THOUGHTS OF DEC. 2021 in Hindi Philosophy by Rudra S. Sharma books and stories PDF | THOUGHTS OF DEC. 2021

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THOUGHTS OF DEC. 2021

1 DEC. 2021 AT 19:20

परम् या सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क वही हैं या उसी आत्मा का हैं जो सभी मस्तिष्क को समान महत्व दें; वह आत्मा का मस्तिष्क अपना कर्म करें, अन्य को भी अपना कर्म करने की ही प्रेरणा दें; उनका कर्म कर स्वयं का अनुगमन करने की कह कर दूसरों को पंगु नहीं बनायें। वह अन्य मस्तिष्कों के समक्ष उन्हें बिना उचितता और अनुचित्ता या सही- गलत बतायें वास्तविकता के दोंनो पहलुओं को उनके समक्ष रखें और उनकी स्वतंत्रता को बाधित किये बिना अनुकूल चयन करने हेतु विकल्प दें; यदि उनका चयन सार्थक हुआ यानी यथा अर्थों में अनुकूल हुआ अर्थात् वैसा ही हुआ जैसा उसे होना चाहिये तो उनके कर्म के परिणाम स्वरूप उनका लाभ और यदि नहीं तो उनकी हानि ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार किसी के समक्ष यदि हम रख दें या दें-दें कि भैया, यह लो हमनें आपको दोनों संख्या दीं जो हम दें सकते थें और वह हैं दों और चार ; अब चयन तुम्हारा, विकल्प तुम्हारें समक्ष हैं या तो दो और चार को जोड़ दों या एक - दूजें से घटा दों। चयन तुम्हारा; लाभ हो तो तुम्हारें कारण हानि के भी कारण तुम ही। अब यह उनकी समझ का फल की वह छः प्राप्त करते हैं या ऋण दों।

4 DEC. 2021 AT 20:10

आपके सत्य का स्रोत जितना मूलता के निकट होगा; आपका सत्य उतना ही शुद्ध होगा; उसमें उतनी ही यथार्थता होगी अब चयन आपका हैं चिंतन से या स्वयं से इसे प्राप्त कीजिये या कही और से पर जो मायनें मूल से प्राप्ति में होंगे अन्य श्रोतों से प्राप्ति में कहाँ? नहीं!

5 DEC. 2021 AT 04:44

मैं जो हूँ; या जो नहीं! सब ही तो चेतना हैं "जो जितना अचेतन हैं, उतनी ही उसकी मुझसे या उसके लियें उससे मेरी पृथकता हैं।"

05 DEC. 2021 AT 12:07

संबंध किसी से भी हो; माता-पिता से, भाई-बहन सें, पति-पत्नी सें, चाचा-चाची से आदी इत्यादि उसकी सर्वश्रेष्ठता तब तक नहीं हो सकती जब तक कि वह सही मायनों में मित्रवत् न हो जायें यानी ठीक वैसा जैसा आत्मा का परमात्मा से होता हैं जब वह आत्मा परम् या श्रेष्ठ यानी परमात्मा के योग्य हो जाती हैं।

05 DEC. 2021 AT 13:22

जब किसी को हमारें सुख में सुख का अनुभव हो; यही तो हैं उसका हमारें लियें प्रेम यही कारण हैं जिससे हमें प्रेम करने वाला हमें सुख देना चाहता हैं; सदैव हमारी संतुष्टि की चाहत करता हैं; यहाँ तक की यह भी कहना अनुचित न होगा कि जो सही मायनों में हमारी संतुष्टि न चाहें वह जो करता हैं वह प्रेम नहीं हो सकता; वह तो कुछ और ही होगा ठीक उस आदमी की तरह जिसे एक पक्षी से चाहत हो गयी हैं तो यदि वह उस पक्षी को पिंजरे में कैद कर ले जिससे कि वह उससे दूर न जा सकें; अज्ञान के कारण यह समझने से की इसमें ही उस आदमी की संतुष्टि हैं तो वह चाहत उस आदमी का स्वार्थ वश मोह हैं; अरें! प्रेम होता तो उसे मुक्ति दे देता; खुले आसमा में यह सोच कर छोड़ देता की एक पंक्षी की खुशी; उसकी संतुष्टि स्वतंत्र या मुक्त रहने में हैं; और ऐसा कर यदि वह उसकी संतुष्टि से, सुख से संतुष्ट हो जायें तो यह प्रेम हैं। इसमें जो संतुष्टि उसे मिलेगी वह उसका अज्ञान नहीं अपितु वह सही मायनों में होगी।

