कभी अलविदा न कहना - 22 - अंतिम भाग in Hindi Love Stories by Dr. Vandana Gupta books and stories Free | कभी अलविदा न कहना - 22 - अंतिम भाग

कभी अलविदा न कहना - 22 - अंतिम भाग

कभी अलविदा न कहना

डॉ वन्दना गुप्ता

22

आज मानव मन के एक और रहस्य को जाना था मैंने... अशोक जी को मैं चाहकर भी भाई का सम्बोधन नहीं दे पा रही थी, क्योंकि मेरे प्रति उनकी भावनाओं से मैं अनजान नहीं थी। यद्यपि मेरे मन में उनके लिए वैसी कोई फीलिंग्स नहीं थीं, फिर भी मैं उनकी भावनाओं का मखौल नहीं उड़ाना चाहती थी। आज जब वे सुनील के बड़े भाई के रूप में मुझसे मिले, मुझे सम्बल दिया तो अनायास ही मैंने भी भाईसाहब का सम्बोधन दे दिया। मैं मेरे बड़े भाई की प्रतिच्छाया उनमें देख रही थी कि अचानक ही वे फिर बोले... "और हाँ, हमारी इस मुलाकात का जिक्र किसी से करने की जरूरत नहीं है, सुनील से भी नहीं... ओके..?"

"जी... मैं आपसे मिलने से पहले ही सुनील से मिल चुकी थी, आपको मेरी वजह से कोई दुःख पहुँचा हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ..." मैं रुआँसी हो गयी थी।

"मुझे मालूम है कि तुम सुनील से पहले मिल चुकी थीं, पर यह नहीं मालूम था कि तुम दोनों.... खैर! पहले पता होता तो बात यहाँ तक नहीं पहुँचती... तुम्हारे घर पर सब मुझे दामाद मानकर बैठे हैं, उन्हें भी समझाना होगा।"

"आप बहुत अच्छे हैं, प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिएगा।"

"फिर वही बात... माफी की नौबत तो तब आती, जब मुझे असलियत पता नहीं चलती... थैंक्स अनिता... तुमने नहीं बताया होता तो मैं कब तक गलतफहमी में रहता और आज की मुलाकात के लिए भी शुक्रिया।"

मैं फिर चौंक गयी... "अनिता यह तुम्हारा प्लान था..?"

"मैं दो प्यार करने वालों को बिछड़ते हुए नहीं देख सकती विशु...."

"और एक अकेले प्यार करने वाले के बारे में क्या खयाल है...?" अशोक जी ने चुटकी लेते हुए कहा।

"उसका दर्द मुझसे बेहतर कौन जान सकता है?"

"निराश मत हो अन्नू, निखिल को तुझसे दूर जाकर जरूर एहसास हुआ होगा तेरे प्यार का.." मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा।

"ओह आप भी बुक हो चुकी हैं, यहाँ भी मेरा चांस खत्म..." अशोक ने फिर हँसने-हँसाने की नाकाम सी एक कोशिश की। कॉफी खत्म हो चुकी थी।

"अब हमें चलना चाहिए.." मैं खड़ी हो गयी।

"विशु! एक अंतिम बात... ध्यान से सुनो.... सुनील को अपने आप प्यार का अहसास होना चाहिए.. इसलिए जब तक वह खुद तुम्हें 'लव यू' न बोले, तब तक तुम्हें इंतज़ार करना होगा। यह उसके आत्मविश्वास और तुम्हारे धैर्य की परीक्षा है।"

"जी मैं ध्यान रखूँगी आपकी बात..."

आज मैं दिल की गहराइयों से अशोक जी के प्रति नतमस्तक थी, साथ में विकल भी... ईश्वर से शिकायत भी थी कि जिंदगी में इतनी जटिलता क्यों....?

आखिरकार वापिस जाने का दिन भी आ ही गया। इस बार घर छोड़ते हुए मन बहुत भारी था। सामान भी ज्यादा था और हिदायतें भी... अम्मा और मम्मी चाहती थीं कि मैं शादी के लिए हाँ कर दूँ। मैंने दीवाली तक की मोहलत चाही थी। ताईजी भी पुरातनपंथी होने से एक साल में घर में दूसरी शादी के पक्ष में नहीं थीं। उन्हें किसी पंडित ने बोला था कि इस स्थिति में एक जोड़ा दुःखी रहता है और उन्हें विश्वास था कि मैं खुश रहूँगी। वे अलका दी की खुशी के लिए आश्वस्त होना चाहती थीं। उनके अंधविश्वास से मैं पहली बार सहमत न होते हुए भी खुश थी।

