Suljhe Ansuljhe - 21 in Hindi Social Stories by Pragati Gupta books and stories PDF | सुलझे...अनसुलझे - 21

सुलझे...अनसुलझे - 21

सुलझे...अनसुलझे

मेरी ज़िंदगी

-----------------

आज जब सवेरे-सवेरे मेरे स्कूल की मित्र वृन्दा का बरसों बाद फ़ोन आया तो अनायास ही मेरे चेहरे पर, एक तरफ तो मुस्कराहट की लहर दौड़ गई और दूसरी तरफ़ पांच साल पहले उसके साथ हुए हादसे की कुछ-कुछ अधूरी-सी दुखद यादें भी साथ-साथ ही हरी हो गई|

पांच साल पहले जब अनायास ही एक दिन मुझे, हमारी किसी दूसरी स्कूल मित्र से पता चला कि वृन्दा की पच्चीस वर्षीया बेटी पंखुरी की, एक एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई है| हम सभी मित्रों के लिए यह ख़बर बहुत झंझकोरने वाली थी, क्यों कि हम सभी के बच्चों की उम्र लगभग एक-सी होने के कारण सबके सुख-दुःख साझे थे|

हादसे के तुरंत बाद बहुत बार मैंने वृन्दा से संपर्क साधने की कोशिश की| पर शायद वृन्दा ने अपना फ़ोन ही स्विच ऑफ करके रख दिया था| आज पांच साल बाद अचानक से वृन्दा का फ़ोन आते हुए देख कर मेरी आँखें नम हो गई, क्यों कि शायद कही गहरे से सोचूं तो मुझे वृन्दा के हालचाल जानने के लिए, उसके फ़ोन की काफ़ी समय से प्रतीक्षा थी|

‘कैसी है वृन्दा? कब से तेरे फ़ोन के लिए प्रतीक्षारत थी..कहाँ से बोल रही है तू?...मैंने फ़ोन को रिसीव करते ही पूछा|

‘मैं ठीक हूँ विजया| आज तेरे शहर में ही मेरे पति के ऑफिस की एक मीटिंग है| आज रात को ही हमारी ट्रेन भी है| बता कहाँ मिल सकती है तू? मैं मिलने आ जाउंगी| बाकी बातें वही करेगे|’ वृन्दा ने मुझ से पता पूछा और वह मेरे पास घंटे भर में पहुँच गई|

इतने अरसे बाद जब मैंने उसको देखा तो कसकर गले मिलकर, हम दोनों सखियाँ पहले तो न जाने कितनी देर तक एक दूसरे के कंधे पर आंसू बहाती रही फिर मैंने अनायास ही पूछा...

‘कौन छोड़ने आया था तुझे वृन्दा?...

‘मेरे पति की ऑफिस की कार मुझे छोड़ने आई थी विजया| बेटी के साथ हादसा होने के बाद से, मेरे पति मुझे अकेला नहीं छोड़ते है| उनकी किसी भी शहर में मीटिंग हो, हम दोनों साथ ही निकलते है| इकलौती बेटी के जाने के बाद, कैसे मेरे पति सुरेश ने ख़ुद को संभाला, मैं नहीं जानती पर शायद अगर सुरेश ख़ुद को, समय पर नहीं सँभालते तो घर चलाना मुश्किल हो जाता|’...

वृन्दा बोलकर चुप तो हो गई पर उसकी आँखों में, बार-बार तैरती नमी मुझे बार-बार महसूस करवा रही थी कि वृन्दा अब काफ़ी संभल तो चुकी है पर मानसिक तौर पर बहुत मजबूत नहीं हो पाई है|

सब कुछ बहुत स्वाभाविक ही था| जवान संतान का अनायास ही चले जाना समय के साथ जनकों को आगे चलने-बढ़ने के लिए खड़ा तो कर देता है, पर एक टूटन सोते-जागते उनका कभी भी पीछा नहीं छोडती है|ऐसे में निमित्त के आगे माँ-बाप अपना सिर झुकाते हैं| पर गए हुए बच्चे की कमी सीने से नहीं छूटती| जिसकी गवाही पल-पल पर नम होती उनकी आँखें देती हैं|

