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वह सुभग कन्या और निरा मूर्ख मैं

जब अनुभूतियाँ अपने शीर्ष पर बहने लगें। भाव-नव तरंगें अपने चरम पर गोता लगा रहीं हों। हृदय के कोर-कोर में विस्फोट आलिंगन दे रहे हों, तो क्या है वह? विशुद्ध प्रेम!, मोह अथवा आकर्षण? वृहद संयोग व अवसर का लाभ न उठा पाना! मूर्खता है या सहजता? इनका निर्णय तो आप सब ही करेंगे। ये मात्र संस्मरण के शब्द नहीं दुःख की पीड़ा-रेखा है।

निगेबाँ हैं मेरे साये, चला हूँ धूप में जब मैं,
मिला हमराह जान-ओ-तन, ताब-बल से ढला हूँ मैं।
वो बन इक इश्क़ की कश्ती, विकट धारा से बचाती है,
वो साहिल से मिलाती है।
नई सुबह की ख़ुशबू-सी, फिज़ा में झिलमिलाती है।
छेड़ मदमस्त सी तानें, शज़र-वन में गुनगुनाती है।
पकड़ वो पाक़ दामन जब, जहाँ भर से लड़ा हूँ मैं।
निगेबाँ हैं मेरे साये......

मेरा संस्मरण शुरू होता है वहाँ से जब मैंने इस वर्ष एक विशेष परीक्षा के एक विषय का फॉर्म पुनः भरा था। वैसे मैं अपनी नौकरी के लगभग दो वर्ष पूर्ण कर चुका था, परंतु जैसा कि पदोन्नति और नयी-अच्छी नौकरी के अवसरों को तलाशना आज के व्यक्ति का सहज स्वभाव है सो मैं भी नए अवसरों की तलाश में हाथ-पैर मारता रहता था। चूँकि कई महत्त्वपूर्ण पदों पर आवेदन हेतु मुझे इस परीक्षा के प्रमाणपत्र की आवश्यकता थी अतः मैं भी उस विषय का पर्चा जल्दी क्वालीफाई कर लेना चाहता था। इस परीक्षा के बाकी विषयों की परीक्षा मैं पहले ही पास कर चुका था, प्रमाणपत्र प्राप्त करने की राह में यही विषय बाधा बन रहा था, जिसका पेपर मैं दो वर्ष पहले भी दे चुका था, परंतु उस समय वो क्वालीफाई नहीं हुआ था, इसीलिए मुझे पुनः फॉर्म का आवेदन करना पड़ा। कुछ दिनों बाद परीक्षा की तिथि और प्रवेश पत्र भी आ गया, मेरे इंस्टीट्यूट के संचालक ने मुझे प्रवेश पत्र भेज दिया। मैं उसमें छपे विवरणों और निर्देशों का अवलोकन करने लगा, तभी मेरी दृष्टि परीक्षा केन्द्र के नाम पर पड़ी। उसे देखते ही कुछ समय के लिए मेरी चेतना शून्य हो गयी। मानो परीक्षा केंद्र का नाम नहीं मन तरंगों और पुरानी यादों-भावनाओं का झोंका-सा आकर मस्तक पर लगा हो। हृदय में बेचैनी और उत्साह का बीज एक साथ अंकुरित हो उठा। पिछली भूल का क्रोध और नये अवसर का उन्माद दोनों मन में एक साथ कौंध गये।
दरअसल दो वर्ष पहले इसी परीक्षा केंद्र में मैंने इस विषय की परीक्षा दी थी। केंद्र में दीवार के बाहर लगे पर्चे पर अनुक्रमांक का मिलान करके केंद्र के अंदर आवंटित किये गये रूम में पहुँचा और निर्धारित सीट पर बैठ गया। वह केंद्र एक विद्यालय था, अतः उसकी सीटें ऐसी थीं कि उसमें दो परीक्षार्थी एकसाथ बैठ सकें। मुझे ये स्मरण नहीं कि साथ का परीक्षार्थी उस सीट पर पहले से बैठा था या मेरे बाद आया था, परंतु वह एक लड़की थी। लगभग मेरी ही उम्र की। मैं उसकी ओर दृष्टि करने का साहस तक नहीं जुटा पा रहा था, क्योंकि प्रारंभ से ही मुझे किसी नये व्यक्ति से बात करने या अवलोकन करने में संकोच होता था और फिर वह तो एक कन्या थी। सदा से ही लड़कियों से मेरा वार्तालाप, तालमेल और मैत्री कम ही रही थी। ग्रेजुएशन और कोचिंग के दिनों में भी लड़कियों के प्रति मेरी हिचक व संकोच बना ही रहा था और वह संकोच अभी भी मेरे व्यक्तित्व में विद्यमान था।
