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ए असफल की कहानियाँ


ए. असफल की कहानियां

(1) दूसरी पारी

टैक्सी लेकर मैं होटल गुलमर्ग पहुँच गया था। जहाँ चंद्रकिरण ने मुझे डिनर पर बुलाया था। दरअसल, उस दिन वह बहुत ज्यादा खुश थी। कारण यह कि उसे बहुप्रतीक्षित डायवोर्स मिल गया था। और चूँकि मैंने केस लड़ा था, इसलिए वह मेरे प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रही थी।
वह एक 26-27 साल की युवती जिसका विवाह 22-23 साल की उम्र में ही हो गया था। लेकिन वह शादी के छह महीने बाद ही मायके लौट आई थी। कारण यह कि वह जिसे ब्याही गई थी, वह एक राजनेता था और उसका पहले से ही एक औरत से सम्बंध था जो उसके घर में ही रहती थी। शादी के पहले बताया गया था कि वह रिश्ते में उसकी बहन है जो विधवा और अनाथ होने के कारण उसके घर में रह रही है। पर शादी के बाद चंद्रकिरण ने जाना कि उसकी तथाकथित ननद न तो विधवा है, न उसके पति की रिश्ते की बहन! वह तो उसकी प्राईवेट सेक्रेटरी है और इसके अलावा भी बहुत कुछ!
घर और बाहर सबदूर उसी का राज चलता था।
चंद्रकिरण का पति भुवनेश्वर हमेशा उसे संग लगाए रखता। सारे कार्यकर्ता उसे दीदी कह सिर पर चढ़ाए रखते। उसकी मर्जी के बिना कहीं पत्ता न हिलता। यहाँ तक कि भुवनेश्वर चंद्रकिरण से मिलने भी उसकी जानकारी में आता। यह मुलाकात भी सिर्फ रात में, वह भी रोजाना नहीं होती।
विवाह में वह चंदरोज के लिए गई थी, तब तो कुछ समझ नहीं पाई। रीतिरिवाजों में ही समय गुजर गया। मगर उसके बाद जब स्थाई रूप से रहने गई, राज, राज न रह सका। भुवनेश्वर अपनी तथाकथित बहन और पर्सनल सेक्रेटरी के साथ दिन के अलावा, रात में भी कमरे में बंद हो जाता।
सबकुछ इतना रहस्य मय कि कुछ समझ में न आता। रात में दस-ग्यारह बजे तक कार्यकर्ताओं का जमावड़ा बना रहता। कभी-कभी कुछ लोग वहीं ठहर जाते और रात में दो-ढाई बजे कारें निकाल ले जाते। तहखाने से पता नहीं उनमें क्या सामान लादा जाता। कभी-कभी शाम सूनी पड़ी रहती, कोई नहीं आता। मगर गई रात कारें आतीं। गेट बेआवाज खुलता। बगटुट सामान तहखाने में पहुँचाया जाता...।
घर बहुत बड़ा था। सास-ससुर अलग हिस्से में रहते थे। समय काटने वह उनके पास पहुँच जाती। थाह लेने की कोशिश करती, ‘‘मम्मी, क्या कारोबार है इनका, कुछ समझ में नहीं आता!’’
और वे अभिमान से भरे ममतालू स्वर में कहतीं, ‘‘भुवन ने बहुत तरक्की की है। तेरे ससुर ने तो फटीचरी में जिंदगी गुजार दी। हमने बड़ी गरीबी देखी है, बेटा! पर तुम दूध करूला करोगी, जिंदगी भर!’’
एक बार उसने ससुर से भी पूछा, ‘‘पापा! आप तो शिक्षक रहे हैं। अच्छे समाज के निर्माण में उम्र खपा दी। आपकी नाक के नीचे कुछ गलत-सलत तो नहीं हो रहा...?’’
उन्होंने गर्दन झुका ली कोई जवाब नहीं दिया।
चंद्रकिरण समझ गई कि वह अकेली है!
वह पढ़ी-लिखी थी। भुवन को उसने एक दिन इन्कार कर दिया कि- उसे जूठन नहीं चाहिए। वह रोजगार के लिए नहीं, अपनी सामाजिक जिंदगी शुरू करने आई है...।’
उसने अपनी सेक्रेटरी से कहा।
चंद्रकिरण को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

उन दिनों वह घंटों मेरे बस्ते पर बैठी रहती और मैं इधर-उधर के कोर्टों में दौड़ता रहता। उसका नोटिस ही नहीं लग रहा था। वे रसूखदार लोग तामील ही नहीं होने देते। चपरासियों को उनका घर ही नहीं मिलता कि नोटिस चस्पाँ भी हो जाता! रिपोर्ट लगा देते कि- दिए गए पते पर इस नाम का शख्स नहीं रहता...।’ तब अदालत से स्पेशल ऑर्डर करा कर लीगल एडवाइजर भेजा गया जो चंद्रकिरण के ससुर को जबरन तामील करवा कर आया।
भुवन ने पचड़े में पड़ने के बजाय डायवोर्स के लिए सहमति दे दी...।

वह मुझे होटल के गेट पर ही मिल गई थी। संघर्ष के इन तीन-चार सालों में वह अपने पाँवों पर खड़ी हो गई थी। शुरू में ट्यूशन पढ़ाकर उसने ब्यूटीशियन का कोर्स किया। फिर एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी। और फिर खुद का ब्यूटीपार्लर बना लिया। मगर खुद रफटफ बनी रही। पर उस दिन ऐसी सजधज कर आई कि मैं देखता रह गया! वस्त्रों से महँगे परफ्यूम की तेज गंध उड़ रही थी। चेहरे से चाँदनी झर रही थी...।
मुझे बड़ा आत्मसंतोष मिला कि मैंने एक बुझी दीप्ति को फिर से जगा दिया...। उसके हारे मन को जीत के आत्मविश्वास से भर दिया!
मेरी पसंद पूछ उसने मीनू बैरे को बता दिया और चंचल आँखों से इधर-उधर देखने लगी...।
पहले पहल जब मिली थी, पेंट-शर्ट में, तीखे नाक-नक्श के बावजूद पौने छह फुट का कठोर मर्द लगी थी। नाक में लोंग न कानों में बुंदे! गला तक सूना, पाँव में पायल-बिछुओं का तो सवाल ही कहाँ?
मैंने प्रशंसा की, ‘‘अब लग रहा है कि तुम लड़की हो...!’’
‘‘थैंक्स!’’ वह मुस्कराई।
खाना आ गया तो हम देर तक मद्धिम संगीत का लुत्फ उठाते खाते रहे। बाद में उसने पूछा, ‘‘मिठाई या आइसक्रीम!’’
‘‘काॅफी!’’ मैं मुस्कराया। और जवाबी मुस्कान में उसके ओठ चौड़ा गए।
हाॅल में थोड़ी देर पहले एक रीमिक्स बज रहा था, ‘होंठों से काॅफी पिलादे ना यार...’
उसने संकेत से बैरे को बुला, बहुत ही मोहक और धीमे स्वर में ओठ गोल कर काॅफी बोल दी। मुझे उसकी यह अदा बड़ी सेक्सी लगी। शरारत सूझने लगी, ‘‘बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ?’’
‘‘आपके सौ खून माफ!’’ वह हँसी। पर मैंने पूछा नहीं कि- इस उम्र में अकेली कैसे रह लेती हो...? दिल की बात दिल में ही दबाकर रह गया।
काॅफी आ गई तो हम चुपचाप पीते रहे...।
जुदा होने लगे तब उसने बेबसी से कहा, ‘‘अब काॅम्पेन्सेशन् के लिए खटना है।’’
‘‘और क्या!’’ मैंने भी कठिनाई अनुभव करते हुए कहा।
‘‘सब आप पर निर्भर है!’’ कहकर वह चली गई तो दिल पर एक बोझ-सा पड़ गया...।
तीन-चार दिन बाद वह नकल लेने आई तब मैंने कहा, ‘‘अब आपको इस केस में थोड़ी मेहनत खुद भी करना पड़ेगी।’’
‘‘कैसी मेहनत?’’ उसने पूछा।
‘‘काॅम्पेन्सेशन् के दावे के लिए उनकी आमदनी, आय के स्रोत, जायदाद आदि का ब्यौरा पेश करना पड़ेगा... नहीं तो वे लोग आसानी से कुछ न देंगे!’’
सुनकर उसकी आँखों में आँसू आ गए। मैंने पूछा तो बोली, ‘‘उनका सारा काम नंबर दो का है। कोई नौकरी या कम्पनी, फैक्टरी, बिजनेस मेरी जानकारी में नहीं है। जायदाद हो सकता है, किसी और के नाम हो! कैसे-क्या होगा!’’
सुनकर मैं भी हताश हो गया, बोला, ‘‘फिर तो सिर्फ मजदूरी का आधार बनता है। इस पर ज्यादा से ज्यादा, ढाई हजार रुपए महीने का और एक मुश्त दो-ढाई लाख का केस बनेगा।’’
‘‘अब जो भी हो...।’’ उसने मजबूरी से कहा।

मेरे तईं यह पहला ही केस था। क्योंकि अपनी दूसरी पारी में वकालत मैंने अब जमा पाई थी! लाॅ करने के बाद पहली पारी में तो जब एक दीवानी के सीनियर एडवोकेट के यहाँ बैठा, इतनी धाराएँ और इतनी पेचीदगियाँ तथा बरसों की लंबित फाइलें देखकर ही घबरा गया। तब एक दूसरे सीनियर के पास गया जो आपराधिक केस लड़ते थे। वहाँ धाराएँ तो गिनीचुनी थीं। बहस के लिए भी ज्यादा मगजमारी न करना पड़ती। पैसा तो जमानत पर ही मिल जाता। पर आत्मा ने गवारा नहीं किया। क्योंकि सारे केस झूठे थे। सच की पैरोकारी तो सरकारी वकील को करना थी, और हमलोगों को झूठ की। सोचा, इससे अच्छा तो जज बन जाऊँ! सो, तैयारी करने बाहर चला गया। वहाँ एक लाॅ ग्रेजुएट युवती का अच्छा साथ भी मिल गया। वह भी सम विचारों की थी। कोचिंग और उसके तो कभी मेरे रूम पर साथ पढ़ने का सिलसिला दो-ढाई साल तक चला। इस बीच प्यार जैसा भी कुछ पनप गया। और उसी भावुकता में हमलोग एकाधिक बार हमबिस्तर भी हो लिए। उन्हीं अंतरंग क्षणों में तय कर लिया कि दोनों में से कोई एक जज बन जाए, शादी कर लेंगे। मगर दुर्भाग्य से पहले चांस में तो रिटिन ही नहीं निकाल पाए। दूसरे में इंटरव्यू में पिछड़ गए। तीसरे का नंबर नहीं आया। निराश रश्मि ने माँ-बाप की समझाइश पर एक नौकरपेशा से शादी कर ली। मैं हतोत्साहित हो अपनी जगह लौट आया...।
तब इस बार खूब ठंडे दिमाग से सोचा कि दीवानी-फौजदारी के पचड़े में न फँस एक्सीडेंटल क्लेम केस, उपभोक्ता केस और डायवोर्स जैसे छोटेमोटे पर विपुल मात्रा में मिलने वाले केस हाथ में लिए जायँ। अलग बस्ता बनाया जाय। खूब मेहनत की जाय...।

मन लगाकर मैं कागज तैयार करने लगा। और बहुत मेहनत से आँकड़े बिठा भी लिए। तभी एक शाम उसका फोन आया, ‘‘सर! थोड़ी देर के लिए घर चले आइए।’’
‘‘घर!’’ मैं चौंका।
‘‘प्लीज!’’
‘‘इस वक्त!’’
‘‘जी, कुछ जानकारी हाथ लगी है।’’
‘‘कल कोर्ट में आकर दे देना...’’
‘‘कल तो देर हो जाएगी!’’ उसने घबराहट में कहा।
‘‘रात में क्या कर लूँगा?’’ मैंने पूछा।
‘‘प्लानिंग...सर...प्लीज!’’
दिन भर का थकामाँदा। जाकर रेस्ट करता। फिर किचेन में खटता। पर वह ऐसी घिघियाई कि इन्कार नहीं कर सका। पूछता ताछता फिलवक्त उसके घर जा पहुँचा। जो द्वार पर प्रतीक्षारत् ऐसे खड़ी थी, जैसे आते ही अंक में भर लेगी! मैं थोड़ा झेंपता-सा सूने घर में आ गया जो किराये का था और जिसमें वह अकेली ही रहती थी।
बेडरूम ही ड्राइंगरूम! बैठते-बैठते मैंने पूछा, ‘‘ऐसा क्या अहम सुराग हाथ लग गया?’’
टीवी चल रहा था। उसी शोर में इंगित कर उसने उतावली में बताया, ‘‘भुवन ने विधायकी के लिए पर्चा भर दिया है! चुनाव आयोग में पेश आमदनी-फाॅर्म का विवरण चैनल पर दिखाया जा रहा है...सर!’’
स्क्रीन के बाॅटम पर रेंगती पट्टी पर मैंने नजरें गड़ा दीं। कुलमिलाकर नौ करोड़ की सम्पत्ति दर्शाई गई थी! पढ़ते ही मैं उछल पड़ा, ‘‘बन गई बात!’’
चंद्रकिरण विह्वल हो गले से लग गई!
भावावेश में कुछ सूझा नहीं। पीठ थपथपाने लगा, ‘‘अब तो आसान है... अब तो डिस्ट्रिक्ट रिटर्निंग आफीसर के यहाँ जाकर मैं नकल ले आऊँगा।’’
चेहरा उठा कृतज्ञता पूर्वक वह निरखने लगी। आँखें आँसुओं की कांति से काले-सफेद मोतियों-सी दमक रही थीं...।
‘‘चलूँ, खाना बनाना है...’’ मैंने पूछा।
‘‘बैठिए,’’ बाँहों से खिसकती वह मुस्कराती हुई बोली, ‘‘तैयार है, खाकर जाइएगा!’’

लौटा तब रात के दस बज रहे थे। पेट में रोटी के साथ वह मन में छवि की तरह उतर गई थी। सपने में रातभर गले से लगी रही...। अगले दिन उसकी ससुराल के जिले में गया और भुवनेश्वर द्वारा भरे गए आमदनी के फाॅर्म की नकल ले आया। मगर दावा ठोकते ही गजब हो गया। गुण्डों ने चंद्रकिरण के ऊपर जानलेवा हमला कर दिया। संयोग से वह तो बच गई मगर घर पूरा तहस-नहस हो गया।
इतनी डर गई कि अब उस घर में नहीं रह सकती थी। पुलिस को बताकर मैं उसे अस्पताल से अपने घर ले आया।
घटना के बाद वह कतई गुमसुम पड़ गई थी। चोट शरीर से अधिक मन पर लगी थी। मैंने बहुत समझाई कि- कोई सदमा न पालो। तलाक होते ही पति-पत्नी दुश्मन हो जाते हैं। तब पता चलता है कि अग्नि को साक्षी कर भराए गए सातों वचन महज ताश के महल थे! शर्तें टूटी नहीं कि जन्म-जन्मांतर के सम्बंध खाक हो गए। अब क्या मोह पालना और कैसी अपेक्षा! मुकाबला करो बहादुरी सेे...।’ फिर भी उबरने में उसे हफ्तों लग गए।
उन दिनों वह गुमसुम घर में ही पड़ी रहती। सुरक्षा की दृष्टि से बाहर जाना उचित नहीं था। मैं जब कोर्ट जाता बाहर से घर का ताला लगा जाता था। हम एक-दूसरे से बहुत कम बात करते थे। यह जरूर था कि मुझे काम करते देख वह घर का कामकाज करवा लेती थी। और खाना हम दोनों मिलकर बना लेते।
वह न सजती-संवरती और न चहकती-फुदकती। ऐसे में और कोई इच्छा पालना मूर्खतापूर्ण था। इसलिए उन दिनों में हमने कभी एक-दूसरे का हाथ भी नहीं छुआ।
इस बीच भुवनेश्वर को जमानत नहीं मिली और वह चुनाव भी हार गया।
चंद्रकिरण अपने घर लौट गई। उसे फिर से सजा लिया।

नियत तारीख पर भुवन की पर्सनल सेक्रेटरी कोर्ट में काॅम्पेन्सेशन् की राशि भरने हाजिर हुई। ननद बाई से कोर्ट ने चंद्रकिरण के खाते में चालीस लाख रुपए जमा करा दिए। खबर सुर्खियाँ बटोरने लगी। उसके ढिंढोरे के साथ, मेरी भी ख्याति फैल गई। सीनियर सलाह-मशबिरा करने लगे कि अगली बार मुझे बार कौंसिल की कमान सौंप दी जाय...।
ऐसे में एक दिन उसने फोन कर पूछा, ‘‘सर जी! आज शाम आप खाली हैं क्या?’’
‘‘हाँ-हाँ, बोलो!’’ मैं उसकी आवाज सुनकर ही उत्साहित हो गया था।
‘‘प्लीज, इधर आ जाएँगे! बात ये कि मुझे चैकबुक मिल गई है... मैंने आपका चैक बना दिया है।’’
‘‘ठीक है, आजाऊँगा!’’ मैंने चहकते हुए हामी भर दी। पहले ही कह दिया था कि अभी तो सिर्फ कागज-खर्चा और कोर्टफीस देना पड़ेगी आपको। परसेंटेज, काॅम्पेन्सेशन् की राशि मिलने पर ले लूँगा। और नहीं दिला पाया तो मेहनताना भी नहीं देना!
सोच रहा था, किसी अच्छे होटल में ले जाकर आज वह डिनर अवश्य देगी...।
कोर्ट से लौटकर, फ्रेश हो, मैंने निकलते-निकलते पूछा, ‘‘कहाँ पहुँचू, ताज या गुलमर्ग...?’’
‘‘कहीं नहीं सर जी, खाना मैंने घर पर ही मँगवाया है।’’
‘‘ये भी ठीक है...’’ मैंने क्लाइंट की मरजी में अपनी मरजी मिलाकर कहा और बाइक उठाकर उसके घर चला आया।
पर एक झलक में ही जान गया कि आज वह फिर ब्यूटीपार्लर हो आई थी...। पूछना मुल्तबी कर कि, पहले होटल में ही डिनर देने का इरादा था ना!’ हँसता-मुस्कराता उसके ड्राॅइंगरूम-कम-बेडरूम में आ गया...।
मेरे आते ही उसने फोन कर दिया था। जब तक उसके हाथ का बना टमाटर का गर्मागर्म सूप पिया और टीवी देखा, बेंडर खाना लेकर आ गया। कमी रह गई थी तो गहमा-गहमी, चकाचौंध और मादक संगीत की! जिसे आज मिलने जा रहे चैक की सौगात ने भर दिया था...कि उसमें भरी बड़ी राशि की कल्पना ने मुझे जीवन में पहली बार इतना उत्साहित कर दिया था जो चंद्रकिरण को मैं अपने कॅरियर की किरण मान उस पर न्यौछावर हुआ जा रहा था...।

घर में बैठे थे। आज कोई जल्दी न थी। खाना हमने ढेर सारी बातें करते देर तक खूब चबा-चबाकर खाया। बातों में पहले संघर्ष की रील घूमती रही। फिर जौक्स चलने लगे। क्योंकि मन में अब कोई कड़वाहट न बची थी। अतीत उसने सूखे रंग की तरह झड़ा दिया था। तभी इतनी ताजादम दिख रही थी कि आज उसकी सुंदर नासिका में लोंग झिलमिला रही थी तो गोरे गले में काले मोतियों की माला और कानों में बुंदे झूल रहे थे तो पाँवों में पायल भी।
खाने के बाद वह बड़े सलीके से बर्तन समेट सिंक में डाल आई। फिर तश्तरी में बारीक हरी सौंफ और मिश्री के दाने सजा मेरी बगल में आ बैठी। निगाह चेहरे पर ठहर गई। भवें बारीक और गोल शेप में कटे बाल कंधों पर झूल रहे थे।
‘‘लीजिए सर...’’ गुलाबी ओठों से मुस्कराते वह फुसफुसाई, तो जैसे रहा नहीं गया। चेहरा हथेलियों में भर मैंने बमुश्किल पूछा, ‘‘क्या?’’ और जवाब में आँखें हँसने लगीं तो आहिस्ता से ओठ ओठों से सटा दिए...।
बेखुदी में हरी सौंफ और मिश्री के चमकदार दाने तश्तरी से उसकी शिफाॅन की गुलाबी साड़ी पर बिखर गए जिसका बार्डर नारंगी था और जिससे मैच करता नारंगी ही बड़े गले का स्लीवलैस ब्लाउज पहन रखा था उसने।
दाने बीनकर मुस्कराते हुए मैंने उसके मुख में डाल दिए... जिन्हें चूसते ही गला ठंडक और मिठास के एहसास से भर गया। नेत्र हर्ष में मुँद गए और फेफड़े सुख की गहरी साँसें भरने लगे। आनंदित जान चंद्रकिरण को मैंने अपने भुजपाश में कस लिया!
दिल में झींसियाँ-सी बज उठीं...।
फिर प्राणियों में व्याप्त प्रबल अशरीरी काम कब हमें सोफे से बेड पर ले पहुंचा, जान नहीं पाए। जिंदगी की दूसरी पारी का आगाज इतना हैरतअंगेज होगा मुझे इल्म न था।
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(2) लड़कियां

वे अब रुकेंगे नहीं ।
अलस्सुबह ही चले जायेंगे। उन्होंने कहा तो नहीं था, पर एक जबरदस्त आशंका डस रही है मुझे। हर दो-एक मिनट बाद घड़ी देख लेती हूँ । बहुत मुश्किल से बजे हैं साढ़े चार। कितनी लम्बी हुई है यह रात ! जैसे समूची जिन्दगी का पूरा नाटक इन छ:सात घंटों में ही सिमट कर व्यापक कैनवास दे गया हो, इन्हें ! और हरेक क्षण एक मुकम्मल दृश्य में बदल गया हो । कितने-कितने हादसे-कामेडी, ट्रेजेडी, सस्पेंस सब एक साथ। अभूतपूर्व अनुभूति का रहस्यमय अहसास । लहरों की तरह उठते-गिरते, फन पटकते उच्छवास और अगले ही क्षण जैसे कोई अलभ्य सपना झटके से टूट जाय, "प्रीता, अब जाओ तुम !"
"कहाँ !! भड़भड़ा कर पूछा था मैंने ।
"जाओ प्रीता ।" यह आदेश था उनका। नहीं, उनसे कभी जीत नहीं सकती मैं । मेरी बोझिल पलकें धीरे-धीरे भर उठीं। जानबूझ कर खुद को संयत नहीं किया। शायद पिघल जाएँ वे इसी उम्मीद में। सिसकती-सी उल्टे पाँव धीरे-धीरे बाहर निकली कि आखिर मानुष हैं। बहुत कठोर होकर भी समूचे मोहजाल को न काट सकेंगे। पर ज्यों ही देहरी से उतरी कि उन्होंने लपक कर दरवाजा बन्द कर दिया। सिटकनी चढ़ा दी । बत्ती बुझा दी। और एकदम गुमसुम पड़ रहे। मैं किवाड़ों से चिपक कर धीरे-धीरे रोती रही कांपती रही बहुत देर और फिर अपने बिस्तर पर आकर ढह गई।

क्या पता बुआ के साथ भी यही सब हुआ हो। हुआ होगा। आखिर वे भी तो मेरी ही तरह शोख हसीन और जवान थीं कभी। और तब भी इस घर में रिश्तेदार आते थे । पुरुषों के प्रति आकर्षित होना और फिर उनके पीछे पागल हो जाना, प्रत्यक्षतः उनके पीछे पड़ जाना अथवा खुद घुटते रहना सर्वग्रासी बिडम्बना है ! किसी का छुटकारा नहीं। जरूर ऐसे ही क्षणों में बुआ कैसी पराजित हुई होंगी। पापा उनके लिए बड़े भाई ही नहीं, बाप की तरह बादशाह भी थे। माना कि यह फैमिली शुरू से ही काफी एडवांस है। हमारा रहन-सहन, तहजीब इस कस्बई मानसिकता के लिए आधुनिकतम फैशनेबुल सही, लेकिन सही अर्थों में सुलझी और सभ्य है। तो भी लोक-लाज और पापा के भय से निजी अपराध बोध के तहत घुट-घुट कर बुआ ने एक दिन ज्यादा मात्रा में नींद की गोलियां निगल लीं ।
जो राज वे मरकर अपने साथ दफना लेना चाहती थीं, वह न हो सका । क्योंकि पापा अचानक रात में ही उनके कमरे में कुछ तलाशने चले गये थे। और उनके मुह से निकलते झाग और घुटी-घुटी आवाज से यकाएक हड़बड़ा गए। उन्होंने चीखकर मम्मी को बुलाया। मम्मी यह हादसा देखकर एकदम डर गईं। उन्होंने दादी को जगा दिया और फिर दादी के जागने से आस-पास के घर भी जाग गए । बुआ को अस्पताल ले जाया गया । कहीं अपने होश में होतीं बुआ, तो कैसे भी न जातीं अस्पताल । पापा की भी अवमानना कर बैठतीं। उन्होंने तो मरने के लिये ही यह पुरुषार्थ किया था। पर सारा प्रयास पछाड़ खाकर गिर पड़ा और बुआ खुद ही कीचड़ में लथपथ जिंदा रह गईं।
डॉक्टर ने उन्हें प्रिगनेंट घोषित कर दिया था। पापा उनके भाई थे । आज भी हैं। पर वह निर्मल प्यार अब नहीं रह गया है बुआ के प्रति उनके मन में। यों तो पापा नीरस, चिड़चिड़े और गम्भीर हैं। उनका जॉब ही ऐसा है कि दिमाग हमेशा गणित में व्यस्त रहता है उनका । इसी कारण उनके घरेलू और समाजी तौर-तरीके भी सर्वथा समीकरणवादी हैं। तिस पर यह घटना और घट गई, जिसने उन्हें और भी रहस्यमय बना दिया है। कभी-कभी सोचती हूँ कि हमें अपने भुक्त कर्मों का ही नहीं, अभुक्त कर्मों का भी परिणाम झेलना होता है। पापा इस स्वरूप में प्रकट नहीं हुए होंगे, निस्संदेह, उन्हें परिस्थितियों ने यंत्रवत् बनाया है। ये परिस्थितियाँ क्या मैंने पैदा की ? पर मैं विवश हूँ उनका यह व्यवहार सहने के लिए ।
मम्मी और दादी ने बहुत चाहा कि बुआ उस दुष्ट का नाम बता दें, जिसने हमारे पूरे परिवार को बदनामी की आग में झोंक दिया है। पर बुआ ने अपना मुँह नहीं खोला। बंद मुट्ठी खुल जाने के बाद उनमें गजब का साहस आ गया था। उन्होंने गर्भपात करा लिया । उस कलंक की चिन्ता नहीं रह गई थी उन्हें, पर वे समर्पण के उस सर्वनाशी क्षण और शख्स की याद मिटा देना चाहती थीं, जिसकी बदौलत यह घृणित/वर्जित/त्याज्य फल उनकी कोख में आया था ।

