी हो रही थी..सभी उत्साह से भरे हुए थे..अच्छा वाला गेंहूँ बखार में शादी के लिए रख दिया गया था..धान भी कुटा-छंटा..बीना-फटका कर बढियाँ चावल रख दिया गया..पीतो के साथ भेजने के लिए चिवड़ा घर में ही कूटना था सो वो ब्याह के पन्द्रह दिन पहले ही कुटेगा अगर पहले से कुटा जाएगा तो चिवड़ा कड़वा जाएगा इस लिए वो काम अभी रुका था..बाकी सब बाजार-हाट हो रहा था |

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जैसे-जैसे समय नजदीक आ रहा था पीतो की धड़कने बढ़ रहीं थीं | घर के सभी लोगों का स्नेह उमड़ने लगा था पीतो पर क्यों कि अब वह इस घर के लिए पराई होने वाली थी | बड़की अम्मा ब्याह का गीत गुनगुनातीं -

“झाँझर कइलू करेजवा हो बेटी

चलेलू सुन्दर वर के साथ

तनिको ना दया तोहरा लागेला बेटी हो

चलेलू सुन्दर वर के साथ..|”

इतना ही गातीं और सिसक पड़तीं फिर जा कर उसे गले से लगा कर रो पड़ती थी; तब सभी भावुक हो जाते थे, पीतो भी सिसक पड़ती | पीतो को अपने ब्याह होने की खुशी तो थी पर मायका छूटने का दुःख भी कम नहीं था |

धीरे-धीरे वो समय भी नजदीक आ गया, अब पीतो ने घर से बाहर निकलना छोड़ दिया | वह स्वभाव से भी शर्मीली और संकोची थी सो ब्याह नजदीक आते ही उसने खुद को एक कमरे में छुपा लिया था | उसका खाना-पानी सब वहीं आ जाता | बड़की अम्मा ने नाउन को बुला कर पीतो को तेल-बुकुआ लगाने को बोल दिया था | उबटन और कमरे के भीतर रहने के कारण पीतो खिलती जा रही थी | बाकी की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रहीं थी | घर की औरतें संझा-पराती और ब्याह के गीत गाने लगी थीं |

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उधर आशुतोष के घर भी सभी रिश्तेदार आने लगे थे | चढ़ावे का सामान बक्से में लगा दिया गया था, कुछ गहनें रह गए थे, जो आने थे | आशुतोष लगन उठने से दो दिन पहले आने वाले थे | यहाँ भी रोज शाम को गाँव की महिलाएँ आतीं और गीत गातीं |

हँसी खुशी का माहौल था | बहनें खुश थी, कलावती के पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे खुशी की अधिकता के कारण उन्हें अपनी दुःख बीमारी सब भूल गई थी अब तो उन्हें बहू उतारने की जल्दी थी |

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साँझ का समय था, ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही थी, सूर्य अपनी प्रखर किरणों के साथ थक कर सुस्त पड़ गए थे, अब वह संध्या से मिल कर निशा की आगोश में विश्राम करने को आतुर थे; पर उससे पहले रामनारायण ओझा तिलक का सारा समान ले कर घर पहुँच जाना चाहते थे | कस्बे से सारा सामान रिक्शे पर लाद कर वह घर की ओर बढ़े जा रहे थे, गाँव में जाने के लिए उन्हें सड़क से उतर कर एक विशाल बगीचे को पार करना था | सड़क छोड़ कर वह बगीचे की कच्ची पगडंडी पर उतर गए | पूरा बगीचा आम, जामुन, महुआ, लीची और कटहल के वृक्षों से भरा था | बीच-बीच में जहाँ कुछ स्थान खाली था वहाँ पर अब सागौन के पेड़ लगा दिए गए थे जिससे बगीचा और भी घना हो गया था, बगीचे के बीचोबीच एक तालाब था जिसके चारों ओर छठ माई का थान बना हुआ था | उनके मन में ना जाने क्या-क्या ख्याल उठ रहे थे | उनका मन कहीं और चल रहा था, उन्हें लग रहा था कि तिलक का सामान कुछ और खरीदना चाहिए था, कहीं कुछ कमी ना रह जाय जिससे पीतो के ससुराल वालों को कुछ कहने का मौका ना मिल जाय फिर सोचते कि कोई पीतो अकेली ब्याहने को तो है नहीं और भी बेटियाँ ब्याहनी है इस लिए अपने हिसाब से ही चलना होगा मुझे और उन्हीं रास्तों के अभ्यस्त उनके कदम स्वत: ही घर की ओर बढ़ते जा रहे थे कि बगीचे के भीतर से घास चर कर आती हुई भैंसों का झुण्ड एकाएक उनके सामने आ गया, वह चौंक कर जल्दी से एक किनारे हो गए; पर एक भैंस एकदम से उनकी ओर बढ़ी, वह अभी संभलते कि उसने उनकी पसली में सिंग लगा दी | सायकिल एक तरफ गिर गई और एक चीख के साथ रामनारायण एक तरफ गिर पड़े, रिक्शे वाला आगे था सो वह तेजी से पैडल मारते हुए बगीचे के बाहर निकल गया; पर उसने रामनारायण की चीख सुन ली थी | बगीचे के पास ही ट्यूबेल था | उसने वहाँ पर बैठे लोगों को सूचित किया, वहाँ से कुछ लोग दौड़े और उनको उठा कर घर पहुँचा दिया गया | उस दिन तो मरहम पट्टी हो गई | बड़की अम्मा दूध में हल्दी डाल कर उन्हें पिला दीं | ओझा जी भी काम में लग गए, पर वह चोट घटने की बजाय बढ़ने लगा, धीरे-धीरे पूरे शरीर में झलका पड़ गया और वह खटिया से लग गए | घर में मायूसी पसर गयी |

