बेपनाह - 19 in Hindi Novel Episodes by Seema Saxena books and stories Free | बेपनाह - 19

बेपनाह - 19

19

“कितनी सुंदर हैं जी चाह रहा है कि सभी उठा कर ले जाऊँ।” शुभी ने कहा।

“तो सब ले लो !” कहकर ऋषभ ने उसे सारी जैकेट उठाकर दे दी।

“मुझे इतनी सारी नहीं चाहिए ! एक ही बहुत ही बहुत है ! मेरा मतलब है कि मेरे लिए सिर्फ एक, बाकी आपकी माँ और दीदी के लिए भी तो लेनी चाहिए।“

“हाँ हाँ उन लोगों के लिए भी लेनी है लेकिन तुम्हें एक नहीं लेनी, लो पकड़ो यह हैं तुम्हारे लिए।“ कहते हुए ऋषभ ने उसे दो जैकेट पकड़ा दी ।

वो कहते हैं न कि अपने आप के लिए खड़े रहो लेकिन अगर आपका प्रेम मनुहार करे तो उसके लिए मिट जाओ ! मान लो उसकी हर बात, जो भी कहे तब ही प्रेम है और सच्चाई है रिश्तों की ।

ऋषभ ने एक दादी के लिए, एक बहन के लिए और एक माँ के लिए और भी एक ले ली,,,,

शायद अपने किसी रिश्तेदार के लिए !

“बता यार कितने पैसे हुए ?”

“अब आपको क्या पैसे बताना ! दे दो जो दिल चाहें !”

“बहुत बड़ा दिल है तेरे यार का ! जो सबसे लेता है उससे थोड़े ज्यादा ही काटना।” कहते हुए ऋषभ ने उसे पैसे दे दिये ।

शुभी को उसकी बातों पर हंसी आ गयी ! कितने प्यारे दोस्त हैं ! दोनों को ही एक दूसरे पर स्नेह है, अपनापन है !

“अब खरीद दारी तो हो गयी है अब थोड़ी मेहमान नवाजी भी कर ली जाये ! नेपाली जरा चाय और बिस्कुट ले आ जाकर ।” उसने अपने नौकर को कहा ।

“जी अभी लाया !” कहते हुए वो बड़ी फुर्ती से निकल गया ! मानों इसी बात का इंतजार कर रहा था ! ठंड के कारण किसी के भी हाथ पाँव नहीं चल रहे थे ! चाय पीने से थोड़ी गर्माहट तो जरूर आएगी।

यार, एक बात कहूँ मुझे ऐसा लगता है कि बर्फ जरूर गिरेगी और थोड़ी नहीं बहुत ज्यादा बर्फ गिरने के लक्षण दिख रहे हैं मुझे तो, चाय पीते हुए उन लोगों की बातें चल रही थी ।

“सच में दोस्त हो तो ऐसे, जो खुल कर हर बिषय पर बात कर सकें या फिर न हो।“

“मैडम जी हम दोनों भाई भाई जैसे हैं और मैं तेरा भी भाई हूँ ।”

“हाँ भाई,, क्यों नहीं ! आप मेरे भी भाई हो।”

तब तक वो छोटा लड़का पास की दुकान से चाय और बिस्किट लेकर आ गया था।

चाय का स्वाद बहुत अच्छा लग रहा था, मीठापन थोड़ा कम था, चाय पीने से ठंड थोड़ी कम हुई लग रही थी ।

“अब चले यहाँ से या अभी और बैठने का इरादा है अपने प्यारे भाई जी के पास?” ऋषभ उसे छेडते हुए बोले ।

“हा हा हा ! आप भी न ऋषभ, बड़ा सताते हो ! लो अब खुद तो बैठे बातें कर रहे हैं और मुझसे कह रहे है कि चल नहीं रही हो !” शुभी को शायद थोड़ा गुस्सा आ गया था ।

ऋषभ और शुभी दोनों उठकर बाहर आ गए ।

“यार एक बात कहूँ ?”

“हाँ हाँ कहो न।” शुभी ने उसे प्यार से देखते हुए कहा ।

“यार जब तू गुस्सा करती है न तो बड़ी प्यारी लगती है, गुस्से में तेरी खूबसूरती बढ़ जाती है ! नाक और गाल दोनों सुर्ख लाल हो जाते हैं ।” ऋषभ कहते हुए मुस्कुराया !

“यह तुम मेरी तारीफ कर रहे हो या बुराई ?”

“मेरी इतनी हिम्मत कि तुम्हारी बुराई कर सकूँ।”

“देखो ऋषभ मुझे तंग मत करो।”

“फिर किसे करूँ?”

“मुझे क्या पता?”

“चल फिर ठीक है लेकिन यार हम यूं ही झगड़ते रहेंगे तो प्यार कब करेंगे ? देखो वो बदलियाँ कैसे पहाड़ों संग अठखेलियां कर रही हैं ।” पहाड़ की तरफ उंगली उठाकर ऋषभ थोड़ा रूमानी होते हुए बोले !