उस साल कमजोर और विक्षिप्त रहने के बाद धीरे-धीरे वे एकान्त की अभ्यस्त हो गईं । खामोशी के साथ अपने काम में डूबे रहना अब उनकी आदत बन गई है। आजादी पर पाबंदी न तब थी, न अब है, लेकिन अब बुआ कहीं नहीं भाती-जातीं। उनका न कोई दोस्त है, न दुश्मन। घर और दफ्तर दोनों जगह उपस्थित होकर भी अनुपस्थित रहती हैं।
पापा कोशिश भी करते तो निर्धारित समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता। और पुरुष के साये से भी दूर भागने वाली बुआ ने किसी नई शुरूआत की फिर कभी हिम्मत नहीं की। तो यों कहा जाने लगा कि- इस आधुनिक परिवार से अब लड़कियों की शादी की परम्परा भी उठ चुकी है।'

कोई दरवाजा खुला है...
मेरे कान तो सुई गिरने तक की आहट पर लगे हुए हैं। बगैर पदचाप, नगे पांव आँगन के ठंडे, कितने फर्श पर आ खड़ी हुई हूँ। उनके कमरे में रोशनी हो रही है। यह कमरा घरेलू व्यवस्था के तहत गप्प / गोष्ठी या कहें मजमेबाजी हेतु उपयोग किया जाता है। मेरे, मम्मी के, भाइयों-बहनों और पापा की मित्र मंडलियां अक्सर यहीं जमती हैं। संक्षेप में इस घर का सार्वजनिक हाल, क्योंकि- महीने में एकाध बार बुआ के सहकर्मी भी उन्हें आ घेरते हैं। तब वे भी अपने कमरे से निकल कर इसी में एक-दो घंटे अतीत भूलकर जी लेती हैं। न जाने कितने बहस-मुबाहिसे सुने हैं इसके दरो-दीवार ने! यही कमरा तो प्राणवान है पूरे घर में! इसमें आकर सभी चहक उठते हैं। वैसे मम्मी चाहे जितनी घरेलू महिला हों, पापा घोर व्यवसायी, मैं और भाई-बहन विकट पड़ाकू और बुआ ध्यानस्थ ! लेकिन इसमें घुसते ही सब अपने खोल फेंककर दांत फाड़ उठते हैं। और खास बात यह कि यही वह सामर्थ्यवान् चारदीवारी है, जो मेहमानों को पनाह देती है ।
अब लगभग सबेरा । सितारे अपनी चमक खो चुके हैं। लेकिन मैं उनके कमरे में झांकने की हिमाकत अब नहीं कर सकूँगी। अब उन्होंने मेरे और अपने बीच लक्ष्मण रेखा खींच ली है। वे काफी सम्माननीय रिश्तेदार हैं हमारे । मेरी ममेरी बहन के जेठ । बिजनैस के सिलसिले में कभी-कभार आते हैं यहाँ। भरा पूरा परिवार है उनका। मुझे क्यूँ अपने गले की हड्डी बनाएँगे ! कितने डरपोक होते हैं पुरुष ! प्रतिष्ठा का लबादा बत्तीसों दांतों तले दबाए-दबाए आगे बढ़ते हैं हरदम! करते वही सब हैं, पर सुरक्षित खोल के भीतर-भीतर । हिश्स... कायर ! हमसे भी गए-गुजरे। इन्हीं ने तो बनाई है मर्यादा की कुण्डली। जिसमें ग्रस लिया है हमें और निरन्तर डसते जा रहे हैं ।
"गुड मार्निंग प्रीता !" हठात् उन्होंने पीछे से आके कहा। बाथरूप से लौटे हैं शायद ! मेरा सर्वांग कांप उठा। फिर से कुछ गलकर बहने लगा धीरे धीरे । जाने किस भय से दिल धक्-धक् कर उठा था । सांस उखड़ सी गई और मैं नमस्ते तक न बोल पाई। झुकी पलकें लिए फर्श कुरेदती रही ।
"चाय पिलाओगी बेबी !"
मैंने बोझिल पलकें उठाईं। मुस्कुरा रहे थे वे, "7:05 की गाड़ी पकड़नी है...।"
मेरा मुँह खुला रह गया है। मेरी आशंका सच निकली। कोई बहुत जरूरी बात छूट गई है अभी । आप कायरों की तरह भाग क्यूँ रहें हैं ? मुझे ठीक से समझाओ न सब कुछ।' लेकिन प्रत्यक्षतः केवल मेरे होंठ फड़क कर रह गए। कोई बोल न फूटा। इस खामोशी के भीतर कितने बवण्डर हैं ! क्या वे समझते नहीं !... और धीरे-धीरे काठ हुई जा रही हूँ मैं, "सॉरी! मुझे कालेज की तैयारी करना है। मम्मी को बोलिए । "
लेकिन काठ नहीं हो पाऊँगी । वह तो क्षणिक आवेग था। झूठा अहसास । खुद को छलना...और क्या ! किसी अबोध की भाँति पिटकर मचलते हुए भी अन्ततः माँ की गोद में ही त्राण खोजूंगी। मन की इसी बेबसी के आगे सिर पटक पटकर खुद को धिक्कारते हुए भी मैं स्टेशन पर आखिरी मुलाकात का मनसूबा बनाकर तैयार हो ली। हाथ में किताबें और पर्स और चेहरे पर कालेज की हड़बड़ी।
मम्मी-पापा उन्हें छोड़ने दरवाजे तक आए थे। मुझे देख दोनों की आँखों में ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न उभर आए। सचमुच ये प्रश्न बहुत दुर्भाग्यशाली हैं। इन्हें कभी सही उत्तर नहीं मिलता। अक्सर गढ़े-गढ़ाए झूठ पकड़ा दिए जाते हैं इनके बदले। और मैंने उनके बगैर पूछे घबराहट पीकर बुलन्द आवाज में कह दिया शायद, मम्मी को लक्ष्य करके, "अभी एक सहेली के यहाँ प्रेक्टिकल नोटबुक कम्पलीट करूंगी. वहीं से कालेज निकल जाऊँगी !"
"नमस्ते जीजाजी !"
उसी रौ में मैंने चहक कर उन्हें भी छुआ और लगभग दौड़ती सी आगे आगे चली आई मेन रोड तक । पीछे वे और पापा साथ थे। धीरे-धीरे बातें करते हुए आगे बढ़ते हुए पापा उन्हें रिक्शे तक छोड़ने जा रहे थे ।
कालेज और स्टेशन एकदम विपरीत दिशाओं में हैं। सहेली के घर का बहाना खुद ही भूल गई। नहीं तो पापा क्या मेरे पेट में बैठे हैं, जो यह आपत्ति करते कि कालेज इधर है, सहेली इधर और तुम उधर स्टेशन की तरफ क्यों भागी जा रही हो !...' पर अपने ही मन की शंका, जो कराए थोड़ा हैं। ... मैंने कनखियों से देखा- हाथ मिलाकर पापा लौट रहे थे। पापा का चेहरा नींद में डूबा था गोया ! उनका रिक्शा स्टेशन की तरफ दौड़ गया था और में व्यर्थ ही बहुत तेजी से कालेज की तरफ लपक रही थी।

बहुत पहले से जानती हूँ उन्हें-
जब ए-फॉर-एप्पल और जेड-फार जेवरा रटा करती थी। वे ममेरी बहन के जेठ होने से पहले भी इस घर के ऐसे चहेते रिश्तेदार हैं जिनका इंतजार बना रहता है और जिनकी उपस्थिति से सभी चहक उठते हैं। उनकी आवभगत हर कोई बड़े उल्लास से करता है। पर पहले संलग्नता न थी और अब तो रागात्मक सम्बन्ध महसूसती हूँ। कितने-कितने खत लिखे हैं मैंने ममेरी बहन को संबोधित ! उसी की याद में बेकरार-सी सशक्त अभिव्यक्ति। ठसाठस भरे हुए शब्द, बोलते गूंजते-गुनगुनाते से ! आश्चर्य कोई कोना खाली न छूटता पर उनमें निहित भाव, यानी मेरी तड़प उनके लिए है, इससे अनभिज्ञ नहीं रहे हैं वे। इतना तो विश्वास है, खुद की धड़कनों पर। यह बात अलग कि उन्होंने मुझे कभी खत न लिखा, घर के नाम लिखा तो औपचारिकता वश मेरा भी नाम जोड़ दिया । ओह्ह ! उसी एक 'प्रीता और फलां फलां को रोज-रोज का प्यार' का हफ्तों पारायण किया है मैंने। कैसा पागलपन है यह भी! लोग पागल ही होते हैं, सचमुच अदेखे, अज्ञात ईश्वर के पीछे कैसे दीवाने ! क्या यह सब भावना और दिल की मजबूरी-वश ही नहीं होता ! कोई यकायक तो प्रवेश नहीं कर जाता हमारे भीतर ! और कोई कर जाए, तब क्या उसे मरकर भी निकाला जा सकता है ! विवेक कितना पंगु होता है ऐसे मामलात में । में ही जानती हूँ या मेरा दिल। जानते तो वे भी होंगे, पर कितने कठोर या निस्पृह हैं।
'छोड़ प्रीता !' प्रत्यक्षतः बुदबुदाकर ठंडी आह भरी मैने पर अपने वश में कुछ भी नहीं रहा अब तो... चाहकर भी नहीं छोड़ सकती। कोई नहीं छुड़ा सकेगा उन्हें! मर जाऊँ तो जानती नहीं। और आज भले यह मुलाकात आखिरी क्यूँ न बन जाये, करके ही दम लूगी...।
एप्रोच रोड पर पहुँचते ही रिक्शा पकड़ लिया है। यह रास्ता लम्बा है। पर परिचित रास्तों से कैसे जा सकती हूँ | घर ही नहीं, पूरा शहर दुश्मन दिखाई दे रहा है।
बरसों से सोई पड़ी इच्छाएँ, जो कि लगभग मृत प्रायः हो चुकी थीं, कल अचानक उनके आ जाने से संजीवनी सूंघकर कर उठ खड़ी हुईं। एकदम युद्ध के लिए तत्पर...! और वे भी तो हवा दे बैठे, "प्रीता ! इस बार तेरी शिकायत दूर कर दूँगा... शाम को घूमने चलेगी मेरे साथ ?"
"नहीं !"
अरे! मुँह फुलाकर अचानक यह क्या कह बैठी मैं! खुद ही हृत्प्रभ रह गई।
"क्यों ! अपना शहर नहीं दिखाओगी हमें ?" वे सामान्यतः मुस्कुरा रहे थे ।
"आपका सब देखा हुआ है," मैंने चिढ़कर प्रतिवाद किया, "मैं तो बच्ची हूँ न ? सारी दुनिया छानी पड़ी है आपकी ..."
और वे बुझ गए शायद ! में किचन में जाकर निरर्थक धरा-उठाई कर उठी। कोई भीतर था, मेरी आत्म-ग्लानि ! जो मुझे खाए जा रही थी। मना कर दिया...? कबसे तरसती रही हूँ उनके साथ के लिए ! किसी ख्वाब की तरह मिला है यह मौका! कोई पत्थर पिघला है आज पहली बार! कैसा आत्मघाती कदम उठा दिया मैंने? यह पश्चाताप कभी पूरा नहीं होगा...। अपना ही हठी निर्णय दुखदायी बनकर तिल-तिल जलाता रहेगा मुझे...।
इसी ऊहापोह में दो-तीन बार उनके पास तक गई और लौट आई। अब राजी बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। क्या पता, तुनक जायें ! बिफर उठें- अपना ब्वाय फ्रेंड समझती हो मुझे जो इतना नखरा करती हो...? क्या बच्चा हूँ मैं कि खिलौना देकर फुसला लोगी!'
और दोपहर होते-होते वे कहीं निकलने के लिए तैयार हो गए। इसी चक्कर में कालेज मिस कर दिया था मैंने। अब जप्त नहीं कर पा रही थी। और किसी चीज के झूठ-मूठ गुम होने को लेकर छोटे भाई पर खीजती हुई आंधी की तरह उनके कमरे में जा घुसी।
"चलूँगी मैं ।" मेरी आवाज गोली की तरह निकली। तत्क्षण विस्मित रह गए वे पर क्षणांश बाद ही गर्दन हिलाकर मुस्कुराए, “अच्छा!" और इस हादसे में मेरा चेहरा लाल पड़ गया । एकदम दौड़ने को हुई कि उन्होंने पहली बार हाथ पकड़ कर कहा, अभी जरूरी काम से जा रहा हूँ शाम को चलूँगा तुम्हारे साथ। "
इस अनोखी स्थापना से मेरा मन जैसे परत-दर-परत खुलता चला जा रहा था । शाम को उनके साथ निकलने के लिए मैंने अपने सारे पसंदीदा कपड़े पहन पहन कर खुद ही रिजेक्ट कर डाले। नहीं समझ पा रही थी कि कौन-सा लिबास फबेगा इस बदन पर, जिसकी सहायता से उनके भीतर उतर सकूँगी। पा चुके हैं मुझे वे। मैं नहीं पा सकी। कैसी मारक विडम्बना है यह ! और हड़कर मैंने साड़ी बाँध ली। और आश्वस्त भी होने लगी खुद के अनुमान पर कि विवाहित पुरुषों को भरी-पूरी, सजी-धजी स्त्रियां ही जँचती होगी ।...

स्टेशन पहुँच कर मैं सीधी विण्डो पर जा लगी। और वहां से प्लेटफार्म टिकट लेकर तेजी से सीढ़ियां चढ़ती उतरती पटरियां पार कर निर्धारित प्लेटफार्म पर आशंकित-सी आ खड़ी हुई। साँस फूलने के कारण सीना जोरों से उठ-गिर रहा था। मैंने किताबें छाती से चपेट लीं और पर्स संभाले प्लेटफार्म के इस छोर से उस तक की यात्रा कर उठी। नजरें बहुत व्याकुल होकर खोज रही थीं उन्हें । गाड़ी अभी नहीं आई थी। बस, इसी बात से डूबते दिल को जरा सा ढांढ़स मिला हुआ था, जबकि वे किसी भी बेंच पर नजर नहीं आ रहे थे। वेटिंगरूम में घुसकर बैठने का प्रश्न ही न था इस वक्त तो भी मैंने अपनी आशंका की पुष्टि में उन्हें वहाँ भी छान मारा। कैसी पागलों सी दर-बदर भटक रही हूँ- हाय ! क्या हुआ है मुझे! मैंने चेहरे का कई बार पसीना पोंछा है इस बीच। और अब तेजी से पस्त पड़ती जा रही हूँ...।

यही सब कल हुआ था। उनकी प्रतीक्षा में आंखें जैसे पथरा गई थीं। हर आहट पर बार-बार चिहुँक पड़ती। कई बार दरवाजे तक जाती लौट आती। और घण्टों बॉलकनी में खड़ी रही...! ये क्या हुआ है मुझे? यह रोग इसी शिद्दत से बढ़ता रहा तो कहीं सचमुच खुद के ही कपड़े न फाड़ने लगूं किसी दिन!
एक-एक कर जब सारी बत्तियाँ जल उठीं घर की, तब लोटे थे वे घोड़े की तरह चेहरा लटकाये हुए! जानते थे, मैं बिगड़ उठूंगी। फिर पापा-मम्मी किसी की भी परवाह नहीं होती मुझे। जाने क्यूँ, जरा-सी भी देर बर्दाश्त नहीं कर पाती मैं। साड़ी बांधे दो घण्टे से ऊपर ही चुके थे...। इसीलिए तो किसी से मेरी पटरी नहीं बैठती। पहले मौका देती हूँ आपको आपके मुताबिक होने का...और फिर भी चूक जायें आप तो मेरा आहत अभिमान किसी को बख्शता नहीं। यही प्रवृत्ति घोर दखदायी है, पर क्या करूँ? ...ओपन एअर रेस्टोरेन्ट में उनके साथ बैठने का सपना खुद ही फाड़कर फेंक दिया मैंने। मजे की बात यह कि- देरी के लिए उनके सॉरी-सॉरी करने और मुझे अभी-अभी साथ ले जाने के आश्वासन के बावजूद मैंने अपनी साड़ी उतार कर फेंक दी। जूड़ा निकाल दिया और पुरानी मिडी पहन कर किताबों के साथ झींकने लगी।
उनका चेहरा उतर गया था, सो मजा आ रहा था मुझे। उनकी ये पतली हालत घर भर ने पहली बार देखी थी। सब लोग मना रहे थे मुझे, यह कहकर कि बहुत नखरेवाज हूँ ! कोई सीधा आदमी फँस गया तो नाक में दम करके रख दूंगी उसकी...।

हठात घण्टी बजी!
हावड़ा के आने की पूर्व सूचना। हालांकि पहली घण्टी । पर मेरे कान बज उठे। वे अब तक नहीं मिले हैं। कुछ खोया जा रहा है। छूटा जा रहा है कुछ। जैसे, प्राण ! इतनी घबराहट पहले कभी नहीं हुई थी। लगता है जैसे मर जाऊँगी मैं, अब नहीं मिले वे तो...!
लेकिन ! यह बेचैनी तो न जाने कब से सिर चढ़ी धूम रही है। कल रात में जब सब सो गये, तो भी मेरे भीतर एक घनघोर युद्ध चल रहा था। और यह मन कितना बड़ा दुश्मन है कि तड़पा-तड़पा कर मारता है। स्वयं से पराजित मैं, विवश-सी पहुँच गई थी उनके कमरे के गेट पर! ताजुब्ब कि जरा-सी आहट पर ही दरवाजा खोल दिया उन्होंने और हाथ पकड़ भीतर खींच लिया।
यानी जागते हुए प्रतीक्षा कर रहे थे!
सिटकनी चढ़ा मुँह बेड में छुपा अधलेटे हो रहे!
घबराहट के बावजूद मुस्कान छूट पड़ी और मैं कुर्सी खींच सिरहाने बैठ गई। तब दो पल बाद झेंपते से उठे और हाथ बढ़ा चेहरा हथेलियों में भर लिया।
भीतर एक हूक-सी उठने लगी। बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने को आमादा करती हूक! हठात मैं फफक पड़ी...।
फिर तो स्नेह का जैसे दरिया ही फूट पड़ा। अपनत्व भरे हाथ ने जबरन गोद में खींच लिया और छोटी बच्ची की तरह पुचकार, सिर पर हाथ फेर गाल चूम लिया...।
प्यार के उन बेशकीमती क्षणों हम कब एक दूसरे से लिपट गए, यहाँ तक कि बैठे से लेट गए, पता नहीं चला! देह के परस्पर मिलन ने जादू का जाल-सा बुन दिया था- जिसमें अपूर्व तृप्ति, अलौकिक आनन्द का सागर हिलोरें ले रहा था...। बरसों की तड़प क्षणों में सिमट आई थी। उसी आतुरता में दोनों ही कब एक-दूसरे की ओर करवट ले सिर से पाँव तक सट गए, यह भी पता नहीं चला। आँसू सूख गए तब गुजरते पलों के साथ दैहिक आवेश बढ़ने लगा। और मैं अनायास उनके सिर के बाल अपनी मुट्ठी में भर-भर खेलने लगी और वे अपनी हथेली से मेरी पीठ सहलाने लगे...।
लग रहा था अब छोड़ेंगे नहीं... नहीं छोड़ेंगे! हाथ आये ऐसे मधुरतम क्षण को कोई गँवाता है, भला!मगर तभी जैसे कोई विस्फोट हुआ...। वे पलंग से उछल झटके से दरवाजा खोल आंगन में पहुँच गये और मानो खुद पर क्रोध निकालते जोर-जोर से पाँवों को पटक वहीं चक्कर काटने लगे।
मेरा जलता बदन जैसे यकायक सर्द हवाओं की प्रबल चपेट में आकर ठण्डा गया और मैं जैसे-तैसे कुर्सी पर आकर बैठ पाई...। एक अद्भुत नाटक, जिसका हर दृश्य बेहद सनसनीखेज था, अब कौन-सा मोड़ लेगा, मैं खुद नहीं जानती थी। मेरी आँखें जल रही थीं, बस ! पर कुछेक लम्हों की रही होगी वह शून्यता... वे जिस तेजी से गये थे, उसी से वापस आ गये। किवाड़ भेड़कर फर्श पर घुटनों के बल मेरी कुर्सी से सट गये। मैं संज्ञाशून्य-सी निहारती रही। और फिर जब मेरी गोद में सिर रखकर फफकने लगे वे. तो मेरी समूची शारीरिक और दिमागी क्रिया ठप्प पड़ गई। नीचे का श्वास नीचे और ऊपर का ऊपर अटककर रह गया। फिर वे ही खुद को संभालते हुए से धीरे-धीरे बोले, "प्रीता जिन्दगी में ऐसे कितने ही सर्वनाशी क्षण आयेंगे, तुम कहीं फिसल न जाना, मेरी बच्ची !..."
एक दिव्य खामोशी पसर गई थी वहाँ । कतई आवेगहीन, संकल्प-विकल्प से मुक्त थी मैं। प्रार्थना के से पुलकित कर देने वाले अनुपम क्षण। लग रहा था, ये छिन गये तो प्राण ही खो बैठूंगी। लेकिन तब भी वे अत्यन्त कठोर होकर बोले थे, या कि अपनी संकीर्णता-वश ऐसा एहसास हुआ था मुझे, “अब तुम जाओ प्रीता ।"

हाँ ! मैंने सिहर कर देखा इधर-उधर, हावड़ा कब की जा चुकी है ! और अब प्लेटफार्म भी मेरी ही तरह उदास और खाली-खाली नजर आ रहा है।
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(3) आधा आसमान

नयन ने पार्टी आॅफिस में पहली बार हिना को देखा तो देखता ही रह गया। कारण था उसका लम्बा कद! इतनी लंबी और हट्टी-कट्टी लड़की उसने पहले कभी देखी नहीं थी। फैन हो गया। सोचने लगा, अगर इससे दोस्ती हो जाए। जबकि लड़कियों से दोस्ती का उसका स्वभाव न था। बाद में पता चला, वह उसी के काॅलेज की स्टुडेंट है। दाखिला इसी साल लिया है। फर्स्ट सेम है, इसलिए रैगिन्ग के डर से कम आती है। उसने मन ही मन उससे दोस्ती कर ली।
जब भी आती, कल्पना में वह उसे कैन्टीन में ले जाता। लाइब्रेरी में ले जाता। किसी बस स्टाॅप पर खड़ा मिल जाता और साथ में काॅलेज आ जाता। साथ लौटता...। पर इससे बात नहीं बन रही थी। तब एक दिन उसने फेसबुक पर खोजकर उसे दोस्ती का पैगाम भेज दिया और हिना ने स्वीकार कर लिया तो कल्पना के पंख हकीकत में बदल गए। वह जब भी आॅनलाइन होती, हालचाल पूछते-पूछते वह इधर-उधर की बातें करने लगता। आॅनलाइन नहीं होती, तब उसकी टाइमलाइन पर अपने फोटो और कमेंट्स डाल देता...।
यों फर्स्ट सेम के एग्जाम तक आखिर उसने उससे दोस्ती कर ही ली। तब पता चला कि उसका तो एक बॉय-फ्रेंड भी है! सुन कर थोडा दुःख हुआ। फिर भी जब भी मौका मिलता वह उसे कैन्टीन में ले जाता। और वह हमेशा ही पहले देने की कोशिश करता पर कभी-कभी हिना उससे पहले अपना पर्स खोल लेती। पर उसकी आदत में था, छोटीमोटी चीजें खरीद कर दोस्तों को देते रहना। इसलिए, उसे भी कुछ न कुछ देता ही रहता। यों दो-तीन महीने के अंदर वे काफी अच्छे दोस्त बन गए।
फेडरेशन से जुड़े थे, इसलिए- पार्टी आॅफिस भी जाते रहते। अव्वल तो उसे साथ चाहिए था, जहाँ भी मिले! हिना जबसे आई थी, नयन पार्टी आॅफिस भी आवश्यक रूप से जाने लगा था। हैड से उसने काफी नजदीकी बना ली थी। वे थे भी पूर्ण समर्पित। पार्टी आॅफिस में ही रहकर निरंतर कोई न कोई गतिविधि चलाते रहते। नयन अपार्टमेंट में अकेला रहता था। उसे फर्क नहीं पड़ता, हैड के साथ पार्टी आॅफिस में ही रुक जाता। क्योंकि- हिना वहाँ आती रहती।

