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किताब में कैद रहस्य

किताब में कैद रहस्य

मधरानपुर,एक ऐसी जगह जिसके लिए कहा जाता है कि यहां के बादशाह अमरेंद्र के महल में कितने सारे रहस्य कैद है। सिर्फ़ महल ही नहीं पर पूरा मधरानपुर भूतिया इलाका माना जाता है। दिन को तो यहां बड़ी चहलपहल रहती है क्योंकि ये महल मधरानपुर गांव के बाहरी हिस्से में पड़ता है। पर गौधूली बेला होते ही यहां मानो करफ्यू लग जाता है। लोगों की चहलपहल थम जाती है। बस कभी कुत्ते या बिल्ली के रोने की या तो कभी हवा की साय साय की डरावनी आवाज़। आख़िर २०० साल पहले उस महल में ऐसा क्या हुआ था की उसके बाद मधरानपुर भूतिया इलाका बन गया?

कई लोगों ने, बड़े बड़े शोधकर्ता, हकीम बाबा, मौला सब ने जानने की कोशिश की पर सबके सब निष्फल रहे की आख़िर उस रात ऐसा क्या हादसा हुआ था। पुराने बूढ़े बुज़ुर्ग और सदियों से सुनते आती कहानी के अनुसार वहां अमरेंद्र राजा की बेटी का दिल किसी पर आ गया था और ये बात राजा को पता चल गई। राजा की बेटी अपने प्रेमी के साथ भागने ही वाली थी या भाग गई थी और सेनापति ने उन्हें राजा के हवाले कर दिया। उसके बाद उस महल में क्या हुआ वो कोई नहीं जानता। क्योंकि बेटी बदनाम ना हो इस लिए राजा ने उस दिन नोकर चाकर, दास दासी रसोइया सबको महल से दूर भेज दिया था। और जब आसपास वाले वहां कुछ चीखें सुनकर गए तो देखा वहां सबके सब मर गए थे। पर उस दिन के बाद उनके शब कहां गए, वहां क्या हुआ था कैसे हुआ था ये कोई नहीं जानता। पर हां गांव वालों पर बड़ा संकट मंडरा रहा था इसी लिए किसी सिद्ध मौलाना संत बाबा ने अपनी योग शक्ति से महल में जाकर हवन किया और आत्मा या आत्माओं को उस महल के शीशा गृह के बड़े शीशे के नीचे सारी आत्माओं को एक किताब में कैद कर लिया। पर उसका भी कोई पुख्ता सबूत नहीं है क्योंकि वो बाबा भी अपनी जान घवा बैठे उस महल में ही। रात के समय वहां से गुजरने वाला जिंदा नहीं बचता आज भी और बच गया तो आधा पागल हो जाता है। बस ऐसे ही किसी पागल ने उस किताब के बारे में बताया था। अब तो गांव में किसी ने उस महल का ज़िक्र भी करना छोड़ दिया था। पर एक मसीहा था जो सबको और इस शापित नगरी को पवित्र करने आया था। और वो था युग।

*

नीता: एक तो मुंह काला करवा कर आई है और उपर से हमसे ज़बान लड़ा रही है कि इस बंदर जैसी शक्ल वाले को यहां रहने दे।

स्वाति: मां प्लीज़। क्या खराबी है युग में? आपने मेरे लिए जो पसंद किया था उस रुद्र से तो लाख गुना अच्छा दिखता भी ही, कमाता भी है, अच्छे खानदान से भी ही और हां इसे कोई बुरी आदत नहीं है। समझी आप? काश आज पापा जिंदा होते तो मुझे समझते और उसके ऐसा नहीं करते। पुरे गांव के सामने मुझे बदनाम नहीं करते।

नीता: सो बात की एक बात। यही गांव वाले कल कछु ऊच नीच होवेगी तो मुझ पर चढ़के नाचेंगे समझी का? तो अगर इसे रुकना है तो जा कर महल का रास्ता नांपे। सुबह होने के बाद कुछ फैसला करेंगे अभी इसके लिए यहां कोई जगह नहीं है। तुझे कॉलेज पढ़ने भेजा था अपने लिए लड़का ढूंढकर वापस आओ तब साथ उठा लाओ उसके लिए नही समझी का?

