gwalior sambhag ke kahanikaron ke lekhan me sanskrutik mulya - 2 in Hindi Book Reviews by padma sharma books and stories PDF | ग्वालियर संभाग के कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य - 2

Featured Books
Categories
Share

ग्वालियर संभाग के कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य - 2

Gwalior sambhag ke kahanikaro ke lekhan me sanskrutik mulya

ग्वालियर संभाग के कहानीकारों के लेखन में सांस्कृतिक मूल्य 2

डॉ. पदमा शर्मा

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी

शा. श्रीमंत माधवराव सिंधिया स्नातकोत्तर महाविद्यालय शिवपुरी (म0 प्र0)

प्रस्तावना

1. भौगोलिक स्थिति

2. जनसंख्या एवं क्षेत्रफल

3. गिरि, सरितायें, वन एवं जलवायु

4. खनिज संसाधन, कृषि एवं उद्योग

5. सामाजिक संरचना

6. आर्थिक परिदृश्य

7. धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य

8. ग्वालियर संभाग की विभिन्न कलायें

(संगीत कला, चित्रकला, वास्तु एवं शिल्पकला)

9. विभिन्न जिलों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः

अ. ग्वालियर ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ब. शिवपुरी ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

स. दतिया ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

द. गुना ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ई. अशोकनगर ज़िले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

संदर्भ सूची

9. विभिन्न जिलों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः-

अ. ग्वालियर जिले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः-

भारत का इतिहास राजे रजवाड़े की कथा किंवद्ंतियों से भरा पड़ा है। आजादी के समय देश में लगभग 550 रियासतें थी। ग्वालियर की सिंधिया रियासत देश की दूसरी सबसे बड़ी रियासत थी। इसका क्षेत्रफल लगभग 26.397 वर्ग मील था। सिंधिया राज्य के वास्तविक संस्थापक महादजी सिंधिया थे।22

1350 ई. में वीरसिंह तोमर ने ग्वालियर किले को फतह किया। तोमर वंशज राजा मानसिंह के शासन काल (1486-1516) को ग्वालियर अंचल में तोमर सत्ता का स्वर्णकाल कहा जाता है।

ग्वालियर दुर्ग जिस पर्वत पर स्थित है उसे गोपाचल पर्वत के नाम से जाना जाता है, जो गालव ऋषि के नाम पर है। जैन धर्म के साहित्य में उल्लेख प्राप्त होता है कि महाभारत के बहुत समय पूर्व अन्धवृश्णि वंश के समय यहाँ पर प्रतिश्ठित् केवली ने निर्वाण प्राप्त किया था।

महाभारत काल में यह क्षेत्र सूरसेन व चेदी जनपद की संधि स्थल पर स्थित था। पाण्डवों की माता कुन्ती इसी क्षेत्र के शासक कुन्ती भोज की पुत्री थी। कृष्ण -बलराम के प्रिय गोपालक सखाओं का भी यह प्रिय क्षेत्र रहा होगा। जहाँ वे गोपद्रि पर्वत तक अपने गौधन चराने आते रहें होंगे। इस क्षेत्र के दक्षिण में अहीर क्षेत्र अथवा अहीर बाड़ा कहलाता था। ईसापूर्व ग्वालियर अंचल विशाल मौर्य साम्राज्य (चन्द्रगुप्त मौर्य) का अंग बन गया था। इसके निकटवर्ती नगर पद्मावती एवं नरवर एक विशाल महत्वपूर्ण नगर थे। यहाँ नागवंशों का अधिकार था बाद में कुशाणों और उनके क्षत्रपों का शासन रहा होगा।23

गुप्तेश्वर (ग्वालियर) उत्खनन से जो वस्तकुठार, खुरचनी, तथा विदारक आदि हथियार मिले हैं, वे बतलाते हैं कि यह क्षेत्र आज से 40 या 50 हजार वर्ष पूर्व भी प्रागेतिहासिक मानव समुदायों से बसा हुआ था। गुप्तेश्वर के ऊपर शैलाश्रम (रॉक शैल्टर्स) भी मिले हैं जिनमें उन आदिवासियों की चित्रकला के नमूने अब भी विद्यमान हैं।24 राष्ट्र

नाग मौर्य एवं गुप्त शासकों द्वारा यह क्षेत्र गोपाद्रि या गोपाचल शासित रहा पर ग्वालियर की प्रसिद्धि का समय छठवीं शताब्दी से प्रारंभ होता है जब इस काल में ग्वालियर दुर्ग एवं नगर का निर्माण प्रारंभ हुआ। इसके पूर्व पाँचवी शताब्दी में ग्वालियर शिलालेख के अनुसार यहाँ राजा मिहिरकुल का शासक था। आठवीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर गुर्जर प्रतिहारों का शासन हुआ किन्तु शीघ्र ही दक्षिण भारत के राष्ट्र कूटों ने ग्वालियर को जीत लिया उस समय यह पूरा क्षेत्र गुर्जर प्रतिहारों तथा तथा राष्ट्र कूटों के मध्य संघर्ष का क्षेत्र रहा। राष्ट्र कूटों ने गुर्जर प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज पर अधिकार करने हेतु बार-बार हमले किये और उन हमलों से झांसी से लेकर ग्वालियर तक का क्षेत्र प्रभावित रहा। कहा जाता है कि ग्वालियर दुर्ग पर दक्षिण भारतीय पद्धति वाले तेली के मंदिर को राष्ट्र कूटों ने ही निर्मित करवाया था। तेली का मंदिर तिलंगाना मंदिर का अपभ्रंश है राष्ट्र कूट शासक तिलंगाना प्रदेश के निवासी थे।25

ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारंभ होते ही ग्वालियर किले तथा उसके आसपास के क्षेत्र पर चंदेलों का राज्य हुआ। इसके पूर्व दसवीं सदी के मध्य से बारहवीं सदी ईसवी के पूर्वार्द्ध तक ग्वालियर तथा इसके आसपास कच्छपघात राजवंश का राजा था। इस वंश की तीन शाखाऐं थीं जिनका शासक क्रमशः ग्वालियर, दुबकुण्ड एवं नरवर में था। ग्वालियर (गोपाद्रि) की शाखा का प्रथम नरेश लक्ष्मण था। 977 ई के लगभग लक्ष्मण के पुत्र वज्रदामन ने गांधिनगर (कन्नौज) के नरेश को पराजित कर ग्वालियर पर अपना राज्य स्थापित किया।26 वज्रदामन को पराजित कर चंदेल नरेश धंगदेव ने ग्वालियर पर चंदेली सत्ता स्थापित की थी। धंगदेव का शासनकाल लगभग सन 950 से 1002 तक रहा है।27

सन 1021 में ग्वालियर पर महमूद गजनवी का आक्रमण हुआ जिसमें ग्वालियर नरेश ने आत्मसमर्पण कर दिया। 1196 ई में पुनः मुसलमानों ने ग्वालियर को जीता। 14वीं सदी ई. के उत्तरार्द्ध में भारत पर तैमूर के आक्रमण तथा उसके परिणामस्वरूप मुस्लिम सत्ता के डांवाडोल होने की परिस्थिति का लाभ उठाकर ग्वालियर में वीरसिंह देव ने तोमर वंश की स्थापना की। सन् 1402 में नासिरूद्दीन मोहम्मद तुगलक के सेनापति मल्लू इकबाल खां ने ग्वालियर पर आक्रमण कर जीतना चाहा, पर असफल रहा। 1404-5 एवं 1416 ई. में भी तोमर मुसलमानों से पराजित हुए। सन 1424 में डूंगरेन्द्र सिंह ने किले को बचाया। 1427, 1428, 1429 तथा 1432 ई. में दिल्ली-सुल्तान ने अपनी सेना भेजी। किन्तु डूंगरसिंह ने उसके सारे प्रयत्न विफल कर दिये। डूंगरेन्द्र सिंह 1455ई के लगभग तक ग्वालियर का शासक रहा। इसने जैन धर्म को प्रश्रय दिया और ग्वालियर किले की दीवारों पर जैन प्रतिमायें उत्कीर्ण करायीं। डूंगरेन्द्र के उपरान्त क्रमशः कीर्तिसिंह और कल्याणमल राज्य के उत्तराधिकारी हुए।28

