Raahbaaz - 1 in Hindi Social Stories by Pritpal Kaur books and stories PDF | राहबाज - 1

राहबाज - 1

मेरी राह्गिरी

(1)

शुरुआत

मैंने वक़्त की धार में एक पैर छुआ कर देखा था और मेरा पैर दहक गया था बुरी तरह. ये नदी मेरी ख्वाहिशों ने गढ़ी थी. मैं नींद में डूबा बेखबर ख्वाबों से हार कर सोने और जागने के बीच तैर और डूब रहा था. मेरी ख्वाहिशें दिन पर दिन हाथ पैर चलाती जवान और फिर बूढ़ी होती जा रही थी. मैंने सोच लिया था कि जिन लोगों ने मेरे हाथ पैर बांध कर मुझे लाचार कर छोड़ा है उनकी एक न चलने दूंगा. मैं जानता हूँ मेरे पूरे परिवार की उम्मीदें मुझ पर टिकी हुयी हैं. और मैं इन उम्मीदों को पूरा करने के लिए क्या नहीं करता?

सुबह घर से निकलता हूँ तो मेरे दोनों बच्चे अपने-अपने कॉलेज जाने की तैयारी में लगे होते हैं और उनकी माँ यानी मेरी पत्नी निम्मी उनकी तैयारी में मसरूफ होती है. घर में एक छोटा-मोटा सा तूफ़ान बरपाया होता है. तीन कमरों वाले इस फ्लैट में उस वक़्त कोई चीज़ अपने ठिकाने पर नहीं होती. मैं इस अफरा-तफरी में खुद को बहुत मजबूर और बेकार पाता हूँ. सो जिस दिन बच्चों का ये कारोबार चल रहा होता है मैं सुबह होते ही नहा-धो कर घर से बाहर निकल जाता हूँ.

गाडी उठाता हूँ और सबसे पहले अपने मनपसंद स्ट्रीट फ़ूड वाले के पास पहुँच जाता हूँ. वो सुबह छह बजे से ही अपनी छोटी सी दुकान लगा लेता है. मुझ जैसे बहुत से घर से घबराए मर्द उसके ग्राहक हैं. हम लोगों के अलावा अकेले रहने वाले मर्द और यूनिवर्सिटी के छात्र जो हॉस्टल में जगह नहीं पाते और शेयर कर के फ्लैट किराए पर ले कर रहते हैं, वे भी अक्सर उसकी स्टाल पर देखे जा सकते हैं.

गंगाराम की चाट, छोले-कुलचे, तले हुए आलू, समोसे की चाट गज़ब की होती है. उसके साथ ही उसका छोटा भाई चाय की टपरी लगाता है. यानी अगर आप बेघर-बार हैं तो मेरे इलाके में आपको परेशान होने की कत्तई ज़रुरत नहीं है. आपके खाने-पीने का पूरा इन्तजाम गंगाराम की शरण में आने पर हो जाता है.

जिस दिन बच्चे कहीं नहीं जाते यानि कॉलेज की छुट्टी होती हैं जैसे कि इतवार और दूसरी छुट्टियाँ, उस दिन मेरा घर मेरा होता है और मेरी पत्नी मुझे अपनी पत्नी जैसी ही लगती है.

वैसे वह बहुत दर्दमंद और मोहब्बत करने वाली औरत है. मुझे बहुत चाहती है लेकिन मेरे बच्चों को मुझसे थोडा ज्यादा चाहती है. ये बात मैंने समय के साथ शिद्दत से महसूस की है. लेकिन मैं उसे कहता नहीं हूँ. जानता हूँ बुरा मान जायेगी, उसका दिल दुखेगा और वो मेरी इस बात को गलत साबित करने के लिए खुद पर तरह-तरह की पाबंदियां लगाने की कोशिश करेगी.

जैसे कि बच्चों को अपना काम खुद करने को कहना, उन्हें शोर मचाने से रोकना, उनकी मनपसंद चीज़ें एक ही बार कहने पर तुरंत नहीं बनाने लग जाना. और ऐसा करने से उस पर मानसिक दबाव बढ़ेगा. क्यूंकि वो दिल से ऐसा नहीं कर पायेगी. उसके मानसिक तनाव के असर से घर का माहौल बिगड़ जाएगा. इस बिगड़े हुए माहौल से मुझे खुद को संतुलित रखने में बहुत मुश्किल होती है.