हिना अपनी मम्मी के साथ रहती थी। पापा की असामयिक मृत्यु के कारण मम्मी को रेल्वे में उनकी जगह नौकरी मिल गई थी। क्योंकि उनकी आवाज सुरीली थी, सो उन्हें मुख्य स्टेशन पर ही अनाउन्सर का काम मिल गया था। और यूँ तो अधिकतर सभी कुछ रेकोर्डेड होता था। पर कुछ सूचनाएँ तो उन्हें बोलकर ही देनी पड़तीं। उम्र कोई अड़तीस-चालीस वर्ष। और अपने आप को खूब मेंटेन कर रखा था। सो, गोरा-छरहरा बदन साड़ी में खूब जँचता। स्टाफ के लोग फ्लर्ट मारते रहते। बेटी से दोस्ती गाँठ, वे अपने अनुभव उसे बताती रहतीं, ताकि वह भी अपनी निजी बातें उनसे शेयर करती रहे।
हिना अपनी मम्मी की तरह ही सुन्दर, गोरी और तीखे नैन-नक्श वाली लड़की थी। कॉलेज में नयन के अलावा उसके कईएक फैन थे। पर वह कभी किसी को आँख उठाकर भी नहीं देखती। नयन में उसे किसी स्वार्थ की बू न आई, सो उससे निष्कपट दोस्ती कर ली। जबकि, प्यार वह संदीप से करती थी।
हुआ यह कि पापा के बाद मम्मी और वह घर में दो जन ही रह गए थे। घर बड़ा था। और मम्मी की ड्यूटी कभी-कभी रात में भी लग जाती...। वे इस बात को लेकर परेशान रहने लगी थीं कि हिना को रात को अकेली जान कोई...या चोरी ना हो जाय! पर वे अपने घर में किसी परिवार को नहीं बसाना चाहती थीं। क्योंकि- वो रहते-रहते घर पर कब्जा करने की कोशिश करने लगते हैं...। सबदूर यह आम-सी बात थी। दोनों ने तय किया कि किसी छात्र को एक कमरा किराए पर दे दिया जाय तो कुछ सुरक्षा मिल सकती है। पर किसी अजनबी छात्र की भी क्या गारंटी! सोच-विचार कर उन्होंने संदीप को रख लिया। वह उनका दूर का रिश्तेदार भी था। पापा के बाद से उनका सहारा भी। घर और बाहर के जो काम माँ-बेटी को पहाड़ से नजर आते, संदीप उन्हें चुटकियों में निबटा देता।
हिना उसे भैया कहकर बुलाती थी। पर मम्मी को पता था कि यह तो सिर्फ दिखावे के लिए है। वे अक्सर चेताती रहतीं- चाहे रियल ब्रदर ही क्यों न हो, लड़कों से कभी एकांत में नहीं मिलना। दोस्ती में हमेशा एक गैप रखना।’ और हिना परम आज्ञाकारी की तरह सुनती, पर मानती नहीं।
हिना और संदीप आपस में खूब बतियाते।
दिन-बदिन मित्रता घनिष्ठता में बदलती गई।
काम के बहाने वह अक्सर संदीप के साथ उसकी बाइक पर सैर-सपाटे के लिए निकल जाती...।
मम्मी चौकन्नी जरूर थीं, पर उन्हें कोई हरकत नहीं दिख रही थी, इसलिए खुश थीं। वे सभी साथ-साथ टीवी भी देखते। भोजन भी अधिकतर साथ ही करते। फिर संदीप एक दिन उनका पेईंग गेस्ट भी बन गया। पाँच-छह माह इसी तरह गुजर गए।
उसका कमरा हिना के कमरे से लगा हुआ था। दोनों के बीच में खिड़की थी जो हमेशा बंद रहती। काँच टूटेफूटे होने के कारण हिना ने एक परदा लगा रखा था। संदीप अपने कमरे में रात को अक्सर अपने कम्प्यूटर पर व्यस्त रहता था। हिना को इतने दिनों में एक लगाव-सा हो गया था। वह उस पर नजर रखने लगी थी कि वो क्या-क्या करता है?
दोनों जवान थे। विपरीत सेक्स के आकर्षण से ग्रस्त भी। जब तक संदीप के कमरे की लाइट जलती रहती, उसे नींद नहीं आती। खिड़की के टूटेफूटे काँच से कुछ दिखता तो न था, पर परदे के बावजूद कुछ न कुछ उजास तो आता ही रहता...। तिस पर उस दिन तो हद ही हो गई। तीन बज गए फिर भी उसकी बत्ती बंद नहीं हुई।
-इस तरह बीमार नहीं पड़ जाएगा!’
मम्मी नाइट ड्यूटी पर थीं। आवेश में वह अपने कमरे से निकल, संदीप के गेट में एक धक्का दे आँधी सी उसके कमरे में घुस गई। पर स्क्रीन पर नजर पड़ते ही यकायक सन्न रह गई...। आज उस पढ़ाकू की पोल खुल गई थी। दुष्ट कानों में इयरफोन लगाए नीली फिल्म देख रहा था!
हिकारत भरी नजर डाल वह पलट पड़ी...।
संजीव उसे देखते ही सन्न रह गया था। उसे लगा, आज तो नहीं कल यह अपनी मम्मी से यह बात जरूर कह देगी! फिर वह उनकी नजरों से गिर जाएगा! हो सकता है उसे यह घर भी छोड़ना पड़े! वह तुरंत उठा और हिना के कमरे में आ गया! मगर हिना अब उससे बात नहीं करना चाहती थी। वह चीखी, गेटआउटऽ!
संदीप ने हाथ पकड़ लिया, हम तो काम कर रहे थे!
गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। आव देखा न ताव हाथ छुड़ा उसने उसका मुँह नोंच लिया। खबर नहीं थी, फिल्म देखते-देखते उबल गया था! गेट बंद कर उसने हिना के साथ....
-ओह! तुमने मेरा कुंवारापन नष्ट कर दिया...।’ वह सिसकने लगी।

बस उसके बाद से ही दोस्ती तिनके की तरह तोड़ दी। जबकि, उसने मनाने की बहुत कोशिश की। पर उसके लिए मन में एक ग्लानि...एक नफरत सी भर गई थी। सिर्फ यही कह पाई कि- जीवन में अब कभी अपना मुँह न दिखाना।’
संदीप मम्मी को बताए बगैर कमरा छोड़ कर चला गया।
दिल हमेशा उदास और अपराधबोध से ग्रस्त बना रहता। हिना मम्मी से भी दिल का बोझ बाँट नहीं पाई। क्योंकि उन्होंने पहले ही चेताया था- भले सगा भाई हो, लड़कों से कभी एकांत में नहीं मिलना। दोस्ती में सदा एक जरूरी दूरी बनाए रखना।’ और वह उसी के कमरे में चली गई!
दर्द का एहसास हफ्तों नहीं गया। कॉलेज में मन नहीं लगता। घर में भी गुमसुम सी रहने लगी। सोचती, नयन से कहूँ! फिर सोचती, कैसे कहूँगी? शर्म से मर नहीं जाऊँगी, उसे बताते!
‘‘तुझे हुआ क्या है...कोई परेशानी है क्या?’’ माँ पूछतीं।
‘‘हाँ...नहीं तो...वो कॉलेज में कल टेस्ट है...!’’ वह अकबका जाती।
‘‘तो, तैयारी नहीं है...?’’
‘‘नहीं माँ...सर दुख रहा है...कैसे पढूँ?’’
‘‘आज तो सो जा...यह सर दर्द की गोली खा लेना...कल की कल देखना।’’
और वह टिकिया सिरहाने दबा लेती तो वे जाते-जाते पलट कर कहतीं, ‘‘जरूर खा लेना और ठीक से सो जाना...सुबह तक ठीक हो जाएगी!’’
ठीक होने जैसा था-क्या!

नयन ही एक ऐसा आत्मीय था, जिससे दिल की बात कहने की सोचती। पर हर बार रह जाती। इसी भावुकता में उसके इतनी नजदीक हो गई कि कोई दूरी नहीं बची...।
उन्हीं दिनों शहीद शशि शेखर का बलिदान दिवस आ गया। पार्टी हैड ने उनके समाधि-स्थल पर जाने की योजना बना ली। कार्यक्रम के लिए झंडे-बैनर तैयार हो गए। नुक्कड़ नाटक और गीतों का रिहर्सल भी रोज-बरोज होने लगा। एक गीत जिसे हिना सहित तीन-चार लड़कियों को गाना था, सुनकर नयन काफी रोमांचित हो जाता। हिना भी इसे मुट्ठी बाँधकर गाती तो मुँह लाल पड़ जाता। वह गीत था:
दुनिया के नक्शे पे, चमका है नया सितारा
आधी जमीं हमारी आधा, आसमां-आं हमा-आरा...
और बाद में जब इंकलाबऽ जिंदाबादऽ का नारा लगाया जाता तो ऐसा समाँ बँध जाता कि पार्टी के बुजुर्ग हैड भी मुट्ठी बाँध उठकर खड़े हो जाते और अपने पोपले मुख से लाल सलामऽ लाल सलामऽ का उद्घोष कर उठते।
टूर के लिए कोई विशेष कपड़े नहीं चाहिए थे, फिर भी नयन ने जोर दिया तो, एक दिन हिना उसके साथ मॉल में चली गई। काफी जोर देने पर उसने कहा कि- रोल के लिए उसे जींस-टीशर्ट चाहिए।’
नयन बोला- चलो ठीक है!’
इस तरह वे शॉपर्स-स्टॉप में गए और उधर जींस-टीशर्ट देखी। सिलेक्ट करते-करते उसे नीली जींस, लाल टीशर्ट पसंद आ गईं।
नयन ने कहा- इनको पहन कर देख लो।’
चेंजिंग-रूम से निकल कर हिना ने मीठे स्वर में पूछा, ‘‘टी-शर्ट कैसी लग रही है, नयन!’’
‘‘अच्छी!’’ कहते उसकी नजरें टीशर्ट से चिपकी रह गईं।
‘‘और जींस?’’
‘‘एकदम फिट!’’
‘‘तो फिर ले दो!’’ मुस्कराती हिना उसकी बाँह थामकर बोली। मगर काउंटर पर आकर उससे पहले अपना पर्स खोल पेमेण्ट कर दिया। नयन को बुरा लगा कि- जब मैं साथ में था...।

अगले हफ्ते वे एक वैन में बैठकर शहीद स्थल के लिए रवाना हो गए। लड़कियों ने राहभर इंकलाबी गीत गाए और नारे लगाए। वैन पर बैनर के अलावा दाएँ-बाएँ लाल झण्डे भी लगाए गए थे। इलाके में पहुँच कर वैन जगह-जगह रुकी, जगह-जगह स्वागत हुआ। शहीद स्थल के नजदीकी कस्बे में लंच की व्यवस्था थी। वहीं जगह-जगह टीम ने अभियान गीत गाया और पार्टी हैड ने प्रभावी वक्तव्य दे सभी को रोमांचित कर दिया। नुक्कड़-नुक्कड़ उन्होंने गंभीरता पूर्वक समझाया कि-
‘आज कार्पोरेट जगत के हाथ में सारी चीजें चली गई हैं। किसानों, मजदूरों का कोई भविष्य नहीं रहा। लेबर्स लाॅ रिवर्स कर दिया गया है। काम के घंटों का निर्धारण उनके हाथों में, छुट्टियों का तुम्हें कोई हक नहीं।
गोरमिंट फाॅर द पीपुल...ठीक है, लोग तो वोट दे ही रहे हैं। चाहे नशे में चलकर दे रहे हों; भोज के बदले, नोट के बदले, साड़ी-कम्बल के बदले...लेकिन 25-30 फीसदी वोट पर बनी ये सरकारें जनता के लिए काम करेंगी या अपने कार्पोरेट आकाओं के लिए?
क्या ये 1857 का दौर है, जब किसान मक्का-बेझर उगाता तो अंग्रेज दो लातें दे फसल जला भूमि लीज पर दे देता! सिंचित भूमि का धनाड्यों में बंदरबाँट करने वालों को जरा भी चिंता नहीं है कि सवा अरब की आबादी को आगे चलकर भोजन कौन देगा!?’
वे जब बोलने पर आ जाते तो बिना माईक के ही उनकी आवाज तेज तर तेज होती चली जाती। समय का भान नहीं रहता। और...शिकार को अपने छुपे हुए शत्रु नजर आने लगते।

लंच के बाद हिना और नयन आइसक्रीम खाने शहीद स्मारक के पार्क में चले गए जहाँ थोड़ी देर पहले सभी कार्यकर्ताओं ने फूल चढ़ाकर नारे लगाए थे।
आइसक्रीम खाते हुए हिना बहुत प्यारी लग रही थी। नयन से रहा नहीं गया। उसने कहा, ‘‘मैं तुम्हें किस करना चाहता हूँ।’’
हिना चौक गई, ‘‘तुम्हें मानना पड़ेगा!’’
‘‘क्यों?’’
‘‘क्योंकि, तुममें काफी हिम्मत है...एक लड़की को यह बोलना...जबकि तुमको मालूम है कि मेरा एक बॉय-फ्रेंड भी है!’’
नयन सकपका गया।
हिना मुस्कराने लगी।
‘‘सॉरी!’’ वह और भी शर्मिंदा हो गया।
‘‘कोई बात नहीं,’’ वह और भी खुलकर मुस्कराने लगी, ‘‘मैं समझ सकती हूँ, तुम्हारी कोई गर्ल-फ्रेंड नहीं है!’’
नयन को ऐसे ताने की उम्मीद न थी। बुरी तरह खिसिया गया। मन ही मन तय कर लिया कि अब थोड़ी दूरी बनाकर रखेगा...।

समाधि-स्थल कस्बे से दूर पुराने हाइवे पर था। नया हाइवे बन जाने से जिस पर अब वाहनों की भरमार नहीं रह गई थी। बहुत दिनों से उस रोड की मरम्मत भी नहीं हुई थी, जबकि जगह-जगह उखड़ गया था। टीम को लिए वैन, उसी पर हिचकोले खाती शाम तक वहाँ पहुँच गई। जहाँ आसपास कोई बस्ती नहीं थी। पर स्थान रमणीक था। क्योंकि- उस मिट्टी में शहीद की सुगंध बसी थी...। स्थल पर शहीद का स्टैच्यु तथा शहीद भवन भी बना हुआ था। पानी के लिए बोर और छोटी-सी बगिया भी थी। स्टैच्यु और भवन के बीच छोटा-सा पांडाल बना दिया गया था। लाउड स्पीकर से देश भक्ति के गीत गूँज रहे थे। कुर्सियों पर पहले से कई लोग मौजूद थे। टीम पहुँची तो दोनों ओर से गगनभेदी नारे लगाए जाने लगे। बुजुर्ग पार्टी हैड ने नसैनी के माध्यम से स्टैच्यु पर चढ़कर शहीद को माला पहनाई। उत्साह में इंकलाब जिंदाबाद और शहीद शशि शेखर अमर रहें के नारे लगाए। फिर सभी लोगों ने शहीद को पुष्प अर्पित किये। नयन उनकी स्टैच्यु देखता रह गया। वह पहली बार समाधि-स्थल पर आया था। उसे यह अनुमान नहीं था कि वे इतने जवान और खूबसूरत होंगे! कि उनकी उम्र शहीद भगत सिंह से मेल खाती महज 23 वर्ष की होगी! देश हित प्राणोत्सर्ग के लिए वे इतनी कम उम्र में कटिबद्ध हो गए होंगे! वह रोमांचित था। उसे क्रांति के सिवा अब और कुछ नहीं सूझ रहा था।
शहीद को पुप्पांजलि के बाद मंच से उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए व्यवस्था बनाई जा रही थी। आरंभ में स्थानीय टीम ने जिसमें 6-7 बुजुर्ग थे, सामूहिक गान किया। उनके गगन भेदी स्वर की अनुगूँज ने हिना को जोश से भर दिया। उसका रोम-रोम उस कोरस को सुनने लगा जिसे मंच से बुजुर्ग लोग मुट्ठियाँ तान-तान कर गा रहे थे:
हम बस्ती नई बसाएँगे, हम दुनिया नई बसाएँगे
पूँजीपतियों सामंतों का धरती से नाम मिटाएँगे
क्यूँ जनता राज न हो कायम, सारा संसार हमारा है
क्यों दान के टुकड़े खाएँ हम सारा संसार हमारा है...

इसके बाद साथ आई टीम ने एक नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन किया। जिसमें बताया गया कि- शहीद शशि शेखर के बलिदान के साथ ही क्षेत्र में जनविद्रोह का सैलाव उमड़ पड़ा था। जमींदारों-साहूकारों की हवेलियाँ जमींदोज कर दी गई थीं। जोत की जमीनों पर किसानों का कब्जा हो गया था। और अंग्रेजी प्रशासन-पुलिस के स्थान पर क्रांतिकारियों का राज कायम हो गया था। मगर बाद के दिनों में गोरे अंग्रेज मालिकों की जगह काले अंग्रेज मालिक देश पर काबिज हो गए।’
सभी वक्ताओं की भी यही चिंता थी।
कई ओजस्वी वक्ताओं के बाद मंच पर, नयन को भी संबोधित करने के लिए बुलाया गया। पर उसके मन में एक दूसरी ही तरह का आक्रोश था। उसने साफ-साफ कहा कि- माफ कीजिएगा, अभी तक आप लोगों की ट्रेन एक ही वे पर दौड़ रही है...। माना कि श्रद्धेय शशि शेखर जी ने अछूतों/दलितों के लिए काम किया। संघर्ष किया। बलिदान दिया। पर बदले में उन वंचितों ने उन्हें भरपूर समर्थन भी तो दिया। मेरी चिंता है कि- शहीद शशि शेखर को आपलोग कब तक भुनाएँगे! आपलोग उन्हीं की तरह कुछ करते क्यों नहीं जिससे हमारे भी प्रतिनिधि वहाँ पहुँचें! जरा सोचिए तो, गुजरे सत्तर सालों में हम श्रद्धेय शशि शेखर की तरह वंचितों के लिए मरते, तो क्या हमारी जमानतें इस दर्जा जप्त होतीं?!’
नयन के भाषण पर सभा में खामोशी छा गई। लग रहा था, अब तक किसी ने सोचा ही नहीं कि हमें आत्मचिंतन भी करना चाहिए!
उसके उद्बोधन का हिना पर बड़ा जबरदस्त असर हुआ। वह उसकी फैन हो गई। भाषण के बाद वह सभा-मंडप में अपने स्थान पर आ बैठा तो वह उसके बगल में खाली पड़ी कुर्सी पर आकर बैठ गई...। बाद के सभी वक्ताओं ने नयन को किसी न किसी रूप में कोट अवश्य किया। कोई सहमत हुआ तो कोई असहमत। पर मंथन उसी के भाषण आसपास घूमता रहा। हिना प्रशंसा के भाव से बार-बार उसके मुख की ओर देखती रही।

भाषणबाजी होते-होते रात हो गई थी। खाने के पैकेट वहीं मँगवा लिए गए थे। खाते-खाते रात और गहरा गई...। तब आयोजकों ने कहा कि- रात में जाना ठीक नहीं होगा!’ पार्टी हैड की मर्जी से सभी ने शहीद भवन में डेरा डाल लिया। लेकिन थोड़ी देर बाद ही लाइट झप्प हो गई। गर्मी और मच्छरों ने कसकर हमला बोल दिया। सभी अपने-अपने बिस्तर ले छत पर चढ़ गए।
दिनभर की थकान से चूर नयन बिस्तर पर पड़ते ही सो गया। हिना बगल में होती तो शायद, नींद की जगह बेचैनी घेरे रखती। पर वह तो दूसरी पंक्ति में लड़कियों में गुट्ठ में लेटी थी।
मगर थोड़ी देर बाद लाइट फिर आ गई। सभी नीचे जाने लगे। हिना ने उसे भी जगाया। पर पहली नींद की बेहोशी में वह उठ नहीं पाया। हिना लिहाज के मारे लड़कियों के पीछे नीचे चली गई। पर नींद नहीं आई। नयन की चिंता लगी थी कि वह छत पर अकेला पड़ा है! आज से पहले उसने उसे इतना निस्पृह कभी न देखा था। यह सब उसी की वजह से हुआ। जबकि, उसका मक्सद उसका अपमान करना नहीं था। उसने तो एक नई शुरूआत से बचने कह दिया, वरना संदीप का साथ तो कब का छूट गया!
सब सो गए तो वह दबे पाँव फिर से ऊपर आ गई और बिना बिस्तर के ही उससे कुछ फासले पर लेट गई।
तब काफी देर बाद नयन की नींद टूटी। आसमान में तारे चमक रहे थे, आसपास धूसर उजाला। और खाली छत पर उसकी ओर पीठ किये कुछ दूरी पर एक लड़की। लंबाई से पहचाना, हिना थी! रोकते-रोकते भी दिल में गुदगुदी होने लगी...। तमाम देर बाद पास खिसक कर फुसफुसाया, ‘‘बाकी सब लोग कहाँ चले गए...?’’
‘‘नीचे!’’ जवाब में वह भी फुसफुसाई।
यकीन नहीं था, वह जाग रही होगी, पर ताज्जुब कि जाग रही थी...।
नयन उसके करीब आकर बैठ गया, ‘‘प्यास लग रही है।’’ उसने मद्धिम स्वर में कहा। क्योंकि अब फुसफुसाने की जरूरत नहीं थी।
‘‘घड़ा जीने के गेट के उधर रखा है...।’’ उसने याद दिलाया।
‘‘ये लोग नीचे नहीं ले गए!’’
‘‘नींद झुकी पड़ रही थी, बिस्तर तो मुश्किल से ले गए...’’ वह धीरे से हँसी।
नयन उठकर उधर चला गया। पानी डोंगे से निकाल कर पिया और उसके लिए भी ले आया। हिना बैठ गई। गर्दन ऊपर की ओर कर मुँह खोल दिया उसने। और वह धार बाँधकर उँड़ेलने लगा। पर उँड़ेलते-उँड़ेलते शरारत सूझ गई, ‘‘तुम्हारा बॉय-फ्रेंड भी इस तरह पिलाता है-क्या?’’
हिना यकायक कोई जवाब नहीं दे पाई। फिर खामोशी तोड़ती हताश स्वर में बोली, ‘‘तुम्हें छोड़ अब मेरा कोई बॉय-फ्रेंड नहीं है।’’
‘‘...संदीप!’’ वह चैंका।
‘‘उसी ने तो विश्वासघात कर दिया...’’ उसकी सिसकी छूट गई।
‘‘अरे!’’ उसे धक्का लगा...डोंगा वहीं रख, बैठ गया।
आँखों की कोरें भीग गयीं। फिर भी खुद को सहेज धीरे-धीरे गीले स्वर में सब बता दिया...।
नयन साँस साधे सुन रहा था। बताते-बताते हिना का गला रुँध गया तो ढाँढ़स बँधाता हुआ बोला, ‘‘फाॅरगेट इट!’’
‘‘कैसे?’’ वह विह्वल हो आई।
‘‘कैसे भी!’’ उसने कहा।

छत पर आदमकद बाउंड्री थी। उठकर आसपास का जायजा लिया। खेतों में दूर-दूर तक कोई नहीं था।
-तुम्हें भुलाना ही होगा!' लौटकर उसने उसके कंधे पर हाथ रख लिया। और शर्म में डूबी हिना ने अपना मुंह दूसरी ओर मुंह फेर लिया। लेकिन थोड़ी देर में सिसकी फूट गई तो, नयन ने उसका चेहरा हाथों में भर लिया! हथेलियों को महसूस हुआ, गाल आंसुओं से तर हैं। वह भावुक स्वर में बोला, मैं हूं तो!'
फिर वह उसकी गोद में सर रखकर लेट गया। और वह अपना पिछला दुख भुलाने नीले आसमान की ओर निहारने लगी जो थोड़ी देर में धूसर होने लगा और छत पर इक्का दुक्का बूंदे गिरने लगीं।
नयन उत्साहित करता बोला, देखो प्रकृति भी हमारी दोस्ती पर खुशी का इजहार कर रही है!'
पर हिना एक निश्वास छोड़ कर रह गई। जैसे, मन का अदृश्य जख्म भरने में अभी और समय लगेगा।
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(4) जाल