कल्याणमल के उपरान्त उसका मानसिंह ग्वालियर के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। ‘‘मानसिंह तोमर सन् 1486 से 1516 ई0 तक ग्वालियर का राजा रहा। फरिस्ता के इतिहास लेखक ने मानसिंह के राज्यकाल को तोमर शासन को ‘‘स्वर्ण युग’’ कहा है।’’29 स्वर्ण युग हो भी क्यों न । आज की पीढ़ी ग्वालियर को मानसिंह के नाम से जानती है अर्थात् मानसिंह और मृगनयनी । वास्तुकला, शिल्पकला, संगीत, काव्य आदि समस्त क्षेत्रों में इस शासक ने परचम फहराये। ग्वालियर किले में स्थित गूजरी महल व मानमहल (मानमंदिर) इसके दृश्टांत हैं। देश का प्रथम संगीत शिक्षा केन्द्र स्थापित करने का श्रंय भी मानसिंह को है।

इब्राहिम लोधी द्वारा सन् 1517 में ग्वालियर विजय के उपरान्त तोमर राज्य का अंत हो गया। सन् 1754 तक यह प्रदेश मुगलों की अधीनता में रहा मुगलों ने इसके विकास हेतु कोई प्रयास नहीं किए। मुगलों के उपरान्त ग्वालियर की सत्ता मराठों (सिंधिया) के हाथ आ गई । ‘‘इसका सम्पूर्ण श्रेय महादजी सिंधिया (माधवजी सिंधिया) को जाता है। महादजी की बढ़ती शक्ति देख अंग्रेजों ने गोहद के राजा की सहायता से उन्हें परास्त कर दिया। ग्वालियर गोहद के जाट राजा के हाथ आ गया।30

सन् 1781 की सालवाई संधि से महादजी ने ग्वालियर को छोड़कर सारा राज्य वापस ले लिया। महादजी के उपरान्त उनके दत्तक पुत्र दौलतराव ने शासन किया सन् 1853 के पश्चात ग्वालियर राज्य को जो चंबल संभाग से मालवा तक फैला था तीन प्रान्तों -मालवा, ग्वालियर तथा ईसागढ़ में विभाजित किया गया और उनके प्रशासनार्थ सरसूला नियुक्त किये गए। स्वतंत्रता प्राप्ति तक ग्वालियर और इसके चारों ओर के भू-भाग पर सिंधिया राजवंश का शासन रहा। सन् 1951 में मध्यभारत पठार एवं मालवा के अनेक छोटे-छोटे रजवाड़ों को मिलाकर एक बड़ा ‘‘मध्यप्रान्त’’ या ‘‘मध्यभारत प्रान्त’’ बनाया गया और ग्वालियर के तत्कालीन शासक जीवाजीराव सिंधिया को इसका राज प्रमुख बनाया गया। सन् 1956 के राज्यपुनर्गठन आयोग के फलस्वरूप मध्य भारत पठार का अधिकांश भाग नवगठित मध्यप्रदेश राज्य का अंग बन गया और ग्वालियर मध्यपद्रेश का प्रमुख संभाग तथा जिला बना गया।31

ब. शिवपुरी जिले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः-

शिवपुरी मध्यप्रदेश के उत्तर में स्थित है। इस जिले में चुड़ैल छज्जा, भूरा खो, भरका खो, परी बरी का झौरा जैसे कई प्रागैतिहासिक स्थल विभिन्न पहाड़ों पर स्थित है। इस जिले की पोहरी तहसील के ग्राम बैराड़ का संबंध महाभारत कालीन राजा विराट की नगरी विराट नगर से बताया जाता है। यहाँ का नरवर नामक स्थान राजा नल की नगरी नलपुर के नाम से विख्यात है। सोलह महाजन पदों में एक नलपुर भी था जिसका नाम निशध था। इस भू-भाग पर कच्छपघात, कछवाह, शक, कुशाण एवं नागवंश का शासन रहा। तोमर एवं तुर्को का भी शासन रहा। इतिहासकारों में शिवपुरी शब्द की उत्पत्ति के संबंध में मतभेद है। कुछ लोगों के अनुसार शिवपुरी से तात्पर्य शिव की नगरी से है। कुछ लोग इसे सिपरी का परिवर्तित रूप मानते हैं।32

उत्तरी विंध्यांचल पर्वत श्रेणियों की अवशिष्ट पहाड़ियों की गोद में बसा शिवपुरी 25.21 से 25.32 उत्तरी अक्षांश एवं 77.7 से 77.32 पूर्वी देशांतर के मध्य बसा है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 250 मीटर से 510 मीटर है।

मुगलों के शासनकाल में शिवपुरी मालवा सूबा नरवर का सदर मुकाम था। राजा अनूपसिंह को मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने नरवर का जागीरदार बनाया। सन् 1804 में शिवपुरी पर सिंधिया वंश का आधिपत्य हो गया था। यह सिंधियां वंश की ग्रीश्मकालीन राजधानी के नाम से प्रसिद्ध था। सन् 1903 में शिवपुरी को जिला मुख्यालय बनाया गया। जबकि पहले नरवर जिला था। ग्वालियर दरवार के विदेश विभाग की पांच अक्टूबर सन् 1919 की विज्ञप्ति के अनुसार इसका नाम सीपरी से शिवपुरी परिवर्तित कर दिया गया। अरूण अपेक्षित की पुस्तक ‘‘शिवपुरी अतीत से आज तक’’ में बताया गया कि सबसे पहले इसका नाम सेपई था।

‘‘मधुमती नदी के किनारे मध्यकाल में मधुमतेय शैव साधुओं का प्रभावशाली शास्त्र का उदय हुआ था। इसी नदी की घाटी में शिवपुरी जिले का वर्तमान करैरा बसा हुआ है।’’

‘‘निशध नामक एक जनपद हमारे प्रदेश में ब्राह्मण ग्रंथों के काल में चेदि से मिला हुआ विद्यमान था, जिसके कारण नल की नैशध उपाधि हुई थी। यह नरवर के आस-पास का प्रदेश था।’’33

यद्यपि शिवपुरी जिले के विभिन्न भू-भाग भी विभिन्न राजसत्ताओं के आधिपत्य में रहे है। इस जिले के चुड़ैल छज्जा, भरका खो और टीला ग्राम की पहाड़ी पर परी बरी का झौरा नामक स्थान पर प्रागैतिहासकालीन सैंकड़ों चित्र है। इन चित्रों के विश्लेशण से एक बात सिद्ध होती है कि आदिम काल से यहाँ मानव निवासरत था। शिवपुरी शहर पूर्व में सीपरी के नाम से जाना जाता था। पोहरी और चंदेरी (चेदि) जनपदों के मध्य इसकी प्राचीन स्थिति थी और अब भी है। इस जिले की पोहरी तहसील के ग्राम बैराड़ का संबंध महाभारत कालीन राजा विराट की नगरी विराट नगर से बताया जाता है। इसी जिले का नरवर भी अत्यन्त प्राचीन नगर रहा है जो राजा नल की राजधानी नलपुर के नाम से विख्यात था। सोलह महाजनपदों में एक नलपुर भी था जो निशध के नाम से जाना जाता था। कालान्तर में इस भू-भाग पर कच्छपघात, कछवाह, शक, कुशाण एवं नागवंश का शासन रहा। तौमर एवं तुर्को का भी शासन रहा।

