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वो फूल रानी



( हरीश )

बीस बरस बाद उस शहर जाना हो रहा था जिधर ये कहानी शुरू हुई थी। जन्मभूमि नही, मेरी कर्मभूमि ।।

घर पड़ोस के जिले के एक गांव में था। बारहवीं तक तो जस तस कर खींच लिया, फिर इंजीनियर बनने के सपने सजाए शहर आया। एक हफ्ते में आटे दाल का भाव पता चल गया। नौवीं कक्षा से तैयारियों में लगें थे लड़के। वो तो भला हो उस दूर के रिश्तेदार का, जिसने सलाह दी कि साथ ही कॉलेज में भी दाखिला ले लो, ड्रॉप ईयर के बाद मुश्किल होती है।

अपने राम तो महत्वाकांक्षा के परों पर सवार थे, सो बात ज्यादा जमी नही । बारहवीं के ठीक बाद नही तो एक साल कोचिंग के बाद तो हो ही जाना है सिलेक्शन। पिता जी नही माने, और सादी ग्रेजुएशन में भी भर्ती करवा दिया।

ठीक ही किया। दो साल की कोचिंग भी जब मन माफिक नतीजा न दिला पाई, तो यह सोचा कि बस एक साल और, फिर ग्रेजुएट हो कर किसी सरकारी नौकरी की राह पकड़ेंगे।

ना ना ना, सिविल सर्विस कौन सोचता? मनोबल की उड़ी धज्जियां समेट कर बस इतना ही मनाया कि फर्स्ट क्लास आ जाए। पहले कुछ समय तो पढ़ाई में, और फिर शर्मिंदगी में गांव का रुख न किया। और रास्ता पकड़ा उधर का जिधर हर धर्मपरायण भारतीय अपनी सारी समस्या छोड़ आता है ।

हॉस्टल से करीब बीस मिनट चलने पर , घंटा घर से जरा पहले ही था वह मन्दिर। कहते थे बड़ा वरदाई है। हर बुधवार गजब भीड़ लगती थी। उसी भीड़ भाड़ में एक शान्त ओएसिस सी खड़ी रहती थी मेरी फूल रानी, गुल ।


( गुड़िया )

अंकुर भैया ने आज फैक्ट्री जल्दी आने को कहा था।

अंकुर भैया, कहने को तो मालिक, पर इतने सरल सहज है। दस साल छोटे हैं, इसलिए दीदी बुलाते हैं। हम सब को, जिनके जीवन को एक नई दिशा दी उन्होंने। आज हम सत्तर औरतें जो छोटे मोटे काम कर बामुश्किल पेट पाल रही थी, उनकी टीम हैं, उनकी फ्लावर मैनेजर ।

कहानी लम्बी है, और करीब बीस एक साल पुरानी।

बाबूजी शहर में कपड़ा मिल में काम करते थे, और मजदूरों को दिए क्वार्टर में रहते थे। मिल बन्द हुई, तो वापस गांव लौट गए, अपनी थोड़ी मोड़ी खेती संभालने। गनीमत ये थी कि क्वार्टर खाली नहीं कराए गए, वरना मुन्ना की पढ़ाई अटक जाती।

पढ़ाना तो वो बेटी को भी चाहते थे पर गांव से जुड़ाव के कारण दसवीं पूरी होते ही हम को ब्याह दिया। होनी तो कुछ और ही थी। दो महीने में ही पति की साइकिल एक ट्रक के नीचे आई और हम खोटे पैसे से मायके वापस। गांव वालों के ताने जब सहन नही हुए तो तय हुआ कि मां बाबूजी गांव में रहेंगे, और मुन्ना की पढ़ाई होने तक हम उस की देखभाल के लिए शहर। प्राइवेट इंटरमीडिएट का फार्म भी भरवा दिया।

मुन्ना के स्कूल के रास्ते में पड़ता था वो मंदिर। कहते थे बड़ा वरदाई है। आँगन में स्थापित मूषक के कानों में जाने कितनी मनोकामनाएं फुसफुसाई जाती थी। अपने तपते चित्त को शान्ति देने हम अक्सर उधर रुकते।

फिर सोचा मुन्ना का स्कूल रहते उधर ही एक फूलों का ठेला न लगा लें। मन लगा रहेगा और चार पैसे हाथ आयेंगे। बड़े पण्डित जी ने दुकान लगाने की अनुमति तो दी, पर मूल धन ??