इसलिए मैं चाहता हूँ कि जो जैसा चल रहा है वैसा ही चलता रहे. जो जिसको पसंद है वो करे. इस बीच मैं वो करता रहूँ जो मुझे पसंद है. इस तरह घर की गाडी सही तरीके से चलती रहती है. मैं चैन से रहता हूँ, पत्नी चैन से रहती है.

बच्चे छुट्टी वाले दिन देर तक सोते हैं. इस दिन मैं और मेरी पत्नी पुराने वाले पति-पत्नी बन जाते हैं. मैं उसके साथ किचन में खडा बातें करता रहता हूँ, वह नाश्ता बनाती जाती है. फिर डाइनिंग रूम में साथ बैठ कर नाश्ता करते हैं. इस दौरान मेरा बेटा और बेटी अपने अपने कमरों में सोते हुए पड़े रहते हैं. यानी पूरा घर हमारे कब्ज़े में होता है.

लेकिन अगर आप ये सोच रहे हैं कि उस दिन रोमांस या लवमेकिंग का कोई सीन हमारे बीच बनता है तो आप सरासर ज्यादती कर रहे हैं. कौन से पति-पत्नी के बीच शादी के के बीस साल के बाद भी रोमांस की गुन्जायिश बची रह जाती है?

वैसे भी हमने तो शादी से पहले चार साल तक जम कर रोमांस, घूमना-फिरना, छिपना-छिपाना, लड़ना-झगड़ना सब कर लिया था. हालाँकि कभी कभार जब भी मेरी पत्नी मुझ से रोमांस की कमी की शिकायत करती है तो मैं उसे फिल्म दिखाने ले जाता हूँ. कभी कोई नाटक या फिर शॉपिंग.

वैसे वो मेरे साथ शॉपिंग जाना पसंद नहीं करती. मैं चाहता हूँ कि एक ही दूकान से देख कर जो लेना हो ले लो और घर से तय कर के चलो कि क्या लेना है. लेकिन मेरी पत्नी को तो सारा बाज़ार घूम-घूम कर देखना होता है और मैं थक जाता हूँ. शारीरिक कम मानसिक तौर पर ज्यादा. सो मैं नाटक या फिल्म या कोई स्टैंड अप कॉमेडी शो ज्यादा पसंद करता हूँ. कभी कभी हम चारों भी फिल्म देखने जाते हैं.

तो ये है मेरी पारिवारिक ज़िन्दगी. जिसमें नया कुछ भी नहीं है. आप भी सोच रहे होंगे कि क्यूँ मैं आप को ये बोरिंग सी कहानी सुना रहा हूँ? एक वजह है. मैं दिखाना चाहता हूँ कि एक आम शादीशुदा आदमी की आम शादीशुदा ज़िन्दगी में क्या-क्या होता है और वो इसे कैसे जीता है. आप कहेंगे हम भी शादीशुदा हैं, जानते हैं. तुम ने कौन सा तीर मार लिया है?

बात तो सही है आपकी. बिलकुल ठीक कहते हैं आप. सब शादियों का कमोबेश यही हाल होता है. लेकिन क्या शादीशुदा आदमी इस शादीशुदा ज़िन्दगी से बोर नहीं होता?

होता है जी. अब यही बात मैं आपको बताने जा रहा हूँ. मैं भी बोर होता हूँ. और बोरियत से निजात पाने के लिए जो हथकंडे मैंने आजमाए उनके बारे में आप को बताऊंगा.

उनके जो अंजाम मैंने देखे वो ज़रा आप भी सुन लें. ये भी जानता हूँ कि आप मेरा अंजाम सुन कर कोई सीख नहीं लेंगे. आप खुद वो सारे हथकंडे आजमाना चाहेंगे. कर के ही मानेंगे.

लेकिन क्या है न, मैं तो आप को बता ही दूँ. कम से कम मेरे मन का बोझ तो हल्का हो ही जाए. अब ये सारी बातें मैं अपनी पत्नी से तो कह नहीं सकता. हालाँकि वही मेरी ज़िन्दगी की सबसे नज़दीकी राजदार है. फिर भी इन बातों से उसे दुःख होगा और मेरी राजदार को दुःख पहुंचा कर मुझे चैन नहीं मिल सकता. सो मैं खुद अपने चैन के लिए ये सब आपको बता रहा हूँ. आप से इसलिए सहजता से कह पा रहा हूँ क्यूंकि मैं आप को न तो अपना नाम बताऊंगा और न ही पता. सो मेरे राज़ आप के पास महफूज रहेंगें.