‘‘नरवर में सन् 125 से 300 ई0 तक नागवंशी राजाओं का राज रहा। चार ईसवी से आठ ईसवी तक की सही जानकारी किसी भी शिलालेख या अन्य काल में नहीं मिलती है। नवी ईसवी में इस दुर्ग पर राजपूत कछवाहों का राज्य हुआ जो दसवी शताब्दी तक चला। 1129 ई0 में यह दुर्ग चहाददेव के आधिपत्य में रहा और इसके पश्चात् इस दुर्ग पर बादशाह नसीरूद्दीन का अधिकार हो गया। 13 वी से 14 वी शताब्दी के मध्य भी इन्हीं मुगल राजाओं में कुतुबुद्दीन खिलजी एबक, अलाउद्दीन एवम् अन्य राजाओं का अधिकार रहा। 1410 ई0 में सिकन्दर लोधी के आक्रमण के फलस्वरूप यह किला उसके अधीन हो गया । .......नरवर जिले के कछवाह राजाओं को अपने जीवन में निरंतर मुगलों से संघर्ष करना पड़ा। 16वी ई0 में फिर से कछवार राजाओं का राज्य आया। 17वी. ई0 में नरवर किले के राजा गजसिंह कछवाहा ने दक्षिण के युद्धों में राजपूतानी शौर्य का परिचय दिया और सन् 1725 ई0 में युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। 18वी सदी में नरवर के किले पर कछवाहा वंश के अंतिम राजा माधौसिंह राजपूत थे। इनके वंशज राजा गंगासिंह राजपूत इसी शताब्दी के 1844 में ग्वालियर स्टेट के श्रीमंत दौलतराव सिंधियां के क्षेत्र में नरवर शामिल हो गया। सिंधिया ने नरवर किला पर सरदार इंगले को नियुक्त किया।34

ओरछा नरेश मुधकरशाह की दो मधुकर साह की दो रानि से 8 पुत्र थे। अंतिम पुत्र रतन सिंह देव को शिवपुरी (सीपरी-शिवपुरी) की जागीर प्राप्त हुई थी। ओरछा के राजा बनने के पूर्व मधुकर शाह भी शिवपुरी के जागीरदार थे। बुन्देलों के उपरान्त मुगलों का और मुगलों के उपरान्त सिंधिया राजवंश का शासन शिवपुरी पर रहा। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उपरान्त शिवपुरी महत्वपूर्ण स्थल के रूप में उभरा। यही कारण था कि इसके महत्व को देखते हुए सन् 1903 में इसे जिला बनाया गया।35

स. दतिया जिले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः-

दतिया माँ पीताम्बरा की धार्मिक नगरी के रूप में जाना जाता है। ओरछा नरेश महाराजा मधुकर शाह ने बड़ोनी की जागीर वीरसिंह जूदेव को दी थी और बड़ोनी को केन्द्र बनाकर वीरसिंह जूदेव ने नरवर, कोलारस, तौरधार और पवाया पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया तथा करैरा, बेरछा, हतनौरा, भांडेर और एरच को अपने प्रभाव में ले लिया। सन् 1584 से 1602 तक बड़ौनी ऐतिहासिक हलचलों का केन्द्र रही।

वीरसिंह जूदेव के पुत्र भगवान राव ने सन् 1626 ई. में दतिया को पृथक् रियासत के रूप में कायम किया। वे (सन् 1626-1640) दतिया रियासत के संस्थापक एवं प्रथम शासक है। महाराजा शुभाकरन के बाद दलपतराय (सन् 1678-1707) दतिया के तीसरे शासक हैं। उनकी बहादुरी के बारे में कहा जाता है कि -

‘‘दतिया दलपतराय की जीत सके न कोय

जो जीतन को मन करे, सो अदफर फजियत होय।।’’36

चौथे शासक रामचंद्र के शासन काल में पृथ्वीसिंह ने सेंवढ़ा की जागीर को अलग रियासत का दर्जा दिलवाया। महाराजा पृथ्वीसिंह एक कवि भी थे, ‘रसनिधि’ के नाम से कवितायें लिखते थे। ‘‘ रतन हजारा उनकी प्रसिद्ध कृति है।’’

दतिया के पाँचवे शासक महाराजा इन्द्रजीत (सन् 1734-सन् 1762) के नाम से इन्दरगढ़ पड़ा।

पहले दतिया बुन्देलखण्ड की उल्लेखनीय रियासतों में से एक थी। सन् 1948 ई. में रियासतों के विलीनीकरण के फलस्वरूप विंध्यप्रदेश का एक जिला हो गया। जिसमें भंभाडेर, सेंवढ़ा और दतिया तहसीले सम्मलित हैं। दतिया जिले का पुरातात्विक महत्व, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व है।37

इतिहास के पन्नों में ओरछा का नाम सर्वप्रथम सन् 1531 में अंकित हुआ। जब बुन्देल शासक रूद्रप्रताप ने गढ़कुंडार से अपनी राजधानी स्थानान्तरित कर ओरछा को अपनी राजधानी बनाया। रूद्रदेव के पुत्र भारतीचंद्र की मृत्यु के पश्चात् मधुकर शाह (सन् 1554 -1592) ने शासन की बागडोर संभाली। मधुकर शाह कृष्ण भक्त थे जबकि महारानी गणेश कंुवरि राम भक्त थी। महारानी भगवान राम को अयोध्या से ओरछा लाना चाहती थी। भगवान राम तीन शर्तो पर महारानी के साथ अयोध्या से ओरछा चलने को तैयार हुए। पहली शर्त के अनुसार महारानी को साधुसंतों के साथ राम की मूर्ति लेकर पैदल अयोध्या से ओरछा जाना था। दूसरी शर्त के अनुसार यात्रा पुश्य नक्षत्र में ही सम्पन्न होनी थी तथा तीसरी शर्त यह थी कि प्रथम बार भगवान राम विराजमान होने वाले स्थान से नहीं हटेंगें।38

पुराणों में उल्लिखित दंतवक्र दानव की नगरी के रूप में दतिया का नाम जाना जाता है। दतिया जिले के सेंवढ़ा स्थल को (सनकुंआ को) सनक-सनकानीक मुनियों की तपोभूमि माना गया है। ऐसा लगता है कि इस सम्पूर्ण क्षेत्र में ईसापूर्व सनकानीक का विस्तार था। समुद्रगुप्त की विजय प्रशसित में उल्लेख मिलता है उसने अभीर, प्रार्जुन, सनकानीक, काक और खर्परिक आदि जातियों को विजित किया। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय का सनकानीक सामन्त तथा उनके पिता व पितामह ‘महाराज की उपाधि धारण करते थे। सनकानीक की अभी तक पहचान नहीं हो सकी है।39

‘‘अग्निपुराण में अनन्त, वासुकि, पù, महापù, तक्षक, कुबीर, ककोंट और शंख आदि अस्सी प्रकार के नामों का सविस्तार वर्णन है। कृष्ण ने नागों के प्रभाव को नष्ट किया। पुराणों के ही आधार पर मथुरा, कान्तिपुरी और पद्मावती इनकी तीन प्रसिद्ध राजरानियाँ थी। दतिया का भू-भाग पवाया (पद्मावती) के अंतर्गत आता था।’’40

दतिया की प्राचीनता के संबंध में सर्वाधिक ठोस प्रमाण हैं गुर्जरों का शिलालेखा जो यह सिद्ध करता है कि इस क्षेत्र की प्राचीनता मौर्यकालीन है। दतिया नगर के पास परासरी ग्राम से लगभग तीन किलोमीटर दूर गुर्जरा ग्राम है, जहाँ अशोक सम्राट का यह शिलालेख प्राप्त हुआ है। ‘‘मौर्यकाल का ठोस प्रमाण अशोक का शिलालेख गुर्जरा ग्राम में प्राप्त हुआ है जो 300 वर्ष ईसवी से पूर्व का है। यह शिलालेख सम्राट अशोक ने राष्ट्रीय मार्ग पर खुदाया जिसमें उनके राज्य के लोगों को दिए गए आदेश तथा उनके धर्म परिवर्तन का इतिहास खुदा है। अतः उस समय प्रधान देश का मार्ग पद्मापुरी से गुजरता हुआ उनाव को जाता था, जो बाद में पहूज पार कर उज्जैन तक और दूसरी और प्रयाग तक जाता था।41

