vachan - 1 in Hindi Classic Stories by Saroj Verma books and stories PDF | वचन--भाग(१)

वचन--भाग(१)

वचन--भाग(१)

चंपानगर गाँव____
सेठ मनीराम अपनी दुकान में बैठकर सामान को तुलवा रहें हैं, पुरोहित जी के बेटे की शादी है तो सारा सामान मनीलाल जी के यहाँ से खरीदा जा रहा है___
ये दीनू क्या कर रहा है ? ध्यान से कर,देख ना तराजू टेढ़ा जा रहा हैं, उस पर बराबर बाँट रख,सामान की मात्रा कम नहीं होनी चाहिए, नहीं तो लोग कहेगें कि मनीराम बेईमान हैं, मनीराम जी बोले।।
तभी पुरोहित जी बोले__
नहीं सेठ मनीराम,तुम पर हमें पूरा भरोसा हैं, इसलिए तो तुम्हारी ही दुकान से सामान खरीदने आते हैं।।
बस,यही ईमानदारी और मुँह के मीठे ही बोल ही तो साथ जाते हैं पुरोहित जी!वरना इंसान मरने के बाद भला क्या ले जाता है, बेईमानी करके कितना कमा लूँगा भला,फिर ऊपरवाले को क्या मुँह दिखाऊँगा,सेठ मनीराम बोले।।
सेठ मनीराम,एक तुम हो जो ईमानदारी पर जीते हो और एक वो तुम्हारा दोस्त हीरालाल, वो तो बस,बेईमानी की ही खाता है, पुरोहित जी बोले।।
उसके कर्म उसके साथ,मेरे कर्म मेरे साथ,मनीराम जी बोले।।
तभी दुकान के द्वार पर डाकिया आया,उसने साइकिल की घंटी बजाई और बोला,सेठ जी शहर से चिट्ठी आई हैं__
हाँ...हाँ...आता हूँ, लगता हैं प्रभाकर की चिट्ठी आई होगीं,उसके इम्तिहान हो गए है, शायद गाँव आने की ख़बर भेंजी होगी,सेठ मनीराम जी बोले।।
सेठ जी ने डाकिए से चिट्ठी ली,फौरन खोल कर पढ़ने लगे चिट्ठी पढ़कर खुशी के मारे भीतर चले गए और भीतर जाकर बोले___
अरी भाग्यवान!सुनती हो...
कहाँ हो सुनती हो.....
हाँ..आई...,आई...क्यों आसमान सिर पर उठा रखा है लो आ गई, बाड़े में गाय को भूसा डाल रही थी,अब बोलो क्या बात है, कौशल्या बोली।।
अरे,प्रभाकर आठ तारीख को आ रहा हैं और आठ तारीख तो कल ही हैं, शाम तक उसकी गाड़ी पहुँच जाएगी, पास वाले कस्बे के रेलवे स्टेशन पर,उसे लेने जाना होगा,सेठ मनीराम बोले।।
हाँ..हाँ अभी आज रात पड़ी हैं,इतना क्यों परेशान होते हो जी! कौशल्या बोली।।
हाँ..हाँ..लेकिन घोड़ा गाड़ी वाले को तो कहना पड़ेगा,स्टेशन यहाँ से पन्द्रह किलोमीटर दूर है, अरे दिवाकर कहाँ गया,उसे तो घरबार की तो जैसे कोई चिंता ही नहीं,ना जाने कहाँ आवारा बना घूमा करता है, मनीराम जी बोले।।
अरे,इत्ता क्यों बिगड़ते हो,होगा यहीं कहीं,कौशल्या बोला।।
तुम तो हमेशा उसका ही पक्ष लोगी,तुम्हारा ही हाथ हैं, उसे बिगाड़ने में,सेठ मनीराम बोले।।
क्या करूँ, माँ हूँ उसकी ,बेवजह मुझसे नहीं डाँटा जाता तुम्हारी तरह,कौशल्या बोली।।
लेकिन है कहाँ,तुम्हारा लाड़ला! सेठ मनीराम बोले।।
होगा कहीं, मैं क्या जानूँ, क्या हरदम मैं उसके पीछे भागा करती हूँ, कौशल्या बोली।।
कभी सीधा जवाब मत देना,मैं ही ढ़ूढ़ लेता हूँ, सेठ मनीराम बोले।।
उधर दिवाकर बगीचें में बिन्दवासिनी के साथ,अमरूद तोड़ रहा हैं___
ओ देवा! देखो तो वो अमरूद कित्ता पका लग रहा हैं, जरा वो वाला तो तोड़ना, बिन्दवासिनी बोली।।
हाँ..हाँ..क्यों नहीं, तूने मुझे तो नौकर समझ रखा है ,दिवाकर बोला।।
देवा!ये कैसी बातें कर रहे हो? जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती,ये रहे तुम्हारे तोड़े हुए अमरूद,अब मैं घर जाती हूँ और अमरूद फेंककर बिन्दवासिनी जाने लगी....
अरे,रूक जा बिन्दू! मेरे कहने का ये मतलब नहीं था,देवा बोला।।
हाँ...हाँ..मैं खूब समझती हूँ कि तुम क्या कहना चाहते थे,बिन्दू बोली।।
ना बिन्दू, ऐसा कुछ नहीं है, दिवाकर बोला।।
ऐसा ही है और बिन्दवासिनी एक पल भी बगीचे में ना ठहरी और सीधी घर जाकर रूकी।।
इधर दिवाकर का मन भी खराब हो गया वो भी सारे अमरूद वहीं छोड़कर चला आया।।