अब क्या होगा ? इधर ब्याह को मात्र कुछ दिन ही बचे थे और बड़का बाबूजी खटिया पकड़ लिए थे | आनन-फानन में उनको नजदीक के शहर में बड़े डॉ० को दिखाया गया | डॉ० ने देखते ही मना कर दिया, कहा कि –“इन्हें घर ले जाओ, पूरे शरीर में इन्फेक्शन हो गया है, आप लोगों ने यहाँ लाने में बहुत देर कर दी |”

दूसरे ही दिन उनका देहान्त हो गया | घर में हाहाकार मच गया, बड़की अम्मा छाती पीट-पीट पागल सी हो गई, पीतो बेहाल ! जिसने भी सुना भागा-भागा उनके घर पहुँच गया, हर कोई सदमे में था | घर में शुभ कार्य और अचानक ये विपत्ति ! बड़की अम्मा बार-बार अचेत हो जातीं |

किया क्या जा सकता था, ईश्वर के आगे किसकी चली है ! अब जो होना था वो हो गया था; पर आगे का कर्मकाण्ड तो करना ही था | उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया | घर वीरान हो गया, कल तक जहाँ खुशियाँ फैली थीं, वहीं अब मौत का सन्नाटा था; जब बड़की अम्मा का करुन क्रन्दन इस सन्नाटे को चीर देता था; तब अनेक सिसकियाँ भी उसमे शामिल हो जाती थी | अजीब खामोशी और उदासी पूरे वातावरण में छायी हुई थी | किसी में भी इतना साहस नहीं था कि एक दूसरे को ढांढस बँधाए | कुछ क्षणों में ही सब कुछ समाप्त हो गया था, टूट कर बिखर गया था | क्या होना था और क्या हो गया था !

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खबर बेला पुर भी भेज दिया गया वहाँ पर भी माहौल गमगीन हो गया | आशुतोष के दोनों बहनोई आए और सभी को सांत्वना दे कर चले गए | धीरे-धीरे एक-एक दिन गुजरने लगा | रामनारायण की तेरवीं हो गई | घर के बाहर सभी लोग यही सोच रहे थे कि पीतो के ब्याह की तारीख का क्या किया जाय; पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल रहा था |

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बड़की अम्मा के माथे पर जहाँ बड़ी सी टिकुली, भरमांग सिन्दूर और शरीर पर फूलदार साड़ी हुआ करती थी, अब माथा सूना हो गया था, मांग उजड़ गई थी और शरीर पर सफ़ेद किनारीदार धोती आ गई थी | जहाँ वह बेधड़क निकलती थीं वहीं अब कमरे से बाहर निकलने में संकोच करती थीं, चुप सी हो गयीं थीं वह |

घर के बुजुर्ग परेशान थे कि क्या किया जाय ? इस गम्भीर वातावरण में कैसे कोई फैसला लिया जाय; पर उसी गम्भीर और गमगीन वातावरण में एक साहसिक फैसला लिया गया | सभी ने मिल कर तय किया कि ब्याह उसी तारीख पर होगा | जब ये खबर घर के भीतर आई तो फिर से बिलख पड़ीं बड़की अम्मा | पीतो भी फूट-फूट कर रो पड़ी | कैसे वह अम्मा को छोड़ कर जायेगी इस हाल में ? रूपा और इंदू उसे संभाले रहती थी; पर किसी के जाने से जिंदगी कभी रुकी है भला !

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विवाह के समय जहाँ गीत के बोल फूटने थे, हँसी-ठहाके गूँजने थे, वहाँ रह-रह कर सिसकियाँ गूँज उठती थीं | बहुत ही सादगी से पीतो का विवाह कर दिया गया, बिदाई के समय पीतो माँ के गले लग कर बिलख-बिलख कर रोई, इंदू और रूपा का भी बुरा हाल था, हर कोई अपने आँसू पोंछ रहा था |

रोते बिलखते उसे खींच कर डोली में बैठा दिया गया | डोली विदा हो गई और पीतो आधी यहीं रह गई और आधी अपने ससुराल चली गई |

बेटियों के विदा पर तो सभी रोते हैं; पर इस तरह किसी बेटी की विदाई ना हो; हर कोई ईश्वर से यही प्रार्थना कर रहा था |

पीतो के जाने के बाद क्या पुरुष, क्या स्त्री सभी बैठे रो रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे दूसरी अर्थी विदा हुई हो इस घर से |

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