Sansaar ki sarvshreshth dhyan pranaliya - 1 books and stories free download online pdf in Hindi

संसार की सर्वश्रेष्ठ ध्यान प्रणालियाँ - 1

( परम ध्यान परम आनंद)

लेखक : ब्रजमोहन शर्मा

 

समर्पण : महर्षि रमण

( मनुष्यता के इतिहास में न देखा, न सुना, न पढ़ा कही ऐसा विरला संत जिसे महज १७ वर्ष की आयु में बिना किसी मन्त्र, जप, ताप, ग्रन्थ पथ, पूजा पाठ या किसी भी रंच मात्र साधन अपनाए सिर्फ कुछ क्षणों के लिए अपने शरीर की म्रत्यु देख आजीवन शारीर मन बुद्धि से परे सर्वोच्च

आध्यात्मिक अवस्था सहज समाधि की प्राप्ति हुई ) 
 
copyright@brijmohansharma

भूमिका :
मित्रों यह ग्रन्थ ध्यान के सर्वोच्च ज्ञान, सर्वश्रेष्ठ विधियों व उससे प्राप्त होने वाला परम

आनंद को द्रष्टिगत रखते हुए लिखा गया है I

गीता में भगवान कहते हैं :

“ ध्यान से प्राप्त आनंद के तुल्य संसार में कोई सुख नहीं है I

मैंने इस लघु ग्रन्थ में उपनिषद्, गीता, पतंजल योग दर्शन, शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन, 

अष्टावक्र, विवेकानंद, जे कृष्णमूर्ति, रमण महर्षि आदि अनेक सर्वोच्च संतों के उदहारण प्रस्तुत किये हैं I मैंने आधुनिक विज्ञानं व गणित के प्रैक्टिकल प्रयोगों की द्रष्टि से ध्यान का अध्ययन किया है I

ध्यान के मन शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है I

क्या ध्यान से हमारे मन के दुर्गुण यथा काम क्रोध, इर्ष्या, तनाव दूर किये जा सकते है ?

इसके अलावा मैंने सेक्स को साधना में बाधक बताए जाने वाले प्रोपेगेंडा के भ्रम को दूर करने का प्रयास किया है.

एक बैल तथाकथित ब्रम्हचारी होता है तो क्या वह श्रेष्ठतर प्राणी है?

इन भ्रांतियों पर मैंने मौलिक चिंतन करने का प्रयास किय है ?

इसके अलावा मैंने जे कृष्णमूर्ति का सन्देश “मन की समझ ही वास्तविक ध्यान है” व रमण महर्षि के “मै कौन हूँ ?”की खोज का विशद चिंतन करने का प्रयास किया है I

मित्रों, ध्यान का विषय मानव चेतना का सबसे सूक्ष्म व सबसे दिव्य विषय है जो जीव को ब्रम्ह से एकाकार करता है I यह वास्तव में शब्दातीत विषय है I ध्यान का आनंद गूंगे के गुड के सामान है, इसे सिर्फ इशारों से ही समझाया जा सकता है I

अधिक शब्द जंजाल ध्यान में बाधक है किन्तु बड़े दुःख का विषय है कि जिसे हमारे महर्षि मौन से, सूत्र से समझाते थे, उस मन वाणी से परे विषय पर लच्छेदार भाषण देने वालों को भेडचाल मनोवृत्ति व शब्द्जन्जाल से सम्मोहित होने वाले दुर्बल मस्तिष्क लोगों ने भगवान तक बना दिया I

आगे पढ़िए एवं गहन चिंतन कीजिए ..... ब्रजमोहन शर्मा

 
 
भाग - प्रथम
 
(उपनिषद्, गीता, पातंजल योग, भागवत, वेदांत आदि में वर्णित ध्यान)
उपनिषद् में ध्यान

ब्रम्हज्ञान प्राप्ति की विधि:

उपनिषदों में ब्रम्हज्ञान प्राप्त करने की बड़ी सुंदर साधना बताई गई है ।

‘‘ प्रणवो धनुः शरोह्यात्मा ....... ’’

उं का जाप तीर है व एकाग्रता धनुष है । ब्रम्हज्ञान लक्ष्य है । साधक को तल्लीन होकर लक्ष्य भेद करने को कहा गया है ।

ऐक अन्य जगह साधन पथ को तलवार की धार के समान कठिन बताया गया है ।

आत्मा का स्वरूप:

‘‘ ज्योतिषा़ज्योति ’’, ‘‘ न तत्र सूर्यो भाति न चंद्र तारकं..... ’’

आत्मा को ज्योतियांे की ज्योति निरूपित किया गया है । सूर्य, चंद्र व तारों की लौकिक ज्योति उसे प्रकाशित नहीं कर सकते । उसके प्रकाशित होने पर सब प्रकाषित होते हैं ।ब्रम्ह कहां है ?: ( सुंदर प्रश्नोत्तर विधि )

शिष्य के पूछने पर कि ब्रम्ह कहां है ?

