gwalior sambhag ke kahanikaro ke lekhan me sanskrutik mulya - 1 in Hindi Book Reviews by padma sharma books and stories PDF | ग्वालियर संभाग के कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य - 1

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ग्वालियर संभाग के कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य - 1

ग्वालियर संभाग के कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य 1
डॉ. पदमा शर्मा
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी
शा. श्रीमंत माधवराव सिंधिया स्नातकोत्तर महाविद्यालय शिवपुरी (म0 प्र0)

पुरोवाक्
कहानीकार विशिष्ट प्रतिभा सम्पन्न सामाजिक प्राणी होता है। समाज में भौगोलिक, सामाजिक पारिवारिक, आर्थिक, राजनीतिक सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के बीच उसका व्यक्तित्व निर्माण होता है और समाज में ही वह विभिन्न संस्कारों को ग्रहण करता है। व्यक्तित्व और कृतित्व परस्पर पूरक है। महान् कृतित्व महान् व्यक्तित्व से ही प्रसूत होता है। प्रत्येक लेखक किसी न किसी उद्देश्य से अनुप्राणित होता है। प्रत्येक लेखक किसी न किसी उद्देश्य से अनुप्राणित होता है। विभिन्न सोपानों से गुजरता हुआ वह अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है। ऐसा करते हुए संस्कृति के विविध पक्ष उसकी कथा में अनायास ही उतरते चलते है। किसी भी देश या राष्ट्र का प्राण उसकी संस्कृति है क्योंकि यदि उसकी संस्कृति नहीं तो संसार में उसका अस्तित्व भी नहीं ।
संस्कृति मानव इतिहास के बीते युग की और वर्तमान की रचना समग्रता है। संस्कार की निरंतर प्रक्रिया से वह हमें परिष्कृत करती है। हमारी संस्कृति समन्वित संस्कृति है, इसमें अन्य संस्कृतियों के समन्वय का गुण है। इस महान संस्कृति के हजारों वर्षो के इतिहास में बहुत बार ऐसा हुआ है कि भिन्न जाति या नस्ल के लोगों ने भारत पर आक्रमण किए और उनकी भिन्न संस्कृतियों ने भारतीय संस्कृति पर वर्चस्व करने के प्रयास किए। किन्तु भारतीय संस्कृति की महानता के सामने नतमस्तक होकर वे इसकी मुख्य धारा में शामिल हो गयी।1
मूल्य हमारे साहित्यशास्त्र में समाज कल्याण या मानव मात्र का कल्याण जैसे व्यापक अर्थ तक सीमित नहीं हैं। मूल्य या प्रतिमान वस्तुतः वे निकष है जिनके सहारे साहित्य को परखा जाता है। मनुष्य चूँकि व्यक्ति अर्थात इकाई है फिर वह बृहत्तर मानव समाज का, परिवार राज्य और संसार का सदस्य अंग भी है। वह विशेष होकर भी सामान्य है अतः उसका प्रत्येक विचार, कर्म और चिन्तन या कल्पना तक में मूल्य का प्रश्न महत्वपूर्ण है। हमारे विचारों से शब्द बनते हैं, शब्दों से कर्म, कर्मो के निरन्तर अभ्यास से आदतें अथवा स्वभाव की निर्मिति होती है और इन्हीं का संघात हमारा चरित्र है। चरित्र से ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है इस निर्माण प्रक्रिया में समसामयिक परिवेश और संस्कृति प्रभाव डालती है, साथ ही संस्कारों के परिवर्द्धन में भी सहायक होती है। तत्पश्चात् सांस्कृतिक मूल्यों का स्वरूप पूर्णता ग्रहण करता है।
.1. डॉ.परशुराम शुक्ल विरही-लोक संस्कृतिः अवधारणा और तत्व - भूमिका।

प्रस्तावना
1. भौगोलिक स्थिति
2. जनसंख्या एवं क्षेत्रफल
3. गिरि, सरितायें, वन एवं जलवायु
4. खनिज संसाधन, कृषि एवं उद्योग
5. सामाजिक संरचना
6. आर्थिक परिदृश्य
7. धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य
8. ग्वालियर संभाग की विभिन्न कलायें
(संगीत कला, चित्रकला, वास्तु एवं शिल्पकला)

9. विभिन्न जिलों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः

अ. ग्वालियर ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ब. शिवपुरी ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स. दतिया ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
द. गुना ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ई. अशोकनगर ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

संदर्भ सूची

अध्याय एक

ग्वालियर संभाग की भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों का विश्लेषण
प्रस्तावनाः

साहित्य जनमानस के हृदय का विकास है अतएव उसमें समाज का प्रतिबिम्ब भी परिलक्षित होता है। इतिहास देश के बाह्य परिदृश्य को उद्घाटित करता है जबकि साहित्य में उस देश के आभ्यंतरिक भाव भी सन्निहित होते है। अस्तु समाज की भी प्रतीति होती है इसीलिए किसी देश की वस्तुस्थिति को समझने के लिए वहाँ के साहित्य को समझना अत्यावश्यक है। साहित्य अपने देश के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य को प्रदर्शित करने में पूर्णतः सक्षम होता है। यह बात राज्य स्तर पर, संभाग स्तर पर और जिला स्तर पर भी खरी उतरती है। कहानी साहित्य तो और भी अधिक रुचिकर ढंग से समाज के समस्त क्रियाकलापों को चित्रित कर देता है। कहानी कितने ही रूपों में हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक काल में न केवल घुली मिली है अपितु प्राण वायु की तरह अनिवार्य जान पड़ती है। आज की गल्प यथार्थ की जमीन से आरंभ होती हुई लक्ष्य के साथ परिणति की ओर अग्रसर होती है।