स्वाति: मां वो भूतिया हवेली है। युग वहां एक मिनिट नहीं जी पाएगा।

नीता: वही मैं चाहूं हूं।

स्वाति: वाह मां। बचपन से मैं आपको खटकती थी क्योंकि आपको लड़का चाहिए था और मैं आ गई। और पापा मुझसे इतना प्यार करते थे की उन्हे दूसरी औलाद नहीं चाहिए थी इसी लिए आपको मुझसे नफरत है और मेरे प्यार से भी। ठीक है फ़िर युग अकेला नहीं जाएगा वहां। मैं उसके साथ जाऊंगी।

नीता: ठीक है जा। जिंदा बचो दोनों तो सुबह चाय पर मिलना कछु बातें करेंगे हां बिटिया।

नीता दरवाज़ा बंद करके चली गई। पर पूरे गांव वालों ने युग और स्वाति को पनाह देने k बहोत आग्रह किया और समझाया कि नीता का स्वभाव कड़क है पर दिल की अच्छी है। महल मत जाओ। पर स्वाति अडग थी अपने निर्णय पर। उसने सबसे कह दिया कि अब वो ही होगा जो हम दोनों की नियति में होगा। रास्ते में स्वाति ने युग को उस भूतिया महल के बारे में सब बताया और पूछा तुम चाहो तो हम वापस जा सकते है। पर युग ने कह दिया कि मेरे पास मेरे हनुमानजी है जो मेरे इस चैन में से सीधे दिल तक जाते हे वो हमारी रक्षा करेंगे तब तक मुझे किसका डर नहीं है, बस आखरी पल भी एक दूसरे के साथ बीते और कुछ नहीं चाहिए।

दोनों महल का गेट खोलकर अंदर जाने लगे। अचानक से हवा ज़ोर ज़ोर से चलने लगी। कुत्ते बिल्ली रोने लगे। कौआ, चमगादड़ गिध वहां मंडराने लगे और अजीब सी बदबू और आवाजे आने लगी। स्वाति वापस जाना चाहती थी पर युग ने हाथ पकड़कर रोका और दोनों महल के अंदर गए।

महल का दरवाजा खुलते ही उन्हों ने देखा सामने मकड़ी का जाला हर जगह था। उसे हटाते हटाते दोनों अंदर जाने लगे। अंदर दोनों को एक अजीब सुकून मिल रहा था। मानों वहां कुछ पल के लिए आत्माओं का डर हो ही नहीं। उनकी नज़र सामने दीवार पर टंगी बड़ी सी तस्वीर पर गई। जिस पर लिखा था राजा अमरेंद्र। और उसके ठीक बगल में तस्वीर थी वो थी अमरेंद्र की पत्नी अमरावती की। धीरे धीरे दोनों अंदर जाने लगे तो उन्हों ने देखा एक बड़े से कमरे में अंधेरे के बीच चांद की रोशनी में और मोबाइल की टॉर्च में चमकने वाली एक सुंदर राजकुमारी वो कोई और नहीं पर राजा की बेटी वियंता थी। हाथ में धनुष लिए खड़ी वो दिखने में बेहद खूबसूरत थी। महल वाकेहि बहोत बड़ा था। युग और स्वाति एक दूसरे का हाथ थामे आगे एक कमरे के पास आकर खड़े हो गए वहां बहार ही सेनापति शुद्धधोधन की तस्वीर लगी थी। पर वो कमरा दोनों खोल नहीं पाए तो वहां से आगे बढ़ गए।

