Hame tumse pyar kitna... - 2 in Hindi Fiction Stories by Poonam Sharma books and stories PDF | हमे तुमसे प्यार कितना... - 2 - एक वादा...

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हमे तुमसे प्यार कितना... - 2 - एक वादा...

नामकरण संस्कार भी बहुत धूम धाम से मनाया गया....पंडित जी ने कई नाम सुझाए पर सबको वोह पुराने से लगे किसी को पसंद नहीं आए जब बच्चे बड़े हो जायेंगे तो बहुत कोसते अपने मां बाप को कैसे नाम रखे हैं उनके सब हस्ते हैं। शेखर की मां भी गांव की पली बढ़ी थी उन्हे भी नए जमाने के नाम नही पता थे फिर सुनंदा जी ने दो नाम सुझाए मायरा और कायरा उस वक्त के लिए ये नए थे सभी को पसंद आ गए। नामकरण संस्कार बहुत ही अच्छे से संपन्न हुआ और दोनो बच्चियों के नाम मायरा और कायरा रख दिया गया। महेश जो कब से अपनी मां को गौर से देख रहा था उनके चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश कर रहा था उसने शेखर से भी कहा मां कुछ परेशान हैं कुछ कहना चाहती है शायद सब लोगों के चले जाने के बाद महेश और शेखर ने सुनंदा जी से उनकी परेशानी का कारण पूछा। सुनंदा जी ने कहा रे म्हारा राम जी परेशान हुए म्हारे दुश्मन, म्हारे मन में बस एक बात है सब लोगन को ठीक लगे तो कहूं। सबने हां में इशारा किया....ये भी कोई पूछने की बात है आप बड़ी है आप हुकुम कीजिए बस और बेझिझक अपनी बात कहिए, मेघना ने बड़े ही आदर के साथ कहा।

म्हारे मन में एक बात से में चहुं की तू अपनी बड़ी बेटी मायरा को मेरे पोते विराज को सौंप दे म्हारा मतलब है कि में अपने पोते विराज के लिए तेरी बेटी मायरा का हाथ मांगती हु। म्हारे दोनो बच्चों में घनी दोस्ती से और आगे भी कायम रहेगी और दोनो बहुओं में पक्की दोस्ती है दोनो परिवारों में इतना मेल मिलाप है तो दोनो के बच्चों में भी रहेगा ही लेकिन कल को बच्चों ने कहीं ऐसे इंसान से शादी करली जो आगे चल कर दोनो परिवारों के लिए सही नही हुआ या हुई तो.....मुझे पूरा विश्वास है मेघना और शेखर के संस्कारों पर तुम दोनो मायरा और कायरा को अच्छे संस्कार ही दोगे इसलिए में थोड़ी सी स्वार्थी हो गई हूं इसलिए में विराज और मायरा की शादी कराना चाहती हूं.....

सभी सुनंदा जी को गौर से सुन रहे थे... सभी के चहरे पे आश्चर्य के भाव थे....सभी समझने की कोशिश कर रहे थे की सुनंदा जी ने अभी क्या कहा....

(शेखर की मां) दमयंती जी ये बात सुन कर बहुत खुश थी उन्हे तो बैठे बिठाए दामाद मिल गया था अपनी पोती के लिए....

पर मां जी ये तो बाल विवाह हुआ मेघना ने कहा....

रे म्हारा राम जी मानने तो लागे है तेरे दिमाग के पुर्चे ठीले हो गए हैं रे शादी तो बच्चों के बड़े होने के बाद ही होगी लेकिन फैसला अभी होना चाहिए ।

रूपाली और महेश दोनो की आंखों में खुशी झलक रही थी उन्हे देख के साफ पता चल रहा था की दोनो ही अपनी मां की बात से सहमत हैं। लेकिन उन्हें इंतजार था शेखर के रिएक्शन का।

शेखर को समझ ही नही आ रहा था को वोह क्या ही कहे एक नजर मेघना की तरफ देख के उसने अपनी नजर महेश पे टिका दी जैसे वो भी इंतजार कर रहा था की पहले महेश कुछ कहे।

हिचकिचाते हुए उसने कहा महेश देख....