लेखक ने अपने चारों ओर नाना प्रकार के मनुष्य, उनकी जीवन शैलियाँ, विविधतायें एवं परिस्थितियाँ देखी और उन्हीं में से उसे वे सभी कथ्य मिलते गये जो आज हमारे जीवन के सबसे ज्यादा निकट है । अन्य विधाओं की तरह कहानी साहित्य में भी तर्कसंगत मनोवैज्ञानिक तथ्य ,यथार्थ जीवन -सत्यों की व्यंजना तथा अंतर्द्वद्व के विश्लेषण के साथ - साथ मूल्यों की भी प्रतिष्ठा होती है। अपने कथ्य कलेवर में वह हमें कोई न कोई जीवनोपदेश से अभिहित कराती है। वह जीवन के किसी न किसी पहलू और तत्संबंधी क्रियाकलापों को व्यक्त करती है।
जहाँ जीवन है वहाँ समाज है और जहाँ समाज है वहाँ संस्कृति भी अवश्य है। संस्कृति सांस्कृतिक मूल्यों से प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जुड़ी रहती है। यही संस्कृति एवं सांस्कृतिक मूल्य हमारी पहचान बन जाते है जिन्हें कहानियों के माध्यम से भी उकेरा जाता है।
वर्तमान मध्यप्रदेश का ग्वालियर संभाग भौगोलिक अध्ययन केन्द्र के साथ - साथ साहित्यिक गतिविधियों एवं उन्नयन का स्त्रोत रहा है।
1
मनुष्य के क्रियाकलापों को उसका वर्तमान परिवेश आसपास का परिदृश्य एवं उनसे जुड़ी सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार एवं कार्य व्यापार प्रभावित करते हैं, कहानीकारों के लेखन एवं परिवेश के साथ-साथ भौगोलिक, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक पर सांस्कृतिक परिस्थितियाँ भी प्रभाव डालती हैं।
ग्वालियर संभाग का विश्लेषण निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर किया गया है।
1. भौगोलिक स्थितिः-
भारत उपमहाद्वीप के मध्य में स्थित ग्वालियर अंचल सन 1948 ई. तक ग्वालियर रियासत के नाम से विख्यात था। ग्वालियर नगर इस राज्य की राजधानी था। यह नगर 1948 ई. में निर्मित मध्य भारत प्रांत की राजधानी भी रही। वर्तमान में ग्वालियर जिला होने के साथ-साथ ग्वालियर संभाग मुख्यालय भी है। इसके चंबल क्षेत्र में भिण्ड,मुरैना,श्योपुर, है तथा ग्वालियर में ग्वालियर, शिवपुरी, गुना अशोकनगर तथा दतिया जिले सम्मिलित हैं।
भारत के केन्द्र में स्थित मध्य प्रदेश के उत्तरी शीर्ष पर स्थित ग्वालियर 250-34’ से 260-21’ उत्तरी अक्षांश एवं 770-40’ से 780-50’ पूर्वी देशांतर पर स्थित है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 292 मीटर है। ग्वालियर जिले के उत्तर में भिण्ड व मुरैना दक्षिण में शिवपुरी पूर्व में दतिया व पश्चिम में श्योपुर जिला मुख्यालय है।
ग्वालियर संभाग की सीमाएं राजस्थान एवं उत्तरप्रदेश राज्यों की सीमाओं को स्पर्ष करती है। इस संभाग के पूर्व में उत्तरप्रदेश राज्य झांसी, ललितपुर एवं जालौन जिले हैं तो पश्चिम दिशा में राजस्थान के बूंदी, कोटा एवं बारां जिले हैं इसकी उत्तरी सीमा राजस्थान के सवाई माधोपुर तथा दक्षिणी सीमा मध्य प्रदेश के राजगढ़, विदिशा और सागर जिलों की सीमाओं से मिलती है।
भौतिक संरचना की दृष्टि से वर्तमान म0प्र0 को निम्नलिखित भौतिक प्रदेशों में विभाजित किया गया है।
1. मध्यपद्रेश, 2. सतपुड़ा श्रेणी प्रदेश 3. पूर्वी पठार
मध्यप्रदेश के मध्यभारत का पठार के अंतर्गत ग्वालियर जिले की ग्वालियर तहसील, शिवपुरी जिले की शिवपुरी, पोहरी, कोलारस तहसीलें, गुना जिले की गुना व चाचौड़ा तहसीलें सम्मिलित हैं। ग्वालियर के दक्षिण से उत्तर पूर्व की ओर सेंवढ़ा तक की विजावर सीरीज को ग्वालियर सीरीज भी कहतें है, जो कड़प्पा क्रम के अंतर्गत आती है। विंध्यक्रम की चट्टानों का विस्तार गुना, पोहरी तहसीलों के पश्चिम भाग में तथा दक्षिण में ग्वालियर तथा शिवपुरी तहसीलों तक है। मालवा का पठार मध्यप्रदेश मध्य पश्चिम भाग में स्थित है। इस जिले का विस्तार गुना जिले में है।1

2. जनसंख्या एवं क्षेत्रफलः-
शहर क्षेत्रफल जनसंख्या
ग्वालियर 5214 वर्ग किमी. 1629881
शिवपुरी 10298 वर्ग किमी. 1441950
गुना 6484.63 वर्ग किमी. 838926
अशोकनगर 4673.94 वर्ग किमी. 6889920
दतिया 2691 वर्ग किमी. 6278182
(गुना $अशोकनगर की 2001 में जनसंख्या 1665578 थी 15.08.2003 को अशोकनगर अलग से जिला घोशित)
जिला ग्वालियर
1. गिर्द (ग्वालियर)
2. मुरार - 1,05,149
3. घाटी गाँव - 1,06,417
4. डबरा - 1,46,036
5. भितरवार - 1,32,52
जिला शिवपुरी
1. शिवपुरी - 1,10,279
2. कोलारस -87,216
3. करैरा - 1,37,205
4. नरवर - 1,28,483
5. पोहरी - 1,35,374
6. पिछोर - 1,18,414
7. खनियाधाना - 1,42,040
8. बदरवास - 1,04,111
जिला दतिया
1. दतिया - 1,62,084
2. सेंवढ़ा - 1,45,268
3. भाण्डेर - 1,02,643
जिला गुना
1. गुना - 1,34,314
2. बमौरी - 1,04,048
3. राधौगढ़ - 1,40,047
4. चाचौड़ा - 1,39,955
5. आरौन - 76,520
जिला अशोकनगर
1. अशोकनगर - 2,27,404
2. चंदेरी - 1,30,532
3. मुंगावली - 1,82,497
4. ईसागढ़ - 1,38,160
5. शाढ़ौरा नवीन तहसील3
3. गिरि सरितायें वन एवं जलवायुः-
ग्वालियर का अधिकांश भाग पथरीले पर्वतों एवं पठारों से युक्त है यह पर्वत घने वनों से आच्छादित है। इस क्षेत्र में बहने वाली नदियाँ कुछ इस प्रकार बहती हैं जिससे इसकी प्राकृतिक भौगोलिक सीमायें निर्मित हो जाती हैं। उत्तर पश्चिम में बहने वाली चम्बल नदी इसकी प्राकृतिक सीमा बनाते हुए इसे राजस्थान व उत्तरप्रदेश से पृथक् करती है वहीं पार्वती, सिंध एवं बेतवा नदियाँ भी हैं।