श्याम मोहन और हरि मोहन अच्छे मित्र थे। यद्यपि दोनों का सामाजिक स्तर भिन्न था, मगर मानसिक मेलजोल अच्छा था। कहने को हरि ओहदेदार और धनी थे और श्याम बेरोजगार और निर्धन। मगर उनके आपसी व्यवहार को देखकर इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था। मानसिक स्तर के अलावा दोनों में एक समानता और थी, वह उनका कुवांरापन। किसी पर कोई घर-गृहस्थी संबंधी जिम्मेदारी न थी। फकीराना अंदाज में अलमस्त रहना, निर्विघ्न जीना।... हरि पर चूंकि धन का अभाव न था, नदी के तीर पर उनका बहुत बड़ा कृषि फार्म भी था। श्याम ने इच्छा व्यक्त की कि यहां फार्म हाउस बन जाय तो वे प्राकृतिक वातावरण में जिंदगी गुजार दें! हरि ने तुरंत उनकी इच्छा पूरी कर वहां रेस्ट हाउस बनवा दिया। श्याम को रसोई रचना तो आता न था...उन्होंने पास के ही गांव की एक सामान्य-सी लड़की पगार पर रख ली। पगार तो नाममात्र की थी, पर उसका खाना-रहना फ्री था। साल में दो जोड़ कपड़े भी मिल जाते।... और इससे जियादः उसे कुछ चाहिए न था। वह तो अपने गुड़ियों के खेल में मगन रहा करती। ये शौक बचपन से था। घर के फटे-पुराने कपड़ों से भांति-भांति की गुड़ियां बना लिया करती। उनमें राजा-रानी, मंत्री-वजीर, दास-दासी और राजकुमार-राजकुमारियां सभी हुआ करते। जैसे-जैसे उम्र और समझ बढ़ती गई उसकी गुड़ियों के खेल बदलते गए थे... पहले बचपन में जहां उसकी गुड़ियां बचपने के खेल खेला करती थीं, किशोरावस्था में वे ही ब्याह-शादी रचाने लगीं।... फार्म हाउस में आने के बाद तो उसने उनके लिए भांति-भांति की पोशाकें और गहने बना लिए थे।... गुड़ियों की शादी को भी एक-सवा साल हो गया था।... वे पति-पत्नी की तरह मेलजोल पूर्वक रह रही थीं।... लड़की खुश थी। वह मेहनत और लगन से घर का काम करती। श्याम जी को मन पसंद भोजन खिलाकर खुश रखने का यत्न करती। मगर वे हमेशा भुनभुनाते रहते। कभी दाल अच्छी गला दी और तड़का अच्छा नहीं लगा पाई तो बेवकूफ कहते। चटनी मीठी की जगह खट्टी और खट्टी की जगह मीठी बंट दी तो बुद्धू! रोटियां गुदगुदी और समान आकार की नहीं बनीं तो मूर्ख बता दिया।... बहरहाल, उसे रोज अपनी अयोग्यता से परिचित होना था। मगर वह भी सुनने में पक्की थी। उनके विशेषणों पर तुरंत दांत निकाल फिक्क से हँस देती। रोज यही होता और रोज वह भूल जाती।... गांव वालों को पहले तो लगता कि उनमें कोई खिचड़ी पकने लगेगी। आग और फूस आसपास हों तो झल्ल होते देर नहीं लगती। मगर ऐसा होता कैसे? वे लड़की पर रीझते तो राह बनती! और लड़की भला कैसे रीझती उन पर? वह तो उनकी झिड़कियों से हतोत्साहित बनी रहती। आकर्षण-वाकर्षण की शिकार तो वह तब होती, जब कोई निगाह भर देखता।... दो मीठे बोल बोलता। उसकी आवाज की, चाल की, रूप-रंग की तारीफ करता।... उसकी मेहनत-लगन और काम की सराहना करता। उसे एकनिष्ठ सेवा के बदले कभी झूठा धन्यवाद भी देता! सो, जिंदगी मशीन की तरह धड़ाधड़ चलती चली जा रही थी। न कोई भावनात्मक उद्रेक और न प्रेरणात्मक अभीप्सा।... लेकिन बड़ी पुरानी कहावत है कि एकरस जिंदगी तो कभी किसी की बीतती नहीं।... एक बार तो जरूर उस मशीनी चाल में परिवर्तन आता है। एक बार सबके दिन फिरते हैं। एक बार कुछ दिनों के लिए ही सही मुरगे को भी कलंगी निकलती है।... चींटियों के भी पर उगते हैं। श्याम मोहन देशाटन पर क्या गए, लड़की के दिन फिर गए। हरि मोहन पहली बार अपने फार्म हाउस का जायजा लेने वहां आ पहुंचे। श्याम जी देशाटन को चले गए हैं, इसकी उन्हें खबर न थी। श्याम ने कोई कामवाली बाई रख ली है, यह भी उन्हें पता न था।... कार उन्होंने अपनी अहाते में रख आवाज दी, ‘कोई है?’ लड़की ऊंघती-सी बाहर आई, ‘जी-आप कौन हैं...मेरे पति घर में नहीं हैं, फिर कभी आइयेगा!’ हरि चकित! श्याम ने ब्याह भी कर लिया? और उन्हें खबर नहीं! वे अकबकाये से उन्हीं पैरों लौट आए। लौटकर उन्होंने फार्म हाउस के कर्मचारियों को बुलाया, पूछा, ‘माजरा क्या है?’ उन्होंने कहा, ‘लड़की बुद्धू है।...उसके और श्याम जी के बीच कोई रिश्ता है ही नहीं तो हम कहें कैसे?’ हरि को बड़ा ताज्जुब हुआ। लड़की के दुस्साहस पर वे दंग रह गये। अगली छुट्टी ज्योंही हाथ लगी, वे फिर से अपने फार्म हाउस पर चले आये। कार अहाते में खड़ी कर फिर से आवाज दी, ‘कोई है?’ लड़की ने कमरे की जाली से उन्हें आते हुए देख और पहचान लिया था। वह समझ गई कि ये महाशय किसी और के लिए नहीं, मेरे ही लिए आए हैं। उसे अच्छा लगा। इस तरह कोई पहली बार उसके लिए आया था। उसके सांवले चेहरे पर नूर बरस उठा। उसने मुस्कराते हुए मीठी आवाज में कहा, ‘जी आप कौन हैं, क्या काम है? मेरे पति तो अभी लौटे नहीं!’ हरि उसकी बदमाशी पर मन ही मन मुस्कराए और बोले, ‘जी मैं उनका दोस्त हूं। मुझे नहीं लगता कि आप उनकी पत्नी हैं। और हैं तो सुहाग के कोई चिन्ह क्यों नहीं आपके शुभ अंगों पर...? घोर आश्चर्य!’ इस पर लड़की मायूस हो गई, बोली, ‘दरअसल, मेरे पति गरीब और बेरोजगार हैं...उन पर इतना धन कहां कि मुझे गहने और शादी का जोड़ा दे पाते?’ फिर वह सिसकने लगी और अंदर चली गई। हरि को लगा कि श्याम जी ने उनसे बड़ा गुप्त रहस्य छुपा लिया। फार्म हाउस के कर्मचारियों को भी उन्होंने अपनी ओर मिला लिया।... सब मुझे बनाने पर तुले हैं! वे क्षोभ से भरे फिर लौट आए। फिर कर्मचारियों को तलब किया और डांटा कि- तुम सब मुझसे बड़ा भारी विश्वासघात किये हो...इसमें कुछ भी बुरा नहीं कि श्याम जी ने उससे शादी कर ली।... बुराई इसमें है कि मुझे नहीं बुलाया। बताया तक नहीं। और अब तुम लोग भी उस बात को छुपाने में लगे हो। दोस्त और अपने ही कर्मचारियों से मुझे इस धोखे की उम्मीद न थी!’ तब कर्मचारियों ने गंगाजली उठाई। सौगंधें खाईं कि आपसे छल करें तो हम निर्धन और कोढ़ी होवें! वह इतनी बौड़म लड़की है कि श्याम जी जैसे विद्वान, चिंतक और ज्ञानी पुरुष उस पर कैसे रीझ सकते हैं? आप यकीन करें, वह बहुत बातूनी है।... श्याम जी के आगे तो उसकी जुबान तक न खुलती। आपके भोलेपन और भलमनसाहत का फायदा उठा रही है, चुड़ैल!’ पर हरि मोहन को उनकी बातों पर यकीन नहीं आया। उन्हें लगा, कितना ही ज्ञानी-ध्यानी पुरुष हो, माया के फेर में पड़े बिना नहीं रहता। यह कोई कमजोरी नहीं, स्वाभाविक मानवीय क्रिया है। नौकर लोग श्याम जी की बहुत इज्जत करते हैं। इस संबंध का खुलासा कर वे अपने मालिक के दोस्त की तौहीन नहीं करना चाहते। और यह अच्छा ही है।...जब वे मेरे मित्र की इतनी इज्जत रख रहे हैं तो मेरी न जाने कितनी रखेंगे! और...श्याम जी, वे तो कितने खुद्दार इंसान हैं। भावुकता वश ब्याह तो कर लिया, पर दोस्त की अमानत में खयानत नहीं की। नहीं तो फसल का जिम्मा उन्हीं पर तो है। कितनी ही चोरी करके बीवी के लिए गहने गढ़ा देते! और वह भोली लड़की, वह भी कितनी वफादार...नेकदिल और संतोषी प्रकृति की है...बिना गहनों-कपड़ों के ही खुश। पति की लाचारी को उसकी कमजोरी नहीं बनाना चाहती।... हफ्ते भर वे इसी उधेड़बुन में लगे रहे। फिर अगली छुट्टी में खूंटे से खुली गाय की तरह फिर से फार्म हाउस जा पहुंचे। इस बार वे दोस्त की मेहरारू के लिए शादी का जोड़ा और मुख्य गहने खरीद लाए थे। कार अहाते में रख उन्होंने फिर से स्नेहसिक्त वाणी में कहा, ‘कोई है? श्याम जी लौट आए क्या?’ लड़की जैसे, उन्हीं का इंतजार कर रही थी। वह उमंग से भरी उछल कर बाहर आ गई, ‘जी! वे तो नहीं लौटे...आप काम बता दीजिए, मैं कह दूंगी।...’ हरि उसकी निश्छलता पर अभिभूत हो गए। उन्होंने गहने का डिब्बा और कपड़े का पैकेट निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘जी, मैं आपलोगों की शादी पर नहीं आ पाया था। मेरी ओर से इस तोहफे को कुबूल कर लीजिए।...’ लड़की ने हंसती आंखों से उन्हें देखा और थोड़े संकोच के साथ वे चीजें ले लीं। हरि अपूर्व संतोष के सुखद एहसास से लबरेज शहर लौट आए।... तब दूसरे-तीसरे दिन उनके कर्मचारियों ने आकर उन्हें बताया कि- आप तो सचमुच बहुत भोले हैं! उस चुड़ैल की बातों में इस कदर आ गए कि हमारे कहे पर कान नहीं दे रहे।... आप उस कुवांरी लड़की को शादी का जोड़ा और गहने दे आये...जिन्हें लादे वह फार्म हाउस में चमकचौदस बनी घूम रही है। गांव वाले पूछ रहे हैं कि ये किस की ब्याहता बन गई? अब हम क्या जवाब दें!’ और तब जाकर हरि मोहन जी के कान खड़े हुए।... अगली छुट्टी की प्रतीक्षा में वे बेचैन हो रहे। तय था कि अब वे झांसे में नहीं आने वाले, उसकी भली प्रकार खबर ले लेंगे।... और आखिरश वह दिन ही आ गया, जब हरि मोहन अपनी कार से छुट्टी वाले दिन अलस्सुबह ही अपने खेत-घर जा पहुंचे। कार उन्होंने अहाते में खड़ी की और सीधे बंगले के अंदर घुस गए। लड़की उस वक्त नहा-धोकर निबटी ही थी। उन्हें अचानक आया देख वह सद्यःविकसित कली-सी चिटक कर खिल गई। मगर हरि ने उसके रूप लावण्य पर ध्यान न देकर सख्ती से पूछा कि- शादी का मतलब भी जानती हो तुम?’ ‘उँहुं!’ लड़की अचकचा गई। फिर तुरंत हंसने लगी कि- शादी हुए एक-सवा साल हो गया। मतलब क्यूं न जानूंगी...’ ‘तो बताओ, शादी क्या होती है, कैसे होती है, पति के प्रति शादीशुदा औरत का क्या कर्त्तव्य होता है, घर में कैसे रहती है वह... पति को भरण-पोषण और सुरक्षा-सम्मान के बदले क्या-क्या देती है?’ हरि एक सांस में पूछ गए। लड़की विचलित नहीं हुई। उसने कहा, ‘आप बैठ जाइये।’ हरि बैठ गए। लड़की ने कहा, ‘स्नान कर लीजिए और कपड़े छोड़ दीजिए।’ हरि ने परीक्षा बतौर स्नान कर लिया और कपड़े छोड़ दिए। तब लड़की प्रसन्नता पूर्वक स्नानगृह में गई और उनके अंतवस्त्र धोकर अलगनी पर टांग दिए। फिर चूल्हा जगाकर रसोई में जुट गई। फिर उसने थाली लगाकर आसन डाल दिया और वे जीमने गए तो हाथ में पंखा ले वह भी मुस्कराती हुई पास बैठ गई।... दोपहर बाद उसने उबटन किया, स्नान किया और शादी का जोड़ा पहना। दो पटे अगल-बगल में डाल दिए। एक पर उन्हें बिठा लिया, दूसरे पर खुद बैठ गई। फिर उनके दोनों हाथों के बीच अपने दोनों हाथ रखवा लिए और लजाते हुए कहा कि- शादी ऐसे होती है!’ हरि रोमांचित हो उठे। देर तक किंकर्त्तव्यविमूढ़ से बैठे रह गए।... झूठी लड़की ने कनखियों से देखा उन्हें और मुस्कराई। हरि ने सोचा कि हार तो गए अब।... मगर आँखों में सितारों-सी चमक उभर आई। मूर्खा ने तब जाना कि वह तो फंस गई! ऐसे, जैसे- चिड़िया जाल में फंस जाती है, मछली कांटे में।...

सुबह वे अपनी कार अहाते से निकाल शहर लौट गये। संयोग से उसी दिन उनके परम मित्र श्याम मोहन जी देशाटन से लौट आए। देहलीज पर पांव रख उन्होंने सांकल खटखटाई तो भीतर से आवाज आई, ‘आप कौन हैं...? मेरे पति घर में नहीं हैं!’ श्याम जी ने उसके जवाब को कोरी झक माना और नौकरों से बोले, ‘इस बुद्धू की मूर्खता तो अब हद से ज्यादा बढ़ गई।... इसे निकाल कोई दूसरी कामवाली ले आओ!’ नौकरों ने कहा, ‘माफ करें, श्याम जी! हरि मोहन जी ने कहा है कि इसे यहीं रहने दें। आपके लिए वे कहीं और ठिकाना कर देंगे।...’ और श्याम जी हतप्रभ रह गए। निरी देर तो उन्हें यकीन नहीं आया।... और जब आया तो वे उस करामाती लड़की को नजर भर देख लेना चाहते थे, जिसने हरि मोहन जैसे स्वतंत्र व्यक्ति को बांध लिया। मगर वह तो अब सचमुच ब्याहता थी। पराए मर्द के आगे क्योंकर आती? फिर नौकरों ने भी उन्हें वहां ज्यादा देर टिकने नहीं दिया।.
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(5) लॉक डाउन में प्यार

मेरी जिंदगी की अब तक की यह सबसे बड़ी हैरतअंगेज घटना है। जैसा कि आप सभी जानते हैं, प्रधानमंत्री ने एक दिन अचानक कहा कि- संडे को जनता कर्फ्यू रहेगा!
मैं इंदौर में एक हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई कर रही थी। उनके कहे अनुसार पूरा शहर उस दिन घरों में कैद हो गया और शाम को सभी लोगों ने थाली बजाई-ताली बजाई। लेकिन तब हम यह नहीं जानते थे कि दो दिन की छूट के बाद फिर अचानक तीन सप्ताह मांग लिए जाएंगे!
टीवी पर रात आठ बजे प्रकट होकर उन्होंने कहा, आज रात बारह बजे से देश में संपूर्ण लॉकडाउन रहेगा!

-अरे, ये तो बहुत मुश्किल हो गई!' मैंने पापा को फोन किया।
वे भी घबराए हुए थे, उन्होंने कहा, तुम जल्दी से स्टेशन पहुंचो और जनरल का टिकट लेकर ही किसी ट्रेन में बैठ जाओ। तीन हफ्ते तो बहुत होते हैं और फिर उसके बाद पता नहीं, क्या होगा?
घबराहट में मैंने अपना पिट्ठू बैग लिया जिसमें लैपटॉप और कुछ जरूरत के सामान, एटीएम और जो पैसे बचे थे, उन्हें लेकर रूम पर ताला जड़ भागकर सीधी स्टेशन पहुंची और जनरल का टिकट लेकर दिल्ली की ओर जा रही ट्रेन के एक स्लीपर कोच में घुस गई। फिर उससे जुड़ी बोगियों में भटकते-भटकते एक खाली दिखी साइड अपर बर्थ पर चढ़ गई। सोच रही थी, टीसी के आने पर यही बर्थ ले लूंगी, पर उस दिन कोई टीसी भी नहीं आया।
बिना खाये-पिये जैसेतैसे दोपहर तक का सफर पूरा कर मैं दिल्ली पहुंच गई।
लेकिन अब वहां से देहरादून के लिए कोई साधन नहीं था...। मैंने पापा को फोन लगाया तो उन्होंने कहा, तुम घबराओ नहीं, वहीं रुक जाओ, मेरे एक मित्र के मित्र हैं, वे चांदनी चौक इलाके में नई सड़क तरफ कहीं जोगीबाड़ा में रहते हैं। हालात सामान्य होने तक तुम वहां रह सकोगी। चिंता मत करना, वे काफी विश्वसनीय हैं।
ऑटो लेकर मैं जैसेतैसे पापा के बताए पते पर पहुंची। बड़ी संकरी गलियां थीं। एकदम घनी बस्ती। सभी मकानों की गोखें एक दूसरे से सटी हुईं। बहरहाल, जब मैं उनके घर पहुंची तो उन्होंने एहतियातन मुझे सैनिटाइज कर भीतर ले लिया। पर एकदम ऊपर के कमरे में ले आए जो कि 36-37 जीने चढ़ने के बाद था। यानी तीसरी मंजिल पर।
मैं जब वहां पहुंच गई तो उन्होंने कहा, इसे अपना ही घर सुमझें और निश्चिंतता पूर्वक रहें। जरूरत की सभी चीजें आपको पहुंचा दी जाएंगी। वॉशरूम इसमें अटैच है।'
मैंने बुरा नहीं माना क्योंकि यह समय ही ऐसा था। इंदौर में तो कोरोना इतना फैल गया था कि रोजाना नए-नए संक्रमित मिल रहे थे। वहां से आये मेहमान से घर के लोगों को दूर रखना निहायत जरूरी था। पीएम ने कहा था कि सोशल डिस्टेंसिंग ही एकमात्र उपाय है...। पिता के मित्र के मित्र जो उन्हीं की अवस्था के थे, बड़े भले आदमी लग रहे थे।
पर मैं बहुत अजनबी पन महसूस कर रही थी। लग रहा था, यहां आकर तो बुरी तरह फँस गई। इससे अच्छा तो अपने होस्टल में ही रुकी रहती! पर कैसे, वहां से तो सभी भाग रहे थे!
अंदर आकर मैंने गेट बंद कर लिया और फ्रेश होने लगी। जब लैपटॉप खोलकर देश-दुनिया के समाचार देख रही थी उस समय दरवाजे पर नॉक हुई तो मैंने खोला। वहां एक छोटी-सी बच्ची खड़ी थी, जिसने मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया। उसके हाथ में नाश्ते की प्लेट थी, नमस्ते दीदी, कहकर मुझे दूर से पकड़ा कर लौट गई तो मैंने दरवाजा फिर बंद कर लिया।

दरवाजे पर पर्दा पड़ा था। बगल में एक खिड़की थी, वह शीशे की थी और उस पर भी पर्दा पड़ा था। कमरे में एसी था, इसलिए गर्मी और उमस का कोई प्रकोप न था।
मैंने नाश्ता किया और प्लेट टेबिल पर छोड़ दी तथा बेड पर आकर फिर से अपना लैपटॉप ऑन कर लिया... तब मैंने अपने फेसबुक फ्रेंड को लिखा कि- हम तो फँस गए! अब पता नहीं कब मैं हॉस्टल जाऊंगी और कब अपने घर! फिलहाल तो इक्कीस दिन एकांतवास में काटना पड़ेंगे या कम से कम चौदह दिन का क्वॉरेंटाइन! हो सकता है चौदह दिन बाद यह लोग अपनी फैमिली में मुझे मिक्स कर लें!'
पढ़कर दोस्त चिंतित हो गया। वह मुझसे साल भर से जुड़ा था। वह आकर्षक था और बहुत उम्दा बातें करता था। धीरे-धीरे हम लोगों में अपनत्व जैसा भी कुछ पनप गया था। दिन में अगर दो-चार बार बात नहीं कर लेते तो मन नहीं भरता। वह कई तरह के चित्र मुझे डालता और मैं भी अपने कई फोटो डाल देती। कई बार हम लोग वीडियो कॉलिंग भी कर लेते। इस तरह एक आभासी दुनिया में दो अजनबियों के बीच जो लगाव हो गया था उसमें हम लोग व्यस्त थे, मस्त थे और एक दूसरे से बंधे भी। पर जैसा कि फेसबुक पर छुपा कर रखा जाता है तो मैंने भी उसे अपना असली परिचय नहीं दिया था, नाम भी नकली था और शहर भी, केवल चेहरा असली था। और मैं यह अनुमान लगा सकती थी कि उसने भी मुझे अपना असली परिचय नहीं दिया होगा! वह कहां रहता है, मुझे नहीं पता! बस मैं उसे शक्ल से और एक फर्जी नाम से जानती हूं, यह फर्जी नाम सचिन था। और मेरा अनुराधा। जबकि मेरा असली नाम संगीता है। उसका असली नाम क्या होगा, मुझे नहीं पता।
जब मैंने कहा कि मैं मुंबई में फँस गई हूं यानी यहां भी मैंने झूठ बोला, नहीं बताया कि मैं दिल्ली में हूं तो उसने भी कहा कि वह कोलकाता में है, यानी वह जहां था, वहीं है। कोलकाता में अपने रूम में, उसने वीडियो कॉलिंग करके वही रूम दिखाया तो मैंने भी उसे अपना दिल्ली वाला गेस्ट रूम मुंबई का बता कर दिखा दिया! लेकिन उसी रात अचानक यह घटना घट गई!

लाइट अकस्मात चली गई और बहुत देर तक नहीं आई तो उमस से बचने के लिए मैंने खिड़की खोल ली, तब देखा कि सामने वाली बिल्डिंग की खिड़की खुली है जो कि ठीक मेरी खिड़की के सामने है। और हम दोनों के बीच सिर्फ एक गोख का फासला है जो कि आपस में मिली हुई है और उस फासले को कोई भी फलाँग सकता है!
तो उस खिड़की में जो मुझे दिखा, वह मेरी ओर पीठ किये था। लाइट उस वक्त उस बिल्डिंग में भी नहीं थी। पर इनवर्टर की रोशनी में उसकी पीठ दिख रही थी। मेरे कमरे में इनवर्टर की कमी थी, बत्ती नहीं जल रही थी इसलिए मैं अंधेरे में थी...।
उसे देख कर अचानक मुझे अपने मित्र की याद आ गई और मैंने कॉलिंग कर दी तो इस रहस्य पर से पर्दा हट गया!
मेरा फेसबुक फ्रेंड मेरे सामने था!
पहली बार मुझे जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य हुआ जो कि सत्य था। लेकिन मैं अंधेरे में थी और अपनी खुशी छुपा गई। उसने कहा भी कि अपना प्यारा मुखड़ा तो दिखाओ!' तो मैंने कहा कि, इस समय लाइट नहीं है और मेरे कमरे में अन्य कोई रोशनी भी नहीं!'
उसने कहा, चलो कोई बात नहीं, जब लाइट आ जाए तो दोबारा वीडियो कॉलिंग करूंगा।
-मैं करूंगी, लेकिन अभी तो तुम बात करो!
तो उसने कहा, क्या तुम मुझे देख सकती हो?
मैंने कहा, कि हां बिल्कुल मैं तुम्हें देख पा रही हूं। तुम अपने कमरे में हो। तुम अपनी खिड़की पर हो...और आगे का दिखाओ तो जानूं!
तो उसने पूरा रूम दिखाया। जो कि दूधिया रोशनी में नहाया हुआ था। उसमें टेबल थी, सेल्फ, टीवी था, एसी था, कांच की खिड़की और पर्दा पड़ा दरवाजा था...! यह सब वही था जो मेरे सामने था!
मुझे पूरा यकीन हो गया कि यह वही है, वही है लेकिन इतना बड़ा झूठ कि मैं कोलकाता में हूं! और मैं मन ही मन खुश थी, तब तो, तब तो तुम सचिन नहीं हो, तुम्हारा असली नाम क्या है, अब मैं यह जानकर रहूंगी बच्चू! और मैंने फोन काट दिया।
उसके बाद उसका फोन आया तो उठाया नहीं। बस उसकी बेचैनी देखती रही। उसके बाद ऐसे ही उन्मुक्त क्षणों में सोती-जागती कल्पना करती रही कि अब मैं उससे मिल सकती हूं...!
लेकिन मिलने की सोच कर ही डर लग रहा था। यह डर शायद प्रेम का था क्योंकि मिले बिना रहा भी तो नहीं जा रहा था!

अगले दिन फिर वही नाश्ता, खाना, दिन भर का रूटीन और पढ़ाई...और रात को फिर अचानक लाइट चली गई! और मैंने खिड़की खोली तो देखा, वह रोशनी में नहाया हुआ अपने कमरे में ही बैठा था! उसकी कांच की खिड़की बंद थी। मैंने वीडियो कॉलिंग की तो उसने तुरंत फोन उठा लिया और मुझे दिखाई दिया कि उसका पंखा चल रहा था, लेकिन एसी बंद था। मैंने पूछा, लाइट नहीं है?
उसने कहा, हां- पता नहीं क्यों, लाइट अब रोजाना इस समय चली जाती है! कल भी गई थी। लेकिन तुम भी तो दिखाई नहीं दे रहीं!
तो मैंने कहा कि- पता नहीं क्यों सारे देश में यह हो रहा है...मैं मुंबई में हूं और तुम कोलकाता में और दोनों शहरों में एक साथ लाइट गई है, रोजाना जाती है, क्या बिजली पर भी वायरस अटैक हो रहा है?
-अरे नहीं....' वह हँसने लगा, यह रूटीन का लोड सेटिंग है!'
-पर यकीन नहीं हो रहा, एक टाइम पर दो इतनी दूर के महानगरों में, एक साथ!'
यकीन तो उसे भी नहीं हो रहा था। फिर हम यह दुनियादारी छोड़ बड़ी अंतरंगता से प्यार-मोहब्बत की बातें करते रहे और बाद में जब अचानक लाइट आ गई तो मैंने फोन काट दिया और खिड़की बंद कर पर्दा डाल दिया कि राज खुल न जाये! तो उसने जनरल कॉल लगाकर पूछा, क्यों लाइट आ गई क्या?
तो मैंने कहा, हां- आ गई!
अब मैं बंद कमरे में बहुत खुलकर हँस रही थी। और वह हवा में किस कर रहा था और अंत में मैंने भी उसे किस कर लिया था।

अगले दिन फिर वही रूटीन: नाश्ता, खाना, दोपहर में पढ़ाई-सोना, शाम को चाय और फिर डिनर और उसके बाद पढ़ने बैठी तो अचानक लाइट का गोल हो जाना!
मैं जैसे लाइट जाने की प्रतीक्षा ही कर रही थी। मैंने खिड़की खोल ली और वह सामने था! मन में आया कि इसी समय, इसी हालत में, खुली खड़की से फोन करूं! लेकिन फिर डर लगा कि अब कोई गड़बड़ हो न जाए! कहीं उसे यह समझ न आ जाए कि मैं इसी शहर में हूं, उसके आसपास ही, क्योंकि लाइट एक साथ जा रही है!
इसलिए नहीं किया पर उसे देखती रही...। वह बड़ी मासूमियत के साथ बैठा पढ़ रहा था। थोड़ी देर बाद उसने खिड़की की तरफ अपना मुंह कर लिया था और अंधेरे में इधर उधर झाँक रहा था। फिर उसे जाने क्या सूझा कि उसने अपने कमरे की लाइट बंद कर ली और उसका दिखना बंद हो गया!

