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कुलदेवता का वास

काज़ी वाजिद की कहानी

यशोदा को इस घर में आए पांच वर्ष हो गए। पहले उसे अपनी क़िस्मत पर नाज़ था। माता-पिता के छोटे-से कच्चे घर को छोड़कर एक हवेली में आई थी, जहां दौलत उसके क़दमों को चूमती जान पड़ती थी। उसके पति कुंवर प्रताप सिंह रूपवान थे, उदार थे शिक्षित थे, विनोदप्रिय थे और प्यार की एक्टिंग भी करना जानते थे। उनके लिए यशोदा का खिला हुआ यौवन और देवताओं को भी लुभाने वाला रूप- रंग केवल विनोद का सामान था। घुड़दौड़ और शिकार, सट्टे जैसे सनसनी पैदा करने वाले मनोरंजन में प्यार दबकर पीला और बेजान हो गया था। ...एक पुत्र-रत्न पाकर भी वह सुखी न थी।
कुंवर प्रताप को एक महीने से ज़्यादा हुआ, शिकार खेलने गए और अभी तक लौटकर नहीं आए। और यह ऐसा पहला ही अवसर न था। हां, अब उनकी अवधि बढ़ गई थी। पहले वह एक सप्ताह में लौट आते थे, फिर दो सप्ताह का नंबर चला और अब कई बार से एक-एक महीने की ख़बर लेने लगे। ... शिकार से लौटते तो घुड़दौड़ का राग छिड़ता। कभी दिल्ली, कभी बम्बई, कभी पूना। घर पर रहते, तो अधिकतर लम्पट रईसज़ादो के साथ गप्पें उड़ाया करते।
पति का यह रंग ढंग देख यशोदा मन- ही- मन कुढ़ती और घुलती जाती थी। कुछ दिनों से हल्का-हल्का बुख़ार भी रहने लगा था। यशोदा बड़ी देर तक बैठी उदास आंखों से, गैरेज में ढांचा बनी कार को देखती, जो उसे अपने भविष्य से रुबरू कराती थी।
बड़े कुंवर साहब, ने यशोदा को चिंतित देखकर कहा, 'प्रताप के रंग-ढंग ठीक नहींं है, मैं समझता हूं यही तुम्हारी चिंता का कारण है। तुम सोचती हो, 'ससुर जी के बाद क्या होगा?' फिर उन्होंने कार की सीट की गद्दी हटाई। उसमें एक मखमली बक्सा रखा था। उन्होंने यशोदा से कहा, 'इसमें हमारे कुल देवता विराजमान है। किसी कारणवश यह एकांतवास में हैं। इनके रहते इस परिवार पर कोई आपदा नहीं आएगी। एक बात की गाठ बांध लो, कभी तुम्हें यहां से जाना पड़े, अथवा कार बेचना पड़े, तो मूर्ति निकाल लेना नहीं तो अनर्थ हो जायेगा।'
यशोदा ने श्रद्धा पूर्वक कुलदेवता को नमन किया और बक्से पर जमी धूल साड़ी के पल्लू से साफ की। फिर ससुर जी से बोली, 'आपकी दवाई का समय हो गया, लेकर आती हूं। वो दवाई लेकर आई, तब तक ससुर जी स्वर्ग सिधार चुके थे।
यशोदा ने ज़िमिंदारी का काम-काज देखने वाले मुनीम से पूछा, 'कुंवर प्रताप की कोई ख़ैर- ख़बर है?' ... जी हां, साहब ने एक बारहसिंगा मारा है।' यशोदा ने जलकर कहा, 'मैं यह नहीं पूछती, उन्हें ससुर जी की मृत्यु का समाचार भेज दीजिए।' कुछ दिन पश्चात कुंवर प्रताप लौटे। उन्होंने बारहसिंगा के सींग दीवार पर लगा दिए। आने-जाने वालो को सींग दिखाते और शिकार की डींगें हाकते।
तैरहवीं के बाद मुनीम ने कुंवर प्रताप को बताया, 'सब कुछ गिरवी पड़ा है, पता नहीं कैसे बड़े कुंवर साहब घर चलाते थे?' ...उन्होंने मुनीम से गुस्से में कहा, 'आप काम से काम रखिये, यह देखना हमारा काम है। ... वो आश्वस्त थे, पिता जी का छिपाया धन उन्हें फिर मालामाल कर देगा।
