राहबाज - 6

रोजी की राह्गिरी

(6)

कोई मिल गया

वो दिन भी और दिनों की ही तरह था. मैं और कार्ल अपने-अपने काम में लगे थे और शाम उतर आयी थी. ये वो दिन थे जब हमने साथ घर जाना शुरू कर दिया था. कम से कम हफ्ते में दो बार. आज भी जब दिन में मेरा सामना कार्ल से हुआ था किसी काम के सिलसिले में तो मैंने कहा था कि शाम को वो मेरे साथ ही चले.

आज हमें एक पार्टी में जाना था. कुछ कारोबारी दोस्तों की पार्टी थी. बोरिंग और कामकाजी. ऐसी पार्टियों में मैं कार्ल के साथ जाती हूँ. अक्सर इनमें काम से सम्बंधित लोग मिल जाते हैं. और उनसे आगे बात बढ़ाने में कार्ल का और मेरा साथ होना ज़रूरी होता है. वजह यही कि मैं तो एकाउंट्स देखती हूँ, प्रोडक्शन सारा कार्ल के हाथों में है.

वो दिन भी वैसा ही था जैसा उससे पहले का दिन था. लेकिन कुछ तो जादू था उस दिन में. मुझे कुछ अंदेशा हो रहा था. कुछ जैसे होने को है. कोई हलचल थी मन में. मानो कोई कह रहा था जैसे कि रोज़ी तुझे जिसकी तालश है वो पूरी होने को है. क्यों ये महसूस हो रहा था मैं नहीं जानती. शायद मेरे मन में इस बात को लेकर इतना घनीभूत इंतज़ार बस गया था कि मैं कुछ और सोच भी नहीं पाती थी. शायद यही लगातार सोचना मुझे मेरे अंदर इस इंतजार के ख़त्म होने का सुराग आहिस्ता-आहिस्ता दे रहा था.

इन दिनों मेरे और कार्ल के बीच कुछ अजीब सा घटित हो रहा था. मैं जैसे ख्वाब में विचर रही थी. कार्ल जैसे एक बार फिर मेरे इश्क में गिरफ्तार हो रहा था. हर रात जब वह बिस्तर पर आता तो मुझे इतनी शिद्दत से छूता कि जैसे कल का कोई पता ही न हो. हर रात एक नयी सुबह की शुरुआत लगने लगी थी. हम दोनों के बीच एक ऐसी नज़दीकी आने लगी थी जो मैंने अब तक कभी महसूस नहीं की थी.

मैं सुबह उठती तो कार्ल मुझे कुछ और अपना लगता. ऐसे लगता था जैसे अखिरकार मुझे मेरा वह साथी मिल गया था जिसकी तलाश मुझे जन्मों से थी. मेरे अंदर की औरत इन दिनों अघा गयी थी. लेकिन इसके साथ ही मेरे अंदर की माँ हर रोज़ और भी पुख्ता हो रही थी. हर रोज़ उसकी चाहत बढ़ती ही जा रही थी. यह वक़्त मेरे लिए बड़ा भारी हो रहा था. मैं प्रेम के नशे में चूर थी. डूबी हुयी प्रेम में, कार्ल के प्रेम में.

और इसके साथ-साथ एक ऐसे पुरुष की शिद्दत से तलाश में भी, जो मुझे मेरी मनमानी करने दे. ये कैसा दौर था मैं सिर्फ महसूस ही कर सकती थी. यहाँ तक कि खुद को भी इसके बारे में कुछ बता नहीं सकती थी.

इन दिनों अक्सर यूँ होता था कि मैं हर रोज़ आईने से खुद को बिना देखे ही हट जाती थी. तैयार होती और फ़ौरन हट जाती. एक दो बार खुद को निहारना चाहा तो कार्ल की नज़रें मेरी नज़रों में उतर आयीं और मैं घबरा गयी. आईने के सामने से हटी तो मेरा अजन्मा बच्चा मेरे ख्यालों में उभर आया और मैं खुद में स्थापित हो गयी.

इन दिनों मेरे ख्याल दो लोगों में बस गए थे. कार्ल, जो मेरे पति होने के साथ-साथ मेरा प्रेमी भी बन गया था और मेरा अजन्मा बच्चा जो मेरा अनदेखा आशिक हो गया था. ये दोनों मेरे ज़ेहन में पूरी तरह से छा गए थे. इन्हें मैं बस काम के वक़्त ही खुद से अलग कर पाती थी. वर्ना ये चौबीसों घंटें मेरे ख्याल में छाये रहते.