जैसा कि मैंने अभी आप को बताया कि मैं अक्सर घर से सुबह ही निकल जाता हूँ, बिना कुछ खाए-पिए; जा कर गंगाराम की से उसकी पटरी वाली दुकान से चटपटी चीज़ें खाता हूँ. अक्सर इसलिए कहा कि ऐसा मैं हफ्ते के छह दिन करता हूँ. क्यूंकि कॉलेज छह दिन खुलते हैं और मेरे घर में सुबह का तूफ़ान भी छह दिन ही आता है.

तो गंगाराम से सुबह का नाश्ता कर के मैं सीधा अपने दफ्तर जाता हूँ. सेल्फ एम्प्लोएड हूँ सो अपने दफ्तर का राजा हूँ. जा कर सीधे अपने केबिन में दरवाज़ा बंद कर के सोफे पर लेट जाता हूँ. ये मेरा अपन वक़्त होता है. इतना अपना कि ऐसा अपना वक़्त मुझे घर में अपने बेडरूम में भी नहीं मिलता.

वजह? अजी वहां मेरी पत्नी रहती है. वो कमरा मेरा कम उसका ज्यादा है. हर चीज़ पर उसकी छाप है. हर कोने में उसकी चीज़ें हैं. हर रंग उसकी पसंद का है. मुझे अपने कपड़ों के लिए भी उसका मुंह देखना पड़ता है. अलमारी वही लगाती है. कोई चीज़ अगर बिलकुल सामने ही ना रखी हो तो मैं उसका मोहताज हो कर रह जाता हूँ. जब तक उसे वक़्त न मिले और मुझे निकाल कर ना दे, मैं उसकी राह देखता हूँ. मैं उसका एहसानमंद हूँ कि वो मेरा इतना ख्याल रखती है लेकिन साथ ही मुझे इस बात का रंज भी होता है कि मेरी खुदमुख्तारी गुम हो चुकी है.

खुदमुख्तारी से याद आया कि अपने ऑफिस का मैं राजा हूँ. मेरे ऑफिस में सिर्फ मेरा और मेरा राज चलता है.

लेकिन नहीं, रुकिये ज़रा! मेरे ऑफिस में जाने से पहले मुझे बिल्डिंग के चौकीदार के सलाम को झेलना होता है. उससे दो-चार बातें करना होती हैं. मौसम का हाल डिस्कस करना होता है. दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की तारीफ सुननी होती है. उसके बाद बारी आती है लिफ्ट मैन की. वो भी केजरीवाल का ही चेला है. जब दोनों मुझे पका चुके होते हैं तो मैं लम्बा सा बरामदा पार कर के अपने ऑफिस में पहुंचता हूँ.

यहाँ मेरा सामना होता है मेरे कमरे की सफाई करने वाले से. वो भी इन दोनों से कम नहीं है. अक्सर मुझे उसकी घर की समस्याओं को सुनना होता है. उसकी जवान बहन की शादी से जुड़े मसले उसकी ज़िंदगी का सब से बड़ा शगल भी है और रोना भी. जो उसके जवान होते ही लड़कों द्वारा हुयी छेड़-छाड़ से शुरू हुए थे. फिर लड़के के घर वालों के उसके घर देखने आने तक चले. इसके बाद शादी तय होने तक खिंचे. यहाँ तक कि मुझे भी आधे घंटे के लिए उस शादी में शामिल होना पड़ा था.

अब आजकल उसकी बहन लड़-झड कर मायके आ गयी है. उसके घर में आजकल रोज़ एक नया हंगामा होता है. अब ये रोज़-रोज़ के दुखड़े सुनाने वो और किस के पास जाएगा? मैं ही तो हूँ. सोफे पर लेटने की अपनी तफरीह के बाद मैं उसे बुलाता हूँ. उसके दुखड़े सुनता हूँ और जब ये सारे काम निपट जाते हैं तो मैं इत्मीनान से अपनी कुर्सी पर बैठता हूँ और उसे अनुरोध करता हूँ कि वो मुझे अकेला छोड़ दे.