मुझे रात भर नींद नहीं आई। मैं महसूस कर रही थी कि मुझे वह अपनी बाहों के घेरे में लिए है, जबकि प्रत्यक्ष में अभी उससे भेंट भी नहीं हुई थी।
सुबह बच्ची नाश्ता लेकर आई तो मैंने बड़ी मुश्किल से उठकर दरवाजा खोला और नाश्ता लेकर रख लिया। मुझे घने आलस्य में घिरा यानी लगभग सोता हुआ सा पाकर वह चिंतित हो गई, आपकी तबीयत ठीक नहीं है, दीदी?
मैंने भरसक मुस्करा कर मगर जमुहाई लेते हुए कहा, रात में लाइट चली गई तो नींद उड़ गई थी इसलिए, मैं अभी सो रही थी...।
-दीदी, लाइट तो रोज आती है, इसमें इन्वर्टर का कनेक्शन नहीं है इसलिए आपको परेशानी हो रही है। थोड़े दिन की बात और है, दादा जी बोल रहे थे कि चौदह दिन पूरे हो जाएं, दीदी तब हम आपको नीचे ले लेंगे!
उसके सामने मैं मुस्कुरा कर रह गई, पर मुझे अच्छा नहीं लगा। उसके बाद मैं फ्रेश हुई, नाश्ता किया। ख्यालों में खोई रही और नहा कर तैयार हो गई। फिर खाना खाकर सो गई क्योंकि मुझे कल्पना में सचिन का साथ चाहिए था, जैसे वही सहारा था!
शाम को लड़की की नॉक ने जगाया। मैंने दरवाजा खोला और बेबी के हाथ से थाली पकड़ने में उंगलियां टकरा गईं तो वह झटके से एक कदम पीछे हट अपना हाथ ऐसे देखने लगी जैसे मेरी उंगलियों के कोरोना सांप ने उसे डँस लिया हो!
-सॉरी!' मुझे सचमुच अफसोस हुआ।
-कोई बात नहीं दीदी, पर इंदौर में अब तो बहुत तेजी से फैल रहा है।' उसने कहा, आप अभी तक सो रही थीं, लगता है, तबीयत ठीक नहीं।'
-नहीं, नहीं! ये बात नहीं...' मैं बौखलाई।
-जरा भी खराब लगे तो बता देना, दादा जी चेकअप करा देंगे! अब तो किट भी आ गई है, जांच आसानी से हो जाएगी। इलाज भी हो जाएगा। आपकी फिक्र है, इसलिए कहा।
मेरी या अपनी! मैंने पलकें उठा कर देखा उसे और प्रत्यक्ष में बोली, नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है!
सुनकर वह सहजता से फुदकती चली गई पर मैं थोड़े से तनाव में आ गई। सोचा, संदेह कितनी बुरी चीज है। फिर मैंने खाना तो भरपेट खा लिया पर नींद उड़ गई।
और फिर धीरे-धीरे वही वक्त आ गया जबकि लाइट जाती है! जिसके जाते ही कमरा अंधेरे में डूब गया। तभी अचानक उसने वीडियो कॉलिंग की और मैं भूल गई कि राज खुल जाएगा, फोन उठा लिया! तो उसने कहा, यह अजीब संयोग है, इस समय मेरी बिल्डिंग में भी लाइट नहीं है और सामने वाली बिल्डिंग में भी लाइट नहीं है! आखिर तुम हो कहां अनुराधा!?
मैं धीरे से हंसी और मेरे मुंह से निकल गया, मैं तुम्हारे सामने ही हूं सचिन!
-सचमुच!' सुनकर उसे यकीन नहीं हुआ।
-हां...' मैंने सारा किस्सा बता दिया कि किस तरह पिछले तीन दिनों से तुम्हें प्रत्यक्ष देख रही हूं!
और यह हकीकत जान वह आने के लिए एकदम उतावला हो गया मगर तभी अचानक लाइट आ गई और मैंने पर्दा हटा दिया तो देखा, वह गोख फांदते, फांदते अचानक रुक गया पर वहीं से हैरत भरा मुझे प्रकाश में नहाया देर तलक देखता रहा।

एक ऐसी रात जो हमें सोने नहीं दे रही थी! अपने-अपने कमरे में बंद मगर फोन खुले हुए! ढेर सारी बातें, बातें इतनी जो खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। और उन्हीं बातों में मैंने बता दिया है कि- अब नहीं, मेरा यहां दम घुट रहा है। ऐसे संदेह में जीना बहुत मुश्किल है। मैं पापा को समझा लूंगी। अच्छा हो तुम मुझे यहां से निकाल लो!
तब उसने कहा, अच्छा, कल मैं आता हूं अनुराधा! हम जरूर कोई राह निकाल लेंगे! अब तुम सो जाओ, नहीं तो तबीयत और ज्यादा बिगड़ जाएगी।
और मैं उसकी बात मान फोन बंद कर सो गई।

सुबह उठी तो मुझे सचमुच बहुत अच्छा लग रहा था। मैं बहुत मीठे सपनों में बहुत गहरी सोई थी, इतनी कि एक करवट में नींद पूरी हो गई और सुबह टाइम पर जाग गई। जब तक नाश्ता आया मैं नहा धो ली। बच्ची ने कहा, दीदी आज आप अच्छी लग रही हैं।
-मैं तो ठीक ही हूं, कल मैं सो नहीं पाई थी इसलिए तुम्हें शक पड़ गया...
उसने कहा, नहीं-नहीं, शक वाली बात नहीं, हम लोग बस आपकी चिंता करते हैं।
मैंने उसे थेंक्स कहा और कहा, सब लोगों को मेरा आभार व्यक्त करना।
उसके बाद वह चली गई। तो नाश्ते के बाद और फिर खाने के बाद भी मैं ऑनलाइन पढ़ाई करती रही। शाम का खाना भी मैंने नियत समय पर खा लिया। उसके बाद थोड़ी देर के लिए लेट गई तो निश्चिंत-सी झपक भी गई। तभी फोन आया तो पता चला कि लाइट चली गई है और सचिन गोख फांद कर दरवाजे पर आ चुका है!
दिल यकायक धड़क उठा और मैं कांपते कदमों से दरवाजे पर आ गई। और उसने धीरे से नॉक की तो मैं वहीं खड़ी थी, लगा नॉक दिल पर हुई! तो मेरी घबराई-सी उंगलियों ने सिटकनी उतार दी। तब गेट को हल्की सी जुंबिश दे वह छाया सदृश फुर्ती से अंदर आ गया, फिर सिटकनी चढ़ाने की आवाज आई तो मैं कोने में सिमट गई कि कहीं यकायक बाहों में भर कर चूम नहीं ले! घबराहट में चेहरा पसीने से तर था।
तभी अचानक लाइट आ गई और मेरे पांव तले की जमीन खिसक गई! क्योंकि वह खुद सहमा-सा एक कोने में खड़ा था। और उसके चेहरे पर तीन परतों वाला मास्क चढ़ा था तो हाथों में सफेद ग्लव्स!
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(6) देह भूमि

रात को वह देर से लौटी थी। माँ ने दरवाजा जरूर खोला, पर कोई बात नहीं की। सुबह आँख खुली तो छोटी की हालत बद्तर! कुछ दिनों से उसके पेट में अपेंडिसाइटिस का जानलेवा दर्द होने लगा था। आखिर उसने माँ के फूले हुए चेहरे को नजरअंदाज कर धीरे से कहा, 'रिक्शा ले आती हूँ।'
सुनकर माँ ने कौड़ी-सी आँखें निकालीं, बोली कुछ नहीं। नेहा सिर खुजला कर रह गई।
वातावरण निर्माण के लिए स्थानीय स्तर पर कलाजत्थे बना दिए गए थे। जिन्हें नाटक और गीत सिखाने के लिए मुख्यालय पर एक प्रशिक्षण शिविर लगाया गया। प्रशिक्षु उसे दीदी कहते और आकाश को सर। वे लोग रिहर्सल में पहुँच जाते तो जोश में फैज और सफदर के गीत गाने लगते। ऐसे मौकों पर दोनों भावुक हो उठते, क्योंकि दिल से जुड़े थे।
जब प्रत्येक टीम के पास प्रशिक्षित कलाकार हो गए तो उन्हें उनका स्थानीय कार्यक्षेत्र दे दिया गया। यानी हरेक टीम को अपने सर्किल के आठ-दस गाँवों में नुक्कड़ नाटक व गीतों का प्रदर्शन करना था। कलाजत्थों, कार्यकर्ताओं व ग्रामसमाज के उत्साहबर्धन के लिए उन्हें प्रतिदिन कम से कम पाँच-छह गाँवों का दौरा करना पड़ता।
और एक ऐसे ही प्रदर्शन के दौरान जिसे देखते-सुनते वे दोनों ही भाव विभोर हो गए थे। नेहा आकाश के कंधे से टिक गई थी और वे रोमांचित से उसी को देख रहे थे, किसी फोटोग्राफर ने वह पॉज ले लिया! और वह चित्र उसे एक खबर प्रतीत हुआ, जो उसने एक स्थानीय अखबार में छपा भी दिया... जबकि उस क्षण वे लोग अपने आप से बेखबर, लक्ष्य को लेकर अति संवेदित थे!
बाद में उस अखबार की कतरन एक दिन आकाश ने नेहा को दिखलाई तो वह तपाक से कह बैठी, 'यह तो मृत है, जिसे देखना हो, हमें जीवंत देखे!'
वे हतप्रभ रह गए।
पापा ने भी वह चित्र कहीं देख लिया होगा! वे कॉलोनी को जोड़ने वाली पुलिया पर बैठे मिले। माँ दरवाजे पर खड़ी। भीतर घुसते ही दोनों की ओर से भयानक शब्द-प्रताड़ना शुरू हो गई। वही एक धौंस, 'कल से निकली तो पैर काट लेंगे! बाँध कर डाल देंगे! नहीं तो काला मुँह कर देंगे कहीं! यानी हाँक देंगे जल्दी सल्दी किसी स्वजातीय के संग जो भले तुझसे अयोग्य, निठल्ला, काना-कुबड़ा हो!'
और उसी क्षण जरा-सी जुबानदराजी हो गई तो पापा यानी पुलिस ने क्रोध में रंडी तक कह दिया!
छोटी की तड़प और तेज हो गई तो, उसने तैयार होकर उसे अकेले दम ले जाने का फैसला कर लिया। तब माँ ने अचानक गरज कर कहा, 'केस बड़े अस्पताल के लिए रैफर हो गया है!'
वह निशस्त्र हो गई। आँखों में अचानक बेबसी के आँसू उमड़ आए।
'पापा?' उसने मुश्किल से पूछा।
'गए, उनके तो प्राण हमेशा खिंचते ही रहते हैं,' वह बड़बड़ाने लगी, 'हमारी तो सात पुश्तों में कोई इस नौकरी में गया नहीं। जब देखो ड्यूटी! होली-दीवाली, ईद-ताजिया पर भी चैन नहीं... कहीं मंत्री संत्री आ रहे हैं, कहीं डकैत खून पी रहे हैं!'
पहले वह ऐसी नहीं थी। न पापा इतने गुस्सैल! भाई मोटर-एक्सीडेंट में नहीं रहे, तब से घर का संतुलन बिगड़ गया। फिर दूसरी गाज गिरी पापा के सस्पेंड होकर लाइन अटैच हो जाने से...।
पुलिस की छवि जरूर खराब है। पर पुलिस की मुसीबतें भी कम नहीं हैं। एक अपराधी हिरासत में मर गया था। ऐसा कई बार हो जाता है। यह बहुत अनहोनी बात नहीं है। कई बार खुद के डिप्रेशन वश और कई बार सच उगलवाने के चक्कर में ये मौतें हो जाती हैं। राजनीति, समाज और अपराधियों के न जाने कितने दबाव झेलने पड़ते हैं पुलिसियों को। पापा पागल होने से बचे हैं, उसके लिए यही बहुत है। बेटे की मौत का गम और दो कुआँरी बेटियों के कारण असुरक्षा तथा आर्थिक दबाव झेलते वे लगातार नौकरी कर रहे हैं, यह कम चमत्कार नहीं है। कई पुलिसकर्मी अपनी सर्विस रिवॉल्वर से सहकर्मियों या घर के ही लोगों का खात्मा करते देखे गए हैं। माँ तो इसी चिंता में आधी पागल है! नेहा की समाजसेवा सुहाती नहीं किसी को।
और वह सुन्न पड़ गई। आकाश रोजाना की तरह लेने आ गए थे!
क्षेत्र में ट्रेनिंग का काम शुरू हो गया था। वे दोनों की पर्सन थे। मास्टर ट्रेनर प्रशिक्षण हेतु जो सेंटर बनाए गए थे उन पर मिलजुल कर प्रशिक्षण देना था। आकाश सुबह आठ बजे ही घर से लेने आ जाते।
'क्या हुआ?' उन्होंने गर्दन झुकाए-झुकाए पूछा।
'सर्जन ने केस रीजनल हॉस्पिटल के लिए रैफर कर दिया है...' उसने बुझे हुए स्वर में कहा।
'पापा?' उन्होंने माँ से पूछा।
माँ ने मुँह फेर लिया।
वे एक ऐसी सामाजिक परियोजना पर काम कर रहे थे, जिसे अभी कोई फंड और स्वीकृति भी नहीं मिली थी। मगर प्रतिबद्ध थे, क्योंकि परिवर्तन चाहते थे। क्षेत्र में उन्होंने सैकड़ों कार्यकर्ता जुटाए और साधन निहायत निजी। सभी कुछ खुद के हाथपाँव से। जिसके पास साइकिल-बाइक थी वह उससे, आकाश ने एक पुरानी जीप किराए पर ले रखी थी। शहर से देहात तलक सब लोग मिलजुल कर एक परिवार की तरह काम कर रहे थे। उन्होंने सभी को गहरी आत्मीयता से जोड़ रखा था। नेहा की माँ अक्सर उनका विरोध किया करती थी। परीक्षा से पहले नेहा एक युवा समूह का नेतृत्व अपने हाथ में लेकर बिलासपुर चली गई थी, उसे वह मंजूर था। उसके जम्मू-कश्मीर विजिट पर भी माँ ने कोई आपत्ति नहीं जताई! पर आकाश के संग गाँवों में फिरने, रात-बिरात लौटने से उसे चिढ़ थी...।
नेहा मन ही मन प्रार्थना कर उठी कि वे यहाँ से चुपचाप चले जायँ। मगर उन्होंने परिस्थिति भाँपकर साथ चलने का निर्णय ले लिया!
माँ यकायक ऋणी हो गई।
नेहा खुश थी। बहुत खुश।

जरूरत का छोटा मोटा सामान जीप में डालकर, बैग में जाँच के परचे रख वह तैयार हो गई। उन्होंने माँ को आगे बैठाया, बहन उसकी गोद में टिका दी। ड्रायवर से बोले, 'गाड़ी सँभाल कर चलाना, धचका नहीं लगे।' दरवाजे पर ताला जड़ वह उड़ती-सी पीछे जा बैठी। जीप स्टार्ट हुई तो वे भी बगल में आ बैठे। शहर निकलते ही कंधे पर हाथ रख लिया, जैसे सांत्वना दे रहे हों!
सहयोग पर दिल भर आया था। जबकि, शुरू में उनके साथ जाना नहीं चाहती थी। जीप लेने आती और वह घर पर होते हुए मना करवा देती। क्योंकि शुरू से ही उसका उनसे कुछ ऐसा बायाँ चंद्रमा था कि एक दिशा के बावजूद वे समानांतर पटरियों पर दौड़ रहे थे...।
तकरीबन तीन साल पहले आकाश जब एक प्रशिक्षण कैंप कर रहे थे, वह अपने कोरग्रुप के साथ फाइल में छुपा कर उनका कार्टून बनाया करती थी। उनकी बकरा दाढ़ी और रूखा-सा चेहरा माइक पर देखते ही बोर होने लगती। और उसके बाद उसने एक कैंप किया और उसमें आकाश और उनके साथियों ने व्यवधन डाला... न सिर्फ प्रयोग बल्कि विचार को ही नकार दिया! तब तो उनसे पक्की दुश्मनी ही ठन गई। जल्द ही बदला लेने का सुयोग भी मिल गया उसे! एक संभागीय उत्सव में प्रदर्शन के लिए आकाश को उसकी टीम का सहारा लेना पड़ा था। और वह कान दबाए चुपचाप चली तो गई उनके साथ पर एक छोटे से बहाने को लेकर ऐंठ गई और बगैर प्रदर्शन टीम वापस लिए अपने शहर चली आई! वे वहीं अकेले और असहाय अपना सिर धुनते रह गए थे।
फिर अली सर ने कहा, 'नेहा, सुना है तुम आकाश को सहयोग नहीं दे रही? यह कोई अच्छी बात नहीं है!'
वे उसके जम्मू-कश्मीर विजिट के गाइड, नजर झुक गई। उनके निर्देशन में रजौरी तक कैंप किया था। वह उनका सम्मान करती थी। मगर उन्होंने दो-चार दिन बाद फिर जोर डाला तो उसने उन्हें भी टका-सा जवाब दे डाला, 'माफ कीजिए, सर! मैं खुद से अयोग्य व्यक्ति के नीचे काम नहीं कर सकती!'
बस, यहीं मात खा गई, वे बोले, 'तुम जाओ तो सही, धारणा बदल जाएगी,' उन्होंने विश्वास दिलाया, 'नीचे-ऊपर की तो कोई बात ही नहीं... यह तो एनजीओ है - स्वयंसेवी संगठन! सभी समान हैं। कोई लालफीताशाही नहीं।'
नेहा अखबारों में उनकी प्रगति-रिपोर्ट पढ़ती...और सहमत होती जाती। और आखिर, उस संस्था में तो थी ही, समिति ने उसे उनके यहाँ डैप्यूट भी कर रखा था! परीक्षा के बाद खाली भी हो गई थी। सिलाई-कढ़ाई सीखना नहीं थी, ना-ब्यूटीशियन कोर्स और भवन सज्जा! फिर करती क्या? उन्हीं के साथ हो ली।
उन दिनों वे उसे आगे बिठा देते और खुद पीछे बैठ जाते। सिगरेट पीते। उसे स्मैल आती। पर सह लेती। पिता घर में होते तब हरदम धुआँ भरा रहता। नाक पर चुन्नी और कभी-कभी सिर्फ दो उंगलियाँ टिकाए अपने काम में जुटी रहती। हालाँकि बचपन में उसने भार्इ के साथ बीड़ी चखी, तम्बाकू चखी, चौक-बत्ती खार्इ...पर उन चीजों से अब घिन छूटने लगी थी।
तीन-चार दिन में आकाश ने उसे नाक मूँदे देख लिया। बस, उसी दिन से जीप में सिगरेट बंद। मगर में घर में आते या अकेले होते ही पीने लगते। हालांकि यह बुरी आदत पहले नहीं थी। पर पत्नी की बेध्यानी और तनहा छोड़ देने से यह लत लग गई! जो शुरू के दिनों में ऐसी नहीं थी, पर सात-आठ साल में, बल्कि चार साल में दो बच्चे होते ही देह का जादू उतर गया। आकाश की भावुकता और चाहत को वह बड़े हल्के से लेने लगी और सहेलियों, डिजाइनों, पकवानों, मर्तबानों में बिजी बनी रहती...। थकान और ऊब के कारण बरसों से उसने अपने शौहर के कमरे में जाना छोड़ दिया था...। वे बड़े हुलास से करीब आते भी तो वह अनिच्छा प्रकट कर देती। जरूरी अवसरों पर भी उनके साथ जाना टाल जाती।
जब उनकी पसंद को दरकिनार कर बच्चों की पसंद बन गई सुजाता तो वे भी अभियान को समर्पित हो गए। नेहा को ध्यान में रख वे दूसरे कार्यकर्ताओं को भी धूम्रपान नहीं करने देते। वे वाकई अच्छे साबित हो रहे थे।
उन दिनों वह एक वित्त विकास निगम के लिए भी काम करती थी। आकाश दाएँ बाएँ होते तब कार्यकर्ताओं को अपनी प्लांटेशन वाली योजनाएँ समझाती। धीरे धीरे तमाम स्वयंसेवकों को निगम का सदस्य बना लिया। पर एक बार जब एक मीटिंग के दौरान प्रोजेक्ट पर बात करते करते निगम का आर्थिक जाल फैलाने लगी तो वे एकदम भड़क उठे। कुरसी से उठकर जैसे दहाड़ उठे, 'नेहा-जीऽ! सुनिए, सुनिएऽ! ये एजेंटी जुआ, लॉटरी यहाँ मत चलाइए। ये लोग एक स्वयंसेवी संगठन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं! इन्हें मिसगाइड मत करिए! यहाँ सिर्फ प्रोजेक्ट चलेगा, समझीं आपऽ?'
- समझ गई!' उसने मुँह फेर लिया।
- कल से बुलाना!' अपमान के कारण चेहरा गुस्से से जल उठा।
उठकर एकदम भाग जाना चाहती थी, पर वह भी नहीं कर पाई। रात में ठीक से नींद नहीं आई। बारबार वही हमला याद हो आता! पर दो दिन बाद एक किताब पढ़ी, 'यह हमारी असमान दुनिया' तो सारा अपमान, सारा गुस्सा तिरोहित हो गया। वह फिर से पहुँच गई उसी खेमे में। और गाँव गाँव जाकर पुरुष कार्यकर्ताओं की मदद से महिला संगठन बनाने लगी। उसे अच्छा लगने लगा। वित्त विकास निगम की एजेंटी सहेली को दान कर दी। जैसे लक्ष्य निर्धरित हो गया था और उपस्थिति दर्ज हो रही थी, 'समाज में स्त्री की मौलिक भूमिका।'