वह सारी मौजमस्ती छोड़ बक्से की तलाश में जुट गए। उन्होंने सारा घर खंगाल लिया, फर्श खोद दिया और दीवारें खोखली कर दी, पर बक्सा नहीं मिला।
उनकी हवेली और जायदाद के नीलामी की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। वह दिन भी आ गया उनके फाटक पर डुगडुगी बजने लगी। लोग नीलामी की बोली लगा रहे थे, जो दस लाख तक पहुंच चुकी थी। यशोदा को ससुर जी को दिया वचन याद आया। उसने कुलदेवता को साथ ले जाने के लिए कार में रखा बक्सा खोला। खचाखच हीरे जवाहरात से भरे बक्से में कुल देवता की सोने की मूर्ति रखी थी। उसने ग्यारह लाख की बोली लगाई जिससे जायदात नीलामी से बच गई।
यशोदा कुल देवता की मूर्ति को सीने से लगाए बैठी थी‌। कुंवर प्रताप ने प्रसन्न होकर यशोदा से मूर्ति को घर में बने मंदिर में रखने को कहा पर यशोदा ने मना कर दिया। उसकी दलील थी, जिस घर के, स्वामी के हाथ निरीह प्राणियों के खून से रंगे हों और दीवार पर हिरन की खाल और बारहसिंगा के सींग लगे हो, वह घर देवता का वास नहीं हो सकता।
कुंवर प्रताप यशोदा को घर में आने के लिए मनाते रहे। हालांकि उन्हें न यशोदा में‌ दिलचस्पी थी न देवता में श्रद्धा। उन्हें करोड़ों की मूर्ति की सुरक्षा की चिंता थी।
देर रात कुंवर प्रताप को नींद आ गई तो यशोदा छुपते-छिपाते मूर्ति को लेकर एक मंदिर में गई। वहां पीतल की मूर्ति की जगह सोने की मूर्ति रख दी। वहां से पीतल की मूर्ति अपने साथ ले आई और कार में रखे मखमली बक्से में रख दी।
कुंवर प्रताप नींद से जागे तो उन्होंने यशोदा से जीव हत्या न करने का वादा किया। यशोदा उनका भरोसा करके घर में आ गई और मूर्ति को घर के मंदिर में विराजमान कर दिया।
कुछ दिन तक कुंवर प्रताप ने अपना वादा निभाने का ढोंग किया। फिर एक दिन उन्होंने कुल देवता की हूबहू पीतल की मूर्ति बनवाई। उसे मखमली बक्से में रख दिया और मखमली बक्से में रखी मूर्ति को बेचने ले गए।
सुनार से उन्हें पता चला कि मूर्ति पीतल की है। वह समझ गए, यशोदा ने पहले ही सोने की मूर्ति की जगह पीतल की मूर्ति रख दी थी। उन्होंने यशोदा से मूर्ति का पता जानने का हर संभव प्रयास किया। उसका उत्तर था, 'कुल देवता सही जगह विराजित है। जब हमारा घर देवता के वास योग्य हो जाएगा तब ले आउंगी।'
यशोदा का स्वास्थ्य चिंताजनक हो गया था। कुंवर प्रताप पश्चाताप की मुद्रा में यशोदा के पास आए। उसे सहारा देकर हवेली की बगिया में ले गए। उन्होंने अपने शस्त्र बारहसिंगा के सींग और हिरन की खाल के साथ दफन कर दिए। फिर पूछा, 'क्या मेरे हाथ पवित्र हो चुके?'
यशोदा के चेहरे पर विजयी मुस्कान आई और उसकी आंखों से बेसाख़्ता आंसू बहनेे लगे। उसने कुंवर प्रताप की ओर उन निगाहों से देखा जब बरसों पहले उसने उन्हें दिलो- जान से चाहा था। फिर उनके हाथ अपने हाथों में लेकर चूम लिये और उन्हें मूर्ति का पता बता दिया। वह प्रसन्न थी दुनिया को अलविदा कहने से पहले उसका घर देवता का वास बन गया था।'
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