कार्ल तो उस वक़्त भी मेरे ख्याल में होता जब वो मेरे सामने बैठा होता, जब वो मुझे बाँहों में समेटे प्यार कर रहा होता. तब भी जब मैं आधी नींद में होती और वो बाथरूम में होता. अजीब दौर था ये भी. कार्ल सामने बैठा होता मैं उससे बातें कर रही होती और उसी के बारे में रूमानी ख्याल मेरे ज़ेहन में लगातार चल रहे होते. इन्हीं दिनों कुछ अनचीन्हा सा सुरसुरा सा राग मेरे अन्दर छिड़ गया था. हर पल यूँ लगता था जैसा कुछ अनोखा होने वाला है. बस अभी ही कुछ होने वाला है.

उस दिन तो सुबह से ही दिल की धड़कन में अजीब सा कुछ घुलमिल गया था. जिसे मैं कोई नाम नहीं दे पायी थी लेकिन उसके साथ धड़क रही थी. उसी शाम उस पार्टी में मैंने अनुराग को देखा था. सांवला, लम्बा, गठीली देह, सुतवां नाक, बड़ी बड़ी ऑंखें, चौड़े हाथ, लम्बी बाहों और टांगों वाला अनुराग. उसका नाम तो बाद में पता लगा जब कार्ल ने मेरा उससे परिचय करवाया.

पार्टी में मैं एक पुरानी दोस्त से उसकी नयी ड्रेस के बारे में बात कर रही थी, जब कार्ल ने अपने खास बेहद शालीन तरीके से मुझे उससे मांग कर एक दुसरे ग्रुप में शामिल कर लिया था और एक एक कर के उन से मेरा परिचय करवाने लगा. ये भी एक तरह का मजाक ही था जो बहुत पहले से हम दोस्तों के बीच चलता आ रहा था. ज़्यादातर सभी हम दोनों को जानते थे. लेकिन कार्ल को हर बार उनसे मुझे अपनी पत्नी कहते हुए मिलवाने में मज़ा आता था.

और आज भी वह यही काम काफी दिनों के बाद फिर से कर रहा था. बीच में एक ठंडा सा दौर हम दोनों के बीच आया था. मगर जब से हम और करीब हुए थे कार्ल में भी मैंने कई बदलाव देखे थे. वह पहले से बहुत जायदा रूमानी हो गया था. आज भी कई दिनों के बाद उसने यह परिचय करवाने वाली हरकत की थी. मुझे हमारी शादी के शुरू के दिन याद आ गए थे और मैं इस सारी कवायद का खूब मज़ा उठा रही थी.

इससे पहले मैंने पार्टी में घूमते हुए कई बार अनुराग को देखा था और प्रभावित हुयी थी. उसकी पर्सनालिटी के साथ-साथ उसकी भाव भंगिमा से भी. मैंने महसूस किया था कि आम मर्दों से बिलकुल अलग सा वह खूबसूरत औरतों को देख कर अप्रभावित सा ही रहता था. सभी से एक सामान ही वयवहार कर रहा था. उसके आकर्षण से बंधी मेरी आँखों ने कई बार उसका पीछा किया था और हर बार मैंने अपने इस अनुभव की पुष्टि की थी.

और अब मैं अचानक अनुराग के सामने खड़ी थी और कार्ल मेरा परिचय उससे करवा रहा था.

“हाय अनुराग. मीट माय लवली वाइफ रोजी. शी इज़ वन ऑफ़ हर काइंड. इसलिए नहीं कि मेरी बीवी है. बस बहुत ख़ास है. बस एक ही है अकेली इस दुनिया में.”

मैं शर्म से लाल हो गयी थी. जो मैं बहुत कम होती हूँ. कुछ बोल ही नहीं पायी थी जब कि कार्ल की ऐसी बातों पर मेरा दहला अक्सर उसके नहले से सवाया ही होता है. एक सम्मिलित ठहाका लगा था जिसमें मेरे अलावा सभी शामिल थे.

अनुराग ने भी खुल कर हँसते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया था.

“हाय रोज़ी. आय ऍम अनुराग.”

मैंने उसके हाथ की गर्मी अपनी बाजू तक उठती महसूस की थी. कुछ कुछ सख्त अनुराग का हाथ कह रहा था कि वह मज़बूत आदमी है. लेकिन उसकी हल्की सी पकड़ यह चुगली भी खा रही थी कि वह दोस्ती में कुछ ज्यादा यकीन नहीं रखता. अपने काम से काम रखने वाला अंतर्मुखी इंसान.

पार्टी के दौरान मेरा उसका सामना कई बार हुआ लेकिन ज्यादा बातचीत नहीं हुयी. एक बार उसने मेरी फैक्ट्री के बारे में कुछ सवाल पूछे और इसे दौरान मैंने उससे उसका विजिटिंग कार्ड मांग लिया. मन में कुछ ख़ास नहीं था उस वक़्त. यही कि आकर्षक पुरुष है. अपने ही फील्ड का है. कांटेक्ट रहना चाहिए.

