राहबाज - 7

मेरी राह्गिरी

(7)

शादी खाना-आबादी

निम्मी आज फिर एक बार निम्मी मोड में आ गयी थी. निम्मी के साथ अक्सर ऐसा होता है. जब भी मैं घर से ज्यादा दूर रहता हूँ, उस पर इस तरह के दौरे पड़ते हैं. वह खुद से निराश हो जाती है. खुद को ही सजा देने लगती है. इसी तरह मुझे भी खुद से छिटका कर सजा देती है. अब कई दिन तक घर का माहौल दमघोटू हो जाएगा.

घर चलेगा. सब कुछ रोज़ की तरह होगा. लेकिन निम्मी कोप भवन में रहेगी. रोती बैठी रहेगी. खाना नहीं खायेगी. जब भूख नहीं सही जायेगी तो कुछ ऊट पटांग तला हुआ बना कर खा लेगी. फिर पेट पकड़ कर रोती रहेगी.

मेरे बार बार कहने के बावजूद डॉक्टर के पास नहीं जायेगी. नहायेगी नहीं. मुड़े-तुड़े कपडे पहन कर लिविंग रूम के सोफे पर पडी रहेगी. कभी नीचे कारपेट पर सो जायेगी. किसी से भी सीधे मुंह बात नहीं करेगी. डिप्रेशन के लिए डॉक्टर ने जो दवा दी है उसे वो खाना बंद कर देगी. और मेरी पूरी तरह से शामत आ जायेगी.

ये दौरे उसे कब और किस वजह से ट्रिगर होते हैं मैं आज तक नहीं समझ पाया. लेकिन इनके पीछे मेरे व्यवहार का कुछ तो योगदान है ये मैं जानता हूँ. इसलिए मैं पूरी कोशिश भी करता हूँ उसे मनाने की.

उसका ख़ास ख्याल रखता हूँ. काम और घूमना छोड़ कर घर बैठ जाता हूँ. उसे पिक्चर दिखाने ले जाता हूँ, किसी तरह ठेल-ठाल कर. कुछ दिन इसी तरह तनाव में निकलते हैं. फिर वो भी थक हार कर अपने नार्मल पत्नी और माँ के मोड में आ जाती है और मैं अपने कारोबार और मटर-गश्तियों की तरफ लौट जाता हूँ.

शादी इसी का तो नाम है.

यही तो है. और ये नया बच्चा? मैं घर की तरफ ड्राइव कर रहा हूँ. जैसा उठा था वैसा ही, बिना कुछ खाए पिए, बिना नहाये-धोए, कपडे बदले चल पड़ा हूँ. इतना टाइम नहीं दिया निम्मी ने कि कार में जा कर कपडे लाता और नहाता या कपडे बदलता.

अब मुझे फ़िक्र है निम्मी की और ये भी फ़िक्र है कि अब कई दिन घर के मनहूस बन गए माहौल को झेलना होगा मुझे. बच्चे भी इन दिनों अनमने और परेशान हो जाते हैं. बेटा बड़ा है. वो तो अपने बूते पर इस माहौल से निकल लेता है. दोस्तों के साथ पूरा-पूरा दिन बाहर रहता है. बेटी अभी छोटी है और मिजाज़ से नाज़ुक भी. मुझे उसको भी देखना पड़ता है.

रोज़ी इस वक़्त दिमाग से छिटक गयी है. सुबह उठते ही वो ख्यालों पर हावी थी लेकिन अब सिर्फ उसका अजन्मा बच्चा ही रह-रह कर याद आ रहा है.

तभी एक ख्याल आया ये नियोग ही तो किया है निम्मी ने. पुराने ज़माने में भी तो औरतें करती थीं. फिर क्या गलत है इसमें? कुछ गलत नहीं किया निम्मी ने. उसे बच्चा चाहिए था पति नहीं दे सकता. मुझ से ले लिया.

लेकिन फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ दिमाग में. मुझ से कहना चहिये था उसे. यूँ धोखा नहीं करना चाहिए था. फिर ख्याल आया जब कुंती ने सूर्य देवता को बुलाया अपने बेडरूम में, तो क्या उसे बच्चा चाहिए था? वो तो हो गया और वो रख नहीं सकी. बहा दिया नदी में.

लेकिन पांडव तो नियोग से पूरे संज्ञान के साथ पैदा किये गए थे. हाँ, ठीक है. रोज़ी सही है. उसने तो पुरानी परम्परा का ही निर्वाह किया है. मेरा दिल कुछ हल्का हो आया. अब मैं घर के नीचे था. गाडी लगा रहा था और सोच रहा था निम्मी जाने किस हालत में मिलेगी मुझे.