गुरू जल से भरा पात्र मंगवाकर उसमें नमक घुलवाते है । गुरू उस घोल को उपर, नीचे, दांये, बांये सब ओर से चखने को कहते हैं । फिर वे पूछते हैं, नमक कहां है ?

जिस प्रकार घोल में नमक सब दूर उपस्थित है उसी प्रकार ब्रम्ह विश्व के कण कण में विराजित है । । वह सर्वव्यापी है ।

नचिकेता

कठोपनिषद में ऐक बड़ी सुंदर कथा का वर्णन आता है।

बालक नचिकेता के पिता क्रोधित होकर उसे यमराज को दान मे दे देते हैं।

नचिकेता सच में मृत्यु के देवता के द्वार पर जा पहुंचता है। यमराज के न मिलने पर वह तीन दिन रात भूखा प्यासा रहकर उनका इंतजार करता है। यमराज के लौटने पर बालक की तपस्या देखकर उनका मन द्रवित हो उठता है। वे बालक से कोई भी तीन वर मांग लेने को कहते हैं।

नचिकेता पहला वर पिता के क्रोध को शान्त होने का मांगता है।

यमराज से दूसरा वर के लिऐ वह उनसे स्वर्ग प्राप्त करने की विधि बताने को कहता है।

तब तीसरे वर के रूप में नचिकेता ऐक प्रश्न पूछता है, ‘ हे म्रत्यु के देवता ! क्रपया यह बतलाइये कि जीव की म्रत्यु के बाद क्या शेष रह जाता है ? ’

यमराज कहते है, ‘ हे नचिकेता ! तुम पूरी प्रथ्वी व स्वर्ग का साम्राज्य मांग लो। अमर रहने का वर मांग लो। किन्तु मृत्यु के बाद क्या शेष रहता है, इस अति गोपनीय रहस्य के विषय मे न पूछो।

किन्तु नचिकेता सारे प्रलोभन ठुकराते हुऐ अपने प्रश्न के समाधान पर अड़ा रहा।

तब यमराज उसके वैराग्य व जिज्ञासा की तीव्रता की प्रशंसा करते हुऐ उससे कहते हैं, ‘ हे नचिकेता ! जीव की मृत्यु के बाद भी आत्मा जीवित रहती है। आत्मा अजर अमर आनंद स्वरूप है । मृत्यु के बाद भी यह अपरिवर्तित बनी रहती है। देहत्याग के बाद जीव का अपने कर्मो के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म होता है।

उपरोक्त कथा से यह संकेत दिया गया है कि आत्मज्ञान प्राप्ति’ के लिऐ वैराग्य भावना का उदय आवश्यक है । मनुष्य के ह्दय में स्थित आत्मा के साक्षात्कार के लिऐ ऐकाग्रता से किया गया ध्यान परम आवश्यक है ।

केनोपनिषद (महाज्ञान)

उपनिषद में ऐक बड़ी सुंदर बात कही गई है, 

विद्या के अंधकार अधिक घना है

‘‘ अन्धंतमः प्रविशंति ये विद्यामुपासते। .....’’

‘ जो अविद्या में रत हैं वे अंधकार में प्रवेश करते हैं किन्तु जो विद्या की उपासना करते हैं वे और अधिक अंधकार में प्रवेश करते हैं। ’

यह बात सुनने में बड़ी अजीब लग सकती है किन्तु है बिलकुल सत्य । जो लोग अविद्या मे रत है वे तो निष्चित ही अंधकार में हैं किन्तु जो विद्या में रत होकर अपने ज्ञान के अभिमान में रत हैं, वे ज्ञान के घमंड के दोष के कारण वे और अधिक अंधकार में प्रवेश कर रहे हैं।

विवेकानंद ने कहा है:

ज्ञान का क्षेत्र जितना बढ़ता है अज्ञान का क्षेत्र उससे कई गुना अधिक बढ़ जाता है।

ब्रम्ह ज्ञान अज्ञान से परे है

ऐक अन्य स्थान पर पुनः कहा गया है, 

‘‘ यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि ...... ’’ केनोपनिषद

‘ यदि तू कहता है कि तूने ब्रम्ह को जान लिया है तो तूने ब्रम्ह को नहीं जाना है। यदि तू कहता है कि तूने ब्रम्ह को नहीं जाना है तो तूने उसे कुछ कुछ जान लिया है। ’

वास्तव में ब्रम्ह ज्ञान व अज्ञान दोनों से परे हैं।

ब्रम्ह स्वप्रकाशित है:

‘‘ न तत्र सूर्योभाति ....... ’’

ब्रम्ह को कोई ज्योति यथा सूर्य, चंद्र या तारे आदि प्रकाषित नहीं कर सकती क्योंकि उसके प्रकाशित होने पर अन्य सभी वस्तुएं प्रकाशित होती हैं।

 

चारों वेदों का सार चार वेद महावाक्य, 

1  प्रथम महावाक्य, ‘अहं ब्रम्हास्मि’, “मैं ब्रम्ह हूं” ।

द्वितिय महावाक्य, ‘‘ प्रज्ञानं ब्रम्ह ’’, “प्रज्ञान ब्रम्ह है” ।

3 त्रतीय महावाक्य, ‘ सर्व खल्विदं ब्रम्ह ’, “यह सबकुछ ब्रम्ह ही है” ।

चतुर्थ महावाक्य, ‘ अयमात्मा ब्रम्ह ’ “यह आत्मा ही ब्रम्ह है” ।

उपनिषद (महाविद्या)

‘ सा विद्या या विमुक्तये ’, सत्य विद्या वही जो मुक्त करती हो ।

उपनिषद में ऐक बडी सुंदर कहानी कही गई है। ऐक प्रसिद्ध ऋषि का पुत्र बड़ा शरारती था। वह पढ़ता लिखता नहीं था व दिन भर मटरगश्ति करता व उपद्रव मचाता रहता था। उसके माता पिता बड़े दुखी थे।

तब पिता ने अपने पु़त्र को ऐक अन्य गुरू के यहां विद्याध्ययन करने भेजा। पुत्र शीघ्र ही सभी विद्याओं में पारंगत हो गया। वह इतना मेधावी था कि उसने उस समय के सभी दिग्गजों को शास्त्रार्थ में हरा दिया।

उसे अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान हो गया। अपने घर लौटने पर उसने अपनी विजयगाथा अपने पिता को सुनाई व अभिमान के कारण उनके पैर नहीं छुऐ।

तब पिता ने उसके अभिमान को दूर करने के लिऐ पुत्र से ऐक प्रश्न किया, ‘ बेटा ! क्या तुमने वह विद्या सीखी जिसके ज्ञात होने पर अन्य सभी विद्याएं अपने आप सीख ली जाती हैं। ’

इस पर पुत्र ने कहा ‘‘ नहीं पिताजी मैने ऐसी कोई विद्या नहीं सीखी । ’’

वह षीघ्रता से अपने गुरू के पास पहुंचा व उनसे ऐसी विद्या के विषय में पूछा जिसके सीखने के बाद सब कुछ जाना हुआ हो जाता है। किन्तु गुरू ने भी किसी ऐसी विद्या के विषय में अपनी अनभिज्ञता प्रकट की ।

बेटे ने अपने पिता को उस महाविद्या को पढ़ाने का निवेदन किया तब पिता ने पुत्र को उस विद्या के जानकार ऐक राजा के पास भेजा।

राजा ने अनेक दिनों तक ऋषिपुत्र की अनेक प्रकार से परीक्षा ली । ऋषिपुत्र जब हर परीक्षा में पास हो गया तब ...

ऐक दिन अर्धरात्रि को राजा ऋषिपुत्र को ऐक झोपड़े के पास गहरी निद्रा में सोऐ हुऐ ऐक व्यक्ति के पास ले गया। राजा ने उस सोऐ हुऐ व्यक्ति को उसके नाम से पुकारा किन्तु वह नहीं जागा। अनेक बार जोरों से आवाज लगाने पर भी उस व्यक्ति के नहीं जागने पर राजा ने उसे ऐक छडी से मारा तो वह व्यक्ति हड़बडाकर जाग गया।

राजा ने ऋषिपुत्र से पूछा, ‘ यह व्यक्ति कहां था व अब कहां से आया है ? ’

राजा ने अपने छात्र को उस गंभीर प्रश्न पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय दिया।