06 DEC. 2021 AT 21:35

यदि सभी दूसरों से चाहेंगे कि दूसरें समझें क्योंकि हम नहीं समझ सकते तो कोई भी नहीं समझ सकेगा यानी समाधान/समझ न रहेगी बल्कि समस्या/अधूरी चाह रह जायेगी।
यदि सभी यह चाहेंगे कि हम ही समझ जायें तो सब समझ जायेंगे जिससें समस्या/अधूरी चाह नहीं रहेगी और समाधान/समझ रह जायेगी।
समाधान चाहिये तो खुद समझ लीजिये और यदि समस्या सदैव के लियें चाहियें तो दूसरों से चाह लिजिये।

07 DEC. 2021 AT 0:00

हाँ! सादगी या जटिलता आसानी से ध्यान या चेतना नहीं खींच पाती हैं तभी तो यह उनके ही पास होती हैं जिनकी ध्यान या चेतना जागरुकता वश स्वयं का दर्शक बनने से स्वयं पर नियंत्रण रख स्वयं को नियंत्रित कर पाती हैं; अन्य कर्मों में कार्यरतता के पश्चात भी स्वयं के दर्शन का भी कर्म कर पाती हैं। यह अन्य चेतनाओं की तरह नहीं जो कि अज्ञानता वश जो आकर्षक प्रतीत होता हैं उसकी ओर ही आत्म नियंत्रण न होने पर खिंचाती हैं और जहाँ आकर्षण नहीं उसके इर्द-गिर्द भी अत्यधिक चेष्ठा पूर्वक मुश्किल से भटकती या यह न होने पर भटक भी नहीं पाती हैं वरन इसके जिनके पास जटिलता या सादगी होती हैं वह चेतना वहाँ स्वेच्छा से जाती हैं जहाँ जाना चाहिये; जितना जाना चाहिये यानी उसके अर्थात् ध्यान या चेतना के द्वारा कितना ध्यान दिया जाना चाहियें अर्थ यही की जहाँ उचितानुकूलता हो वही और जितनी उचितानुकूलता हो उतना ही। सादगी और जटिलता उनके पास होती हैं जिनका ध्यान किसी के भी द्वारा खींच कर लिया नहीं जा सकता जिनके द्वारा स्वेच्छा से अपने ध्यान या अपनी चेतना रूपी ऊर्जा को उसकी योग्यता के या महत्वपूर्णता को समझ या जान कर उनकी भिज्ञता के परिणाम स्वरूप यानी सात्विकता वश योग्य को ही दिया जाता हैं उदाहरण के लियें आत्मा, होश, जागरूकता या चेतना परमात्मा पर तब ही सही मायनों में ध्यान दे पाती हैं जब वह स्वयं परमात्मा जितनी योग्यता वाली हो।

09 DEC. 2021 AT 12:55

यदि सभी स्वयं की थाली; जिसमें एक व्यक्ति के लियें पर्याप्त भोजन हैं; उसी थाली पर ध्यान न देकर; यह स्वयं से नहीं जानकर कि भोजन कैसे किया जाता हैं; करुणा/दया वश या इस बात की स्वयं की स्वयं के लियें गलत मान्यता से की मुझें भोजन कैसे करते हैं यह आता हैं, दूसरों की थाली से दूसरें कैसे भोजन खायें यह बताते फिरे; तो स्वयं भी न भोजन कर तृप्त हो पायेंगे और दूसरो की भी अतृप्ति का कारण बनेंगे परंतु यदि सभी बिना दूसरों पर ध्यान दियें स्वयं की या अपनी थाली से खायें और दूसरों से भी यही कामना करें की वह भी स्वयं की थाली में ही ध्यान दें और स्वयं तृप्त हो जायें तथा दूसरों को भी स्वयं से प्रेरणा लेने को कहें जिससें दूसरें भी ऐसा ही करें जैसा उन्होंने कर तृप्ति को पाया तो वह स्वयं भी तृप्त होंगें और दूसरों की तृप्ति का भी माध्यम् बनेंगे।