ग्वालियर के उत्तरी भाग में चम्बल एवं यमुना के विशाल कछार है। दक्षिण भाग में श्योपुर-शिवपुरी के घने जंगल एवं ईसागढ़ क्षेत्र की उपजाऊ बलुआ भूमि है।
यहाँ अनेक छोटी-बड़ी पर्वत श्रेणियाँ हैं बड़े-बडे़ और गहरे भरके व खड्डे हैं सम्पूर्ण क्षेत्र प्रायः ककरीला पथरीला है। यह भू-भाग ऊश्ण कटिबंधीय पेटी के अंतर्गत परिभाशित किया गया है।
ग्वालियर संभाग के जिलों में भिन्न प्रकार की जलवायु दशायें हैं। यहाँ की जलवायु मानसूनी है। कर्क रेखा म.प्र. के मध्य भाग से गुजरती है। 21 मार्च के बाद सूर्य उत्तरायण होने लगता है। अतः प्रदेश गर्म होने लगता है। सूर्य की किरणें लम्बवत् होती जाती हैं तथा 21 जून को कर्क रेखा के निकट सूर्य लम्बवत् होता है। मई माह में ग्वालियर का तापमान अधिक होता है।
अधिकांश वर्शा जून से सितम्बर के मध्य होती है। यह वर्शा उन हवाओं द्वारा होती है जिन्हें दक्षिण-पश्चिमी मानसून कहते हैं। दिसम्बर-जनवरी में कुछ वर्शा चक्रवातों से होती है। अन्य महीनों में कम वर्शा होती है। मानसून की वर्शा बंगाल की खाड़ी और अरब सागर दोनों क्षेत्रों से उठने वाली हवाओं से होती है।
आम, महुआ, सागौन, नीम, इमली, जामुन, खजूर, तेंदू, आंवला, हरड़, बहेड़ा, बेर, बबूल, इत्यादि के वृक्ष यहाँ पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त जंगलों में अनेक प्रकार की घास पायी जाती है। अनेक दुर्लभ जड़ी बूटियाँ इन जंगलों में उपलब्ध हैं। गौंद, अचार, आंवला सालबीज, जंगली तुलसी, हरड़, बहेड़ा सलाई जैसे वनोपज यहाँ प्रचुर मात्रा में हैं।
काली मिट्टी गुना-शिवपुरी में, जलोढ़ मिट्टी ग्वालियर शिवपुरी में, कछारी मिट्टी ग्वालियर एवं पोहरी में है। यहाँ से उत्तर पूर्व की ओर बहने वाली सिंध नदी है। पार्वती एवं महुअर नदी दायें एवं वायें, किनारे पर परवई के पास मिलती है। पार्वती नदी पर ककेटा बांध बनाया गया है। पोहरी के कुछ भू-भाग में कूनों नदी एवं शिवपुरी के पूर्व में कुंवारी नदी बहती है।4
एक समय था इस भू-भाग में जंगली पशुओं का आधिपत्य था पर वनों में कमी होने के कारण अब वन्य प्राणी भी लुप्त होते जा रहे हैं।
4. खनिज संसाधन कृषि एवं उद्योगः-
ग्वालियर संभाग खनिज संसाधनों की दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। शिवपुरी-गुना-ग्वालियर में पत्थरों की खदानें हैं। मुरम, गेरू, खड़िया, पीली मिट्टी प्रायः सभी जिलों में पायी जाती है। ग्वालियर के पास चीनी मिट्टी भी पायी जाती है।
संभाग में दो प्रकार की फसलें रबी और खरीफ होती हैं। रबी फसलों में गेहूं, मटर, मसूर, चना, राई और जौ प्रमुख हैं। गुना जिले में चना अधिक होता है। ज्वार बाजरा, मक्का, धान, सोयाबीन आदि खरीफ फसलें हैं।
इन फसलों के अतिरिक्त गन्ना, शकरकन्द, आलू, मिर्च, अरबी, आदि की फसलें भी होती हैं। गुना और शिवपुरी जिलों में उड़द, मूंग तथा मूंगफली की फसल प्रचुर मात्रा में होती है।
यहाँ की जनता का प्रमुख व्यवसाय कृशि एवं पशुपालन है। ग्वालियर में अनेक छोटे-बडे कारखाने हैं । गुना में गैस संयंत्र है तथा साइकिल इण्डस्ट्री है। अशोकनगर जिले के चंदेरी की साड़ियाँ प्रसिद्ध हैं।
नया गाँव ग्वालियर में चीनी मिट्टी पायी जाती है। ग्वालियर में संगमरमर (रंगीन) एवं गेरू पाये जाते हैं। उद्योग धंधों में ग्वालियर लैदर फैक्ट्री एण्ड टेनरी ग्वालियर की 1958 में स्थापना हुयी जिसमें जूते तम्बू एवं त्रिपाल बनते हैं। यहाँ की पोटरीज में चीनी के बर्तन बनते हैं कागज उद्योग एवं दियासलाई के डिब्बे बनाने के कारखाने हैं। सूती वस्त्र उद्योग एवं कृत्रिम रेशों में कपड़े बनाने के कारखाने हैं।
शिवपुरी में सीसा बैराइट डायस्पोर हैं, यहाँ कत्था बनाने का कारखाना एवं तेल मिल भी हैं। चंदेरी के हस्तशिल्प की साड़ियाँ विश्व प्रसिद्ध हैं। दिनारा तथा सतनवाड़ा के विजरावन, नरवर एवं कोलारस में तांबा पाया जाता है। सीसा करैरा के मानपुर में पाया जाता है। कोलारस एवं पिछोर में बहने वाली नदियों के समीप अल्प मात्रा में सोना पाया जाता है। कुछ स्थानों पर लेटराइट की चट्टानों में बॉक्साइड, विध्यं चट्टानों में लाम स्टोन, जैतपुर में मरकरी पाई जाती है। यहाँ पत्थर की खदानें बहुतायात में है। मत्स्य पालन एवं दुग्ध उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है। बीड़ी बनाने का कार्य भी यहाँ हेाता है। यहाँ जड़ी -बूटी संस्थान भी है।5
5. सामाजिक संरचना:-
ग्वालियर संभाग में सामान्य जातियों के अतिरिक्त आदिवासी जातियाँ भी रहती हैं। ब्राह्मणों में सनाढ्य कान्यकुब्ज एवं जुझौतियाँ हैं । क्षत्रियों में बुन्देला, भदौरिया, रघुवंशी तोमर, सिकरवार, सेंगर, कछवाहे, बैस, रावत आदि हैं तो वैश्यों में जैन, अग्रवाल, गहोई आदि हैं। अन्य जातियों में घोसी, कुर्मी, दांगी, गूजर, जाट, किरार लोधी, अहीर, कायस्थ, सोनी, भाट, जोशी, ढीमर, तेली, धोबी, बढ़ई, काछी, चमार, बसोर एवं मेहतर आदि हैं। मुसलमान, ईसाई, सिंधी, एवं बौद्धों का निवास भी इस भू-भाग पर है। शिवपुरी तथा गुना जिलों में सहरिया और भीश्म जाति के लोग अधिक है। इस क्षेत्रों में अभी भी पर्याप्त चेतना का अभाव है। जातिगत मोह के बन्धन में अब भी यहाँ का जन-जीवन पिछड़ा हुआ है।
