Naiya - 2 in Hindi Love Stories by Sharovan books and stories PDF | नैया - भाग 2

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नैया - भाग 2

नैया/सामाजिक उपन्यास/ दूसरा भाग/ शरोवन


***

तब दुलारे चाय का पानी रखने चला गया और सुधा पुन: अपने बालों को सुखाने लगी ।
दुलारे सुधा के घर का नौकर था और उम्र में वह उसके पिता से भी काफी बड़ा था । सुधा को उसने गोद में खिलाया था । वह एक लम्बे समय से सुधा के घर मेँ नौकरी कर रहा था ।
वह चाय बनाने में लीन था और सुधा अपने बालों को शीघ्र ही सुखा लेना चाहती थी । इसलिए उन्हें खुले छोडकर वह बाहर घर की गैलरी में आ गई । पर वहाँ से अपने पिता की बातों का स्वर सुनकर एक बार को ठिठक गई, क्योंकि उसके अनुमान के अनुसार उसके पिता को इस समय कचहरी में होना चाहिए था । अक्सर वे आठ बजे प्रात: ही कचहरी पहुँच जाया करते थे, पर आज़ उनके कमरे का द्वार खुला देखकर उसके लिए आश्चर्य करना स्वाभाविक ही था । वे कचहरी नहीं गए थे, इतना तो वह समझ ही चुकी थी । सहसा ही दुलारे ने उसे आवाज़ दी, "बिटिया ! चाय वहीँ ले आऊँ या यहीं नाश्ते की मेज़ पर लगा दूँ?”

तब वह दुलारे के पास पहुँची और चाय का प्याला अपने हाथ में लेकर उससे कहा,

"मैँ यह चाय वहाँ गैलरी में धूप में बैठकर पीती हूँ । आप ऐसा करो कि दो प्याले चाय वहाँ पापा के पास भी पहूँचा दो ।
"ठीक है ।" फिर थोड़ा रुककर वह आगे बोला,

"मैंने दोपहर का खाना बना दिया है । बाबूजी आज़ कचहरी नहीं जा रहे हैं, सो वे भी यहीं खाएँगे। शाम के लिए सब्जी नहीं है, सो मैँ उधर से आते वक्त लेता आऊँगा, तभी शाम का खाना भी बनाऊँगा ।"
" अच्छा, ठीक है, और हाँ, शाम को अब गर्म कपड़े पहनकर आया करो । देखा नहीं, ठण्ड पड़ने लगी है ।” सुधा ने कहा ।
इसके बाद दुलारे चला गया और सुधा वहीं गैलरी में एक कुर्सी पर बैठकर चाय पीने लगी ।
फिर अचानक ही उसके पिता के कमरे से किसी जाने-पहचाने पुरुष के स्वर को सुनकर उसके कान खड़े हो गए । उसने वहीं से उनके कमरे में देखना चाहा, पर कुछ देख न सकी । फिर सोचा कि खुद ही वहाँ चली जाए, पर यह सोचकर कि यह उसके पिता का कारोबारी मामला है, उसे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । साथ ही यूँ भी दो जनों की व्यक्तिगत चार्ता के मध्य किसी भी प्रकार से विघ्न डालना शिष्टाचार के विरुद्ध भी होता है, क्योंकि सामाजिक दायरे इस हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देते हैँ- चाहे बात करनेवाले आपस में कितने ही घनिष्ठ क्योंकर न हों । ऐसा सोचकर सुधा वहीँ बैठी रही- चुपचाप ।
परन्तु फिर भी उसके कान उन दोनों के स्वरों से सचेत अवश्य हो चुके थे- इस संशय में कि दूसरे पुरुष का स्वर जो जाना-सुना-सा लगता है, किसका हो सकता है ? कौन है वह ?
तभी उस पुरुष ने कहा,

"तो इसमें इतना अभी से परेशान होने की क्या बात है ?"
" परेशान ? देखिए शर्माजी, मैं यह कैसे सहन कर लूँगा कि जो कहानी मेरे साथ घटित होकर पूर्ण हो चुकी है, वही मेरी बेटी के साथ फिर से दोहराई जाए ?“
“ आपका मतलब ?"
“ मतलब यह है कि आपको तो अच्छी तरह से ज्ञात है कि मैरे विवाह से पूर्व मेरी पुत्री की माँ का किसी से भी कोई सम्बन्ध नहीं था, पर मँगनी के पश्चात् संयोग से एक दूसरा पुरुष मेरी पत्नी के जीवन में आ गया था । "
"आपका मतलब है कि वही कनुराज, जिसने संयोग से बीच बाजार में आपकी पत्नी का पर्स किसी पर्स-चोर से छीनकर वापस किया था । "
"हाँ ! वही । उस पर्स में उस समय तीस हजार रुपये थे । मेरी पत्नी बैंक से कैश लेकर आ रही थी कि तभी गाड़ी में बैठने से पूर्व ही एक आदमी बिजली की रफ़्तार से उसका पर्स छीनकर भाग गया था । तभी मेरी पत्नी ने सहायता के लिए किसी को पुकारा था और उस समय कनुराज साइकिल से वहाँ से गुज़र रहा था । मेरी पत्नी की विनती पर वह साइकिल से ही उस बदमाश को पकड़ने को दौड़ पड़ा था । बाद मैं पर्स प्राप्तकर, वह पर्स में लिखे पते के अनुसार घर पर वापस करने आया था । "
"हाँ, फिर ?"
“यहीं से वह मेरी पत्नी के जीवन में प्रवेश कर गया था । यह जानते हुए भी कि मेरी पत्नी किसी की मँगेतर है, वह उसे प्यार करने लगा था । ”
"लेकिन इससे क्या होता था ? विवाह तो आपकी पत्नी ने आपसे ही किया था । "
"हाँ, विवाह नहीं, रस्में पूरी अवश्य की थीं । इसमें कनुराज का कोई दोष नहीं था । शायद मेरी पत्नी की ग़लती अवश्य थी । तन से वह मेरे साथ जुड़ गई थी, पर मन से वह सदैव कनुराज से जुडी रही थी । ” कहते-कहते सुधा के पिता संजीदा हो गए ।
“ और इसी सन्देह के कारण आपने उन्हें तलाक देकर घर से निकाल दिया था और तलाक भी कानूनी तौर पर आसानी से मिल गया था क्योंकि पेशे से आप वकील जो ठहरे । "
" ?" शर्मा नाम के पुरुष थोड़ी देर को ठहरे, फिर आगे बोले,

" लेकिन मैं नहीं मानता कि आपकी पत्नी कनुराज से वाक़ई प्यार करने लगी थी । यह आपका शक था । अगर ऐसा होता तो वह आपसे हरगिज़ विवाह नहीं करतीं । खैर, छोड़ीये इन बातों को । यह बताइए कि इन बातों से आपकी बेटी का क्या सम्बन्ध है ?" 'उन्होंने पूछा ।

इस पर सुधा के पिता ने कहा,

"मेरी बेटी के साथ भी यही सब होने जा रहा हैं ।
"वह कैसे ?"
" आपको तो मालूम है कि मेरी पुत्री की सगाई हो चुकी है । "
"हाँ । सागर नाम के युवक से । "
" और दो बार उसकी किसी पुरुष ने जान भी बचाई थी । "
"हाँ, सुना तो अवश्य है पर इससे उसका सरोकार क्या है ?"
" और यह भी ज्ञात है कि मेरी बेटी मॉडलिंग में भी रुचि लेती है । ”
"हाँ…यह भी कोई छिपी बात तो नहीं है । अधिकांशतय: पत्रिकाओं के मुख्य पृष्ठ पर उसके फ़ोटो देख लेते हैं ।”
"तो समस्या यह है कि मेरी पुत्री सागर से विवाह करेगी और माँझी नाम के युवक ने दो बार उसकी जान बचाकर उसके हदय में अपना स्थान बना लिया है और यही माँझी एक मूर्तिकार भी है, जिसको मेरी बेटी की 'स्टेच्यु' बनाने का ऑफर एक बड़ी कम्पनी से मिला है ।“
" यह तो कोई बडी समस्या नहीं है । ”
"कठिनाई यह है कि यह मूर्तिकार मेरी बेटी को प्यार करता है और मैं नहीं चाहता कि विवाह के पश्चात मेरी बेटी का होनेवाला पति सागर भी मेरी ही तरह अपनी पत्नी को उस मूर्तिकार की वज़ह से सन्देह की दृष्टि से देखे और बाद मैं वह न करे जो मैंने आवेश में आकर कर लिया था। बीस वर्ष पहले मैंने अपनी निर्दोष पत्नी को इस घर से निकाला था और संयोग देखिए कि आज बीस वर्ष बाद वही सब कुछ पुन: होने के आसार दिखाई दे रहे हैं । लगता है कि भगवान मुझे प्रायश्चित करने का अवसर भी नहीं देना चाहता है ।” कहते-कहते केशवचन्द्र वर्मा का स्वर भारी हो गया । उनकी आँखों में प्रायश्चित्त और पश्चाताप के प्रतिबिम्ब स्पष्ट झलकते प्रतीत हो रहे थे ।
“खैर ? यह बताइए कि आपकी बेटी को यह सब मालूम है । ” उन्होंने पूछा ।
"नहीं । उसने कभी पूछा नहीं और मैंने बताया नहीं । अगर पूछेगी भी तो मैं उससे कुछ छिपाऊँगा भी नहीं । "
“वैसे मेरे ख़याल से उसे यह सब अब बता देना चाहिए क्योकि इसी मैं उसकी भलाई है।"