मैं घर पहुंचा तो पाया निम्मी सोफे पर लेटी थी. उसके बाल उड़े हुए, कपडे वही जो रात को पहनती है, यानी टीशर्ट और कैपरी. निम्मी हलके फुल्के बदन की खूबसूरत औरत है, जो पहनती है उस पर फबता है. इस वक़्त भी उजड़े हुए चेहरे, उड़े बालों और मुस्से हुए कपड़ों के बावजूद उस के पूरे बदन में एक अजीब तरह की रवानगी और ताजगी थी. जैसी बारिश में भीगने के बाद इन्सान महसूस करता है. ठीक वैसी जैसी सुबह की सैर के बाद महसूस होती है.

उसे देख कर हमेशा की तरह मन एकदम से जुड़ा गया. रात भर से दिल भरा हुआ था, जी उचाट भी था और सोच में भी, रोज़ी की बातों से. अब निम्मी को यूँ देखा तो जा कर उसके पास सोफे पर ही बैठ गया. वह चौंक कर उठी और बैठ गयी. मुझ से कुछ दूर हट कर.

"क्या हुआ डार्लिंग?" मैंने उसे अपने पास खींचना चाहा.

वह छिटक गयी. मैंने फिर एक बार कोशिश की उसे पास लाने की. वह फिर छिटक गयी. हार कर मैं उठा और उसके बिलकुल पास जा कर बैठ गया. मैं उसे बाँहों में समेटना ही चाहता था कि वह फिर उठ खडी हुयी.

इस बार वह सोफे से दूर हटी और नीचे कालीन पर बैठ गयी. मुझे समझ नहीं आया कि वो क्या कर रही है.

"क्या कर रही हो यार? यहाँ आओ, बात करों मुझसे. क्या हुआ है? घर पर तो सब ठीक-ठाक ही है. मुझे क्यूँ बुलाया इस तरह?"

"हाँ. तुम्हारा घर सब ठीक-ठाक से चल रहा है. तुम्हें क्या फर्क पड़ता है? घर चलाने वाले पर क्या गुज़रती है? तुम्हें उससे क्या मतलब? तुम जाओ अपनी पार्टियाँ करो. क्यों आये हो यहाँ?

अब मैं समझ गया था निम्मी जाहिरा तौर पर मेरे रात भर कथित तौर पर पार्टी में रहने से खफा थी. मेरे मन का चोर सहम गया. अगर निम्मी को रोज़ी वाली असलियत पता लग गयी तो ये मासूम औरत तो मर ही जायेगी.

मैं पछतावे से भर गया. ये जो नया हादसा हुआ था और रोज़ी मेरे बच्चे की माँ बनने जा रही थी इससे मैं खुद बेतरह चकराया हुआ था. अब निम्मी को इस तरह दबाव में परेशान और दुखी देख कर मेरी रही सही हिम्मत भी जवाब दे गयी थी.

मैं सोफे से उठ कर उसके पास कालीन पर बैठ गया. उसके ठीक सामने. मुझे लगा हमें आमने सामने बैठ कर बात करनी होगी. निम्मी को भरोसा दिलाना होगा कि मैं उसके साथ हूँ. मैं निम्मी का दर्द समझता हूँ कि वो अकेली पड़ जाती है. लकिन बच्चे तो हैं दोनों. ऐसी अकेली भी तो नहीं. घर पर बिजी भी तो रहती है. मेरे लिए वक़्त भी तो नहीं उसके पास. इसलिए भी तो मैं मारा-मारा घर से बाहर फिरता हूँ. लेकिन ये सब कहने की हिमत नहीं हुयी. सिर्फ इतना बोल पाया.

"यार, प्रॉमिस करता हूँ आगे से ऐसी पार्टियों में नहीं जाऊंगा या तुम्हे साथ ले कर जाउंगा."

"हां. हां. करो वादे. जैसे आज तक सब निभाते ही आये हो." उसकी आवाज़ रुंधी हुयी थी.

"यार इस बार पक्का." मैं पिघला हुआ तो था ही उसकी इस बात से और पिघल गया. उसके और पास खिसक आया.

पता नहीं मेरे पास आने की वजह से या फिर पहले से ही निम्मी भरी हुयी थी. वह फफक कर रो पडी. मैं घबरा गया. मैं संभलता और उसे सँभालने की कोई सूरत करता उससे पहले ही उसका रोना ऊंचा होने लगा. और चंद सेकंड में ही वह फूट-फूट कर रोने लगी.