जीप इंडस्ट्रियल ऐरिया के मध्य से गुजर रही थी। हॉस्पिटल अब ज्यादा दूर न था। लेकिन छोटी दर्द के कारण ऐंठ रही थी। माँ घबराने लगी। आकाश ने ड्रायवर से कहा, 'गाड़ी और खींचो जरा!' नेहा खामोश नजरों से उन्हें ताकने लगी, क्योंकि चेसिस बज रही थी। गाड़ी गर्म होकर कभी भी नठ सकती थी।
- कुछ नहीं होगा!' उन्होंने चेहरे की भंगिमा से आश्वस्त किया तो, पलकें झुका लीं उसने।
वापसी में अक्सर लेट हो जाते। तब भी गाड़ी इसी कदर भगाई जाती। गर्म होकर कभी कभी ठप पड़ जाती। सारी जल्दी धरी रह जाती! उसे लगातार वही डर सता रहा था। मगर इस बार जीप ने धोखा नहीं दिया। बहन को कैज्युअलिटी में एडमिट करा कर सारे टेस्ट जल्दी जल्दी करा लिए। दिन भर इतनी भागदौड़ रही कि ठीक से पानी पीने की भी फुरसत नहीं मिल पाई। रात आठ-नौ बजे जूनियर डॉक्टर्स की टीम पुनर्परीक्षण कर ले गई और अगले दिन ऑपरेशन सुनिश्चित हो गया तो थोड़ी राहत मिली।
वे बोले, 'चलो, जरा घूमकर आते हैं।'
उसने माँ से पूछा, 'कोई जरूरत की चीज तो नहीं लाना?'
उसने 'ना' में गर्दन हिला दी। माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं। किंतु उसकी परेशानी को नजरअंदाज कर वह आकाश के साथ चली गई।
चौक पर पहुँचकर उन्होंने पावभाजी और डिब्बाबंद कुल्फी खाई। असर पेट से दिमाग तक पहुँचा तो रौशनी में नहाई इमारतें दुल्हन-सी जगमगा उठीं। चहलकदमी करते हुए वे फव्वारे के नजदीक तक आ गए। बैंचों पर बैठे जोड़े आपस में लिपटे हुए मिले। माहौल का असर कि आकाश से अनायास सटने लगी और वे आँखों में आँखें डाल विनोदपूर्वक कहने लगे, 'योगी किस कदर ध्यान-मग्न बैठे हैं!'
लाज से गड़ गई कि - आप बहुत खराब हैं!'
उसे वार्ड में छोडकर वे अपने मित्र के यहाँ रात गुजारने चले गए। वह तब भी उन्हें आसपास महसूस कर रही थी। मानों करीब रहते रहते कोई भावनात्मक संक्रमण हो गया था। उनकी आवाज, ऊष्मा और उपस्थिति हरदम मँडराती थी सिर पर।
सुबह वे जल्दी आ गए, सो तत्परता के कारण दुपहर तक ऑपरेशन निबट गया। छोटी का स्ट्रेचर खुद ही धकेल कर ओटी तक ले गए और वापस लाए। हड़ताल के कारण उस दिन कोई वार्डबाय न मिला था। दुपहर बाद अचानक बोले, 'नेहा! अब मैं रिलैक्स होना चाहता हूँ! तुम्हें कोई जरूरत न हो तो चला जाऊँ?'
वे अपने स्थानीय मित्र के यहाँ जाने के लिए कह रहे थे, शायद! बहन को फिलहाल दवाइयों की जरूरत थी, न जूस की। नाक में नली पड़ी थी और प्याली में उसका पित्त गिर रहा था। नेहा को कपड़े धोने थे, कुछ इस्त्री करने थे। जल्दी सल्दी में गंदे संदे और मिचुड़े हुए रख लाई थी।
उसने माँ से पूछा, 'मम्मी, दो घंटे के लिए मैं भी चली जाऊँ सर के साथ?'
वे एकटक देखती रहीं। पति होते तो शायद, ज्यादा मजबूत होतीं। उसने कपड़े एक बैग में ठूँसे और बछड़े की तरह रस्सा तुड़ाकर भाग खड़ी हुई।
बाहर आते ही आकाश ने इशारे से स्कूटर बुलाया और वे लोग मुस्तैदी से उसमें बैठ गए। काम की फिक्र में ड्रायवर को सुबह ही गाड़ी समेत वापस भेज दिया था। समिति के दूसरे लोगों को लेकर वह फील्ड में निकल गया होगा!
कैंपस निकलते-निकलते वे एक प्रस्ताव की भाँति बोले, 'अपन चल तो रहे हैं,' थोड़े हँसे, 'क्या-पता, बिजली पानी की किल्लत हो वहाँ!' फिर ऊँचे स्वर में ऑटोचालक से कहा, 'यहाँ आसपास कोई लॉज है क्या?'
उसने गर्दन मोड़ी, आँखों से बोला - है!'
'चलो, किसी लॉज में ही चलो...।' आकाश ने नेहा को देखते हुए कहा। पर उसके तईं जैसे, कुछ घटा ही नहीं! घर हो या लॉज, उसे तो एक बाथरूम से मतलब था। जब तक वे रेस्ट करेंगे, कपड़े धो लूँगी! घर भी आ जाते और दीदी की कंचन उत्साह में नाचती तोतली आवाज में आकर बताती, 'मोंतीजी-मोंतीजी, आपते तल आ दए!' और बाहर भाग जाती जीप में खेलने। वह तब भी, जिस काम में जुती होती, उसे निबटा कर ही तैयार होती, अपना बैग उठाती। वे तब तक ऊपर के कमरे में पड़े रेस्ट करते रहते...।
लेकिन काउंटर पर आकर लेडीज रिसेप्शनिस्ट ने पूछा, 'सर! साथ में वाइफ हैं?' तो वह सकुच गई। आकाश मुस्कराकर रह गए। रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें चाबी पकड़ा दी। नेहा फिर सामान्य हो गई - दुनिया है!' पर परिस्थिति इतनी सहज नहीं थी, यह उसे रूम में आकर पता चला! बाथरूम की ओर जाने लगी तो वे हाथ पकड़ हाँफते से बोले, 'नेहा, थोड़ा तो रेस्ट कर लो! बाद में धो लेना...।'
उसने फिर भी यही सोचा कि मेरी खटपट से नींद में खलल पड़ेगा, इसलिए ऐसा बोल रहे हैं!' सफेद चादर पर बेड का किनारा पकड़ कर लेट गई। झपक जाएँगे तो खिसक लूँगी!'
लेकिन झपकने के बजाय वे उसकी ओर सरक कर कुछ बुदबुदाए जो वह सुन नहीं पाई। फिर अकस्मात बाँहों में भरकर चूमने लगे...।
उसके तईं यह कतई अप्रत्याशित घटना थी। उसका हलक सूखने लगा। न कोई गुदगुदी हुई न उत्तेजना, बल्कि डर लगने लगा। और वह रोने लगी। उसे अपनी बोल्डनेस आज सचमुच महँगी पड़ गई थी। मगर उसके ताप और स्पर्श से निरंकुश हो चुके आकाश के लिए अब खुद को रोक पाना नामुमकिन था। वे उसके आँसू पीते हुए बोले, 'पहली बार थोड़ी घबराहट होती है... डरो नहीं, प्लीज!'
तभी मानों विस्फोट हुआ। उन्हें पीछे धकेल, बैग कंधे पर टाँग वह नीचे उतर आई। फिर कुछ देर टूसीटर की प्रतीक्षा कर पैदल ही अस्पताल की राह चल पड़ी। भीतर जैसे, हडकंप मचा हुआ था।
तब कुछ देर में वे भी पीछे-पीछे आ गए। और साथ चलते हुए कातर स्वर में कहने लगे, 'नेहा-आ! प्लीज, ऐसी नादानी मत दिखाओ... तुम मेच्योर हो, पढ़ी लिखी... रिलेक्स-प्लीज!'
उनका गला भर आया था। पर उसने रुख नहीं मिलाया। न एक शब्द बोली। सामने देखती हुई गर्दन उठाए सरपट दौड़ती-सी चलती रही...।
वार्ड में आकर आकाश गैलरी में ही एक चादर बिछा कर लेट गए थे। वे उसे अब दुश्मन सूझ रहे थे। वह चाह रही थी कि किसी तरह आँखों से ओझल हो जायँ। क्यों उन्होंने एक लड़की को अपनी मर्जी की चीज समझ लिया! उसका जमीर उन्हें धिक्कार रहा था।
रात ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे के लगभग आकाश की तबीयत काफी बिगड़ गई। वे भयानक डिप्रेशन के शिकार हो रहे थे। नेहा का अस्वीकार उन्हें खाए जा रहा था। अब तक उसके पापा भी आ गए थे। आकाश ने खुद को सँभालते हुए उनके सामने ही उससे पूछा, 'अब मैं लौट जाऊँ, सुबह ड्रायवर को भेज दूँगा?'
'जैसी मर्जी।' उसने उपेक्षा से कहा।
वे अपना बैग उठा कर हर्टपेशेंट की तरह घबराहट में डूबे हुए निकल गए वार्ड से। उनके जाते ही नेहा खुद को स्वस्थ महसूस करने लगी।
पापा उनके इस तरह चले जाने को लेकर काफी चिंतित हो गए थे। उनके इस भोलेपन पर नेहा ग्लानि से गड़ी जा रही थी। क्योंकि वे पापा ही थे जो उसके लेट हो जाने पर घर के बाहर या और भी आगे कॉलोनी को जोड़ने वाले रोड की पुलिया पर रात दस दस, ग्यारह ग्यारह बजे तक बैठे मिलते। चेहरा गुस्से से तमतमाया होता, पर मुँह से एक शब्द नहीं निकालते। उस पर यकीन भी था और उसे पुरुषों के समान अवसर देने का जज्बा भी। माँ अक्सर विरोध दर्ज कराती कि वह वापसी में लेट न हुआ करे, अन्यथा यह काम छोड़ दे! उसकी हालत तब काम छोड़ देने की रही नहीं थी। जिस दिन साथ नहीं जा पाती, किसी काम में मन नहीं लगता। खाना-पीना, रहना सब कुछ उन्हीं के साथ भला लगने लगा था...।

अगले दिन जब अस्पताल में झाड़ू-पोंछा चल रहा था, ड्रायवर बाहर गैलरी में आकर खड़ा हो गया। वह एक शिष्ट लड़का, उसे दीदी कहता और मानता भी। उसने उसे मुस्करा कर आश्वस्त कर दिया। शाम तक वे लोग प्राइवेट वार्ड ले उसमें घर की तरह रहने लगे।
रात में सभी सो गए तो ड्रायवर ने उसे एक बंद लिफाफा दिया।
आकाश ने यही कहा था...।
नेहा ने सुबह तक नहीं खोला। मगर सुबह वह उसी को पढ़ने के लिए अस्पताल के पार्क में चली गई। उसका हृदय संताप से भरा हुआ था। इच्छा न रहते हुए भी उसने लिफाफा खोल लिया और उसमें रखी स्लिप निकाल कर पढ़ने लगी...।
आकाश ने लिखा था, 'मैं अपराधी हूँ। यह एक तरह का अपमान है, बल्कि स्त्री-हत्या! मगर इस पाप के लिए तुमने मुझे मानसिक रूप से तैयार कर लिया था!'
तारीखें जुदा थीं तो क्या! संयोग से दोनों का जन्मदिन एक ही महीने में पड़ता। वे अपने ग्रुप को किसी न किसी बहाने सेलिब्रेट किया करते थे। बड़े उत्साह से कार्यकर्ताओं के जन्मदिन मनाए जाते। सभी एक-दूसरे को छोटे-बड़े उपहार देते। सहभोज होता और गाना-बजाना भी। डायरी में सभी के जन्म दिनांक उन्होंने पहले से टाँक रखे थे। दिसंबर आया तो एक माकूल शुक्रवार देख आकाश ने घोषित कर दिया कि - आज दीदी का जन्मदिन मनेगा।'
- सर का भी तो!' उसने जोड़ा।
लोग मगन हो गए। जीपों में भरकर सब नदी तट पर पहुँच गए! वहीं रसोई रचाई, वहीं नाचे-गाए! सभी ने दोनों को छोटे-बड़े उपहार दिए। और आकाश ने उसे एक सुंदर सलवार सूट तो उसने उन्हें एक खूबसूरत हैट और सेविंग बॉक्स! आकाश मुस्कराने लगे, क्योंकि वे दाढ़ी नहीं बनाते थे! और वह खिसिया गई, जैसे सरेआम निमंत्रित कर रही थी!
स्लिप लिफाफे में डाल, उसे वस्त्रों में छुपा लिया। फिर एक निश्वास छोड़ उठ खड़ी हुई और वार्ड में वापस चली आई।
अपने साथ घटी इस दुर्घटना को कदाचित भूल जाती वह, लेकिन आकाश को किसी करवट चैन न था। दिन तो भागदौड़ में किसी तरह कट जाता, मगर रात उन पर भारी पड़ जाती। पत्नी ने एकाध बार पूछा भी, 'आप किसी बड़े टेंशन में हैं?' पर वे टाल गए। उन्हें लग रहा था कि बेशक वे अपने दुर्बल चरित्र के कारण इस दुर्घटना के दागी हुए हैं, पर यह उनके द्वारा प्रायोजित न थी।
जून की दुपहर में जब शार्टकट के चक्कर में ड्रायवर जीप को एक धूल भरे मैदान से निकाल रहा था। उन दो के सिवा गाड़ी में और कोई कार्यकर्ता न था। वे आगे ही ड्रायवर और उसके बीच आ बैठे थे। सूरज आसमान में, किरणें धरती पर चमक रही थीं कि अचानक टायर गड्डे में चला गया और जीप ऐसा जोर का हिचकोला खा गई कि नेहा झटके से डेशबोर्ड पर झूल गई और हड़बड़ाहट में उन्होंने हत्थे की जगह उसकी गोलाई पकड़ ली! मगर भान होते ही सकपका कर छोड़ दी और ड्रायवर पर खिसियाने लगे, कैसे चलाते हो, ऐं- ऐं?' फिर सॉरी बोलने नेहा की ओर गर्दन मोड़ी तो अचंभित रह गए, वह खिड़की की ओर मुँह किये धीरे-धीरे हँस रही थी।

तीन-चार दिन बाद वे विवश से फिर अचानक अस्पताल पहुँच गए। छोटी के पलंग और सोफे के बीच फर्श पर जो जगह खाली थी, उसी पर चटाई डाले नेहा सो रही थी। मम्मी बाथरूम के अंदर। पापा और ड्रायवर का अतापता नहीं! आकाश ने झुककर उसकी कलाई छू ली, आँखें टुक से खुल गईं। फिर देखते ही देखते उनमें चमक आ गई।
थोड़ी देर में माँ सहसा बाथरूम से निकल आई। आकाश पर नजर पड़ते ही वह रैक से परचा उठाती बोली, 'ये इंजेक्शन आसपास कहीं मिल नहीं रहा।'
परचा उन्होंने हाथ से ले लिया। उठते हुए बोले, 'चलो-नेहा! चौक पर देख लें, वहाँ तो होना चाहिए!'
वह जैसे, उपासी बैठी थी! चुन्नी बदलकर झट साथ हो ली।
बाहर निकलते ही बातें होने लगीं तो आवाज में चहक भर गई।
चौक पर स्कूटर से उतरते ही इंजेक्शन उन्हें पहली दुकान पर ही मिल गया। लेकिन आकाश उसका हाथ थाम लगभग दो फर्लांग तक पैदल चलाते हुए एक रेस्तराँ में ले गए, जहाँ दोनों ने ताजा नाश्ता करके दही की लस्सी पी। इस बीच उन्होंने बताया कि आप लोगों के चले आने से कैसी कठिनाई आ रही है! जीप तो जैसे तैसे हैंडल कर ली, पर जो महिला संगठन सुस्त पड़ रहे हैं, उन्हें सक्रिय नहीं कर पा रहे।'
उसे अस्पताल छोड़कर वे लौटने लगे तो वह अवश-सी उन्हें अकेले जाते हुए देखती रही...।

पहले उसे समझ में नहीं आता था कि वे इतने बेचैन और उद्विग्न क्यों हैं! जबकि हम यथास्थिति में मजे से जिए जा रहे हैं! लोग तीज-त्यौहारों, खेलों, प्रवचनों-कुंभों में इतने आनंदित हैं। और यह सुविधा हमें लगातार मुहैया कराई जा रही है!'
वे कहते - हमारी मूल समस्या से ध्यान हटाने की यह उनकी नीतिगत साजिश है। समाज को नशे में बनाए रखकर वे अपना उल्लू सीध कर रहे हैं।'
एक दिन मुश्किल से कटा। दूसरे दिन उसने ड्रायवर से कहा, 'तुम्हें पता है, अपने क्षेत्र में आज पर्यवेक्षक आ रहे हैं!'
'सर ने बताया तो था एक बार... पर उन्होंने मुझे यहाँ छोड़ रखा है! कोई और इंतजाम कर लिया होगा!'
'हाँ, कर लिया है,' वह मुस्कराई, 'गाड़ी खुद चलाने लगे हैं! कभी उसका गीयर निकल जाता है, कभी सेल्फ नहीं उठता... पचते रहते हैं!'
'अरे!' वह आश्चर्यचकित-सा देखता रह गया। उनके गाड़ी चलाने लगने से एक कौतूहल मिश्रित खुशी उसके भीतर नाच उठी थी। उसने कहा, 'अपन लोग चलें वहाँ! छोटी दीदी की हालत में अब तो काफी सुधर है, मम्मी-पापा हैं-ही...।'
वह जैसे इसी बात के लिए उसका मुँह जोह रही थी! पहली बार पापा से मुँह खोलकर बोली, 'आप देखते रहे हैं, हम लोगों ने कितनी मेहनत उठाई है! यही समय है, जब अच्छे से अच्छा प्रदर्शन कर हम प्रोजेक्ट को आगे ले जा सकते हैं...।'
उन्होंने बेटी की आँखों में गहराई से देखा। वहाँ शायद, आँसू उमड़ आए थे! बीड़ी का टोंटा एक ओर फेंकते धीरे से बोले, 'चली जाओ,' फिर बीबी को कसने लगे, 'इससे कहो, रात में अपने घर में आकर सोए!'
उसे बुरा लगा। सिर झुका लिया तो आँसू बरौनियों में लटक गए।
लेट होने पर माँ प्रायः बखेड़ा खड़ा कर देती थी। कभी कभार जुबानदराजी हो जाती तो राँड़, रंडो, बेशर्म कुतिया तक की उपाधि मिल जाती! मगर अगले दिन पैर फिर उठ जाते। माँ देखती, हिदायत देती रह जाती। ऐसे वक्त निकलती जब पापा घर में नहीं होते। गाड़ी समिति के दूसरे लोग मॉनीटरिंग वगैरह के लिए ले जाते तो साइकिल से ही आसपास के गाँवों में चली जाती। एक भी दिन खाली नहीं बैठती। नेहा को बच्चा बच्चा जानता। चहुँओर से नवजात पिल्लों की तरह दुम हिलाते, दौड़े चले आते! औरतों के चेहरे खिल जाते। लड़कियाँ जोर से गा उठतीं, 'देश में गर बेटियाँ मायूस और नाशाद हैं...' किसान-मजदूर सभी उत्साह से भर उठते। कोई कहता, 'बोल अरी ओ धरती बोल, राज सिंहासन डाँवाडोल!' कोई कहता, 'इसलिए राह संघर्ष की हम चुनें...' तब वह खुद भी गुनगुनाती हुई आगे बढ़ जाती, 'ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के!'

बैग में वापसी योग्य सामान ठूँसकर ड्रायवर के साथ बस में बैठ अपने नगर चली आई। भाग्य से रिक्शा आकाश की जीप से बीच राह टकरा गया। वह किलक कर अपनी जगह पर आ बैठी। ड्रायवर अपनी जगह। वे पर्यवेक्षकों की अगवानी के लिए स्टेशन जा रहे थे। नेहा को अचानक पाकर हर्षातिरेक में हाथ अपने हाथ में ले बैठे। दूसरी ओर ड्रायवर घने बाजार में चपलता से गाड़ी चला रहा था। अब वे आधे अधूरे नहीं थे। उनके स्वर में वही पहले-सी बुलंदी और दिमाग में वही तेजी मौजूद थी, जिसके बल पर कितने दिनों से एक अंतहीन बाधदौड़ दौड़ते चले आ रहे थे।
पर्यवेक्षकों को रेस्टहाउस में टिका कर वे लोग फील्ड में निकल गए और शाम तक तीन-चार गाँवों में घूम आए। कार्यकर्ता को तो उत्साह का खाद-पानी चाहिए। उन्हें पाकर वे ऐसे जोश से भर उठे कि- असेसमेंट कल हो तो अभी क्यों न हो जाए! पर वापसी में जीप एक कच्चे पहुँच मार्ग में फँस गई।
ड्रायवर गियर अदल बदल गाड़ी आगे-पीछे झुलाता रहा। हड़ गया तो इंजन बंद कर दिया।
गर्दन मोडकर नेहा ने आकाश से पूछा, 'अब?'
'कोई ट्रेक्टर मिले तो इसे खिंचवाया जाय!' वे हताश स्वर में बोले।
'गाड़ी यहीं छोडकर मेनरोड तक निकल चलें... अभी तो कोई साधन मिल जाएगा!' उसने सुझाया। तब ड्रायवर ने मोर्चा सँभाल लिया, 'सर! दीदी को लेकर आप निकल जायँ।'
बादल मढ़े थे। दिशाओं में संध्या फूल रही थी...।
कुतूहल से भरे कुदरत के नजारे निरखते कदम-कदम बढ़ ही रहे थे कि बारिश झरने लगी। फिसलन से बचने चलते-चलते एक-दूसरे का हाथ थाम लिया, दिल में झींसियाँ-सी बज उठीं। फिर पता नहीं चला, अँधेरा कब उनके कदमों से तेज चलकर आ गया!
गिरते-पड़ते वे मुहांड तक आ गए।
ऐसा तिराहा जो तीन प्रांतों को जोड़ता...। इसे दो-तीन सालों से भली-भाँति जानती थी। नीमों की बगिया के बावजूद जो अक्सर सूना रहता। जहाँ वर्षों से गड़ी पीडब्ल्यूडी की खिड़कीनुमा दरवाजे वाली रेल के डिब्बे-सी टीन की गुमटी हमेशा कौतूहल जगाती। जब भी इधर से गुजरती, भीतर झाँक लेने की जिज्ञासा प्रबल हो आती कि मजदूर इसमें कैसे रहते हैं! बारिश तेज हो आई तो उसके खिड़कीनुमा दरवाजे से होकर ही उसके भीतर ही शरण लेना पड़ी! इच्छाएँ किस तरह पूरी होती हैं, वह चकित थी।
संझा-आरती का वक्त। दूर किसी देवालय से शंख-झालर की मधुर ध्वनि आ रही थी। मुरली बजाते श्याम और उन पर मुग्ध राधा जहन में नाच उठे:
'ओह! राधा-कृष्णा का प्यार भी क्या गजब फिनोमिना है!' तिलिस्म में डूबते-उतराते आकाश ने आह-सी भरते हुए कहा।
फिर हवा के झोंकों के साथ पानी की तेज बौछार भी भीतर आने लगी तो गुमटी का वह खिड़कीनुमा द्वार भी बंद करना पड़ा। और अँधेरे के बावजूद एहतियातन वह कुछ हटकर खड़ी हो गई। मगर कुछ देर में अचानक जोर की बिजली कड़की तो 'ओ-मम्मीऽऽऽ!' कह वह उनसे चिपक गई! कौंध तो वे भी गए मगर इस अप्रत्याशित खुशी से दिल बल्लियों उछलने लगा। काँपती पीठ पर हाथ फेरते देर तक हँसते रहे, 'तुम भी क्या... बच्चियों की तरह डर जाती हो...' और तब धीरे-धीरे सामान्य हो वह भी हँसने लगी। गुमटी पर बजता बूँदों का संगीत दिलों के भीतर उतर आया! मगर उसमें डूबने से पहले ही दूर से आती किसी वाहन की घरघराहट सुन वे गुमटी से बाहर आ गए। जहाँ से ट्रक में चढ़कर शहर...।
लगता था ट्रक ड्रायवर या शायद क्लीनर ने जिसकी अभी मसें ही भीग रही थीं, उसे देखकर ही लिफ्ट दी थी! सड़क से बार-बार नजरें हटाकर वह इधर ही टिका लेता जहाँ वोनट के पार वह भीगी हुई बैठी थी! आकाश उसके भोलेपन पर रह-रहकर मुस्करा लेते, जिसे यह खबर नहीं कि नेहा छबीस की हो गई है!

ट्रक से नाके पर उतर ऑटो में बिठा वे उसे अपने घर ले आए। अब से पहले रात में वह कभी उनके घर नहीं गई थी। कपड़े गंदे हो रहे थे और उनमें अस्पताल की बू भरी थी। झिझकते-झिझकते उनकी पत्नी से लेकर बदल लिए। आकाश की नजर पड़ी तो अनायास मुस्करा पड़ी कि आप इन्हीं में तो देखना चाहते थे - हमें! फिर वे बेड पर ही खाने के लिए बैठ गए। आकाश ने अखबार बिछाते हुए कहा, 'यह रहा हमारा दस्तरख्वान!'
नेहा मुस्कराती रही...।
सुजाता प्रसन्नता के साथ खिला रही थी। वह छत्तीस-सैंतीस साल की खाई-अघाई औरत, जिसकी एक बेटी, एक बेटा था। बेटा किशोर और बेटी वयःसंधि काल में प्रवेश करती हुई। और वह स्वयं एक कुशल गृहिणी। जिसका शौहर पेशे से वकील और ख्यातनाम सामाजिक कार्यकर्ता। घर-गृहस्थी और बच्चों को सपेरने में पता ही नहीं चल रहा था कि मियाँ जी हाथ से निकल रहे हैं! फिर भी छठी इन्द्रिय की प्रेरणा से इम्तिहान-सा लेते हुए पूछा, 'अच्छा नेहा, बताओ - काहे की सब्जी है?'
उसने एक क्षण सोचा और किसी प्रायमरी स्टूडेंट-सी सशंकित स्वर में बोली, 'चौल्लेइया की...!'
'तुम कभी धोखा नहीं खा सकतीं।' मुस्कराते हुए उसकी आँखें चमकने लगीं। और वह पापा की हिदायत भूल गई कि रात में अपने घर से बाहर नहीं सोना!
सुबह वे उससे पहले उठकर फील्ड में निकल गए, तब कहीं अपने घर पहुँची! बरसात अभी थमी नहीं थी। पर जाने क्या सूझा कि - सारे फर्श झाड़पोंड डाले! ढेर सारे कपड़े भिगो लिए... बेडसीट्स, चादरें, मेजपोश, कुर्सियों के कुशन और खिड़की, दरवाजों के परदे तक नहीं छोड़े! माँ होती तो कहती, 'जिस काम के पीछे पड़ती है, हाथ धोकर पड़ जाती है!'
माँ को क्या पता, उसे तो सबकुछ अच्छा लगने लगा था। अच्छा आज से नहीं, पिछली सारी ऋतुओं से। चिलचिलाती धूप में जब चैसिस आग हो जाती, इंजन धुआँ उगल उठता, आकाश से सटकर वह पसीने से ठंडक पा लेती...। इतनी बेरुखी बरतने के बाद भी उनका फिर से अस्पताल जा पहुँचना - जगाना, हाथ पकड़ घुमाना, घर ले जाना, साथ खिलाना, सुलाना... सब कुछ कितना सुखद! एक जादुई यथार्थ। जिसमें विचरण की वह आदी हो गई है! कैसे संभव है उससे निकल पाना! जिस दिन साथ नहीं मिलता, मानों पगला जाती! कुछ भी अच्छा नहीं लगता, किसी काम में दिल नहीं लगता!

