solahavan sal - 12 in Hindi Children Stories by ramgopal bhavuk books and stories PDF | सोलहवाँ साल (12)

सोलहवाँ साल (12)

उपन्यास

सोलहवाँ साल

रामगोपाल भावुक

सम्पर्क सूत्र-

कमलेश्वर कॉलोनी (डबरा) भवभूति नगर, जिला ग्वालियर म.प्र. 475110

मो 0 -09425715707Email:- tiwariramgopal5@gmai.com

भाग बारह

मेरा मन फिल्म देखने का नहीं था। अंदर का चोर उछलकूद कर रहा था। मुझे अपनी खैरियत फिल्म देखने जाने में ही लगी। मैं बेमन से तैयार होने लगी। मम्मी ने पूछा -‘‘क्यों सुगंधा यहाँ कौन-कौन सी फिल्में चल रही हैं ?’’

मैंने अपने आपको बचाने के लिए झट से उत्तर दिया-‘‘मुझे क्या पता?’’

मम्मी बोली ‘‘अरे ! कैसी लड़की है? कॅालेज की लड़कियाँ आपस में बातें करती हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता, लड़कियाँ..........और फिल्मों की बातें न करें।’’

मैंने कहा-‘‘मम्मी, सुनन्दा कह रही थी कुछ दिनों पहले यहाँ शोले फिल्म चल रही थी। वह तो बदल गई।’’

‘‘ठीक है आ ही गयें हैं तो कोई सी भी फिल्म देख लेते हैं। हमने सोचा, बच्चों का भी फिल्म देखने का मन होता हैं फिर ये संजूभैया भी यहाँ आने की जिद कर रहा था। ’’

मैंने संजू से पूछा-‘‘क्यों भैया कौन सी फिल्म चलें ।’’ वह तत्त्क्षण दोनों हाथों से मुक्के मारने का अभिनय करते हुए बोला ‘‘डिसिम ऽऽ डिसिम ऽऽ ।’’

मम्मी बोली-‘‘सुना है इन दिनों तीसरी कसम फिल्म चल रही है, कलात्मक फिल्म है।’’

पापा बोले -‘‘यह आँचलिक उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी है।’’

दीदी बोली -‘‘पापा ये तो साहित्यक फिल्म है।’’

‘‘हाँ बेटी, तुम्हारी मम्मी को ऐसी ही फिल्में अच्छी लगती हैं।’’

हम फिल्म देखने समय से निकल पड़े। रास्ते में मम्मी मेरे कान के पास आकर बोली, ‘‘तुम्हारे कॅालेज की लडकियाँ भी तो फिल्म देखने जाती होगी।’’

उनकी यह बात सुनकर मुझे विश्वास हो गया, चोरी पकड़ी गई। मैंने धीमे से सच को स्वीकारा ‘‘मम्मी एक दिन मैं भी अपनी कॉलेज की सहेलियों के साथ शोले फिल्म देखने गई थी ।’’

मम्मी ने आश्चर्य व्यक्त करने के भाव में कहा-‘‘अरे ! बिना बताये ।’’

‘‘हाँ मम्मी, कॅालेज की लड़कियाँ पीछे पड़ गई। नानी से पूछती तो आप उनका स्वभाव जानती ही हैं ।’’

‘‘ठीक है, अब बिना बताये न जाना ।’’

‘‘जी मम्मी ।’’

‘‘यह बात पापा को पता न चले, वे बहुत गुस्सैल हैं ।’’

‘‘मम्मी, मैंने उन लड़कियों से कुट्टी कर ली है । मैं यहाँ पढ़ने आई हूँ।

हमारी बातों पर दीदी कान दे रही थीं। वे हमारी बातें सुनने के लिए कदम तेज करते हुए बराबरी में आ गईं ।

मम्मी ने विषय बदल लिया ।

हम टॉकीज पर पहुँच गये। पापा टिकिट लेने के लिए पंक्ति में लग गये। हम वहाँ खड़े-खड़े पोस्टर देखने लगे। थोडी देर हम सिनेमा हाल में थे ।

उस दिन फिल्म देखने में मन नहीं लग रहा था।

मैं मन मार कर फिल्म देखने लगी। फिल्म का यह गीत आज भी राह चलते गुनगुना लेती हूँ- चलत मुसाफिर मोह लिया रे। पिंजरे बाली मुनिया।

