THOUGHTS OF JAN. 2022 in Hindi Philosophy by Rudra S. Sharma books and stories PDF | THOUGHTS OF JAN. 2022

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THOUGHTS OF JAN. 2022

3 JAN. 2022 AT 11:32

कोई किसी अन्य के महत्व की पूर्ति नहीं कर सकता। यदि अपना कोई प्रियजन भौतिक शरीर छोड़ देता हैं तो इस बात की तो संतुष्टि रहती हैं कि वह पूर्णतः खत्म नहीं हुआ; उसका शरीर जहाँ से आया था वही मिल गया परंतु वह आत्म ऊर्जा होने से अमर हैं, यदि आप उसके सूक्ष्म शरीर से संपर्क रखने की भी योग्यता रखते हैं तब भी उस शरीर का आपके सूक्ष्म शरीर को सानिध्य होगा; क्या वह आपके स्थूल शरीर से संपर्क रख पायेगा? नहीं! यही कारण हैं कि स्थूल शरीर भी महत्व रखता हैं। अब कोई समझेगा कि मैं यह मोह वश कह रहा हूँ, तो वह जान लें कि मैं मोह के वशीभूत नहीं हूँ परंतु मोह के भी अपने मायनें हैं; उसे भी महत्वपूर्ण होने की योग्यता के आधार पर योग्य महत्व मिलना चाहियें। हाँ! यह सत्य हैं कि वह एक बुरा स्वामी हैं क्योंकि यदि कोई उसका प्रभाव जानें अंजाने यानी होश में या होशहीनता में स्वीकार कर लें तो वह उसके अस्तित्व को मिटा देता हैं यानी उसके अधीन होने वाले को इतना प्रभावित करता हैं कि उसके अस्तित्व को नाम मात्र का यानी मिटा ही देता हैं। यही कारण हैं कि मैंने उसके प्रभाव से मुक्ति पाकर उसे अपने अधीन में किया हैं जिससें अब मैं उसका स्वामी हूँ और अब यदि मैं भी उसे अपने लियें उपयोग करके उसके उपयोग में कदापि नहीं आना चाहूँगा तो उसमें और मुझमें अंतर क्या शेष रह जायेंगे? समय, स्थान और उचितता के अनुकूल हो तो यह भी अनुचित नहीं।

4 JAN. 2022 AT 10:15

जिस तरह हमारा स्थूल या भौतिक शरीर आत्म या चेतना से मुक्त होने के पश्चात या उसका उस पर से प्रभाव खत्म होने से पाँच तत्वों में मिल कर अनंत प्रकृति से एक हो जाता हैं यानी अब वह प्रकृति का अत्यंत छोटा सा भाग नहीं अपितु समूची प्रकृति हैं; वह अब समस्त साकारता हैं ठीक उसी प्रकार आत्मा यानी हमारी चेतना भौतिक या स्थूल शरीर से मुक्ति प्राप्ति के पश्चात या उस शरीर का उस पर से प्रभाव खत्म होने के पश्चात उसके साथ चलने वाले हर भाव, विचार और अनुभव से निर्मित संस्कार के खत्म होने पर अनंत आत्म ऊर्जा यानी चेतना से एक हो जाती हैं यानी अब वह चेतना या आत्मा का अत्यंत छोटा सा भाग नहीं हैं अपितु अनंत निराकार और साकार अस्तित्व हैं, साकार भी क्योंकि साकार का आकार प्रतीत होना तो भृम या माया की अत्यधिकता हैं और निराकारता उसकी भी वास्तविकता हैं।

4 JAN. 2022 AT 12:03

धर्म वही हो सकता हैं जो ऐसा गणित, माध्यम् या योग हो जिसकें माध्यम् से हमारें समुचें यानी साकार और निराकार अस्तित्व का अनुभव यानी ज्ञान किया जा सकें। हमारें समुचें अस्तित्व का हमें ज्ञान होने के पश्चात उसके उद्देश्य, अर्थ, मतलब, यथार्थ हित या उसमें संतुलन यानी उस अनंत और शून्य के हर एक कण की सही अर्थों में संतुष्टि की सुनिश्चितता की जा सकें और ऐसी योग्यता वाला कर्म केवल एक ही हैं ' ध्यान ' यही कारण हैं जिससें मैं सदैव कहता हूँ और वर्तमान में भी कह रहा हूँ कि ध्यान ही यथा अर्थों में परम् या सर्वश्रेष्ठ गणित, माध्यम् या योग यानी धर्म हो सकता हैं जिसकी सिद्धि से या जिसे करनें से हमारें अनंत और शून्य अस्तित्व के अत्यंत सूक्ष्मता वाले भाग यानी कि स्थूक शरीर से लेकर समुचित अनंत की संतुष्टि, मुक्ति या सही अर्थों का हित यानी सफलता हैं।

8 JAN. 2022 AT 14:47

आत्मा यानी ध्यान या चेतना को अपने किसी भी आयाम में ठहर नहीं जाना चाहियें वरन या बजायें इसके हर आयाम को समान महत्व देना चाहियें। वह भौतिक शरीर हो या भावनात्मक, विचारात्मक, काल्पनिक या फिर आत्मिक कोई भी क्यों न हों यहाँ तक कि साकार अनंत या निराकारता का पर्याय शून्य; किसी का भी महत्व कोई दूसरा पूर्ण नहीं कर सकता अतः उसे सभी को समय देना चाहियें। भला समय, स्थान और उचितता यानी हमारें परम् या सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य के अनुकूल हो यानी अनुचितता वाला न हो तो इसमें अनुचित्ता कैसी? कदापि नहीं!