इस हिचक का कारण संकोच और आध्यात्मिकता का पुट थे। मैं किसी स्त्री को कभी वासना की नज़रों से नहीं देखता। यह तो देखने वाले की दृष्टि है कि वह स्त्री में क्या देख रहा है। कोई स्त्री में रूप देखता है, कोई लावण्य, कोई सौंदर्य, कोई सौमनस्य, कोई शीलता, कोई सौहार्दता। यह तो दृष्टि-दृष्टि का भेद है। कोई उस पर कामी हो रहा है, कोई उस पर प्रेमी हो रहा है। कोई वासनायुक्त हो रहा है, तो कोई योग के उत्तुंग शिखर पर चढ़ गया है। कोई सोच रहा है ये कितनी सुन्दर है और कोई सोच रहा है कि ये इतनी सुन्दर हो सकती है तो राधा रानी कितनी सुन्दर होंगी।
हालाँकि मैं स्वभाव से बहुत ही मृदुभाषी, चंचल और हँसमुख हूँ। एक बार किसी से अच्छी पहचान हो गयी और बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाये तो मुझे अपने हँसी-मज़ाक से भरे मूल स्वभाव में आने में समय नहीं लगता, वरन् वार्तालाप प्रारंभ करने और खुलने में ही समय लगता है। पर किसी तरह हृदय से साहस करते हुये मैंने उसकी ओर देखा। उस पर दृष्टि पड़ते ही मेरी स्थिति कुछ ऐसी हुयी जैसे किसी गजी को देखकर सुरापान किये हुए मदमस्त विशालकाय हाथी के गंडस्थल से मद चुने लगा हो। मानो किसी घोर अरण्य में चल रहे पथिक के ऊपर दो मेघों के टकराने से उत्पन्न विद्युत-सम्पात गिर पड़ा हो। कोई अश्व लौह बंधनों को तोड़कर उच्छृंखल हो गया हो। जैसे कोई कट्टर दक्षिणपंथ का समर्थक अचानक लिबरल विचारधारा का हो गया हो। कोई कस्तूरी मृग तरंगों के साथ हिरण चौकड़ी भरने लगे। ऐसा रूप, लावण्य, सौमनस्य, जो रोम-रोम में कंपन पैदा कर दे। जैसे किसी बहुत ऊँचाई पर उड़ते विहग का पंख टूटकर वायु के वेग रूपी गोदी में विराजमान होकर बड़े आनंद से हल्का होकर आसमान में उड़ते हुये धीरे-धीरे पृथ्वी पर अभिराजित हो रहा हो।
उसके मुख पर स्त्रीत्व की दिव्य कांति एवम् हिरण्यगर्भ से निकलती सहस्रों रश्मियों की आभा विद्यमान थी। लावण्यता ऐसी कि जिसे देखकर महताब भी शर्म से बादलों में अपना मुँह छिपाकर बैठ जाये। जब उसकी केश अलकावलियाँ उसके तेजस्वी मुख पर बिच्छुरित होती थीं तो ऐसा प्रतीत होता था कि किसी नीलकमल के ऊपर हजारों भौंरे रस लेने के लिए लपक रहे हों। ऐसा सौंदर्य! ऐसा लगता था कि बसंत की बसंतिका ने अपनी सौरभ्यता और सुगंध उसके चरणों में अर्पित कर दी हो। ऐसा अनुपम स्वरूप! ढलते हुये भुवन-भास्कर की अरुणिमा ही उसने होंठों पर विराजमान कर ली हो। अमावस्या की रात्रि को ही बलात् उसने अपनी आंखों में कज्जल के रूप में अभिराजित कर लिया हो। गंधर्वों के वाद्य से उदित संगीत ही पदद हो जाते थे जब उसके लटके हुये मुक्ताहार के कुंडल हिलकर उसके कपोलों से टकराते थे। बला की