वाकई आसमान में थोड़ी धूप थी और थोड़े बादल और वे बादल पहाड़ों के ऊपर लोटते हुए मस्तियाँ कर रहे थे ! कितना प्यारा दृश्य लग रहा था कभी सफ़ेद कभी काले बादल इधर से उधर घूम रहे थे !

“ऋषभ पहाडों का मौसम हमेशा ही बहुत अच्छा रहता है न ! सर्दी गर्मी बरसात सभी मौसम में यहाँ अच्छा लगता है न, सर्दियाँ ही रहती हैं न ?” उसने ऋषभ को टहोका ।

“यार अब मुझे क्या पता ?”

“और फिर किसे पता होगा, तुम पहाड़ों के ही रहने वाले हो न ? हर बात पर मुझे क्या पता, मुझे क्या पता, क्यों कर रहे हो ?” वो थोड़ा इरिटेड होते हुए बोली ।

“देख मैं शुरू से मैदानी शहर में ही रहा, यहाँ कभी आ जाता हूँ क्योंकि दादी बाबा यही रहते हैं। तो कुछ समझ नहीं आया मौसम के बारे में?”

“चलो रहने दो !”

“यहाँ से कुछ फल ले लूँ ?” सामने से फलों की दुकान दिख गयी तो फौरन ऋषभ बोल पड़े ।

“ले लो अच्छा है हालांकि फल थोड़ा ठंडे होते हैं और अभी सर्दियों का मौसम है।”

“हाँ तेरा कहना भी ठीक है लेकिन डॉ कहते हैं कि कोई भी फल ठंडा या गरम नहीं होता है।”

ऋषभ ने ढेर सारे सेब, केले और संतरे लिए । शुभी ने अपने पर्स में से पैसे निकले और देने लगी तो ऋषभ ने मना किया नहीं मैं दूंगा पैसे ।“

“क्यों मैं क्यों नहीं दे सकती हूँ, क्या हम अलग हैं?”

ऋषभ उसकी बात सुनकर चुप हो गया ।

वे दोनों घर पहुंचे तो रूपोली रोटियाँ सेक रही थी और दादा जी खा रहे थे ! कितने प्यार से गरम रोटी दे रही थी।

“अब बस कर मेरा हो गया !”

“एक और ले लो न दादा जी !”

“ठीक है दे दो, अब यह आखिरी है फिर मत देना !”

लड़की हौले से मुस्कुरा दी !

“दादी को एक प्लेट लगाकर दे आओ,तुम दोनों आ गए, चलो अब खाना खा लो ।” शुभी और ऋषभ को आता हुआ देखकर वे बोले।

“जी दादा जी ।” ऋषभ बोले ।

“रूपोली बेटा, सबको खाना खिलाकर तू भी खा लेना ।“

“हाँ मैं खा लूँगी ।”

खाना खा कर दादा जी दादी के कमरे में चले गए ! रूपोली उनको भी थाली मे खाना लगा कर ले आई !

“दादी खाना खा लो !” शुभी ने उनको उठाते हुए कहा !

“हाँ बेटा मैं जग रही हूँ ! तुम लोगों ने खा लिया !” वे उठ कर बैठ गयी थी। कितनी कमजोर हैं दादी जी शायद उम्र या बीमारी इंसान को कमजोर कर देती है !

“अभी नहीं खाया दादी !”

“क्यों बेटा ?”

“आज मेरा कुछ खाने का मन नहीं कर रहा है।”

“कैसे मन नहीं कर रहा ! तुम दोनों नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाऊँगी ! रूपोली जरा दो थाली और लगा कर दे जाओ ।”

“अरे दादी आप ऐसा क्यों कह रही हो ? आप खाओ न ! हम भी थोड़ी देर में खा लेंगे !”

“नहीं अभी खाओ हमारे साथ में !” वे ज़िद करने लगी !

“ठीक है खा लेते हैं ।” मन न होने पर भी दादी की ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा।

यह जो हमारे बड़े बुजुर्ग होते हैं न वे हमसे कितना स्नेह रखते हैं लेकिन हम उनके प्रेम का उतना सम्मान नहीं कर पाते जितना करना चाहिए ।

चने की दाल, आलू गोभी की सूखी सब्जी, दही और टमाटर की चटनी व देसी घी लगी गरम गरम रोटियाँ ! बहुत स्वाद था खाने में, मन न होने पर भी खा लिया गया।

“बेटा तुम इधर हमारे पास सो जाओ और ऋषभ दादा जी के कमरे में सो जायेगा,ठीक है न ?”

“हाँ दादी मैं यही पर सो जाऊँगी ! कल तो हमने जाना ही है !”

“क्यों कल ही क्यों बेटा ?”

