Meri Bhairavi - 10 in Hindi Spiritual Stories by निखिल ठाकुर books and stories PDF | मेरी भैरवी - 10 - रहस्यमय तांत्रिक उपन्यास - मायावी जंगल

मेरी भैरवी - 10 - रहस्यमय तांत्रिक उपन्यास - मायावी जंगल

माया के द्वारा मेरी जान बचाने के बाद मैं भी सतर्क हो गया था और माया के साथ ही पास की झाड़ियों में छिप गया। उस घनघोर अंधेंरे में कुछ भी सही से देख पाना मुश्किल सा था और धूंध के धुयें की बजह आस-पास की चीजें भी दिखनीं बंद हो गई थी।
हम दोनों को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें क्या नहीं और हमारे चारों तरफ खतरा ही खतरा था...इसलिए हम दोनों सिवाये छिपने के कुछ भी नहीं कर सकते थे। माया की आध्यात्मिक शक्ति उच्चस्तरीय थी जिसके कारण वह आस -पास के खतरे को महसुस कर पाती थी और अपनी ओर आने वाले खतरे के लिए तैयार रहती थी।
पास की झाड़ियों में कुछ आवाज सी होती ,.सर्ररर्रर्रर्रर्रर्र...करके ...मानों की कोई सर्प तेज गति ले उन झाड़ियों के अंदर से गुजरा हो ,,...मैं डर के कारण माया के सीने से चिपक गया ....फिर मैंने धीरे से अपने सिर को ऊपर उठाया तो माया और मेरा चेहरा एक -दूसरें के बेहद करीब थे...हम दोनों एक दूसरों की सांसों की गर्माहट को महसूस कर सकते थे और दोनों की धड़कने तेज हो गई...धड़कनों के चलने की आवाज हम दोनों को स्पष्ट रूप से सुनाई दे रही थी।
इतने करीब होने के बाद हम दोनों की नजरें मिलने के बाद कुछ समय के लिए हम दोनों आँखों की हसीन दुनिया में खो गये हो...और ऐसा लग रहा था जैसे वक्त ठहर सा गया हो।
तभी दूर से चलने की आवाजे सुनाई देने लगती है और उन आवाजों को सुनते ही हम दोनों की तंद्रा टूट जाती है और माया ने मुझे जोर से धक्का मारकर स्वयं दूर किया और मेरी तरफ गुस्से भरी आँखों से देखते हुआ कहा ..ठरक्की इंसान....मैं बस मंद मंद सा मुस्कुराया और उसे कोई जबाव नहीं दिया।
अब वे आवाजें धीरे -धीरे सेे पास आने लगी थी..उसे सुनकर ऐसा लग रहा था कि ये आवाजें किसी मनुष्य के चलने की है ..,,हम दोनों झाड़ियों में खुद को छिपाते हुये बस उन सब लोगों का इंतजार कर रहे थे। जब चलने की आवाज और नजदीक से सुनाई देने लगी तो ...उसे सुनकर ऐसा लगा कि कम से कम दस-ग्यारह लोग तो अवश्य ही होंगे ..,देखते ही देखते कुछ ही देर में ठीक दस लोग थो़डी दूरी पर चलते हुये दिखाई दिये ..,जो कि हमारी तरफ ही आ रहे थे।
जब वे लोग थोड़ी और नजदीक पहुंचे तो तब वे हमें स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे..उन दस लोंगों में तीन सुन्दर युवतियां और एक अधेड़ उम्र का लम्बी सफेद दाड़ी वाला बजुर्ग था ..जिसने सफेद रंग की रेश्मी सुनहरी पोशाक पहनी हुई थी और हाथ में एक लम्बी सी छड़ी पकडी़ हुई थी जो देखने में जादूगर की छड़ी जैसी लग रही थी....तंत्र की भाषाशैली में कहें तो इसे दण्ड कहा जाता है...तंत्र विद्या के माध्यम से इस तरह के अनेक शक्तिशाली दंड़ का निर्माण तांत्रिक लोग करते थे..जिनमें वे असीम तांत्रिक व मायावी शक्तियों को स्थापित करते थे...इन्हीं दण्ड़ों में से कुछ प्रमुख दण्डों के नाम इस प्रकार से है ...भैरव दण्ड़,हनुमान दण्ड,बावन वीर दण्ड़,ब्रह्म दण्ड...,इन्हीं सभी दण्ड़ों में ब्रह्म दण्ड़ ही सबसे शक्तिशाली दण्ड़ है। साथ ही साथ उस बजुर्ग व तीन युवतियों के साथ छ: हटे -कटे जवान जवान चल रहे थे। जो देखने में पहलवानों से कम नहीं लग रहे थे,कसा हुआ शरीर ,चौड़ी छाती ,कसे मसल थे और उन सबके कमरबंद से तलवारें लटकी हुई थी।