गनीमत इतनी थी कि बच्चे घर पर नहीं होते इस वक़्त वर्ना मेरे लिए उनको यह समझाना मुश्किल हो जाता कि मैंने उनकी माँ को तकलीफ नहीं दी है. लेकिन मन में बैठा चोर यह भी कह रहा था मुझसे कि तकलीफ तो दी ही थी मैंने वर्ना हमेशा हंसने बोलने वाली, लगातार चपर-चपर बातें करने वाली निम्मी बिना कुछ बोले रोये क्यों चली जा रही थी.

दरअसल उसके मन में ये बात बैठ गयी थी कि वो कुछ भी बोले मुझे अपने दिल की बात और परेशानी नहीं समझा पायेगी. पिछले कई महीनों से निम्मी मुझे अपनी उदासी के बारे में कह रही थी. चाहती थी कि अपनी परेशानी, बातें और फिक्रें मेरे साथ साझा करे लेकिन मैं खुद अपने काम और बाद में रोज़ी में उलझ कर रह गया था.

ज़ाहिर है मैं उसे सहारा नहीं दे सका था जो मेरी ज़िम्मेदारी भी थी और निम्मी का हक भी था.

मैं शर्मिंदा था. निम्मी का गुनाहगार था. रोज़ी का भी गुनाहगार बन गया था. न चाहते हुए भी. न होते हुए भी. पता नहीं क्यों मुझे यही लग रहा था कि रोज़ी जिस बच्चे को जनम देने पर तुली हुयी है वह आखिरकार मेरी ही ज़िम्मेदारी होने वाला है. और मैं इस बात से बुरी तरह घबरा गया था.

दूसरी तरफ मेरे दिल में एक अजीब सी लहर भी हिलेरें ले रही थी. बिलकुल वैसे ही जब निम्मी दूसरी बार माँ बनने वाली थी. बेटा अरुण उस वक़्त चार साल का था. निम्मी ने एक शाम मेरे घर लौटने पर मुस्कुराते हुए मुझे ये खबर दी थी और मैंने लपक कर उसे सीने से लगा लिया था. उसे बेतहाशा चूमता रहा था.

लेकिन रोज़ी ने जिस तरह बिना किसी लाग-लपेट के यह खबर मुझे सुनायी थी मैं अभी तक उसी सदमे में तो था लेकिन अपने इस नए बच्चे को लेकर मन में कोमल भाव जाग उठे थे. मैं उसकी पैदाईश का एक हिस्सा बनना चाहता था और नहीं भी बनना चाहता था.

इससे मेरे मौजूदा परिवार पर खतरे के बादल मंडरा सकते थे. मंडरा क्या सकते थे मेरा परिवार पूरी तरह बिखर सकता था. ये सब सोच कर और अब निम्मी की यह हालत देख कर मैंने कड़े मन से फैसला किया कि आज के बाद रोज़ी से कोई संपर्क नहीं रखना है. और उस बच्चे के बारे में तो बिलकुल कोई ख्याल दिल में लाना ही नहीं है. वो बच्चा मेरा नहीं है. सिर्फ और सिर्फ रोज़ी का या फिर रोज़ी और कार्ल का है. जैसा कि रोज़ी ने मुझसे कहा था.

अब तक निम्मी का रोना कुछ कम हुआ था. वह सिसक रही थी. उसका सर मेरी गोद में था. मैं कालीन पर अधलेटा था और वह मेरी गोद में सर रखे बिलकुल फैल कर लेटी हुयी थी. मैं इस बीच लगातार उसके बालों में अंगुलियाँ फिरा रहा था ताकि उसके उजड़े हुए मन को कुछ दिलासा दे सकूं. वह चुप तो हो गयी थी लेकिन उसकी हालत बहुत ही खराब थी.

मैंने उसे सहारा दे कर उठाया और अन्दर बेडरूम में ले गया. बेड पर लिटाया तो वह करवट बदल कर आँखें बंद कर शांत हो गयी. मैंने उससे बात करना चाही,"निम्मी, अब कैसा लग रहा है?"

निम्मी कुछ नहीं बोली. मैंने अपना सवाल दोहराया. इस बार उसने थके हुए स्वर में कहा, "मैं थक गए हूँ. सोने दो. कल रात भी नहीं सोयी. तुम्हें तो परवाह है ही नहीं."