9 JAN. 2022 AT 15:05

निराकारता ही अहंकार की यथार्थता यानी कि वास्तविकता अर्थात् उसका सत्य हैं। अहंकार यानी होता हैं अहं का आकार। अहं अर्थात् जो हम नहीं हैं ऐसा हमारा आकर यानी हमारें भृम यानी अज्ञान का आकार होता हैं। सर्वप्रथम ज्ञान प्राप्त कर्ता आत्म अनुभव या ज्ञान से यह जानता हैं कि वह अनंत अस्तित्व का अत्यंत छोटा सा ऐसा अभिन्न अंग हैं और उसके समान ही अन्य अस्तित्व भी हैं एक दूसरें के समान परंतु भिन्न। वह अनंत अस्तित्व का इतना छोटा भाग हैं जिसें गिनना या जिसकी गणना भी सहजता से संभव नहीं और समझ और आत्म अनुभव की वृद्धि के साथ उसे यह ज्ञात होता हैं कि वह ही समुचित अनंत साकार अस्तित्व हैं यानी उसके भृम से उसका यह सत्य स्वतंत्र हो जाता हैं कि वह स्वयं समुचित साकारता हैं यानी वह जो हैं वह सही अर्थों में जान जाता हैं परंतु जो वह नहीं हैं, इस सत्य यानी वास्तविकता की भिज्ञता से अनुभूति की कमियों के कारण अनभिज्ञ रहता हैं; जो कि उसे तब जाकर हो पाती हैं जब उसका ध्यान अर्थात् वह यानी उसकी चेतना उसकी निराकारता की अनुभूति कर्ता यानी साक्षी बन पाती हैं और तब जाकर के अज्ञान से ज्ञान का सफर यानी यात्रा या भ्रम अर्थात् माया की यात्रा से यानी अहंकार से हमें हम का स्वरूप स्पष्ट होता हैं जो आकर रहित रहता हैं; यह निराकारता का अनुभव ही सही अर्थों यानी वास्तविक और पूर्ण आत्म ज्ञान हैं।

9 JAN. 2022 AT 15:45

जो ज्ञान होने के पश्चात भी अज्ञान का महत्व नहीं भूले और समय, स्थान और उचितता के अनुकूल होने पर अज्ञान को भी ज्ञान जितना ही महत्व दें वह अज्ञान के महत्व की भिज्ञता के परिणाम स्वरूप अज्ञान के आधार पर भी महत्वपूर्ण हो सकता हैं ठीक उसी भांति जिस तरह परम् पिता ब्रह्मा, श्री विष्णु और महेश अज्ञान यानी संसार या माया को महत्व देने पर भी महत्वपूर्ण हैं। भृम या अज्ञान अनुचितता तब हैं जब यह समय, स्थान और उचितता के लियें अनुकूल नहीं हों।

09 JAN. 2022 AT 19:14

मैं जिस पर ध्यान नहीं दें रहा;
मेरा ध्यान उसके वश में ही।
जिसका मुझ पर ध्यान नहीं,
सही अर्थों में मेरे वशीभूत वही।।
क्योंकि ध्यान हूँ मैं इससें भिन्न;
मेरा थोड़ा सा भी अंश नहीं।
मेरा वंश ध्यान का ही विस्तार हैं;
ध्यान से भिन्नता जिसमें वह मेरा वंश नहीं।।

12 JAN. 2022 AT 08:48

परमात्मा प्रेम के अतिरिक्त, कुछ भी कर हीं नहीं सकते।

किसी का भी सही अर्थों का परिचय उसके कर्म, उसकें ज्ञान और उसके उसके आत्म विश्वास के आधार पर होता हैं। यदि वह सही अर्थों के परमात्मा हैं तो किसी से भी यथार्थ प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ कर ही नहीं सकतें।

हाँ! आपकों यदि सही अर्थों के या परमात्मा के प्रेम का ज्ञान या उसके सुंदर अहसास का परिचय नहीं हों, तब आप अपने अज्ञान के कारण उसे परमात्मा का श्राप या आपके साथ उसका अन्याय समझ सकते हों; इसमें आपकी कोई गलती नहीं हैं वरन आपकी अज्ञानता की गलती हैं क्योंकि परमात्मा का प्रेम उस मीठे ज़हर या कालकूट का आपको सेवन नहीं करने देता; उस कालकूट का जो मीठे पन की महक के कारण आपकों अपने अज्ञान वश अमृत प्रतीत होता हैं और उस कड़वेपन से भरें सही अर्थों के प्रेम के पर्याय अमृत का आपको सेवन करवाना बंद नहीं करता; वह कड़वा अमृत जो उसके कड़वेपन के कारण यानी आपको आपको अपने इस अज्ञान से ज़हर प्रतीत होता हैं।