मध्य प्रदेश में पंचायती राज की स्थापना से एक क्रांतिकारी युग का प्रारंभ हुआ। दलितों और स्त्रियों को राजनीति में सत्ता की भागीदारी प्राप्त हुयी। निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार प्राप्त हुए। परिणामतः ग्रामों का शान्त वातावण उद्वेलित होने लगा। गाँवों के चौपाल षडयंत्रों के केन्द्र बन गये। फलस्वरूप सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन परिलक्षित होने लगा।
यहाँ की सामाजिक संरचना मिश्रित है जो किसी एक संस्कृति को प्रदर्शित नहीं करती। ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी और गुना जिले का कुछ भाग बुन्देली संस्कृति से प्रभावित है। गुना में मालवी संस्कृति के अधिक दर्ष न होते हैं।
दो दशक पूर्व इस संभाग स्त्रियों की स्थिति अधिक अच्छी नहीं थी। वे घर की चहारदीवारी में बन्द रहती थीं। कुछ स्थानों पर कन्या को जन्मोपरांत ही मार दिया जाता था। अब भू्रण परीक्षण के प्रारंभ होने से कन्या भू्रण में ही खत्म करने के मामले प्रकाश में आने लगे। यहाँ पितृ सत्तात्मक व्यवस्था है। घर का मुखिया या पुरूष सदस्य कमाते थे। स्त्रियाँ पर्दा-प्रथा में जकड़ी थीं। वे घर के बाहर आर्थिक संसाधन जुटाने नहीं निकलती थीं। लेकिन यह विधान निम्न वर्गीय परिवार की स्त्रियों पर लागू नहीं होता था। कालान्तर में मध्यमवर्गीय परिवार की स्त्रियाँ भी नौकरी में पदार्पण करने लगी।
नारी की स्वतंत्रता के साथ ही उस पर लगे तमाम बंधन टूट गये। वह स्वावलम्बी होने लगी। विवाह के प्रतिमान बदलने लगे, सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ मूल्यों में परिवर्तन आना स्वाभाविक प्रक्रिया है। पाश्चात्य संस्कृति भी शनैः-शनैः घर-घर में प्रवेश कर गयी। मानव भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृति के बीच विचरण करनेे लगा।
6. आर्थिक परिदृश्यः-
ग्वालियर संभाग आर्थिक दृष्टि से अधिक समृद्ध नहीं है यहाँ प्रति व्यक्ति की आय राष्ट्रीय औसत से कम है। आर्थिक दृष्टि से जो लोग सम्पन्न हैं उनका यहाँ के आर्थिक संसाधनों पर एक छत्र अधिकार है। यहाँ मध्य वर्ग का आधिक्य है किन्तु वह आर्थिक रूप से सृदृढ़ नहीं है। निम्न वर्ग की स्थिति कुंआ खोदकर प्यास बुझाने जैसी है। इस संभाग में बेरोजगारों की संख्या अधिक है ग्वालियर में जे.सी. मिल बन्द होने से, तथा शिवपुरी में पत्थर की खदानों का काम बन्द होने से बेरोजगारी अधिक बढ़ गयी है। तांगा एवं रिक्शा चालक की भी यही स्थिति है। बेरोजगार दो प्रकार के हैं एक तो शिक्षित बेरोजगार जो उच्च शिक्षित होकर भी नौकरी प्राप्त नहीं कर पाये, दूसरे वे जो शिक्षित एवं प्रशिक्षित नहीं हैं और श्रम को धनोपार्जन में व्यय नहीं कर पाते।
गाँवों में पारिवारिक विघटन के साथ-साथ जमीन कई हिस्सें में बंट गयी है जिससे उर्वर भूमि में कमी आ गयी। दूसरी ओर ग्रामीण युवा शक्ति मेहनत कर कृशि से परे सफेद पोश कामों की तलाश में शहर की ओर पलायन करने लगे।
7. धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्यः-
किसी भी देश की संस्कृति उस क्षेत्र विशेष की आत्मा होती है। ग्वालियर संभाग की संस्कृति भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत है। कर्मवाद, पुनर्जन्म, धर्मदर्ष न, अध्यात्म, आस्था, विश्वास जैसी सांस्कृतिक स्थितियाँ यहाँ देखने को मिलती हैं। अपनी मान्यतानुसार हिन्दू ईश्वर के रूप में रामकृष्ण, शिवपार्वती, हनुमान, देवी दुर्गा, गणेश के साथ-साथ सूर्य एवं चन्द्रमा की भी पूजा करते हैं। सिख, मुस्लिम एवं ईसाई धर्मावलम्बी भी अपने धर्म के अनुसार धर्माचरण करते हैं। इस क्षेत्र में बौद्ध धर्मावलंबी कम हैं। यहाँ धार्मिक सदभाव गहराई तक हैं। अन्य क्षेत्रों की भँभाति यहाँ भी वेद, पुराण उपनिशद् तथा रामायण, रामचरितमानस तथा श्रीमद् भागवत, गीता का अध्ययन मनन एवं चिन्तन किया जाता है। इन ग्रंथों में से रामचरितमानस प्रायः हर हिन्दू घर में उपलब्ध है। मुस्लिम कुरान शरीफ, सिक्ख गुरूग्रंथ साहब तथा ईसाई बाइबिल को सम्मान देते हैं।
संस्कृति के दूसरे पक्ष के रूप में जन सामान्य के आदर्श , रीति-रिवाज परम्पराऐं भी विद्यमान हैं। सम्बोधन, अभिवादन, आचार-विचार, खान-पान, रहन-सहन सभी सांस्कृतिक मूल्यों में निरन्तर परिवर्तन होता जा रहा है क्योंकि प्रत्येक युग के बदलते परिवेश में बदले हुए मूल्यों के कारण संस्कृति में परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन संस्कृति जड़ वस्तु नहीं है उसे गतिशील प्रक्रिया में ग्रहण करना उचित है। हर जनपद की एक निजता होती है, एक विशिष्ट पहचान बनती है।6 पर जब इन गतिशील प्रक्रिया में जड़ता आ जाती है तो लोक संस्कृति का यही स्वरूप अंधविश्वास बन जाता है। इस अंचल की लोक संस्कृति इससे अछूती नहीं है।