बस खचाखच भरी थी। सोमवार को हमेशा ही भीड़ ज्यादा रहती थी। आज एक उत्साह का माहौल था। सुनील को देखते ही मेरी धुकधुकी बढ़ गयी थी। मैं सोच रही थी कि 'क्या अशोक भाईसाहब ने सुनील से बात की होगी, वह मुझे देखकर कैसे रियेक्ट करेगा...' उससे नज़रें मिलते ही मेरा अंग प्रत्यंग तरंगित हो उठा। उसने भी मुस्कुराहट बिखेरी और शर्म से मेरे गाल लाल हो गए, मेरी नज़रें झुक गयीं। शैफाली, राजेश, अनिता के अलावा भी बहुत सारे मित्र साथ में थे, अतः कोई खास बात होनी ही नहीं थी, किन्तु आज उसकी उपस्थिति मुझे कुछ अधिक ही गुदगुदा रही थी। मैंने जब भी उसकी ओर देखा, उसकी नज़रें मुझ पर ही फोकस दिखीं। शायद आज पहली बार हम दोनों एक जैसे एहसासों की नदी में तैर रहे थे।

कॉलेज में भी खिलखिलाहटें गूँज रहीं थीं। ग्रीष्मावकाश में सभी तरोताज़ा होकर एक नये उत्साह से लबरेज़ थे। हर शिक्षण सत्र में नये विद्यार्थियों का साथ कभी भी बोरियत नहीं होने देता, कॉलेज में जॉब करने का ये प्लस पॉइंट है। अनिता की नजरें निखिल सर को ढूंढ रहीं थीं। वे आये किन्तु साथ में अपना ट्रांसफर ऑर्डर भी लाये थे। उस दिन शाम को घर पर पार्टी का आयोजन था। सारी व्यवस्था रेखा और विजय ने की थी, रेखा दो दिन पहले ही आ चुकी थी। नवम्बर में उनकी शादी की तारीख तय हो चुकी थी और अब निखिल सर की फेयरवेल भी इसी में शामिल थी।

सुबह जिस उत्साह से आये थे, वह ठण्डा पड़ गया था। मिलन के ख्वाब सजाए थे और घड़ी बिदाई की आ गयी थी। निखिल सर का ट्रांसफर गृहनगर हुआ था, यह खुशी की बात थी किन्तु यहाँ से जा रहे थे इसका दुःख हम सभी को था। इतने कम समय में हम सब इतना जुड़ चुके थे... घर से दूर हमारा अपना एक घर था.. कोई खून का रिश्ता नहीं था, फिर भी दिल और दोस्ती का अटूट बंधन जुड़ गया था, जो ताज़िन्दगी साथ रहने वाला था।

"अरे यार ऐसे मुँह मत लटकाकर बैठो, नवम्बर में मिलेंगे रेखा और विजय की शादी में... अनिता तुम्हारी शादी में भी मैं जरूर आऊँगा, बुलाना मत भूलना......" निखिल ने अनिता को जता दिया कि उनका रिश्ता सिर्फ दोस्ती तक ही सीमित रहेगा।

अनिता का दिल जितना कोमल था, उसका व्यक्तित्व उतना ही मजबूत... दिल टूटने की आवाज़ मैंने सुनी थी.. हम दोनों किचन में थे जब उसने कहा था..."रेखा की शादी की तारीख तय हो गयी है, सुनील भी तुझे 'आई लव यू' बोल ही देगा... तुम दोनों प्यार की जिन्दगी में एक सोपान आगे बढ़ गयी हो, किन्तु मैं एक कदम पीछे चली गयी हूँ।"

"दिल छोटा मत कर अन्नू, तुझे इनसे भी अच्छा कोई मिलेगा।"

एक दर्दीली मुस्कान के साथ उसने कहा था कि  "बात अच्छे या बुरे की नहीं है, बात प्यार की है, जिंदगी में पहला प्यार कोई कभी भूलता नहीं है।"

"सही कह रही है तू, भगवान ऐसा क्यों करता है, जिसके लिए हमारा दिल धड़क रहा है, उसका दिल भी हमारे लिए क्यों नहीं धड़कता...?"

"हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं होता है विशु... मैं तुम दोनों की खुशी में खुश हूँ।"

"हाँ हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं होता है... जैसे अशोक जी और अंकुश... पर मुझे बुरा तब लगता है जब मैं किसी के दुःख का कारण बनूँ.." कहते हुए मेरे दिमाग में अचानक कुछ कौंध गया और मैं तुरन्त बाहर के रूम में पहुँची जहाँ रेखा, निखिल और विजय बैठे थे।

"निखिल सर बताइए वह कौन खुशनसीब है, जिसकी वजह से आपने अन्नू का दिल तोड़ा है?"