तब ऐक दिन ऋषिपुत्र के मन उस प्रश्न का हल समझ में आ गया जो आत्मज्ञान को परिलक्षित करने के लिऐ पूछा गया था।

गहन निद्रा में प्रत्येक प्राणी नाम रूप, शरीर, , मन वाणी से परे अपनें आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है ।

आत्मज्ञान ही वह ज्ञान है जिसके जानने के बाद सभी कुछ जाना हुआ हो जाता है I आत्मज्ञान के आगे अन्य सभी ज्ञान गोण हैं ।

 
भगवत्गीता में ध्यान विधि

( छटे अध्याय का सार )

भगवद्गीता अर्थात भगवान का गीत । वास्तव में यह ग्रंभ्थ अत्यंत दिव्य है, जैसा इसका नाम वैसा ही इसका अर्थ है । विशेषकर इस ग्रंथ के छटे अध्याय में योग की बड़ी सुंदर व आसान विधि बताई गई है:

साधक को किसी निर्जन स्थान में शांतचित्त होकर नासिका के अग्र भाग में ध्यान लगाते हुए ईश्वर का स्मरण करना चाहिए । साधक को नित्य ध्यान का अभ्यास करना चाहिऐ। योगी को यम नियम का पालन करते हुए सर्वथा शांतचित्त रहते हुए सांसारिक बुराइयों से दूर रहना चाहिए ।

‘‘ शुचौदेशे प्रतिष्ठाप्यं .....  चैलाजिन कुशोत्तरम ।

.... मनः संयम्य मच्चित्तौ युक्तआसीत मत्परः। ’’

भगवान का शिष्य अर्जुन तरह तरह की शंकाऐं व्यक्त करता है । वह कहता है, ‘‘ चंचलं हि मनः क्रष्नः... वायोरिवसुदुष्करम। ’’

‘ हे क्रष्ण ! मन को ऐकाग्र करना तो वायु को वश में करने के प्रयास के समान कठिन है ।’

इस पर क्रष्ण बड़ा सुंदर उत्तर देते हुए कहते हैं, 

‘‘ अभ्यासेन तु कौंन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। ’’

‘ हे अर्जुन यद्यपि मन को वश में करना बड़ा कठिन है किन्तु अभ्यास व वैराग्य से उसे वश में करना संभव है । ’

अर्जुन पूछता है, ‘ यदि साधना करते हुए बिना लक्ष्य प्राप्त किए किसी साधक की म्रत्यु हो जाती है तो फिर उसका क्या होगा ?’

क्रष्ण कहते हैं कि भगवान ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि बिना लक्ष्य प्राप्ति के यदि साधक की म्रत्यु हो जाए तो वह अगले जन्म में किसी सम्पन्न घर में अथवा उत्तम योगी के घर मे जन्म लेता है। वहां वह साधक उसी बिन्दु से अपनी साधना पुनः प्रारंभ कर देता है जहां तक वह पूर्व जन्म में पहुंचा था । योगसाधक का कभी नाश नहीं होता व भगवान स्वयं उसकी हर आवश्यकता का ध्यान रखते हैं ।

साधक को साधना की उच्च स्थिति में ऐसा दिव्य आनंद का अनुभव होता है कि जिसका वर्णन करना संभव नहीं है। उसके मन की स्थिति वायुरहित कमरे में रखे दीपक की लौ के समान स्थिर हो जाती ।

गीता में भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि का विशद वर्णन किया गया है

अंत में भगवान यह भी कहते हैं कि, ‘‘ हे अर्जुन ! यदि तू किसी भी प्रकार के योग को करने में असमर्थ है तो स्वयं को पूर्णतया भगवान की शरणागति मे समर्पित कर दे । शरणागत भक्त की समस्त साधना मेरे द्वारा सम्पन्न की जाती है। ’’

इस प्रकार गीता में मनुष्य को किस प्रकार दिव्य जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए, यह बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया गया है ।

कपिलमुनि

(भागवत सार)

महापुराण भागवत में भगवान कपिलमुनि की माता अपने मन को दुख से मुक्ति हेतु पुत्र कपिलमुनि से ज्ञान का उपदेश देने को कहती है ।

कपिलमुनि कहते हैं, ‘ माता सांसारिक पदार्थों में सुख नहीं है । समस्त सुखों का अंत दुखों मे होता है ।