14 JAN. 2022 AT 10:15

यहाँ सभी के अपने मायनें हैं अर्थात् जो हैं वह किसी न किसी हमारी आवश्यकता की पूर्ति आधार पर हमारें लियें महत्वपूर्ण हैं; ऐसा कुछ भी नहीं हैं जिसका हमारें लियें कोई भी महत्व सही अर्थों में नहीं हो; यदि ऐसा कुछ होता तो क्या परमात्मा उसके अस्तित्व को रहने ही नहीं देते।
हम जिसे महत्व देते हैं उसके आधार पर महत्वपूर्ण हो जाते हैं यानी हम जिसकी आवश्यकता को समझ जाते हैं; उस जानकारी या ज्ञान के आधार पर अपनी आवश्यकता की पूर्ति के योग्य यानी समर्थ हो जाते हैं इसलियें जिसका जितना महत्व हैं; हमें उतना उसे देना चाहियें नहीं तो हम अपनी अर्थ पूर्ति या मतलब की पूर्ति की योग्यता से वंचित रह जायेंगे।
उदाहरण के लियें :-
एक होती हैं सकारात्मकता दूसरी नकारात्मकता और फिर तीसरी होती हैं वास्तविकता। तीनों के अपने मायनें हैं अतः सभी अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। सकारात्मकता को महत्व न दोगे तो उससे होने वाले लाभ से वंचित रह जाओगे इसी तरह नकारात्मकता और वास्तविकता के महत्व से भी अनभिज्ञता हानिकारक हैं इसलियें हर समय; हर क्षण ऐसा कुछ किया जायें जिससे कि सकारात्मकता, नकारात्मकता और वास्तविकता यानी यथार्थता तीनो को महत्व दिया जा सकें अतः हमें वास्तविकता को महत्व देना होगा हाँ वास्तविकता कोई सकारात्मकता और नकारात्मकता से भिन्न नहीं वरन इसके समय और स्थान के अनुकूल होने पर दोनों को पर्याप्त और समान दिया महत्व हैं।

14 JAN. 2022 AT 19:57

शब्द मूल अर्थों में ध्वनि हैं अतः इसकी ध्वनि को ही इसके मौलिक यानी मूल संबंधित अर्थों की प्राप्ति का आधार कहना अनुकूल प्रतीक होता हैं। हाँ! यह भी सही हैं कि समय, स्थान और आवश्यकता के आधार पर जब एक से अधिक शब्दों को जोड़ा जाता हैं तो दूसरें शब्दों के साथ होने सें मौलिक आधार ध्वनि के अतिरिक्त और भी हो सकतें हैं।

14 JAN. 2022 AT 22:05

कुछ ज्ञान का भाग ऐसा भी होता हैं; जो अभिव्यक्ति की चाहत से मुक्ति के साथ ज्ञात यानी प्राप्त होता हैं। वैसें तो समझ की गहनता के साथ अभिव्यक्ति की चाहत स्वयं से करें बिना जन्म नहीं लेती परंतु समय स्थान और उचितता के अनुकूल होने के महत्व यानी ज्ञान के परिणाम स्वरूप यानी सात्विकता के कारण अभिव्यक्ति कर पाना सहज और स्वभाविक ही हो जाता हैं।

14 JAN. 2022 AT 23:03

न ही किसी से दोस्ती रही और न ही किसी से भी बैर रह गया हैं। अब जो रहा इकलौता और पर्याप्त भी हैं जो वह ही तो एक मात्र प्रेम रह गया हैं। अब इच्छा हो; तो प्रेम से स्वतः बही मुस्कान को सुन लिजियें। कुछ आवश्यक कहने की इच्छा होगी तुम्हारी तो सुन लेंगे; नहीं तो कोई मनाही नहीं अच्छा-बुरा, सुशब्द-कुशब्द जो मर्जी कहियेगा; अरें मुह आपका हैं, आपको पूछने की भी आवश्यकता थोड़े नहीं हैं पर हाँ कान हमारें भी मन मर्जी के ही सुनने को बैठे हैं; मन होगा तो सुन लेंगे और यदि सही नहीं लगा मन को सुनना यानी सार्थक नहीं हुआ हमारें लियें तो नहीं सुने भी तो किसे मालूम पड़ता हैं। अब आप जैसा मेरे संग बर्ताव किजियें; मन को सुहाऊ तो पास रखियेगा नहीं तो मन यदि नफ़रत की प्रधानता वाला रहे तो बेहूदा सलूक किजियें अरें! दफा हो जाने को कह दीजियें; चाहें कारण दीजियें न दीजियें विश्वास मानिये यदि अनुकूल हुआ तो इतनी दूर हो जाऊँगा की फिर कभी न दिखूंगा पर हाँ जब आप प्रेम के दो बोल बोलना चाहेंगे; मेरे पास प्रेम पूर्वक आयेंगे, जो अपने पन से बोलेंगे तो बोल लूँगा, आपसे भी उतनें ही प्रेम से और यदि योग्यता या समर्थता रही तो पर्याप्त सुंदरता यानी प्रेम से भी मैं बोलूँगा ; मेरे बोल स्वतः ही बही मुस्कान में लिप्त हुयें आप तक आयेंगे मेरे बर्ताब में आप के कारण कोई अंतर नहीं आयेगा; मेरी ओर से अपनेपन की प्राथमिकता रहेगी और कुछ नही रह पायेगा।