मुझे आशा है कि पहले तो वह ये ग़लती कभी नहीं करेगी, जो उसकी मॉ ने कभी अगर की भी है और अगर वह ऐसा सोचती भी होगी तो उसे अपनी माँ के अतीत से एक सबक भी मिलेगा । वैसे भी वह बहुत ही अनुशासनप्रिय और स्वावलंबी लइकी है और बहुत ही समझदार भी । आपके साथ जो कुछ भी हुआ है या जो आपने किया था, वह सब परिस्थितियों-वश हुआ था । किसी विशेष उद्देश्य से नहीं । ऐसा समझते हुए आपको भी दोष नहीँ दे सकेगी वह । ”
"मैं भी यही समझता हूँ लेकिन उसे यह सब बताएगा कौन ? " सुधा के पिता ने पूछा ।
"वह आप मुझ पर छोड़ दीजिए । मैँ उसे समझा लूँगा । आखिर अंकल हूँ उसका । बेटी समान उसे अपनी गोद में बिठाया है । "

. . .सुनते-सुनते सुधा की छाती पर साँप लोट गया । ऐसा तो उसने कभी सोचा भी नहीं था । न ही कभी उसने इस प्रकार की कोई अनहोनी-सी बात पहले सुनी भी थी । उसके दिल में धक-सी होकर रह गई । क्षणभर को वह यह निर्णय भी नहीं कर पाईं कि वह किसे दोष दे ? पिता को या माँ को ? पिता ने उसे इतना अधिक प्यार दिया है कि इस अपार प्यार के आगोश में डूबकर वह कभी अपनी माँ की ममता की गोद की कमी भी महसूस नहीं कर सकी थी । फिर कौन जानता है कि उसकी माँ ने कोई ग़लत पग उठाया भी था या नहीं ? अगर नहीं भी उठाया था, तो भी उसके पिता के स्वरों से एक ' प्रायश्चित ' की आवाज़ भी आ रही है- कितने दुखित हैं वे ? किस क़दर परेशान ? ऐसे में यदि वह भी उनको अपनी दृष्टि में एक गुनहगार समझने लगेगी, तो कितना अधिक वे दूट सकते हैं । किस कदर उनको पीड़ा होगी । किस हाल तक वे दोहरे पश्चाताप की आग में जलते रहेंगे ? फिर जो ग़लत सजा वह उसकी माँ को दे चुके हैं, उसका परिणाम वे अभी तक भुगत रहे हैँ । तिल-तिल करके प्रतिदिन जलना और सुलगता । मन-हीँ-मन हर रोज़ अपने-आपको कम करते रहना । इससे बढ़कर सजा उनके लिए और क्या हो सकती है ? फिर यह तो वह भी जानती और समझती है कि जो मनुष्य प्रतिपल अपने-आपको थोड़ा-थोड़ा करके मार रहा है, ऐसी मृत्यु उस मृत्यु से कहीँ अधिक पीड़ादायक और कष्टभरी होती है, जो एक बार ही होती है ।

सहसा ही सुधा का ध्यान भंग हुआ, तो वह सहम-सी गई । उसने इधर-उधर निहारा... आसपास कोई भी नहीं था । चाय के प्याले की और देखा, उसमें रखी हुईं चाय पूरी तरह ठण्डी हो चुकी थी । ठीक उसके दिल की सोचों और भावनाओं के समान ही । अब उसके हदय में न ही कोई चिंगारी थी और न ही कोई शोला । सिर्फ उबलती हुईं भावनाओँ की वह राख थी, जो किसी भी प्रतिशोध की गर्मी और घृणा की कीचड़ में आने से पूर्व उड़ चुकी थी ।

इसी बीच उसके पिता के कमरे का द्वार खुला और साथ ही दोनों का वार्तालाप का स्वर बाहर आता हुआ प्रतीत हुआ, तो वह और भी अधिक सँभलकर बैठ गई । उसके पिता अपने मित्र शर्मा के साथ बाहर आ रहे थे । उसके पिता ने भी यूँ उसको बाहर धूप में बैठे देखा तो चौंक अवश्य गए । साथ ही उनके मित्र भी । फिर वे दोनों ही सुधा के पास तक चले आए । तब सुधा उन दोनों को अपनी तरफ़ आते देख, उठकर खडी हो गई- उनके सम्मान में ।

" अरे बेटी ! तुम अभी तक यहाँ ? कॉलेज नहीं गई क्या ?”
“नहीं, आज छुटटी ले ली है । " सुधा बोली ।
“और इन्हें देखो, पहचानती हो इन्हें ? " उसके पिता ने साथ में खड़े शर्माजी की और इशारा करके पूछा ।
इस पर सुधा ने उन सज्जन की ओर निहारा, फिर हल्के-से मुस्कराते हुए बोली,

" आप अंकल शर्माजी हैं; पिछली दीपावली पर यहॉ आए थे । ”
"बिलकुल ठीक पहचाना । ” कहकर शर्माजी मुस्करा पड़े ।
"बेटी ! शर्माजी को मैँने एक काम के सिलसिले में यहाँ बुलाया है । शाम का खाना यह घर पर ही खाएँगे । अभी हम लोग कचहरी जा रहे हैं; अगर देर हो गई तो शर्माजी हमारे साथ रात को भी यहीं रुकेंगे । तुम तो घर पर रहोगी, सो जैसा उचित समझो वैसा खाना और प्रबंध कर लेना."
"जी अच्छा !" सुधा ने हांमी भरी ।
“ अच्छा, सुधा बेटी ! शाम खाने की मेज़ पर अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट खाने के साथ फिर भेंट होगी। " अब की बार शर्माजी ने कहा ।
इसके पश्चात वे दोनों हाथ हिलाते हुए चले गए और सुधा उनको चुपचाप जाते हुए निहारती रही।
फिर काफी देर तक वह गुमसुम-सी खड़ी रही । पलभर को उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि अब क्या करना चाहिए ?
फिर थोडी देर बाद ही वह चाय का प्याला उठाए हुए अन्दर आ गई ।
बाल अब तक उसके पूरी तरह से सूख नहीं पाए थे, सो वह ड्रेसिंग टेबल के सामने जाकर खड़ी हो गई । आईने में एक बार अपने को देखा । स्नान करने के पश्चात् उसका रंग और भी अधिक निखर आया था । लम्बे और भीगे बालों से पानी की बूँदें रिस-रिसकर मोतियों समान बालों के छोरों से लटकी हुईं थीं, तो कुछेक दूट-दूटकर नीचे फ़र्श पर बिखरती जा रही थीं । चेहरा भी ऐसा, जो भी एक बार देखे तो वहीं ठिठककर रह जाए । मुखड़ा यौवन की लाली से भरा हुआ । ओस से धूले-धुलाए फूल समान । झील जैसे ज़लकुंण्ड में डूबी हुईं भूरी-भूरी-सी हल्की नीली आँखें जो कभी भी काजल की आस न करें । वयसन्धि को पार करके यौवन के भरे-पूरे आँगन में खड़ा हुआ सुधा का सुन्दर शरीर ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे आकाश की ऊँचाइयों से उतरकर किसी रूप की देवी ने धरती के आँचल मेँ शरण ले ली हो ।

अचानक ही फोन की घण्टी बजी तो सुधा का ध्यान फिर भंग हो गया । उसने जाकर फोन उठाया और जैसे ही हलो बोला तो दूसरी तरफ़ से सागर की आवाज़ सुनाईं दी । वह पूछ रहा था कि, “ अभी तक घर पर हो । कॉलेज क्यों नहीं आईं ?"
"बस, ऐसे ही थोड़ी तबीयत ठीक नहीं थी ।"

"क्यों, क्या हो गया ?”
“ घबराने की कोई बात नहीं है । रात देर में सो सकी थी, और तबीयत भारी-भारी थी । ” सुधा ने कहा ।
" अब क्या इरादा है ? " सागर ने पूछा ।
"घर पर रहने का ।"
"क्यों ?”
“पापा के मित्र शर्मा जी आए हुए हैं, और शाम का खाना घर पर ही खा रहे हैं । हो सकता है कि वे रात को घर पर रुक भी जाएँ । ”
“ ओह ! अच्छा ! " कहकर सागर थोड़ी देर को रुका ।
"तुम ऐसा करना कि शाम को घर पर ही आ जाना. यहीं खाना भी खा लेना ।” सुधा ने कहा ।
“ ओ. के., ठीक है. मैं देखता हूँ । और हाँ, तुम्हारे उस मूर्तिकार का क्या हुआ ?" सागर ने पूछा "? "
"उसे मना लिया है ।"
" अच्छा, कैसे ? " सागर ने आश्चर्य से पूछा ।
"वह शाम को आओगे, तब बताऊँगी । "
"तो शाम के खाने पर क्या उस मूर्तिकार को भी निमन्त्रण दिया है तुमने ? "
"क्यों? पागल हूँ मैं क्या ? अपनी मुसीबत नहीं करनी है मुझे "
"नहीँ, मैं तो ऐसे ही पूछ बैठा था । "
"तो मत किया करो ऐसी बातें मुझसे ।"
“क्यों ?”
“मजाक करने की बात नहीं है ये, मैं गम्भीर हूँ । "
“ क्या तुमने कभी उस पर ध्यान दिया है ? ”
"किस बात पर ?"