मैंने उसकी बात को काटने की कोई कोशिश नहीं की. ये वक़्त इस सब का नहीं था. मुझे तो अपना ही किया हुआ बखेड़ा समेटना था. यह वक़्त गिले-शिकवे या सफाई देने का नहीं था. मैंने उसके पास बैठ कर कहा ,"निम्मी आय एम वैरी वैरी सॉरी. जो हो चुका, सब हो चुका. आज के बाद तुम्हें शिकायत का मौका नहीं दूंगा. मैं खुद अपनी लापरवाही पर शर्मिंदा हूँ. "

हालाँकि मैं इतना शर्मिंदा नहीं था जितना उसे जता रहा था. फिर भी निम्मी का स्वस्थ्य मेरी चिंता थी. और मुझे हर हाल में उसे सामान्य देखना था. वैसे भी वो डिप्रेशन की मरीज़ है. सो उसका खयाल रखना मेरा पहला कर्तव्य बनता है.

"ठीक है. तुम सो लो. शाम को बाहर चलेंगे. मे बी मूवी ऑर अ प्ले. उसके बाद डिनर. ऑल फोर ऑफ़ अस. राईट?"

निम्मी की ऑंखें भारी हो कर बंद हो चुकी थीं. उसने सर हिला कर हामी भरी और हल्की सी नामालूम सी मुस्कान उसके चेहरे पर खेल गयी. मेरी जान में जान आयी. मैंने सोचा कितनी सरल है निम्मी. बिलकुल बच्ची जैसी. मुझे निम्मी पर बहुत प्यार उमड़ आया. मैंने झुक कर उसके माथे पर एक चुम्बन टांका और कमरे से निकल आया.

टेबल पर रखा नाश्ता करते हुए मैं अपने इन हालात पर विस्तार से सोचता रहा था. मुझे शाम होने तक अपनी आगे की ज़िन्दगी के बारे में फैसले लेने थे.

रोज़ी की खबर ने मेरे होश फाख्ता कर दिए थे. लेकिन लगातार तीन घंटे सोचते रहने के बाद भी मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाया था.

थक-हार कर मैंने तय लिया कि इस बारे में कुछ भी नहीं सोचना और तय करना है. जो करना है रोज़ी करे. कल को अगर इस सारे मामले की आंच मुझ तक पहुँचती है तो मैं तभी सोचूंगा कि क्या करना है. इसी तरह उस रोज़ मेरे दिल को कुछ तसल्ली हुयी. इसके बाद मैं नहाने धोने के लिए बाथरूम में घुसा.

तैयार हो कर मैंने एक कप चाय बनाई और चाय पी ही रहा था कि निम्मी भी तैयार हो कर बेडरूम से बाहर आ गई थी. नीली साड़ी में निम्मी बहुत खूबसूरत लग रही थी. छरहरी छोटे से कद की निम्मी अक्सर मेरा दिल मेरे सीने से निकाल ले जाती है. आज भी ले गयी. मैंने एक सीटी बजाई और वो हमेशा की तरह शरमाते हुये जोर से हंस पडी.

"तुम नहीं सुधरोगे?"

"क्यूँ सुधरूं? तुम चाहती हो?"

"नहीं और हाँ."

मैं समझ गया अब लम्बी बाहस छिड़ जायेगी. और इस वक़्त में उसके लिए कत्तई तैयार नहीं था.

मैंने कहा,"बच्चे कहाँ हैं? उनको बताया?'

"हाँ. अरुण से बात हो गयी वो संजना को उसके कॉलेज से लेकर सी. पी. आ जायेगा. हम वहीं उनसे मिलेंगे. "

"गुड."

और हम दोनों घर से निकल आये थे.

वो शाम बेहद सुखद थी. निम्मी मुझे फिर से अपने साथ पा कर खुश थी. बच्चे हम दोनों को साथ खुश देख कर खुश थे. और मैं पिछले चौबीस घंटों से जिस खबर से जूझ रहा था, उसको विराम दे कर अपने मन पर अपने परिवार के संग-साथ की ठंडी फुहारें छोड़ रहा था. कुछ चैन मेरे दिल को भी मिला तो था.

यूँ इस तरह उस नए बच्चे की दुनिया में आने की खबर ने मेरे जीवन में हलचल मचा कर उसका पटाक्षेप किया था. मुझे रोज़ी ने फिर कोई खबर नहीं दी. कई बार मेरा मन किया कि मैं खुद ही, फ़ोन पर ही सही रोज़ी से बात करूँ लेकिन कई वजहों से चुप रहा.

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