लेकिन उसको लेकर उत्सुकता लगातार बढ़ती जा रही थी. बार-बार मेरी नज़रें उसकी तरफ उठ रही थीं. बार-बार मैं यह तय कर लेना चाहती थी कि वह पार्टी में मौजूद तो है. कहीं चला तो नहीं गया. उसका वहां होना मुझे आनंद दे रहा था. मैं समझ नहीं पाई थी तब तक कि उसके होने या न होने से मुझे कुछ फर्क क्यों पड़ रहा था.

और फिर मैंने उसे बाहर जाते हुए देख लिया था. जब कुछ मिनटों तक वह लौट कर अंदर नहीं आया तो मैं समझ गयी कि वह सिगरेट के लिए बाहर नहीं गया था बल्कि पार्टी से चला गया था. इसके बाद मेरा भी मन वहां नहीं लगा और मैंने कार्ल से घर चलने का आग्रह किया. और हम चले आये थे.

उस रात कार्ल की बाहों में मैंने अनुराग नाम के उस अनजाने पुरुष की गर्माहट को भी पाया था. मेरी बदचलनी की वह पहली रात थी. अगला दिन मेरे ख्यालों में उस अनजान पुरुष के बेधड़क चले आने का दिन था. मैंने उसके इस अनधिकार प्रवेश का किसी भी तरह से विरोध नहीं किया था. मैं तो ऐसे ही किसी पुरुष की तलाश में थी. लेकिन ये वही है इसका मुझे यकीन जाने क्यों हो रहा था. ऐसे लग रहा था जैसे कोई अदृशय शक्ति मुझे इस तरह के संकेत दे रही थी.

फिर भी मैंने खुद को एक हफ्ते तक रोके रखा. मैंने इस भाव को अपने भीतर पक कर तैयार होने तक इंतजार किया ताकि कहीं मैं गलत कदम न उठा बैठूं. इससे पहले दो बार आखिरी कदम उठाने से पहले मैं लौट आयी थी और इस बात को लेकर मन में अच्छे भाव नहीं थे. एक अजीब तरह की ग्लानी होने लगती थी जब रुशील या अब्दुल का ख्याल आता था.

रुशील से तो फिर भी बात खुल कर नहीं हुयी थी. परदे का इत्मीनान था. लेकिन अब्दुल से तो मैंने खुल कर अपनी इच्छा ज़ाहिर की थी. इसीलिये जब भी अब्दुल का ख्याल आता शर्म से घबराहट होने लगती थी. अब मैं ऐसे किसी भी जोखिम को उठाने से पूरी तरह बचना चाहती थी.

एक हफ्ते के बाद एक दिन मैंने सोचा अनुरागा से मिलने के बारे में और मैंने उसका फ़ोन मिलाया. घन्टी बजती रही. उसने कॉल ही नहीं ली. मुझे बहुत बुरा लगा. दिल बैठ गया. आधे घंटे के बाद मुझे ख्याल आया कि उसके पास तो मेरा नंबर ही नहीं है तो ज़ाहिर है वो नहीं जानता कि मैं फ़ोन कर रही हूँ. इस बार मैंने मेसेज किया.

“हाय अनुराग. दिस इज रोजी. कैन आय स्पीक विद यू?”

इसके पांच मिनट के बाद ही उसका फ़ोन आ गया. मैं उस दिन फैक्ट्री के काम से ईस्ट दिल्ली में थी. काम अभी हुआ नहीं था लेकिन अनुराग से मिलने की इच्छा इतनी ज्यादा थी कि मैंने झूठ बोला, "हाय, मैं आपके इलाके में हूँ. फ्री हो गयी हूँ तो सोचा आप को मिलती चलूं. आप बिजी तो नहीं हैं न?"

मुझे लगा था कि बिजी है क्यूंकि वह कुछ देर चुप रह कर बोला था, "जी नहीं. आप आ जाइये."

मैं गयी थी उस रोज़ अनुराग के दफ्तर. उसने नीचे अपना एक आदमी भेज रखा था जो मेरी गाडी पार्क करवा के मुझे ऊपर दसवें माले पर उसके भव्य दफ्तर में ले गया था.

उस दिन अनुराग से मुलाक़ात बहुत अच्छी रही थी. हम दुनिया जहान की बातें करते रहे थे. कॉफ़ी पी थी. उसने अपने ऑफिस के पास के किसी दूकान के बेहद मशहूर समोसे भी खिलाये थे. मुझे लगा था कि मुझ से मिल कर शायद उसे भी उतनी ही खुशी हुई थी जितनी मुझे.

