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बेरोजगारी बनाम जिंदगी- ए ट्रेजेडी इन 2020





ऑनलाइन क्लास करते करते अब तो ये तक याद हो चुका था कि किस यूट्यूब चैनल पर किस सर की क्लास कितने बजे होती है। लेकिन रेलवे ग्रुप डी की न परीक्षा हुई न ही उसकी कोई खबर आई। घर मे दो बहन और दो भाइयों में सबसे बड़ा संजय पिछले लगभग 4 सालो से रेलवे की तैयारी कर रहा था पिछली ग्रुप डी की भर्ती में उसके साथ के लगभग सभी साथियों का या तो सलेक्शन हो चुका था या उन्होंने तैयारी छोड़कर कही प्राइवेट जॉब या धंधा बिजनेस शुरू कर दिया था। संजय ने अपनी तैयारी की शुरुवात इंटरमीडियट के बाद ही शुरू कर दी थी करता भी क्यों न पिता के संघर्ष को उसने अपनी आँखों से देखा था। वो उस दिन को कभी नही भुला था जब उसे एक दिन आंटा लाने के लिए पैसे दिए गए और बालपन में वो पैसे कही गिर गए और संजय के पूरे परिवार सहित उस दिन भूखे रहना पड़ा था उधारी दुकान दार देता नही क्योंकि गरीब का सहायता या तो भगवान करते है या वो खुद करता है।
पिता दिन में एक दुकान में स्टोर में समान की आवाजाही देखते थे और रात में एक शो रूम गार्ड का काम करते थे आर्थिक तंगी और लगातार काम के तनाव ने उन्हें बहुत ही चिड़चिड़ा और गुसैल प्रकृति के बना दिया था।
जिसका परिणाम ये हुआ कि संजय और उसके भाई बहन छुट्टियों के दिनों से डरने लगे क्योंकि ये वो दिन होता था जब पिता का तनाव गुस्सा बनकर संजय और उसके भाई बहनों पर उतरता था। पिता के इस स्वभाव को उम्र के साथ संजय ने जान लिया था कि ये क्यों है इसी वजह से वह इंटरमीडियट की परीक्षा के बाद से ही आर्मी की तैयारी में जुट गया था। संसाधनों के अभाव में दुर्भाग्य वस न वह आर्मी में हो सका न ही एयरफोर्स में क्योंकि लगातार कम्पटीशन बढ़ रहा था

अब परीक्षा पास करने के लिए खुद की पढ़ाई के साथ साथ कोचिंग की मद्दत की जरूरत आन पड़ी थी इस लिए नही की वो पढ़ने में कमजोर था न न बिल्कुल नही वो पढ़ने में तो बहुत अच्छा था लेकिन और लोग कोचिंगों में बहुत पढ़ रहे थे जाना तो वो भी चाहता था लेकिन उसे पता था कि उसकी दो बहनों की शादी होनी थी रिश्तेदारों के ताने पहले ही बहुत हो चुके थे तो मन मार कर संजय ने अपने दिल मे ही कोचिंग की बात छिपा ली।

समय धीरे धीरे कटता गया अब उम्र 22 पार हो चुकी थी यानी की संजय अब बहुत सी परीक्षाओं में बैठने के लिए भी योग्य नही बचा था।


अब किसी ने सलाह दी कि तुम ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दो ताकि कम से कम खुद का खर्च निकाल सको धीरे धीरे 1-2 करते करते 8 ट्यूशन संजय पढ़ाने लगा था पैसे अच्छे मिलते थे तो आर्थिक रूप से थोड़ा आराम मिला अब किताबो और अन्य संसाधन जो उसकी आमदनी में सुलभ थे उसे आसानी से मिल जाते। दिन में 3 बजे से लेकर रात के 9-10 बजे तक वह ट्यूशन पढ़ाता था और उसके बाद खुद रात के 3 बजे तक पढता था। फिर सुबह 8 बजे तक सोकर उठता और फिर 9 से 2 पढ़ता था यही उसकी आम दिनचर्या थी।