इन सभी को देखकर यही प्रतीत हो रहा था कि ये सभी लोग बहुत खतरनाक हो ...और बेहद ही शक्तिशाली ....इधर माया भी पूरी बेसब्री से लड़ने के लिए तैयार थी ...उसने अपनी मायावी शक्तियों से एक तिलस्मी तलवार को प्रकट करके अपने हाथों में ली ...और वह हमला करने वाली थी कि ..तभी मैंने परिस्थति को समझते हुये माया को पकड़कर अपनी तरफ पीछे खींच लिया। मेरे इस व्यवहार से वह बहुत चिढ़ सी गई थी...और मुझे खा जाने वाली नजरों से घूर रही थी...यदि नजरों से मारने की कोई विद्या या शस्त्र होता तो वो शायद इस समय मुझे अपनी कातिल नजरों से मार ही चुकी होती ।
उसके इस तरह देखने पर मैंने ड़रते हुये कहा कि ...हमें बिना सोचे -समझें हमला नहीं करना चाहिए। हम नहीं जानते है कि हमारे समक्ष ये लोग कितने ताकतवर है ...और किस स्तर के है...और अभी तो अभी हमारे पास कोई रणनीति भी नहीं और हम तो ये भी नहीं जानते है कि ये हमारे शत्रु है भी या नहीं .,,तो बिना मतलब के इस अनजान जगह पर हम बिना किसी कारण के बेवजह ही अपने शत्रु क्यों बनायें। वैसे भी इन्होंने हमें नहीं देखा है...तो हमारे लिए बेहतर यही होगा कि हम दोनों चुपचाप कुछ समय तक यहीं छिपकर प्रतीक्षा करें।
मेरी बात सुनकर माया समझ गई थी कि मैं क्या कहना चाह रहा था उसने हाँ में अपना सिर हिलाया और चुपचाप उन सभी को गौर से देखने लगी।
उन सभी में से एक युवती जो दिखने सबसे छोट़ी
और कम उम्र की लग रही थी...वह उस बजुर्ग से कुछ कह रही थी ...उसके बाते करने के तरीके से लग रहा था कि शायद वह उस बजुर्ग की पोती हो...जैसे -जैसे वह हमारे ओर नजदीक आते जा रहे थे तो हम दोनों को उनकी सारी बातें स्पष्ट सुनाई दे रही थी।वह छोटी युवती उस बजुर्ग से कह रही थी दादा जी ...इस मायावी जंगली में आकर वह दुष्टात्म कहीं छिप गया होगा ..अब हम उसे कैसे ढूंढेंगे.....अगर इस वह मुझे मिल जाये तो मैं उसे जिंदा ही नहीं छोडूगी...उसने मेरी प्यारी मैना को मार ड़ाला और उसे खा भी गया..,मैं उस दुष्ट जानवर के टुकड़े -टुकड़े कर दूंगी।
उसकी बात सुनकर वह बजुर्ग मुस्कुराते हुये बोला जरूर सुहाना बेटी...तुम चिंता मत करो तुम्हारे दादा जी उस मायावी जानवर को जरूर अच्छा सबक सिखायेगा।
अपने दादा जी की बात सुनकर सुहाना खुश होकर उछलने लगती है येहय्य्य्य्य्ये...दादा जी आप कितने अच्छे हो तो ...अब उन सब की दूरी हमसे कुछ फीट दूर ही थी ..,मैंने माया से अपनी आध्यात्मिक आभा को सीमित करने को कहा और माया मेरी बात को समझ गई और अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को उसने बिल्कुल से सीमित कर दी और मैंने भी अपनी आध्यात्मिक आभा सीमित कर दी..,अब हम दोनों की मौजुदगी का एहसास किसी को नहीं हो सकता था।