"तुम्हें किसने बोला..?"

"हमें सब पता है, कोई है आपकी लाइफ में वरना हमारी अन्नू इतनी प्यारी है कि कोई इंकार कर ही नहीं सकता।"

"रियली ऐसी कोई बात नहीं है, परन्तु एक खबर जरूर है आप लोगों के लिए...."

"क्या है बताइए जल्दी...?" अनिता भी बाहर आ गयी थी।

"मेरी शादी के लिए लड़की फाइनल हो गयी है।" यह खबर अप्रत्याशित थी। उन्होंने बताया कि उनकी भाभी दो बहनें हैं और भैया ने ससुरजी का बिज़नेस जॉइन कर रखा है। अब यदि उनकी साली की शादी कहीं और होती है तो बिज़नेस के हिस्से होंगे, यदि दोनों बहनें एक घर में रहीं तो सारा माल इन्हीं के घर आएगा। इसलिए उनकी शादी भाभी की बहन से तय हो चुकी है। अनिता को अपलक शून्य में निहारते देख मैंने हौले से उसका हाथ दबाया, मेरी हथेली पर एक बूंद टपकी... मैंने उसकी पलकों की कोरों पर झिलमिलाते मोती देखे।

"क्या सिर्फ इसी वजह से आप भैया की साली से शादी कर लेंगे..? आप तो नौकरी कर रहे हैं, बिज़नेस से क्या लेना देना?" मैंने पहली बार रेखा को तेज़ आवाज़ में बोलते देखा। उसका आक्रोश मित्र की वेदना के लिए था या व्यवस्था के प्रति, बात वह सही कह रही थी.. "यदि लड़की कुरूप हुई, या अनपढ़ गंवार तो भी क्या आप शादी कर लेते? मैं जानती हूँ कि आपके समाज में दहेज प्रथा है किंतु एक शिक्षित और नौकरीपेशा नवयुवक का ये कदम मेरी सोच से परे है... बुरा मत मानना सर आपसे ये उम्मीद नहीं थी।"

"हम समाज का हिस्सा हैं और सामाजिक नियमों का पालन करना हमारा धर्म है.. हम परिवार के निर्णय से परे नहीं जा सकते।" निखिल ने एक घटिया तर्क दिया।

बहस बढ़ती देख विजय ने विषय परिवर्तन करना चाहा और कहा "सुनील अभी तक नहीं आया, बैंक के बाद पहुँचने का बोला था।"

मैं फिर सोच में पड़ गयी... सुनील के प्यार की खातिर उसके भाई ने कुर्बानी दी और निखिल अपने भाई के व्यापार के लिए कुर्बानी दे रहा है। कितना फर्क है सोच में... किसी के लिए प्यार तो किसी के लिए दौलत का पलड़ा भारी... दुनिया तेरी रीत निराली...! उस पल मुझे अनिता के लिए खुशी हुई कि वह एक दकियानूसी सोच वाले परिवार का हिस्सा बनने से बच गयी थी।

"शैतान का नाम लो और शैतान हाज़िर...." सुनील को आता देखकर अनिता बोली....

"चलिए किसी भी तरह किसी ने हमें याद तो किया... वरना हमें कौन पूछता है।"

"अच्छा जी... बोलिए किससे पुछवाना है..? अभी हाज़िर करते हैं.."

"अजी हम ही पूछ लेंगे..." सुनील ने मेरी ओर देखते हुए कहा।

थोड़ी देर पहले माहौल में जो गर्माहट बढ़ी थी, सुनील के आने से फिर कम होने लगी। मेरी धड़कने जरूर तेज़ हो गयीं थीं।

"अटेंशन प्लीज...." विजय ने टेबल बजाते हुए कहा... "आज निखिल की फेयरवेल है तो अब नो हार्श टॉक प्लीज... इन लम्हों को हमें यादगार बनाना है... जब भी हम सोचें तो होंठों पर मुस्कुराहट खिल जाए न कि मन में कड़वाहट घुल जाए... ओके..? सो लेटस स्टार्ट..."

