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किसान व हलवाई की कहानी

किसान व हलवाई की कहानी
 
एक गाँव में एक हलवाई की दुकान थी व गाँव में अनेक किसान रहते थे ।
एक किसान थक - कर खेतो में लौट रह था | उसे भूख भी बहुत लगी थी लेकिन जेब में चंद सिक्के ही थे | रास्ते में हलवाई की दुकान पड़ती थी | किसान हलवाई की दुकान पर रुका तो उसकी मिठाइयो की सुगंध का आनंद लेने लगा |
 
हलवाई ने उसे ऐसा करते देखा तो उसे कुटिलता सूझी | जैसे ही किसान लौटने लगा, हलवाई ने उसे रोक लिया |
 
किसान हैरान होकर देखने लगा | हलवाई बोला- पैसे निकालो | किसान ने पूछा पैसे किस बात के ? मैंने तो मिठाई खाई ही नहीं |
 
जवाब में हलवाई बोला - तुमने मिठाई खाई बेशक नहीं हैं लेकिन यहाँ इतनी देर खड़े होकर आनंद तो लिया हैं न |
 
मिठाई कि खुशबू लेना मिठाई खाने के बराबर हैं | तो तुम्हे उस खुशबू का आनंद उठाने के ही पैसे भरने होगे |
 
किसान पहले तो घबरा गया लेकिन थोड़ी सूझ - बूझ बरतते हुए उसने अपनी जेब से सिक्के निकले |
 
उन सिक्को को दोनों हाथो के बीच डालकर खनकाया | जब हलवाई ने सिक्को कि खनक सुन ली तो किसान जाने लगा तो |
 
हलवाई ने फिर पैसे मांगे तो उसने कहा - जिस तरह मिठाई कि खुशबू लेना मिठाई खाने के बराबर हैं, उसी तरह सिक्को कि खनक सुनना पैसे लेने के बराबर हैं |
 
अथार्त : हम अपनी सूझ - बूझ से मुश्किल से मुश्किल कार्य को आसानी से हल कर सकते है |