"मांझी की तुम्हारे प्रति रूचि पर?"
"यह तुम मुझसे कह रहे हो ।"
“क्यों ?"
" विवाह तुमसे करने जा रही हूँ । क्या तुम्हारी अब कोई भी जिम्मेदारी नहीं है मेरे प्रति ? " सुधा फिर गम्भीर हो गई ।
"इसीलिए तो तुम्हें सतर्क कर देना चाहता हूँ । "
"क्यों इतना डर है अभी से ?"
"तुम्हें पाकर कौन मूर्ख खोना चाहेगा ? "
"जब कोई वस्तु मिलनी नहीं होती है, तो कब हाथों में से आकर भी खिसक जाती है कुछ पता नहीं चलता है और इन्सान है कि बस हाथ मलता ही रह जाता है । ”
“क्यों, ताना दे रही हो क्या ?"
“बात तो तुमने ही छेड़ी थी । अब सुनने से परेशानी क्यों है ? "
"तुम्हारी किसी भी बात से मुझे भला परेशानी क्यों हो सकती है .? "'
"यह तो वक्त ही बताएगा, अभी क्या कहूँ । अभी तो शुरूआत ही है । "
" क्यों, मुझ पर क्या विश्वास नहीं रहा ? "
"तुम पर तो विश्वास है पर भाग्य और ज़माने का बदलता हुआ रवैया देखकर कभी-कभी सन्देह होने लगता है।"
“डॉक्टर बनने जा रही हो और भाग्य की लकीरों को देखकर निर्णय करती हो ।”
"क्यों, डॉक्टर भी तो किस्मतवाले ही बना करते हैं । "
“तो तुम्हारा मेरे बारे में जो निर्णय है, वह किस्मत का है या तुम्हारा ?"
"किसी का भी नहीं ।"
" इसका मतलब ? "
" 'सागर' में डूब-मरने की जिद थी इसलिए... " सुनकर सागर खिलखिलाकर हँस पड़ा ।
“ अच्छा, मैं चलती हूँ । थोड़ा-बहुत किचन वगैरह देख लूँ । " यह कहकर सुधा ने फोन रख दिया । '

दूर क्षितिज में सूर्यं की अन्तिम रश्मि भी अपना प्रभाव समाप्त करती, इससे पहले ही सुधा ने दुलारे के साथ मिलकर शाम का भोजन तैयार कर लिया था । उसके पिता और शर्माजी अब किसी भी समय आ सकते थे, सो वह शीघ्र ही तैयार भी हो गई थी ।
शाम के साढ़े छ: बज रहे थे और रात्रि का धुँधलका छाने लगा था । सुधा के पास अब उन लोगों के आने की प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त और कोई कार्य भी नहीं बचा था । इसलिए वह बालकनी में आकर खड़ी हो गई थी । जाड़े के दिन थे, सो यूँ भी दिन जल्दी ही छिप जाता था। आसपास के तमाम पड़ोसियों और घरों की बत्तियाँ भी जल उठीं थीं । चारों तरफ शाम की शान्तिभरी रौनक दिखाई दे रही थी । बस्ती के कुछेक बच्चे अभी भी बाहर मैदान में भाग-दौड़ रहे थे ।
सुधा अभी तक बाहर ही खड़ी-खड़ी सबको निहार रही थी- ऐसे ही, बेमन से । कभी वह कहीं दूर आकाश में छाती हुईं धुंध में अनजाने ही कूछ-न-कुछ दूँढ़ने की कोशिश करने लगती थी ।
जब खड़े-खड़े उसे काफी देर हो चुकी, तो वह निराश होकर अन्दर कमरे में आ गई । एक बार किचन की ओर देखा- खाली, सुनसान-सा, इस बात की गवाही दे रहा था कि हर रोज़ की तरह दुलारे आज भी अपना काम समाप्त करके जा चुका था । फिर किचन को निहारती हुई सुधा डाइनिंग-हॉल को पार करती हुई अपने कमरे की ओर बढ़ी । एक नज़र उसने मेज़ पर सजे हुए विशिष्ट प्रकार के भोजन और व्यंजनों पर डाली । उसे लगा कि सजे हुए भोजन और खाली प्लेटें इत्यादि मेहमानों की अनुपस्थिति के कारण जैसे उसको मुँह चिढ़ा रहे थे ।
तब वह अपने कमरे में आ गई । आकर टेलीफोन उठाया और सागर का नम्बर डायल किया । थोडी देर तक घंटी बजती रही । जब वहाँ से भी किसी के न होने का आभास हो गया, तो उसने पुन: फोन अपने स्थान पर रख दिया । अब वह क्या करे ? कैसे समय पास करे ? कोई भी तो आया नहीं है अभी ?’ ऐसा ही कुछ सोचते हुए सहसा ही उसकी दृष्टि रेडियो की और गई, पर ध्यान आया कि टी. वी. ही खोलकर बैठा जाए । सोचकर उसने टी. वी. आँन कर दिया । थोड़ी ही देर में जब टी. वी. ने अपना परिचय देना आरम्भ किया तो तुरन्त ही उसके कान ऐँठते हुए बन्द भी कर दिया । उसमें कोई महाशय कृषि के बारे में किसी विशेष प्रकार के बीजों मेँ कीड़े लगने का कारण बता रहे थे ।
बाद में निराश होकर उसने रेडियो आँन कर दिया । उसमें फिल्म 'उपहार' का गीत गायक मुकेश और उसके सहयोगियों द्वारा प्रसारित किया जा रहा था । गीत के बोल थे,
माँझी नैया ढूंढ़े किनारा...
कभी तो समझोगे तुम ये इशारा...
सुधा ने सुना तो उसे लगा कि अचानक ही जैसे किसी ने उसकी दुखती हुईं रग पर हाथ रख दिया हो । उसकी सोई हुई दर्दीली पलकों के भीतऱ जैसे किसी ने झाँकने की चेष्टा की हो । बार-बार उसके मस्तिष्क में एक ही ख़याल, एक ही बात घर कर बैठती थी कि यह कैसा संयोग था कि जो कुछ भी न होकर भी बहुत कुछ था । कैसी वेदना थी, जो न तो उससे सम्बन्धित थी और न ही उसकी अपनी थी, पर फिर भी उसकी स्मृतिमात्र से ही एक अनकहे दर्द को कसक से वह विचलित हो जाती थी । उसको आँखों के अन्दर वह कौन-सी तस्वीर थी, जिसे वह खोलकर देखती, तो वह ग़ायब हो जाती थी, और बन्द करने पर उससे तरह-तरह के प्रश्नों के साथ अपने चलचित्र दिखाने आरम्भ कर देती थी ।
माँझी. . .? केवल इस एक नाम ने, मात्र इस अनबूझे व्यक्तित्व ने ऐसा उसके साथ क्या कर दिया है कि वह उसके नाम सुनने भर से ही परेशान हो जाती है । वह उससे कुछ कहना चाहती है । सारी बातें स्पष्ट कर देना चाहती है, पर उसके सामने आकर कह नहीं पाती है और 'वह' बिना कहे, बिना सामने आए ही उससे वह तमाम बातें कह जाता है, जिन्हें सुनने का उसे अब कोई अधिकार भी नहीं रहा है । क्या सम्बन्ध है उसका इस लड़के से ? कौन सा रिश्ता वह उससे जोड़ बैठा है ? कोई भी तो नहीं । बस एकमात्र मानवीय रिश्ता अवश्य है, लेकिन फिर क्यों उसे माँझी के खयाल से परेशान होना पड़ता है ? क्यों उसको इस लड़के पर तरस आता है ? जो कुछ वह चाहता है, 'वह' वह उसको दे नहीं सकती है, तो फिर क्यों नहीं उसे स्पष्ट मना कर देती है, ताकि आगे के लिए किसी को भी कोई शिकायत और शिकवे न रहें । पर वह ऐसा भी तो नहीं कर रही है, क्योंकि जब भी वह उसके सामने आया, उसकी वही बिना झोली फैलाए जिन्दगी की ढेर सारी हसरतों की भीख माँगती हुई आँखें, बार-बार उसको अपनी बुझी-बुझी लालसाओँ को याद दिलाने की कोशिश करती हुईं उसके चेहरे की भरपूर खामोशियाँ, जुबान काटकर जैसे बोलने और चिल्लाने की सजा देते हुए उसके बंद ओठ और बाद में कुछ भी न प्राप्त ओठों पर एक निराश और थकी हुई जिन्दगी के साथ उसके लौटते हुए कदम- जाते-जाते भी, कई बार पीछे मुड़-मुड़कर उसको एक आस और उम्मीदभरी निगाहों से देखती हुईं उसकी भिक्षा माँगती हुई आँखें- उसकी निराशाएँ- उसके दिल की वेदनाएँ, जैसे उन दोनों के पिछले किन्ही जन्मों के दूटे-फूटे और बिखरे हुए रिश्तों की स्मृतियाँ दोहराने की चेष्टा कर रही हों।
क्या यह आवश्यक हो जाता है कि यदि कोई मात्र अपनी और से किसी को चाहने लगता है । उसे प्यार करता है, तो वह लड़की भी उसका खयाल रखे ? क्या यह उसका कर्तव्य हो जाता है कि किसी के प्यार-भरे सन्देशों का प्रत्युत्तर प्यार-भरी शहनाइयों से ही दिया जाए ? नहीं ! तो फिर वह क्यों परेशान होती है ? क्यों उसकी चिन्ता करती है ? क्यों उसकी परेशानी देखकर वह स्वयं विचलित हो जाती है ? क्यों उसको देखकर अपने से मलाल करती है ? यदि वह किसी को चाहते हुए भी कोई भला नहीं कर सकती है, तो उस बात को भूल जाना ही बेहतर है ...और फिर क्या यह माँझी का दोष नहीं है कि वह क्यों उस दरवाजे को एक आशा से खटखटाता है, जिसके अन्दर पहले ही से कोई शरण ले चुका है । संसार भर के और भी तो दरवाजे उसके लिए खुले हैं । कहीं भी जा सकता है । मेरी बला से । चाहे सड़कों पर आवारा फिरे और चाहे मक्रील से बातें करें । मेरे पीछे क्यों पड़ा हुआ है ? क्यों मेरी मुसीबत करना चाहता है ? सारी दुनिया में बस एक यही बचा हुआ था मेरी गाड़ी के नीचे आने के लिए ?