"ये लीजिए पहले मेरी तरफ से मिठाई खाइए, बिदाई भूल जाइए।" निखिल ने मिठाई का डिब्बा खोलकर रख दिया।

"डबल खुशखबरी है, मिठाई भी डबल चाहिए.." मेरी बात सुनकर सुनील ने चौंकते हुए पूछा... "मतलब अब अनिता जी और निखिल भी....." विजय ने उसकी बात बीच में ही काट दी... "निखिल के तबादले के साथ ही उसकी शादी भी तय हो गयी है, परिवार की पसन्द से..." मेरी बात से अन्नू को और विजय की बात से सुनील को झटका लगा।

"अन्नू! प्लीज मेरी बात समझ, कुछ समय का दुःख है, जो हुआ अच्छा हुआ...." किचन से खाने के डोंगे लाते हुए मैंने कहा। रेखा ने भी समर्थन किया..."विशु सही कह रही है अन्नू, अब उनके सामने रोना मत... सबके जाने के बाद हम मिलकर रोयेंगे ठीक.?" उदास सी हँसी बिखर गयी थी।

"महफ़िल खत्म हो, उसके पहले सब अपने दिल की बात शेयर करो... छः महीने के साथ के खट्टे मीठे पल... निखिल मुझे तो तुम बहुत याद आओगे यार... " विजय एकाएक ही भावुक हो गया... "यार सुनील एक गाना हो जाए..."

"ह्म्म्म.. ग़ालिब की एक ग़ज़ल पेशे खिदमत कर रहा हूँ, इस समय के लिए फिट है...."

मेहरबां होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त

मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ....

सुनील गा रहा था और हम सब भीग रहे थे। मैं सोच रही थी कि 'बुलाऊँ क्यों? तुम्हें खुद आना होगा मेरे पास, मैं इंतज़ार कर रही हूँ तुम्हारा... आओगे न?' मैं खो सी गयी थी... अनिता की आवाज़ सुन तन्द्रा भंग हुई..

"निखिल के लिए पेश हैं चंद पँक्तियाँ..."

लोग आते हैं, चले जाते हैं

हर जगह नई यादें बनाते हैं

आज तुम भी हमें छोड़ जाओगे

बीते पल याद आकर रुलाएंगे

शुभकामनाएँ हैं हमारी

ना रहे कोई ख्वाहिश अधूरी तुम्हारी

अपनी दुनिया में रम जाना किन्तु

गुजारिश है तुमसे हमें न भुलाना.....

बोलते बोलते वह रो पड़ी थी। अब तो निखिल के वापिस लौटने की उमीद भी नहीं थी। विदाई के पल भावुक होते हैं... किन्तु ये आँसू नकारे जाने का दर्द भी बयां कर रहे थे।  रेखा और विजय ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त की। वे दोनों खुश थे किंतु गमगीन भी.. विचित्र स्थिति थी... आँखों में नमी होते हुए होठों पर मुस्कुराहट सजाना आसान नहीं होता। मुझे अनिता के लिए दुःख था तो निखिल के प्रति गुस्सा भी... इन छः महीनों की दोस्ती में उसने अनिता की खुशफहमी को पनपने दिया.... क्यों..? किसी की भावनाओं से खेलकर कोई कैसे खुश रह सकता है?

यकायक मौसम नम हो गया था... वातावरण में ठंडक घुलने लगी थी। मिट्टी की सौंधी खुशबू से पता चला कि हल्की बारिश शुरू हो गयी। मौसम की पहली बारिश हमेशा मुझे रोमांचित करती है। एक नया अनुभव हो रहा था। सुनील, मैं और बारिश... दिल में प्यार की तरंगें हिलोर लेने लगीं... मन हुआ कि सुनील के साथ बारिश में भीग जाऊं और हमारे प्यार के इजहार के साथ प्रकृति भी प्रफुल्लित होकर झूम उठे। मैं ख्वाब में खोने लगी थी कि विजय की आवाज़ ने जगा दिया... "आसमान भी अनिता दीदी के साथ रोने लगा है...."

"मैंने भी अभी एक कविता लिखी है, इजाजत हो तो सुनाऊँ..?" निखिल के हाथ में अनिता की दी हुई डायरी और कार्ड था... यह कविता उसकी रिटर्न गिफ्ट थी।

"इजाजत की जरूरत है क्या..?"

"औपचारिकता का निर्वाह समझ लो..."

"ह्म्म्म.. जब सम्बन्ध ही औपचारिक हो गए तो कैसा निर्वाह....." अनिता के स्वर में कठोरता का समावेश हो उसके पहले ही मैंने कहा... "जी हाँ सर सुनाइए..."

निखिल ने बोलना शुरू किया....