जिस शरीर को सुख का साधन माना जाता हे वही शरीर म्रत्यु के समय बुरी तरह दुर्गंध देता है व सब लोग उससे बचकर निकलते हैं । जिस परिवार का मनुष्य बड़ी मेहनत से पालन करता है, बूढ़ा होने पर घर के लोग व उसके पुत्र उसका बुरी तरह से अपमान करते हैं। पुत्र उसके मरने की राह देखते हैं ताकि पिता का धन प्राप्त हो सके। परिवार की सम्रद्धि के लिए कमाए हुए धन हेतु किए गए पापों को मनुष्य को नर्क में रहकर अकेले भुगतना होता है ।

आत्मा ही मनुष्य के मन व शरीर को चलाती है । उसके निकल जाने पर शरीर म्रत पड़ा रहता है । अतः प्राण रहते हुए मनुष्य को भगवदप्राप्ति का प्रयत्न कर अपने जन्म को सफल कर लेना चाहिए ।

भगवदप्राप्ति के दो मार्ग हैं ।

प्रथम - भक्ति मार्ग, इसमें भगवान के नाम का कीर्तन, पूजा पाठ, कथा श्रवण

आदि उपाय किए जाते हैं । भगवदक्रपा की प्रप्ति के लिए भक्त को सम्पूर्ण

ह्दय की गहराई से भगवान को आर्त स्वर में पुकारना चाहिए। उनका कीतैन व ध्यान करना चाहिऐ।

द्वितिय - योग मार्ग :

इसमें ध्यान, वैराग्य, मंत्र जप आदि उपायों से आत्मसाक्षात्कार किया जाता है ।

दोनों मार्ग ऐक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं ।

जो लोग मंदिर में भगवान की मूर्ति की पूजा करते हैं किन्तु अन्य प्राणियों से दुर्व्यवहार करते हैं वे मेरा अपमान करते हैं क्योंकि समस्त प्राणियों में मैं स्थित हूं । 


पातंजल - योग

यह योगशास्त्र का सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक ग्रंथ हैं।

महर्षि पतंजली के अनुसार

‘‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’’

विक्षोभ रहित मन की स्थिति ही योग है ।

साधक को योग साधना के लिए यम नियम का पालन करना चाहिए:

अष्टांग योग के निम्न अंग हैं:

1 यम 2 नियम 3 आसन 4 प्राणायाम 5 प्रत्याहार 6 धारणा 7 ध्यान 8 समाधि

यम: ये पांच हैं:

1 सत्य : सदैव सच बोलना I

2 अहिंसा: मन, वचन व काया से किसी को कष्ट नहीं देना ।

3 अस्तेय: मन वचन काया से चोरी नहीं करना ।

4 ब्रम्हचर्य: स्त्री सहवास व कामोद्दीपन की किसी भी क्रिया से दूर रहना ।

5 अपरिग्रह: किसी वस्तु का संग्रह नहीं करना ।

नियम: ये भी पांच हैं:

1 शौच: बाह्य एवं आंतरिक शुद्धि

2 संतोष

3 तप: साधना के लिए कष्ट सहन करना

4 स्वाध्याय: धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन

(साथ ही स्वयं का अध्ययन भी उपयुक्त व्याख्या है । )

5 ईश्वर प्राणिधान: ईश्वर का मनन चिंतन, भजन ।

भगवान के नाम स्मरण व भक्ति से समाधि प्राप्ति बताई गई है । यह बड़ा सुगम भक्ति मार्ग है ।

योग के सिद्ध होने पर साधक को अनेक सिद्धियां प्राप्त होती हैं, यथा अणिमा ( मनचाहे छोटे आकार में स्वयं को बदलने की शक्ति ), गरिमा ( इच्छित आकार में बड़ा हो जाना ), दूरगमन ( सुदूर स्थान में जाने की क्षमता), दूरश्रवण ( बहुत दूर की ध्वनि सुनने की क्षमता )

योग का अंतिम लक्ष्य है: समाधि ।

यह दो प्रकार की हैं 1

1 सविकल्पक समाधि 2 निर्विकल्पक समाधि

सविकल्पक में ईश्वर के स्वरूप की विद्यमानता रहती है ।

निर्विकल्पक में मन निराकार ब्रम्ह में पूर्णतया विलीन हो जाता है ।

 