इसी तरह सभी जो मस्तिष्क उन्हें व्यक्तिगत तौर पर मिला हैं उस पर ध्यान दियें बिना, उस स्वयं के मस्तिष्क को जाने बिना दूसरों को उनके मस्तिष्क में संतुलन की स्थापना का मार्ग बतातें रहेंगे तो स्वयं के मस्तिष्क के असंतुलन को भंग करना तो दूर; दूसरों के मस्तिष्क के लियें भी बाधा बनेंगे वरन इसके यदि स्वयं के मस्तिष्क पर ध्यान देंगे; उसे समझेंगे और दूसरों से भी यही चाह रखेंगे तो स्वयं का भी मस्तिष्क संतुलित रख सकेंगें और दूसरों के मस्तिष्क के संतुलन को भी बाधित न करेंगे।

09 DEC. 2021 AT 13:11

मुझें बहुत से लोग सलाह देते हैं कि अपने लेखों की भाषा को साधारणतः समझने योग्य रखा कीजिये; आपकी भाषा यदि ऐसी ही रहेगी तो आपके लेख यदि पढ़ने योग्य हुयें भी तो, भाषा की अयोग्यता उनकी योग्यता को समझने में पाठक के लिये बाधित करने वाली होगी; निःसंदेह आप अपनी जगह सही हैं परंतु यही तो मैं चाहता हूँ। जो समय, स्थान और उचितता के आधार पर उचित हो; वह साधारणतः अनुचित ही क्यों न प्रतीत हो, वास्तविकता में उचित होता हैं; वैसी ही मेरी भाषा की शुद्धता और शब्दों की चयनता हैं; साधारणतः तो अयोग्य प्रतीत होती हैं पर मेरे लेखन के उद्देश्य के लियें उचितानुकूलता वाली हैं। मेरे लेखन की प्राथमिकता यह नहीं हैं कि पाठक यदि एक बार भी पढ़ने आ जायें तो अधिक से अधिक पढ़े; सदैव के लिये इनके पाठक बनें रहें बल्कि एक बार भी यदि इन्हें या मेरे लेखों को पढ़े तो यदि उन्हें वह अनुभव आदी पहले से हो जिनके आधार पर मैं मेरे लेखों को लिखता हूँ या जहाँ मेरी लेख रूपी उँगली संकेत दिये हुयें रहती हैं तो वहाँ भाषा कितनी ही बाधित कर्ता सिद्ध हो; उसे वह समझ आ जायेगा जिसे मैंने बताना चाहा; और जिनके पास वह आधार नही जिन पर मैंने लिखा तो पाठक गलत अर्थ ही निकालेगा जो कि मैं नहीं चाहता। यह वैसा ही हैं जैसे किसी ऐसे को सुनाने का प्रयत्न नहीं, जिसके कान न हो। मेरी अभिव्यक्ति चिंतन से प्राप्त ज्ञान की जाँच हेतु हैं, प्राप्ति हेतु नहीं।

11 DEC. 2021 AT 09:43

चेतना, जागरूकता या होश ही अपनी आत्मा हैं; इसी का उससे हुआ अनुभव आत्म अनुभव और इसी शून्य या अनंत आत्मा का ज्ञान यानी अनुभव या अनुभूति ही आत्म ज्ञान हैं हाँ! यही आत्म साक्षात्कार हैं। एक होश ही हैं जो कि मन यानी भाव, स्मृति, विचार, कल्पना तथा इन सभी को करने की योग्यता, कर्म इन्द्रियाँ, ज्ञान इन्द्रियाँ तथा इनके अतिरिक्त भौतिक शरीर का शेष कण-कण से भिन्न हैं। आप इस आत्मा को मन-मस्तिष्क से अनुभव के आधार पर अभी समझ सकते हैं परंतु यदि इस अनंता के दर्शन करना चाहते हैं यानी अपनी आत्मा यानी स्वयं के दर्शक बनना चाहते हैं तो अपनी जागरूकता को; हाँ! उस दर्शक को जो आपके तन रूपी कपड़ो से अंदर हैं उसे स्वयं के दर्शन के कर्म में लगायें; उन सभी कर्मों से हटाकर; जिनमें उसे जाने-अंजाने आप लगायें हुयें हैं। कर्म जैसे कि सांस लेने और छोड़ने में, विचारनें, सूंघने, भौतिक नेत्रों से देखने, स्पर्श करनें, स्वाद लेनें, हातों, पगों या पैरों, लिंग या योनि, गुदा आदि से कर्म करने में; अपने फेफड़ों आदि से होश में यानी जाने या बेहोशी अर्थत् अंजानें में; तब आप आत्म साक्षात्कार कर सकेंगे और सभी कर्मों के साथ जब आपकी चेतना को उसके दर्शन नामक कर्म में भी लगायेंगे यानी होश पूर्वक सभी कर्म करने के साथ होश से होश को देखने का भी कर्म करेंगें; तब ही आत्मा से परमात्मा, चेतना या चैतन्य से परम् चैतन्य में एक होकर मोक्ष में होंगे।