‘यह तो बहुत अच्छी बात है वृन्दा कि अब तूने घर के बाहर निकलना शुरू कर दिया है| सब धीरे-धीरे समय के साथ ठीक हो जायेगा| जैसे ही मैंने वृन्दा का हाथ अपने हाथों में लिया, वृन्दा की आँखों से आंसुओं की धारा टपटप मेरे हाथों पर गिरने लगी और उसने सुबकते हुए मुझ से कहा...

मेरी बेटी पंखुरी की कहानी नहीं सुनेगी तू विजया? मेरी बेटी के हादसे की असल कहानी आज तक किसी को नहीं पता विजया, क्यों कि मैंने किसी को बताई ही नहीं| कैसे मैं दिल्ली जैसे बड़े शहर में पली-बड़ी अपनी बेटी की नादानियों को सबके सामने कहती| बहुत होशियार थी मेरी बेटी एम.बी.ए करने के बाद बहुत अच्छी नौकरी करने लगी थी| कब उसकी संगत बदली वो मुझे नहीं पता ही चला| मैं तो उसकी शादी का सोच रही थी|’...

अब वृन्दा बोलते-बोलते चुप होकर शून्य में ताकने लगी थी| शायद गुजरा हुआ एक-एक घटनाक्रम उसकी आँखों के सामने से गुजर रहा था|

‘अगर तेरा मन अच्छा नहीं है तो मत बता वृन्दा मैं कभी और सुन लूँगी|’...मैंने कहा|

‘नहीं विजया तू सुन ले प्लीज, शायद मेरी मदद कर सके|...मैं तुझे पंखुरी की नौकरी के बाद के उन सभी घटनाक्रमों को ज्यों का त्यों सुनाना चाहती हूँ जिनको मैंने झेला है विजया| फिर तू मुझे बताना, कहाँ पर गलत हूँ मैं| क्या मेरी परवरिश में कोई कमी रह गई|...शायद हल्की हो जाउँगी तुझको बताने से| आज भी जब याद करती हूँ चलचित्र सा सामने चलने लगता है विजया....

‘माँ! आज हम सभी मित्रों की होटल पार्क में ऑफिस के बाद पार्टी है| रात देर हो जाएगी आने में। हर बार की तरह इंतज़ार मत करना।’..अक्सर ही पंखुरी मुझे किसी भी पार्टी में जाने से पहले कुछ इस तरह ही बताया करती थी|

‘कौन-कौन जा रहा है बताओगी या फिर हमेशा की तरह कहोगी ,आप जानती तो हो माँ मेरे सभी दोस्तों को, फिर बार-बार क्यों पूछती हो?’...

मेरे बार-बार पूछने पर मुझे यही ज़वाब मिला करता था कि...

‘यही तो माँ! बड़ी हो गई हूं अब मैं|....कमाती है अब आपकी बेटी ...ऑफिस में काम करती है।..अब सोचना बंद कर दें मेरे लिए ..मेरे ज़िन्दगी है यह, मुझे मेरी तरह जीने दें।...’ विजया! पंखुड़ी का हमेशा ही यह कहा हुआ डायलॉग मुझे बहुत आहत करता था| पर इतने बड़े बच्चों से बहुत ज्यादा प्रश्न करना शायद मेरे जैसे कई माँ-बाप को आहत करता है|

पंखुड़ी के हमेशा ही, इस तरह की बातें बोलने पर मुझे भी यही लगता कि मुझे यह सोच लेना चाहिए कि मेरी बेटी बड़ी हो गई है और अपने निर्णय ले सकती है| सो मैंने भी हमेशा ही उससे उतना ही पूछने की कोशिश की जितना जरूरी थी| पर मैं दबी आवाज़ में ख़ुद से ही कहती थी.....