कुंडलिनी योग

मैने कुंडलिनी योग का अध्ययन व अभ्यास किया।

इस योग के अनुसार, मनुष्य शरीर में रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे ऐक मूलाधार चक्र है । वहां ऐक अग्निकुंड है । उसमें सर्पाकार कुंडली के रूप में दिव्य शक्ति कुन्डलिनी गहन निद्रा मे सोई हुई है । वह अग्निकुंड में सुप्तावस्था में है । उस पर प्राणायाम के द्वारा मंत्र शक्ति से आघात किया जाता है । तब वह जाग्रत होकर उपर उठती है।

वह क्रमशः स्वाधिष्ठान ( मूलाधार से ऊपर ) में पहुंचती है।

वहां से वह, मणिपुर (नाभिप्रदेश में ), तब अनहत, ( हृदय मे), विशुद्ध

( गले में ), आज्ञा चक्र (दोनो भौहो के बीच ) से होती हुई अंत में सहस्रार

( मस्तिष्क के सबसे उपरी भाग )में पहुंचकर ब्रम्ह से जा मिलती है ।

यहां साधक को परम आनंद की प्राप्ति होती है ।

मैने बहुत समय तक कुंडलिनी योग का अभ्यास किया किन्तु मुझे कोई विषेष सफलता नहीं मिली ।

शंकराचार्य के सुंदरतम छंद

(ज्ञान ही ध्यान है)

( परम आनंद का बोध कराता अम्रतमय काव्य )

आदि गुरू शंकाचार्य ने ऐक बड़ी सुंदर कविता लिखी है । यहां मैं उसके कुछ छंदों का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूं ।

मैं कौन हूं ? प्रश्न का उत्तर देते हुऐ जगद्गुरू शंकरावार्य कहते हैं:

‘ मनो बुद्धिहंकार चित्तानि नाहं, न च श्रोत्र जिव्हे, न च घा्रण नैत्रे ।

न च व्योम भूमि र्न तेजो न वायु, चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम । ’

मैं न शरीर हूं, न मन, न बुद्धि और न अहंकार हूं ।

क्योंकि गहरी नींद में ये सब विलुप्त हो जाते हैं । मैं पंच तत्वों यथा प्रथ्वी, जल वायु, अग्नि, या आकाश में से कोई तत्व हूं, न मैं माता, पिता, बंधु, गुरू आदि ही हूं । ये सभी जीव की उपाधियां हैं । इस प्रकार सभी उपाधियों का निषेध करने ने पर जो शेष बचता है मैं वही सत् चित् आनंद स्वरूप आत्मा हूं। वही शिव है, वही मैं हूं ।

यह छंद शब्दों से परे दिव्य अवस्था का बड़ा सुंदर वर्णन करता है ।

यह काव्य अध्यात्म का महाअम्रत है।

 

बुद्ध के उपदेश

महान् संत गौतम बुद्ध के अनुसार समस्त संसार दुखों का सागर है। मनुष्य जब से अस्तित्व में आया है, उसने समस्त समुद्रो में उपस्थित कुल पानी से भी अधिक आंसू बहाऐ हैं। मनुष्य जीवन दुखों से पूर्ण है।

इस दुख की निव्रत्ति के लिऐ उसे अष्टांग मार्ग को अपनाना चाहिऐ। इसके निम्न नियम हैं:

1 सम्यक द्रष्टि 2 सम्यक विचार 3 सम्यक वाणी 4 सम्यक कर्म 5 सम्यक आजीविका 6 सम्यक प्रयास 7 सम्यक ध्यान 8 सम्यक ऐकाग्रता

तीन अग्नियां है: 1 इच्छाऐं 2 क्रोध 3 भ्रम

बुद्ध के अनुसार: निम्न प्रश्न अनुत्तरित, अव्यावहारिक व अप्रासंगिक हैं:

1 संसार का निर्माता कौन है?

2 संसार का आरम्भ कब हुआ व अंत कब होगा?

3 ईश्वर है अथवा नहीं ? आदि प्रश्न स्वयं में झूटे व मनुष्य कल्पित हैं।

बुद्ध आत्मा का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते ।

आज महात्मा बुद्ध द्वारा प्रतिपादित विपश्यना ध्यान स्रसार का सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक ध्यान माना जाता है।

कर्मयोग (गीता)

गीता में वर्णित कर्मयोग अधिकांश लोगों के लिए कुछ सुलभ योग है । जो लोग ध्यान का अभ्यास नहीं कर सकते उनके लिऐ यह सरल योग बताया गया है ।

गीता के अनुसार, ‘ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ’

अर्थात हे अर्जुन ! मनष्य को अपना कर्तव्य कर्म बिना फल प्राप्ति की आशा के साथ करना चाहिए ।