‘‘मौर्यकाल (सन् 322 ई0 पू0 से 184 ई0पू0 ) के उपरान्त इस क्षेत्र में ब्राह्मण राजवंशों का प्रभाव बढ़ा। इनमें शंग, कण्व, सातवाहन वंशों की शत्रुता ने शक और कुशाण जैसी विदेशी जातियों को पश्चिमी-दक्षिणी बुन्देलखण्ड पर अधिकार करने का अवसर दिया। कुशाण राजा कनिश्क ने धार्मिक सहिश्णुता का आदर्श प्रस्तुत करते हुए उन्नाव (दतिया) में भागवत् (वैश्णव) धर्म वाले सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था।’’42

कनिश्क के उपरान्त दतिया एवं इसके आसपास के भू-भाग पर नागवंश, बाकाटकों, दागियों एवं अमीरों का राज्य रहा। इसी प्रकार अन्य छोटी मोटी जातियों की सत्ताऐं यहां पर रहीं, पर एक स्वतंत्र इकाई के रूप में इसका अस्तित्व स्पष्ट न हो सका। ओरछा के राजा वीरसिंह जूदेव के समय से दतिया का स्वरूप एक राजनीतिक इकाई के रूप में निखरना प्रारंभ हुआ। यद्यपि इसके पूर्व इस क्षेत्र के सेंवढ़ा (पूर्व नाम सरूआ) जिसके प्रसिद्ध दुर्ग का नाम कन्नरगढ़ भी है, को सन् 1018 में महमूद गजनवी ने अपने अधीन लेने की चेश्टा की थी।43

ओरछा नरेश मधुकरशाह (सन् 1554-1752) के चौथे पुत्र वीरसिंह को बड़ौनी जैसी छोटी जागीर तक सिमटकर रहना नहीं चाहते थे। अंतिम दिनों में वीरसिंह ने उसके विद्रोही पुत्र सलीम का साथ दिया था। जब सलीम जहांगीर के नाम से गद्दी पर बैठा तो उसने वीरसिंह को ओरछा का स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया। वीरसिंह ने अपने बारह पुत्रों में से एक भगवानदास को अपनी बड़ौनी की जागीर और निवास के लिए अपना दतिया का महल दिया। सन् 1765 में भगवानदास की मृत्यु हो गयी।

भगवानदास की मृत्यु के उपरान्त परम्परानुसार उनके ज्येष्ठ पुत्र शुभकर्ण दतिया के शासक हुए। इस प्रकार एक के बाद एक बुन्देला शासक शत्रुजीत सिंह (सन् 1763-1801) तक इस भू-भाग पर शासन करते रहे।

शत्रुजीत सिंह के बाद पारछित राजा हुए परंतु इस समय तक इस क्षेत्र में मराठों तथा अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो चुका था। महाराज परीक्षित ने अंग्रेजों से संधि कर ली और इस क्षेत्र पर अंग्रेजों का राज्य हो गया। 1857 की क्रांति के समय दतिया के राज सिंहासन पर भलानी सिंह राजा थे जो सन् 1907 तक रहे। इसेक उपरान्त गोविन्द सिंह सन् 1952 तक राजा रहे। स्वतंत्रता के बाद राज्यों का पुनर्गठन किया गया और दतिया ग्वालियर संभाग का एक जिला बन गया।

द. गुना जिले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः-

गुना जिला मालवा प्रवेश के द्वार के नाम से जाना जाता है। यह मालवा पठार के उत्तर और पूर्वी भाग में पार्वती और वेतवा के बीच स्थित है। यह जिला 23‘53’’ और 25‘6‘55 अक्षंश उत्तर तथा 76.48‘30’’ और 78, 16‘70’’ पूर्व देशान्तर के मध्य स्थित है पार्वती मुख्य नदी है। इसका पश्चिमी तट मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले तथा राजस्थान झालावाड़ और कोटा जिले को छूता है।44

देश के उत्तर पश्चिम प्रान्तों को मिलाने वाली एक मजबूत कड़ी आगरा -बाम्बे राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 3 के रूप में गुना से गुजरती है। इसके उत्तर में शिवपुरी पूर्व में उत्तरप्रदेश का झांसी और ललितपुर तथा मध्यप्रदेश के सागर व विदिशा, दक्षिण में सीहोर एवं राजगढ़ जिले तथा पश्चिम में राजस्थान प्रदेश हैं। यहाँ का अधिकांश भाग पठारी है तथा पूर्वी भाग में बुन्देलखण्ड की पहाड़ियाँ और दक्षिण में विंध्यांचल पर्वत की श्रृंखलायें हैं।यहाँ की माटी मालवा की माटी से मिलती है। जिले की जलवायु समशीतोश्ण है अर्थात यहाँ गर्मी में अधिक गर्मी और ठंड में अधिक ठंड पड़ती है। यह जिला समुद्र तल से लगभग 759 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। जिले से पार्वती, सिंध, वेतवा चौपेट जैसी प्रमुख नदियँ प्रवाहित होती है। इनका प्रवाह उत्तर से पश्चिम की ओर है। जिले में इनकी लंबाई 227 किलोमीटर है।

वर्तमान में गुना नगर अपने जिस नगरीय रूप में है पूर्व में नहीं था । ‘‘पूर्व से पश्चिम समुद्र तक विस्तार वाले पर्वतराज विध्यंचल की कोमलांगी और मृदुला पाशाणी पर्तो की उर्वरा मेखलाओं की गोदी में बसा बुन्देलखण्ड, उत्तरप्रदेश, मालवा का प्रवेश द्वार कहलाने वाला यह नगर राष्ट्रीय राजमार्गों को छूता हुआ अवस्थित है। 19 वी शताब्दी में गुना एक छोटा सा गाँव था। ईसागढ़ तथा बाद में बजरंगगढ़ जिला ग्वालियर राज्य के अंतर्गत था। सन् 1909 के पूर्व ईसागढ़ और बजरंगगढ़ पृथक्-पृथक् जिले थे। उस समय गुना अंग्रेजों की एक छावनी था। सन् 1844 में यहाँ ग्वालियर की फौज रहती थी, जिसने विद्रोह कर दिया था, तभी से यहाँ अंग्रेजी राज्य की स्थापना हुई और 1850 से यहाँ अंगेजी फौजें रहने लगी। वैसे गुना ग्वालियर राज्य का ही अंग था किन्तु अंग्रेजी फौज का मुख्यालय होने के कारण यहाँ जिला मुख्यालय नहीं रखा गया।45

इसी जिले के ग्राम कदवाहा तथा चंदेरी और महुआ ग्राम से पूर्व पाशाणयुगीन औजार, हस्तकुठार और गंडासे आदि प्राप्त हुए हैं। ‘‘वेतवा नदी घाटी की खोज में प्राप्त ‘‘सीरीज-2 ’’ के हथियार प्राप्त हुए है। यहाँँ बेतवा ने अपने बायें तट के एक भाग को काट दिया है, जिसमें औजारों सहित बजरी जिस पर 12 फुट मिट्टी की सतह जीम़ी हुई है जिला गुना से प्राप्त हुई है।46 इसी प्रकार चाचौड़ा में उत्तर पाशाणयुगीन हथियार प्राप्त हुए है।