‘जानती हूँ बेटा! तुम्हारी ज़िन्दगी है।’..फिर मन ही मन, मैं बुदबुदा जाती.. ‘पर तुम तो मेरी बेटी हो ...मेरे शरीर का हिस्सा ...शायद मेरा बहुत कुछ|’....

गुज़रती रातों में कई-कई बार पंखुरी के कमरे के चक्कर लगाना, मैं कभी नहीं भूलती थी। पर कब पंखुड़ी का इंतज़ार करते-करते मेरी भी आँखें लग जाती, पता ही नही चलता। कई-कई बार सवेरे हड़बड़ा कर उठती तो पंखुरी को सवेरे तक भी नदारद पाती। कुछ भी बोलने पर वही जवाब ‘दोस्त के यहां थी माँ ...बहुत मत सोचा करो। समझ है मुझे अपने अच्छे-बुरे की, मुझे अपनी तरह जीने दो...

‘पंखुरी की समय के साथ रोज़-रोज़ की पार्टियां भी बढ़ती ही जा रही थी। कभी नशे में धुत्त लौटती तो कभी ,चार-पांच लड़के -लड़कियों के साथ। सारे के सारे एक ही कमरे में बंद हो जाते और रात- रात भर उड़दंग चलता। रसोई में उन सबका आना-जाना बना रहता। कभी कुछ बाहर से ऑर्डर किया जाता, तो कभी रसोई के फ्रिज से बर्फ निकालने की आवाज़े आती|...

चूँकि मेरा और सुरेश का कमरा नीचे ही था तो मुझे उन सभी की अस्पष्ट-सी आवाज़े सुनाई देती थी| पर जानती है विजया, जब पंखुरी के दोस्त घर में होते, मैं उस समय रसोई या उसके कमरे में जाने का भी नहीं सोच पाती थी| मुझे लगता था, कहीं पंखुरी अपने दोस्तों के सामने मुझे से कुछ ऐसा नहीं कह दे, जो मुझे आहत करे|...

‘पंखुरी के पिता सुरेश की नौकरी शहर से बाहर होने से ,उनका आना- जाना महीने में एक आध बार ही होता था। मैं उनको कुछ बोलती-बताती तो, दूर से बैठ कर वो बातों की गंभीरता को इतना नही सोच पाते और मैं भी पंखुड़ी को समझा -समझा कर थक चुकी थी|...

‘अच्छी पढ़ाई लिखाई करवाने के बाबजूद भी, ऐसा रूप सामने आएगा मैंने कभी नही सोचा था। बहुधा यही सोचा जाता है कि पढ़ाई लिखाई व्यक्तित्व में सोच को उच्चता देती है। पर मेरी पंखुरी के केस में ऐसा कुछ नहीं हुआ|

बहुत अधिक शराब और ड्रग्स लेने से पंखुरी अब बीमार रहने लगी थी और मेरा कुछ भी बोलना-समझाना ,पंखुरी से मेरी बेज्जती ही करवाता था। अब मूक दर्शक बनी मैं सिर्फ पंखुरी को आते-जाते देखती और उसके घर को लौटते कदमों की राह देखती। तो कभी ईश्वर के आगे उसके लिए प्रार्थनाये करती|

तभी एक दिन अचानक देर रात बजी फ़ोन की घंटी ने मुझे बहुत घबरा ही दिया। शहर के एक हॉस्पिटल से फ़ोन था...

‘आपकी बेटी का नशे की हालत में गाड़ी चलाते हुए एक एक्सीडेंट किया है| जल्दी ही हॉस्पिटल पहुँचें। काफ़ी सीरियस है वो| शायद किसी नर्सिंग स्टाफ का फ़ोन था| जैसे-तैसे अपनी कार को ड्राइव करके मैं हॉस्पिटल पहुंची तो ...खून से लथपथ पंखुड़ी को आई.सी.यू. के बिस्तर पर देखा और एक बार तो मैं पूरी तरह हिल गई फिर खुद सयंत होकर नर्स से पूछा ।

‘इस एक्सीडेंट में और किसी को चोट तो नही आई ।’...