‘‘ मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि। ’’

हे अर्जुन! तू मेरे लिऐ कर्म कर, इससे तू मुझको प्राप्त होगा।

समस्त कर्मो के फल को ईश्वरार्पण कर देना चाहिए । क्योंकि हर कर्म के साथ पाप व पुण्य जुड़ा रहता है । अतः जीव को प्रत्येक कर्म के फल को भुगतना पड़ता है, चाहे कर्म शुभ हो या अशुभ। कर्तव्य कर्म को करते हुए उसे ईश्वरार्पण कर देने से उसका विषाक्त फल समाप्त हो जाता है । अपने जीवन निर्वाह के साधन के साथ ही मनुष्य को भगवान के लिए कर्म करना चाहिए जैसे भगवान के भक्तों की सेवा, भगवान की सेवा, पूजा, अर्चना, दीन दुखियों को भगवान का स्वरूप मानकर उनकी सेवा सुश्रुषा आदि । सभी कर्मों को अनासक्ति पूर्वक व अहंकार रहित होकर फल की चिंता किए बिना करना चाहिए I

‘‘ सर्वधर्मांपरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। ’’

अंत में भगवान भगवत्प्राप्ति का सबसे

सरल उपाय बताते हुऐ कहते हैं कि हे अर्जुन ! यदि तू योग, भक्ति, ज्ञान व कर्मयोग आदि किसी भी प्रकार के योग मार्ग पर चलने में असमर्थ हो तो भी कोई बात नहीं तू समस्त साधन त्यागकर अनन्य भाव से मेरी षरण में आजा। इस अत्यंत सरल साधन विधि से तू मुझे शीघ्र प्राप्त कर लेगा । मित्रों, भगवद्प्राप्ति का यह सबसे सुगम मार्ग है ।

नकली वैराग्य

योग के क्षेत्र में वैराग्य का बहुत महत्व है । यदि आप धन, कीर्ति, मनोरंजन आदि दुनिया की वस्तुओं के पीछे भागते रहोगे तो योग के लिए न तो समय मिलेगा न साधना ही सम्पन्न होगी ।

गीता मे क्रष्ण वैराग्य के द्वारा मन पर नियंत्रण करने का मार्ग बतलाते हैं ।

देखो ! जिस शरीर के सुख के लिए आदमी दिन रात परिश्रम करता है, जिस नाम पद के लिए वह न जाने क्या क्या उद्यम करता है, वही शरीर ऐक दिन मर कर बड़ी बुरी तरह सड़ांध मारता है ।

ऐक बड़ी सुंदर कहावत है:

‘ पशु की चाम तो काम आत है जाकी बनत पनैया, 

नर तेरी चाम काम न आत है, काहे इतराय फिरैया ’

अर्थात ऐ मनुष्य क्यों अपने पर इतराता फिरता हे ? तुझसे अच्छा तो पशु है कि जो जिंदा रहकर भी दूसरों की सेवा करता है व मरने के बाद भी उसके चमड़े का उपयोग होता है । किन्तु मनुष्य नामक प्राणी न तो जीते जी किसी के काम आता है और न मरने पर ही उसके शरीर का कोई उपयोग रह जाता है ।

किन्तु साथ ही नकली वैराग्य से भी सावधानी आवश्यक है।

यहां में एक कहानी सुनाना चाहता हूं ।

ऐक व्यक्ति कुछ कमाता नहीं था व इधर उधर भटककर अपना समय व्यर्थ गपबाजी में बिताता था । रात को घर लौटकर वह अपनी पत्नि को डांटते हुए बढ़िया खाना परेांसने को कहता ।

बेचारी पत्नि आसपास के घरों से भीख मांगकर सा उधार मांगकर जैसे तैसे खुद भूखी रहकर उसके खाने का प्रबंध करती । पत्नि उसे अनेक बार कमाने की सलाह देती किन्तु उस मुफ्तखोर को कोई फर्क नहीं पड़ता ।

पत्नि उसे ज्यादा कहती तो वह घरबार छोड़कर साधू बन जाने की धौंस देता । बेचारी पत्नि डर के मारे चुप हो जाती । ऐक दिन ऐक साधू बाबा उधर से निकले । पत्नि ने उन्हें अपना दुखड़ा सुनाया

इस पर साधू बाबा ने उसे कहा कि अपने पति को साधू बनने के लिऐ मेरे पास भेज देना व उन्होंने उसे अपने आश्रम का पता बता दिया । दूसरे दिन रात को रोज की तरह पति ने बढ़िया खाना