इसके बाद मेरा अपना दिन शुरू होता है. अब मैं अपना कंप्यूटर खोलता हूँ और दुनिया से अपने हिस्से की रोजी कमाने की शुरुआत करता हूँ. ये ऐसा काम है जो मुझे हर रोज़ करना है. हर रोज़ अपना एक हिस्सा तोड़ कर मुझे दुनिया को बेचना है और उसके बदले में शाम को बाज़ार जा कर अपनी ज़रुरत की चीजें खरीदना है. ये बेचा जाने वाला टुकड़ा कभी मेरी ज़मीन का होता है, कभी मेरी ऊर्जा का, कभी मेरे वक़्त का, कभी मेरे प्यार का, कभी मेरी ज़रुरत का, तो कभी मेरे ज़मीर का; यानी कुछ भी हो सकता है.

दुनिया के कारोबार में टिके रहने के लिए बेचना उतना ही ज़रूरी है जितना कि कुछ खरीदना. अब मेरे पास बेचने के लिए जो भी है उसी में से तो मैं कुछ बेचूंगा न. वैसे ये बात खरीदने वाले पर भी निर्भर करती है कि वो क्या खरीदना चाहता है. कई बार ऐसा होता है कि मेरे पास उस वक़्त जो चीज़ बेचने को है उसका कोई खरीदार नहीं होता. ऐसे में मन मार कर मुझे कारोबार से हाथ खींच लेना पड़ता है. ये वो वक़्त होता है जब मैं शांत हो कर दुनिया के कारोबार की आवाजें सुनता हूँ.

दुनिया में बड़ा शोर है. हर तरफ. जीने का शोर जिसमें प्यार, नफरत, दुलार, धोखा, सम्मान, अपमान सभी तरह के शोर शामिल हैं. मैं शोर से नहीं डरता लेकिन शोर से जो मेरे दिमाग की नसें फटने लगती हैं उनसे मुझसे ज़्यादा मेरी पत्नी को तकलीफ होती है.

अब इसकी भी कई वजहें हैं. पहली तो ये कि इससे मेरा मूड ऑफ हो जाता है. और मैं अपना मुंह बंद कर के अपने कमरे में क़ैद हो जाता हूँ. मेरी पत्नी मेरे बंद किनारों पर बेदखल सी हो जाती है और ये बेदखली उसे बहुत नागवार गुज़रती है.

दूसरे मेरे डॉक्टर का भी कहना है कि मुझे अपन वज़न और कोलेस्ट्रोल दोनों ठीक करने होंगें. अब इनके लिए मेरा मूड अच्छा होना बहुत ज़रूरी है. मूड खराब होता है तो मैं खाता चला जाता हूँ और खाता ही जाता हूँ. और जब आदमी ये काम करेगा तो उसका वज़न और कोलेस्ट्रोल दोनों ही काबू में नहीं रह सकते.

यही वजह है कि पत्नी मुझे अपने नियंत्रण में करने की कोशिश लगातार करना चाहती है. और इस कोशिश के चलते बीच-बीच में ऐसे दिन आते हैं जब मुझे वही सब खाना होता है जो वो मुझे मुहैया करवाती है. वह आधा घंटा और पहले उठ कर मेरे लिए नाश्ता और दोपहर का खाना पैक कर देती है. यहाँ तक कि बीच में से दस मिनट और निकाल कर मेरी शाम की मंचिंग के लिए फल भी काट कर एक ठन्डे डिब्बे में डाल देती है. इस डिब्बे के चारों तरफ के गद्देदार बैग में बरफ रखी रहती है ताकि वे शाम तक ताज़ा रहें. यानी गंगाराम की कमाई कुछ दिन कम हो रहती है. कुछ दिन ये सिलसिला चलता है फिर वह भी ढीली पड़ जाती है और मैं भी डॉक्टर के पास नहीं जाता, टेस्ट नहीं करवाता ताकि मेरी जुबान पर होने वाले अत्याचार को कुछ आराम मिले.

मेरी पत्नी को इस बात का डर भी है कि कहीं मैं उससे पहले न मर जाऊं. ये बात वो कई बार कई तरीकों से मुझ से कह चुकी है. कि मैं सुहागन मरना चाहती हूँ, कि तुम पहले चले गए तो मुझे कौन मुखाग्नि देगा, कि तुम पहले नहीं मर सकते, तुम्हें मेरी देख-भाल करनी है. मुझे इनमें से तीसरी बात सब से सही लगती है. हालाँकि देखा जाए तो मेरी पत्नी ही मेरी देख-भाल करती है. लेकिन जो दुनिया के बाज़ार में बेचने-खरीदने का कारोबार है वो मैं ही करता हूँ. दुनिया में पैर जमा कर हवा से कौर पैदा करने का सर्कस मेरे ही जिम्मे है. और इसी के ज़रिये मेरी देखभाल का सिलसिला आगे चलता है.