लोक मान्यताओं के आधार पर लोक देवताओं की पूजा इस क्षेत्र में भी प्रचलित है। तमोगुणी देवों में भैंसासुर बाबा, मशान बाबा, घटोइया बाबा आदि की पूजा प्रचलित है। हरदौल, ठाकुर बाबा, कारसदेव, ग्वालाबाबा आदि के प्रति भी यहाँ के जनमानस में पर्याप्त श्रृद्धा है। भारतीय संस्कृति के प्रायः सभी तत्व यहाँ दृष्टि गोचर होते हैं। छोटों के द्वारा बड़ों को सम्मान, अभिवादन एवं चरण स्पर्ष करना, उम्र के हिसाब से चाचा, ताऊ, बुआजी तथा भैया एवं चाची, ताई, अम्मा और भाभी जी, दीदी आदि सम्बोधन दिये जाते हैं। पर बदलती संस्कृति में ये भावनात्मक संबोधन अंकल और आण्टी में सिमटकर रह गये हैं।
पर्व एवं उत्सव सभी धर्मावलम्बी आपस में मिलजुलकर मनाते हैं। परस्पर आंमत्रित करते हैं। इस संभाग के दतिया, शिवपुरी तथा गुना जिले के कुछ भाग में बुन्देली संस्कृति का पूर्ण प्रभाव है। इन क्षेत्रों में हरछट (हलशश्टी), मोराई छठ, हरितालिका व्रत, महालक्ष्मी, सन्तान सप्तमी आदि पर्वों के साथ-साथ नौरता, आसरानी, गड़ारानी, मामुलिया जैसे पर्व मनाये जाते हैं। ब्रज संस्कृति के प्रभाववश शिवपुरी जिले के बदरवास एवं कोलारस तहसीलों में तथा दतिया जिले में राधा अष्टमीधूमधाम से मनायी जाती है। राजस्थानी संस्कृति के प्रभाव स्वरूप ग्वालियर गुना, अशोकनगर शिवपुरी में गणगौर का पर्व मनाया जाता है। शिवपुरी जिले के कोलारस तहसील के ग्राम बेंहटा का गणगौर उत्सव पूरे संभाग में प्रसिद्ध है। दतिया, अशोकनगर अपने दशहरे के लिये प्रसिद्ध है। अशोकनगर और ग्वालियर में राखी के दूसरे दिन भुजरियों का मेला भी बड़े उत्साह पूर्वक भरता है। ग्वालियर में रामलीला, गुना के खानावद गाँव में तेजा जी का मेला, चंदेरी में जोगेश्वरी देवी का मेला, ग्वालियर, गुना तथा आसपास के गाँव में हीरा भूमिया का मेला, शिवपुरी के सांवरा में पीर बुधान का मेला, शिवपुरी में सिद्धेश्वर मेला, तथा दतिया के सेंवढ़ा में सनकुंआ मेला प्रमुख है।
8. ग्वालियर संभाग की विभिन्न कलायेंः-
ग्वालियर संभाग में विभिन्न कलाओं के दर्ष न होते हैं जिनमें संगीत कला, वास्तु एवं शिल्पकला आदि प्रमुख हैं।
अ. संगीतकला - मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता ने ग्वालियर को संगीत का संगम स्थल कहा है। कला संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम है चित्रकला, वास्तुकला, शिल्पकला, संगीत एवं काव्य आदि कलाओं के द्वारा देश एवं क्षेत्र विशेष की संस्कृति का ज्ञान होता है। तानसेन और बैजू बावरा ग्वालियर के ऐसे रत्न हैं जिन्होंने संगीत कला को पूर्णता प्रदान की। संगीताचार्य स्वामी हरिदास की तपोभूमि भी यहाँ रही है। 15वीं सदी के तोमर शासक मानसिंह तोमर ने ग्वालियरी शैली गायन को स्थापित किया व सम्पूर्ण भारत में उसे लोकप्रिय बनाया मानसिंह स्वयं कुशल संगीतकार, रचयिता, चित्रकार एवं गायक थे। इन्होंने विष्णु पद की कठिन गायकी को धु्रपद के माध्यम से कोमल व सरल बनाया था। इनके द्वारा मानकुतुहल नामक एवं संगीत ग्रंथ की रचना का उल्लेख भी मिलता है। मानसिंह के समय ग्वालियर में एक विशाल संगीत सम्मेलन किये जाने का भी उल्लेख मिलता है। मानसिंह ने ग्वालियर में संगीत विद्यालय की भी स्थापना की।7 आइना-ए-अकबरी के लेखक अबुलफजल ने लिखा है कि राजा के चार कलाकारों ने जिनके नाम नायक, बख्शू, नच्चू एवं भानू थे ने ऐसे गीतों का संकलन किया था जो सभी वर्गों के अनुकूल थे। इन कलाकारों ने विख्शू की मल्हार, घोन्डिया की मल्हार एवं चरजू की मल्हार आदि मल्हारों का सृजन ग्वालियर में ही किया।
राजा मानसिंह की गूजरी रानी मृगनयनी भी संगीत कला में निपुण थी। गूजरी रानी ने अनेक राग-रागनियों का आविश्कार किया जिनमें गूजरी टोड़ी और मंगल गूजरी प्रमुख हैं, हालांकि विद्वानों के वर्ग के मतानुसार इन रागों की उत्पत्ति रानी गूजरी ने नहीं वरन् राजा मानसिंह के दरबारी गायक वैजनाथ (बैजू) ने की थी और उन्हें रानी का नाम दे रखा था। राजा मानसिंह का राज्यकाल सन 1486 से 1516 तक रहा है इनका समय कला सम्वर्द्धन के लिए स्वर्णयुग रहा है इनके समय में स्थापित ध्रुपद और कमार की गायकी और ग्वालियर का विद्यापीठ जिसके शिष्य तानसेन थे, भारत भर में प्रसिद्ध रहा है।8
ग्वालियर घराने की विशेषता उसकी विभिन्न संगीत शैलियाँ अर्थात् ध्रुपद, धमार, ख्याल, टप्पा, ठुमरी-दादरा, लेदा, गजल, तराना, त्रिपट एवं चतुरंग है। यहाँ के सूफी संतों ने भी गायन की शैलियों को आत्मसात किया।
तानसेन ने अपनी संगीत साधना द्वारा भारतीय संगीत में अनेक रागों को जन्म दिया। इन्होंने मल्हार राग में गंधार एवं दोनों प्रकार के निशाद का मिश्रित प्रयोग कर मियां मल्हार राग का निर्माण किया। राग रागनियों को संशोधित कर, संगीत की सीमा को केन्द्रित किया। ईरानी संगीत का मिश्रण कर अनेक रागों के रूपों को निर्मित किया। अकबर के दरबार में नवरत्न के पद को सुशोभित करते हुए रागमाला नामक संगीत ग्रंथ का निर्माण किया तथा भारतीय संगीत के क्षेत्र में संगीत को एक नयी दिशा दी और एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया।9