“हमारी टीम है न देहारादून में और मुझे उनके साथ ही वापस घर जाना है।”

“अच्छा कल का कल सुबह देखेंगे ! अभी आराम करो ।”

“जी दादी।”

“ऋषभ बेटा कल सुबह मुझे डॉ के पास शहर जाना है ! मैं दो तीन घंटे में वापस आ जाऊँगी ! तुम लोग अपनी पसंद का खाना रूपोली से बनवा लेना।”

“ठीक है दादी ! अब मैं दादा जी के कमरे में सोने जा रहा हूँ ।”

“ठीक है बेटा जाओ !आओ शुभी आज तुम हमारे बेड पर सो जाओ इतना बड़ा बेड है चार जन आराम से सो जाएँ ! और वो मोटा वाला कंबल उठा लाओ उसमें बिलकुल ठंड नहीं लगेगी।” दादी ने बड़े बक्से के ऊपर रखे कंबल की तरफ इशारा करते हुए कहा ।

ऋषभ के जाने के बाद शुभी ने अपना कंबल मुंह तक ढँक लिया और सोने की कोशिश करने लगी लेकिन नींद भला कैसे आए वो तो ऋषभ के साथ चली गयी थी। ओहह, क्या अब जागते हुए रात गुजारनी होगी ! दादी शायद सो गयी थी और वे हल्के हल्के खर्राटे लेने लगी थी ! उनकी दवाई में नींद की गोली भी थी जिससे उन्हें फौरन नींद आ गयी थी ! मैं भी एक नींद की गोली खा लूँ ? शुभी ने मन में सोचा ! शुभी ने दादी की नींद की गोलियों की शीशी की तरफ हाथ बढ़ाया तभी दादी जो खर्राटे लेकर सो रही थी एकदम से बोल पड़ी’ बेटा, जरा लाइट बंद कर दो, मुझे रोशनी में सोने की आदत नहीं है ।”

“जी दादी !” उसे ज़ोर की हंसी आई लेकिन उसने अपने होंठ कसकर बंद कर लिए !

लाइट बंद करके उसे थोड़ा डर का अहसास हुआ अब तो बिलकुल भी नींद नहीं आयेगी एक तो अंधेरा उसे बिलकुल पसंद नहीं दूसरा एकदम से नई जगह, उसने ईश्वर को याद किया और कंबल के अंदर अपने मोबाइल की लाइट जलाकर अपने भय को कम करने की कोशिश की ! चलो थोड़ी देर एफ़बी ऑन कर लेती हूँ उसने जैसे ही एफ़बी ऑन की देखा ऋषभ भी ऑन लाइन है क्या उसे भी नींद नहीं आ रही या किसी और से बात तो नहीं कर रहा, मन में जैसे ही शक का भाव आया वैसे ही आँखों से आँसू बहने लगे और प्रेम कहीं बह गया, हाय ऋषभ तुम चीटर हो मुझे यहाँ लेकर आ गए और खुद किसी और से बात करने लगे, मैं ही मूर्ख हूँ जो तुम पर विश्वास करके यहाँ तक अकेले चली आई हूँ ! पूरा तकिया गीला हो गया था ! नींद पूरी तरह से गायब हो गयी थी ! आँखों में आँसू भरे थे और एफ बी स्क्रीन धुंधली दिखाई देने लगी, ऋषभ को मेसेज करने के लिए उसने जैसे ही हाय टाइप किया देखा वो ऑफ लाइन हो गया था ! क्या मुझे ऑन लाइन देख कर चला गया क्या यह फेंक है मुझे सिर्फ बर्बाद करने को ले आया है क्या है यह सब यह मेरा फायदा उठाना चाहता है ! सच में शक प्रेम को हर लेता है और बचा रह जाता है दर्द, और शक का एक पल सदियों के प्रेम का नाश कर देता है ।

क्या उसकी वही पुरानी प्रेमिका एफ़बी पर थी ? क्या वो उसी से बात कर रहा था ?तेज दर्द की लहर उठी और उसने अपने सीने को कसकर पकड़ लिया, मानों कोई जान खींच रहा हो ! दौड़कर जाऊँ अभी जाकर उससे पुंछ लूँ लेकिन क्या कहूँगी ? क्या उसे गलत कहकर अपनी नजरों से उसे गिरा दूँ ? वो लौट कर आया है उसे मुझसे मोहब्बत है तभी आया है, मैं अपने भरम को मिटा दूँगी ! ऋषभ मेरा है और मेरा ही रहेगा ! मन खुद को समझा रहा था और आँखों से आँसू बहे जा रहे थे ! वो झूठ नहीं हो सकता उसने मुझसे कहा था क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है ? क्या अपने प्रेम पर विश्वास नहीं है ? ऋषभ अपने प्रेम पर विश्वास तो मुझे पहले भी था, आज भी है और हमेशा रहेगा पर तुम पर विश्वास नहीं रहा क्योंकि तुमने मेरा भरोसा तोड़ा था ! मन को चैन नहीं था तो अपने मोबाइल की रोशनी से देखती हुई बाहर निकल आई, ठंडी हवा से शरीर में सिहरन सी हुई बराबर में ही दादा जी का कमरा था और उस कमरे की लाइट भी जल रही थी !

“ऋषभ,” हल्के से दरवाजे को नॉक करते हुए उसने आवाज लगाई !

एक पल की देरी किए बिना ही उसने दरवाजा खोल दिया !

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Sushma Singh

Sushma Singh 3 months ago

S Nagpal

S Nagpal 3 months ago