अचानक ही बाहर के दरवाजे की घण्टी बजी, तो सुधा के विचारों का ताँता टूट गया । वह खयालों से वापस आ गई । रेडियो पर इस समय कोई अन्य गीत प्रसारित हो रहा था- 'बिन बदरा के बिजुरिया कैसे चमके... । '
वह जल्दी से उठी । अपने को ठीक किया और फिर रेडियो बन्द करके बाहर दरवाजा खोलने चली गई । फिर जैसे ही उसने दरवाजे के पट खोले, उसे लगा कि अचानक ही जैसे किसी ने उसे मछली के स्थान पर जीवित साँप पकड़ा दिया हो । उसकी प्रतीक्षा में प्यासी आशाओं के विपरीत उसके सामने माँझी खड़ा था- बहुत चुपचाप । बुझा-बुझा- थका हुआ । अपनी लुटी हुई हसरतों का हिसाब लिए, जेसे फिर एक बार अपनी बेदर्द हसीना से कोई फ़रियाद करने आया था।
" आप... ?"
"अब...और इस समय ?"
सुधा ने उसको भेदभरे ढंग से देखते हुए पूछा,

"मैं कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर जा रहा था । " माँझी ने खड़े-खड़े ही अपने गम्भीर स्वर में कहा ।
“...? “
सुधा के मन में आया कि उससे कह दे, कहीँ भी जाना है तो जाओ । यहाँ मुझे क्यों सुनाने आए हो ?” परन्तु फिर यह सोचकर कि दहलीज़ पर आए हुए किसी भी व्यक्ति को बगैर किसी संगीन अपराध के फटकारा और लताड़ा नहीं जाता हैं, अपने दिल के जोश को वहीं दबा गई । 'शायद कोई व्यापारिक वार्ता के सिलसिले में आया हो ?' ये सोचकर वह उसको गौर से निहारते हुए बोली, “ आइए, अन्दर बैठते हैं पहले । ”
"शायद आप कहीं जाने की तैयारी में हैं, अथवा किसी की प्रतीक्षा कर रही हैं, इसलिए मैं अपनी बात यहीं समाप्त कर देना चाहता हूँ । " माँझी ने उसकी रूप-सज्जा को निहारते हुए कहा ।
"बगैर सूचित किए हुए किसी का दरवाजा खटखटाना आपका रिवाज़ हो सकता है, लेकिन बिना बिठाए किसी को वापस भेज देना हमारे परिवार की रीति नहीं है । अन्दर आइए पहले । " यह कहकर सुधा ने दरवाजा खोला और उसका पट पकड़कर एक तरफ़ हो गई ।
“ आप शायद ग़लत समझ बैठी । मैँने फोन भी किया था, पर आपका फोन काफी देर से व्यस्त आ रहा था, और मुझे अभी ही जाना है । " माँझी ने अन्दर आते हुए कहा ।
तब सुधा अन्दर आ गई । पीछे-पीछे माँझी भी आ गया । मेहमान-कक्ष में आकर वह उसे सोफे की ओर इशारा करते हुए बोली, "बैठिए क्या पीना पसन्द करेंगे ?"
“ आपको तो मालूम है कि मै चाय, कॉफी, सिगरेट और मदिरा कतई नहीं पीता हूँ । "
" और पानी पीने की आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि नदी के किनारों से जन्म-जिन्दगी की मित्रता जो कर ली है । " सुधा एक व्यंग्यभरी मुस्कान बिखेरते हुए बोली ।
"हर आदमी का जीने का कोई-न-कोई बहाना या सहारा तो होता ही है । " माँझी ने तर्क दिया "लेकिन दरिया के किनारे बैठकर अपने-आपको एक झूठी तसल्ली और झूठे सहारे की आस पर कब तक जीवित रख सकेंगे ? ”
"जब तक उसमें बाढ़ नहीं आती । जब तक उसमें डूब नहीं जाता । "
“ क्या आपको मालूम है कि मरुस्थल में बनी हुई नदी में कभी बाढ़ नहीं आती है । "
“यह तो अपनी-अपनी पसन्द है । "
“पसंदें बदली भी तो जा सकती हैं । "
"शाकाहारी भोजन करनेवाला माँसाहारी भोजन कैसे खा सकता है? ”
"इलाज़ के लिए कड़वी दवाई भी तो खानी पड़ती है । "
“ उससे भी मरीज़ ठीक नहीं हुआ तो ?"
"तो फिर कैप्सूल, इन्जेक्शन और बाद में आप्रेशन करना पड़ता है । ”
" और आप्रेशन भी नाकामयाब रहा तो.. ?"
“तो फिर दोबारा आप्रेशन की गुंजाइश नहीं रहती है, और मरीज़ भी बेकार हो जाता है । "
“ लेकिन इससे क्या आप्रेशन करनेवाले डॉक्टर की कमजोरी जाहिर नहीं होती है ?”
"इसलिए तो कहती हूँ कि अनाड़ी डॉक्टर के पास आनेवाला मरीज़ मूर्ख होता है । उसे किसी अच्छे विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए और आपको शायद मालूम नहीं कि डॉक्टर केवल बीमारी का इलाज करता है, किसी भी बीमार का नहीं । "
“ ...?”
सुधा की इस बात पर माँझी क्षणमात्र को मौन हो गया । वह चुपचाप नीचे फ़र्श की और निहारने लगा । तभी सुधा ने पुन: बात आरम्भ की । वह बोली,

"खैर छोडिये ! एक बात पूछ सकती हूँ मैं ?"
" ? ” माँझी ने उसे प्रश्चसूचक दृष्टि से निहारा । फिर बोला, " क्या ?"
"कलाकार होने का यह आशय तो नहीँ कि अपना हुलिया बगैर किसी बात के ही बिगाड़ डाला जाए । ये निराश, फीका-फीका-सा चेहरा । बुझी-बुझी दृष्टि, बेमतलब बढ़ती हुई दाढ़ी । हर समय खोए-खोए-से क्या ढूँढ़ते रहते हैं आप ?”
"ढूँढा तो उसे जाता है जो खो जाए, लेकिन जब कोई वस्तु छिन जाती है तो उसकी क्या उम्मीद करूँ ? " माँझी ने बड़े ही निराश स्वर -मे' कहा ।
" दुनिया की इतनी बड़ी वास्तविकता का बखान कर रहे हैं तो फिर अपना ख़याल क्यों नहीं रखते हैँ आप ? "
" ख़याल रखूँ ! किसके लिए ? "
“ अपनी माँ के लिए, अपने पिता के लिए, अपनी बहन के लिए, और यदि दिल में कोई हसरत है तो अपनी होनेवाली पत्नी के लिए ! "
"जब जिन्दगी का सबसे बड़ा रिश्ता ही झूठा साबित होने लगा है तो फिर और किन रिश्तों को अपना समझूँ और किसको नहीं ?"
" एक मछली के मर जाने से समुद्र खाली नहीं हो जाता है । दुनिया इतनी बड़ी है । दुनिया को दुनियावालों की दृष्टि से देखेंगे तो जीने के बहुत सारे साधन मिल जाएँगे और अगर अपनी दृष्टि से देखेंगे तो जो कुछ देख रहे हैं, वह भी नहीं मिलेगा । "
"हाँ ! आप शायद ठीक ही कहती हैं । यह तो संसार का नियम है कि जिसके पास है उसे और दिया जाता है और जिसके पास कुछ भी नही है, उससे वह भी ले लिया जाता है, जो कुछ उसके पास है ।"

" यह भी तो हो सकता है कि जिसे आप अपना समझ रहे हों, वह आपका था ही नहीं । अगर फिर भी उसे आप पाने की लालसा कर रहे हैं, तो यह मतलब भी नहीं है कि वह आपकी विनती और आरजुओँ के कारण पिघलकर आपके क़दमों पर आकर गिर पड़े । रावण के अनुरोध पर सीता जैसी देवी ने लक्ष्मणरेखा पार करके जो ग़लती की थी, वह केवल इसलिए नहीं की थी कि वह एक ग़लती थी, बल्कि इसलिए भी की थी कि संसार की अन्य नारियाँ अपने जीवन में ऐसी ग़लती न दोहराने का सबक भी सीख लें । ”
“… ?”
सुंधा के इस बयान पर माँझी निरुत्तर हो गया । वह कुछ कह नहीं सका । जब कुछ नहीं बन सका तो निराश होकर पुन: नीचे फ़र्श को ताकने लगा ।
तब सुधा ने बात बदलते हुए कहा, "अच्छा छोड़िए, मैं भी क्या ले बैठी ? मैं तो भूल ही गई थी कि यह आपका व्यक्तिगत मामला है । खैर ! यह बताइए कि कितने दिनों के लिए बाहर जा रहे हैँ ?"
“ जल्दी भी आ सकता हूँ और कुछ दिन भी लग सकते हैं । " माँझी ने कहा ।
“क्या मैँ पूछ सकती हूँ कि काम क्या है ?”
"कोई विशेष नहीं, बस इधर कुछ दिनों से इस शहर में मन नहीं लग रहा है । " माँझी ने उदास होकर कहा ।
“वहाँ मन लग जाएगा आपका ?” सुधा ने पूछा ।
"शायद ।"
“ठीक है । कोशिश कर देखिए, लेकिन आप जल्दी नहीं आए तो मेरा काम ? मेरा मतलब आडवाणी का कांट्रेक्ट, मेरी 'स्टेच्यू' ?”
“ आप फोटो तैयार रखिए । मैं शीघ्र ही आकर काम शुरू कर दूँगा । चाहे यहॉ और चाहे वहाँ ।"