तब दोनों उस बड़े से शीशा गृह के पास आ पहोंचे और तब ही स्वाति को याद आया की यहां तो एक रहस्यमय किताब है। दोनों जल्दी से अंदर गए और किताब ढूंढने लगे। चारों और शीशे थे। वो लोग खुद से ही टकरा रहे थे। तब युग ने स्वाति को दिमाग पर ज़ोर डालने को कहां और पूछा क्या तुम्हें याद है इस कमरे में किताब कहां है? स्वाति को याद आया कि बंसी चाचा ने बताया था की महल के शीशा गृह के सबसे बड़े शीशे के नीचे छुपाई है किताब तो उसने युग को बताया और दोनों वहां जाने लगे। पर वे दोनों चारों और शीशे होने की वजह से खुद से ही टकरा रहे थे। युग ने युक्ति निकाली और स्वाति का हाथ थामे हर शीशे को हाथ से छूते छूते धीरे धीरे आगे बढ़ बड़े शीशे के पास आ गया।

उसने देखा बड़े शीशे के नीचे एक बक्सा था। उसने वो जैसे ही खोला महल में अजीबोगरीब आवाज़ें आने लगी। इतने सालो से बंद पड़ी खिड़कियां आपस में टकराने लगी। बिजली गरजने लगी। जोर शोर से बारिश होने लगी। एक शीशे का टुकड़ा उड़कर आया और सीधा युग के हाथ में घुस गया पर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने कांच हाथ से निकालकर स्वाति का दुप्पटा वहां लगाया और अपना खून रोका। और पूरी हिम्मत के साथ हनुमानजी का लॉकेट एक हाथ में पकड़कर दूसरे हाथ से बक्से को खोला तो देखा उसमें एक सांप बैठा था। पर सांप अपने आप वहां से हट गया और बिजली के कभी अंधकार तो कभी उजाले के बीच कही गायब हो गया।

युग ने देखा वहां एक नहीं दो किताब थी। युग ने पहली उठाई। उसे खोलकर पढ़ना शुरू किया। किताब को मौलाना संत ने देवनगरी लिपि में लिखा था।

"यह किताब जब भी किसीके हाथ में आयेगी उसका मतलब यह होगा की उसमें इतनी ताकत है की वो इस महल की बुरी शक्तियों को मौत दे सके और सबको मुक्ति दिलवा सके। मैं भी यहां इस ही मकसद से आया था पर अफसोस मैं काम पूरा नहीं कर पाया। यहां की नेक आत्माओं ने मुझे बहोत कुछ बताया जो दूसरी किताब पढ़ते वक्त समझ आ जाएगा पर यहां एक बुरी आत्मा भी है जिससे बचना बहोत जरूरी है। उस दिन मैं महल का राज़ जानने और गांव को इस शापित भूतिया महल के कहर से मुक्ति दिलवाने के लिए ही आया था पर राजा अमरेंद्र की आत्मा ने मुझे जो कहा था वो मैं भूल गया और वो ये था कि ये दूसरी किताब में बुरी आत्मा से छुटकारा कैसे मिलेगा वो लिखा हुआ है पर वो सिर्फ़ और सिर्फ़ सुबह के वक्त सूर्योदय के बाद राजा अमरेंद्र की छबी के पास ही पढ़ी जा सकती है वरना नहीं।"

आगे क्या लिखा था वो युग पढ़ नहीं पाया क्योंकि वो उर्दू में था और न युग उर्दू पढ़ सकता था ना स्वाति।