लगातार क्लर्क और अधिकारी लेवल के एग्जाम में 1-2 नम्बरो से बाहर होते होते अब ये संख्या लगभग अर्द्ध सैकड़ा पार हो चुकी थी। रिश्तेदारों ने तैयारी को लेकर ताने कसने शुरू कर दिए थे। लेकिन कभी भी माता पिता ने कुछ नही कहा कहते भी क्यों उन्होंने तो खुद ही करीब से संजय को संघर्ष करते देखा था

2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ युवाओं द्वारा चुनी सरकार सत्ता सम्भाल चुकी थी। युवाओं की उम्मीद थी कि अब कुछ तो बेहतर होगा ही उन्ही युवाओं में संजय ने अपनी तैयारी का दायरा बढा कर ट्यूशन कम किये और
तैयारी पर पुर जोर लगाना शुरू कर दिया। धीरे धीरे सरकार ने बड़े ऐतिहासिक फैसले लिए अन्य युवाओं की तरह संजय का विश्वास भी बढ़ रहा था कि इस सरकार में सबकी तरह उसका भी भला हो जाएगा। लेकिन हालात जस के तस रहे। उम्र अब 25 का आंकड़ा पार कर गयी थी पिता बूढ़े हो चले थे बहने जवान हो गयी थी उनकी शादी की चिंता ने माता पिता और संजय की रातों की नींदे उड़ा रखी थी।

एक दिन पड़ोस के शर्मा जी संजय के घर आये और चाय की चुस्कियां लेते हुए बोल बैठे क्यों संजय तुम्हरा अभी कही कुछ मामला बैठा नही बेटा??


"नही अंकल जी अभी तक तो नही लेकिन जैसे ही एग्जाम होंगे मेरा सलेक्शन हो जाएगा"-संजय

"चलो बढ़िया है लगे रहो हमारे यहां तो तीनों लग गए और देखो इनकी मौसी के लड़के भी लग गए तुम भी लग जाओगे" - पड़ोसी शर्मा जी



शर्मा जी की बात ने संजय के ह्रदय पर गहरा आघात किया। उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई खंजर लेकर उसके सीने में उतरता जा रहा हो। लेकिन वह चुपचाप ही अपने कमरे में जाकर बिना किसी को पता चले बिना आंसू के रोते हुए सो गया।


पिता जी भी अब संजय की पीड़ा को समझने लगे थे तो उन्होंने अपने जानने वालों से बात की उन्होंने संजय को डीएलएड (बीटीसी) करने की सलाह दी कहा कि इसमे बहुत स्कोप है एक बार में ही 70-80हजार भर्ती आती है सलेक्शन हो जाता है।
पिता की बात पर अमल करते हुए संजय ने डीएलएड का कोर्स शुरू कर दिया। कोर्स के दौरान नए मित्रो से मुलाकात और एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटी से तनाव से मुक्ति मिली।

सब कुछ सही जा रहा था लगने लगा था कि अब तो लाइफ सेट ही है कि अचानक से अंतरराष्ट्रीय खबरों में चीन से फैली महामारी कोरोना के विषय मे संजय को पता चला। लेकिन चिंता का विषय अभी नही था वो अभी भी सुंदर भविष्य के सपने सँजोता दीन दुनिया से बेखबर अपनी तैयारी में लगा था। अमेरिका, फ्रांस ,इटली ,चीन और अन्य देशों में मची तबाही की खबर वो लगातार पढ़ रहा था। फिर भी वो निश्चिन्त था कि भारत मे थोड़े ही कुछ बिगड़ने वाला है। 31 जनवरी 2020 को जब भारत मे पहला केस आया जिस समय संजय अपने डीएलएड के सेमेस्टर एग्जाम्स की तैयारियों में जुटा था। एग्जाम्स की डेट्स फाइनल होने वाली थी कि मार्च 22, 2020 को देश के प्रधानमंत्री द्वारा लॉक डाउन की घोषणा की गई।