"यहाँ-वहॉ ? क्या मतलब ?" सुधा चौंक गई ।
“ आश्चर्य मत करिए । आडवाणी से मेरा कांट्रेक्ट यह है कि मूर्ति मेरी पसन्द के स्टूडियो में जहाँ मैं चाहूँगा वहीँ बनेगी । और मूर्ति मैं आपके कहने पर बना रहा हूँ , आडवाणी के कांट्रेक्ट के प्रभाव में नहीं । और मैंने आपसे वायदा किया है कि आपका यह कार्य अवश्य ही होगा । बस विश्वास रखिए । ”
यह कहकर माँझी उठ खड़ा हुआ, और सुधा के चेहरे पर प्रसन्नता के फूल खिल उठे । वह खुश होकर बोली, "कहाँ चल दिए ? खाना खाकर जाइए । सभी लोग आनेवाले हैं ।'
“मैं कैसे रुक सकता हूँ । जबरन अन्दर घुस आया हुआ मेहमान हूँ न ?" माँझी ने अपनी असमर्थता दिखाईं ।
"तो ठीक है, कम-से-कम एक गिलास पानी तो पीकर जाइए । इस विश्वास के साथ कि घर के साफ-सुथरे पानी में मक्रील के जल के समान बालू और मछलियों की बदबू तो नहीं होती है, और इसे पीनेवाला मानसिक रूप से बीमार भी नहीं पड़ता है ।" यह कहकर सुधा किचन में पानी लेने चली गई । फिर शीघ्र ही वह पानी लेकर वापस आईं और माँझी की ओर गिलास बढाते हुए बोली, "लीजिए और पीजिए...ओँर तुलना कीजिए नदी और घर के स्वभाव में । "

"क्या तुलना करूँ ? पानी तो पानी होता है । फ़र्क तो हम पीनेवाले लोग कर देते हैं । किसी को कुएँ का पानी अच्छा लगता है । किसी को नदी का और किसी को सागर का "
“... ?” खामोशी रही ।
इस पर सुधा ने उसे गौर से देखा । अपलक । बडी गम्भीरता से । फिर बोली, "यानी कि अपनी आदत से मज़बूर हैं । जाते-जाते भी ठहरे हुए जल में पत्थर फेंकने से चूक नही सकते हैं?
“ अच्छा, मैँ चलता हूँ । " कहकर माँझी चल दिया । सुधा उसे दरवाजे तक छोड़ने आईं । फिर दोनों ने एक-दूसरे को 'बाय' बोला और मुख फेर लिए ।
सुधा उसे काफी देर तक दरवाजे पर खडी-खड़ी देखती रही । निहारती रही और सोचती रही..॰यही कि कैसा अदूभुत, अनबूझा, न सुलझा-सा युवक है । ऐसा उलझा-उलझा-सा कि जो कोई भी उसे समझने और सुलझाने का प्रयास करे, वह स्वयं भी उलझकर रह जाए । क्या सारे कलाकार लोग ऐसे ही होते हैं ? न खुद चैन से रहना जानते हैं और न ही दूसरों को चैन से रहने देते हैं । बातों में से बात निकालेंगे और बात भी ऐँसी करेंगे कि बातों-ही-बातों में कोई बात अवश्य बन जाए । यह भी अनोखे और इनकी पसन्द भी अनोखी । ऐसी कि नाउम्मीद पहले, जैसे कि पत्थर तोड़कर प्यास बुझाने की जिद, ख्वाहिश या फिर इनकी कोई आदत ?
अचानक ही स्कूटर रुकने की आवाज़ आई तो सुधा अपने खोए हुए विचारों से वापस आ गई । उसने सामने देखा- सागर स्कूटर एक ओर खड़ा करके उसी की ओर आ रहा था । इस पर सुधा ने पहले तो एक बार उसे देखा, फिर कलाई से बँधी घड़ी पर दृष्टि डाली…रात्रि के नौ बजने जा रहे थे । इतना अधिक समय देखकर जैसे उसके मुख का स्वाद ही बिगड़ गया । वह दरवाजे के पट खुले छोड़कर अन्दर चली आई । सागर को अनदेखा-सा करके ।
सागर ने जब उसकी इस बेरुखी को देखा तो चोंक अवश्य गया । फिर एकदम से उसके पीछे आकर बोला, "सुधा ! "
इस पर सुधा उसकी बात अनसुनी करके अन्दर मेहमान-कक्ष में आ गई, बिना उसकी बात का कोई भी उत्तर दिए । तब सागर ने आश्चर्य से उसके सामने आकर पूछा, "क्यों क्या हो गया तुम्हें ? "
"यह वक्त है तुम्हारे आने का ? ” उत्तर में सुधा ने उलटा उससे प्रश्न कर दिया ।
" ओह ! मैं तो समझा था कि... ” सागर ने एक गहरी साँस ली, फिर आगे निश्चिन्त होकर बोला, " कोई और ही बात है । "
"तुम्हें मालूम है कि तुम्हें घर पर कितनी बार टेलीफोन कर चुकी हूँ । न घर पर हो और न ही यहाँ पर । पापा भी अभी तक नहीं आए हैं । सारा अकेला, . इतना बड़ा घर जैसे काटने को दौड़ता है । ”
सुधा के स्वंरो मेँ उसके प्रति शिकायतें थीं । झुंझलाहट थी ।
"मेरी ग़लती नहीं है । गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही थी, सो एक दोस्त का स्कूटर माँगकर तब यहाँ आया हूँ । "

सागर ने अपनी सफाई पेश की तो सुधा बोली,

"और मैं कहाँ चली गई थी, मुझे फोन कर देते तो मैं ही ले आती । ”
“नहीं, फिर सोचा कि अब तुम्हें क्यों हैरान करूँ । थोडी ही दूर की तो बात है । खैर ! गुस्सा छोड़ो और ये बताओ कि वह मक्रील का ठेकेदार आज यहाँ का रास्ता कैसे मूल गया था ? मैंने उसे इधर से जाते हुए ही देखा है । ”
"ठेकेदार ? ” सुधा ने उसके शब्द दोहराए । फिर विस्मय से उससे कहा,

“ये इतने निचले स्तर के पर्यायवाची उसके प्रति तुम्हारे मस्तिष्क में कब से आए ? ”
“तो क्या तुम भी अपनी सौत को दीदी कहकर पुकारोगी ? ”
“वह तुम्हारी सौतन है क्या ? ” सुधा ने पूछा ।
"लगता तो ऐसा ही है, लेकिन तुम्हें बुरा क्यों लगा, अगर उसको ठेकेदार . कह दिया ? “
"यह मत भूलो कि उस ठेकेदार के कारण ही तुम्हारे होनेवाली पत्नी आज तुम्हारे सामने सही-सलामत खड़ी है । वह मेरी इज्जत करता है । तुम्हें सम्मान देता है । हम सबका मान रखता है, फिर भी तुम उसको इस दृष्टि से देखते हो । कहाँ चली गई तुम्हारे परिवार की इन्सानियत?"

“देखो सुधा, अगर उसने तुम्हारी जान बचाई है तो उसको इसकी मुनासिब कीमत मिल सकती है, लेकिन अगर वह यह चाहे कि उसके इस एहसान के कारण मैं सारी उम्र उससे नज़रें झुकाकर बात करूँ, तो यह कभी नहीं हो सकता है। "
"कीमत और इसका यह ऋण चुकाने को तुम्हारे अन्दर इतनी हैसियत है ?” सुधा ने पूछा ।
“हाँ वह माँगकर तो देखे । पचास हजार. .एक लाख. दो लाख । ”
“ जाकर पूछकर तो देखो उससे । सुनकर बर्दाश्त भी नही कर सकोगे तुम कि वह क्या चाहता है?"
“ जानता हूँ कि वह क्या चाहता है । और जो वह चाहता है, उसे वह इस जन्म में तो क्या किसी भी जन्म में कम-से-कम मेरी ओर से तो कभी नहीं मिलेगा । और हाँ, तुम्हारा दृष्टिकोण यदि बदल जाए तो बात और है ।”
“.... ?”.
उसकी इस बात पर सुधा एकदम तुनक गई । तनिक आवेश में आकर, सागर की आँखों में आँखें डालकर, उसे सचेत करते हुए बोली,

"सोच-समझकर बात मुख से निकाला करो । ”
“मैं जानता हूँ कि तुम्हें बुरा अवश्य लगा होगा, लेकिन मैं भी मनुष्य हूँ । तुम्हारा होनेवाला पति हूँ । तुम्हें अगर कोई बुरी नीयत से देखेगा तो मैं कैसे सहन कर सकता हूँ ?" सागर ने उसके कन्धे पर हाथ रखते हूए, उसे समझाने के स्वर में कहा ।
उसकी इस बात पर सुधा खामोश हो गई-पलभर को ।
तब सागर ने आगे कहा- कुछ व्यंग्यभरे लहजे में,

” अच्छा छोड़ो इसे । अब तो बता दो कि वह महान मूर्तिकार साहब यहॉ कैसे आए थे ।"
“... ? “
सुधा ने जैसे उसे पलभर को घूरना चाहा । फिर उसी के लहजे में बोली,

" आपकी होनेवाली मेम साहब से कुछेक प्यार की बातें करने ।"
“ क्या ! ” सागर चौंक पड़ा ।
“ क्यों, होश में आ गए । तुम्हारा यही इलाज है ।"
" आखिर डॉक्टर हो न । तुम्हारा मरीज़ तुमसे जीत भी कैसे सकता है ?"
यह कहकर सागर ने उसे अपने गले से लगा लिया । तब सागर ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा,