15 JAN. 2022 AT 23:59

दूसरों को किस तरह का लिखा हुआ पढ़ना भाता हैं यानी उनको क्या सुहाता हैं, मेरी लिखने की प्राथमिकता यह नहीं हैं; मैं तो बस मेरे लियें लिखता हूँ; कोई पढ़े न पढ़े, किसी को पसंद आयें न आयें ' मेरे मन को क्योंकि लिखने यानी अभिव्यक्ति करने या रचने में रस आता हैं, हाँ! इस रस की प्राप्ति के ही लियें लिखता हूँ; इसी लियें मेरा लिखना संभव हो पाता हैं '।

18 JAN. 2022 AT 19:07

अब उसको क्या बतायें; उससे कौनसी और क्या बात करें जो वह सब जानता हैं और यदि नहीं भी जाने तो जानने की पूर्ण योग्यता रखता हैं, वही सब जिसे तुमनें जाना हैं और तुम जिसे जानने की योग्यता भी रखते हो।

बस यही आशा करतें हैं कि परमात्मा न करें पर यदि जब भी मैं मार्ग भटक रहा होऊँ स्वयं से स्वयं के संबंध के नाते सहयोग तुमसें हम तुम्हारा चाहते हैं और परमात्मा नहीं करें पर यदि हमारी ही जैसी तुम्हारी आवश्यकता आ जायें तो तुम्हारी भी ऐसी आवश्यकता की पूर्ति की अनंत काल तक के लियें हमारी स्वयं से स्वयं के संबंध के नाते चाहत हैं।

18 JAN. 2022 AT 19:32

जीवन ऐसा गणित हैं जिसकें मौलिक यानी मूल संबंधी हर सूत्र का ज्ञान कर लेना तुम्हें सही अर्थों में इससें संबंधित सभी कुछ ज्ञात कर सकनें की योग्यता के आधार पर परम् या पूर्ण ज्ञानी सिद्ध कर सकता हैं या फिर कर देता हैं क्योंकि तुम जो जान सकनें की योग्यता रखते हो या जिसे जब तक जान सकते हो तो तब तक के लियें उसे जान ही गयें और दूसरी तरफ इस जीवन के गणित के कितने भी समीकरण हल कर लें; कभी पूर्णतः यानी सभी समीकरण नहीं हल कर सकते इसलियें यह भी या इसे भी यथार्थ कहना अनुचित न होगा कि ज्ञान अनंत हैं इसकी पूर्णतः प्राप्ति असंभव हैं।

18 JAN. 2022 AT 19:52

तुच्छ आत्मा से परम् आत्मा की यात्रा सभी करतें हैं और परम् या सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त भी हो जाते हैं।

अनंत में अनंत के सभी; चाहें वह परम् यानी सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा यानी आत्मा वर्तमान में हो या नहीं हो, वह भूत में वही थे और भविष्य में भी परम् यानी सर्वश्रेष्ठ की प्राप्ति की यात्रा के पथिक होने के परिणाम स्वरूप वही हो ही जायेंगे यानी आत्मा से परमात्मा हो ही जायेंगे।

अतः जो यह कहें कि वह सर्वश्रेष्ठ हैं एवं अन्य नहीं निःसंदेह यह उसकी संकुचितता के परिणामस्वरूप अज्ञानता हैं। जो यह कहें कि वह तुच्छ हैं अन्य सर्वश्रेष्ठ हैं यह भी निःसंकोच उसका अज्ञान हैं। केवल जो यह कहें कि सभी समान हैं क्योंकि सभी किन्ही महत्व रखने वाले तथ्यों के आधार पर सर्वश्रेष्ठ हैं और सभी किन्ही महत्वपूर्ण आधारों पर तुच्छ भी हैं यानी समता ही सभी की सुंदर वास्तविकता हैं वही यथार्थ सत्य कह रहा हैं।

18 JAN. 2022 AT 21:04

जो यथार्थ अध्यात्म को पूर्ण विज्ञान नहीं मानता वह क्या यह भी नहीं मानता कि ई जो हैं वह एम सी स्‍क्‍वेअर्‌ के समतुल्य हैं जिसे अनंत की वास्तविकता की सिद्धि के एक मात्र माध्यम् यानी गणित के द्वारा सिद्ध किया जा चुका हैं।

20 JAN. 2022 AT 10:46

अनंत में ऐसी कोई प्राथमिकता के योग्य क्रिया नहीं जो स्वयं की सही अर्थों की प्रसन्नता अर्थात् संतुष्टि से अधिक महत्व रखती हो।