‘नही मैडम बस नशे की हालत में पंखुरी की गाड़ी, रोड साइड पर खड़ी गाड़ी से टकराई| ..दरअसल उस गाड़ी में बैठे हुए लोग गाड़ी खराब हो जाने की वज़ह से गाड़ी के बाहर खड़े होकर मैकेनिक का इंतज़ार कर रहे थे। शुक्र है उन लोगों की गाड़ी तो बुरी तरह टूट गई...पर पूरा परिवार सही सलामत है। पर आपकी बेटी को, कार की स्पीड बहुत तेज होने से काफ़ी सारी चोटें आई है... काफ़ी सीरियस है वो| जानती है विजया उसी वक़्त मुझे अपने हाथों से सब कुछ छूटता नज़र आ गया था|...

हॉस्पिटल में अवाक खड़ी मैं अपने आपको कुछ पागल-सी ही महसूस कर रही थी|...तभी मुझे हॉस्पिटल में लगी भगवान की मूर्ति नज़र आई ,तो उसके आगे शीश झुकाकर ,मैंने ईश्वर को उस अनजान परिवार को बचा लेने की लिए धन्यवाद कहा| साथ ही ईश्वर से अपनी बेटी की सलामती की प्रार्थना की| फिर मैं आई. सी.यू. की तरफ वापस बढ़ गई...

‘विजया! पंखुरी लगातार उस समय माँ ,माँ बड़बड़ा रही थी। कभी थोड़ा होश में आती तो कराहती हुई बोलती ...’मुझे बचा लो माँ... अपनी बेटी को बचा लो ...बहुत दर्द है मेरे...सहन नहीं हो रहा...

मैंने पंखुरी के माथे पर हाथ रखा और उसके बालों को जाने कब तक सहलाती रही। उस वक़्त मेरी आंखों से आँसुओं का बहना रुक नहीं रहा था| शब्द खो गए थे। बार-बार पंखुरी के कहे, वही वाक्य आस-पास से होकर गुज़र रहे थे। जिनकी वज़ह से मेरा अब पुत्री मोह टूटने लगा था।...

‘मेरी ज़िंदगी है मुझे अपनी तरह जीने दो माँ। मुझे आपकी हर बात में दखलंदाज़ी करना बिल्कुल अच्छा नही लगता। आप अपना काम करिये। अपना कमाती खर्च करती हूं ,आपसे नही मांगती ,फिर क्यों मुझे इतना टोकती हैं।’

मैंने उस दिन पंखुरी की टूटती सांसो को बहुत करीब से महसूस किया और मैं मन ही मन बुदबुदाने लगी..

‘पंखुरी मैंने तो तुमको, तभी से धीरे-धीरे छोड़ना शुरू कर दिया था बेटा ,जिस दिन से तुमने मुझे अपनी ज़िंदगी से हटाना शुरू कर दिया था। मैंने जन्म दिया था तुमको। तुम्हारी चिंता करना मेरी आदतों में था बेटा पर ज्यों-ज्यों तुम मुझे ख़ुद से अलग करती गई ,मैं अपनी उसी टूटन को साध कर तुमसे दूरी बनाने में इस्तेमाल करती गई। बहुत मुश्किल अभ्यास था यह बेटा। आख़िरकार तुमको भी तो कभी बड़ा मानकर ,मुझे तुम्हें अपने जीवन के निर्णय लेने के लिए छोड़ना ही था।....तुम्हारी ज़िन्दगी ही थी बेटा। तुमने जो किया वो तुम्हारी ज़िन्दगी की सोच से जुड़ा था। उसमें हमारी चिंताएं कहां थी बेटा? तुम्हारी ज़िन्दगी थी ,तभी तुम सिर्फ अपना सोच पाई|...