“चलो, अब तो हम दोनों बराबर हो गए । बहुत नोक-झोंक हो गई । अब बताओं क्या बात थी ? कैसे आया था वह ?"
“वह यहाँ से जा रहा है ।" सुधा ने कहा ।
" जा रहा है । कहाँ...क्यों ?" सागर ने आश्चर्य किया ।
"क्या पता, मैंने भी पूछा नहीं ।"
"तो फिर तुम्हें बताने क्यों आया था ?”
“वह 'स्टेच्यू ' के बारे में ।"
“क्या कहा है ? "
“वापस आकर काम पूरा करेगा । इस बीच मुझे अपने फोटोग्राफ्स तैयार रखने होंगे । "
"वापस कब आएगा ? "
"कुछ पता नहीं ।"
“चलो कुछ दिनों के लिए मक्रील नदी की लहरों को लापरवाही से मचलने-बहने का अवसर तो मिलेगा । बहुत तंग आ गई होंगी । उसे देखकर कतरा-कतरा के चलते हुए । "
"तो अब तुम जाकर वहां धूनी रमाने लगो । क्यों उन नि:स्वार्थ लहरों को अकेला छोड़ते हो? " सुधा ने व्यंग्य कस दिया ।
"मैं और वहां ?" सागर आश्चर्य से बोला ।
"क्यों ? क्या अन्तर पड़ता है ? 'माँझी' न सही, 'सागर' ही सही । मर्दो का काम तो केवल छेड़ना ही है । जल की लहरें हों, अथवा जीती-जागती मानवीय जिन्दगियाँ ?"

" अच्छा , अब फिर शुरू हो रही हो क्या ?"
सुधा की बात पर सागर ने जैसे उसे सचेत करना चाहा ।
"मैं समाप्त ही कब हुई थी । वह तो तुम्हें बोलने का अवसर दे रही थी । " सुधा के चेहरे पर शरारत झलक उठी ।
"अच्छा, तो ठीक हैँ..."
इसी बीच बाहर कार का हॉर्न बजा तो दोनों की वार्ता स्वत: ही समाप्त हो गई ।
"लगता है पापा आ गए ?”
ये कहकर सुधा बाहर दरवाजे की और चली गई, और सागर चुपचाप सोफे से धँस गया, तथा सोफे के पास में रखी हुई मेज़ पर से कोई पत्रिका उठाकर उसके पृष्ठ पलटने लगा ।
थोड्री ही देर में सुधा अपने पिता और शर्माजी के साथ बातें करती हुईं अन्दर आ गई । उन सबको देखकर सागर सोफे से उठ गया, और सुधा के पिता को नमस्ते करके बोला,

"बहुत प्रतीक्षा कराते हैं अंकल आप ! "
"अगर प्रतीक्षा न करनी पड़े तो मनुष्य को समय की बहुमूल्य कीमत का अन्दाजा कैसे लगेगा?" सुधा के पिता ने कहा तो सभी लोग हँस पड़े ।
तब सुधा के पिता ने अपने पास में खडे शर्मा जी की ओर इशारा करके उनका परिचय कराया । वे बोले,

"ये केशवचन्द्र शर्मा हैं । मेरे बहुत ही पुराने, करीबी वकील मित्र हैँ और मेरे पारिवारिक मामलों के 'लॉयर' भी हैं। "
तब सागर ने उन्हे भी नमस्ते की , और उनसे हाथ मिलाया ।

थोड़ी ही देर में सब लोग खाने की मेज़ पर बैठे हुए थे । साथ ही वार्ता भी करते जा रहे थे । अधिकांश वार्ता का विषय सुधा के पिता और शर्माजी का उनके मुवक्लिलों से सम्बन्धित होता था या फिर सुधा को पढाई और सागर के व्यापारिक और उसके भविष्य के प्रति बने हुए उद्देश्यों पर केन्द्रित हो जाता था । इन बातों के अतिरिक्त कभी-कभार वे लोग सुधा के द्वारा बनाए हुए विशेष प्रकार के स्वादिष्ट भोजन की तारीफ़ के पुल बाँधने लगते थे ।
भोजन की समाप्ति के पश्चात् सुधा ने सबके लिए कॉंफी बनाईं । कॉफी पीने के पश्चात् सागर थोडी देर और रुका था, फिर वह भी सबको शुभरात्रि कहकर चला गया ।
शर्माजी का उस रात वहीँ पर ही रुकने का कार्यक्रम बन गया था । सो सुधा ने उनकी भी सोने की व्यवस्था अपने पिता के शयनकक्ष में ही कर दी थी ।
सागर के जाने के पश्चात सुधा के पिता भी जल्दी ही सोने चलें गए थे, पर शर्माजी अभी तक मेहमान-कक्ष में बैठे हुए कभी सुधा से बातें कर लेते थे, तो कभी अख़बार या किसी पत्रिका के पृष्ठ पलटने लगते थे ।
जब उन्हें भी बैठे-बैठे काफी देर हो गई तो सुधा ने उनके पास आकर कहा, “ "अंकल ! अब आप भी आराम कर लीजिए । पापा तो वैसे भी आपको न जाने कहॉ-कहाँ घुमाकर लाए होंगे । आप थक भी गए होंगे । "
"नहीं, ऐसी बात नहीं है, बेटी ! " दरअसल मेरा आज यहाँ ठहरने का कोई इरादा नहीं था, पर मुझे अचानक ही ज्ञात हुआ कि तुम कुछ परेशान हो, जिसके कारण तुम्हारे पिता भी परेशान-से हैं, तो मैंने सोचा कि चलो मैं ही तुम्हें समझाऊँ ।
"मेरी परेशानी... ? " उनकी बात सुनकर एकदम ही चौक गई ;
"हाँ ! सुना तो ऐसा ही था ' “
“नहीं ! मेरी परेशानी कोई ऐसी परेशानी नहीं है, जिसे सुनकर सबको परेशान होना पड़े । हाँ, छोटी-मोटी मौसमी हवाओं से क्या होता है ? ये तो यूँ भी आती-जाती ही रहती हैं, और बगैर कोई हानि किए हुए कतराकर निकल भी जाती हैं । "
सुधा ने कहा तो शर्माजी थोड़ी देर को चुप हो गए । उन्होंने एक पल सुधा को निहारा । उन्हें सुधा की आँखों में एक दृढता लिए हुए आत्मविश्वास की रूपरेखा नज़र आई, लेकिन फिर भी वे बात को जारी रखते हुए आगे बोले,

"अच्छा, ठीक है, लेकिन फिर भी मुझे तुमसे कुछ बातें करनी हैं । "
"ऐसी कौन-सी बातें हैं, या बात है जो आपको मुझसे ही करनी है ? ”
सुधा की जिज्ञासा और भी बढ़ गई, तो वह आगे बढ़कर उनके सामने बैठ गई ।
"हाँ बेटी, है ऐसा ही कुछ जो मैं ही तुमसे कह सकता हूँ और शायद कोई भी नहीं ।"
“ क्या कहना है आपको ? ” सुधा ने तुरन्त आश्चर्य से पूछा ।
“जो कुछ भी मैं बताने जा रहा हूँ वह एकदम से तुम्हारे जीवन से सम्बन्धित तो नहीं है परन्तु इसका प्रभाव तुम्हारे दाम्पत्य जीवन पर अवश्य पड़ सकता हैं, लेकिन तुमको मुझसे एक वायदा करना है । ”
"कैसा वायदा ?" सुधा ने पूछा ।
“यही कि इन समस्त बातों को सुनने के पश्चात् तुम आवेश में नहीं आओगी । अपने को सामान्य रखोगी, और किसी को भी दोषी नहीं समझोगी । समझ लो कि जो कुछ भी हुआ था, वह सब परिस्थितियोंवश ही हुआ था । "
इस पर सुधा ने उनको उत्तर दिया,

"देखिए अंकल, सबसे पहले तो मैं एक लड़की हूँ । आपकी और पापा की बेटी । दूसरी इस घर में अकेली, इकलौती, बिन माँ की सन्तान । ऐसी परिस्थितियों में मैं आपकी और पापा की किसी भी बात या निर्णय को सुनकर बुरा कैसे मान सकती हूँ और मुझे यह भी विश्वास है कि पापा ऐसा कोई भी कार्य कर ही नहीं सकते हैं, जो मुझे सुख न दे सके । "
सुधा की आँखों में अपने पापा के प्रति भरपूर विश्वास और कथन में भी आत्मविश्वास था । शर्माजी ने उसे देखा तो पलभर को कुछ कह नहीं सके । वे कुछ सोचने लगे, फिर अपने चेहरे के भाव बदलते हुए बोले,

"मैँ जानता हूँ कि तुम एक बेहद समझदार और अनुशासनप्रिय लड़की हो, मगर फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं कि मनुष्य जिनके विषय में कभी सोच भी नहीं पाता है, और जब वे यकायक ही उसके जीवन में एक कटु सत्य बनकर प्रवेश लेती हैं, तो उसे शायद परिवर्तित होते देर भी नहीं लगती है, तब ऐसी स्थिति में वह अपने-आपको सँभाल नहीं पाता है । "
“ … ? “
शर्माजी के इस कथन पर सुधा थोड़ी देर के लिए सोचने लगी, 'ऐसा क्या हो सकता है? वह कौन-सी बात हो सकती है जिसका उसे गुमान भी नहीं है ?' लेकिन क्षणभर में वह कोई निर्णय नहीं ले सकी ।
तभी शर्माजी ने बात आगे बढाई । वे बोले,