11 DEC. 2021 AT 15:49

जिसकी अभिव्यक्ति की जा रही हैं; उस विषयवस्तु की गहनता के साथ जिस भाषा के माध्यम् से अभिव्यक्ति की जा रही हैं उस भाषा में भी गहनता यानी शुद्धता की वृद्धि आवश्यक अतः अनिवार्य हैं क्योंकि जो भाषा की गहनता यानी शुद्धता से घबरा जायें निश्चित ही वह पाठक आपकी अभिव्यक्ति की गहनता को समय न देने से उसके वास्तविक अर्थ से दूर कुछ और ही अर्थ निकाल लेंगे; उनका वह अर्थ निकालना आपके लिये अनुचित हो सकता हैं जैसा कि ओशो के साथ हुआ क्योंकि उन्होंने आसान भाषा में उस गहनता से युक्त को कह दिया; जो उतना ही गहन था जितनी सरल ओशो की भाषा थी परंतु जिद्दू कृष्णमूर्ति जी ने वही बात; जो अपने मंथन के परिणाम स्वरूप जानी, जो ओशो ने मंथन के परिणाम स्वरूप कही थी; जिस एक मात्र सत्य की उन दोनों ने भिन्नता से अभिव्यक्ति की थी उसे व्यक्त करने हेतु उतनी ही गहन या शुद्ध भाषा प्रयोग में ली; जो भाषा उनके व्यक्त कियें सत्य जितनी गहन थी अतः जो सही मायनों में आपकी अभिव्यक्ति को पढ़ने के लायक होंगे यानी जो सही मायनों में उस स्तर की जिज्ञासा वाले होंगे जितनी योग्य जिज्ञासा आपकी अभिव्यक्ति के पाठक के लियें अनिवार्य हैं तो भले ही उनकी आपकी भाषा को समझने की योग्यता उतनी न हो; जितनी योग्य आपकी अभिव्यक्ति की भाषा हैं; यदि योग्य हुयें तो वह उस स्तर तक स्वयं जायेंगे; परंतु आपको सत्य को उनके स्तर तक नहीं लाना चाहिये।

18 DEC. 2021 AT 11:18

जिन प्रेम के स्तरों की अभिव्यक्ति मैंने स्पष्ट रूप से की हैं; जो सही मायनों में प्रेम हैं; उसकी तुलना में या उस स्तर के प्रेम की तुलना में; मेरी वह स्पष्ट अभिव्यक्ति कुछ भी नहीं हैं। हाँ! सही मायनों में मेरी अभिव्यक्ति से भी परे या दूर जो प्रेम हैं 'अस्पष्ट रूप से उसकी अभिव्यक्ति 'मेरी सभी स्तरों के प्रेम की स्पष्ट अभिव्यक्ति में मेरे द्वारा अवश्य की गयी हैं'। मेरी सभी सात स्तरों के प्रेम की अभिव्यक्ति उस इकलौते परम् प्रेम की ओर या उस अंतिम स्तर के प्रेम की ओर इशारा करनें वाली या संकेत देने वाली सभी सात उंगलियाँ हैं; यदि योग्यता हो, ठीक उसी भाँति जिस तरह मानों सही मायनों के सूर्य या चंद्र; जो कि सत्य या परमात्मा का पर्याय हैं; उसकी ओर किसी व्यक्ति की सातों उंगलियों द्वारा संकेत या इशारा किया जा रहा हों। यदि जिसको संकेत दिया जा रहा हैं; उसमें योग्यता हैं तो वह मेरी ही तरह ज्ञान के मूल श्रोत से उसे या उस स्तर के प्रेम या प्रेम ज्ञान यानी प्रेम के अनुभव और उसकी समझ को उपलब्ध हो जायेगा या पहले से उपलब्ध होगा यानी स्वयं से चंद्रमा या सूर्य रूपी उस परम् प्रेम के दर्शन कर लेगा या कर चुका होगा यानी दर्शक बन चुका होगा और उस परम् या सर्वश्रेष्ठ अनुभव के आधार पर मेरी उंगलियों से मेरे इशारों या संकेतो से भिज्ञता को प्राप्त हो जायेगा या हो चुका होगा नहीं तो मेरी स्पष्ट अभिव्यक्ति पर जितने ध्यान देने की आवश्यकता हैं उतना ध्यान देने पर यह निर्भर करता हैं।