खूबसूरत! ब्यूटी नहीं वरन् ब्यूटी इन्कार्नेशन थी वह। उसका कलेवर कौमार्यता के चरम पर था,जिसे देखकर फ़रिश्तों का भी ईमान डगमगा जाये। जैसे ग्रीक लोकश्रुतियों की सौंदर्य देवी ने स्वयं अपने हाथों से साँचे में ढालकर उसे बनाया हो। जैसे पूर्वचित्ति और सव्यसाची जैसी अप्सराओं ने अपना सारा सौमनस्य व विलक्षणता भेंट करके उसका शृंगार किया हो। परंतु सबसे मुख्य थे उसके मादकता भरे नेत्र। बड़ी-बड़ी आँखें मयखाने के दो बाब जैसी लगती थीं, आँखों के दोनों जाम भयानक आतिशा थे, मानो उनमें भारी विस्फोट छिपा हो।
तभी परीक्षा प्रारंभ होने का क्षण निकट आया और मैंने प्रयास करते हुये धीरे-धीरे बात शुरू की तो पता चला कि एक बार उसका भी यही एग्जाम क्लीयर नहीं हुआ था। उस लड़की का नाम बहुत विचित्र था, जो मुझे अब विस्मृत हो चुका है और यही मेरे दुःख और स्वयं पर क्रोध का एक बड़ा कारण है। मैंने तुरंत उसके नाम पर चुटकी ली। मैं अपने मूल स्वभाव में आने लगा था। वह मुस्कुरा दी और आँखें मेरी ओर घुमाते हुये बोली, ''तुम्हारा नाम भी तो बहुत अजीब है।'' मैं भी हँस दिया। पास ही खड़ी पर्यवेक्षिका ने भी अपनी किसी रिश्तेदार के नाम का हवाला देते हुए उससे कहा कि, ''मेरे एक रिश्तेदार का नाम भी यही है जो तुम्हारा है।'' धीरे-धीरे बातों का दौर आगे बढ़ा। बातें करते वक़्त मैं कभी उसकी आँखों को देखता, कभी अपने सीट पर पड़े प्रवेश पत्र को। कभी उसके मुख को निहारता तो कभी पेन से खेलने लगता। वह भी कुछ-कुछ ऐसा ही कर रही थी। वह मुँह से कम और आँखों से ज़्यादा बातें करती थी, मानो उन सुन्दर आँखों में अभिनय करता रंगमंच का एक मँझा हुआ कलाकार बैठा हो। बहुत चंचल थीं वो आँखें, बहुत शरारत थी उनमें, पुतलियाँ हर समय इधर-उधर नृत्य करती रहती थीं। मुझे भी कभी ऐसे देखतीं जैसे उद्दंडता से घूर रहीं हों।
उसने बताया कि उसकी तैयारी इस विषय में इतनी अच्छी नहीं हो पायी है। अतः उसके हृदय में थोड़ी शंका व क्षोभ था। यही कुछ-कुछ मेरी भी स्थिति थी। तो यह तय हुआ कि हम मिल-बाँटकर पूरी श्रद्धा से पर्चा हल करेंगे, जैसे अंग्रेजों ने मैग्नाकार्टा श्वेत पत्र पर उत्तर मुगलों से संधि कर ली हो। प्रश्नोत्तर पुस्तिका आने पर हमने उनका अवलोकन किया तथा ये निश्चित किया कि बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर समान व गहरी चर्चा के बाद ही दिये जायेंगे, सो किया भी। एक-एक प्रश्न हम बारीकी से देखकर गंभीर विचार-विमर्श करने लगे, जैसे कोई व्यापारी वाणिज्यिक संधि के बंध-पत्रों को देखकर चिंतन करता है। इस प्रकार हमने पर्चे का बहुविकल्पीय भाग हल करके उत्तर-पुस्तिका जमा की और विस्तृत उत्तरीय-पुस्तिका मांगी व हल करने को उद्यत हुये। बीच-बीच में मज़ाकिया बातों व सौंदर्य रस पान भी जारी रहा। सौंदर्य पान करने वाले से पूछो यौवन से ज़्यादा तरो-ताज़ा क्या मिलता है! हमने सोचा कि जिन प्रश्नों के सारे भाग आते हों, उन्हें ही पहले हल किया जाये और कठिन प्रश्नों को बाद में