उसकी बात आगे बढ़ने से पहले ही महेश बोल पढ़ा मुझे और रूपाली को मां की बात सही लग रही है में भी चाहता हूं की हमारी दोस्ती रिश्तेदारी में बदल जाए। सबकी अपनी सोच और इच्छाएं होती है में तुझ पर कोई दबाव नहीं डालना चाहता अगर तेरी हां है तो मुझे बहुत खुशी होगी।

महेश भाईसाहब एक मां के लिए इससे बड़ी बात क्या होगी की उसकी बेटी को ऐसा ससुराल मिले जो उसे मायके से भी ज्यादा प्यार दे। लेकिन कल को बच्चों ने बड़े होक इस बात का विरोध किया तो..... मेघना ने अपनी उलझन को व्यक्त करते हुए कहा....

तो हम हैं ना हम उन्हे समझाएंगे वो जरूर मान जायेंगे हमसे बेहतर कौन समझ सकता है की उन दोनो के लिए क्या बेहतर है क्या नही....रूपाली ने विराज को गोद में बिठाते हुए कहा जो कब से सोती हुई मायरा के पास जाके बार बार उसका हाथ पकड़ रहा था और मायरा नींद में ही कसमसा रही थी।

सुनंदा जी ने अपनी गहरी नज़र शेखर पे डाली और बड़ी ही उम्मीद से शेखर से पूछा की तेरा क्या विचार है शेखर.....

शेखर जो कब से गहरी सोच में डूबा हुआ था उसने सुनंदा जी की तरफ देखा फिर मायरा की तरफ देखने लगा जो इत्मीनान से वही सो रही थी.....

दमयंती जी तो पहले ही अपनी हामी भर दी थी.....मेघना भी सबके तर्क वितर्क से संतुष्ट हो चुकी थी....बचा था सिर्फ शेखर....उसने भी बहुत सोच समझने के बाद अपनी हामी भर दी थी....

चाहता तो शेखर भी था इस दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का लेकिन उसे एक डर था कहीं बच्चों ने बड़े होक उनके फैसले पे उंगली उठाई तो वो क्या कहेगा....कैसे बिना बच्चों से पूछे बचपन में ही उनकी शादी तै कर दी.....ऐसा नहीं है महेश का परिवार बुरा है बल्कि उसकी बेटी तो बहुत खुश रहती वहां लेकिन विराज के बारे में कहना मुश्किल है बड़ा होक जब उसे पता चलेगा तो वो स्वीकार कर पाएगा उसकी बेटी को....महेश और रूपाली की परवरिश पे उसे कोई संदेह नहीं है लेकिन फिर भी डर तो उसके मन में बनाया हुआ था....
अगर उससे उसकी बेटी ने बड़े होक पूछ लिया की उसे अपने से अपना जीवन साथी चुनने का भी अधिकार नही है तो वोह क्या कहेगा।

महेश भी समझता था शेखर की समस्या इसलिए उसने हर तरीके से कोशिश की शेखर को समझने की इस रिश्ते के जुड़ने में ही दोनो बच्चों की भलाई है।

शेखर भी पूरी तरह से संतुष्ट हो चुका था.....

दोनो दोस्तों ने गले मिलके इस नए रिश्ते की शुरुवात करी। रूपाली और मेघना ने भी एक दूसरे को बधाई दी। सुनंदा जी और दमयंती जी ने भी एक दूसरे को मिठाई खिलाकर एक वादा लिया आज से आपकी पोती मेरी ओर मेरा पोता आपका हुआ।

महेश और शेखर ने भी एक दूसरे से वादा किया की वोह आगे चलकर विराज और मायरा की शादी कराएंगे और अपने वादे से कभी मुकरेंगे नही।

दिन बीतने लगे...वक्त अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था....तीनो बच्चे दोनो मांओं के संरक्षण में पल रहे थे।
महेश और शेखर तीनो बच्चों पे जान लुटाते थे। उन्होंने खिलौनों से पूरा घर भर दिया था....