बातें करते करते फिल्मों की तरफ मुड़ गयी थी. मुझे पता लगा कि वह फ़िल्में खूब देखता है. ख़ास कर एक्शन फ़िल्में. जिनमें मेरी दिलचस्पी कत्तई नहीं थी. मैंने इस फिसलन भरी ज़मीन पर चलने से बचना चाहां. बार-बार मुझे अनुराग की तरफ ज़बर्दत आकर्षण महसूस हो रहा था. बार-बार कोई एक अनचीन्ही सी आवाज़ भीतर कह रही थी, 'यही है, यही है. इसी से हासिल होगा जो तुम चाहती हो."

"क्या?" मैंने खुद से सवाल किया था उसी दिन अनुराग के सामने उसके दफ्तर में बैठे हुए ही जब वो अपने किसी फ़ोन कॉल का बेहद चुस्ती के साथ छोटा सा जवाब दे कर उसे बंद करने की कोशिश में लगा था ताकि पूरा ध्यान मुझे दे सके.

मुझे खुद से इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला था. जवाब जानती थी फिर भी अहमकाना हरकत करते हुए खुद से ही जवाब मांग रही थी.

अनुराग ने पूछा था, "आप एकाउंट्स के लिए मुझे कोई अच्छा आदमी बताइए. मेरे अकाउंटेंट रिटायर होना चाहते हैं. उनकी उम्र ज्यादा हो गयी है और अब वे अमरीका अपने बेटे के पास जा रहे हैं. "

मैंने न जाने क्या सोच रही थी. मेरी नज़रें अनुराग के चेहरे पर टिकी थीं लेकिन जाने क्या तो मैं सोच रही थी. वो समझ गया था कि आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँची. उसने दोबारा आग्रह नहीं किया लेकिन एक मुस्कराहट उसके चेहरे पर आ गयी थी. ये मुझसे नहीं छिप सकी और मैं फौरन समझ गयी. अकबका कर मैंने पूछा था, "सॉरी. आप क्या कह रहे थे?"

हम दोनों ही इस बात पर हंस पड़े थे.

"जी मैं कह रहा था कि मुझे एक अकाउंटेंट की ज़रूरत है. अगर आप मुझे एक सही चुस्त आदमी ढूँढने में मदद करेंगी तो महरबानी होगी. "

अनुराग बड़ी अच्छी उर्दू मिली हिंदी बोलता है. और इससे भी उसके क्लासी होने का सबूत मिलता है. इन्हीं कई छोटी छोटी बातों के चलते मैं हर नए दिन के साथ उसे ज्यादा और ज्यादा पसंद करने लगी थी. और ये बात मेरे अन्दर पुख्ता होती जा रही थी कि यही है वो पुरुष जिसका बीज मुझे हासिल करना है.

लेकिन इस बार यह बात भी मैंने मन ही मन तय कर ली थी कि उसे इस बात की हवा भी नहीं लगने देना है. मुझे प्रेम का, आकर्षण का खेल खेलना है और जब मेरा मतलब सध जाए तो उससे बिना किसे लाग लपेट के विदा ले लेनी है. यह बड़ा संगीन मामला था.

मैं इस पुरुष के लिए मन में आकर्षण महसूस कर रही थी. इसके बिना मैं शारीरिक संसर्ग की बात सोच भी नहीं सकती थी. साथ ही मुझे बच्चा जाने पहचाने पुरुष का चाहिए था. उसे भी मुझसे प्रभावित होना चाहिए था ताकि वह भी मुझे चाहे.

साथ ही इस बात का भी मुझे ख्याल रखना था कि मैं प्रेम में न पड़ जाऊं और अपने इरादे के बारे में साफ़ तौर पर न कह डालूँ. जब मैंने अनुराग के बारे में सोचा तो पाया कि अनुराग भी शायद मुझे इस तरह अपने बच्चे की माँ बनने देने पर राजी नहीं होगा. प्रेम सम्बन्ध या शारीरिक आकर्षण से बंधे शादी से बाहर सम्बन्ध होना अलग बात है लेकिन शादी से बाहर बच्चा होना बिलकुल अलग.

अब तक मैं समझ गयी थी कि अपनी मर्जी से कोई भी समझदार पुरुष ऐसा नहीं करेगा और मेरी मुश्किल यही थी की मुझे पुरुष समझदार भी चाहिए था और लापरवाह भी. और मुझे लग रहा था कि अगर मैं और अनुराग इस राह पर चल पड़ें तो मुझे कामयाबी मिल सकती है. और शायद बाद में मैं आसानी से चुपचाप उससे किनारा भी कर सकूंगी बिना कोई वजह बताये.

उस रात कार्ल देर से घर आया था. दोस्तों के साथ बाहर था. आजकल उसकी ऐसी शामें कम तो हो गयी थीं. लेकिन उसे ख्याल रहता था कि मैं जागती हुयी उसका इंतजार कर रही होऊंगी.