20 JAN. 2022 AT 10:51

स्वयं ज्ञान के पर्याय हो गयें परमात्मा अज्ञान यानी संसार को महत्व दे रहें हैं; यह प्रेम के अतिरिक्त अन्य कोई संभव नहीं करवा सकता।

20 JAN. 2022 AT 12:37
धर्म का अर्थ वह नहीं हैं जिसें तुमनें उसे दिया हैं क्योंकि तुम्हारें द्वारा उसे दिया अर्थ यथार्थता यानी जैसा उसका अर्थ हैं या जैसा होना चाहियें उसके आधार पर नहीं अपितु तुम्हारी संकुचितता के आधार पर हैं। धर्म को यथार्थ यानी परम् यानी सर्वश्रेष्ठ अर्थ की पूर्ति कर्ता ही समझो क्योंकि यही वह हैं भी; उसे हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, पारसी, जैन, ईसाई, बुद्ध आदि इत्यादि दायरों में सीमित मत करों। वह तो अनंत हैं; सर्वश्रेष्ठ हैं हाँ! वही जो सही अर्थों में सर्वश्रेष्ठता हैं उसकी प्राप्ति करवाने वाला हैं।

20 JAN. 2022 AT 17:29

तुम करतें वही हो जो समय, स्थान और अनंत की संतुष्टि या हित यानी उचितता के लियें अनुकूल होता हैं क्योंकि तुम्हारें पास इसके अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं हैं।

हाँ! इसे कैसे करना हैं इस हेतु विकल्प हैं और वह भी केवल दों, अब यह तुम पर निर्भर हैं कि तुम किसें चुनतें हों। उनमें से पहला यह कि तुम इसें न चाहतें हुयें करों यानी अपनी इच्छा के बिना करों और करनें दों, जो करना समय, स्थान और अनंत की संतुष्टि या हित यानी उचितता के लियें अनुकूल हों क्योंकि परमात्मा तुम्हें कुछ भी अनंत की अनुचितता वाला करने देंगे ही नहीं और दूसरा यह कि तुम इस परम् अर्थ पूर्ति के कृत्य को इसके या इसके अर्थों के महत्व यानी मायनों की भिज्ञता के परिणाम स्वरूप यानी सात्विकता वश स्वयं की इच्छा से या होश पूर्वक जानने से होशपूर्वक करों और करनें भी दों और ऐसा करनें पर तुम स्वयं उन आधार पर परमात्मा हो जाओगें; किसी के भी परिचय के लियें जिनसे महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं उन सभी आधारों पर यानी कर्म, अनुभूति और ज्ञान इनके आधार पर।

20 JAN. 2022 AT. 19:35

वह कुछ भी क्यों न हो, यदि दिया जा रहा हैं तो उसे देने वाला केवल परमात्मा हैं; यदि जिससें मिल रहा हैं वह आपको परमात्मा नहीं हो; तो वह देने वाला हो ही नहीं सकता बल्कि वह तो केवल माध्यम् होगा। वही दे सकता हैं जिसमें सही अर्थों में देने की योग्यता हों और दे सकनें कि योग्यता उसी में हो सकती हैं जो योग्यता के आधार पर यानी सही अर्थों में परमात्मा हों।

यदि आप दें रहें हो चाहें वह सुख हो, प्रेम हो यानी किसी की इच्छा पूर्ति से मिलने वाली संतुष्टि हों; उसकी वह इच्छा जो सही अर्थों की आपकी संतुष्टि की हों; तो या तो आप देने वाले के माध्यम् हो और यदि माध्यम् नहीं अर्थात् देने की योग्यता रखने वालें भी हैं तो निःसंदेह आप परमात्मा हों।

20 JAN. 2022 AT 19:54

जो हर किसी के लियें उनकी किसी न किसी महत्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति के आधार पर महत्व रखता हो यानी वह हर किसी की चाहत हों; वह ऐसा हैं क्योंकि वह ऐसा होने की योग्यता रखता हैं अतः वह ही ऐसे किसी सभी के प्रिय की भी चाह या चाहत होने की योग्यता रखता हैं; जो उन सभी जितनी योग्यता वाला हैं यानी सभी जितनी श्रेष्ठता जिसमें हैं जो उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के योग्य होने से सभी के प्रिय चाहत कर्ता को चाहनें वालें यानी उसकी चाहत करनें वाले हैं।

यदि वह सभी चाहत कर्ताओं के योग्य, श्रेष्ठता या योग्यता के आधार पर हो तो ठीक पर नहीं हो तो सभी का प्रिय जो हैं उसे उस अयोग्य की चाहत नहीं करनी चाहियें यानी उसे नहीं चाहना चाहियें।

22 JAN. 2022 AT 12:36

प्रेम यानी कर्ता को उसका प्रेम जिससें भी संबंधित हो उसके आनंद, संतुष्टि या शांति अर्थात् प्रसन्नता से मिलने वाली आनंद की सुंदर अनुभूति।