यह शब्द देश के लाखों युवाओ की तरह संजय के लिये भी नया था। फिलहाल 14-21 दिनों की बंदी है पढ़ लेंगे बढ़िया ही है साथ ही रेलवे की डेट्स भी आने वाली है रिवाइज कर लूंगा की सोच के साथ संजय खुशी से लॉक डाउन के शुरुआती दिनों में समय काट रहा था। सब लोगो की तरह उसने भी खाली समय मे कुछ न कुछ नया बनाने की कोशिश की। धीरे धीरे कोरोना की स्थितियों में भयावरता आती गयी। अब संजय चिंता में डूबने लगा भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा था। न ही डीएलएड एग्जाम की कोई खबर आ रही थी न ही रेलवे की। दोनो ही तरफ से हाथ खाली थे। इधर लॉक डाउन में पिता जी की नौकरी भी छूट गयी कुछ दिन तो खाने पीने को कोई दिक्कत नही हुई किन्तु समय के साथ बचत की पूंजी खत्म होने लगी। और इसी के साथ संजय के माता पिता परेशान रहने लगे। समाचार पत्रों में अब 2 वर्ष कही 1 वर्ष सरकारी भर्ती नही होंगी की खबरें और कुछ अफवाहें भरी पड़ी थी जो संजय की चिंता को लगातार बढा रही थी।


लॉक डाउन खुला फिर एक दिन शर्मा जी का आगमन घर पर हुआ।

"कहो बेटा संजय क्या हाल है?"- शर्मा जी

"ठीक हूं अंकल"- संजय

"तुम्हारी तैयारी कैसी चल रही? बीटीसी का क्या हुआ तुम्हारी? "- शर्मा जी

"बढ़िया चल रही है। बीटीसी के सेमेस्टर एग्जाम होने है अभी लॉक डाउन हटे तो कुछ बात बने"- संजय


"तैयारी का करिहो बच्चा कुछ और देखो अब सरकार की नीति सत्यानाश है। खैर चलो अब ये तो कही सकत हो कि तुम्हारी तैयारी थी लेकिन कोरोना महामारी से उम्र निकल गयी नौकरी न मिल पाई। देखो हम पंचन का तो मौका ही नही मिला नौकरी नही आई।" - शर्मा जी (धूर्तता भरी हंसी के साथ)



"जी"- संजय

(शर्मा जी की बात संजय को कितना घायल कर गयी यह केवल संजय जानता था या उसका ईश्वर, संजय कमरे में गया और तकिया से मुँह छिपाकर फूट फूट कर रोया। दोपहर में खाना भी नही खाया। शाम को माता जी के बहुत कहने पर खाया तो लेकिन माता पिता के उतरे चेहरे उसे बहुत दुखी कर रहे थे। अपने कमरे में जाकर बैठा रहा रात के 2 बजे तक अपना जीवन व्यर्थ लगने लगा था। और उसने अपनी जीवन लीला समाप्त करने का मन बना लिया। छत पर पड़ी रस्सी को लाया और पंखे से लटका कर फंदा तैयार किया। माँ पिता और भाई बहन के अंतिम दर्शन कर के पानी पिया और चढ़ गया स्टूल चढ़ कर फंदा गले मे डाला और आंखों में आँशु भर कर स्टूल को धक्का ही दिया था कि दरवाजा तेजी से खुला और संजय के पिता ने संजय को पैर से पकड़ लिया

और बोले बेटा ऐसा बोझ मेरे कंधे पर मत डाल मैने कभी कहा नही लेकिन तू जैसा भी है मेरा अभिमान है। तुम कुछ भी न करना मैं तुम्हे बैठा के जिंदगी भर खिलाऊंगा लेकिन फिर ऐसा न करना। तुझे मेरी कसम......दोनो पिता पुत्र लिपट के खूब रोये....उनके आंसुओ के शायद संजय की तैयारी और सरकारी नौकरी का सपना बह गया.......






इस कहानी की कथावस्तु पूर्णतया काल्पनिक है जिसका किसी भी व्यक्तिगत जीवन से कोई सम्बन्ध नही है, किन्तु मुझे पूर्ण विश्वास है आप खुद में कुछ न कुछ प्रतिशत संजय के जीवन को पाएंगे। दोस्तों आप तैयारी में फेल होकर कई बार जिंदगी से हारने को ठान लेते है लेकिन सोचिए जब साल दो साल की तैयारी में फेल होने पर आपको इतनी तकलीफ होती है तो उन्हें कितनी होगी जिन्होंने आपको तैयारी के लॉयक बनाने में 20-25 साल कड़ी तपस्या की है।
सरकारी नौकरी ही जीवन नही है


जीवन के लिए सरकारी नौकरी है, सरकारी नौकरी के लिए जीवन नही है.......जय हिंद....✍️