सच कह रही हूँ विजया उस दिन न जाने कैसे मैं अपनी ही बेटी के लिए यह सब बुदबुदाती गई| आज सोचती हूँ तो लगता है माँ होकर क्या मुझे इतना कठोर होना चाहिए था|...

‘आज ख़ुद को आधुनिक पीढ़ी की श्रेणी में रखने वाले बच्चों का यही सच है। जिनको आधुनिकता ,स्वतंत्रता और उश्रृंगलता के मायने नही पता| कब टूटती सांसो ने पंखुड़ी का साथ छोड़ा ,यह मुझे ,मुआफी मांगती पंखुड़ी की आँखों में नज़र आ गया था।...

‘जो बच्चे माँ-बाप को कमजोर बनाते है वही कई बार उनकी जिद्दो की वजह से मजबूत भी बन जाते है। इसका अहसास उस दिन मुझे बखूबी हुआ विजया| उस दिन हॉस्पिटल की सीढ़िया पहले चढ़ते और फिर उतरते समय मैं ,ईश्वर के आगे अपना सर झुकाना नही भूली। पर विजया नहीं भूल पाती हूँ मैं अपनी बेटी को| हालांकि मैंने स्वयं को खूब समझा-बुझा लिया है पर मैं पूरी तरह ठीक नहीं हूँ... बता न मैं क्या करूँ|’

‘सब ठीक हो जायेगा वृन्दा बस तू अब मेरे संपर्क में रहना| हालांकि बच्चों को खोने का दुःख सारी उम्र सालता है| पर हम सभी को सुख हो चाहे दुःख स्वीकारने ही होते है| कम से कम तुझे अपनी बेटी की गलतियों का अहसास तो था| नहीं तो आजकल माँ-बाप भी बच्चों की गलतियों को ढकते है| तुझ जैसी हिम्मती माँ तो मिसाल है| सब ठीक हो जायेगा समय के साथ बस तू अपने आप को अँधेरे में मत छुपा| गलती तेरी कहाँ है, आजकल के माहौल की है जिसको आधुनिकता मान कर बच्चे भ्रमित हो रहे है और कब ये ही भटकन उनको गर्त में धकेल देती है उनको आभास भी नहीं होता| मैं तेरे साथ हूँ हमेशा रहूंगी| बोलकर मैं उसकी तरफ उसके उत्तर का इंतज़ार करने लगी|

‘विजया! मेरी बेटी का हादसा बोझ था मुझ पर| इतनी सारी बातें मैंने सुरेश को भी नहीं बताई थी क्यों कि वो तो यही सोचते मेरी परवरिश में कमी रही होगी या मैंने ध्यान नहीं रखा होगा| पर अब तेरे से बात करने के बाद बहुत हल्का महसूस कर रही हूँ|’...

वृंदा के जीवन में हुए इस हादसे को सुनने के बाद न जाने कितनी देर तक हम दोनों चुपचाप बैठे रहे| फिर वृन्दा ने उठकर मुझे गले लगाकर विदा ली और कहा...

‘अब मैं तुझ से जब भी मिलूंगी दूसरी बात करुँगी| पर तू कहानियाँ भी लिखती है न| एक कहानी, आज के युवाओं की मनमानियों पर भी लिखना ताकि उनको महसूस हो परिवार में किसी की भी ज़िन्दगी सिर्फ उसकी नहीं होती, सभी की ज़िन्दगी का मूल्य एक दूसरे के लिए बहुत होता है| सिर्फ अपनी ही मनमानी करना दूसरों को बहुत आहत कर सकता है|

लिखेगी न विजया तू मेरी बेटी पर एक कहानी|’ मेरे सहमति में सिर हिलाते ही वृन्दा ने सकूं की सांस ली| शायद वो चाहती थी हर युवा इस कहानी को पढ़े और अपनी ज़िन्दगी के साथ खिलवाड़ न करे|’....

प्रगति गुप्ता