वो जब घर में दाखिल हुआ तो मैं वाकई जाग ही रही थी और लिविंग रूम में टीवी देखते हुए उसका इंतज़ार भी कर रही थी. मुझे वहां बैठे देख कर थोडा सा चौंका था. वीक के दिनों मैं वैसे अक्सर जल्दी सो भी जाती थी. लेकिन आज अनुराग का ख्याल मुझे जगाये हुए था.

"यार. तुम सोयी नहीं? आल वेल?"

"यप. आल वेल डार्लिंग. जस्ट वेटिंग फॉर यू."

वो चुपचाप मुझे देखता खड़ा रहा. उसकी आँखों में मेरे लिए क्या है कभी कभी मैं कभी समझ नहीं पाती. कार्ल मुझे प्यार करता है. जानती हूँ. लेकिन कभी कभी उसकी आँखों में एक अजीब सा परायापन भी नजर आता है मुझे. एक ऐसा परायापन जो मुझे याद दिलाता है कि हम दोनों दोस्त तो बहुत गहरे हैं लेकिन पति-पत्नी कुछ उथले से हैं.

हम दोनों में से कोई भी एक दूसरे पर रौब नहीं गांठता जैसे आम तौर पर कपल करते हैं. हम दोनों ही एक दूसरे से पल-पल का हिसाब नहीं मांगते जैसा दूसरे शादी शुदा लोग करते हैं. खास तौर पर बीवियां और कुछ पुरुष भी. वे अपने पति पत्नियों को कोई भी काम अपनी मर्जी के बिना नहीं करने देते.

लेकिन कार्ल कभी मुझसे इस तरह के सवाल नहीं करता. ये बात मुझे अच्छी तो लगती है लेकिन कभी-कभी मैं घबरा भी जाती हूँ. डर लगता है कि कहीं मेरा ये घर बिखर न जाए. वैसे कई बार लगता है कि घर में मैं ही तो हूँ और मैं जहाँ रहूंगी मैं ही तो रहूंगी. कार्ल तो हो कर भी नहीं होता. बस प्यार मुझे बहुत करता है और इसी के मारे कभी कुछ नहीं पूछता. जबकि मैं चाहती हूँ कि कभी तो कुछ पूछे मुझ से. जैसे कि आज ही पूछ ले कि मैं अनुराग से मिलने क्यों गयी? अगले ही ही पल ये ख्याल आया कि अगर पूछ लिया तो क्या जवाब दे पाउंगी? सोच कर झुरझुरी सी छूट गयी.

'"तुम को ठंडी लग रही है. आओ. चलो अंदर." ये दोस्ती वाला आग्रह था. पति तो सो गया था बहुत पहले अन्दर जा कर.

कार्ल ने हलके से शांत लहजे में कहा था और अन्दर चला गया था. बात मेरी मर्जी पर ठहरी थी कि मैं उसकी बात मानूं या वैसे ही बैठी रहूँ.

कुछ देर मैंने सोचा था और फिर उठ कर अंदर चली गयी. मेरा दिल कार्ल के पास रहने को था. कार्ल बाथरूम में था. जब तक वह बाहर आया और बिस्तर में लेटा मैं आधी नीन्द में थी. मैंने हल्का सा हाथ उसकी तरफ बढ़ाया तो कार्ल ने मुझे माथे पर एक हल्का सा बोसा दे कर कहा था,"गुड नाईट स्वीटहार्ट" और चित लेट कर आँखें बंद कर ली थीं.

कुछ ही देर में उसकी गहरी साँसें कमरे में गूँज रही थीं. मैं चुपचाप जागती हुयी पडी रही थी. सोच रही थी कि कार्ल के प्यार में वह जो तुर्शी और उन्माद जो कुछ दिनों के लिए आया था वह ठंडा पड़ चुका है. कार्ल पर शायद उम्र ने असर दिखाना शुरू कर दिया है. आज मुझे ये बात शिद्दत से याद आयी कि कार्ल उम्र में मुझसे बीस साल बड़ा है. लिविंग रूम से टीवी की हल्की-हल्की आवाज़ आ रही थी जब मैं नींद के आगोश में समाने लगी थी.

अगले हफ्ते मैं और अनुराग एक फिल्म देखने गए थे. मुझे तो फिल्म का एक भी दृश्य दिखाई नहीं दिया था. न कोई संवाद सुनायी दिया न कोई गाना सुना. पूरे वक़्त मैं अनुराग की नज़दीकी को सोखती रही थी खुद में और फिल्म देख कर जब हम बाहर निकले तो मैंने ही डिनर का प्रस्ताव रखा था. लगा कि अनुराग इसका इंतजार ही कर रहा था.

