UJALE KI OR ----संस्मरण in Hindi Motivational Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | उजाले की ओर ---संस्मरण

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उजाले की ओर ---संस्मरण

प्रिय साथियों

स्नेह वंदन

कुछ यादें परछाईं सी साथ ही लगी रहती हैं चाहे उनसे कितना भी पीछा छुड़ाने का प्रयास करो ,नहीं छुट पातीं | मन में जैसे आलथी-पालथी मारकर बैठ जाती हैं और कभी भी सिर उठाकर खड़ी हो जाती हैं |कुछ यादें प्रसन्नता देती हैं तो मुख पर मुस्कान चिपक जाती है लेकिन वे यादें जो आँखों में पानी भर लाती हैं ,बड़ी सताती हैं | कभी-कभी तो लगता है दम ही घुट जाएगा |

स्मृतियों के सिरहाने खड़े दिनों की सिहरन कुछ ऐसी होती है जैसे सर्दी से चढ़कर आया बुखार ! जब तक वे आँसुओं के रूप में या किसी और तरह से जैसे चिल्लाने से या किसी और चीज़ में मन लगाने से न छिप जाएँ तब तक वे हमें सताती ही रहती हैं |

मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो खुश रहना चाहता है लेकिन जब वह अपने किसी व्यवहार पर अंकुश न पाए ,किसी सीमा में न बंधे वह असहज रहता ही है | यह स्वाभाविक भी है | संवेदनाओं का पलड़ा भारी होता ही है लेकिन जब वह अपने में होता है तब यदि वह स्वयं को बादशाह समझने लगे तब तो उसका परिणाम भयंकर ही होता है |

सही प्रकार से जीने के लिए मनुष्य मज़बूत रहे ,अकड़े नहीं !विनम्र रहे ,डरपोक नहीं तभी सही प्रकार से जीवन समन्वय से जीया जा सकता है |ऐसे मनुष्य का सम्मान उसके बाद भी लोगों के मनों में बना रहता है | वह दरअसल ,एक छाप होता है जो दूसरों पर अपने व्यवहार से छोड़ जाता है |

जब मैं छोटी थी ,मेरे शहर में एक द्वारिकप्रसाद जी रहते थे | हम तो बच्चे थे तब | उस समय शहर में गिनी-चुनी गाड़ियाँ होती थीं| द्वारिका प्रसाद जी के घर में तीन गाड़ियाँ खड़ी रहतीं | उनकी पत्नी आर्यसमाज से जुड़ी थीं और मेरी नानी भी | इसलिए उनके व हमारे संबंध काफ़ी करीबी थे हालाँकि हमारे व उनके स्तर में बहुत अन्तर था| हमारा परिवार मध्यमवर्गीय था और वह परिवार धनाढ्य था जो शहर के टॉप परिवारों की श्रेणी में आता था |

इस परिवार की एक विशेषता यह थी कि यह पैसे से तो खूब समृद्ध था ही ,कई शुगर-मिल्स थीं इनकी लेकिन उतना ही शालीन व सहज ,सरल था |

इनके बच्चे भी हमारे साथ पढ़ते थे ,जिनका स्वभाव व मानसिक स्तर हम लोगों जैसा ही था | हमने उन्हें कभी भी अपने पैसों पर घमंड करते नहीं देखा |

हमारा परिवार अधिक शिक्षित होने के कारण शहर में सम्मान पाता |

नानी अक्सर कहतीं ---" द्वारिकप्रसाद जी के बच्चों के साथ खेलने से मैं तुम्हें कभी मना नहीं करूँगी ---"

इसका सबसे बड़ा कारण था कि जब दूसरे रईस घरों के बच्चे अपनी ऐंठ में रहते ,उन्हें गाड़ी में स्कूल छुड़वाया जाता | द्वारिका अंकल के बच्चे यानि उनके पोते-पोतियाँ हमारे साथ पैडल-रिक्शा में जाते थे | हालाँकि उनके घर पर दो गाड़ियाँ और ड्राइवर्स सदा रहते |