दोनों प्रेमी एक दूसरें के प्रेम पर जितना अधिक ध्यान देंगे तो मोह की वृद्धि उतनी ही अधिक होगी जिससें मोह कर्ता का उसके स्वयं के ही कारण अहित यानी असन्तुष्टि होगी, जिससें उसे जिससें मोह हैं वह चाह कर भी उसके हित की सुनिश्चितता उसके लियें नहीं कर सकता और वरन इसके यदि दोनों अपने-अपने प्रेम पर ध्यान देंगे तब ही दोनों में प्रेम बढेगा और दोनों ओर आनंद, संतुलन, संतुष्टि या शांति यानी प्रेम के अतिरिक्त कुछ न रह जायेगा।

22 JAN. 2022 AT. 13:06

यदि परमात्मा सभी अर्थों यानी मायनों में यानी हर तरह से मेरे पास न हों और सभी आधारों पर उनसें सदैव यानी अनंत काल तक के लियें एक हो जाने की मुझें आस यानी विश्वास भी न हों; तो मेरे जीते-जी मर जाना अर्थात् होश नहीं संभाल पाना और मर के भी न जी पाना स्वभाविक हैं।

22 JAN. 2022 AT 13:10

खुद की परमात्मा से पृथकता हर तरह से खुद से ही तो दूरी हैं।

22 JAN. 2022 AT 19:29

समझ के स्तर पर कल्पना के, भाव, विचारों आदि आयामों पर सर्वश्रेष्ठता के पर्याय ऐ. पी. जे. अब्दुल कलाम जी।

22 JAN. 2022 AT 20:48

शब्द मूलतः वह ध्वनि हैं जो अनुभूति की मौलिक अभिव्यक्ति हैं यदि इन पर ध्यान की पर्याप्तता दे दी जायें तो व्यक्त कर्ता के द्वारा किया अनुभव यथावत् किया जा सकता हैं और अनुभव या अनुभूति ही तो ज्ञान की सूक्ष्म समझ का रूपांतरण हैं वही ज्ञान यानी ज्ञात कर सकनें योग्य कृत्य जो किसी की भी यथार्थ सामर्थ्यसूचक योग्यता प्राप्ति की सुनिश्चितता का कारक हैं। वह किसी की भी अनुभूति का महत्व की हैं जो योग्यता के आधार पर किसी भी चैतन्य के अंश को परम् के संग से युक्त कर सकता हैं अतः यह अनुभव ध्यान की पर्याप्तता के परिणाम स्वरूप या तो ज्ञान के मूल अर्थात् आत्म अनुभव पर स्वयं से प्राप्त हों अन्यथा इसें अन्य के अनुभवों की अभिव्यक्ति यानी शब्दों पर पर्याप्त ध्यान दियें जानें से भी प्राप्त किया जा सकता हैं; हाँ! अभिव्यक्ति ऐसी ही होनी चाहियें जिसकें श्रोत की मौलिकता और कर्ता द्वारा उसकी यथावत्ता के साथ कोई समझौता नही होना चाहियें। चयन आपका हैं; मेरे अनुसार तो दोनों ही विकल्पों की अपनें-अपनें स्थान पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण होने से दोनों ही समान सार्थकता यानी महत्व या आवश्यक होने से मायनें रखतें हैं।

22 JAN. 2022 AT 21:52

यदि अनुभूति की अभिव्यक्ति में पर्याप्त यथावत्ता हों तो अभिव्यक्ति अनुभव का माध्यम् नहीं अपितु अभिव्यक्ति स्वयं अनुभूति हैं अतः जो अभिव्यक्ति पर्याप्त ध्यान देने पर स्वयं अनुभूति हो जायें वही हैं परम् अभिव्यक्ति हैं।

यदि अभिव्यक्ति से अनुभूति में पर्याप्त यथावत्ता या मौलिकता हों तो अनुभव अभिव्यक्ति का माध्यम् नहीं अपितु अनुभव स्वयं अभिव्यक्ति हैं अतः जो अनुभूति पर्याप्त ध्यान देने पर स्वयं अभिव्यक्ति हो जायें वही हैं परम् अनुभूति हैं।

23 JAN. 2022 AT 09:39

वास्तविकता यानी वर्तमान उस गहरी कल्पना का परिणाम हैं हमें जिस गहराई तक पहुँच सकनें में लगने वाले समय की इतनी अधिकता रही कि हम इस हेतु सही - सही अनुमान नहीं लगा सकते यानी हमारा अनुमान लगभगता के मोहताज़ ही होगा। ध्यान में अधिकता हुयी होगी तो यह बहुत जल्द हो गया होगा और उसकी कमी से युग भी बीत गयें होंगे तो भी इसमें आश्चर्य की निहितता हमारी अनुचित्ता होगी।

23 JAN. 2022 AT 9:50

वास्तविकता के ज्ञान का सूत्र जान लेने के बाद उससें यानी वास्तविकता से हमारी दूरी उतनी ही होती हैं; जितनी किसी गणित के ऐसे सूत्र के ज्ञान होने के पश्चात, जिस सूत्र से उस गणित के सभी सूत्रों का सही यानी सटीक अनुमान लगाया जा सकता हैं और ज्ञात कियें सभी उसे हल करने में उपयोगी सूत्र उपयोग कर, उस गणित का उनके सहयोग से कोई भी सिद्ध अंत की प्राप्ति करनें में दूरी होती हैं।