अपने क्षणिक सौभाग्य का एक मात्र चिन्ह मेरी अनामिका को छोड़ , सराफे की भेंट चढ़ा और दुकान लगाई गई ।

उसी दुकान पर हर बुधवार भेंट होती थी उनसे । दिवंगत पति की ही आयु, वही कद काठी। पता नही किस चिन्ता में लीन । वह मायूसी ही प्रेरित करती थी कि दुकान के सबसे ताजे फूल उस के दोने में जाते ।

एक दिन साहस जुटाकर बोल दिया , " भगवान को लाल गुड़हल पसन्द है, और कहते हैं अच्छे नम्बर लाने के लिए हरी दूब । आप कहो तो बुधवार को ला दे ।"

अटक कर बोला , " तुम्हें कैसे पता? तुम तो......"

बड़े दिन बाद कानों को अपनी ही हंसी अपरिचित लगी। " अरे , हमारा भाई है ना, मुन्ना, थोड़ा तोतला है , अटक कर भी बोलता है। उसी को सुन सुन कर इधर आस पास के दुकानदार गुल बुलाते है। वैसे हमारा नाम है गुड़िया ।"


( हरीश )

दर बुधवार गुल के हाथ से हरी दूर्वा में बंधे गुड़हल पकड़ते कब मन उस की पकड़ में चला गया, पता ही नहीं चला ।

छि छी, क्या सोच रहे हैं आप ? गंवार को शहर की हवा लग गईं । अब तो प्रभु ही संभाले।

कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा होता है । परिवार और स्वयं के नैराश्य का बोझ जब असह्य हो रहा था, तब उन निर्दोष आंखों में तैरते विश्वास ने सम्बल दिया । उस फूल के दोने में वो हर सप्ताह थोड़ा और आत्मबल थमा देती , थोड़ी और ऊर्जा ।

और सच कहूं तो हमारी तुलना में उस की बोल चाल ज्यादा साफ थी । बचपन से शहर में थी । बारहवीं की परीक्षा देने वाली थी । दुकान संभालते हुए हिसाब रख लेती थी । और रखती थी असीम कौतूहल। अंग्रेजी हमारी तरह कुछ कच पक्की थी, पर सुनती थी, गुनती थी , और मंदिर में यदा कदा आए फिरंगियों को भी येस सर, थैंक्यू सर बोल कर फूल थमा ही देती ।

कुल मिला कर बीस इक्कीस के युवा दिवा स्वप्न के लिए पर्याप्त ईंधन। पर मन में मैल नही था । उस को पार्श्व में सोचा, तो पूरे सम्मान के साथ।

जीवन साथी को सम्मान दिलाना हो तो स्वयं भी सम्माननीय बनना पड़ेगा । किसी लायक हों, तब तो बात कुछ आगे बढ़े।

पूरी जान लगा दी उस साल । पता नही भगवान को फूल भा गए या भोली भक्तिन की श्रद्धा, पर फर्स्ट क्लास भी आई और बैंक में नौकरी भी लगी ।

कृतज्ञता ज्ञापन के साथ मंदिर जा कर एक और मन्तव्य भी सिद्ध करना था । गुल का मन टटोलना था । वो हां बोल दे तो हजार किलोमीटर दूर नई नौकरी निश्चिंत हो कर की जाए ।

प्रसाद चढ़ा कर गुल की दुकान पर जूते के फीते बांधते बांधते , मुंह को आते कलेजे को समझाते , उस से पूछा " बारहवीं के बाद क्या सोचा है? आगे पढ़ना है या घर वाले ब्याह की सोच रहे ? "

उस के खिले चेहरे पे घोर उदासी के बादल घिर आए। हम भी अचकचा गए। इतने संक्षिप्त परिचय में इतना घनिष्ठ प्रश्न कैसे पूछ बैठे ?

