सीमा पार के कैदी - 6 in Hindi Children Stories by राजनारायण बोहरे books and stories Free | सीमा पार के कैदी - 6

सीमा पार के कैदी - 6

सीमा पार के कैदी6

 

                              बाल उपन्यास

 

                             राजनारायण बोहरे

                               दतिया (म0प्र0)

 

6

      रात को आठ बजे ।

      अचानक ही इनके रूम का दरवाजा खटखटाया गया। अजय ने दरवाजा खोला। बाहर एक अपरिचित चेहरा मौजूद था। वह व्यक्ति भी अचकचा गया। अजय बोला- ‘‘कहो चचा, किसे चाहते हो।’’

      -‘’हे....हे......यहाँ तो जनाब फज़ल ठहरे हैं न। ’’ वह व्यक्ति हकलाया सा बोला। विक्रांत का नाम यहाँ फज़ल ही था। अजय बोला- ’’आईये...आईये...आप शायद फज़ल मियाँ, आप ही की तलाश में है, आप कासिद मियाँ है न ?

      -’’जी’’ हाँ जनाब।’’

      -’’कौन है भाई?’’   अन्दर से विक्रांत का स्वर गूँजा ‘‘ कासिद मियाँ हैं क्या ?’’

       ’’जी’’ ...जी जनाब । मैं ही हूँ।’’

            कासिद को अन्दर करके दरवाजा लगा दिया गया।

           

             चारों की चौकड़ी जमी। पहले दोनों शैतानों से परिचय हुआ। यानि अजय और अभय से। इसके बाद परिचय किया कासिद ने इन शब्दों में- ’’आपका परिचय तो हुआ, अब मेरा सुन लीजिये। मेरा नाम कासिद है और में यहाँ मिलिट्री में खानसामा हूँ, यानि खाना पकाता हूँ।’’

      -’’ इनका दूसरा परिचय में देता हूँ ’’विक्रांत बोला-’’यह हमारे देश के जासूस है।’’

      दोनों चौंके, राजनीति भी क्या खेल दिखाती है।

      कासिद मिंया ने उन तीनों को उनके नाम पते आदि के कागज दिये तो पता लगा कि यहाँ    अजय और अभय के नाम अकबर और सलीम थे, जबकि विक्रांत फज़ल नाम से ठहरा था। दोनों छोटे जासूसी के गुर सीख रहे थे, उन्हें हर काम कोैतुहल से भरा लग रहा था।

            विक्रांत की यात्रा का रहस्य कासिद और विक्रांत की आपसी बातचीत से खुला कि भारतीय सेना के अणुशक्ति  के केन्द्र के नक्शे किसी प्रकार भारत से बाहर आ चुके हैं, दूसरे देश उनको अमरीका भेजने जा रहा था, कि कासिद ने भारत खबर भेजी और किसी तरह वे नक्शे हासिल करने के लिए तत्काल विक्रांत को भेज दिया गया।

           एक्स और वाय की सुरक्षा उसमें जुड़गई तो एक पंथ दो काज हुए।

            चारों ने अपना अगला कार्यक्रम बनाया।

            अजय और अभय पर रिकॉर्ड रूम से फाइल का पता करने का काम सौंपा गया, जबकि विक्रांत और कासिद अपने काम में लग गये।

सीमा पार के कैदी

 

                              बाल उपन्यास

 

                             राजनारायण बोहरे

                               दतिया (म0प्र0)

 

           अगली सुबह-

            एक्स और वाय तैयार हुये दोनों ने पुराने फटे हुए कपड़े और चेहरों का गंदा सा बना लिया । कासिद के बताये अनुसार विदेश विभाग की इमारत की ओर चल दिये। कासिद ने यही शक किया था कि गिरफ्तार व्यक्तियों के बारे में जानकारी विदेश विभाग के रिकोर्ड रूम में ही मिल सकती है।

            विदेश विभाग की इमारत के सामने एक रेस्टोरेंट था।

            होटल से चलते समय अभय ने जो सस्ते से कपड़े पहन लिये थे वैसे होटलों में काम करने वाले बच्चे पहनते हैं। रेस्टोरेंट का मालिक गद्दी पर बैठा काम देख रहा था।

       अजय उसके पास पहुँचा, अभय दूर खड़ा रहा।

      -’’हुजूर ..... इनायत हो ’’.....। अजय ने सलाम बजाया।

      सेठ ने तिरछी नजर से देखा-’’ सलाम, चाहते क्या हो ?’’