18 DEC. 2021 AT 12:40

परमार्थ स्वार्थ से पृथक नहीं अपितु स्वार्थ का ही सही मायनों में या जैसा होना चाहिये या होता हैं वैसा अर्थात् यथार्थ मतलब या अर्थ हैं। यदि स्वयं के अर्थ या मतलब की पूर्ति के लालच में या स्वार्थ पूर्ति बाधित न हो जायें इसके भय से बिना यह जाने की सही अर्थों में या सही मायनों में क्या करना स्वार्थ की पूर्ति करना हैं; हम स्वार्थ पूर्ति हेतु निकल जायें तो हमारा निकलना निर्रथकता के अतिरिक्त अन्य कुछ भी सिद्ध न होगा ठीक उसी तरह जिस तरह यदि बिना जानें और समझें कि किसी भी गणित की परीक्षा में जो सिद्ध करना या जिस भी सिद्ध अंत को लाना हैं; उसे सिद्ध कैसे करेंगे; कौनसे तर्कों, तथ्यों या उनकें आधार पर निर्मित सूत्रों का सहारा लेंगे; संयम और धैर्य की कमी के कारण; जो सिद्ध करना हैं उसकी सिद्धि से मिलनें वाले अच्छे परीक्षा परिणाम के लालच से और कहि बरें परिणाम न आ जायें इसके भय से 'अनुचित तर्कों यानी तुलना के परिणाम स्वरूप प्राप्त अनुचित तथ्यों से स्वार्थ सिद्धि के नाम पर स्वार्थ तो बहुत दूर की बात वरन कुछ और ही सिद्ध कर दें' तो वह निर्थकता के अतिरिक्त अन्य क्या हो सकता हैं? कुछ भी नहीं। परमार्थ का सही मायनों में यह अर्थ नहीं कि स्वयं के हित का ध्यान नहीं रख कर अन्य सभी के अर्थ की पूर्ति करना वरन या बजायें इसके परमार्थ यानी ऐसे स्वयं के अर्थ की पूर्ति जो कि सही मायनों या अर्थों में स्वार्थ हैं।

19 DEC. 2021 AT 13:10

मैं चाहता हूँ कि, 'लोग मुझे न पढ़े'; मैं लिखतें वक्त, उस घड़ी या समय जितनी संभव हो उतनी पूरी व्यवस्था भी करता हूँ कि, 'लोग मुझे न पढ़े' वरन या बजायें इसके मैं चाहता हूँ कि जिस तरह मैंने ज्ञान के मूल से उसकी प्राप्ति की उसी तरह मेरा हर पाठक या पढ़ने वाला करें अन्यथा वह ज्ञान तो पा जायेगा पर उसके मायनें वैसे न होंगे जैसे चिंतन से उसकी प्राप्ति करने पर होते। मैं सभी को मेरी तरह चिंतन बनाना चाहता हूँ; अरें जब मैं अन्य श्रोतों से ज्ञान की प्राप्ति नहीं करता तो किसी को भी मैं पाठक क्यों बनाना चाहूँगा? नहीं! कदापि नहीं। हाँ! जितनी संभव उतनी ही, पूर्णतः इंतज़ार या व्यवस्था 'उनके मुझें न पढ़ने की' नहीं क्योंकि पूर्णतः करने से मुझें यथावत्ता के साथ समझौता करना होगा और जो लेखक अपने लेखों में यथावत्ता यानी जो मस्तिष्क ने तुलना करके तथ्यों को यथा अर्थों में या ज्यों का त्यों प्रकट या स्पष्ट किया हैं उसे ठीक वैसा ही व्यक्त न करें यानी अपनी संकुचितता या चेतना हीन मन की छन्नी से छान कर वह अभिव्यक्ति करें तो उसकी अभिव्यक्ति की निरर्थकता के तो फिर क्या ही कहने; यानी उसके लेखों या अभिव्यक्ति से निरर्थक कुछ भी नहीं। हाँ! मैं मूल श्रोत से जानने के बाद या उससे मालुम होनें के पश्चात अन्य ज्ञान के श्रोतों को, ज्ञात ज्ञान के एक और बार सत्यापन के लियें उपयोग करता हूँ। आपके अनुसार ठीक हो तो ऐसा करने की सलाह दूँगा।