युग समझ नही पाया कि ये किताब के कुछ पन्ने मौलाना संत ने कैसे लिखे थे क्योंकि वो तो मर चुके थे तो मरने के पहले ये सब कैसे?... और सिर्फ़ ये बताने के लिए के ये दूसरी किताब नेक बंदा ही सिर्फ़ अमरेंद्र राजा के सामने खोल सकता है वरना वो भी मारा जाएगा। और उसके बाद का सब उर्दू में ऐसा क्यों? लगभग सुबह होने को ही थी। युग और स्वाति उस दूसरी किताब को लेकर वहां से धीरे धीरे करके बहार निकले। दोनों के सिर इतनी बार शीशे के टकरा चुके थे की दोनों को काफ़ी खून निकल रहा था उपर से पैरों में ही कांच लगे थे। पर जैसे तैसे दोनों वहां से बहार निकले। अचानक दोनों के सामने धबाक करके दीवार का बड़ा सा हिस्सा ऊपर से नीचे गिरा। इस बार सिर्फ़ स्वाति नहीं युग भी डर गया था। अचानक युग को एहसास हुआ जैसे उसका दूसरा हाथ किसीने पकड़ रखा है। उसने बहोत कोशिश की पर हाथ छुड़ा नहीं पाया। दोनों को भयानक भूतिया आवाज़ें सुनाई दे रही थी। पर दोनों मक्कम रहे और आगे बढ़ने का तरीका सोचने लगे। तब ही स्वाति का गला किसीने दबाया। आसपास कोई नज़र नहीं आ रहा था पर एक भयानक आवाज सुनाई दे रही थी, "अब तु मुझे खतम करेगी हां!? तु? तेरे में इतनी हिम्मत? २०० साल हो गए पर फिर भी इतनी गरमी तुझमें! जैसे जैसे वो गुस्सेभरी आवाज बढ़ रही थी वैसे वैसे स्वाति हवा में ऊपर जा रही थी। और सांस नहीं ले पा रही थी जैसे किसीने उसे गले से पकड़कर ऊपर उठाया हो। युग ज़ोर ज़ोर से हनुमान चालीसा करने लगा तो अचानक उसे एहसास हुआ जैसे उसका हाथ किसीने छोड़ दिया था और स्वाति पटाक से नीचे गिरी। युग ने स्वाति का हाथ पकड़ा और उसे लेकर वहां से सीधा अमरेंद्र की तस्वीर के पास आ गया। दोनों आसपास देख रहे थे सूरज की हल्की किरने महल में पड़ रही थी। दोनों ने सोचा यही सही समय है युग ने किताब खोली...

तब दोनों को ऐसा एहसास हुआ मानों वो गांव या महल नहीं पर किताब ही शापित हो।

किताब खोलते ही साय साय करती पवन ज़ोर ज़ोर से चलने लगी। महल के हर कौने से धुआं निकलने लगा। पूरा महल जैसे कंपन हो रहा हो वैसे हिलने लगा। अचानक युग और स्वाति हवा में उड़ने लगे। युग ने किताब मजबूती से पकड़ रखी थी फ़िर भी किताब गिर गई और कही गायब हो गई। दोनों ज़मीन पर ज़ोर से गिर पड़े। किताब के गायब होते ही दोनों डर गए पर समय घवाए बिना किताब खोजने लगे। दोनों सारे कमरे और आसपास की हर एक छोटी चीज़ में किताब ढूंढने लगे। स्वाति को लगा जैसे उसके पीछे से तेज़ रफ्तार से कोई परछाई गुजरी हो पर उसने मुड़कर देखा तो पीछे कोई नहीं था। दोनों पहली मंज़िल पर गए तो उन पर वहां बीच में लगा वो बड़ा जुम्मर गिरने ही वाला था की युग और स्वाति वहां से हट गए और बच गए। उनके हाथ में और शरीर पर कांच के टुकड़े लगे पर दोनों कांच के टुकड़े निकालकर वहां से आगे निकल किताब ढूंढने लगे।

स्वाति ने देखा किताब ज़मीन पर दूर पड़ी हुई थी। उसने युग को इशारे से किताब दिखाई और दोनों उसे लेने गए। जैसे जैसेवो आगे जाते किताब पीछे हटती। और आखिरकार वो किताब सेनापति के कमरे के पास आकर रुक गई। युग और स्वाति वहां गए और किताब लेने युग जैसे जूका एक ऊंचे विराटकाय अजीबोगरीब दिखने वाली आत्मा ने उसका हाथ पकड़ लिया। वो आत्मा बहोत भयानक थी क्योंकि उसका सिर कभी धड़ से अलग होता तो कभी इधर उधर घूमने लगता। उसने किसी पुराने ज़माने के सेनापति के कपड़े पहने थे। उसकी एक आंख पत्थर की और दूसरी गहरे काले रंग की थी। सिर पर लंबे लंबे बाल। हाथ पर वार का निशान। वो युग और स्वाति को इस घूर रहा था मानों अभी उनकी जान ले लेगा। युग ने हनुमानजी का नाम लेकर किताब उस दुष्ट से छीन ली और दोनों दौड़ते हुए अमरेंद्र राजा की तस्वीर के पास आ पहुंचे। दोनों बहोत डर रहे थे क्योंकि उन्हें पूरे महल में भयानक गूंजती उस सेनापति की आवाजें आ रही थी। पहली मंज़िल से लड़खड़ाते हुए वो आरपार दिखने वाली आत्मा धीरे धीरे नीचे उतर रही थी। युग ने स्वाति को कहा किताब तुम पढ़ो मैं यह तक हनुमान चालीसा करता हूं ताकि ये आत्मा हमे परेशान न करे।