तानसेन की समाधि स्थल पर प्रतिवर्ष अखिल भारतीय तानसेन संगीत समारोह आयोजित किया जाता है। आइना-ए-अकबरी के अनुसार अकबर के दरबार के महान 36 गायकों में 16 गायक ग्वालियर के ही थे दौलतराव शिन्दे (1794-1827 ई.) के दरबारी गायक बड़े मुहम्मद खां उस समय के माने हुए गायक थे उनके शिष्श्यों में हददू खां, हस्सू खां एवं नत्थू खां प्रमुख थे। इन्होंने कलावन्त एवं कब्बाली शैली के मिश्रण से नई शैली के ख्याल का आविष्कार किया था। जयाजीराव शिन्दे (1843-1886 ई.) के शासनकाल में इनके शिष्य वंशजों में बाबा दीक्षित, छोटे मोहम्मद, नब्बू खां वाला साहेब, निसार हुसैन रहमत खां एवं हुसैन खां ने बहुत ख्याति प्राप्त की। इनके अतिरिक्त बामन बुआ व शंकर पण्डित उनके पुत्र कृष्णराव पण्डित, राजा भैया पूंछवाले आदि ने ग्वालियर घराने के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सरोदवादन में उस्ताद हाकिमअली खान एवं अमजदअली खान परिवार का बहुत योगदान रहा है।
दतिया भी संगीत कला का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। दतिया जनपद में संगीत प्रणेता के रूप में आचार्य कोहल का नाम लिया जाता है। आचार्य कोहल संगीत के प्रकाण्ड पण्डित थे और भरत नाट्य शास्त्र में चौथी शताब्दी में इन्हें उच्चकोटि का संगीतज्ञ उल्लिखित किया गया हैं। .....संगीत का विधिवत् रूप महाराज विजय बहादुर के शासनकाल से प्राप्त होता है तथा महाराज भवानी सिंह के समय में यह कला अपने चरमोत्कर्ष पर थी। महाराज विजयबहादुर सिंह ने अपने शासनकाल में गोविन्दजी के मंदिर का निर्माण करा कर श्री राधाकृष्ण की युगलमूर्ति के समक्ष नियमित रूप से विष्णुपद गायकी की व्यवस्था की थी। पं. गयाप्रसाद नगार्च को उसका मुखिया नियुक्त किया गया था अन्य गायकों में लल्ला तिवारी, गणेश प्रसाद रावत, किशोरी लाल नगार्च एवं रामलाल पखावजी के नाम उल्लेखनीय है।10 दतिया के ही कुदउ सिंह महाराज का नाम पखावज वादन के क्षेत्र में अत्यंत प्रसिद्ध हैं। आधुनिक संगीतकारों में महाराज िसह, महमूद खां, रामकृष्ण त्रिवेदी, रामकुमार भट्ट, सीताराम भट्ट, घून्नू उस्ताद, रामप्रसाद पण्डा उस्ताद आदिल खां आदि के नाम उल्लेखनीय है। सेवढ़ा के उस्ताद नत्थू खां एवं दिगवां के नाथूराम वर्मा ख्याल ठुमरी गायन में अपना दखल रखते थे।
ब. चित्रकलाः-
ग्वालियर में भित्ति चित्रकला के बहुआयामी उदाहरण देखने को मिलते हैं। यहाँ चार प्रकार की भित्ति चित्रकला दिखाई देती है। प्रथम मुगलपूर्व, द्वितीय मुगलकालीन, तृतीय राजपूत या राजस्थानी कलम, चतुर्थ मराठाकालीन या ग्वालियर कलम। मुगलपूर्व के भित्ति चित्रकला में तोमर कालीन जैन गुफायें, मानमंदिर, गूजरी महल, विक्रम मंदिर एवं बादलगढ़ के भवनों में यह कला दर्ष नीय है। मुगलकालीन चित्रों में मोहम्मद गौस के मकबरे की छत पर गलीचा शैली, राजपूत अथवा राजस्थानी कलम के चित्र सराफा बाजार के जैन मंदिरांे एवं वैश्णव मंदिरों में टेम्परा विधि के रंग देखने को मिलते हैं। इन मंदिरों में श्वेताम्बर जैन मंदिर बड़ी सहेली जैन मंदिर, चम्बाबाग जैन मंदिर एवं बालाजी माहेश्वरी समाज मंदिर तथा मोती महल के कुछ कक्षों में है। मराठा शासकों द्वारा यहाँ 1810 ई. के उपरांत भवनों, महलों एवं छतरियों का निर्माण हुआ। चतुर्थ प्रकार के रूप में चित्रों में रिलीफ जड़ाउ जेवर, शिवमंदिर, दशहरा, दृश्य शिकार गाथा राग रागनियाँ आदि विधायें हैं। ग्वालियर कलम के सुन्दर उदाहरण मोती महल कम्पू कोटी एवं सिंधिया शासकों की छतरियों में देखने को मिलते हैं।
ग्वालियर चितेरा शैली की चित्रकला जो एक लोक कला के रूप में झांसी के पतन के उपरांत यहाँ वे चितरे बस गये थे, इनके द्वारा बनाये गये चित्र गोरखी महल में देखने को मिलते हैं। इन चितेरों के वंशज आज भी चितेरा ओली, मोहल्ले में निवास करते हैं।
चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में दतिया में चित्रकला का विकास हुआ। यहाँ की चित्रकला दतिया कलम के नाम से जानी जाती है। लखनऊ के संग्रहालय में दतिया कलम के नाम से एक अलग गैलरी स्थापित है।11 भारतीय कला के प्रख्यात विद्वान् आनन्द कुमार स्वामी ने राजस्थानी शैली का क्षेत्र राजपूताना और बुन्देलखण्ड माना है। बुन्देलखण्ड में ओरछा और दतिया दो केन्द्र स्थापित हुए। इन कलमों में रागमाला चित्रों का महत्वपूर्ण स्थान है। बुन्देलखण्ड में दतिया और ओरछा में बड़े सुन्दर चित्र बनाये गये। इनमे बड़ी सूक्ष्म अलंकारी कला है। भावनाओं का सुन्दर मुद्राओं द्वारा प्रस्तुत करने का भी कलाकारों ने प्रयास किया। इस शैली के अंतर्गत रागमाला चित्रों की बड़े व्यापक स्तर पर रचना हुई दतिया के किले के एक कमरे (जिसे असाव कहते हैं) में दतिया नरेशों के बड़े प्रभावशाली भित्ति चित्र बने हैं । दतिया की इन व्यक्ति चित्रों की परम्परा के अतिरिक्त यहाँ राजस्वामी का राजपूत शैली के अनुरूप रागमाला बारहमासा पर आधारित चित्र भी हैं। दलपतराव के प्रपोत्र शत्रुजीत के व्यक्ति चित्र दतिया संग्रह में देखे गये हैं। ओरछा के लक्ष्मीनारायण मंदिर और किले में भित्ति चित्रों का बहुत बड़ा भण्डार है।12