इसी बीच दमयंती जी की नई फरमाइश शुरू हुई समाज के डर से पोते की इच्छा।
उन्हे अपनी दोनो पोतियों से भी बहुत प्यार था लेकिन वारिस बढ़ाना या समाज के ताने कारण कोई भी हो लेकिन आए दिन बार बार मेघना को दूसरा बच्चा करने को कहती।

शेखर बिलकुल तैयार नहीं था उसे बार बार मेघना का दर्द में तड़पना याद आ जाता।

रोज़ रोज़ की बातों से तंग आ कर मेघना ने शेखर को मना ही लिया था।

जब मायरा और कायरा ३ साल की हुई और विराज ४ साल का तब मेघना और रूपाली फिर एक बार प्रेगनेंट हुई.... इसबार मेघना की डिलीवर पहले थी और रूपाली की उसके चार महीने बाद।

मेघना को लड़का हुआ ...दमयंती जी तो बहुत खुश हुई।
रूपाली को लड़की हुई....और उसके घर में भी खुशी का माहौल था।

सब बहुत खुश थे और खुशी खुशी अपना जीवन बिता रहे थे।

महेश ने अपने डायमंड के बिजनेस को बहुत अच्छे से एस्टेबलिस कर दिया था और अपनी प्राइवेट नौकरी भी छोड़ दी थी। अब वो ऑस्ट्रेलिया में बिजनेस एस्टेब्लिस करना चाहता था ये उसका सपना था क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में डायमंड की बहुत डिमांड थी।

लेकिन कहते है ना चंद्रमा को भी ग्रहण लग ही जाता है ऐसे ही महेश की खुशियों को भी ग्रहण लगाने कोई तैयार था वो थे महेश की बड़ी बहन सुहाना और उसका पति किशोर । आए दिन दोनो घर में धमक जाते थे उनकी नज़र महेश के पैसे पे थी। दोनो अपना हिस्सा महेश मांगते थे। सुनंदा जी भी सुहानी और किशोर की हरकतों से परेशान थी उन्हे तो यकीन ही नहीं हो रहा था उनकी अपनी बेटी और दामाद ऐसा कर सकते हैं जब सुहानी और किशोर ने रूपाली को धमकाया था की अगर महेश ने उन्हें प्रॉपर्टी में हिस्सा नहीं दिया तो वो विराज को जान से मार देंगे।

रूपाली तो ये सुनके सन्न रह गई थी। कोई कैसे पैसों के लालच में अंधा होक अपने ही भतीजे को मारने की धमकी दे सकता है।

रूपाली की ज़िद की वजह से महेश अपने परिवार को लेका ऑस्ट्रेलिया शिफ्ट हो गया था....ताकि इन सब झमेलों से दूर रह सके।

उसने शेखर को भी साथ चलने के लिए बहुत कहा लेकिन शेखर ने मना का दिया यह कह के की यहां उसकी नौकरी है वो उसे नही छोड़ सकता और बिजनेस की भी उसे समझ नही है तो वहां साथ चलके बिजनेस में भी महेश की हेल्प नही कर पाएगा।

शेखर का परिवार वोही सहारनपुर में हो रहे गया और महेश का परिवार ऑस्ट्रेलिया चला गया।
दोनो परिवारों में बातें रोज़ होती थी।

दिन बीत रहे थे.....

देखते ही देखते बच्चे बड़े हो गए थे। आज मायरा और कायरा का जन्मदिन था दोनो आज २१ साल की हो गई थी।










कहानी अभी जारी है.....



धन्यवाद 🙏