23 JAN. 2022 AT 9:57

अनंत का हर ऐसा कृत्य जिसमें अनंत का अहित नहीं हैं तो हित भी नहीं हैं; यदि अंजाम दिया जा सकता हैं तो केवल प्रेम के परिणाम स्वरूप।

23 JAN. 2022 AT 10:24

वह सभी जिन्होंने होश यानी चेतना की वास्तविकता को जान लिया हैं; जो जान गयें हैं कि उनकी वास्तविकता क्या हैं; वह कौन हैं उनसें या उन ध्यानों से एक प्रश्न हैं कि अभी तो वह होश में हैं; इसका क्या आश्वासन कि मृत्यु के पश्चात भी होश संभाला जा सकेगा, करनें से सब कुछ संभव हैं; यह ध्यान रहें कीं करने से ही वह स्वयं की वास्तविकता से भी भिज्ञता रख पायें हैं; अतः मृत्यु पश्चात भी होश को संभाल सकनें की भी सुनिश्चितता उन्हें ही करनी होगी यदि स्वयं पर ही निर्भरता की सुनिश्चितता सदैव के लियें करनी हो तों। इसका सभी जाननें वालों को ज्ञान हैं कि वह पहले भी कभी अपनी वास्तविकता से उसी भाती परिचित थे जिस तरह की स्वयं से उनकी वर्तमान में परिचितता हैं परंतु अज्ञान यानी माया के प्रभाव के परिणाम से तब अज्ञान के वशीभूत हो गयें थे तो इसकी भी तो संभावना हैं कि वह पुनः हो सकते हैं? इसका क्या आश्वासन हैं कि वह पुनः नहीं हो सकनें कि योग्यता रखतें हैं यह स्वयं से प्रश्न होना चाहियें।

23 JAN. 2022 AT 10:37

स्मृति या स्मरण शक्ति ध्यान में रखी कल्पना तक पुनः पहुँच सकनें हेतु ही तो की व्यवस्था हैं, यदि कल्पना शक्ति की ही पर्याप्तता कर ली जायें तो इसकी क्या आवश्यकता हैं? नहीं! कोई आवश्यकता नहीं।

23 JAN. 2022 AT 11:07

स्वयं को ऊँचा जानकर और किसी दूसरें को निचला जानकर क्यों आश्चर्य करते हों; क्यों स्वयं को महान और दूसरें को तुच्छ समझतें हों थोड़ा ध्यान को समझ की गहराई में लेकर जाओ, पर्याप्त गहनता से उसका परिचय करवाओं तभी गहराई में मिलने वाली समता नामक वास्तविकता से तुम्हारें वास्तविकता की ऊपरी परत पर होने से तुम्हें दिखी संकुचितता से फ़लित अज्ञान का नाश होगा; इस ज्ञान के परिणाम स्वरूप की उच्चस्तरीय के प्रारब्ध के एक अत्यंत छोटे ऐसे भाग के धीरें- धीमें घटने से जिसनें उसे उच्च प्रतीत करवाया था, वह जितना ऊँचा जैसे जैसे होते जायेगा उतना ही शीघ्र उसके निम्न होने का समय आते जायेगा और वह तुम जैसे संकुचितता वश देखने वालों को निम्न प्रतीत होगा और इसके विपरीत निम्न स्तर वाले के प्रारब्ध के भी एक अत्यंत छोटे ऐसे भाग के धीमें-धीरें घटने से जिसनें उसे निम्न या तुच्छ प्रतीत करवाया था, वह जितना अधिक निम्न जैसे-जैसें होते जायेगा उसका उच्च होने का समय निकट आतें जायेंगा और एक समय वह भी उच्च की तरह प्रतीत होगा।

23 JAN. 2022 AT 12:09

समझ के आयाम पर, ध्यान के उससें जुड़े अज्ञान की भिज्ञता अर्थात् माया का अनुभव और ध्यान अर्थात् ही वास्तविकता इस सत्य से भिज्ञता का द्वार हैं स्मृति की ध्यान द्वारा समझ।

24 JAN. 2022 AT 12:53

अनंत का हर तन, हर मस्तिष्क; हर एक संबंधित कण,
यानी जो हैं और नहीं वह भी सब अपना लगता हैं।
मैं जागरण के समय ही नहीं सपने में जागा रहता हूँ,
अब दर्शन के अलावा सब ही कुछ सपना लगता हैं।।

24 JAN. 2022 AT 18:01

कोई समस्या हैं?
जैसें कि समय, स्थान, अनंत के लियें जो अनुकूलता योग्य नहीं ऐसा क्रोध, डर, भूख, गर्व, अहं, ईर्ष्या, मोह, संदेह यानी झिझक आदि इत्यादि ऐसा कुछ भी जिसें नही होना चाहियें।
अरें! तो उस पे ध्यान क्यों हैं?
यदि ध्यान हटाया जा सकें तो इस कदर हटाओं कि तुमकों उसके अनुभव की पहचान भी न रह पायें।
क्या ध्यान हटा नहीं पातें; इस कारण नहीं हटा पा रहें?
तो उसे साधो पर हटानें की योग्यता रखों क्योंकि इससें ही जड़ सें समाधान हैं।