महाभारत काल में आधुनिक चंदेरी चेदि देश के नाम से विख्यात् था। यहाँ का राजा शिशुपाल था। इस किले के भग्नावशेश बूढ़ी चंदेरी में अब भी द्रष्ट ब्य हैं। महाजनपद काल के सोलह महाजनपदों में से एक चेदि भी था। इसी जिले के तूमेन गाँव में कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल का गुप्त संवत् 116 का शिलालेख प्राप्त हुआ। जिसमें तुम्बवन (तुमैन) के शासक घटोतकचगुप्त का उल्लेख है। बौद्ध ग्रंथों में तुमैन से तुम्बकन कहा गया है। वर्तमान में तुमैन गांव के पश्चिम की ओर नदी के उस पार प्राचीन टीले हैं जो स्थानीय नामों - भागरटोर तथा पोलाटोर के नाम से जाने जाते हैं। यहाँ प्राचीन शैलाकृतियाँ है और प्राचीन ओरछा के भग्नावशेश हैं।47 चंदेरी अवध के मौर्य व गुप्त शासकों के अधीन रही और चंदेरी के साथ साथ दूसरों संलग्न भू-भाग भी । जिसमें आज का अशोकनगर, मुगंवली, ईसागढ़ का विशाल क्षेत्र सम्मिलित है।

छठवी शताब्दी में चेदि प्रदेश जुझौतिया, जेड़ाहुति के नाम से अभिहित हुआ। बुन्देलखण्ड में चंदेलवंशीय नरेशों में जय शक्ति (जेज्जाक) अत्यन्त प्रतापी राजा हुआ। इसके नाम पर यह क्षेत्र जेजाकभुक्ति के नाम से जाना जाने लगा, जो 12वी शताब्दी के अंत तक रहा।48

आठवी-नवमी शताब्दी में इस क्षेत्र पर परमारों तथा प्रतिहारों का साम्राज्य रहा। कदवाहा (कदम्बगुहा) के शिवमुदिर पर गुर्जर प्रतिहार शासक जयंन्त वर्मन (जैत्रवर्मन प्रतिहार) का तथा एक तिथिरहित शिलालेख में प्रतिहार इत्रपाल, बलराज, स्वर्णपाल, कीर्तिराज तथा उसके भाई उत्तम का उल्लेख है। चंदेरी में भी प्रतिहार वंश का शिलालेख है जिसमें हरिराज से होकर जैत्रवर्मन तक प्रतिहार वंशावली दी है। कुछ स्मारकों के निर्माण का भी उल्लेख है। यहीं पर प्रतिहार वंश का शिलालेख है, जिसमें महाराज हरिराज से लेकर अभयपाल तक प्रतिहार राजाओं का वंश वृक्ष दिया है।49

कदवाहा के जैन मंदिर प्रस्तर लेख सम्वत् 1451 तथा भक्तर एवं भेसरवास ग्राम के राति स्तम्भ प्रस्तर लेख भी हैं। कदवाहा में ही 11वी एवं 12वी शताब्दी के शिलालेख में पतंगेश नामक साधु द्वारा शिवमंदिर निर्माण का उल्लेख है तथा कदम्बगुहा के निवासी मुनियों की प्रार्थना की गई है।50 इस काल में गुना जिले के कदवाहा, तूमैन, महुआ (मधुवन) तथा शिवपुरी जिले के अरणीपद्र में शैव साधना के विख्यात केन्द्र थे और तत्कालीन शासकों द्वारा इन्हें संरक्षण एंव संवर्द्धन प्राप्त होता था।

गुना जिले की स्थिति मध्यप्रदेश के प्रायः मध्य में हैं इसके एक ओर नरवर तथा

गोपाचल जैसे प्राचीन राज्य हैं तो दूसरी ओर भेलसा (विदिशा) की सीमायें इसको स्पर्ष करती थी। एक ओर बुन्देलखण्ड था, तो दूसरी ओर राजस्थान और मालवा के शासकों का प्रभाव था। यही कारण है कि यह जिला विभिन्न राजवंशों द्वारा शासित होता रहा। इसके भिन्न-भिन्न भू-भागों पर भिन्न-भिन्न शासक रहें। तुर्को के आक्रमण के समय यह समूचा भू-क्षेत्र तुर्को द्वारा पद्दलित हुआ। 13 वी शताब्दी से मुगल सत्ता आने तक इस जिले के कुछ क्षेत्र ग्वालियर के तोमरों के हाथ में रहें। मुगलियाँ सल्तनत ने देश के अनेक भागों की भांति इस भू-भाग पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया।

गुना जिले के अन्य क्षंत्रो में जहाँ विभिन्न राजवंश शासन कर रहे थे, वहीं इसी जिले के राधौगढ़ में चौहान राजपूतों के खींची नामक राजा राज्य कर रहे थे। अकबर के समय राजा गरीबदास इस राज्य के प्रमुख थे और शांहजहाँ के समय राजा लालसिंह प्रमुख थे। इन्हीं ने सन् 1678 में राधौगढ़ में राज्य की राजधानी स्थापित की और किले का निर्माण कराया। इन राजाओं के मुगलों से बहुत अच्छे सम्बन्ध रहे। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह इसी खींची राज परिवार के हैं।51

सम्पूर्ण गुना जिला कालान्तर में ग्वालियर के सिंधिया राजाओं के अधीन रहा। देश की स्वतंत्रता के उपरान्त राज्यपुनर्गठन के समय यह भू-भाग मध्यप्रदेश का अंग बना। सन् 1919 में ब्रिटिश फौज का मुख्यालय ग्वालियर स्थानांतरित हो जाने के कारण जिला मुख्यालय स्थापित किया गया, किन्तु जिले का नाम ईसागढ़ ही रहा। सन् 1937 में जिले का नाम गुना रखा गया।52

इ. अशोकनगर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः-

15 अगस्त 2003 को अशोक नगर पृथक् जिला बना । इसके पूर्व यह गुना जिले में सम्मिलित था। अशोकनगर सिंध और बेतवा के बीच में मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग में स्थित है। यह मध्य भारत के पठार के दक्षिणी भाग के अंतर्गत आता है। यह जिला 23.34 अक्षांश उत्तर तथा 77.43 पूर्व देशान्तर के मध्य स्थित है। इसके पूर्वी और पश्चिमी भाग नदियों के द्वारा विभाजित है। पूर्वी भाग में वेतवा नदी बहती है जो म0प्र0 सागर जिले तथा उत्तर प्रदेश के ललितपुर को विभाजित करती है। सिंध नदी प्रमुख नदी है जो पश्चिमी भाग में बहती है चन्देरी अपने उत्कृष्ट सौन्दर्य और हस्तशिल्प की साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है।53 प्रतिहार नरेश कीर्तिपाल द्वारा 11वी. सदी में निर्मित दुर्ग के अन्दर जौहरकुण्ड, हवामहल, खूनी दरवाजा चर्चित स्थापत्य है।54

प्राचीनकाल से भारत ऋषि मुनियों का देश है। यह देश अनेक महिमा मण्डित तीर्थो की पुण्यभूमि है। अशोकनगर का नाम पहले पछार था बाद में सम्राट अशोक के नाम से अशोकनगर हुआ। कदवाया में प्राचीनकाल के शैव मठ हैं तथा थूबोन जी में चौबीसी जैन मंदिर प्रसिद्ध है।

भारत में कई बाल्मीकि आश्रम है किन्तु लवकुश का जन्म हुआ उस समय बाल्मीकि ऋषि करीला में अस्थाई निवास करते थे। करीला के पास से कौंचा नदी उद्गम स्थल है जो क्रौंच का अपभ्रंश है जब ऋषि बाल्मिकि ने ब्याघ्र द्वारा सताये क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक की मृत्यु का दृश्य देखा तो उनके मुख से ‘‘माँ निशाद प्रतिष्ठा..........’’ पंक्तियाँ निकली। इससे सिद्ध होता है कि क्रौंचा नदी उसी क्रौंच पक्षी के रूदन पर आँसुओं से प्रकट कौंच नदी है। जिला अशोकनगर बेतवा तथा सिंध के मध्य स्थित नवीन जिला है। जिसके पूर्व में सागर, पश्चिम में गुना, उत्तर में ललितपुर तथा दक्षिण में विदिशा जिले है। जिले में पुरातात्त्विक महत्व के कई स्थान हैं जिनमें चंदेरी, तूमैन, कदवाया, अखैवर, ईसागढ़ आदि प्रमुख है। चंदेरी महाभारत कालीन शिशुपाल की राजधानी रही। मुगलकाल में यहाँ राजा में मैदिनीराय थे जिनकी रानी गुणमाला ने जौहर किया था। चंदेरी में ही संगीत सम्राट तानसेन समकालीन, बेजूबाबरा हुए जिनकी समाधि चंदेरी में है।55