राजा परीक्षत की मृत्युपरान्त उसके सुपुत्र विजय बहादुर के दतिया कलम के माध्यम से स्थानीय कलाकारों द्वारा उनकी समाधि में श्रीमद्भागवत के सम्पूर्ण प्रसंगों को चित्रित कराया। समाधि की बड़ी गुम्मद के उपर बड़े-बड़े और अप्सराओं के चित्र अंकित हैं। उसके बाद कलिया मर्दन करते, वस्त्र हरण करते, कंसवध एवं गीता ज्ञान देते श्रीकृष्ण सुख सागर, प्रेमसागर की कथाएँ तथा रामकथा के भी चित्र अंकित हैं। दशहरे का वर्णन, नायिका भेद चित्रण, मल्ल युद्ध चित्रण, शिकार चित्रण, राम विदाई सीता तथा अन्य वधुयें बुन्देलखण्डी दुल्हन की वेशभूशा में चित्रित हैं। बारादरी में सामूहिक श्रमदान का चित्र है जिसमें औंरतें सिर पर तसले रखे दिखाई गयी है। बालक कृष्ण गोवर्धन उठाये है, बकरियाँ गाय-भैसें बैठी हैं, सुस्ताये से गोप भी बैठे हैं, एक ओर खाना पकाया जा रहा है।13
शिवपुरी जिले में भी अनेक स्थलों पर सुन्दर चित्रांकन है। पोहरी, नरवर, खनियाधाना, कोलारस, सुरवाया, करैरा, एवं दिनारा स्थानों के किलों, बावड़ियों, गढ़ियों एवं पुराने महल हवेलियों की भित्ति पर सुन्दर चित्रांकन है। शिवपुरी माधव राष्ट्रीय उद्यान में चुडै़ल छज्जा नामक स्थल पर चित्रित शैलचित्र विष्णु के निश्ठावान अनुयायी के शिवपुत्र शिवकाशी के चित्रों की श्रृंखला बेहद महत्वपूर्ण है। यहाँ कुछ चित्र ब्रह्मलिपि के हैं, ये सभी चित्र ई.पूर्व 2000 से लेकर 10000 साल पुराने हैं। इन चितेरों ने चुडै़ल छज्जा, चूना खो और टीला में वन्य प्राणियों मवेशियों, पेड़ों, पहाड़ों के अलावा त्रिशूल, धनुशबाण और लकड़ी के हथियारों से प्राणी का शिकार करते हुए चित्रों का भी अंकन किया है। अतीत की स्मृतियों और भविश्य की लाल्साओं से युक्त व निर्लिप्त इन शैलाश्रम वासियों ने चूना खो में प्रेतबाधा दूर करते हुए और विभिन्न कर्मकाण्डों का भी सजीव चित्रण किया है। इन गुहाचित्रों में चीतल, नीलगायें, बकरी, गाय, काला हिरण, हाथी, बाघ, तेंदुआ, घोड़ा और जंगली कुत्ते, बिल्लियों के भी चित्र बड़ी संख्या में हैं। गाड़ी, तलवार, बाल और घुड़सवार के भी सुन्दर चित्र हैं।14 गुना जिले में चंदेरी से 2 किमी. की दूरी पर दक्षिणांचल में खंदारगिरी है। यहाँ 13वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक की विशाल शैल प्रतिमायें बनी हुई हैं।
स. वास्तु एवं शिल्पकलाः-
ग्वालियर संभाग वास्तु एवं शिल्पकला की दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न हैं। यहाँ के सेंकड़ों किले तथा गढ़ियाँ में कलात्मक मंदिर, विशाल मस्जिदें, गुरूद्वारे, एवं मनमोहक तथा धातु की प्रतिमायें आज भी इस भू-भाग की स्फटिक समृद्धि के द्योतक हैं। यह भू-भाग श्रमण संस्कृति का भी केन्द्र रहा है।15
ग्वालियर नगर गोपाचल के नाम से विख्यात था, यह गालव ऋषि की तपोभूमि रहा है। महाभारत काल के पूर्व से ही यहाँ वास्तुकला उन्नत रही है। चेदि देश (चंदेरी) में राजा शिशुपाल का किला एवं नखपुर (नरवर) स्थित महाराज नल का किला उस समय की वास्तुकला के अद्भुत् नमूने हैं। यद्यपि समयानुसार उनमें अनेक परिवर्तन होते रहे हैं शिवपुरी जिले में सुरवाया नरवर, पोहरी, पिछोर, खनियाधाना आदि स्थलों पर अनेक मंदिर किले एवं गढ़ियाँ बने हुए हैं। इसी जिले के अरणिपद्र (वर्तमान में रन्नौद) नामक स्थान पर बना मठ (खोखईमठ) शिल्पकला की दृष्टि से बड़े महत्व का है। यह 132 फुट 4 इंच लम्बा तथा 106 फुट 5 इंच चौड़ा है। यह दो मंजिला मठ रेतीले पत्थरों का बनाया गया है, इसमें सीढ़ियाँ हैं।16
गुना जिले के कदवाया (प्राचीन नाम कदम्बगुहा) में भी इसी प्रकार का एक मठ है। इसी जिले में तूमेन में चतुर्मुखी शिवलिंग है। जिसके चारों मुखों में से एक मुख पार्वती का है। शिव के गले में दो मालाऐं तथा पार्वती के गले में एकावली है। चंदेरी किले का निर्माण प्रतिहार नरेश कीर्तिपाल ने कराया था इसमें जोहर कुण्ड, हवामहल, नौखण्डामहल, खूनी दरवाजा आदि है। चंदेरी से 18 किमी. दूरी पर दक्षिण पूर्व दिशा में घने जंगलों के बीच स्थित बेंहठी मठ गुप्त काल में तांत्रिकों की साधना स्थली रहा है। इसके 16 स्तंभों को पत्थर की बारीक कटाई में शेर, हाथी, मोर, घोड़े, हिरण कमल के फूल एवं देवी देवताओं की मूर्तियाँ उकेरी गयी हैं। ग्वालियर नरेश मानसिंह तोमर द्वारा गूजरी महल, सास बहू मंदिर तथा मानमंदिर बनवाये जिनका स्थापत्य आज भी अप्रितम है। गूजरी महल का निर्माणकाल पंद्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध है। इसी किले में बना तेली मंदिर नवीं शताब्दी का है। 1093 में कछवाहा राजवंश के राजा महीपाल द्वारा निर्मित सास बहू मंदिर है। जो वस्तुतः प्राचीन विष्णु मंदिर है । इसकी दीवारों पर देवी देवताओं के सुंदर कलात्मक चित्र बने हैं। ग्वालियर जिले में भी बरई पनिहार में अनेक मंदिर व गढ़ी हैं।
ग्वालियर के दुर्ग में बादलगढ़ द्वार (पंद्रहवी सदी में) तोमर वंश द्वारा बनवाया गया। इसकी ऊँचाई 20 फीट है। इस द्वार के दोनों ओर 50 फीट ऊँचाई वाली गोल मीनारें बनी हैं, इन मीनारों के शीर्ष पर अष्ट कोणीय स्तम्भों पर आधारित गुम्मदयुक्त छतरियाँ बनाई गईं हैं। चतुर्भुत मंदिर हथियापौर, विक्रम महल, कर्ण महल, जहांगीर महल, शाहजहाँ महल, राणा की छतरी, ढोढ़ा पौर, द्वार अस्सी खम्ब बावड़ी वर्धमान मंदिर, गोल बाबड़ी, सूरजकुण्ड, गुरूद्वारा, जैन शैल गुफा समूह आदि स्थापत्य के बेजोड़ नमूने हैं। ग्वालियर दुर्ग की कहानी सूरज कुण्ड पर रहने वाले गालव ऋषि की कहानी से प्रारंभ होती है। राजा सूरज सेन को कुष्ठ रोग से मुक्ति इस कुण्ड के जल से मिली तब उन्होंने गालव ऋषि को कुछ देना चाहा। उन्होंने सूरज सेन को इस पहाड़ी पर दुर्ग बनाकर राज्य करने की सलाह दी राजा ने कुण्ड की स्थापना की व दुर्ग बनवाकर गालव ऋषि के नाम पर ग्वालियर शहर की स्थापना की।17