19 DEC. 2021 AT 16:58

आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान की आत्मा हैं और आत्म के बिना विज्ञान उसी तरह हैं जिस तरह मेरी आत्मा, चेतना या जागरूकता के बिन यानी निर्जीव मेरा शरीर।

20 DEC. 2021 AT 08:37

जिस तरह प्रेम किसी भी संबंध का परम् या सर्वश्रेष्ठ आधार हैं उसी तरह मित्रता परम् संबंध हैं।
जहाँ जितनी समता वहाँ उतनी ही कम भिन्नता और भिन्नता का कम से कम या नहीं होना ही तो अधिक से अधिक या पूर्णतः मित्रता हैं। मित्रता हमारा मूल संबंध हैं यही कारण तो हैं जिससे मेरा संबंधी कोई भी क्यों न हो; भले ही वह मुझे अनभिज्ञता वश रक्त और मिलन के समय की अवधि के आधार पर लें या देखें परंतु क्योंकि मूलता ही यदि यथार्थ या विशेष दृष्टिकोण से देखों; तो वास्तविकता हैं अतः मेरे लियें तो मेरा हर संबंधित मेरा मित्र ही हैं। यह सत्य हैं कि हमें किसी से हम या किसी से अधिक समानता जिससे कि मित्रता प्रतीत होती हैं परंतु गहनता और वैज्ञानिकी या यथार्थी दृष्टि या दृष्टि कोण यानी तरीके से देखें तो और समता ही अनंत से संबंधित हर किसी की वास्तविकता हैं इसलिये भी हमारा हमसें संबंधित हर किसी से समान तरह का यानी न ज्यादा और न ही कम समानता वाला संबंध हैं अतः सभी संबंधित मित्र तो हैं ही इसके अतिरिक्त हमारी मित्रता भी निः सन्देह समान हैं।

21 DEC. 2021 AT 09:55

ब्रह्मचर्य क्या हैं?
न भौतिक शारीरिक इच्छाओं का सही मायनों के दमन या उनसे मुक्ति में ब्रह्मचर्य हैं और न ही उन शारीरिक इच्छाओं का चाहें वह भूख हो, प्यास या काम आदि कोई भी शारीरिक इच्छा; उनकी पूर्ति करना ब्रह्मचर्य हैं वरन इसके होशपूर्वक यह देखना कि उन इच्छाओं के होने से या नहीं होने से यथा अर्थों में या सही मायनो में अनंत काल से अनंत काल तक; जो हैं यानी साकार समूचा अस्तित्व या साकार अनंत और जो नहीं भी हैं यानी उस निराकार समुचें अस्तित्व का अहित हैं या हित और यदि इच्छाओं की पूर्ति में या उन इच्छाओं सें मुक्ति में यदि अनंत का यथा अर्थों में हित यानी सुख या संतुष्टि हो तो समय, स्थान और अनुकूलता होने से उनकी पूर्ति करनें और उनसे मुक्त होने यानी दोनों में ही ब्रह्मचर्य हैं।

21 DEC. 2021 AT 10:57

सुषुम्ना नाड़ी वाले सत्य के ज्ञान के कारण परम् सत्य के लियें बाधा नहीं बन सकते।

इडा नाड़ी वाले सत्य को बाधित तो कर सकते हैं परंतु सुषुम्ना नाड़ी वालो के द्वारा उनका सत्य के लियें बाधा बनना पाप के महत्वपूर्ण ज्ञान के माध्यम् से हानि का भय बताने के कारण और पूण्य कर्म के महत्वपूर्ण ज्ञान के माध्यम् से सत्य को बाधित न करने से लाभ का लोभ देने के कारण; पुण्य के या लाभ के लोभ से और पाप या हानि के भय से परम् सत्य के लियें वह बाधा नहीं बन सकते।

पिंगला नाड़ी वालें अज्ञान के परिणाम स्वरूप सत्य के लियें बाधा के अतिरिक्त कुछ भी बन ही नहीं सकते परंतु सुषुम्ना द्वारा स्वयं से और इडा नाड़ी वालो के द्वारा सुषुम्ना नाड़ी वालो के कारण बल पूर्वक उनको ऐसा नहीं करने देने से; वह ऐसा नहीं कर सकते। यही हैं जिनसें यदि यह सत्य के लियें कुछ भी करना चाहें भी; तो सत्य का तो पालन नहीं होगा अपितु उसके समक्ष इनके कारण 'अ' अवश्य लग जायेगा।