अकवर के उपरान्त जब सलीम जहांगीर के नाम से गद्दी पर बैठा तो उसने ओरछा राज्य के वंशज संग्राम सिंह को चंदेरी परिक्षेत्र की जागीर दी। सन् 1616 ई0 में संग्राम सिंह के नाती भरत सिंह ने चंदेरी के साम्राज्य के विरोधी गोदराय को पराजित किया था। अतः शाहजहोँ ने प्रसन्न होकर चंदेरी इलाके की सरहद भरतसिंह को दे दी। मराठों के आक्रमण के उपरान्त सन् 1736 से चंदेरी, मुंगावली ईसागढ़, अशोकनगर आदि का भाग मराठों के हाथ में आ गया। मुगलों व मराठों के उपरान्त यह सम्पूर्ण क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन हो गया और एक संधि के अंतर्गत अंग्रेजों से यह भू-क्षेत्र ग्वालियर के सिंधिया शासकों द्वारा शासित होने लगा।56

करीला धाम समुद्र सतह से लगभग 550 मी. ऊपर स्थित हैं। यह अशोकनगर और मुंगावली के बीच स्थित है। सम्भवतः करीला के वृक्षों की अधिकता होने से यह स्थान करीला कहलाया है। यह लवकुश के जन्म स्थल के रूप में जाता है यहाँ रंगपंचमी को मेला भरता है। यहाँ बेड़नी नृत्य होता है। इस धाम में माँ जानकी लवकुश मंदिर, बाल्मीकि आश्रम, धर्मशाला, गढ़फेरा, जानकी तालाब, कुआ, गौशाला सभी पहाड़ी पर स्थित है। माँ जानकी की मूर्ति को ही करीला वाली माता के रूप में जाना जाता है।57 गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरित मानस में भी इस स्थान का भी उल्लेख मिलता है -

नव रसाल वन विहरन सीला, सोह कि कोकिल विपिन करीला।

रहहु भवन अस्स हृदय विचारी, चन्द वदनी दुख कानन भारी।।

सम्भवतः करील के वृक्षों की अधिकता होने से यह स्थान करील कहलाया। अशोकनगर का नाम पहले पछार फिर सम्राट अशोक के नाम अशोकनगर हुआ। कदवाया में प्राचीनकाल के शैव मठ हैं तथा थूबोनजी जी में 24 प्राचीन जैन मंदिर है। अशोक नगर में भी चौबीसी जैन मंदिर प्रसिद्ध है।

करीलाधाम आश्रम परिसर में माँ जानकी मंदिर के अंदर एक प्राचीन सिद्धों की गुफा है। यह गुफा माँ करीला आश्रम से ग्राम दियाधरी (अशोकनगर) तक है। इस गुफा में सिद्ध महाराज का स्थान गोडसिद्ध निवास करते हैं।

प्राचीन समय में करीला आश्रम के नजदीक हासी टोरा गाँव बसा हुआ था। गाँव की लड़कियों की शादी गाँव में उसी गँाव के लड़कों के साथ हो जाती थी। इस प्रकार 750 दामाद गाँव में रहते थे। इसी गाँव का लड़का इतिहास में ‘‘राजा सिया’’ के नाम से पुकारा जाता है।

आश्रम के निकट गढ़फेरा ग्वालियर स्टेट सिंधिया महाराज की गढ़फेरा एक चौकी थी। जो इसी पहाड़ियों के पास खण्डहर में स्थित है। यहाँ पिण्डरी लोग निवास करते थे। आसपास बहुत आंतक मचाते थे, जिससे लोग परेशान थे। अंग्रेज अधिकारी बारेन हेस्टिींग ने पिण्डारिया के प्रमुखों को बुलाकर टोंक, छबड़ा, सिरोंज, मोहम्मदगढ़, पठारी, कुरवाई की जागीर देकर भेज दिया, जिससे आतंक कम हुआ। एक पिण्डारी जिसका नाम चीता था, वह बलशाली था। उसे चीता उठाकर ले गया था।

इसके बाद सिंधिया स्टेट इसके आसपास का संचालन यहीं से होता था। गढ़फेरा मे अधिकारी कर्मचारी की फौज रहती थी। सिंधिया महाराज के आदेशानुसार करीला आश्रम के संचालन हेतु सहयोग दिया जाता था।

भारत वर्ष में त्रिकाल चौबीसी वेदी तीन स्थानों पर है परन्तु अशोकनगर जैसा मंदिर कहीं भी नहीं है। श्रेष्ठ मुनी श्री विद्यासागरजी के आशीर्वाद से 1992 में त्रिकाल वेदी की प्रतिष्ठा की गई। इस मंदिर में 111 प्रतिमायें 105 पत्थर की, 4 पीतल की, 2 प्रतिमायें सिद्धों की इस प्रकार कुल 111 प्रतिमायें हैं। जिससे भूतकाल, वर्तमानकाल, भविश्यकाल की प्रतिमाओं को दर्शाया गया है।

अशोकनगर से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर अमाई तालाब के समीप अत्यन्त प्राचीन गुफा है। जो विशाल वटवृक्ष के नीचे बनी हुई है। वटवृक्ष के नीचे बनी होने के कारण ही इसे अखयवट के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ गुफा के समीप एक सुरंग को देखा जा सकता है। जो अशोकनगर होती हुई ग्राम दियाधरी में खुलती है।

अशोकनगर से 9 किलोमीटर कचनार रोड पर प्राचीन नगरी ताम्रपणिनी तुमवन वर्तमान नाम ग्राम- तूमेंन के नाम से जाना जाता है। इस नगरी का पुराणों, सत्यनारायण की कथा एवं श्रीमद् भागवत में उल्लेख मिलता है।

तुमेन नगरी के राजा मोरध्वज, तंुगध्वज, गंदर्भ सेन थे। गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य का जन्म तुमन में ही हुआ था। राजा भर्तहरि उस समय गर्भ में थे। राजा गंधर्वसेन के समय देव प्रकोप के कारण सवा प्रहर धूल वर्शा हुई। राजा, रानी, मंत्री अन्य लोग गुप्त रास्ते से उज्जैन, मथुरा चले गये। पुरातत्व के अनुसार गुप्त रास्ता भूतेश्वर महादेव से बताया जाता है। सम्पूर्ण नगरी धूल से दब गई। समस्त नगर नष्ट हो गया था। माता विंध्यवासिनी देवी का मंदिर विशाल उसी काल से सुरक्षित प्राचीन कलाकृतियों की याद दिलाता है। इस ग्राम में सात देवी हैं जो गाँव के चारों ओर बैठी हैं। पूर्व दिशा में बीलटोरा माताजी, पश्चिम दिशा में मरई माता जी, उत्तर दिशा में खजूर वाली माताजी शेर पर सवार हैं, दक्षिण दिशा में शीतलामाता बीजासन देवी माता का मंदिर, विंध्यवासिनी माता के सामने मंदिर स्थित है। माताजी के मंदिर में अखण्ड ज्योति जल रही है। ग्राम के चारों ओर परकोटा(दीवार) खण्डहर अवस्था में हैं। यहाँ बलदाउ मंदिर, हजारिया शिवलिंग, भूतेश्वर महादेव, बैठा देव तूमेंन पहाड़ पर भगवान नरसिंह, भगवान, बराह, भगवान दत्तात्रेय, सेमरा पहाड़ पर माँ कालीदेवी, भेरोंजी साथ में स्थित हैं। इसी गाँव में त्रिवणी संगम स्थल है, जहाँ तीन नदियाँ आकर मिली हैं। खुदाई करने पर जगह-जगह मूर्ति, भवन निकल आते हैं। कभी-कभी खोदने पर चांदी-सोने के सिक्के मकान बनाते समय ग्रामवासियों को मिल जाते है।