उनके बच्चे हमारे घर भी आते ,हम भी उनके घर जाते रहते | हमारे घर जो भी बना होता ,वो बड़े प्रेम से खा लेते | हम साथ में खूब खेलते और माँ के अध्यापिका होने के कारण उनके साथ बैठकर पढ़ते भी |

द्वारिकप्रसाद जी का घर हमारे घर से बहुत पास था ,एक सड़क पार की और उनकी विशाल कोठी का बड़ा सा द्वार आ गया | उनके गार्ड्स भी हमें पहचानते थे इसलिए जब भी मैं अपनी बाल-टोली को लेकर उनके घर जाती वे हमें बिना किसी पूछताछ के जाने देते |

उस कोठी में बहुत बड़ा बाग था जिसमें आगे की ओर लॉन,साइड में लंबे पेड़ों की कतारें दूर तक जाती थीं | कोठी के पीछे खूब बड़ा किचन-गार्डन था जिसमें उनका माली सब्जियाँ तो उगाता ही ,आम,लीची ,केले ,चीकू आदि पेड़ों की देखभाल रखता | उनके बागीचे में इतने फल होते कि वे पड़ौस में खूब बाँटे जाते ,हमारे यहाँ भी भेजे जाते |उनके घर में जितने भी काम करने वाले थे ,उनसे बहुत अच्छा व्यवहार किया जाता | एक प्रकार से उन्हें घर का सदस्य ही माना जाता | घर के एक साइड में पीछे उन्होंने कुछ कमरे बनवाए हुए थे जिनमें उनके घर में काम करने वालों के परिवार रहते |जिनका भरण-पोषण उनके घर से ही हो जाता था | यदि कोई उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद कहता अथवा उनकी प्रशंसा करता वे बड़े विनम्र भाव से ईश्वर को धन्यवाद देते कि वे कुछ नहीं हैं ,जो कुछ भी ईश्वर उनसे करवा है वे कर रहे हैं ---बस --इतना ही !

अचानक एक दिन जब खबर सुनी कि उनके बड़े पेड़ों में छिपे कुछ लोगों ने उनके एकमात्र पुत्र का कत्ल कर दिया गया है ,शहर भर में अफरा-तफ़री फ़ेल गई | सेठ द्वारिका प्रसाद को दिल का दौरा पड़ा और आधा घंटे बाद उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए |

हम छोटे से थे ,जब उनके घर से एकसाथ दो शवों को निकाला गया हमें बाहर से अंदर भेज दिया गया था | द्वारिका जी के घर के हमारी उम्र के बच्चों को हमारे घर भेज दिया गया था | फिर भी हमने छिपकर उत्सुकतावश उनकी अंतिम यात्रा देखी थी और उस महा हुजूम का वह नज़ारा जिसने हमारी आँखों में एक भय भर दिया था |

कारण था ईर्ष्या ! इसी ईर्ष्यावश उनसे चिढ़ने वाले किसी दूसरे रईस ने अपने लोगों को उनके बगीचे में छिपवा दिया था जिन्होंने रात्रि में किसी समय उनके युवा लड़के पर अटैक किया था | हालाँकि वे लोग बाद में पकड़े गए लेकिन द्वारिकप्रसाद जी का परिवार पूरा तहस-नहस हो गया था | उनकी पुत्र-वधू शिक्षित थीं जो पहले कहीं बाहर नहीं निकलती थीं | लेकिन बाद में उन्होंने ही अपने श्वसुर की शुगर-मिल्स संभाली और अपने बच्चों को बड़ा किया |

जिन्होंने यह सब करवाया था उनकी पूरे शहर में इतनी इज्ज़त खराब हो गई , कि उन्हें शहर छोडकर जाना पड़ा |

उस दृश्य को आज भी मैं जब याद करती हूँ ,शरीर ऐसे काँपने लगता है ,मानो सर्दी चढ़ा हुआ बुखार !

इस घटना को याद करके मन बहुत व्यथित हो गया है | अगली बार किसी मुस्कुराते हुए विषय के सग्थ आप सबसे मिलने का प्रयास करूँगी |

सस्नेह

आप सबकी मित्र

डॉ. प्रणव भारती