पर्यवेक्षकों ने मेप ले लिया था। वे अपनी मरजी से कुछ अनाम केंद्रों पर पहुँचने वाले थे। दुपहर तक एक अन्य जीप आ गई और वह ड्रायवर के साथ फील्ड में निकल गई। पर्यवेक्षण के आतंक में सौ फीसदी केंद्रों को सजग करना था।
रात नौ-दस बजे तक वे सब लगाम खींचे घोड़ों की तरह लगातार दौड़ते रहे। मगर काम से पर्यवेक्षक इतने प्रभावित हुए कि सबके सामने ही आकाश का हाथ अपने हाथ में लेकर बोले, 'प्रोजेक्ट की सफलता के लिए हमें पूरे देश में आप सरीखे वॉलंटियर्स चाहिए!'
- अरे!' उसके तो हाथपाँव ही फूल गए! आँखों में खुशी के आँसू छलक पड़े।
वे उसे आकाश से भी अधिक महत्व दे रहे थे... क्योंकि असेसमेंट के दौरान ही एक ग्रामीण ने बड़ा अटपटा प्रश्न खड़ा कर दिया था कि - हमारे मौजे का रकबा इतना कम क्यों होता जा रहा है?'
और वह अड़ गया कि - हमें परियोजना नहीं जमीन चाहिए, पानी और बिजली चाहिए!'
जाहिर है, वे राजनैतिक नहीं थे जो कोरे वायदे कर जाते... हकला गए बेचारे! आकाश ने उसे समझाना चाहा तो मुँहजोरी होने लगी। विरोध में कई स्वर उठ खड़े हुए। तब उसने बीच में कूदकर सभा में एक ऐसा प्रतिप्रश्न खड़ा कर दिया कि सबके मुँह सिल गए।
उसने कहा था - आपकी जमीनें कोई और नहीं हमारी जनसंख्या निगल रही है! बस्तियाँ बढ़ती जा रही हैं... गाँव से जुड़ा एक छोटा-सा उद्योग ईंट भट्टा ही कितने खेतों की उपजाऊ मिट्टी हड़प लेता है! परिवार के विस्तार से ही जरूरतें सुरसा का मुख हो गई हैं जिनकी पूर्ति के लिए खुद आप लोग ही हरे वृक्ष काटने को मजबूर हैं। फिर पानी क्यों बरसेगा, नहरें और कुएँ कहाँ से भरेंगे। जरा सोचें, बिना जागरूकता के यह नियंत्रण संभव है! अशिक्षा के कारण ही सारी दुर्गति है, फिर आप जाने... पर आप क्यों जानें? आप तो प्रकृति और सरकार पर निर्भर हो गए हैं...!'
आवेश के कारण चेहरा लाल पड़ गया था। सभा में सन्नाटा खिंच गया।
वापसी में पर्यवेक्षक उसे अपनी कार में बिठाना चाह रहे थे। उन्होंने उत्साहित भी किया कि - प्रोजेक्ट के बारे वह उन्हें अपने अनुभव सुनाए तो वे दीगर क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को लाभान्वित कर सकेंगे!' ऐसी बातों से आत्मविश्वास काफी बढ़ गया था। पर अपने सर को छोड़कर इस वक्त वह कहीं जाना नहीं चाहती थी।
पर्यवेक्षकों की रवानगी के बाद वे केंद्र प्रमुख के यहाँ भोजन के लिए गए। जहाँ कम से कम आधे गाँव की औरतों ने घेर लिया उसे! इतनी उत्साहित कि आने न दें, रतजगा करने पर आमादा! उसे भी कुछ ऐसी भावुकता ने घेर लिया कि उसी घर में पनाह ढूँढ़ने लगी। इच्छा हो रही थी कि आकाश के साथ रात भर यहीं रहकर जश्न मनाए! जैसे, जीत का सेहरा उनके सिर बाँधना चाहती थी या उनसे अपने सिर बँधवा लेना चाहती थी आज! मगर जीप स्टार्ट हो गई और वह अपनी जगह पर आ बैठी। हृदय की उमंग उसके भीतर ही दफ्न हो रही। उसने निराशा में भरकर कहा, 'अब तो हमें उनके निर्देशन में यह आंदोलन चलाना पड़ेगा!'
'और-क्या!' वे कुछ और सोच रहे थे।
'फिर आपके परिवर्तनकामी सोच का क्या होगा?' उसने टोह ली। उनका लक्ष्य कुछ और ही था। वे हमेशा विद्रोह की बातें करते थे।
'हम वही करेंगे...' उनकी आँखें हँस रही थीं।
उसने उन जैसा आत्मविश्वासी व्यक्ति नहीं देखा...। शनैः शनैः कंधे से टिक गई तो, बाँह उन्होंने गले में डाल ली! जंगल के सफर में अंतरिक्ष की यात्रा-सा एहसास होने लगा! जी में आ रहा था, यह सफ़र कभी बीते नहीं। मगर नदी-पुल पर आकर इंजन यकायक गड़गड़ा उठा।
ड्रायवर ब्रेक लेकर बोला, 'सर! गाड़ी गरम हो रही है...'
- क्या!' वह यकायक चौंक गई। वोनट से तेज भाप निकल रही थी! एक क्षण के भीतर रात और जंगल का भय मन के भीतर भर गया। एक बार इसी तरह चेंबर कहीं टकरा गया था... ऑयल निकल गया और फिर इंजन सीज!
'बंद मत कर देना,' आकाश बौखला रहे थे, 'स्टार्ट नहीं होगी, फँस जाएँगे! तुमने ध्यान नहीं दिया, रेडिएटर लीक था!!'
'नईं-सर! वो बात नहीं है, कूलेंट गिर गया है।' उसने उतर कर वोनट खोल दिया और बोतल से पानी उँड़ेलने लगा।
थोड़ी देर में चल पड़ा तो आकाश धैर्यपूर्वक कहने लगे, 'दस मिनट और खींचों जैसे तैसे, पहले तुम्हारा ही घर पड़ेगा, वहीं रोक लेना, हम लोग पैदल निकल जाएँगे।'
नेहा ने घड़ी देखी। अलबत्ता, ऑटो रिक्शा भी नहीं मिलेगा! फिर ध्यान इंजन की ध्वनि पर केंद्रित हो गया। पहले जब सीज हो गया था, आकाश को बारह हजार भरने पड़े। उस रात वह साढ़े तीन बजे घर पहुँची। मन हजार कुशंकाओं में फँस गया। बीच में फिर एक-दो बार भाप तेजी से उठी तो जीप रोक पानी उँड़ेला उसने... गनीमत थी पहुँच गए। शहर में घुसते ही आकाश ने पंजा दाईं ओर मोड़ गाड़ी ड्रायवर के कमरे की ओर मुड़वा दी। थोड़ी देर में वह रूम के आगे इंजन बंद कर पूछने लगा, 'स-र! साइकिल निकाल दूँ?'
उन्होंने एक पल सोचा और हाँ में सिर हिला दिया। और वह खुशी में नहाया साइकिल निकाल लाया तो वे पैडल पर पाँव रखकर सीट पर बैठ गए, नेहा जंप लेकर कैरियर पर।

इस तरह बचपन में पापा और भैया के साथ जाया करती थी...। राह में गश्त के सिपाही मिले, वे भी कुछ नहीं बोले। उस वक्त वे सचमुच फैमिली मेंबर ही लग रहे थे। तभी तो घर आकर उसने ताला खोला तो साइकिल उन्होंने अंदर गलियारे में लाकर रख ली! और वह उजबक-सी खड़ी रह गई तो गेट खुद ही जाकर बन्द कर आये!
दिल धड़कने लगा।
देर से रुकी थी, सीधी बाथरूम के अंदर चली गर्इ। घर में इस छोर से उस तक एक चिडिया न थी, जिसकी आड़ ले लेती! उसने सोचा जरूर कि दो पल एकांत के मिल जायँ और मैं बधार्इ दे लूँ! पर इतना अरण्य एकांत और क्षणों का अम्बार... यह तो कुन्ती जैसा आह्वान हो गया! देर बाद भीगी बिल्ली बनी जैसेतैसे निकली, साइकिलिंग की वजह से पसीने से लथपथ वे शर्ट के बटन खोले पंखे के नीचे बैठे मिले!
नजरें मिलीं तो उठकर करीब आ गए!
घर सख्त हो आया था तब उसने ताजिए के नीचे से निकल कर मुराद माँगी थी। साथ के लिए, सिर्फ साथ के लिए! तब उसे खबर नहीं थी कि मुहब्बत इतनी विचित्र शह है! लाख घबराहट के बावजूद मुस्करा पड़ी, ''कान्ग्रेच्युलेशंस आन योर सक्सैस!“
''ओह! सेम-टु-यू!!” वे गहरे भावावेश में फुसफुसाए। फिर अचानक चेहरा हथेलियों में भर ओठ ओठों पर रख दिये!
''आऽकाऽश!”
उसका स्वर भहरा गया। जैसे, होश में नहीं थी। उसने कभी उन्हें नाम से नहीं बुलाया। हमेशा सर या भार्इसाब! वे दो पल यूँ ही बाँधे रहे, जिनमें बीती बरसातें, सर्दियाँ, गर्मियाँ, माँ की जलीकटी बातें और पापा का तमतमाया चेहरा सब बिला गया...।
घड़ी की टिकटिक दिल की धडकन से हारने लगी तब ओठ ओठों से छुड़ाकर बमुश्किल कहा उसने, ''दो बज गए!”
और वे सहमे से स्वर में पूछने लगे, 'मे आइ गो...?' तो दिल घायल परिंदे-सा तड़पने लगा।
मगर यथार्थ से भयभीत उन आखिरी लम्हों में भी वह उनसे बचने की कोशिश कर रही थी, 'आप उनसे दूर जा रहे हैं...'
'किससे...?'
नजरें उठाकर वह मुस्कराने लगी, 'भाभीजी से।'
निश्वास छूट गया।
रात सघन एकांत के दौर से गुजर रही थी। काँधे में सिर दे वे सुबकते से बोले, 'नेहा-आ! मुझे पता नहीं, यह सब क्या है... पर लगता है, तुम नहीं मिलीं तो अब बचूँगा नहीं!'
सुनकर भावुक हो आर्इ वह, सिर उनके सीने में दे लिया, 'तुम निरे बच्चे हो, आ-का-श!'
फिर पता नहीं चला कि लटें चूमते-चूमते, वे कब एन माँ के पलंग पर ले आए:
'तुमने सचमुच कर दिखाया।'
- ओह! वे गोलाइयाँ थामे जीत का सेहरा बाँध रहे थे!
'और किसी की सामर्थ्य नहीं थी...'
'क्यूँ...ऽ'
'और कोई था ही नहीं!'

सुबह जब चिड़ियाँ बोल रही थीं, वे पीसफुली सो रहे थे। और वह थकान और जगार से उनींदी बिस्तर में एक अप्रतिम सुख से सराबोर सोच रही थी कि अब शायद वह एक ऐसी स्त्री बन जाय जो उनसे संबंध बनाए रखकर भी अपने परिवार में बनी रहे। अपनी संतान को अपने नाम से चीन्हे जाने के लिए संघर्ष करे। शायद उसे सफलता मिले! परिस्थिति-वश एक सामाजिक क्रांति के बीज उसके मन में उपज रहे थे। और फूल से खिले चेहरे में तमाम पौराणिक स्त्रियों के चेहरे आ मिले थे...।
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(7) प्यार का प्रेत


आबू से लौटकर नींद उड़ गई थी। यात्रा इतनी गहरी पैठ गई थी जे़हन में कि निकाले नहीं निकलती। वे थोडे़ से दिन पूरी उम्र पर छा गए थे। स्त्री-पुरुष मैत्री, जो प्राण-प्राणों में उतर जाने पर तुल जाय और प्यार कहलाये, ऐसा प्यार मुझे पहली बार हुआ था!
बेचैनी के आलम में तीन-चार दिन बाद फोन मिलाया, कहा, ‘‘नौ बजे सेंट्रल लाइब्रेरी में मिलो।’’
मुलाक़ात छह-सात वर्ष पुरानी थी। पहले मैथ्स और इंग्लिश पढ़ाता था उसे। फिर केमिस्ट्री और बॉयोलाजी पढ़ाने लगा। संयोग से उसके शैक्षिक उत्थान के साथ ही मैं भी इंटर कॉलेज से पी.जी. कॉलेज तक के अध्यापन सफ़र पर पहुंचा। जननेंद्रियों के क्रियाकलाप समझाता तो उसकी बॉडी की केमिस्ट्री बदल जाती... ।
‘‘क्या लिखवाना है, सर!’’ वह आ गई। मगर साथ में अपनी बेस्ट फ्रैंड शहनाज को भी ले आई! कुछ सूझा नहीं। अजीब-सी घबराहट होने लगी। पुराने अख़बारों का बन्च उठा कर बनावटी व्यस्तता दिखाने लगा। थोड़ी देर में शहनाज बोर होने लगी, ‘‘तू रुक, मैं चलती हूं...’’ वह बेबसी में मुस्करायी। मैंने कनखियों से देखा, ‘‘सर-नमस्ते!’’ बोल कर वह चली गई।
‘‘उसे बुलाया था-क्या,’’ मैं ख़ीजा, ‘‘क्या सोचेगी...’’
-कुछ नही...।’ उसने न में गर्दन हिलायी, मुस्कान बरकरार थी।
‘‘तुमने कुछ बता तो नहीं दिया इसे!’’ मैं तनावग्रस्त हो गया।
-कहीं और चलें...?' उसने आँखों से पूछा।
‘‘नहींऽ!’’ मैं बौखला गया।
जरा-सी मिसअण्डरस्टेंडिंग के कारण अच्छा-भला मूड बिगड़ गया था।
यह सच है कि शुरूआत अचानक नहीं होती...। कुछ साल पहले तक मैं अकेला ही रहता था। तब कोचिंग सेंटर ही मेरा घर हुआ करता। कॉलेज और कोचिंग सेंटर बस दो ही स्थान थे शहर भर में जहां मुझे पाया जा सकता था। इसी कारण धीरे-धीरे उसे वहम हो गया कि मैं अविवाहित हूं। फिर भले पैतृक सम्पत्ति के बंटवारे के बाद मैंने भी शहर में अपना एक छोटा-सा घर बना लिया और परिवार के साथ रहने लगा। पर गलतफहमी-वश जो चाहना बन गई थी, वह बरकरार रही...।
कॉलेज का वार्षिक टूर माउन्ट आबू के लिए प्रस्तावित हुआ। मैंने लिस्ट बनाई तो दर्शन का नाम सबसे पहले आया...।
पहला पड़ाव जयपुर। बस होटल परिसर में जाकर ठहर गई। दो हॉल बुक करा लिए थे। एक में लड़के और उनके क्लास टीचर शिफ्ट हो गए, दूसरे में लड़कियां और उनके क्लास टीचर। हालांकि मैं लड़कियों का ही क्लास टीचर था, किंतु मेल सेक्शन में ठहरा। बीच-बीच में अपनी क्लास की लड़कियों की व्यवस्था देखने जाता रहा।
जयपुर हम दो दिन रहे। ‘हवामहल’ और ‘जंतरमंतर’ देख कर वह पागल हो गई थी। वहां की मशहूर राजमंदिर में हमने नई ‘देवदास’ भी देखी। ‘जलमहल’ और ‘गल्ता’ झील ने उसे इतना आकर्षित किया कि उसकी वह इच्छा मुझे माउन्ट आबू में पूरी करना पड़ी, जब मैंने उसे ’नक्की’ झील में बोटिंग कराई...। शायद, एक साथ ‘देवदास’ देख कर ही हम इतने घुलमिल गये कि फिर आगे का सफ़र बस में उसने मेरी बग़ल में ही तय किया...।
वह टू-बाई-टू सीटर एक डीलक्स बस थी। इतनी आरामदेह कि जरा भी जर्क न लगे, सीट्स बेड की तरह खुल जायं। रात्रि में तो दो -दो सीटों के कूपे-से बन जाते...।
और उस रात पेड़ों पर चढ़े भीलों ने बस पर पत्थरों से हमला कर दिया तो, वह चीख कर मेरे गले में लिपट गई!
मैं अपने भाग्य पर फूला नहीं समा रहा था। मुझमें एक गजब तेज़ी, अमित ऊर्जा और नवोत्साह का संचार हो उठा था। न टीचर्स को शक़ था, न छात्र समुदाय को। तब शक़ सरीखा कुछ था भी नहीं। वह स्टूडेंट थी, मैं टीचर। मगर हमारे बीच गुरु-शिष्या का वह पारंपरिक रिश्ता आबू में ‘काकाकाकी’ हनीमून पॉइंट पर आकर अचानक भावुकता में बदल गया...।
और वह शुरूआत दर्शन ने की।
वही उस दिन होटल से शौक़िया साड़ी बांध कर चली...। नज़र बचा कर मुझे उस दिलकश चट्टान के पीछे ले गई जहां इस जहान से दूर एक नई दुनिया में मदहोश कईएक जवां दिल आपस में मशगूल थे। हमारे कॉलेज का और परिचित कोई चेहरा न था।
‘‘बताइये सर, साड़ी में कैसी लगती हूं?’’ उसके ओठों पर जो बात देर से थी, फूटी।
‘‘बुरा तो नहीं मानोगी?’’ मैं मुस्कराया।
‘‘नहीं बतायेंगे तो ज़रूर मानूंगी...।’’
‘‘एकदम फिट लगती हो...’’ मैंने अपने मन की बात कह दी। ऐसे, जैसे, सलमान खान ने प्रियंका चोपड़ा से पूछ लिया कि मुझसे शादी करोगी!
दर्शन चहक कर सीने से लग गई, ‘ओऽसर!’
और मैं घबरा गया, यह क्या हुआ...? मेरी बीबी है, एक बेटी भी! मैं तो बस, मज़े के लिए चुहल किया करता था। और आजकल तो यह भी ऐजुकेशन का पार्ट है। सेक्स फीलिंग्स को उभारना, फिर पूरी मैच्योरिटी के साथ उन जिज्ञासाओं का समाधान।
उसके चेहरे पर अनार फूट गया था, आंखें बिल्लौरी हो आई थीं! खैर। समय के साथ यह नादानी दूर हो जायेगी। तब मैंने सोचा था...। लेकिन सोचने और होने में ज़मीनोआसमान का फ़र्क़ हुआ करता है। मेरी केमिस्ट्री उसकी उपस्थिति में बदलने लगी थी। निर्जन में साथ रहना अच्छा लगने लगा था। दिलचस्पी हमारी न म्यूजियम में थी, न पिता श्री की समाधि अथवा नंदी अचलगढ़ और अम्बा देवी मंदिर में- क्योंकि भीड़ का एक रैला हरदम साथ होता। पर आबू की गुफाएं और टॉडरॉक, गुरुशिखर हमें खींचते थे। जहां एकान्त में एक-दूसरे का हाथ थाम चल पाते...। वही आनंद और उल्लास का विषय था। शेष सब गौण! दिल में हरदम एक मिठास सी घुली रहती।

कई रोज़ बाद एक रोज़ लाइब्रेरी हॉल से निकल कर अनजाने में ही हम उस बस में आ बैठे, जो उधर से गुजरती थी, जिधर से गुजरने पर खिड़की से हमेशा दिखता था एक डाक बंगला। नदी किनारे टीले पर अकेली खड़ी इमारत। वह जैसे बुलाती थी। मगर कोई जाता नहीं था।
मेरे जे़हन में अर्से से वही एक ऐसी जगह थी आसपास की जानी-पहचानी सारी जगहों में, जहां हम जा सकते थे...।
नदी-पुल पर बस टोलटैक्स गुमटी पर रुकी तो मैंने आंख के इशारे से कहा, ‘चलो, इसे भी देख लें!’
वह हँसती आँखों से उठ खड़ी हुई। बस चली गई तब हमने पुल के छोर से उस डाक बंगले को पीछे से नज़र भरकर देखा जो टीले पर खड़ा गर्दन मोड़ हमें भी देख रहा था। दोनों के बीच एक पगडण्डी थी। जोश में चढ़ने लगे। बीच-बीच में एक-दूसरे को मुस्करा कर निरख लेते, गोया डेटिंग पर हों!
ऊपर जाकर खुशी और बढ़ गई...। क्योंकि उसके आगे की सड़क टूटी-फूटी थी और उस उजाड़ रेस्ट हाउस में उस वक़्त हमारे सिवा कोई और न था! सो गलियारे में चढ़ कर एक कमरे में दाखिल हो गए मगर सोफा, बेड सब टूटे मिले। उन पर इतनी धूल अँटी थी कि बैठने पर कपड़े धूल से भर जाते। मीटिंग और डाइनिंग हॉल में भी कमर टिकाने बालिश्त भर जगह न मिली। सोचा, सोफा-कुर्सी के बजाय एक टेबिल साफ कर दो क्षण बैठ लें। इस प्रयास में उसने अपना रूमाल भी गंदा कर लिया...। और मैंने दरवाजा भेड़ कर सिटकनी खोजी तो उखड़ी मिली! फिर हमने बारी-बारी सभी किवाड़ों में सिटकनी ढूंढी, एक भी साबूत नहीं! तोड़ दी गई थीं। क्यों? हमें डर-सा लगा। रसोई में पहुंचे तो अधजली लकड़ियां और कुछ जूठन-सी बिखरी मिली। ...कहीं डकैत तो यहां आकर रसोई नहीं रचाते!’ आशंका-वश डर और बढ़ गया। और हम लुढ़क कर चलते-से कछार में आ गये...।
नदी पार टीले पर मंदिर का ध्वज लहरा रहा था। मैंने कहा, ‘‘वहां चलते है...।’’
‘‘फिर पुल की ओर क्यों चलें,’’ वह सोच कर बोली, "यहां नदी पांज (उथली) होगी!’’
-शायद हो! बीच-बीच में रेत चमक रहा था।' मैं धँसने लगा। पीछे वह भी। धार तेज थी मगर घुटनों तक रही। मंझधार में आकर हमने एक-दूसरे के बाजू थाम लिए ऐहतियातन। फिर किनारे तक उसी भांति चले आये। फिर मेरी हाथ छुड़ाने की इच्छा नहीं हुई। ...और सटने की होने लगी। उसने भी हाथ छुड़ाया नहीं।
मगर मंदिर वाले टीले पर आकर पता चला कि वह निर्जन नहीं है! वहां एक साधु अपना भोजन पका रहा था। हम लोगों को देखते ही बोला, ‘‘परसादी ग्रहण करोगे?’’
‘‘नही...।’’ हमने एक साथ कहा।
बोला, ‘‘बग़ल में गुफा है- जाओ देख लो!’’
‘‘गुफा?’’
‘‘ऊपर मंदिर है, दर्शन कर लो जाके...’’
‘‘हां- वो तो हैं!’’ हमने कहा।
‘‘तो! और किसी काम से आये हो...’’ उसकी आँखें चमक रही थीं।
‘‘नहीं, गुफा का पता नहीं था...’’ दर्शन ने बात संभाली।
‘‘गुफा तो प्रसिद्ध है...दूर-दूर के लोग आते है...।’’ उसने आले से टॉर्च उठा कर दी, ‘‘देखो तो आप जाके!’’
मेरा दिल धड़कने लगा...। जो एकान्त और सुरक्षा चाहता था आखिर वही तो ईश्वर ने बख्श दी! मगर दर्शन के चेहरे पर रसोई रचते साधु की तलवार लटक रही थी। उसने इशारे से मना कर दिया।
आलमारी में एक धुंधला-सा बोर्ड पड़ा था। मैंने साधु की गृहस्थी खिसका कर इबारत पढ़ी, ‘संस्कृत विद्यालय’!
‘‘अरे!’’
‘‘हां- पहले किसी ज़माने में चलता था। उस कोठरी में आज भी कुछ पुस्तकें रखी है...।’’ बाबा ने सामने की ओर इशारा किया।
मैं उठ कर चल दिया। पीछे दर्शन भी। किवाड़ों की सांकल उतार कर धूल-जाले से अँटी किताबें पलटीं। पीले, मोटे छापे के पन्ने। अजीब-सी स्मैल से भरे हुए। दीमक चाट गई थी बहुत कुछ। दो किताबें छांट लीं। ‘पार्वती मंगल’ और ‘चार्वाक संहिता’।
साधु ने फिर कहा, ‘‘भोजन का समय हो चुका है, अब तो भूख भी लगी होगी...।’’
दर्शन मुस्करायी, अर्थात् हां!
रोटियों की गंध ने मेरी भी क्षुधा जाग्रत कर दी थी।
‘‘ठीक है, पा लेंगे।’’ मैंने कहा।
साधु थाली में और थोड़ा-सा आटा निकाल कर गूंथने लगा, ‘‘सब्जी तो सैली है, चार टिक्कर और लगाए देता हूंं...यहां तो कोई न कोई मूर्ति आती ही रहती है।’’
फिर वह थाली सजा कर बोला, ‘‘मैं जाकर भोग लगाता हूं तब तक थोड़ा-सा आटा है, तुम सेंक लोगी?’’ उसने दर्शन से पूछा।
‘‘बिल्कुल!’’ वह खुशी से भर गई।
‘‘फिर ठीक है...’’ कह कर वह मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगा।
दर्शन लकड़ी के चूल्हे पर रखे तिरछे तवे को चिमटे से ठीक कर, उकड़ूं बैठ, थाली से आटा तोड़ लोई बनाने लगी। कुरता समेट कर उसने अपनी जांघों में दबा लिया था। मैं उसे अचरज से निहारता वहीं पत्थर की बैंच पर बैठ गया।
पहली किताब पलटी। बीच में एक पन्ने पर नज़र ठहर गई। श्लोक था- बिल्वस्तनी कोमलिता सुशीला सुगंधकुंता ललिता च गौरा। नालिंगतो येन च कंठदेशे वृथागतः तस्य नरस्य जीवनम्।
नज़रें दर्शन की ओर उठ गईं और मैं कल्पना करने लगा कि उसके स्तन सचमुच बेल सदृश चिकने होंगे! वह कितनी कोमल और सुशील है और गोरी भी! करीब होती है तो देह से उठती भीनी सुगंध जो कि कमल पुष्प-सी प्रतीत होती है, मुझे मदहोश कर देती है। सचमुच इसे गले से लगा कर आलिंगनबद्ध न करके मैंने अपना नर जन्म वृथा गंवा दिया है...।
दर्शन ने हाथ से ठोक कर टिक्कर तवे पर डाल दिया था। मैंने निश्वास छोड़ कर किताब फिर खोली, श्लोक था- पीनस्तनी पक्वबिम्बाधरोष्ठा प्रसन्नवक्त्रा मृदुभाषणीया। नोसेवितो येन भुजंगवेणी वृथागतः तस्य नरस्य जीवनम्।
और मैंने नज़रें उठा कर फिर पुष्टि की...। पुष्ट स्तन अभी दुपट्टे के पीछे छुपे हैं पर पके कुंदरू से ओष्ठ तो रूबरू हैं! उसका प्रसन्नता से चहकना और मधुर संभाषण तो मैंने सुना है! ओह! इस काले सर्प-सी चोटी वाली रमणी का सेवन न कर मैंने अपना नर-जन्म व्यर्थ गंवा दिया है!
उसने मंद-मंद मुस्कराते हुए रसोई समेटनी शुरू कर दी थी। मैंने अगला श्लोक पढ़ा- चलत्कटि नूपुरमंजुघोषा नासाग्रमुक्ता नयनाभिरामा। नोचुम्बितो येन सुनाभिदेशे वृथागतः तस्य नरस्य जीवनम्।
मेरे कानों में घंटियां-सी बज रही थीं। क्या सचमुच उसके चलने-फिरने से करघनी और नूपुर मधुर ध्वनि कर रहे थे! उसकी नाक की लोंग मुझे चकित कर रही थी! तब तो उसके सुंदर नाभि-खण्ड को न चूम कर मैंने अपना मनुष्य-जन्म सचमुच ही गंवा दिया...।
‘‘क्या पढ़ लिया जो इतने डूब गये?’’ वह सम्मुख थी।
‘‘चार्वाक संहिता।’’
‘‘अरे! ऐसा क्या लिखा है उसने?’’
‘‘सिर्फ लिखा नहीं, तुम्हें हू-ब-हू उतार दिया है...’’
वह एक खास अदा से मुस्करायी और खाना परोसने लगी। थोड़ी देर में साधु भी भोग लगा कर लौट आया। मैंने जीवन में पहली बार इतना स्वादिष्ट खाना खाया। दर्शन ने भी सब्जी और टिक्करों की बहुत तारीफ की। साधु बच्चों और गृहणियों की तरह खुश हुआ...।
खाने के बाद हम लोेगों ने अपने-अपने बर्तन मांजे-धोये। मेरे तईं यह भी पहला अनुभव था। फ़ारिग हुए तो साधु बोला, ‘‘आप ईश्वर को नहीं मानते?’’
‘‘किसने कहा?’’ मुझे झटका-सा लगा। मैं जन्मजात पुरोहित!
‘‘तो मूर्ति में श्रद्धा नहीं है...’’
‘‘नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। हम तो मंदिर के ध्वज से ही प्रेरित होकर यहां आये! पर गुफा वर्णन, विद्यालय दर्शन फिर भोजन...। मूर्ति दर्शन का अवकाश ही नहीं मिल पाया।’’
‘‘अब चलते है...।’’ दर्शन ने उत्साह से कहा।
बाबा तख़्त पर आराम करने लगा। मैं दर्शन के पीछे मंदिर की चौड़ी सीढ़ियां चढ़ने लगा। 'पार्वती मंगल’ लेना चाहता था ताकि एकान्त में उसे वे श्लोक सुनाऊं! किंतु धोखे से ‘चार्वाक संहिता’ उठा लाया। बहरहाल, सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते पन्ने पलटे तो अचानक एक श्लोक पर नज़र ठहर कर रह गई। दर्शन ने बांह से टिक कर पूछा, ‘‘अब क्या मिल गया?’’
‘‘ऊपर बैठ कर बांचेंगे।’’ मैंने उंगली लगा कर किताब बंद कर ली।
शिला-खण्ड में उत्कीर्ण वहां हनुमान जी की विशाल प्रतिमा थी। उसमें सिर्फ उदर और मुख दर्शाया गया था। न हाथ-पैर, न गदा और न द्रोणागिर।
दर्शन ने अपना सिर मेरे कंधे से सटा लिया था। प्रार्थनारत् हम थोड़ी देर यों ही खड़े रहे। मेरा दिल धड़क रहा था और शायद, उसका भी। मैंने मन ही मन देवता से कहा कि आप मुझे माफ़ करें। मेरा चित्त आपकी भक्ति में न होकर इस रमणी में रमा हुआ है। यद्यपि ब्रह्मा ने कहा है- पुरुषं सुवेशम् दृष्ट्वा भ्रातरम् यदिवासुतम। योनिःक्लीद्यति नारिणाम् सत्यम्-सत्यम् हिनारद।’ पर मैं तो यह अनुभव कर रहा हूं कि इस नवयौवना को एकान्त में पाकर स्पर्श और संभोग की कल्पना से स्वयं मेरा बुरा हाल है!
दर्शन ने मुख उठा कर मुझ पर एक बेधक-सी नज़र डाली और परिक्रमा हेतु बायीं ओर घूम गई। मैंने तुरंत उसका अनुसरण किया। किताब मेरे हाथ में थी। मूर्ति के पीछे जाकर वह ठिठकी। मैंने उससे सट कर किताब खोल ली। उंगली उसी श्लोक पर लगी थी, जिसने इतना उत्तेजित कर दिया था।
‘‘क्या लिखा है?’’ वह फुसफुसायी।
जालियों से पर्याप्त रोशनी आ रही थी। मगर श्लोक पढ़ने से पहले ही मैं हांफ गया। मैंने उसे दर्शन की ओर बढ़ा दिया! वह अटक-अटक कर पढ़ने लगी, ‘जघ...नन्त...राले विमले...विशाले अधो...मुखी रोम बने बसंती। सापा...तु देवीम् भगनाम ध्येयो दन्तम बिना चर्बति चर्मदण्डा...ह।’ फिर चेहरा उठा कर गोया इन्नोसेंटली पूछा, ‘‘मतलब?’’
और मैं कमर में हाथ डाल रहस्यमय ढंग से मुस्कराया, "इतनी संस्कृत तो आती होगी!"
"नहीं ना, बताओ ना किसकी स्तुति है?" चमचमाती आँखें पूछ रही थीं। तब कान से मुँह लगा फुसफुसाते मैंने बताया कि, ‘‘स्तुति-प्रार्थना नहीं, description है...ऋषि ने Inter course की Details दी है!"
"धत!" चेहरा लाल पड़ गया। और मैंने लोहा गर्म समझ कमर बाजुओं में कस ली तो सिर सीने में गड़ा गिरफ्त से छूट तेजी से भाग खड़ी हुई।