शुरू-शुरू में तो लगा- मम्मी ये कैसी बोर फिल्म दिखाने ले आयी हैं ? -गाड़ीवान विभिन्न प्रसंगों में दो बार कसमें खा लेता है। इसके वह एक नौटंकी बाई को मेले में ले जाता है। रास्ते में बच्चों का दुल्हनियाँ बाला गीत मन को गुदगुदा देता है। यों मेले में पहुँचते पहुँचते, दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। नौटकीं बाई इन्हें मित्रों सहित नौटंकी की देखने का टिकिट दिला देती है। जब नौटंकी देख रहे होते हैं नौटंकी बाई से लोग अश्लीलता की हरकतें करते हैं। यह बात गाड़ीवान को पसन्द नहीं आती, वह उनसे लड़ने तैयार हो जाता है। यह बात नौटकी बाई जान जाती है तो उसे गाड़ीवान से प्यार हो जाता है। गाड़ीवान अपने पैसों को चोर उठाईगीरों से बचाने के लिए नौटंकी बाई के पास रख आता है। नौटकीं बाई जब नौटंकी छोड़कर जाने लगती है तो उसे गाड़ीवान के रूपये लौटाने की चिन्ता रहती है। ट्रेन आने से पहले गाड़ीवान स्टेशन पर पहुँच जाता है, वह उसके पैसे सोंपकर ट्रेन में बैठ जाती है।

वह यह कसम खाता है कि अब किसी नौटंकी बाई को अपनी गाड़ी में नहीं बैठायेगा। उसकी यह तीसरी कसम थी।

अगले दिन मम्मी पापा भैया को लेकर गाँव लौट गये। तो मैंने राहत की साँस ली।

कॅालेज में डॉ. अरविन्द कौरव सर पढ़ा रहे थे-‘‘आर्य लोग बोल्गा के तट से चलकर भारत में आये ।’’

कौरव सर की इस बात से मेरे मन को चोट लगी। शब्द निकले-‘‘ सर पुस्तको में जो लिखा है। आप वही कह रहे हैं या अन्तर मन में बसे सत्य को व्यक्त कर रहे हैं।’’

‘‘सुगंधा तुम्हारा प्रश्न ठीक है। हम शिक्षकों को निर्धारित कोर्स के अनुसार ही पठन- पाठन कराना पड़ता है।’’

‘‘ सर ,यह स्कूल नहीं है आप कॅालेज में पढ़ा रहे हैं।‘‘

‘‘ मैं यह जानता हूँ।’’

‘‘ फिर कहें, क्या आर्य लोग विदेशी हैं ?’’

‘‘सुगंधा इस प्रश्न को लेकर मैं भी सोचता रहा हूँ। कुछ राहुल सांकृत्यायन जैसे विद्वान कहते हैं कि बोल्गा के आसपास से वे भारत में आये थे ।’’

‘‘किन्तु सर मैं मानती हूँ कि आर्य लोग हिमालय की तराई क्षेत्र और सरस्वती नदी के आसपास से सारे विश्व में फैले हैं।’’

‘‘मैं सुगंधा तुम्हारी बात को अस्वीकार नहीं कर रहा हूँ। कुछ आधारों केा लेकर किसी जाति के निवास का निश्चित बिन्दु निर्धारित करना मूर्खता है। वे बोल्गा घाटी से यहा आये या वे यहाँ से बोल्गा की घाटी के लिए गये। यह विचारणीय बिन्दु अभी भी शोध की मांग करता है।’’

‘‘सर कुछ लोगों की इतिहास बदलने की साजिश है। जिससे वे यह घोषित कर सकें कि यहाँ के सभी निवासी विदेशी हैं, तो आर्य भी विदेशी ही हुये।’’

सुनन्दा बोली-‘‘सर हम सब सुगंधा के तर्क से सहमत है।’’

उस दिन मैं यह सब सोचते हुए कॉलेज से लौटी थी, मैं भी कैसी हूँ, इतिहास के इस सोच से परीक्षा का क्या सम्बन्ध? वहाँ परीक्षक तो रटे रटाये उत्तर पर अंक देते होंगे । मेरे इन्टर में द्वितीय श्रेणी आने का यही एक कारण भी रहा है। मैं रटे रटाये उत्तर में विश्वास नहीं रखती।’