24 JAN. 2022 AT 23:36

ध्यान पर नियंत्रण की सार्थकता से भिज्ञता जरूरी हैं।

यह जान लेना जरूरी हैं कि यदि समस्या हैं तो इसका मतलब हैं कि ध्यान पर नियंत्रण नहीं और समाधान हैं इसका मतलब हैं ध्यान नियंत्रण में हैं।

यदि ध्यान पर नियंत्रण हैं तो कोई समस्या नहीं हैं क्योंकि हम जहाँ नहीं चाहते कि हमारा ध्यान जायें, यदि हमारी इच्छा के बिना वह फिर भी जायें तो ही तो समस्या हैं; नहीं तो समाधान।

उदाहरण के लियें हमें सुबह पाँच बजें उठना हैं; जिससें कि हम अखाड़ें जाकर कसरत कर सकें तो यदि हमारा ध्यान आलस्य के अनुभव पर जायें यानी वहाँ जायें जहाँ नहीं जाना चाहियें तो समस्या हैं और यह तभी संभव हैं जब ध्यान हमारें नियंत्रण में नहीं हों।

परंतु यदि हम हमारें ध्यान पर इतना नियंत्रण रख सकें कि वह वहाँ लगें जहाँ हम चाहतें हैं यानी अखाड़े जाने पर और वह भी इस कदर कि हम आलस्य का अनुभव ही भूल जायें तभी समाधान हैं।

अब यदि हम ध्यान की एकाग्रता या निरुद्धता वाले नहीं तो हमें चाहें उसे साधना ही क्यों नहीं पड़े, उसें साध कर नियंत्रित करनें में ही जड़ से समाधान हैं इस लियें नियंत्रण करना ही होगा।

25 JAN. 2022 AT 9:21

मोह इससें नहीं हैं कि तुम किसी के भी प्रेम पर ध्यान ही न दों, तुम्हारा उस अधिकता में ध्यान देना तब अनुचित्ता होगी जो ध्यान तुम्हें तुम्हारें द्वारा कियें जा सकनें वालें प्रेम पर तुम्हारा ध्यान ही नहीं होनें दें , हाँ! तब मोह इतना अधिक होगा यानी अनुचित होगा जब तुम अपने प्रेमी के प्रेम पर केवल ध्यान दों जिससें कि अपनें प्रेम पर ध्यान ही न दें सकों।

26 JAN. 2022 AT 9:58

शून्य और अनंत अस्तित्व यानी जो नहीं हैं और जो हैं उसकी यानी अपनी यथार्थ यानी परम् अर्थ पूर्ति में निरुद्धचित्तता ही परम् समाधि हैं।

27 JAN. 2022 AT 14:27

ऐसा कोई जो तर्क की सार्थकता से भिज्ञता रखता हों फिर भी पूरें होश के साथ अतार्किकता युक्त अभिव्यक्ति करनें वाला हैं या वह कर रहा हैं तो इसका अर्थ स्पष्ट हैं कि आपकों उसकी तर्क हीन प्रतीत होने वाली अभिव्यक्ति तो पूर्णतः तर्क संगत हैं परंतु जिस अनुभव के आधार पर उसनें अभिव्यक्ति की हैं आप उसकी भिज्ञता से वंचित हैं।

29 JAN. 2022 AT 11:32

यदि आप सही अर्थों के यानी यथार्थ धर्म नामक परम् कर्म की पूर्ति कर रहें हैं तो कोई आपको अपने धर्म का पालन करनें से रोक नहीं सकता और आप भी किसी के भी साथ किसी भी शर्त पर ऐसा नहीं कर सकतें। जिस धर्म का पालन करनें से पालन कर्ता को बाधित किया जा सकें; यदि सत्य कहें तो यथा अर्थों में धर्म हैं ही नहीं।

31 JAN. 2022 AT 12:12

ऐसी कोई भी समस्या नहीं हैं जिसकी जड़ अचेतनता यानी बेहोशी नहीं हों; जितनी अधिक बेहोशी उतनी ही बड़ी समस्या। यह कहना अनुचित न होगा कि बेहोशी ही समस्या या हानी का स्पष्ट अर्थ हर एक महत्वपूर्ण आधार पर हैं और बेहोशी के विपरीत चेतनता यानी होश या ध्यान ही हर एक समस्या का समाधान। चेतन्यता जितनी अधिक होगी उतनी ही अधिक हर एक समस्या के कम से कम होने की संभावना।

31 JAN. 2022 AT 20:38

परमात्मा इतने श्रेष्ठ हैं कि उनकी यथार्थ भक्ति करनें वालें यानी सही अर्थों के जो उनके भक्त हैं वह भी उन जितनी ही श्रेष्ठता वालें हों जायें यानी योग्यता के आधार पर परमात्मा हो जायें तो भी संकोच करना अनुचित्ता होगी।

- © रुद्र एस. शर्मा (०,००)