जीवन में ऐसी हास्यास्पद स्थिति पहली बार बनी। इतना शर्मसार हुआ कि दो दिन घर से नहीं निकला। फिर आत्मनियंत्रण की ग़रज से मैंने कॉलेज से लम्बी छुट्टी ले ली।
कई दिन बाद एक दिन वह घर आई और बातों-बातों में ही मुझे एक लिफाफा थमा गई जिसे बंद कमरे में जाकर मैंने धड़कते दिल से मद्धिम उजाले के बीच पढ़ाः
लिखा था, ‘‘आप विद्ड्रॉ करले...। मैं नहीं करने वाली!’’
इसका क्या मतलब हुआ...? मुझे उससे नफरत होने लगी। आबू से वापसी में अपनी सीट के कूपे में जो आनंद लूटा था, वही सहस्रगुना गुनाह में तब्दील होकर चित्त को छलनी किये दे रहा था। आखिर मैंने शर्त रखी कि अब तुम मुझसे मिलीं तो ज़हर खा लूंगा!
उन दिनों न मैं किसी से बात करता, न कोई काम। हरदम दिल में एक हूक-सी उठती रहती। तनाव और विरह ने मुझे बीमार कर दिया। धमकी से वह भी डर गई। तीन महीने तक नहीं मिली। न मैं कॉलेज गया। परीक्षाएं निबट गईं। वे दिन मुझ पर ही नहीं, मेरे परिवार पर भी बहुत भारी पड़ गए।
और एक दिन पता चला कि वह तो साध्वी बन गई है! परीक्षा भी नहीं दी!! घर छोड़ दिया!!! सुनकर कलेजा मुंह को आ गया।
मुझे अक्सर अपनी स्थिति पर दया आती और हँसी कि एक स्टूडेंट ने किस कदर नाथ लिया है। हा! मैंने कितने स्टूडेंट्स निकाले... और उसके आगे सारी ब्रिलियेंसी धरी रह गई है...!
ख़ोजख़़बर ली। सफेद साड़ी में लिपटी वह सचमुच एक धार्मिक शिविर में मिली जहां विचित्र वेशभूषा में सेकड़ों स्त्री-पुरुष परलोक साधने का जतन कर रहे थे! रोक रहे थे, अपना काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, ईर्ष्या आदि...। सात दिवसीय वह ‘तनाव-मुक्ति’ शिविर राजेंद्र नगर में आयोजित किया गया था। दर्शन को जीवन में दुबारा लौटाने मैं उन साधकों के बीच जा बैठा।
दर्शन वहां सीने पर बैज लगाए कार्यकर्ता बनी घूम रही थी। उसे विकल देख मुझे नहीं लगा कि वह सहजावस्था की ओर बढ़ रही है! नेत्र, हृदय में धधकती प्रेमाग्नि का परिचय दे रहे थे...। ऐसी दशा में वह अपने मन को इच्छा, क्रिया और ज्ञान से शून्य कर सकती थी, भला!
मैंने कहा, ‘‘दिमाग फिर गया है, तुम्हारा! एक आदमी के पीछे सारी दुनिया छोड़ दोगी?’’
वह चुपचाप आँसू बहाने लगी। तब मैंने उसके हृदय की पीर जानी। मुझे अपना सीना चाक होता महसूस होने लगा...। मैंने इतना दर्द पहले कभी नहीं झेला था। ...वह मुझसे प्रेम करती है, मगर साथ सोना नहीं चाहती। इसी द्वन्द्व में उसका पलायन शुरू हुआ था...। मैंने वायदा किया कि- मिलता रहूंगा...तुम इस तरह जीवन तबाह न करो अपना।’
अगले दिन मैं प्रातःकाल ही शिविर में पहुंच गया। दर्शन मुझे पाकर ऐसे खिल गई जैसे, सूर्य-रश्मि को पाकर कमल-पुष्प। थोड़ी देर बाद वह अपने तंबू से अपना सफेद झोला उठा लाई जिसमें से उसने कम्पित हाथों से मुझे एक सफेद लिफाफा निकाल कर दे दिया। आशंकित मन, मैं उसे हाथ ले, एक कोने में जाकर पढ़ने लगाः
फिर आई जुदाई की रात... तुमको पा न सकी क्योंकि, यह मेरी खुदाई नही चाहती! मिलकर बिछुड़ना ही था इक दिन तो यह मुलाकात क्यों हुई? बताओ तो, हर मिलन के बाद जुदाई क्यों है...?'
पत्र पढ़कर मुझे अपना श्वास रुकता-सा महसूस होने लगा...। अक्सर तो मैं अपने पूर्वजों के कारण ही पतित हुआ, जिन्होंने काम का ऐसा मोहक वर्णन किया, जिन्होंने मेरे चित्त में स्त्री की ऐसी उत्तेजक छवि बसा दी! कि उन्होंने मुझे एक ऐसी दिव्य दृष्टि पकड़ा दी, जो उसे सात परतों के भीतर भी नग्न देख ले! आखिर मैं समझता क्यों नहीं कि मुझे उसकी इच्छा के विरुद्व कुछ भी करना नहीं चाहिये, भले वह प्यार हो या उपचार...। खैर।
उस दिन तो नहीं। पर और ऐसे ही दो-चार प्रयासों के बाद, उसका पलायन रोकने में मैं कामयाब हो गया। घरवालों को मुझ पर पहले से ही अखण्ड विश्वास था, अब तो और भी घनी परतें चढ़ गईं। समझाने और पढ़ाने के बहाने अब मैं घंटों उसके साथ अकेला बैठ सकता था। छत पर एक बरसाती थी...। उसमें एक टेबिल-कुर्सी, पलंग और एक बिजली का पंखा था। कभी वह पलंग पर लेट जाती और मैं कुरसी पर बैठा लैक्चर देता रहता और कभी मैं पलंग पर आराम फरमा उठता और वह टेबिल पर निश्चिंतता पूर्वक पढ़ने लगती!
सोचता था, उसे संसार में लौटा लाऊं एक बार, फिर धीरे-धीरे अपना दामन छुड़ा लूंगा...। मगर इस तरह मेरी खुद की बेचैनी सिर पर चढ़कर बोलने लगी थी। आलम ये कि वह दो-चार दिन नहीं मिले तो हाल बेहाल हो जाता! और तब मैं खुद को उसी के हवाले छोड़ देता। जो मुझे सुखासन पर बिठा देती। कहती- आसन का बड़ा महत्व है, आसन सध जाय तो श्वास पर नियंत्रण के बाद धारणा कर ध्यान लगा देने से ‘राजयोग समाधि’ फलित हो जाती है! राजयोग सभी योगों का राजा है क्योंकि इसमें सभी योग समाहित हैं। जैसे- संन्यास योग जिसमें बुराइयों का संन्यास किया जाता है, ज्ञान योग जिसमें प्रॉपर ज्ञान होता है कि कैसे मेडिटेशन द्वारा अपनी शक्तियों को जागृत करें और भक्तियोग जिसमें मन के भावों को परमात्मा से संबंध जोड़कर याद किया जाता है।’

पर मुझसे कुछ सध नहीं रहा था। एक दिन खीज कर मैंने उससे कहा कि- मेरा मन तो नींद और बेडरूम से जुड़ा है?’ और वह नासमझ प्रशिक्षक की तरह समझाने लगी कि- फिर आप रसोई में, जहां नींद की संभावना नहीं या बालकनी/लॉन में ध्यान कर लिया करो। नियमित, एक ही स्थान और समय पर करने से ध्यान लगने लगता है। धीरे-धीरे अवधि बढ़ाते जाइये, इससे दक्षता हासिल हो जाती है!’
‘‘और इस दक्षता का हासिल-क्या?’’
"आत्मा के सभी पाप समाप्त हो जाते हैं, वह पावन बन जाती है। जिन इंद्रियों के हम दास हैं, वे हमारी गुलाम हो जाती हैं!’’ उसने जोर देकर कहा।
मैं हैरान रह गया कि उस अबोध को समझा पाना कितना कठिन है! तभी वह विहंसती-सी बोली, ‘‘कभी शिवमंदिर गए हैं आप! वहां देखा है कि शिव कितने शांत-चित्त स्थापित हैं सैलसुता के पावन आसन पर! इतने कि घोर अशांत चित्त भी प्रवेश पाते ही गहरी शांति से भर उठें!’’
पर मेरा ध्यान उसके शब्दों की गहराई पर नहीं, सुंदर देह-यष्टि पर था, ‘‘तो क्या, तुम्हारे साथ योग करने से वह अखण्ड शांति मुझे भी सुलभ हो जाएगी...?’’
सुनकर वह मन ही मन मुस्कराने लगी। जैसे, कहती हो- नहीं वत्स! वहां तो सदाशिव ज्योर्तिलिंग के रूप मे विराजमान हैं जगदम्बिका की दीपयोनि में! यहां तुम स्त्री जननेन्द्रिय में पुरुष जननेन्द्रिय का वास चाहते हो!
तुम कभी समझोगी नहीं- मैंने भी मन ही मन कटुता से कहा और फिर कभी उसके दर पर न आने का निश्चय कर वहां से चला आया। उसे राजी कर पाने की बनिस्वत तो आकाश में छेद कर देना या चलनी में दूध दुह लेना सरल था! दिन विरह के संताप में कटने लगे। क्योंकि मन का निग्रह मेरे हाथ से बाहर की बात थी...। कोरी बकवास सिद्ध हो रहा था, समत्व योग! जिसमें भावनाओं व विवेक को बैलेंस करना सिखाया गया था...। यहां तो मेरे हठयोग पर उसका बुद्धि योग हावी था!
वैराग्य के चक्कर में परीक्षा में न बैठ पाने के कारण ही दर्शन इस वर्ष फिर फाइनल ईयर में थी। कॉलेज का टूर इस बार नेपाल के लिए प्रस्तावित था। मैंने नौकरी ज्वाइन कर ली थी।
दर्शन उत्साहित थी। मगर मैं निरुत्साहित।
मैं उसके कारण ही इस टूर पर नहीं जाना चाहता था। मुझे भारी व्यवहारिक कठिनाई आ रही थी। निकट रहता तो सीमा टूटती। नहीं रहने पर मन टूटता। काश कोई ओझा, तांत्रिक या सिद्ध मिल जाता तो मैं इलाज करा लेता। पिछली बार एक साइकियाट्रिक को दिखाया तो उसने अव्वल उपचार तो मुलाकात ही बताया। दूसरा कुछ दवाइयां लिख दीं, जिनके सेवन से अस्थाई तौर पर दिमाग वहां से हट जाता। डिप्रेशन कम हो जाता और कुछ राहत मिल जाती। किंतु बाद में मैंने जाना कि वे दवाइयां दिमाग को अपना आदी बनाती जा रही है...।
मेरी बिगड़ती मानसिक दशा के कारण पत्नी और बेटी सदा चिंतित रहने लगी थीं।
मगर मैं चल नहीं रहा, यह जान कर दर्शन मन ही मन दुःखी थी। सवाल यात्रा का नहीं था, साथ का था। वह भी मेरी ही तरह बेचैन प्रायः रहती थी। अव्वल तो यह एक बीमारी थी। हम लोगों ने कई बार सोचा। ...मगर इलाज समझ में नहीं आ रहा था।
टूर से कुछ दिन पहले मैंने बीमारी दर्शाकर छुट्टी की अरजी भेज दी तो वह पगलाई-सी घर चली आई और मुझे फिर एक लिफाफा थमाकर चली गई जिसे पढ़कर मैं सुबकने लगाः
थाम लिया था हाथ जब तुमने किसी का, मन में जगाई थी चाह, पर जब जिन्दगी की कश्ती फंसी लहरों में तो ऐसे दामन छुड़ा जाने लगे!
जब साथ ही नही देना था, मंजिले-राह में मुझे छोड़ देना था, तो दुबारा आए किसलिए?
जख़्म खाकर जिन्दगी-भर का, यूं बिछड़ना था राहगुजर में तो इश्क की इब्तिदा क्यों हुई! आँखों में अश्क ही देना था निर्मोही तो लौटा कर मुक्ति की डगर से, फिर से मुलाकात किसलिए! हसरतों की बारात किसलिए! सांसों की सौगात किसलिए! प्यार का एहसास किसलिए! तुझे पाने की चाह किसलिए!'
जाहिर है, यह कविता नहीं थी, न वह कवयित्री! दिल खून के आँसू रो रहा था...। निम्मी कहने लगी, ‘‘चलो, आपको कहीं दिखा लें!’’
‘‘तुम लोग अपना काम करो, मुझे कोई बीमारी नहीं है,’’ मैं चिढ़ गया, ‘‘क्या कोई अपने मन से बीमार नहीं हो सकता, क्या आदमी कोल्हू का बैल है, जो मन हो तो भी, न हो तो भी लगातार चक्कर काटता रहे। उसकी कोई पर्सनल लाइफ होना चाहिये कि नहीं! ज़िंदगी तो हो गई गुलामी करते...।’’
वह अवाक् रह गई। बेटी का भी मुंह सूख गया। उन लोगों ने मुझे कभी इतनी ऊंची आवाज में बोलते नहीं सुना था। रात्रि जागरण के कारण मेरे सिर में दर्द, दिल पर बोझ, आँखों में लाल डोरे और आवाज भर्रा रही थी।
उन्हें लगा कि कोई प्रेतबाधा है या किसी ने मुझे कुछ दे दिया! दोनों रोने लगीं। घर में मातम-सा छा गया। दिनभर चूल्हा नहीं जला...।
कितनी बुरी बात है! मुझे शर्म आने लगी। ज़ब्र करता हुआ धीरे-धीरे फिर से सामान्य होने का प्रयास करने लगा। बेटी पहले से अधिक ख्याल रखने लगी। निम्मी भी रोज रात मेरे बिस्तर पर सोने आ जाती। मगर दर्शन से प्रेम-डोर में बंध जाने के कारण पत्नी के साथ संगति की इच्छा समाप्त हो गई थी।
मैंने जाना कि सेक्स पहले मानसिक है, फिर शारीरिक। जानवर एक-दूसरे को जन्म से निर्वसन देखने के आदी होते हैं। वहां कोई प्रतिबंध ही कहां, इसलिए हरदम इच्छा नहीं होती संभोग की। न लालसा बनती है किसी विशिष्ट चयन की। मंसूबे नहीं बंधते...। वह तो प्रकृतिजन्या शारीरिक मांग होती है। इंद्रियजनित मांग। बिल्कुल पेट की भूख की तरह। ...तब दौड़ते हैं एक दूसरे की ओर। और पूर्ति के साथ ही उस वासना से कतई मुक्त हो जाते हैं। जबकि मनुष्य उसके बाद भी बंधा रहता है।

आठ-दस दिन बाद जब जान लिया कि टूर चला गया, फिर से कॉलेज पहुंचा। दिन भर आयंबायंसायं न जाने क्या पढ़ाता रहा...। शाम को पता चला कि- दर्शन भी टूर पर गई नहीं। और वह इतने दिनों से कॉलेज भी नहीं आ रही...।’ मन आशंकाओं से भर गया। पत्नी, बेटी को एक व्यवसायिक कोर्स के सिलसिले में उसका टेस्ट दिलाने दिल्ली ले गई थी। मौका पाकर मैं टोह लेने लगभग रुआँसा-सा उसके घर जा पहुंचा।
‘‘कौन है?’’ घंटी बजते ही भीतर से उसकी बीमार-सी आवाज आई।
‘‘मैं आर.पी.सर!’’ गला चिपक गया था।
उसने धीरे-से दरवाजा खोल दिया, ‘‘ओह-सर! आइये-आइये, प्लीज!’’ उंगलियां मोड़ कर बाल कान से हटाती हुई वह इतनी प्रफुल्लित कि लगा अभी गले लग जायेगी...।
मैं उद्विग्न-सा हॉल मैं सोफे की बैंच पर आकर बैठ गया। वह शायद, बाथरूम से आई थी, दुबारा वहीं चली गई। उधर से पानी गिरने की आवाज आने लगी। अपनी विक्षिप्तता छुपाने मैं बेवजह अखबार पलटने लगा। घर में कोई और नहीं दिख रहा था, रसोई और बेडरूम की ओर से भी कोई आहट नहीं मिल पा रही थी। ...शायद, जॉनी भी नहीं, वरना टीवी तो चलता होता! और बागले साब होते तो यहीं अपने क़ाग़जी काम में भिड़े मिलते। मिसेज बागले रसोई या आंगन में कुछ न कुछ करती-धरतीं! बात क्या है?
‘‘दर्शनऽ सुनो-तोऽ! मुझे देर हो रही हैऽ...’’ मैंने जानबूझ कर ज़ोर से आवाज दी ताकि कोई हो तो सुन ले और मैं चोरों की तरह नहीं पकड़ा जाऊं! मां उसकी, कई बार अपने कमरे में खामोश बैठी स्वेटर वगैरह बुनती रहती है। भाई भी चुपचाप स्टोर में खेल-खिलौने बिगाड़ता-सुधारता रहता है। और पापा- कहो गुमसुम छत पर टहल रहे हों, लगातार सिगरेट फूंकते हुए...।
पर मेरी आवाज पर वही आई, दर्शन! शानों पर जुल्फें बिखराए, खुद से अनजान-सी। नहाकर जिसका रूप और निखर गया था। मेरी बग़ल में ही सोफे में धंसती हुई लाचार-सी बोली, ‘‘कोई है-नहीं, मम्मी जॉनी को लेकर मामाजी के यहां चली गई हैं...आज पापा भी नहीं हैं घर पर।’’
‘‘अरे!’’ मुझे चिंता हो आई। कुछ दिन पहले इसी गली में आठ-नौ साल की बच्ची के साथ रैप हो गया था! आसपास का माहौल बिल्कुल अच्छा नहीं है...।
मैंने आत्मीयतापूर्वक हाथ उसके सिर पर रख लिया, ‘‘तुम गई नहीं?’’
आँखें भर उठीं। जैसे, सदियों से वीरान पड़े मंदिर में प्रतिमा जाग रही हो!
मेरे दिल में घंटियां-सी बज उठीं, ‘‘आज तो तुमने मेरा दम ही निकाल दिया...’’ मैंने आपबीती सुनाई। इच्छा हो रही थी, उसका मासूम हाथ अपने हाथों में लेकर कहूं- इस तरह गुम मत हुआ करो, किसी दिन मर जाऊंगा...।
‘‘कुछ खाने के लिए लाऊं...?’’ चमकते आंसुओं के साथ वह हौले से मुस्कराई।
-रहने दो!' मैंने नाज़ुकी से गर्दन हिलाई, ‘‘बैठी रहो, ये पल फिर नहीं मिलेंगे। इस साल कॉलेज तुम्हें फेयरवेल दे देगा...अगले साल तक क्या पता...!’’ गला रुंध गया।
यह एक तथ्य था, जो मेरे मुंह से अचानक निकल गया था। उसके लिए बहुत ज़ोरशोर से घर-वर देखा जा रहा था...। बिछुड़ने के ख्याल से ही दिल में दर्द की एक लहर-सी उठ खड़ी हुई और मैं धीरे-धीरे सुबकने लगा...। चुप कराते-कराते वह ऐन सट गई फिर सीने में चेहरा देकर खुद भी सुबकने लगी।
माहौल ग़मग़ीन हो गया। पर अच्छा लग रहा था। विरह-जनित मिलन के सुख में सराबोर मैं अपनी रुलायी रोक हथेली से उसकी आँखे पोंछने लगा...। तब थोड़ी देर में वह मेरा हाथ झटक, उठकर बिस्तर की सलवटे ठीक करने लगी। गोया, अब भी खफा थी!
बिस्तर ठीक करते देख मैंने तंज किया, "बस की सीट पर तो तुम मेरी गोद में ही सो जाती थीं!"
सुनकर उसकी बॉडी लैंग्वेज बदल गई, "नेपाल चलते तो फिर सोती।"
और मैं उत्साहित हो गया कि उसने यह क्या कह दिया! मगर तुरंत निरुत्साहित कि उस नादान के कहे का क्या अर्थ!
पर दीवान पर झुकी बिस्तर की सलवटें मिटाती वॉयलेट कलर के गाउन में इस वक़्त वह सचमुच बेडरूम में इस्तेमाल किये जाने वाले मुलायम गद्दों की मॉडल नज़र आ रही थी, जिसे अंक भर भेंट लेने की इच्छा जाने कितने जन्मों से मेरे भीतर सिर पटकती हुई...। उठकर नजदीक आ गया, "हिम्मत है तो यहीं सो कर दिखाओ ना!"
और वह तिरछी नजरों से मुस्कराने लगी तो दिल फिर एक संभावना की तलाश में धड़कने लगा...!
प्रेम क्या है, मैं समझ नहीं पा रहा था, उसने मुझे बर्बाद कर दिया- पूरी तरह नाकारा और पथभ्रष्ट! अगर वह मन के स्तर पर ही सुलट जाता तो देह अवलंब क्यों बनती...? लिटाते ही हाथ धोखे से जाने कहां पड़ गया कि ‘धप’ की आवाज हुई! उसका गला भर्रा गया, ‘राऽजेश-ओह!’ और मैं आवेग में भर उठा...।
तब देर बाद उसका रहस्य मय स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘अब तो आप बिल्कुल हमारे पापा के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं!’’
‘‘कैसे?’’ मैं चौंक गया। तो वह चेहरा एकदम नजदीक ले आयी। इतना कि उसकी दायीं आँख मेरी बायीं आँख देख उठी और बायीं आँख दायीं!
ऐसा कौतुक मैंने पहली बार देखा था। समझ नहीं पा रहा था कि यह एक शख्स के दो रूप देखने जैसा था या फिर एक शख्स को दो नज़रों से देखने जैसा उपक्रम!
नज़र झुकाई तो पता चला, वह मंद-मंद मुस्करा रही थी, ‘‘उनका भी एक स्त्री से नाज़ायज़ सम्बंध है।’’
‘‘अरे!’’ मुझे झटका लगा।
‘‘बरसों से है,’’ उसकी आवाज भीगने लगी, ‘‘मां जानते हुए बर्दाश्त कर रही है...!’’
-ओह!' मेरे मुँह से निकला और आँखों में अपनी बेटी और पत्नी का चेहरा नाचने लगा।
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