मांगा तो पत्नि ने कहा, ‘‘ घर में खाने को कुछ नहीं है । पड़ौसियों ने उधार देने से मना कर दिया है । ‘

इस पर पति उसे गालियां देते हुए बोला, ‘‘ ऐसे घर में रहने से तो साधू बनकर किसी आश्रम में रहना अच्छा जहां रोज बिना कोई काम किए स्वादिष्ट खाना मिल जाता है । ’’

इस पर पत्नि ने कहा, ‘ आप रोज रोज मुझे साधू बनने के लिए डराते हो तो सच में साधू क्यों नहीं बन जाते ? ‘

पति ने अपनी गाय के समान सीधी सादी पत्नि से ऐसे उत्तर केी आशा नहीं की थी । अपने आत्मसम्मान के खातिर वह उसी समय साधू बनने निकल पड़ा । पत्नि ने कहा ‘ अरे रूको ऐक महात्मा आऐ थे। वे अपना पता दे गए हैं । कहां भटकते फिरोगे वहां ही पहुंचो । उस आश्रम में बिना कोई काम किये नित्य नए नऐ स्वादिष्ट मिष्ठान्न खाने को मिलते हैं ।’

पतिदेव बिना टाइम गवांए सीधे उस आश्रम मे जा पहुंचे ।

वे प्रमुख साधू से बोले, ‘ मैं साधू बनना चाहता हूं । ’

वहां के हैड साधू ने कहा, ‘ आश्रम में प्रवेश के लिए आपको परीक्षा देना होगी । आपको ऐक माह के उपवास रखने होंगे व फलाहार के लिऐ पहले दिन एक नीम का लड्डू व दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, इस प्रकार से आखिरी दिन तीस नीम के लड्डू खाने होगे । यदि आपने यह परीक्षा खुशी से पास करली तब अगले टेस्ट लिए जाएंगे । ’

यह सुनते ही वह व्यक्ति वहां से सिर पर पैर रखकर अपने घर की ओर दौड पड़ा व हांफते हुए अपने घर पहुंचा । उसने पत्नि से अपने दुर्व्यवहार की क्षमा मांगी । वह दूसरे दिन से कमाने के लिए निकल पड़ा ।

उसने फिर कभी साधू बनने की बात जबान से नहीं निकाली ।

मित्रों ऐसे नकली वैराग्य से भी सावधान रहना चाहिए ।

माया

( परिवर्तित कथा )

माया भगवान की सम्मोहक शक्ति मानी जाती है।

ऐक बार नारद ने भगवान से कहा, ‘‘ प्रभु नुझे आपकी माया के विषय में समझाइये।.’’

उस समय बडी तेज धूप पड़ रही थी। भगवान ने कहा, ‘‘ नारद मुझे बड़ी प्यास लगी है, जाओ कहीं से पानी लाओ।’’

नारद ऐक नदी के किनारे पानी लेने गए। इस बीच भगवान ने उन्हे सूअर में परिवर्तित कर दिया।

वहां ऐक सूअरी को देखकर नारद उसके प्रेमपाश में पड़कर उसके साथ रहने लगे। उनके अनेक बच्चे हो गए।

इस तरह अनेक वर्ष बीत गए। नारदमुनि के दिन अपनी प्रेमिका व बच्चों के साथ बड़े सुख से व्यतीत हो रहे थे।

ऐक दिन नदी में बड़ी भयानक बाढ़ आई। नारद के बच्चे ऐक ऐक करके नदी में बहने लगे। नारदजी ने उन्हे बचाने की बहुत कोशिस की किन्तु वे असफल रहे। पति व पत्नि रोते हुऐ बच्चों का शोक मना रहे थे कि ऐक अन्य लहर उनकी पत्नि को बहा कर ले गई। नारद अपने भाग्य को कोसते हुए फूटफूट कर रोने लगे।

इतने में वहां भगवान प्रकट हुए। वहां न नदी थी, न ही कोई सूअर आदि थे।

भगवान ने नारद से पानी मांगा। नारद को गए कुछ पल ही हुए थे किन्तु उन्हें लगा मानों अनेक वर्ष व्यतीत हो चुके थे । नारद ने महसूस किया मानों वे ऐक भयानक सपने से जाग उठे हो।

व्यक्ति, समय, व स्थान की सीमाओं से आबद्ध चेतना के भ्रम का अनुभव माया कहलाता है।

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