वो शाम बेहद हसीं शाम रही. हम सेंट्रल दिल्ली के एक छत पर बने हुए रेस्तरां में बैठे. खाना खाया. नवम्बर की शाम की खासी खुनक भरी महक लिए ठंडी हवा का मज़ा लिया. वाइन के हलके हलके नशे में एक दूसरे को परखा और फिल्म के बारे में, अनुराग की बातें सुनी. फिल्म जो मैंने देखी नहीं थी सिर्फ अनुराग के साथ बैठ कर महसूस की थी.

मैं इन दिनों एक बार फिर खुद से ही अनजान हुयी जाती थी. अनुराग मेरे ख्यालों पर छाया हुआ था. कभी डर लगने लगता कि कहीं मैं उसके प्यार में तो नहीं पड़ रही हूँ और कभी अच्छा लगता खुद के भीतर खूबसूरत जज़्बात पैदा होते देख. अच्छा इसलिए भी लग रहा था कि मेरा पूरा वजूद अनुराग की मांग करने लगा था जो मेरे अन्दर नए जीवन के बीज बोने के लिए बेहद ज़रूरी भी था. मैं प्यार किये बिना प्यार के नतीजे में धारण हुआ गर्भ चाहती थी. और सारी परिस्थितयां उसी दिशा में जा रही थीं जैसा कि मैं चाहती थी.

मैं अनुराग के प्यार में थी भी और नहीं भी. मैं जान गयी थी कि मैं और अनुराग सम्बन्ध बना लेंगें. अनुराग की तरफ से मुझे इत्मीनान होने लगा था हालाँकि अब तक उसने कोई ऐसी बात नहीं की थी जिससे उसके और मेरे बीच दोस्ती के अलावा किसी और तरह के सम्बन्ध की बात हो और न ही उसने भूले से भी मुझे हलके से भी छुआ हो. लेकिन मैं अहिस्ता-अहिस्ता एक दुसरे को नज़दीक आते महसूस कर रही थी. मेरी तरह अनुराग भी इस दूरी से भरी नज़दीकी का आनंद ले रहा था ये बात मैं यकीन के साथ कह सकती थी.

दिन में मेरा वही रूटीन रहता. शामें अब कार्ल ने अहिस्ता-अहिस्ता फिर से घर में कम बितानी शुरू कर दी थीं. शायद उसे एहसास हो गया था कि हमारा मेल कोई रंग नहीं दिखा रहा. मेरे इत्मीनान से होने से उसे संतुष्टि थी और वह धीरे-धीरे वापिस अपने खोल और दोस्तों में जा रहा था. जहाँ से मेरी और सिर्फ मेरी ख्वाहिश के चलते कुछ महीने उसने निकाले थे. अब हम सिर्फ वीकेंड पर ही ज्यादा वक़्त साथ बिताते. लेकिन शारीरिक तौर पर उसने मुझे शिकायत का मौका अभी नहीं दिया था. हम हमबिस्तर भी होते. अभी तक मेरे अंदर एक उम्मीद बची हुयी थी कि शायद कार्ल ही मुझे गर्भवती कर दे. पति-पत्नी अभी तक दोस्ती निभा ही रहे थे. सच कहूँ तो हमारी गाढ़ी दोस्ती ही पति-पत्नी के रिश्ते को संभाले हुए थी.

ऐसे ही एक दिन कार्ल ने फैक्ट्री में ही मुझे बताया कि वह वीकेंड के लिए बंगलुरु जा रहा है. मैं भी चाहूँ तो चल सकती हूँ साथ. लेकिन मेरे मन में ये सुनते ही एक नया विचार आया. ये वही दिन होने वाले थे जिन दिनों में अमूमन मेरा जिस्म का तापमान बढ़ता था. याने मेरा गर्भ धारण करने का योग बनता था. पहले जैसी बात होती तो मैं ज़रूर जाती कार्ल के साथ मगर अब मेरा एक और एक ही लक्ष्य रह गया था. मैं महाभारत के अर्जुन की तरह सोते जागते मुझे सिर्फ और सिर्फ बच्चा ही दिखाई देता था.

मैंने कार्ल से जाने से मना कर दिया. उसने वजह नहीं पूछी. इस तरह की औपचरिकता हमने पहले दिन से ही अपने बीच नहीं रखी थी. वह गुरुवार की रात की फ्लाइट से ही फैक्ट्री से सीधे ही एअरपोर्ट चला गया था. और मैंने उसी शाम अनुराग को फ़ोन करके शुक्रवार की रात अपने घर डिनर पर बुला लिया था. मेरे मन में सब स्पष्ट था.

मुझे उम्मीद यही थी कि अनुराग भी जानता हो कि मैं उससे क्या चाहती हूँ. शायद अनुराग जान गया था क्योंकि उसने पूछा था कि और कौन लोग होंगें और जब मैंने कहा था कि सिर्फ हम दोनों तो वह कुछ पल खामोश हो गया था. मेरा दिल बैठा ही जा रहा था कि कहीं वो मना न कर दे कि उसकी गंभीर आवाज़ मुझे सुनायी दी थी, "श्यौर, मैं सात बजे पहुँच जाऊँगा. "

मेरा अगला दिन इस शाम की तैयारी में ही गुज़रा था.