बस हम दोनों चुपचाप उन सभी को झाडी में से छुपकर देखते रहे।कुछ देर वे सभी हमारे पास झाड़ी के पास बने रास्ते से आगे निकल गये।
उन सभी के जाने के बाद हम दोनों झाड़ी में से बाहर निकल गये ...और झाड़ी से बाहर निकलते ही हम दोनों उन सभी का पीछा ये सोचकर करने लगे कि शायद कहीं हमें इस जंगल से बाहर जाने का मार्ग मिल जाये।
कुछ दूरी पर उन सभी को किसी की आहाट सुनाई देती है और वे सभी अपने हथियार निकालकर सतर्क हो जाते है।
तभी एक बेहद ही विशालाकाय जानवर उन सभी के समक्ष आ जाता है।वह जानवर देखने में बहुत डरावना लग रहा था..और उसकी पीठ पर दो काले पंख भी लगे हुये थे...मैंने पहली बार ही तरह के जानवर को देखा ...मैं उसे देखकर हैरान सा हो गया ..बल्कि मैं ही नहीं ...माया भी उसे देखकर हैरान और दंग थी।
क्योंकि वह जानवर आकार में बहुत बड़ा था..और उसकी आँखे आग की तरह लाल और मुंह से लार टपक रही थी। ऐसा लग रहा था ...वह कोई सामान्य जानवर हो ही नहीं...और वास्तविकता भी यही थी कि वह जानवर सामान्य जानवर नहीं था...वह देखने में ही एक आदमखोर जानवर लग रहा था...हिममानव,विशाल मकड़ी,अश्विंदर,ऑगुरे पक्षी,विशालकाय सांप,ईच्छादारी नागिन,हिम बंदर,अग्निपक्षी,जादुई मोहिनी, नरभक्षी पक्षी जैसे खतरनाक जीव-जंतुओं व जानवरों का नाम तो मैंने बजुर्गों से बहुत सुने हुये थे। परंतु यह जानवर इन सभी से अलग ही था...और उसकी खतरनाक आभा से यही आभ्यास हो रहा था कि यह कोई आम जानवर नहीं है .,,बल्कि मायावी जानवर है ...और इसकी आभा से ही एक उच्चस्तरीय की काली शक्तियों का आभास हो रहा था।
अब तो मुझे यही आभास हो रहा था कि आज तो हम सबकी मौत निश्चित है ....क्योंकि एक तो यह जानवर लंबाई में बहुत बड़ा था और ऊपर काली शक्तियों से युक्त था।
पता नहीं ऐसी कौन -कौन सी शक्तियां इस जानवर के अंदर होगी ...और इसकी क्षमता किस स्तर की होगी ...ये सब जाने बिना तो इसे मारना मुश्किल ही नहीं नामुकिन है।
और बिना सोचे समझे इससे यद्ध लड़ना तो एक बेवकूफी भरा निर्णय ही है...और ये तो सीधी वो ही बात हुई कि जानबुझ कर मौत को गले लगा लेना...जबकि इस तरह से मौत को गले लगाने में कोई बहादूरी का काम तो था ही नहीं।
मैं यह सब मन में सोच रहा था और बचने के उपाय सोचने लगा....परंतु वे सभी लोग बिल्कुल निड़रता के साथ खड़े हुये थे और उस जानवर को बडे ही गौर से देख रहे थे।
उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि ...वे उस जानवर की कमजोरी ढूंढ़ने की कशिस कर रहें हो और किस तरह से उसे मारा जाये।

आखिर कौन सा विशालकाय जानवर उन लोगों और माया व सिद्धेश्वर के सामने आ गया था। क्या सब लोग बच पायेंगे या उस जानवर के हाथों उन सबके साथ माया और सिद्धेश्वर भी मारे जायेंगे ...आखिर क्या होगा आगे ...जानने के लिए पढ़ते रहे मेरे साथ यानि आप सबके अपने निखिल ठाकुर के साथ इस कहानी को मेरी कलम से .,.जिसका नाम है !!""""मेरी भैरवी(रहस्यमय तांत्रिक उपन्यास"""""!! Only on pocket fm and pocket novel reader app पर!