स्वाति ने हिम्मत दिखाई और युग का हाथ पकड़कर ज़ोर ज़ोर से पढ़ना शुरू किया।

"मैं राजा अमरेंद्र ये किताब उनके लिए लिख रहा हूं जो हमें मोक्ष दिलाने आयेंगे। ये एक किताब ही नहीं हम आत्माओं की मुक्ति का तोड़ है।

उस रात बेटी वियंता को लेकर मैं और मेरी पत्नी अमरावती हम दोनों बहोत परेशान थे क्योंकि उसे हमारे ही राज्य के विशेष सलाहकार माननीय अरण्य कुमार से प्रेम हो गया था। वो बेहद बुद्धिमान था। पर नीच जाती का था और हमारी बराबरी में भी नहीं था। बेटी वियंता को पता न चले वैसे मैंने, अमरावती ने और हमारे विश्वासु सेनापति शुद्धधोधन ने मिलकर अरण्यकुमार को मारने का निर्णय किया।

उस वक्त हम सब सेनापति शुद्धधोधन के कमरे में थे। क्योंकि उसका कमरा ऐसे बना हुआ था जहां से महल की ज्यादा आवाज़ें बहार नहीं जाती।

(जैसे जैसे स्वाति पढ़ती गई आगे के पन्ने खुदबखुद जल कर राख हो नीचे गिर रहे थे और उस राख में से भयानक बदबू आ रही थी। स्वाति ने देखा सेनापति की आत्मा उन लोगों के बहोत नज़दीक खड़ी थी पर उनका कुछ बिगाड़ नहीं पा रही थी क्योंकि वो अमरेंद्र की तस्वीर के पास थे।)

महल मैं उस वक्त सिर्फ़ मैं, अमरावती, वियंता, सेनापति और अरणुकुमार थे। वियंता को अमरावती ने तैयार होने में उलझा रखा उसे बताया की हम लोग उसकी शादी की बात करने वाले है अरण्य से और यहां मैं, अरण्य और सेनापति मौजूद थे। मैंने प्यार से समझाया अरण्य कुमार को कि वियंता को भूल जाए उसके बदले में उसे मुंह मांगी सोना मोहर, चांदी, जेवर जो चाहे वो मिलेगा। पर वो नहीं माना क्योंकि उसे वियंता से सच्चा प्यार था। मैंने सेनापति को इशारा किया और सेनापति ने अरण्यकुमार को वहीं मार गिराया। पीछे से वार होने के कारण अरण्य कुमार ना चिल्ला पाया ना अपने बचाव में हाथ पैर चला पाया। उसे मारने के तुरंत बाद मेरे सतब्ध हालत में ही मेरे भरोसेमंद, महावीर सेनापति ने मेरे पेट में तलवार डाल दी। मैं समझ नहीं पाया के ये क्या हो रहा है। और तब ही उसने बोलना शुरू किया, इतने सालो से सेनापति बनके मैंने तेरी सेवा की बूढ़े और तु? वियंता की शादी कहीं और? थू। वियंता मेरी नहीं हो सकती तो किसी और की भी नहीं हो सकती समझे? वो मेरे लिए बनी है। उसे शादी करके इस पूरे सलतनत पर राज करना मेरा मकसद था और तु? अब कोई नहीं बचेगा समझे? मैं पूरे गांव को ख़तम कर दूंगा।