"आज को यदि तुम्हारी माँ होती तो शायद मुझे तुम्हारे समक्ष यूँ नहीं आना पड़ता । "
" मम्मी ! "
सहसा ही सुधा को अपनी माँ का ख़याल आ गया । फिर उसको समझते देर नहीं लगी । उसने सोचा कि आज प्रात: उसके पापा भी तो उसकी माँ के बारे में ही शर्माजी से बातें कर रहे थे । कहीं शर्माजी उसकी माँ से सम्बन्धित ही तो कुछ नहीं कहना चाहते हैं ? फिर वह अचानक ही कोई ठोस विचार अपने मस्तिष्क में नहीं ला सकी, तो उसने शर्माजी को पहले तो एक पल निहारा- एक संशय से । फिर उनको भेदभरी दृष्टि से देखते हुए पूछ बैठी,

" अंकल...कहीं...आप;.. कहीं आप मम्मी के बारे में तो नहीं कुछ कहना चाहते हैं ? "
“..... ?”
इस पर शर्माजी का मुख आश्चर्य से खुला-का-खुला रह गया । उन्हें इस बात का पहले से आभास भी नहीं था । क्षणभर को वे चुप हो गए । कुछ कह भी नहीं सके । बस एक पसोपेश की स्थिति में वे अपने हाथों की अँगुलियाँ आपस में फंसाने लगे । तब सुधा ने उनसे कहा, "आपको आश्चर्य करने की आवश्यकता नही है । यदि आप मम्मी और पापा के बारे में उनके अलगाव के कारण के बारे मेँ कुछ कहने के लिए आए हैं तो उसकी अब आवश्यकता नही है । मुझे सब कुछ ज्ञात है । "
" लेकिन तुमको कैसे ज्ञात हो गया ? " शर्माजी ने आश्चर्य से पूछा ।
"इसका मतलब आप मम्मी-पापा के बारे में ही, उनके तलाक का कारण स्पष्ट करना चाहते हैं और जो मैंने सोचा था, वह सही है । "
"हॉ, लेकिन...तुम्हें ? ”
“ आज प्रात: ही मैंने वे समस्त बातें सुन ली थीं, जो पापा ने आपको बताई थीं । आप लोगों को तो ज्ञात ही नहीं था कि मैं वहीं दरवाजे के बाहर थोड़ी दूर पर धूप में बैठी हुई अपने बाल सुखा रही थी और आप लोगों के कमरे का दरवाजा हल्का-सा खुला होने के कारण वार्तालाप का स्वर मुझे स्पष्ट सुनाई दे रहा था । "
" लेकिन। .. ? ” शर्मा जी पुन: कहते-कहते चुप हो गए तो सुधा ने पूछा,

" लेकिन क्या ? "
" अपने पापा के प्रति कोई भी शिकायत नहीं तुम्हें ? कोई भो सन्देह की भावना नहीं... ? " अबकी बार शर्माजी ने स्पष्ट पूछ लिया, तो सुधा गम्भीर होकर बोली,

“मैं अब कुछ कहकर भी क्या कर सकती हूँ । हाँ, दुख अवश्य हुआ कि पापा ने बहुत जल्दबाजी से अपना निर्णय ले लिया था और उन्होंने मम्मी को भी समझने में भूल की थी । कम-से-कम उन्हें कुछ भी ठोस फैसला करने से पूर्व कुछ समय के लिए रुकना तो चाहिए था । ”
“ पर अब तुम्हारी क्या विचारधारा है, अपने पापा के लिए । ”
"जैसी पहले थी । "
“ क्या तुमने उन्हें क्षमा कर दिया ? ”
“बच्चों को अपने माता-पिता को क्षमा देने का कोई अधिकार शायद कहीं भी नहीं दिया गया है । फिर यह मम्मी-पापा का आपसी मामला था । उन्होंने जो कुछ भी किया था, उसकी सजा या सिला उनको मिल चुका है या कभी मिलेगा । मुझे इससे क्या लेना-देना ? "
"लेकिन अब क्या सोचा है तुमने ? "

" कोई विशेष नहीं । मैं जानती हूँ कि पापा को पछतावा अवश्य है । अगर उनके पश्चाताप से मम्मी की आत्मा को कोई शान्ति मिल सकती हैं तो मेरे लिए यह एक सन्तुष्टि की बात होगी। आप तो जानते ही हैं कि बच्चों के सिरों पर केवल दो महत्त्वपूर्ण शक्तियों का साया रहता है । एक साया पापा की मर्जी से उठ गया और दूसरा मैं अपनी ग़लती से कैसे खोने दूँगी ?"
कहते-कहते स्वत: ही सुधा की आँखों में आँसू आ गए तो बैठे हुए शर्मा जी भी भाव-विह्ल हो गए । उनको भी आँखें भर-सी आईं, लेकिन वे अपने को नियन्त्रण में रखते हुए, सुधा को ढाढ़स बँधाते हुए बोले,

"नहीँ....बेटी...नहीं ! तुम तो बहुत ही मज़बूत और साहसी लड़की हो । ”
तब सुधा ने अपने-आपको सँभाला । सामान्य होने की चेष्टा की और साड़ी के पल्लू से अपनी माँ की स्मृति में नम हो आईं आँखों को पोंछ डाला । थोड़ी देर तक वह चुप ही बैठी रही । शर्माजी भी मूक बने हुए सुधा के दिल का दर्द महसूस करने की चेष्टा कर रहे थे ।
"और यह माँझी नाम के किसी युवक का अब तुम्हारे जीवन से क्या घनिष्ठ सम्बन्ध है ? ”
शर्मा जी ने थोड़ी देर के पश्चात वार्ता का नया विषय आरम्भ किया ।
"वह मेरे जीवन में इसलिए प्रवेश कर गया है, क्योंकि दो बार वह मेरे शेष बचे हुए जीवन का कारण है और पापा को डर ये है कि उनके अतीत की कहानी की पुनरावृत्ति कहीं मेरे आनेवाले भविष्य में न हो जाए । लेकिन ऐसा कभी भी नहीं हो सकेगा । रही बात माँझी की, तो उसे सम्मान देना, और उसकी कोमल भावनाओँ की रक्षा करना अब मेरा एक कर्तव्य है । वह बहुत ही सीधा और गम्भीर युवक है । कभी उस पर मुझे तरस भी आता है, तो कभी प्यार भी, लेकिन मुझे उस पर कभी क्रोध नहीं आ पाता है, क्योंकि वह इतना अधिक बिखरा हुआ-सा लगता है कि अब ऐसी परिस्थिति में यदि मैंने कुछ भी किया तो मेरे एक ही झोंके से वह हमेशा के लिए कहीं खो जाएगा । शायद इसलिए क्योंकि वह मुझे पसन्द भी करता है । यह जानते हुए भी कि मैं सागर से विवाह करने जा रही हूँ सदैव एक नाउम्मीदभरी हसरतों और दर्द को समेटे हुए मुझे और मेरे चेहरे को पढ़ने का प्रयत्न करता रहता है । ”
" फिर ऐसी स्थिति में तुम्हारा क्या निर्णय हो सकता है ?" शर्माजी ने मध्य में ही पूछ लिया ।
"वह मेरे जीवन में आनेवाले बेहद सम्मानित पुरुषों की पंक्ति में सबसे ऊपर आ चुका है, परन्तु वह सागर का स्थान कभी भी नहीं ले सकेगा, क्योंकि आप जानते हैं कि मैं दिल के रोगियों की डाक्टर बनने जा रही हूँ, ऐसी परिस्थिति में जब मैं अपने ही दिल का इलाज यदि ठीक से नहीं कर सकूँगी तो दूसरों का कैसे कर पाऊँगी ?"

यह सुनकर क्षणभर को शर्मा जी भी मुस्करा पड़े । सुधा के आत्मविश्वास और ठोस, संकल्पभरी बातें सुनकर उन्हें भी जैसे सन्तुष्टि हो गई थी । फिर कुछेक क्षणों को कोई भी कुछ नहीं बोला। दोनों के मध्य खामोशी एक अतिवाहकीय रूप के समान अपना स्थान बनाए रही ।"
तब थोड़ी देर बाद शर्माजी ने ही मौन को तोड़ा । वे सुधा से एक अनुरोध से बोले,

“बेटी ! एक गिलास पानी पिला सकती हो "
“मैं अभी लाई ।"
यह कहकर सुधा तुरन्त उठं खडी हुई, पर थोड़ा आगे बढकर, अचानक रुककर शर्माजी को देखती हुई पूछने लगी,

"यदि चाय भी पीना चाहते हैं तो बना लाऊँ ? ”
"नहीं ! इसकी आवश्यकता नहीँ है । वैसे भी रात काफी पड़ने लगी है । और मुझे सुबहवाली गाड़ी से जाना होगा । ”
"सुबह कितने बजे जाना होगा ? " सुधा ने पूछा ।

"नौ बजे ट्रेन जाने का समय है ।"
"तब तो और भी जल्दी उठना पड़ेगा । " यह कहकर सुधा किचन में. घुस गई ।
फिर जब वापस आई तो उसके हाथों में पानी का गिलास था । शर्मा जी ने गिलास हाथ में लेते हुए अपनी अन्तिम बात कही,