उस के उत्तर ने तो हतप्रभ कर दिया ," बाबू जी ने बड़े पण्डित जी से पूछा तो वो बोले कि भाग्य में शादी का सुख नहीं है। नाहक किसी की जान से क्यों खेलें ? "

" अरे, बड़े पण्डित जी ने कह दिया तो क्या सारी उमर कुंवारी रहोगी? " , हल्की चुहल के साथ पूछा हमने।

" कुंवारी नहीं, बेवा । "

( गुड़िया )

साल बदले, समय नहीं बदला । शहर में नौकरी की गुंजाइश कम ही थी । इतनी क्षमता नही थी कि कुछ दे दिला कर मुन्ना को कही ठिकाने लगाते । दोनो भाई बहन किसी तरह दिन काट रहे थे । कुछ दुकान पर और कुछ छोटे मोटे काम कर । मुन्ना की उमर ब्याह की हो आई , पर इस मुफलिसी में एक और पेट जोड़ने की हिम्मत नही थी ।

अपनी शादी का तो खयाल ही छोड़ दिया था । भाग्य में होता तो पति ही क्यों जाता ?

तब भी बीच बीच में वो भली सी सूरत कौंध जाती । हाथ थामने की मंशा थी उसकी । पुरुष का मंतव्य न भांप सके , ऐसी कोई स्त्री नही । पर एक नया जीवन पुराने सच ढांप कर नही बसाना था । और अब पंद्रह बरस बीत गए ।

पता नही वो किस से हारा? हमारे अतीत से या हमारे कल पर मंडराते कुण्डली के अष्टम मंगल से ?

ये फूलवाली की कहानी यही पूरी हो जाती , अगर अंकुर भैया न होते ।

फूलों में जान ही कितनी होती है । शाम को भगवान के सर माथे, अगली सुबह कूड़े के ढेर में । कूड़े वाली गाड़ी उन को पतित पावनी में उड़ेल कर मान लेती कि फूलों का भी उद्धार हो गया । होता कुछ और ही । ये फूल मैया के ही प्राण हर रहे थे । सुधार के दो ही रास्ते थे । या तो नदी साफ करी जाए या फूल उन में जाने से रोके जाएं।

दूसरा रास्ता सरल था । अंकुर भैया ने शहर भर के हर पूजास्थल से गुहार लगाई और फूल नदी की जगह फैक्ट्री जाने लगे । बासी फूलों से बनाते थे अगरबत्ती और धूप । प्रभु की देन उन को ही अर्पण ।

मुन्ना पढ़ा लिखा तो था ही , रोज मिलते जुलते रहने पर एक दिन अंकुर भैया ने उसे फैक्ट्री से जुड़ने को कहा ।

पांच साल होते होते मुन्ना फैक्ट्री में फ्लोर सुपरवाइजर था । उस के पीछे पीछे हम भी आए, और आई ऐसी कई जो छोटे या गन्दे काम करके पेट पालने को बाध्य थीं । रोजगार ही नही मिला, मिला सम्मान ।

आज बैंक के कोई बड़े अधिकारी आने वाले थे । " पुष्प " का काम कई शहरों में बढ़ रहा था । फैक्ट्री देख कर ही विस्तार पर निर्णय होना था ।

कल के फूल छांट ही रही थी कि भैया ने बुला भेजा । बोले " दीदी, बीस सालो से आप फूलों से जुड़ी हो । आप से अच्छा कौन बताएगा हमारा प्रॉसेस । जरा सर को फैक्ट्री दिखा दीजिए । "

गरदन हिलाते हिलाते " सर " की ओर घुमाई तो सांस ही रुक गई । वजन बढ़ने पर और बाल झड़ जाने पर भी सौम्यता वही पुरानी थी।

वह शायद सब भूल चुका था ।

फैक्ट्री के बाहर एक छोटा सा मन्दिर था । जूते उतारते हुए बोला " ताजे फूल मिलेंगे भगवान के लिए ? "

चारदीवारी के पास लगे गेंदे की कतार से कुछ चुन कर आगे बढ़ाए तो बोला , " अरे , तुम ने ही तो कहा था, लाल गुड़हल दूर्वा के साथ " !!

इति

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And

To the friend who casually mentioned a फूलवाली from his student days. That was the germ of this story