ये सब सुन मुझे गुस्सा आ गया और मैंने अपनी तलवार से सेनापति पर खूब वार किए पर वो मरा नहीं। और मेरी नज़रों के सामने वियंता के पास जाने लगा। मैं उसके पीछे भी गया पर तब मैं समझ गया था की ये मैं नहीं मेरी आत्मा थी। उसने मेरे सामने पहले अमरावती पर वार किया और फ़िर वियंता पर। पर वियंता बहादुर थी। उसने सामने वार किया और सेनापति का सिर धड़ से अलग कर दिया जो सीधा सेनापति के कमरे में जा गिरा और धड़ वही गिर गया। मरने के बाद हम में से एक को भी शांति नहीं मिली थी। पर मैं एक सिद्ध पुरुष था इस लिए मेरे सामने सेनापति की आत्मा आने से डरती थी। मेरे पीछे वो कुछ भी करती। यहां के लोगों को २०० साल उसी ने परेशान किया है।

सेनापति की आत्मा को और हम सबको मोक्ष वहीं दिला सकता है जो खुद अरण्यकुमार और वियंता का अवतार हो। क्योंकि इस पूरे हादसे में सबसे बुरा उन दोनों के साथ ही हुआ था। उन दोनों को भनक भी नहीं थी की क्या षड्यंत्र बना था पर सेनापति गद्दार निकला। जब अरण्यकुमार और वियंता का पुनर्जन्म हो और दोनों इस किताब पर हाथ रखकर सेनापति के कमरे के दरवाजे पर रखेंगे तब वो दरवाजा खुल जाएगा। और सामने दिखेगा सेनापति का कंकाल। उसे यही मेरी तस्वीर के सामने ला कर जलाना है। उसके बाद हम सबके कंकाल सेनापति ने जहां कही भी छुपाए है वो खुदबखुद जल जायेंगे और हमें मोक्ष मिलेंगे। वरना नहीं। ये काम अरण्यकुमार और वियंता उस अवतार में कर सकते है जब वियंता का अवतार हो तब वो घर में अकेली लड़की हो और अरण्यकुमार का जन्म मृगशिरा नक्षत्र में हुआ हो।

दोनों समझ गए के यही उन दोनों का अवतार है जब वे दोनों को ये काम करना है। क्योंकि स्वाति एक अकेली औलाद थी उनके मां बाप की और युग मृगशिरा नक्षत्र में पैदा हुआ था।

दोनों ने देखा सामने सेनापति की आत्मा थी पर वो लड़खड़ाके चलता था उसका फायदा उठाकर दोनों भागते हुए ऊपर गए और किताब रखकर सेनापति के कमरे का दरवाजा खोला। सामने ही कंकाल पड़ा था। वो युग ने हाथ में लिया और किताब को स्वाति ने। दोनों पहली मंजिल से कूदकर नीचे आए और वहां पड़े फानस से उस कंकाल को आग लगा दी। सेनापति की आत्मा चीखने चिल्लाने लगी और वहां से गायब हो गई। कुछ ही देर में महल के बीचोबीच एक खड्डा हो गया वहां तीन कंकाल थे उस पीआर जुमर गिरा और वो कंकाल भी जल गए। और महल की सारी आत्माओं को मोक्ष मिल गया।

महल में एक अजीब सी रोशनी फैल गई और एक सुकून। दोनों समझ गए के उनके प्यार को मिलाने और किसीको मोक्ष मिलाने हेतु ही उनका पुनर्जन्म हुआ है। दोनों जैसे ही महल से बहार गए पूरा महल परास्त हो गया। और स्वाति के हाथ की वो किताब नीचे गिर गई और वहीं जल गई।

आसपास सब गांव के सब हितेच्छु और स्वाति की मां भी थी। सब बहोत खुश हो गई। युग और स्वाति ने सबको जो हुआ वो सब बताया और स्वाति की मां ने उन दोनों की खुशी खुशी शादी करवाई।

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