ही छेड़ा जाये। फिर हम उन प्रश्नों को हल करने लगे। हम दोनों में तालमेल ऐसा था, जैसे प्रशांत महासागर में भारत और रूस की सेनाएँ इंद्र नामक युद्धाभ्यास करती हों। कठिन प्रश्नों का उत्तर जब आता नहीं है तो ऐसे में आज के समय का प्रतिभागी अपनी सारी क्रिएटिविटी, सारा टैलैण्ट और भाषा-साहित्य झोंक कर किसी प्रकार उन्हें पूर्ण करके ही दम लेता है। सो हमने भी ऐसा ही किया। पूर्ण होने पर समय से अपनी कॉपी निरीक्षक को सौंपी और हम चलने को उद्यत हुये। हमारी परीक्षा ठीक-ठाक ही हुयी थी और पास होने का कोई भरोसा नहीं था। हमने थोड़ी बात की, परंतु पुराने संकोच और मूल्यों के कारण न तो मैंने उसे सोशल मीडिया पर आगे बात जारी रखने के लिए उसका प्रोफाइल पूँछा और न ही कॉन्टैक्ट नंबर मांग पाया। यह बात मेरे अन्दर ही दबी रह गयी। वह चली गयी। फिर मैंने विचार किया कि ऐसे काम नहीं चलेगा, मुझे इस विषय में जरूर बात करनी चाहिए और परीक्षा केंद्र के बाहर उसे ढूँढ़ने लगा। वह थोड़ी ही दूरी पर अपने कुछ मित्रों के साथ मुझे दिखाई दी। अतः संकोचवश इस इच्छा को हृदयतल में दबाकर मैंने अपनी बाइक उठायी और घर की ओर रवाना हो गया। मुझे यह भी स्मरण नहीं कि मैंने बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उसका नाम सर्च किया कि नहीं या सर्च किया भी तो वह मिली भी या नहीं। हृदय को कष्ट हुआ और अपने स्वभाव पर थोड़ा गुस्सा भी आया। समय के साथ इन भावनाओं और दुःख व क्रोध का ज्वार नीचे आ गया और वह स्त्री मेरी स्मृतियों में कहीं खो सी गयी व मैं अभागा उसका नाम भी भूल गया।
आज वह दिन आया जब मैं दो वर्ष बाद पुनः वो परीक्षा देने के लिए सज्ज हुआ। मैं अपनी बाइक से उसी परीक्षा केंद्र की ओर बढ़ा। परीक्षा स्थल के रास्ते में फिर मेरी दबी स्मृतियाँ व भाव जागृत हो उठे। मैं विचार करने लगा कि क्या उस लड़की ने भी आज उस एग्ज़ाम फॉर्म का आवेदन किया होगा, क्योंकि दो वर्षों से नौकरी और कोरोना काल के बीच यह एग्ज़ाम देना सम्भव नहीं था। अतः मुझे भी उसके विषय में ऐसा ही लगा। विचार आया कि अगर एप्लाई किया भी होगा तो क्या उसका केंद्र भी यही होगा? ईश्वर से सदैव आशीर्वाद में कृपा माँगने वाले मेरे हृदय के एक कोर ने आज उसे फ़िर से मिलाने की प्रार्थना की। क्या यदि वह मुझे मिली भी तो मेरे रूम में ही परीक्षा दे रही होगी? क्या यदि मिली भी तो मुझे पहचानेगी या मैं उसे पहचान पाऊँगा? और कहीं पूरे दिन मास्क तो नहीं लगाये होगी? फ़िर तो हो चुका वस्ल! संदेह के ऐसे प्रश्न बार-बार मन में कौंधने लगे। मैंने सोचा कि इस बार यदि वह मिली तो कोई कसर नहीं छोड़ूँगा, मन की सारी बातें कर लूँगा। जो डिफ्रेंट सा नाम है उसका वह भी पूँछ लूँगा और कॉन्टैक्ट या अकाउंट भी। ऐसी ही आशा और उमंगों की लहरें मन में उमड़ने लगीं। खैर! मैं केंद्र पर पहुँचा और बाइक यथास्थान पर लगाकर केंद्र के इर्द-गिर्द घूमने लगा। वहाँ कुछ अभ्यर्थी हँसी-ठिठोली कर रहे थे, कुछ पढ़ाई में व्यस्त थे, पर मेरी