आप कहेंगे कि मैं बच्चों की देख-भाल का ज़िक्र नहीं कर रहा. तो जनाब, ऐसा है न कि बच्चे तो दोनों के ही हैं. दोनों को ही उनकी देख-भाल करना है. मैं खरीद-बेच करता हूँ, वो पकाना धोना करती है. हम दोनों इन्हीं बच्चों के लिए ही जीते हैं.

जब ये पैदा नहीं हुए थे तब इन्हें पैदा करने के लिए जीते थे और अब इनकी देख-भाल के लिए जीते हैं. ये ऐसा गोरख-धंधा है जो मुझे तो बेहद रहस्यमयी लगता है. आप कहेंगें कि इसमें क्या रहस्य है? तो ऐसा है कि आज रात जब आप सोने के लिए बिस्तर पर लेटेंगे तो इस बारे में सोच कर देखिएगा. और सुबह उठते ही पहला ख्याल इसी बात का कीजियेगा तभी आप समझ पाएंगे मैं किस रहस्य की बात कर रहा हूँ.

सो सारी बात का लब्बे लुबाब और मेरी ज़िन्दगी का सब से बड़ा मकसद यही है कि मुझे अपने वजन और कोलेस्ट्रोल का ख्याल रखना है, बाज़ार में हर रोज़ अपना माल बेचना है और बाज़ार से मेरी ज़रुरत का माल खरीदना है. मेरी ज़रुरत यानी मेरे घर की ज़रूरत.

ऐसा नहीं कि मैं अपनी निजी ज़रूरतों का ख्याल नहीं रखता. मेरी ज़रूरी निजी ज़रूरतों का काफी ख्याल मेरी पत्नी रखती है. लेकिन कुछ ज़रूरतें ऐसी भी होती हैं जिन्हें हर मर्द को खुद ही देखना होता है. जैसे थोड़े बहुत रोमांस की, एकाध फ्लिंग, थोड़ा नयापन, कुछ सस्पेंस, थोड़ा चटपटा स्वाद ज़िन्दगी में होना भी तो ज़रूरी है. अब मैं ज्यादा क्या कहूँ? आप समझ रहे हैं न?

लेकिन एक बात बता दूं, इसी चक्कर में एक बार मेरा ऐसा बैंड बजा कि आज तक चकराया हुआ हूँ. ये वो दिन थे जब मैंने अपना बिज़नस अच्छा खासा जमा लिया था. मेरे इसी एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट के बिज़नस के दौरान मुझे कई तरह के लोगों से मिलना जुलना होता था. उन्हीं दिनों मेरी मुलाक़ात रोज़ी से हुयी थी. रोज़ी एक आकर्षक महिला थी, उम्र में लगभग मेरे करीब यानी पैन्तीस साल की. उसकी एक फैक्ट्री थी कपड़ों की. एक्सपोर्ट करते थे मियाँ-बीवी मिल कर. वो मेरे एक दोस्त के दोस्त की पत्नी थी. सीधे मेरा उससे कोई वास्ता नहीं था याने काम के सिलसिले से.

लेकिन हम दोनों दो-चार बार पार्टियों में मिले और पाया कि हमारे ख्यालात काफी मिलते-जुलते से हैं. वैसे हो सकता है कि मैंने अपने ख़ास मर्द स्वभाव की वजह से उसके ख्यालात को अपने जैसा मान लिया हो. क्यूंकि जो इतनी बड़ी हरकत उसने मेरे साथ बाद में की, वो मैं अगर समय रहते जान जाता तो कभी नहीं होने पाती. और इसी के चलते मैंने पाया कि उसके और मेरे ख्यालात कितने मुख्तलिफ थे.

क्या? अजी यही तो मैं आप को बताने जा रहा हूँ. पहले भूमिका तो बाँध लूं. वर्ना आप को पूरी बात समझ में नहीं आयेगी. समझ नहीं आयी तो बेकार है मेरा अपनी बात कहना. मैं खुद को साफ़ कर के रख सकूं, मर्दों को लेकर जो भ्रम आप के मन में हैं उन्हें दूर कर सकूं यही मेरा मकसद है.

एक बात और. मैं सभी मर्दों का प्रतिनिधित्व नहीं करता. बहुत से मर्द मेरे जैसे ख्यालात और व्यवहार के होंगें और उससे भी ज्यादा बिलकुल मुख्तलिफ ख्यालात के भी होंगें इस भरी-पूरी दुनिया में.