इसी उधेडबुन में मैंने घर में प्रवेश किया

मैं अपनी किताबें रखकर कॅालेज की ड्रेस बदलकर रसोई घर में पहुँच गयी।

इसी समय नानी के आने की आहट मिली वे बडबडाती चली आ रही थीं।-‘‘मैं क्या करूँ? कैसे भी यह वर्ष कट जाये। लड़की बाला मामला है। कोई ऊँच-नीच हो जाये तो दोष सभी मुझे ही देंगे,मैंने ध्यान नहीं रखा। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है। मैं अगली साल यहाँ नहीं आने बाली।’

इस सब के बावजूद मैं अपने अध्ययन में लगी रही। मैं चहती थी कैसे भी प्रथम श्रेणी के अंक आना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त कालेज की हर एक्अीविटी पर भी मेरी नजर थी। इन दिनों देश में महिलाओं के पुरुष से अनुपात में दिन प्रतिदिन कमी आती जा रही है। अखवारों में यह आँकड़े प्रतिदिन दिखाये जा रहे हैं। यह चर्चा का विषय बन गया है। इस समस्या का निदान कैसे खोंजा जाये?

हमारे कॉलेज में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं विषय पर चर्चा आयोजित की गई। मुझे इस विषय पर कॉलेज की सभी लड़कियाँ मुझे प्रोत्साहित करने लगी। मैंने भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने का मन बना लिया। सहेलियों की प्रेरणा से अपना नाम भाषण देने बालों में में लिखा दिया। यह मेरा भाषण देने का पहला अवसर था। सबसे पहले मैंने अपना भाषण लिख डाला। बाद में दर्पण के सामने खड़े होकर अभ्यास भी कर लिया। समय पर सभागार में पहुँच गई। कार्यक्रम शुरू होगया। संचालक ने सबसे पहले भाषण देने के लिए मुझे ही आमंत्रित कर दिया। मैं धड़कते दिल से माइक पर पहुँच गई। मैंने बोलना शुरू किया-‘ सभागार में उपस्थित मेरी गुरुजनों एवं बहिनों, स्त्री-पुरुष का अनुपास समान न रहना प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। इसमें प्रकृति दोषी नहीं है। इसमें दोष है हम सब का। स्त्रियों के साथ दिन- प्रतिदिन अन्याय बढ़ते जा रहे हैं। प्रति दिन आत्महत्याओं का चलन बड़ता जा रहा है। और तो और हम लड़की को चैक कराकर उसे गर्भ में ही मार रहे हैं। उन्हें धरती पर ही नहीं आने दिया जाता। इस तरह बेटे की चाह में उन्हें कुचला जा रहा है।

प्रश्न है इस बात पर रोक कैसे लगे? निश्चय ही माँ को इसके लिए सजग रहना पड़ेगा तभी इस समस्या का निदान सम्भव है। आज की बेटी कल की माँ है। माँ दृण प्रतिज्ञा करले कि मैं भ्रूण को चैक कराने नहीं जाउंगी तो उस समस्या का निदान सम्भव है। मैं हाथ उठाकर कहूंगी कि हम प्रतिज्ञा लेते हैं कि मैं भ्रूण को चैक कराने नहीं जाउंगी और चैक कराने बालों का विरोध करुंगीं। कृपया आप सभी दोहरायें। सभी ने एक स्वर से दोहराया- हम प्रतिज्ञा लेते हैं कि मैं भ्रूण को चैक कराने नहीं जाउंगी और चैक कराने बालों का विरोध करुंगीं। बस-बस मैं समझ गई कि मैं अपनी बात कहने मे सफल रही हूँ। सहयोग के लए बहुत बहुत धन्यबाद।

इस भाषण का ऐसा प्रभाव हुआ कि कॉलेज की सभी प्रोफेसर मुझे जान गईं। सभी छात्रायें मेरे भाषण की प्रशंसा कर रही थी।

इसी क्र्रम में परीक्षायें आ गईं। मैं दिनरात एक करके पढ़ने में लगी रही। परीक्षाओं के बाद हम गाँव चले आये। नानी अपने घर चली गईं।

पापा मेरे लिये बी.ए. भाग द्वितीय हिन्दी की पुस्तक ले आये।

मैं महसूस कर रही थी कि पापा के स्वभाव में परिवर्तन आ गया है।

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