निगाहें जिसको तलाश रहीं थीं वो कहीं दिखाई न दी। अतः समस्त प्रक्रिया पूर्ण करके मैंने एक घंटे पहले ही अपने परीक्षा हॉल में प्रवेश कर लिया। कुछ परीक्षार्थी वहाँ पहले से ही मौज़ूद थे। सीटें वैसी ही थीं। मैं अपनी सीट पर बैठा और अन्य परीक्षार्थियों के आने की प्रतीक्षा करने लगा। धीरे-धीरे सभी लोग आने लगे और मेरी सीट का साथी परीक्षार्थी भी आकर बैठ गया। वह एक लड़की थी, परंतु वह वो लड़की नहीं थी, जिसकी प्रतीक्षा मेरी अन्तर्भावना कर रही थी। वह सीधी, हँसमुख स्वभाव की लड़की थी और कहीं जॉब भी करती थी। परीक्षा का समय जैसे-जैसे करीब आ रहा था, मेरी उम्मीदें टूट रहीं थीं। जैसे ही कोई लड़की कक्ष में प्रवेश करती, मैं अपनी यादों के मेमोरी स्कैनर में उस युवती को खोजने लगता। तभी परीक्षा शुरू होने के कुछ ही समय पूर्व एक नव-यौवना का प्रवेश मेरे कक्ष में हुआ। वह मेरी बायीं ओर वाली सीट पर बैठी और उसके बगल में कोई भी नहीं बैठा था। मेरी दृष्टि उस पर पड़ी। चूँकि वह अत्यधिक सुंदर थी, अतः मेरे मुख से अकस्मात ही उसकी तारीफ़ में माशाल्लाह निकल गया। फिर मैं मुख्य निरीक्षक के निर्देशों को रूम में लगे स्पीकरों से सुनने लगा और कुछ वार्ता अपने सीट की लड़की से की। पुनः कुछ क्षणों बाद मैंने उस नव यौवना जो सीट पर बैठी थी, उसकी ओर ध्यान से देखा तो मस्तिष्क में कुछ खटका। अरे! हे ईश्वर! ये तो वही है! हाँ! हाँ! बिल्कुल वही है। दो वर्ष पहले वाली लड़की, जिसके दिखने का इंतजार मेरा हृदय न जाने कब-से कर रहा था। उसका चेहरा काफ़ी बदल चुका था, किन्तु मैं उसे पहचानने में भूल कदापि नहीं कर सकता। मन में विचार आया और ईश्वर के प्रति असीम श्रद्धा और दृढ़ हो गयी। ऐसा गज़ब संयोग, ऐसा! वह भी दो वर्षों के बाद। जिसकी संभावना न के बराबर थी, वह हो गया!

जिस्म-ए-चराग़ाँ रौशन हुये, नब्ज़-ओ-इंसाँ थम गया।
महताब-ओ-तारे गुम हुये, सूरज ये कैसा उग गया।।
पहाड़ी सफ़र के मोड़ पर, इक शज़र कैसा टूटा पड़ा।
वो रूबरू हमसे हुये, क्यूँ फ़िर वक़्त जाने थम गया।।

मैंने पुनः उसकी ओर रोमांच और भावपूर्णता से दृष्टि डाली। हे कृष्ण! वही कांति, वही आभा, वही सौरभ्यता। कलेवर में लावण्यता वही थी, पर अब उसका लवण और उच्च हो चुका था। जुल्फ़ें जैसे किसी उमड़ती घटा या काली बला की भाँति उसके चेहरे पर आ रहीं थीं। वहीं होंठ अफताब की और अधिक अरुणिमा पी चुके थे। शरीर अपनी यौवनावस्था के चरम पर था। सरिता वही थी, पर जल नित्य नवीन और शुद्घ। सुरम्यता वही थी, पवित्रता और ज्यादा मासूम। जिस्म की मादकता ज्वालामुखी के सदृश फटने को आतुर थी। उम्र का ये मोड़ ही ऐसा होता है। कौमार्यता अब यौवन के शबाब पर पहुँच चुकी थी। जैसे मैकदे के बिगड़ैल रिंद ने जाम पकड़े बेहद खूबसूरत साकी-सुरबाला को देख लिया हो। वन में भटके मृगछौने को उसका संरक्षक मिल गया हो। जन्मों-जन्म से प्यास से व्याकुल राही को मरुस्थल में कल-कल कल्लोलिनी प्रवाहित नदी की जल धारा मिल गयी हो, ऐसी मेरी दशा हो