गहरा जाता है सन्नाटा

मौन हो जाते हैं संवाद

अर्थहीन हो जाता है

सब कुछ जब टूट जाता है

अचानक

बहुत कुछ

एक विश्वास

आस्था

स्नेह

और

वैचारिक एकमतता

टूट जाते हैं जब

झटके से

मन के तार

जिसे किसी अच्छे लम्हें में

हमने जोड़ा था

ओ! दोस्त

आज फिर आशान्वित हूँ

शायद

मन के टूटे हुए तंतु जुड़ जाए

और बहुत दूर... दूर... दूर...

दिल का कोई कोना धड़कता रहे

उस दोस्ती के नाम

जिसे हम कोई सम्बोधन न दे पाए

आज सब छूट रहा है

लिए जा रहा हूँ सिर्फ

कुछ यादें..

ट्रैन की धड़धड़ाहट में

खिड़की पर सिर टिकाए

आँखे बंद किए

अपने कम्पार्टमेंट में

तुम तीनों दोस्तों को याद करूंगा..

अलविदा.....

कविता क्या थी, एक सच्चाई ही बयान कर दी थी शब्दों को सजाकर... खामोशी पसर गयी थी। बारिश की बूंदों की टप टप सुनाई दे रही थी। क्या अलविदा कहना इतना आसान था?

"वैशाली तुमने अंकुश के कार्ड का रिक्त स्थान भर दिया..?" निखिल के हाथ में अन्नू का कार्ड था, रिक्त सम्बोधन वाला...

"वह तो खाली ही रहेगा, जैसे यह कार्ड खाली है.."

विजय को रेखा की मार्फ़त सच्चाई पता थी शायद....

"ओह! मुझे नहीं पता था, सॉरी..." निखिल ने कहा और मुझे ख्याल आया कि यदि मैं सही हूँ तो निखिल भी गलत कहाँ हैं? अपनी जिंदगी का फैसला लेने का हक सबको है... अपनी खुशी के लिए...! मैंने सोच लिया कि अंकुश को पत्र लिखना है.. मैं एक अच्छा दोस्त खोना नहीं चाहती थी।

"सुनील की तरफ देख विशु, तुझे खोने का डर ही उसे तेरे करीब लाएगा, देखना आज ही वह तुझे 'आई लव यू' बोल देगा..." अन्नू मेरे कान में फुसफुसाई। अंकुश के जिक्र ने सुनील को वाकई बेचैन कर दिया था, किन्तु विजय के खुलासे से उसकी आँखों में दीप जल उठे थे... मुझे एक सुखद अहसास हुआ जब उसने कहा... "आज मुझे पहली बार बारिश अच्छी लग रही है, मिट्टी की खुशबू का सौंधापन आज ही महसूस किया है... बूंदों की टप टप में कितना मधुर संगीत छिपा होता है आज ही जाना है और... और....."

"और क्या...?"

"और.... निखिल यार कविता तो बहुत अच्छी लिखी है, आँखों के साथ मन भी भीग गया, कितनी आसानी से कह दिया तुमने... अलविदा..."

मैं सुनील को इतना भावुक होते हुए पहली बार देख रही थी। प्यार के कोमल एहसास से हम दोनों ही सराबोर थे। बस मुझे इंतज़ार था कि कब वह उसके मन की बात मुझे कहेगा....!

"अलविदा कहकर गलती की क्या मैंने... इस अवसर पर और क्या बोलूँ..?"

"गलती नहीं की... किन्तु प्यार भी तो नहीं किया..."

"मतलब..?"

"मतलब यह कि........" अचानक ही सुनील ने मेरा हाथ पकड़ा और सीधे मेरी आँखों मे देखकर पूछा.... "विशु एक बात कहूँ...?" मैं सर से पाँव तक सिहर गयी...  रोम रोम पुलकित हो उठा और 'लव यू' सुनने के इंतज़ार में कान दहकने लगे.... मैंने उसकी ओर देखा... और "जी कहिए" कहकर नज़रे झुका लीं... उसने दोनों हाथों से मेरा चेहरा पकड़कर उठाया... मैं उसकी गर्म सांसों को महसूस कर रही थी... मेरी आँखों में देखते हुए उसने ललाट पर प्यार की निशानी अंकित की और कहा....

"कभी अलविदा न कहना..."

©डॉ वन्दना गुप्ता

22, निर्माण नगर, दशहरा मैदान, उज्जैन (मध्यप्रदेश) - पिन 456010

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Pushpa Joshi

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उपन्यास का अन्त बहुत रोचक है।शिर्षक के अनुरूप। बहुत -बहुत बधाई और बहुत-बहुत शुभकामना।