मनीराम और हीरालाल दोनों दोस्त थे,दोनों ने साथ में आधे आधे पैसे लगाकर कारोबार शुरू किया था,धन्धा बहुत अच्छा चल रहा था,तभी गाँव में बाढ़ आ गई, जो कुछ था,सब बाढ़ में खतम हो गया,दोनों के पास कुछ ही जमापूँजी रह गई, दोनों ने परिवार सहित दूसरे गाँव का रूख़ किया और वहाँ एक जमीन खरीदकर अगल बगल रहने लगें,हीरालाल की बेटी बिन्दवासिनी और मनीराम का छोटा बेटा दिवाकर हम उम्र थे,दोनों साथ खेलते,साथ पढ़ते।।
मनीराम और हीरालाल ने फिर साथ में कारोबार शुरु कर दिया लेकिन हीरालाल की बेईमानियों से तंग आकर मनीराम ने कहा कि अब हम और संग ना रह पाएंगे, तुम अलग धंधा करो और मैं अलग,दोनों में इतना मनमुटाव हो गया कि घरों के बीच में दीवार खड़ी हो गई,लेकिन हीरालाल और मनीराम की बीवी और बच्चों के बीच पहले जैसा ही स्नेह बना रहा,बिन्दू और दिवाकर ऐसे ही झगड़ते रहते लेकिन एकदूसरे के बिन रह भी नहीं पातें,दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन दोनों को पता नहीं हैं क्योंकि आज तक एक दूसरे से ज्यादा दिनों के लिए जुदा जो नहीं हुए।।
दिवाकर,मुँह फुलाए हुए ,घर में घुसा ही था कि मनीराम चिल्लाते हुए बोले कि कहाँ गया था,पता है कब से ढूंढ़ रहा हूँ?
जी,बाबूजी बस ऐसे ही थोड़ा तालाब की ओर निकल गया था,दिवाकर बोला।।
अच्छा, ठीक है... ठीक है, ज्यादा सफाई देने की जरुरत नहीं है, जैसे मैं तेरे बारें में कुछ नहीं जानता,दिनभर आवारा बना घूमता है, ना पढा़ई की खबर और ना दुकान की,दिनभर बस लाटसाहब बना फिरा करता है,मनीराम जी बोले।।
अब घर आ गया ना,जो काम हो तो बता दो,क्यों चिक चिक करते हो जी,कौशल्या बोली।।
हाँ..हाँ.. जा,शाम होने को है वो पूरन सिंह ताँगे वाला लौटने को होगा,उससे कहकर आ कि कल ताँगा तैयार रखना और कहीं मत चले जाना,कल तू प्रभाकर को लेने स्टेशन जाएगा, मनीराम बोले।।
क्या? भइया आ रहें हैं,बहुत अच्छी ख़बर सुनाई ,अभी पूरन को बोलकर आता हूँ और दिवाकर फिर बाहर चला गया।।
रास्ते में उसे बिन्दू मिल गई, वो कलश लेकर कुएंँ पर पानी भरने जा रही थीं और जैसे ही दिवाकर को देखा उसने रास्ता बदल लिया,लेकिन दिवाकर भी कहाँ मानने वाला था,उसने बिन्दू को फिर छेड़ना शुरू कर दिया, बिन्दू पीछे को हटी और एक पत्थर से टकराकर गिर पड़ी,उसके पैर में खरोंच आ गई,वो उठी और गुस्से से अपना कलश उठाकर बोली कि आज के बाद मुझसे कभी बात मत करना।।