      -’’हुजूर ..... बेकार हूँ....आपकी कृपा हो तो होटल पर काम मिल जाये।

      -’’हूँ.... पहले कहीं काम किया है।’’ ?

      -’’जी.... होटल अली बाबा में- मेरे बालिद मियाँ खानसामा हैं, उनके साथ वहीं काम किया है।

      -’’होटल अली बाबा।’’ अली बाबा का नाम सुनकर रेस्टोरेंट मालिक की आँखों में चमक उभरी ’’ क्या-क्या पका लेते हो ?’’

      -’’ पका तो सब लेता था, मगर पिछले दिनों भट्टी के सामने बैठने से नाक में खून आने लगा, खुश्की बड़ जाती है, इसलिये डॉक्टर ने मना किया है कि भट्टी के सामने दो महीनों तक मत बैठना। इसलिये केवल सामान तक्सीम कर सकता हूँ।’’ अजय बिना हिचक के बोल रहा था।

      रेस्टोरेंट मालिक पर रोब पड़ा था, इसलिये वह बोला- ’’कोई बात नहीं, इसी काम पर सहीं। ठीक ढंग से काम करना। लग जाओ काम कर ’’फिर उसने भीतर किसी को पुकारा-’’अरे ओ वशीर मियाँ, ये छोकरा काम पर लग गया है, ठीक से समझा देना दफ्तर दफ्तर में तहजीब से बोलेगा ड्रेस में ही भेजना।

      अजय होटल का बैरा बन गया। उसे नई वर्दी दी गई । दूर खड़ा अभय मुस्कराता रहा। लगता था होटल अलीबाबा का बड़ा नाम था इसलिये रेस्टोरेंट के सभी नौकर उसे आदर से देखने लगे थे। ’’

      निश्चित समय जब दफ्तर खुले।

      विदेश विभाग में चाय लेकर अजय को ही भेजा गया।

      तीन-चार-बार जाने पर उसने पतला लगा लिया कि रिकोर्ड रूम कहाँ है। पर    उधर चक्कर लगाने का सोच ही रहा था, कि चपरासी ने टोका-’’ ओ छोरे अबू रेस्टोरेंट से आया है क्या ?’’

      -’’ हाँ जनाव ’ अजय तहजीव से बोला।

      -’’देख चार चाय रिकोर्ड रूम में ले आना, मंजूर मियाँ ने मंगवाई हैं।’’

      - ’’ठीक है जनाव।’’

      और अगली बार अजय रिकोर्ड रूम में भी घूम आया। रिकोर्ड रूम के क्लर्क थे मंजूर अली। एक दम तलवार कट मूंछे और बड़े बाल रखते थे। पांव में जूती, बदन पर कुर्ता और पैजामा पहनते थे।

      मंजूर मियाँ को पहचानने के बाद अजय बाहर आया। अगली बार वह जब चाय ले गया तो बाहर बैठे चपरासी से गपशप शुरू की-’’ कहो जनाब, आजकल मंजूर मियाँ कहाँ रहते हैं। पहले तो फकीरा चौक पर रहते थे।’’

      -’’तू क्या वहीं रहता था।’’

      -’’ हाँ जनाब पड़ौस में ही रहता था।’’

      -’’वे वहाँ कभी नहीं रहे । वैसे आजकल तो वे नीम वाली पुलिया पर रहते हैं।

      - यानि पन्द्रह नम्बर वाली बस। ’’अजय को राजधानी का नक्शा तो पता नहीं था वह अंदाज से बोला।’’

      ‘‘ अरे नहीं यार, तेरह नम्बर वाली बस।’’ चपरासी बोला।

      अजय उठ गया। उसका काम हो चुका था।

      शाम तक काम करने का बहाना करता हुआ वह बाहर भीतर घूमता रहा ।

      शाम से कुछ पहले अभय यों ही घूमता हुआ रेस्टोरेंट में आया, एक केबिन को खाली देखकरर वह उसमें प्रविष्ट हुआ।

      आर्डर लेने के अंदाज में अजय भी पीछे लपका।

      वहाँ दोनों में बातचीत हुई। अजय ने दिन भर की कारगुजारी सुनाई, और क्लर्क मंजूर अली से फाइल और उसके रैक या अलमारी नम्बर आदि के बारे में तफ्शीस करने का काम अभय को सौंपा।

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