अनैतिक - २९ in Hindi Novel Episodes by suraj sharma books and stories Free | अनैतिक - २९

अनैतिक - २९

अब मै अपने जर्मनी जाने की तयारियाँ करने लगा, मुझे ५ महीने हो गये थे और माँ पापा की भी वीजा अंकल ने करवा दिए थे. 

माँ सारी चीजे याद से रख लेना, और पापा के कपडे तो आपने रखे ही नहीं

हाँ सब रख रही हूँ

पापा कहा है?

सारे दुकान वालो के पैसे चुकाने गये है..मैंने पेपर वाले, दूध वाले सबको बोल दिया है की हम १५-२० दिन में जा रहे..पर बेटा..

माँ, मै जानता हूँ, और मुझे भी बुरा लग रहा अपना घर छोड़कर जाते हुए पर आप दोनों को अब अकेले तो नहीं रहने दे सकता न..मै समझ सकता हूँ आपकी परेशानी मेरी भी इच्छा नहीं है जाने की पर..

पर क्या बेटा? देख अब भी वक़्त है, एक बार फिर सोचले, ये देश हमारा, ये गाँव हमारा, लोग हमारे..

माँ आप बार बार ऐसा बोल कर मुझे और दुविधा में डाल रहे हो..हम बात कर ही रहे थे की पापा घर पर आ गये. वो भी उदास थे 

मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था की मै, उन्हें ऐसे अपने बचपन का गाँव छोड़कर ले जा रहा हूँ..पर कर भी क्या सकता था...

ट्रिंग..ट्रिंग..मेरा फ़ोन बजने लगा, और आखिर भगवाना ने मेरी सुनाली थी, ये फ़ोन मेरे मेरे लिए एक चमत्कार साबित हुआ..

हेल्लो, हु इस धिस?.. उसके बाद जो बात हुइ, मुझे ऐसा लगा जैसे कायनात आज मेरे साथ थी..मै भागते हुए माँ पापा के पास गया और उन्हें कहा रीना के यहाँ चलो...

अरे पर हुआ क्या है? इतना खुश क्यूँ है तू?

पापा, सब बतात हूँ आप चलो तो..

और हम सब कशिश के यहाँ आ गये, आंटी सोफे पर बैठ कर कशिश से बात कर रही थी, मेरे पूछने पर आंटी ने बताया की अंकल बाहर गये हुए है ..

रीना का ससुराल हमारे घर से कुछ १०-१५ मिनिट का रास्ता ही था...मैंने जल्दी से रीना को कॉल किया उसे और उसे पति को घर बुला लिया, मैंने अंकल को भी घर बुला लिया..

आंटी ने कहा, 'अरे बेटा बात क्या है, हमें तो कुछ बता?

बताता हूँ न सबको आने दो..

कुछ १०-१५ मिनिट बाद सब आ गये थे..

एक अच्छी खबर है...पहली तो ये की किशोर की जॉब पक्की हो गयी है..

तभी सबने भवान का शुक्रिया किया, और अंकल ने कहा, "बेटा पर इंटरव्यू कब हुआ था?

किशोर ने सबको बताया की ४-५ दिन पहले उसको जर्मनी से कॉल आया था..पर मुझे दूसरी खबर सुननाने की इतनी जल्दी थी की मैंने उसकी बात बिचमे काटते हुए कहा ...

और उस से भी अच्छी बात ये है की अब किशोर को और मुझे जर्मनी जाने की ज़रूरत नहीं, हाँ बस हमें एक बार जाना होगा ..डाक्यूमेंट्स करने के लिए..उसके बाद अब हम इंडिया में.. दिल्ली में ही जॉब कर सकते है...

माँ पापा की तो जैसे आँखे भर आई..पापा ने भरे हुए गले से कहा मतलब अब हम नहीं जा रहे?

मैंने उनके नजदीक जाकर कहा, "नहीं, बस मुझे एक बार जाना होगा और फिर हम यही रहेंगे अपने घर ...

सब खुश हो गये..अंकल ने उनके पहचान के मिठाई दुकान वाले को कॉल कर के कह दिया की ११ किलो लड्डू चाहिए मंदिर में चड़ाना है ..

इस सब के बिच मेरा ध्यान कशिश पर गया..वो भी बहोत खुश थी, मन तो कर रहा था उसे अभी गले लगा लूँ पर नहीं कर सकता था..माँ और आंटी दोनों बैठ कर बाते करने लगे, किशोर ने मुझे बहोत बार थैंक यू कहा उसकी सैलरी अब पहले से दुगनी हो गयी थी. रीना मेरे गले गयी. 

पापा ने कहा बेटा पर ये हुआ कैसे, तू तो जाने की बाते कर रहा था न..

मैंने उन्हें बताया, "हाँ पापा, पर मै आपको माँ को यहाँ से दूर नहीं करना चाहता था, इसीलिए मैंने कुछ दिन पहले मेरे मेनेजर से बात की, मुझे जॉब करते हुए ३-४ साल हो गये थे और मेरा काम भी बहोत अच्छा था, मैंने उन्हें कहा था की आपकी कंपनी का ब्रांच दिल्ली में भी है, प्लीज मुझे यहाँ से ट्रांसफर दे दीजिये नहीं तो मुझे जॉब के बारे में सोचना पड़ेगा...

फिर क्या उन्होंने क्लाइंट से बात की और वो मान गये, और तो और किशोर को भी मेरे प्रोजेक्ट में ही लिया है, अब उसे सारा काम मै ही समझाऊंगा, सैलरी भी अच्छी मिलेगी उसे..

माँ ने कहा, "पर तूने तो जर्मनी में अग्रीमेंट कहा था ना..

हाँ, माँ पर मैंने उन्हें घर की हालत बताई की आप की और पापा की तबीय ठीक नहीं रहती, तो वो ट्रान्सफर को मान गये...

हम सब इतने खुश थे, रीना और किशोर भी एक दुसरे से ख़ुशी ख़ुशी बाते कर रहे थे माँ पापा अंकल आंटी...सब रात को साथ खाने की बाते कर रहे थे ..कशिश और मै बस एक दुसरे की नजरो में खोये थे की तभी मुझे एक और कॉल आया जिसने मेरी जिंदगी ही बदल दी...

जैसा मैंने पहले भी कहा था भगवान जब कुछ देता है तो कुछ लेता भी ज़रूर है, ये कॉल था केशव मेरे दोस्त का..उसने जो कहा वो सुनकर मेरे हात से फ़ोन निचे गिर गया, मेरी आँख भर आई थी, मै तुरंत अंकल और पापा को लेकर हॉस्पिटल के लिए निकला, किशोर से कहा था घर पर सबका ध्यान रखना ..                                          

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