अशोकनगर से 2 किमी. दूर तुलसी सरोवर के निकट श्री हनुमान जी (पछाड़ीखेड़ा) मंदिर स्थित है। यह मंदिर अति प्राचीन है। राष्ट्र कवि श्रीकृष्ण सरल ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता सेेनानी पं. चन्द्रशेखर आजाद ने साधु वेश में यहाँ रूककर स्वतंत्रता सेनानियों का देश की आजादी के लिए यहां रहकर संचालन किया था। वे श्री हनुमान जी की पूजा अर्चना, सेवा करते थे।

अशोकनगर से 15 किमी. रेल्वे स्टेशन शाढ़ौरा गाँव स्थित है। शाढ़ौरा एक प्राचीन गाँव है। इस गाँव में मराठा शैली के मंदिरों का निर्माण हुआ था। बस स्टेण्ड के पास एक विशाल गणेश मंदिर है। इस मंदिर में विराजमान श्री गणेश जी की प्रतिमा जैसी दूसरी मूर्ति दूर-दूर तक नहीं है। इसी प्रकार शाढ़ौरा तालाब के किनारे भव्य शिव मंदिर शोभायमान है। मंदिर में शिवलिंग, नादियाँ मराठा शैली की याद दिलाता है। शाढ़ौरा से 1 किमी. दूर एक शिव मंदिर प्राचीन विशाल मराठा शैली से बना हुआ है। यहीं श्री नारायण दास जी की समाधि स्थल है। यह एक तपोभूमि के नाम से विख्यात है। यह स्थान कुण्डलपुर कहलाता है।

अशोकनगर से 28 किमी. व ईसागढ़ से 8 किमी. चन्देरी रोड़ पर ढाकौनी गाँव स्थित है। बस स्टेण्ड चौराहा के सामने एक मंदिर एवं तालाब है। यह अति प्राचीन है, कहा जाता है कि यह मंदिर व तालाब राजा नल के समय बनाये गये थे। एक बार राजा नल को विपत्ति पड़ी तो राजा नल और उनकी पत्नी दमयंती विपत्ति के समय यहीं रुके। भूख से बेचैन राजा ने तालाब से मछली पकड़ी और तालाब के किनारे रख दी। खाने की तैयारी करने लगे।

जैसे ही मछली उठाने लगे तो वह उछलकर तालाब में चली गई। राजा नल ने माँ हरसिद्धि से प्रार्थना की तभी एक साधु आया और भोजन की व्यवस्था हुई। उस समय यहाँ ढाक वृक्षों का घनघोर जंगल था। इसलिये ढकवनी कहलाता था जो बिगड़कर ढाकोनी बना।

माँ की मूर्ति में काले रंग की छवि है जो उज्जैन की हरसिद्ध माता के रूप में विराजमान है। यहाँ तालाब में मछलियाँ काले रंग की भुनी हुई सी छवि की मिलती है।

अशोकनगर से 32 किमी. व ईसागढ़ से 4 किमी. दूरी पर आनन्दपुर में यह आश्रम स्थित है। स्वतंत्रता के पूर्व विभाजन केे बाद पाकिस्तान से गुरू महाराज के आदेशानुसार 5 शिष्य इस जंगल में आये और जंगल को साफ कर यह स्थान निर्मित किया। इस आश्रम में गुरू महाराज के संगमरमर के विशाल मंदिर शोभायमान है।

अशोकनगर से 36 किलोमीटर दूर ईसागढ़ कस्बा स्थित है, जिसका प्राचीन नाम हनुमान गढ़ कहलाता है। अंग्रेजों के समय सिंधिया स्टेट का ईसागढ़ जिले के रूप में जाना जाता था। ईसागढ़़ का नामकरण ईसाई शब्द से साम्य रखता है।

यहाँ प्राचीन गढ़ी, तालाब, कई प्राचीन मंदिर स्थित है। तालाब के किनारे बने मंदिर में एक सिद्ध पुरूष रहते थे। उसी मंदिर को गुरू महाराज का मंदिर कहा जाता है। कुछ भक्त इसी मंदिर को गुरू महाराज का मंदिर भी कहते हैं। कहा जाता है, कि ग्वालियर महाराजा श्रीमंत जीवाजीराव सिंधिया गुुरू महाराज से मिलने आये, गुरू महाराज ने देखते ही कहा तुम जिस काम से आये हो, वह मैं समझ गया। आपके घर पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। गुरू महाराज के आशीर्वाद से श्रीमंत माधवराव सिंधिया का जन्म हुआ।

नगर में देखने के लिए मोतीमहल, फूक बाबड़ी, छोटा किला, चंदेरी दरवाजा, परकोटा आज भी प्राचीन कला कृतियों की याद दिलाता है। अशोकनगर से 51 किलोमीटर तहसील ईसागढ़ से 15 किलोमीटर बीजासेन माता मंदिर कदवाया में स्थित है।

महाभारत काल में राजा शिशुपाल सिंह का जनपद के अंग के रूप में कदवाया आता था। यहाँ 12वी शताब्दी के शवि मंदिर मठ देखने को मिलते है। कहा जाता है कि ‘‘छप्पन मठ चौरासी कुआ, चार तालियाँ चार ताल इनके बीच कदवाया बसा’’ यहाँ शैव सम्प्रदाय के मठ थे। जिनमें दो मठ प्रसिद्ध है, जिन्हें मुरायते कहते है। खण्डहर अवस्था में शिवमंदिर प्राचीन कलाकृतियों के जीवित उदाहरण देखे जा सकते है। यहाँ प्राचीन एक गढ़ी है। जो छः मंजिल थी एक मंजिल गिर गई है दो मंजिल है जो दिखाई देती है। तीन मंजिल भूमि के अंदर बनी है। पुरातत्व विभाग की खुदाई से एक बाबड़ी इसी गढ़ी में मिली है। पुरातत्व विभाग द्वारा खोज चल रही है। शिवमंदिर खजुराहों शैली पर बने है। कुछ मंदिर एक पत्थर से ही निर्माण हुए बने है।

अशोकनगर से 66 किलोमीटर एवं ढाकौनी से 30 किलोमीटर पर चंदेरी स्थित है। महाभारत काल में राजा शिशुपाल की नगरी चंदेरी कही जाती थी। यहाँ के राजा मेदिनीराय ने 29 जनवरी 1528 ई.वी. में बाबर से युद्ध किया था। पहाड़ी क्षेत्र होने से बाबर ने एक रात्रि में घाटी को कटवाया था, तभी सेना प्रवेश कर पाई थी जिसमें मेदिनीराय की हार हुई थी। आज भी वही घाटी कटी घाटी के नाम से जानी जाती है।

माँ जागेश्वरी का मंदिर किले के पास काफी ऊँचाई पर पहाड़ में बना हुआ है। यहाँ पहाड़ी से निरंतर जल गिरता रहा है। मंदिर के पास कुण्ड बने हुए है। उनमें पानी भर जाता है।