गयी। जैसे अन्तर में किसी ने आशाओं की नयी दीपाञ्जलि बाल दी हो। मेरे चेहरे पर मुस्कान की एक रेखा तैर गयी और मैंने अपने मुँह पर चढ़ा मास्क हटाया, ताकि वह मुझे भी पहचान सके। उसने मेरी ओर देखा भी, तो मैं श्यामपट की ओर देखकर मुस्कुराने लगा, पर मैं असमंजस में था कि वह पहचानेगी या नहीं। मेरी कद-काठी वैसी ही थी, पर मेरे चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुयी थी, शक़्ल भी थोड़ी बदल तो गयी ही थी। अगले ही पल उसने मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में अब वह चंचलता नहीं थी, वरन् आँखें सागर-सी गम्भीरता समेटे हुयीं थीं। एक ठहराव सा आ गया था उन आँखों में। उसके मुख पर चिंता की कुछ लकीरें दिख रहीं थीं। चेहरा भावशून्य सा हो गया था। शायद उसकी तैयारी इस बार भी इतनी दुरुस्त नहीं थी।
खैर अब एग्जाम स्टार्ट हुआ और मैंने अपनी साथी परीक्षार्थी से पुनः वैसी ही संधि कर ली और पेपर मिल-बाँट कर ही किया। हम पेपर के समय बीच-बीच में हँसते, बात करते और फिर पर्चा हल करने में लग जाते। इस प्रकार किसी तरह हमने पेपर सम्पूर्ण हल किया। बीच-बीच में वो युवती मेरी ओर और मैं उसकी ओर देखते रहते थे तथा मुझे अब लगने लगा था कि वह मुझे पहचान चुकी है। मैंने समय से अपनी उत्तर-पुस्तिका जमा की और उसके भी उठने का इंतजार किया। हालाँकि उसने पेपर समय से पूर्व हल कर लिया था, परंतु पता नहीं क्यों वह बाकी अभ्यर्थियों की तरह पहले उठकर गयी नहीं। हम साथ में ही अपनी-अपनी सीट से उठे और बाहर आये। मैंने ठान लिया था कि अबकी बार हटना नहीं है पीछे, पूरी बात करनी है। पीछे हटता भी क्यों? इन दो वर्षों में लड़कियों के प्रति मेरी झिझक काफ़ी कम जो हो गयी थी। अब मैं सबसे विनम्रता और हँस कर बात कर लेता था। थोड़ा कॉन्फिडेंस तो बढ़ा ही था, लड़कियों के प्रति। इस प्रकार कहकर मैं अपने हृदय को वैसे ही निर्देशित कर रहा था, जैसे किसी टीम का कोच विश्व कप मैच से पहले अपनी टीम के खिलाड़ियों में जोश व ऊर्जा जगाता है। जैसे सेना का कमांडर कूच से पहले अपने लड़ाकों में हौंसला व क्रोध भरता है। वह बाहर आयी तो मैंने तपाक से मुस्कुराकर उससे प्रश्न किया, ''क्या आप वही हैं, जो दो साल पहले...... '' मेरा प्रश्न खत्म होने से पहले ही वह बोल पड़ी, ''हाँ! मुझे भी लग रहा था कि कहीं देखा है, तुम वही हो, ।'' मैंने कहा, ''कैसा हुआ पेपर?'' वह बोली, ''यार अच्छा नहीं हुआ।'' मुझे भी लग ही रहा था कि इस बार भी उसका एग्ज़ाम अच्छा नहीं हुआ है। एक तो उसकी सीट पर कोई बैठा भी नहीं था, जो थोड़ी सहायता कर सके। यही बात करते हुये हम विद्यालय की सीढ़ियाँ उतरने लगे। मैंने हँसते हुये कहा, ''नाम क्या था तुम्हारा, बड़ा डिफरेंट सा था।'' पता नहीं उसने यह प्रश्न सुना या नहीं, क्योंकि सीढ़ियों पर थोड़ी भीड़ भी थी। अतः बोली कि, ''यार कोई जुगाड़ हो इसमें पास होने का तो बताओ।'' मैंने एक ठहाका लगाया और कहा यार ये सरकारी संस्था का पेपर है, इसमें जुगाड़ मुश्किल है, पर देखते हैं।'' फिर मैं उससे पहले केंद्र से बाहर आ गया और बहुत ही स्टाइल से एक सख्त लौंडे की भाँति जेब से बाइक की चाबी निकाली और बाइक लेकर काफ़ी आगे चल दिया। क्या? ये मैंने क्या किया? अबे गधे! मूर्ख! बेवकूफ़! ये क्या कर बैठा? जिस प्रयोजन को मन में बसा रखा था, उसे ही पूर्ण नहीं किया! क्या यही करने के लिए तुझे ईश्वर ने इतना बड़ा संयोग उत्पन्न करके दिया था। उस आराध्य का तो ख्याल किया होता। कम से कम एग्ज़ाम में जुगाड़ लगाने के बहाने ही उसका कॉन्टैक्ट मांग लेता, इतनी भी हाज़िरजवाबी नहीं है तुझमें, क्या यूँही अपनी वाक्पटुता पर झूँठा गर्व करता फिरता है! या जब निरीक्षक ने सबकी साइन करने वाली लिस्ट दी थी, उसी में उसका नाम देख लेता। ये विचार आने के बाद भी पता नहीं क्यों मैंने अपनी बाइक पुनः केंद्र की ओर नहीं मोड़ी। मति भ्रष्ट हो गयी थी शायद। मन में दुःख का अथाह सागर उमड़ पड़ा, स्वयं पर क्रोध का अतिशय ऊँचा ज्वार प्रस्फुटित हुआ। बाइक से घर की ओर जाते हुये मैं बेसुध अपने आप पर चिल्लाये जा रहा था, स्वयं को कोसे जा रहा था। हाय! जे का किया तैने लेखक! शायद संकोच और अधूरी आध्यात्मिकता ने फिर से बाजी मार ली थी। शायद अभी-भी झिझक बिल्कुल खत्म नहीं हुयी थी। शायद आज भी वह दब्बूपन हृदय की तलहटी में कहीं बैठा हुआ था। शायद..... शायद..... शायद......
घर आकर काफ़ी दिनों तक क्षोभ और दुःख में डूबा रहा मैं। उसका नाम याद करने का भी बहुत प्रयास किया, पर नहीं याद आया। सोशल मीडिया पर दो साल पुरानी सर्च हिस्ट्री भी चेक की, पर कोई विचित्र नाम नहीं मिला, शायद मैंने दो वर्ष पहले भी उसका नाम ढ़ूँढ़ने का प्रयास ही नहीं किया। मैं अब थककर हार मान चुका हूँ। निरा मूर्ख हूँ मैं! ईश्वर बार-बार इतनी कृपा का संयोग उपस्थित नहीं करेंगे। ईश्वर ने अवसर दिया था, पर मैं उसे भुना नहीं सका। मछली और अवसर जब दिखायी दे तभी पकड़ लेना पड़ता है।
अब तो इस आशा को पूर्ण करने के दो ही मार्ग मेरे पास बचे हैं। पहला यह कि मैं इस परीक्षा में फिर से अनुत्तीर्ण हो जाऊँ व फिर से अप्लाई करूँ तथा ईश्वर भी वैसे आश्चर्य से भरे संयोग पुनः उत्पन्न करें, जिसकी संभावना नगण्य है अथवा दूसरा, या तो मुझे उसका नाम याद आ जाये और वह सोशल मीडिया पर मुझे मिल भी जाये। परंतु यदि वह मिल भी गई, तो भी क्या ही होगा? क्या ही संभावना है मनुष्य जैसा चाहता है वैसे ही सुगम भविष्य की?

जो खुद से ही निभा पाये न सुर्ख रंगों से सजी वफ़ा,
न गर शख्सियात बदलोगे, क्यूँ मिलेगी दर्द-ए-श़िफा।
जो करना हो पार ये दरिया, तैरना आग में होगा,
गर किनारों से नहीं बिछड़े, तब तो टूटोगे हर इक दफ़ा।।

मैं जानता हूँ कि समय के साथ ये दुःख-पीड़ा और क्षोभ धूमिल हो जायेंगे, क्योंकि सहजता का गुण बीज रूप में समावेशित है मुझमें कहीं। ये भावनाओं के थपेड़े वक़्त के साथ शांत व शीतल हो जायेंगे। उस सौंदर्य देवी को भी कदाचित विस्मृत कर दूँगा मैं।
आगे परमात्मा की इच्छा!!.......