वह शाम मेरे लिए कई मायनों में अजीब सी थी. मेरे मन में अनुराग को लेकर आकर्षण तो था ही, अकेले में उससे इस तरह मिलने को लेकर कई तरह की तरंगे उठ रही थी.

शाम आयी थी और अनुराग जब आया तो मैं उसे देख कर ही अघा गयी थी. हमेशा की तरह वह बेहद संयत भाव लिए घर में दाखिल हुआ था. कुछ देर सोफे पर अगल बगल बैठने के बाद मैं उसे अपने साथ बार तक ले आयी थी ये कहते हुए कि वो खुद ही फैसला कर ले कि उसे क्या पीना है. वह मेरे पीछे पीछे आ रहा था तब मुझे लगा जैसे कि वह कुछ कहना चाहता है. मैं इंतज़ार करती रही लेकिन वो कुछ बोला नहीं. आ कर चुपचाप खडा हो गया.

मैंने ही पूछा था," क्या लोगे?"

उसने उलटे मुझ से ही पूछ लिया था, "तुम क्या लोगी?"

मैं हंस पडी थी. उसकी असहजता से मैं कुछ-कुछ मज़ा लेने के मूड में आ गयी थी.

"जो तुम लोगे."

इसके बाद काफी सहज हो गया था वो. मैं भी. हम दो गिलासों में व्हिस्की ले कर वापिस सोफे पर आ कर बैठ गए थे. उस शाम हम दोनों ही ज्यादा बात नहीं कर पाए थे. और हमारे गिलास भी कुछ ही देर बाद हमारे होठों से छूट गए थे. आधा घंटा भी हम सोफे पर नहीं बैठ पाए थे. हमारी देहों का विस्तार फैल कर सोफे की हदबंदी के पार छूट चला था. मन था कि भागे चला जा रहा था. बदन एक दूसरे में समाने की फ़िराक में ऊर्जा से भर आये थे. ऐसी ऊर्जा जो जिस्मों के सारे बंधन तोड़ कर निकल भागने के लिए खुले और आरामदेह बिस्तर की मांग पर उतर आयी थी.

मैंने ही कहा था, "चलो मेरे बेडरूम में चलते हैं."

वो रात कब शाम के पाँव चलती मेरी देह में फूलों की खुश्बू के साथ-साथ अनुराग के अंश छोड़ गयी थी ये एहसास मुझे अगले दिन हुआ था जब मैं शावर ले रही थी.

वो एक ख़ास मरदाना गंध मेरे जिस्म से भाप की तरह निकल कर मुझे पिछली रात से मदहोश किये हुए थी. मेरे नथुने इस गंध को बार-बार अपने भीतर लेते और रोके रखते, तब तक, जब तक कि सांस न रुकने लगे. फिर छोड़ देते और ये मेरे होठों के ऊपर से गुज़रती हुयी उन्हें मदमस्त करती मेरे सीने में उतर जाती. फिर से मेरे नथुनों से हो कर मुझ तक पहुँचाने के लिए.

मेरे दिमाग में एक अजीब खेल चल रहा था. वो मुझे बार बार एक चेतावनी दे रहा था. मुझे इस एहसास से छुटकारा पाने की चेतवानी और साथ ही इसमें रहने की सलाह. मुझे जो हासिल करना था वो इसी राह हो कर गुजरने पर होने वाला था. मैंने खुद इस राह को चुना था. अब पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं था. मैं पूरे होशोहवास में थी और जो भी कर रही थी उसका मुझे पूरा एहसास था.

ये वो दिन थे जिनमें कार्ल का ख्याल मेरे पूरे वजूद में था और अनुराग के ख्याल को मैंने इस वजूद के ऊपर प्रेषित कर लिया था.

ये वो दिन थे जब कई बार मैंने सोचा और हैरान हुयी कि लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि प्रेम एक ही बार होता है और एक वक़्त में एक ही से होता है?

मैं तो एक ही वक़्त में कई-कई प्रेम कर रही थी. मेरा पहला प्रेम विक्टर अभी तक मेरे अंदर बसता था. कार्ल मेरी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा था. अनुराग से भी मैं प्रेम ही कर रही थी. प्रेम के बिना मैं उसके साथ अन्तरंग कैसे हो सकती थी? और बिना अंतरंगता भरे प्रेम के मैं बच्चे को खुद में कैसे धारण कर सकती थी? और मैं इस अजन्मे अनजाने बच्चे के प्रेम में भी तो शिद्दत से वाबस्ता थी कि उसे हासिल करने के लिए एक ऐसे रास्ते पर चल रही थी जिसके बारे में खुद से भी बात करने से भी कतराती थी.