दतिया में वास्तुकला एवं शिल्पकला के अनेक भण्डार हैं। दतिया, बड़ौनी, सेवढ़ा, रतनगढ़, भाण्डेर, एवं बसई स्थानों पर अनेक सुन्दर महल आदि निर्मित हैं। दतिया का ही पुराना महल सम्पूर्ण देश में अपनी बेजोड़ स्थापत्य कला के लिए विख्यात है। ये बुन्देलों की कीर्ति का अक्षय चिह्न है। ओरछा नरेश महाराज वीरसिंह जूदेव ने सन् 1675 में निर्माण हेतु इसकी आधारशिला रखी थी और यह नौ वर्शों में बनकर तैयार हुआ था। स्वस्तिकाकार इस सतखण्ड व चौकोर महल के प्रत्येक खण्ड में चार चौक हैं, बीच में मण्डप है, जो नीचे से ऊपर तक क्रमशः उठता गया है। महल का निर्माण चूना तथा पत्थर से हुआ है, लकड़ी व लोहे का कहीं नामो निशान नहीं है। छतों की लता स्तम्भों की उकेरियाँ, पत्थर की जालियाँ, गुम्बद, भारणी, कंगूरे आदि देखते ही बनते हैं छतों के नीचे गचकारी का काम है तथा ऊपरी कक्षों में फारसी दरी शैली की चित्रकारी है। महल में आयताकार, वर्गाकार, कक्षों तथा सीढ़ियों का सिलसिला प्रतिसाम्य के कारण भूल भुलैया का है।18
दतिया जिले से 10.15 किलोमीटर दूर सोनागिरि, स्वर्णगिरि या स्वर्णगिरि जैन तीर्थ स्थल है। यहाँ 77 जैन मंदिर व 13 छतरियाँ हैं। कुछ मंदिर मध्यकालीन देवालय निर्माण कला के प्रतीक है तो कुछ बुन्देला स्थापत्य के नमूने। मंदिर का दायां परकोटा बिना गारे के शिलाखण्डों से निर्मित है जो अतिप्राचीन वास्तुकला का नमूना है। खण्डित मूर्तियाँ द्राविड, शैली की प्रतीत हेाती है।19
अशोकनगर से 32 किमी. व ईसागढ़ से 4 किमी. दूरी पर आनंदपुर में श्री परमहंस अद्वैतायन आश्रम, सुखपुर (आन्नदपुर) स्थित है। यहाँ गुरू महाराज के संगमरमर के विशाल मंदिर शोभायमान है। अशोकनगर से 27 किमी. दूर चंदेरी के निकट थूवोन में जैन मंदिर बने हैं। यहाँ पाडाशाह ने 25 जैन मंदिर बनवाये। जिनका स्थापत्य की दृष्टि से महत्व है। मंदिर में 30 फुट तक मूर्ति देखी जा सकती है।20
शिवपुरी में छत्रियाँ सिंधियां राजवंश की देन है जो अपने कलास्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। छत्री में नीले रंग के नगीने जड़े हैं। लाजवर्त नामक नीले काले और ऑनैक्स नामक पारदर्शी कीमती पत्थर इसमें लगे हैं। ये पत्थर इटली, बैल्जियम और इग्लैड से मंगाये गये। शिखर की ऊँचाई भूमि से 70 फीट ऊँचे है। छत्री के बाहरी भागों में सुन्दर पच्चीकारी के बेलवूटे हैं। सफेद संगमरमर पर बारीक नक्काशी तथा जालियाँ है। यहाँ की बारादरी भी बहुत सुन्दर है। छत्री के कपाट चांदी के निर्मित है। माधवराष्ट्रीय उद्यान भी प्राकृतिक और वास्तुशिल्प कला का नमूना है। भदैया कुंड तथा भूरा खो में भी पुराने मंदिर है।21

संदर्भ सूची

1. संपादक मण्डल - मध्यप्रदेश एक अध्ययन पृ0 38 ।
2. पदकपंण्हवअण्पदण् 26.11.08
3. वही
4. डॉ0 पद्मा शर्मा इतिहास और स्थापत्य का संगम शिवपुरी (आलेख) - दैनिक आदित्याज
विशेशांक - 14.09.08 पृ0 10 ।
5. वही
6. डॉ0 नर्मदा प्रसाद गुप्त - बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति: पृष्ठभूमि और वैशिश्ठ्य - (आलेख)
डॉ0 रमेशचंद्र श्रीवास्तव - बुन्देलखण्ड: साहित्यिक, ऐतिहासिक, सास्कृतिक वैभव पृष्ठ 109 ।
7. डॉ0 हरिबल्लभ माहेश्वरी जैसल - ग्वालियर इतिहास, संस्कृति एवं पर्यटन् पृष्ठ 61 ।
8. डॉ0 वृन्दावनलाल वर्मा - मृगनयनी - भूमिका
9. मोतीलाल त्रिपाठी - बुन्देलखण्ड दर्ष न - पृष्ठ 293 ।
10. नारायण भट्ट का आलेख - दतिया की संगीत परम्परा - संपादक के0बी0एल0पाण्डेय -
दतिया उद्भव और विकास पृष्ठ 225 से 228 ।
11. ए0असफल-दतिया अतीत से अबतक (आलेख) दैनिक आदित्याज विशेशांक - 14.09.08 पृ0 8
12. संपादक के0बी0एल0पाण्डेय - दतिया उद्भव और विकास पृष्ठ 235 से 237 ।
13. ए0असफल-दतिया अतीत से अबतक (आलेख) दैनिक आदित्याज विशेशांक - 14.09.08 पृ0 8
14. प्रमोद भार्गव (आलेख) - मध्यप्रदेश लेखक संघ शिवपुरी द्वारा प्रकाशित स्मारिका 2002 - पृष्ठ
41 ।
15. डॉ0 भारती दीक्षित- ग्वालियर- चम्बल संभाग के कहानीकारों के नारी पात्र (शोध ग्रंथ -
जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर) पृष्ठ 08 ।
16. डॉ0 श्रीधर तिवारी - म0प्र0 में शैव का विकास पृष्ठ 62 ।
17. डॉ0 हरिबल्लभ माहेश्वरी जैसल - ग्वालियर इतिहास, संस्कृति एवं पर्यटन पृष्ठ 35 ।
18. बालमुकंुद भारती (आलेख) पुराना महल: बुन्देली स्थापत्य का सर्वोत्कृष्ट नमूना - संपादक
के0बी0एल0पाण्डेय - दतिया उद्भव और विकास पृष्ठ 34-35 ।
19. ए0असफल- म.प्र. का प्रमुख जैन तीर्थ स्थल (आलेख) दैनिक आदित्याज विशेशांक - 14.09.08
पृ0 72 ।

20. महेन्द्र शर्मा - सबसे न्यारा करीला धाम पृ0 29 एवं 35 ।
21. डॉ0 पद्मा शर्मा इतिहास और स्थापत्य का संगम शिवपुरी (आलेख) - दैनिक
आदित्याज विशेशांक - 14.09.08 पृ0 10 ।