हुआ यूँ कि रोज़ी और मेरा आमना-सामना उन दिनों इत्तिफ़ाक़न कई बार हो गया. ये सिलसिला एक पार्टी में बातचीत शुरू होने के बाद हुआ था. मुझे रोज़ी आकर्षक लगी थी लेकिन चूँकि मैं उसके और अपने कारोबार में कोई मेल नहीं देख पाया था सो मैंने उसे अपना विजिटिंग कार्ड नहीं दिया. लेकिन हैरत की बात कि उसने ही आगे हो कर मुझ से मांग लिया. मैं धन्य-धन्य हो गया था और फ़ौरन उसे थमा दिया.

उसके दो दिन बाद जब मैं अपने ऑफिस में एक क्लाइंट के साथ बिजी था एक फ़ोन आया. नंबर मेरे फ़ोन में नहीं था सो मैंने कॉल नहीं ली. उसी नंबर से जब तीन बार और फ़ोन आ गया तो मैंने आजिज़ आ कर कॉल अटेंड की तो सामने से रोज़ी की मीठी आवाज़ में हेल्लो सुनायी दिया.

मेरी आवाज़ में थोड़ी चिढ़ होगी जो शायद मेरे मीटिंग के बीच डिस्टर्ब होने से आयी होगी सो उसने कहा, " अनुराग जी, मैं रोज़ी बोल रही हूँ. आप बिजी लगते हो?"

मैं एकदम ठंडा सा हो आया. रोज़ी का ब्लू हेवन परफ्यूम नथुनों के रास्ते हो कर मेरे दिमाग में फ़ौरन पहुँच गया और इसके साथ ही मेरी आवाज़ में फ़ौरन आइस क्रीम का स्वाद भी घुल गया. मैं एक पल के लिए सामने बैठे क्लाइंट को पूरी तरह भूल गया.

"हाय रोज़ी, कैसी हो आप? सॉरी मैंने आपका नंबर सेव नही किया था, इसलिए समझ नहीं पाया. वैरी वैरी सॉरी. " मैं वाकई बहुत शर्मिंदा था. महिलाओं के साथ ऐसी बदतमीजी मैं कभी नहीं करता.

"अरे नहीं मैंने अपना नंबर आप को दिया ही नहीं था. आप सेव कैसे करते?" उसने एक मधुर सा ठहाका लगाया था जिसे मैंने अपने चेहरे पर महसूस किया. लगा जैसे ठन्डे पानी का एक फव्वारा छूटा और मेरे गालों को सहला कर चला गया मुझ पर बिखर गया. मुझे झुरझुरी सी छूट गयी और मैंने अपनी अंगुलियाँ बालों में फिराकर खुद को व्यवस्थित किया.

मुझे हिला देने वाले इस खूबसूरत से ठहाके के बाद मुझे सूझा ही नहीं कि मैं क्या कहूँ और कैसे कहूँ. सोच ही रहा था कि रोज़ी की आवाज़ फिर आयी.

"मैं आपके इलाके में ही हूँ. सोच रही थे आप से आ कर मिल लूँ. पर लगता है आप बिजी हो."

अब तो मैं घबरा गया. एक तो रोज़ी मेरे इलाके में थी और दूसरे मिलने आने वाली थी और तीसरे मैं एक क्लाइंट के साथ मीटिंग में था. एक साथ इतनी सारी हलचल मेरे साथ कम ही होती है. ऐसा नहीं कि मैं महिलाओं से मिलता जुलता नहीं. बहुत महिलाओं को जानता हूँ लेकिन रोज़ी में कुछ अलग ही आकर्षण मुझे बार-बार अपनी तरफ खींच रहा था.

मैंने फ़ौरन कहा, " बिलकुल जी. आप आ जाइये. मैं बिजी नहीं हूँ. आप पहुँचिये. मैं वेट कर रहा हूँ."

उसने कहा, "जी ठीक है. मैं 15-20 मिनट में पहुँच जाउंगी.. आपके ऑफिस के बाहर पार्किंग तो मिल जायेगी न?"

"आप फ़िक्र मत करिये . मुझे गाडी का नंबर बताइए मैं अपना आदमी नीचे भेज देता हूँ वो पार्किंग करवा देगा."

"गुड " उसने कहा था और फ़ोन बंद कर दिया था.

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