दिवाकर ने बिन्दू को और भी नाराज कर दिया और दुखी मन से पूरन के पास पहुँचा और ताँगे की बात ठहराकर घर लौट आया लेकिन उसका मन नहीं लग रहा था बिन्दू के बिना।।
रात हुई, कौशल्या ने दिवाकर को खाने के लिए बुलाया लेकिन दिवाकर बोला ,परोस कर रख दो माँ,बाद में खा लूँगा।।
ऐसा तो तू कभी नहीं करता रे! तबियत तो ठीक हैं ना तेरी,कौशल्या ने पूछा।।
हाँ,माँ सब ठीक है, सोच रहा हूँ कि छत पर लालटेन ले जाकर थोड़ी देर पढ़ लूँ, उसके बाद खाना खा लूँगा, दिवाकर बोला।
ठीक है, जैसी तेरी मरजी,कौशल्या बोली।।
दिवाकर कुछ किताबेँ और लालटेन लेकर छत पर चला आया और चटाई बिछाकर पढ़ने लगा,तभी बिन्दू ने अपने आँगन से देखा कि दिवाकर छत पर हैं, मन तो उसका भी नहीं लग रहा था,उसके बिना और वो सारा गुस्सा छोड़कर अपने घर की छत पर चली आई,दोनों छतें आपस में जुड़ी हुई थीं,
बिन्दू, दिवाकर के पास जा बैठी,लेकिन दिवाकर कुछ नहीं बोला।।
अभी तक नाराज हो,बिन्दू बोली।।
तुम्हें क्या? तुम ठहरी पत्थर की तरह कठोर,तुम्हें किसी के मन से क्या लेना देना,दिवाकर बोला।।
अच्छा! माफ कर दो,बिन्दू बोली।।
नहीं करूँगा, दिवाकर बोला।।
अरे,कर दो ना,बिन्दू फिर बोली।।
नहीं...कभी नहीं...,दिवाकर बोला।।
ठीक है मत करो बात,आज ही बाबू जी कह रहें थे कि उन्होंने मेरे लिए एक लड़का पसंद कर लिया है,जब ब्याह कर चली जाऊँगी, तब पछताते रहना,बिन्दू इतना कहकर जाने लगी।।
दिवाकर ने बिन्दू का हाथ पकड़ लिया और बोला,चोटी पकड़कर बैठा लूँगा, तुझे! बड़ी आई ब्याह रचाने वाली,तुझे अपने से दूर कहीं भी नहीं जाने दूँगा।
भला किस रिश्ते से,बिन्दू ने पूछा।।
दोस्ती के रिश्ते से,दिवाकर बोला।।
अच्छा खाना खाया,बिन्दू ने पूछा।।
नहीं.. दिवाकर बोला।।
अच्छा, चलो मैं खाना लेकर आती हूँ, साथ मिलकर खाएंगे, बिन्दू बोली।।
और बिन्दू खाना लेकर आई और दोनों ने साथ मिलकर खाना खाया..

क्रमशः___
सरोज वर्मा___


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