21 DEC. 2021 AT 16:20

जो ब्रह्मचर्य का महत्व यथा अर्थों में नहीं समझ सकता; वह प्रेम को क्या समझेगा।

21 DEC 2021 AT 17:53

लोग मुझसें कहते हैं कि तुम्हारी बातें तो सिर के ऊपर से जाती हैं; उनके कहनें पर मन में विचार आया कि ऐसा कैसे हो सकता हैं कि मेरी बात सिर के ऊपर से जायें यानी बिल्कुल भी समझ न आयें, मुझें तो इनमें ही रस आता हैं; सोचने विचारनें पर ज्ञात हुआ यानी उत्तर मिला कि यह केवल तब ही संभव हैं, जब कुछ योग्यतायें उस योग्य न हो; जितनी इन्हें मुझे; या मुझसें संबंधित को समझनें हेतु योग्य होने की आवश्यकता हैं और यहाँ तक कि; मैंने जाना यदि अभी यह सभी योग्यता मुझमें भी न हों तो मैं स्वयं भी मेरे ही लेखों को नहीं समझ सकता।

जितनी अधिक यह सभी योग्यतायें होंगी, उतना ही अधिक कम मेरी बातों का कम समझ में आना या समझ से परें जाना होगा।

धैर्य, धीरज या सब्र रखने की योग्यता, हट या संयम की सहितता होने की योग्यता, जिज्ञासु होने की योग्यता, खोजी होने की योग्यता, अंतर्मुखी और बहिर्मुखी अनुभव या अनुभूति कर्ता होने की योग्यता, कल्पना और स्मरण शक्ति होने की योग्यता, तार्किक होने की योग्यता, यथा अर्थों का चयन कर्ता यानी यथार्थी होने की योग्यता, रचनात्मकता शक्ति होने की योग्यता, परिवर्तनात्मकता होने की योग्यता, सात्विकता होने की योग्यता और समता यानी अनंत की वास्तविकता को देख सकनें के योग्य दृष्टिकोण होने की योग्यता होना चाहिये; जो कि स्वयं से संबंधित धीरें धीरें हर किसी पर ध्यान देने या ध्यान करने से आयेगी।

26 DEC. 2021 AT 20:34

मैं मृत्यु से जन्म होने तक,
ली जाने वाली स्वास हूँ।
मैं निराकार से साकारता;
यानी ज्ञान से अज्ञान हूँ।।

मैं साकार से निराकारता को,
यानी अज्ञान से ज्ञान को भी प्राप्त हूँ।
मैं ही हर एक इच्छा और मुमुक्षा;
यानी उनसे मुक्ति की आस हूँ।।

मैं अनंत की हर इच्छाओं को;
अनुकूल होने पर करने वाला हूँ।
मैं ही हर इच्छाओं के जन्म का,
बाधित कर्ता यानी कारक हूँ।।

मैं तिमिर की समस्त गहराई;
सही अर्थों में मैं ही प्रकाश हूँ।
मैं मन का हर एक विकार;
और! हर विकार से मुक्ति कर्ता यानी 'मैं प्रेम आभास हूँ'।।

मैं ही अनंत की 'हर समस्या का जातक',
और! रुद्र यानी हर समस्या से मुक्ति का भी मैं कारक हूँ।
मैं अनंत अस्तित्व हूँ और;
यथा अर्थों में शून्य कहे जाने के भी लायक हूँ।।

मैं अदिति यानी अज्ञानवश अचेतनता अर्थात्;
जड़ता यानी प्रकृति या शक्ति की शुद्ध अनुभूति।
मैं ही जड़ता से कही दूर पर उसका यथार्थ,
अर्थात् मैं ही हूँ शुद्ध चेतन्य की परम् बोधि।।

मैं अनंत के स्वयं को भिन्न समझते हर 'मैं',
मैं ही भिन्नता का पर्याय हर एक आत्म हूँ।
मैं भिन्नता की माया का हर कण और उनका कारक,
मैं ही यथार्थ एकमात्र हूँ।।