अगले एक महीने में मैं और अनुराग बहुत बार मिले. अब मैंने अपना जिस्म का तापमान देखना बंद कर दिया था. मेरा एक ही मकसद रह गया था. अनुराग से मिलना और हमबिस्तर होना. मैं फिर से एक बार एक बड़ी सी योनी बन गयी थी.

इस दौरान मैंने इस बात की पूरी पूरी कोशिश कर के रखी थी कि अनुराग को गलती से भी यह एहसास न हो जाये कि मेरा उससे मिलने और उसके प्रेम में होने का असली मकसद क्या था. एकाध बार अनुराग ने कार्ल के बारे में जानना चाहा.

उसे थोडा अंदेशा इस बात का हुआ था कि शायद मैं कार्ल से संतुष्ट नहीं हूँ या फिर कि शायद कार्ल मुझे इग्नोर करता है जिसकी वजह से वह मेरी ज़िन्दगी में आया है. मैंने तब अपनी तरफ से उसे तसल्ली दिला दी थी की कार्ल मेरा पति है और मैं उसे चाहती हूँ. लेकिन अनुराग के लिए मेरे मन में दूसरी तरह की चाहत है, कि मैं उसके शारीरिक और मानसिक परिपक्व व्यक्तित्व से आकर्षित हुयी हूँ.

कि मेरी भावुक और मानसिक ज़रूरतें कार्ल से ज्यादा कुछ और मेरी ज़िन्दगी में होने की मांग करती हैं. और अनुराग इन्हीं को विराम देने के लिए मेरी ज़िंदगी में आया है. वैसे ये बात झूठ भी नहीं थी इसलिए इस को कहने में न मुझे कोई संकोच हुआ न ही अनुराग को मेरी इस बात पर विश्वास करने में कोई परेशानी हुयी.

अनुराग को मैं किसी भी हालत में अपने असल इरादे के बारे में नहीं बता सकती थी. एक बार मैं ये कर के देख चुकी थी और मुझे यकीन था कि अनुराग भी जानते बूझते हुए अपने बच्चे को मुझे धारण नहीं करने देगा.

वह मानसिक और भावनात्मक तौर पर बहुत परिपक्व था. उसका अपना एक भरा पूरा परिवार था जिसमें एक खूबसूरत बीवी और दो बच्चे थे. एक बेटा और एक बेटी. इन सब की तस्वीरें मैं देख चुकी थी. एक बार बातचीत में मुझे उसने अपने फ़ोन पर पिछले हॉलिडे की तस्वीरें दिखाई थीं.

एकाध बार थोड़ी बहुत चर्चा हुयी थी उसकी पत्नी की मानसिक परेशानी की लेकिन जल्दी ही मैंने बात का रुख पलट दिया था. मुझे लगा वह खुद भी इस बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहता था.

मैं उसकी पत्नी के बारे में कोई नकारात्मक बात सुनने से बचना चाहती थी. मैं नहीं चाहती थी कि मेरा और अनुराग का सम्बन्ध एक ऐसी जगह पहुँच जाए जहाँ मैं उसकी भावनात्मक कमी को इस कदर पूरा करने लगूं कि उसे अपनी पत्नी का साथ गवारा न हो.

इसके आलावा मेरे अन्दर कहीं ये अपराध की भावना तो थी ही कि मैं किसी के पति के साथ सम्बन्ध कायम किये हुए थी चाहे किसी भी कारण से ये रहा हो. मैं खुद को किसी भी तरह से सही साबित करने की न तो स्थिति में थी ना ही करना चाहती थी.

मैं जो कर रही थी वह कई मायनों में समाज के स्थापित नियमों और दायरों के बाहर था लेकिन मेरी ज़रूरतों, भावनाओं और आकाँक्षाओं के अनुरूप था. यही सोच कर मैं पूरे मन और आस्था से खुद पर भरोसा रखे हुए एक अन्तरंग सम्बन्ध अनुराग से बनाये हुए थी जो दिन पर दिन गाढ़ा होता जा रहा था.

अब मुझे डर भी लगने लगा था कि कहीं मैं उसके प्रेम में न पड़ जाऊं. या वो मेरे प्रेम में न पड़ जाए कि कहीं ऐसा न हो कि मेरा मकसद पूरा होने के बाद भी मुझे उससे मिलने की ज़रुरत पड़े. या कि कहीं मेरे आने वाले बच्चे की तरफ अनुराग की कोई भावना जागृत ना हो जाये.

ये बच्चा पूरा का पूरा मेरा और सिर्फ मेरा होने वाला था. शायद कार्ल का भी. लेकिन अनुराग का तो कत्तई नहीं. किसी सूरत भी नहीं.

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