यहाँ प्राचीन कलाकृतियाँ आसपास देखी जा सकती है, जिनका प्राचीन महत्व है। किला, किला कोठी, रानीमहल, रानीजौहर, बेजूबाबरा, संगीत सम्राट की समाधि, खूनी दरवाजा, काटीकाटी, फुवारे जी, खण्डर जी, संकल कुण्ड, कौसीकमहल, शनीचरा मंदिर, सिंहपुर महल, लक्ष्मण मंदिर, मालन खौ, जैन चौबीसी, बड़े गणेश जी, परकोटा, अन्य प्राचीन कलाकृतियों के नमूने मन को मोहने वाले देखे जा सकते है। पुरातत्व विभाग द्वारा मूर्तियों को एकत्रित करके संग्रहालय बनाया गया है। शासन द्वारा पर्यटन स्थान चंदेरी घोशित किया गया है।

अशोकनगर से 73 किलोमीटर, रेल्वे स्टेशन मुगाँवली से 15 किलोमीटर जैन तीर्थ क्षेत्र निशई जी स्थित है। यहाँ श्री मद् तारण मडलाचार्य की समाधि स्थली तीर्थ क्षेत्र है। जहाँ मंदिर विशाल धर्मशाला है। मंदिर में मूर्ति के स्थान पर ग्रंथ रखे हुए है। मूर्ति के स्थान पर ग्रंथों की पूजा की जाती है।

मुगाँवली से 16 किलोमीटर, प्राचीन स्थान मल्हारगढ़ स्थित है। यहाँ किला मैदानी है, किले पर विशाल बड़ी चार तोपे रखी हुई है। यहाँ प्राचीन समय से संस्कृत विद्यालय आश्रम है। यहाँ प्राचीन लक्ष्मीनारायण मंदिर, बिहारी मंदिर दूसरी मंजिल पर बना है। यहाँ चार बाबड़ी और प्राचीन नक्काशी देखी जा सकती है। गणेश कुण्ड यहाँ से 4 किलोमीटर दूर वेतवा नदी के बीच एक टापू पर स्थित है जिसे महुटा के नाम से जाना जाता है। यहाँ प्राचीन मंदिर तथा कुण्ड स्थित है।

पिपरई ग्राम रेल्वे स्टेशन से 12 किलोमीटर व चंदेरी रोड ग्राम तारई से 8 किलोमीटर प्राकृतिक कुण्ड भरका स्थित है। यहाँ प्राकृतिक कुण्ड है और नदी का पानी बहुत ऊँचाई से नीचे गिरता है। नीचे ही गुफा में शिवलिंग, हनुमानजी, गोड़बाबा का स्थान है। यहाँ प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर ग्रामीण मेला लगता है।

थूवोन अशोकनगर से 27 किलोमीटर दूर चंदेरी के निकट जैन अतिशय क्षेत्र स्थित है।58

22. आनंद कुमार शर्मा - ग्वालियर का गौरव सिंधिया परिवार (आलेख) - दैनिक आदित्याज

विशेशांक - 14.09.08 पृ0 48 ।

23. डॉ0 हरिबल्लभ माहेश्वरी जैसल - ग्वालियर इतिहास, संस्कृति एवं पर्यटन् पृष्ठ 10 ।

24. डॉ0 प्रमीला कुमार - मध्यप्रदेश का प्रादेशिक भूगोल म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी भोपाल संस्करण

1987 पृ0 38

25. वही

26. डॉ0 राजकुमार शर्मा - मध्यप्रदेश के पुरातत्व का संदर्भ ग्रंथ म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी प्रथम

संस्करण 1974 पृ0 100

27. डॉ0 अयोध्या नाथ पाण्डे - चंदेलकालीन बुन्देलखण्ड का इतिहास हिन्दी साहित्य सम्मेलन

प्रयाग प्रथम संस्करण 1968 पृ 39

28. डॉ0 राजकुमार शर्मा - मध्यप्रदेश के पुरातत्व का संदर्भ ग्रंथ म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी प्रथम

संस्करण 1974 पृ0 103-104

29. डॉ0 वृन्दावनलाल वर्मा - मृगनयनी मयूर प्रकाशन झांसी - परिचय

30. वही

31. डॉ0 भारती दीक्षित- ग्वालियर- चम्बल संभाग के कहानीकारों के नारी पात्र (शोध ग्रंथ -

जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर) पृष्ठ 15 ।

32. डॉ0 पद्मा शर्मा इतिहास और स्थापत्य का संगम शिवपुरी (आलेख) - दैनिक आदित्याज

विशेशांक - 14.09.08 पृ0 10 ।

33. हरिनिवास द्विवेदी -मध्यभारत का इतिहास - पृ0 36 ।

34. देवेन्द्र शर्मा - शिवपुरी जिला परिचय (आलेख) - मध्यप्रदेश लेखक संघ शिवपुरी इकाई द्वारा

वर्ष 2002 में स्मारिका प्रकाशित स. अरूण अपेक्षित पृ0 36

35. डॉ0 भारती दीक्षित- ग्वा. -चम्बल संभाग के कहानीकारों के नारी पात्र (शोध ग्रंथ - जीवाजी

विश्वविद्यालय ग्वालियर) पृष्ठ 14 ।

36. संपादक के0बी0एल0पाण्डेय - दतिया उद्भव और विकास पृष्ठ 41 ।

37. डॉ0 कामिनी - दतिया जिले के इतिहास की पृष्ठभूमि (आलेख) दैनिक आदित्याज विशेशांक -

14.09.08 पृ0 57 ।

38. एम0डी0मिश्रा ‘‘आनंद’’ ओरछा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि(आलेख)दैनिक आदित्याज विशेशांक 14.09.08

पृ0 51

39. राधारमण वैद्य (आलेख) दतिया जनपद: पुरातात्त्विक संकेत - संपादक के0बी0एल0पाण्डेय -

दतिया उद्भव और विकास पृष्ठ 12 ।

40. वही पृ0 17

41. राधाचरण गोस्वामी (आलेख) दतिया के पुरातत्व संकेत - संपादक के0बी0एल0पाण्डेय - दतिया

उद्भव और विकास पृष्ठ 20 ।

42. डॉ0 के0पी0तिवारी - बुन्देलखण्ड का बृह्द इतिहास - पृ0 87

43. वही पृ0 89

44. पदकपंण्हवअण्पदण् 26.11.08

45. संपा. आर0के0 पटेरिया, विष्णुसाथी- स्मारिका -आस्था (1997) प्रकाशक नगरपालिका परिशद

गुना पृ 21

46. डॉ0 राजकुमार शर्मा - मध्यप्रदेश के पुरातत्व का संदर्भ ग्रंथ म.प्र. - हिन्दी ग्रंथ अकादमी प्रथम

संस्करण 1974 पृ0 126

47. वही पृ0 386

48. डॉ0 रमेशचंद्र श्रीवास्तव - बुन्देल खण्डः साहित्यिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक वैभव पृ0 02 ।

49. डॉ0 राजकुमार शर्मा - मध्यप्रदेश के पुरातत्व का संदर्भ ग्रंथ म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी प्रथम

संस्करण 1974 पृ0 187-188

50. डॉ. काशीप्रसाद त्रिपाठी - बुन्देलखण्ड का बृह्द इतिहास - पृ0 76 -77 ।

51. शैलेन्द्र सिंह भदौरिया - ग्वालियर के राजपूत पृ0 30-31

52. संपा. आर0के0 पटेरिया, विष्णुसाथी- स्मारिका -आस्था (1997) प्रकाशक नगरपालिका परिशद

गुना पृ 21

53. श्री महेन्द्र शर्मा - सबसे न्यारा करीला धाम - परिचय

54. सम्पादक मण्डल - म.प्र. एक अध्ययन पृ0 15 ।

55. डॉ0 औंकारलाल शर्मा ‘‘प्रमद’’(भूमिका) -सबसे न्यारा कराीला धाम-लेखक महेन्द्र शर्मा पृ0 04

56. डॉ0 काशीप्रसाद त्रिपाठी - बुन्देलखण्ड का बृह्द इतिहास - पृ0 76-77

57. श्री महेन्द्र शर्मा - सबसे न्यारा करीला धाम - पृ0 5 से 7 तक

58. वही पृ. 16 - 35