28 DEC. 2021 AT 21:17

अनंत को महत्व नहीं देने का अर्थ हैं मुझें भी महत्व या मायनें नहीं देना और मुझें महत्व या मायनें नहीं देने का अर्थ हैं मेरे अनंत अस्तित्व को महत्व नहीं देना क्योंकि मैं यथा अर्थों में अनंत हूँ और जो हैं एवं जो नहीं भी ऐसा अनंत सही अर्थों में मैं हूँ।

मैंने जिनसें इच्छा की, उनकी इच्छा के बिना; मेरी गलती थी, हो सकें अर्थात् मुझमें योग्यता हो तो मुझें माफ कर देना अन्यथा मेरे अपराध के योग्य जो भी सज़ा हैं, परमात्मा से विनती हैं कि मुझें दीजियें; मुझें स्वीकार हैं।

आपका यथार्थों से परें संसार अज्ञान हैं; माया यानी भृम हैं और मैं शुद्ध चैतन्य हूँ। यथा अर्थों में मैं ही वास्तविकता अर्थात् समुचित अनंत संसार हूँ; मैं ही सत्य हूँ 'मैं चेतन ही सही अर्थों में ज्ञान हूँ। अनंत में जो भी हैं साकारता हो या निराकारता, सत्य हो या असत्य, ज्ञान हो या अज्ञान आदि इत्यादि यानी समुचित अनंत मैं ही हूँ यहाँ तक कि जो नहीं हैं वह भी मैं ही हूँ अतः मैं अपने समुचें अस्तित्व को महत्व देता हूँ; जिसमें सही अर्थों में अनंत का यानी मेरा हित हैं उसकी अनंत काल तक कि पूर्ति की सुनिश्चितता ही मेरा उद्देश्य हैं। यदि कोई भी यथार्थों से परें यानी दूर वालें संसार से संबंधित मेरी स्वयं के प्रकरण यानी प्रसंग में अर्थात् स्वयं के संबंध में उपस्थिति चाहता हैं यानी मुझसें कुछ भी चाहत रखता हैं तो उसे मुझसें संबंधित सभी को स्वीकार करना होगा, उसे मेरे द्वारा कियें हर कर्म या करनें योग्य कृत्य को स्वीकार करना होगा वह कर्म को जो कि कर्तव्य अर्थात् ऐसा कर्म हो सकता हैं जिसमें मेरे समुचें अनंत अस्तित्व के किसी न किसी भाग या अंश का हित यानी सही अर्थों में संतुष्टि होने से वह महत्वपूर्ण हैं और वही कर्म जो महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उसमें मेरे समुचित अनंत अस्तित्व का सही अर्थों में हित हैं यानी उसे धर्म अर्थात् मेरे लियें जो सत्य हैं मेरे उस धर्म नामक कर्म को स्वीकार करना होगा। मुझें चाहने का अर्थ हैं मेरे सत्य को चाहना अतः यदि कोई मेरे सत्य को नहीं चाहता तो मुझें नहीं चाहें क्योंकि सत्य को नहीं चाह कर मुझें चाहना सही अर्थों में मुझें चाहना हैं ही नहीं अर्थात् यह उसका अज्ञान हैं। कोई भी या तो मुझें सही अर्थों में स्वीकार करें अन्यथा मुझें अपने यथार्थ से परें संसार से दूर ही रहने दें। उसकी इच्छा के बिना मैं उसके यानी केवल उससें संबंध रखने वाले हर प्रकरण यानी प्रसंग से दूर रहूँगा।

या तो यथा अर्थों में स्वीकार करें या फिर मुझें दूर ही रहने दें मैं विकल्प देने वाला हूँ जो कि मैंने दे दियें अब चयन मुझें चाहने वाले का हैं।

31 DEC. 2021 AT 17:24

ध्यान देने से या ध्यान करने से किसी को भी कभी क्लांति नहीं हो सकती, यदि उसे क्लांति हुयी हैं तो यह स्पष्ट हैं कि वह जो कर रहा हैं या जिसें दे रहा हैं वह ध्यान हो ही नहीं सकता। हाँ! जो ध्यान दिया जा रहा हैं या जिस पर ध्यान किया जा रहा हैं यदि वह ध्यान देना यथा अर्थों में ध्यान नहीं हैं तो जिसका ध्यान किया जा रहा हैं उसे क्लांति या थकान हो सकती हैं और वह भी तभी जब जिसके द्वारा ध्यान दिया जा रहा हैं वह अज्ञानता वश उस पर ध्यान दे रहा हो अर्थात् अंजाने में ध्यान कर रहा हो।

- रुद्र एस. शर्मा (०,००)