"देखो सुधा बेटी, तुम अपने घर की अकेली सन्तान हो तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी तुम्हारे पिता की सम्पत्ति का वारिस नहीं है । इसलिए यदि बुरा न मानो तो यह अन्तिम बात भी तुम्हें बता दूँ ?" उन्होंने सुधा से जैसे अनुमति लेनी चाही ।
" देखिए अंकल, पापा-मम्मी के मनमुटाव वाली महत्त्वपूर्ण बात से अत्यधिक गम्भीर बात मेरे लिए और क्या हो सकती है ? जब मैंने उसका कोई बुरा नहीं माना तो फिर... ? कहिए, अब और क्या कहना है आपको ? " सुधा बहुत ही सहज और सामान्य स्वर में बोली ।
"हॉ, तो मैं तुम्हारे पापा की सम्पत्ति के वारिस के बारे में बात कर रहा था । चूँकि तुम्हारे पिता के जीवन में तुम्हारी माँ को लेकर ऐसी घटना घट चुकी है, इसलिए वे इस बात से भयभीत होकर आगे कोई भी ऐसा पग नहीं उठाना चाहते हैं कि जिसके कारण तुम्हारी कोई भी हानि हो सके , इसलिए उन्होंने अपनी समस्त सम्पत्ति का असली हक़दार तुम्हें नहीं बनाया है ।"
“.... ? “
यह सब सुनकर तो सुधा को और भी आश्चर्य हुआ । वह थोड़ी देर के लिए मौन हो गई, फिर कुछ सोचकर बोली,

"पहली बात तो सम्पत्ति पापा की है । यह उनके परिश्रम का फल है, इसलिए यह उनकी इच्छा है कि वे इसे चाहे किसी को भी दें, पर मुझे कोई भी आपत्ति नहीं है, और न ही इस विषय में उनसे मुझे कोई गिला-शिकवा करना है, पर फिर भी मैं उनकी इकलौती सन्तान हूँ, इस नाते क्या मैं पूछ सकती हूँ कि अगर उनकी सम्पत्ति की हकदार मैं नहीं हूँ तो फिर वह कौन है ?"

"कह नहीं सकता कि तुम्हें सुनकर प्रसन्नता होगी या आश्चर्य, पर सत्य यही हैँ कि उन्होंने अपनी सम्पत्ति तुम्हारे नाम न करके तुम्हारे होनेवाले बच्चों के नाम पर की है, और तुम जब तक तुम्हारे बच्चे वालिग़ नहीं हो जाते, तब तक उस सम्पत्ति की देख-रेख करोगी । बच्चों के वालिग होने के पश्चात ही उस सम्पत्ति में एक बराबर का भाग तुम्हारा भी होगा ।"

" इसका मतलब है कि पापा ने बड़ी सूझ-बूझ से काम लिया है । " सुधा बोली ।

“ऐसा ही समझ लो, लेकिन ऐसा उन्होंने इसलिए किया है कि तुम्हारे पिता के पश्चात तुम्हारा होनेवाला पति तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध उस सम्पत्ति का नाजायज़ लाभ न उठा सके । "

"मैं समझती हूँ कि पापा को शायद अब सागर पर भी विश्वास नहीं रहा है? “

"चोट खाए हुए इन्सान हैं । शायद इसलिए वे अपने क़दम सँभाल-सँभालकर रख रहे हैं । "

शर्मा जी के इस कथन पर सुधा ख़ामोश हो गई । वह कुछ नहीं बोली । फिर बोल भी क्या सकती थी ? सारी बातें तो कम-से-कम हो ही चुकी थीं । कहीं भी विवाद और सन्देह की गुंजाईश भी नहीं रही थी, इसलिए किसी भी प्रश्न की उत्पत्ति अब सम्भव नहीं थी और अब वह भी अपने-आपको हल्का महसूस कर रही थी । उसके दिल के बोझ की गठरी जो अचानक से ही उसके सिर पर आकर गिर पडी थी, यकायक ही वायु भरे हुए गुब्बारे के समान हल्की होकर जैसे अन्यत्र अपना ठिकाना ढूँढ़ने के लिए, आकाश में ही दूर निकल गई थी, हालाँकी, उसने अपने पिता को पहले भी दोष नहीं दिया था, परन्तु फिर भी उनकी और से उसके मानस-पटल पर एक चादर-सी जरूर बिछ चुकी थी और वह यह निर्णय नहीं कर सकी थी कि इसमें कहीं-कहीं उसकी माँ के साथ की गई बेवफाई के दाग़ थे अथवा उस चादर ने उसकी आँखों पर इन दागों को न देखने के लिए कोई पर्दा डालने की कोशिश की थी ।

पर अब तो शर्माजी के आने पर, उनके साथ वार्ता करने के उपरान्त सभी मैल धुल चुका था । अब उसकी आँखों में अपने पापा के प्रति एक निश्छल सत्य की परछाईं थी और हदय में जैसे भविष्य की आनेवाली खुशियों के संगीत की मधुर झंकारें; जिनके शोर में उसके अपने मन के हृदयप्रिय गीत भी थे ।

शर्मा जी जब सोने चले गए तो वह भी थोड़ी देर के लिए बाहर आँगन में आकर खड़ी हो गई । बाहर आँगन मे चारों तरफ खामोशी थी । आकाश स्वच्छ था । आज चन्द्रमा भी काफी दिनों के पश्चात जैसे मुस्करा रहा था । इस कारण छोटी-छोटी तारिकाएँ भी कभी हल्के-से मुस्कराती थीं, तो कभी मायूस भी हो जाती थीं ।
सुधा अभी भी आँगन में खडी हुईं थी- चुपचाप- और बहुत शान्त-सी । सहसा ही उसने दूर आकाश में पुन: देखा । फिर सोचा, कि यदि प्रकृति ने रात न बनाई होती तो दिन का क्या महत्त्व होता? यदि इस रात में चारों तरफ़ अन्धकार न छाया होता तो फिर चन्द्रमा और तारिकाओं की कौन परवाह करता ? कौन उनके प्रकाश की बहुमूल्य कीमत महसूस करता ?
इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी यदि दुख-दर्दों के थपेड़े न लगें, तो फिर वह अपने सुखों के लिए प्रयास क्यों करे ? उसके जीवन में यदि कभी अँधेरा न छाए तो फिर वह अपने भविष्य में आनेवाली प्रकाश की किरणों की रक्षा क्यों करेगा ? यह तो प्रकृति का नियम है । संसार बनानेवाले की कार्य-प्रणाली है कि 'आज' के बाद 'कल' आता है- 'कल' के बाद पुन: आनेवाला 'कल' आता है । इस प्रकार समय का चक्र चलता रहता है । दुनिया घूमती रहती है और मनुष्य इस समय के चक्र में घूमता जाता है- चलता जाता है- खिसकता जाता है और इसी प्रकार धीरे-धीरे खिसककर एक दिन कहीं दूर विलीन भी हो जाता है । अन्तर केवल इतना है कि आज का जानेवाला सवेरा, संध्या में परिवर्तित होकर, रात्रि का अन्धकार काटने के पश्चात्, दूसरी सुबह में एक नए दिन, नए उजाले के रूप मेँ फिर से उदय होता है, परन्तु आज़ का जानेवाला मनुष्य दूसरे दिन के प्रकाश में दोबारा आने की एक झूठी आस भी नहीं देता है, तब पुनर्जन्म की तो बात ही और है ।

कई दिन व्यतीत हो गए... ।
कई हफ़्ते, कई महीने... शरद् ऋतु समाप्त हो गई । बदन के गर्म ऊनी वस्त्र उतारकर, उनका स्थान ठण्डे हल्के वस्त्रों ने ले लिया । वसन्त ऋतु भी आईं और वृक्षों के भी कपड़े उतारकर चली गई । पतझड़ के बाद उनका स्थान नई-नई चहकती, महकती कलियों और कोंपलों ने ले लिया । जिस प्रकार से नवीन वस्त्र पहनकर बच्चा प्रसन्नता के कारण फूला नहीं समाता है, उसी तरह प्रकृति के समस्त पेड़-पौधे, नई-नई आई कोंपलों और पत्तियों के कारण प्रसन्नता में, वायु के झोंकों में झूमते, नृत्य करते-से प्रतीत होते थे । एक और से चाहे जिधर भी दृष्टि डालो, चारों और हरी-भरी हरियाली-सी ही नज़र आती थी ।

माँझी जयपुर चला गया था । सुधा की परीक्षाएँ करीब आ गई थीं, सो वह भी अब अत्यधिक व्यस्त हो चुकी थी । उसके ज़हन में एक और परीक्षाओं की तैयारी, दूसरी ओर विवाह की रूपरेखा; उसकी तैयारियों, ख़रीदारी इत्यादि । साथ ही कहीं दूर दिल के किसी कोने में छिपा-छिपा-सा माँझी की स्मृति का एहसास भी । उसके न आने की अनिश्चितता और चिन्ता; इतना सारा बोझ वह एक साथ ही उठा रही थी । माँझी की चिन्ता उसको इसलिए नहीं थी कि वह उसके शहर भरतपुर से चला गया था, बल्कि इस कारण थी, क्योंकि उसे गए हुए चार महीने से अधिक हो चुके थे और वह अभी तक वापस नहीं आया था, न ही उसकी कोई उचित सूचना ही उसको मिल सकी थी ।
सुधा के लिए माँझी का वापस आना अब बहुत ही अधिक आवश्यक भी हो चुका था, क्योंकि वह चाहती थी कि आडवाणी का वह कार्यं भी उसके विवाह से पहले ही पूर्ण हो जाए, जिसकी अग्रिम राशि वह पहले ही ले चुकी थी । इस बीच आडवाणी भी अब चिन्ता महसूस करने लगे थे । वे लगभग प्रतिदिन ही सुधा को फोन कर देते थे । स्वयं सुधा ने भी कई-एक बार माँझी के बारे में उसके घर से पता लगाना चाहा, पर किसी ने कोई भी सन्तुष्टिपूर्ण उत्तर नहीँ दिया था ।
ऐसी स्थिति में उसके पास माँझी का न तो कोई पता ही था और न ही कोई टेलीफोन नम्बर इत्यादि । वह करती भी क्या ? सिवा इसके कि प्रतिदिन उसके आने के आस में एक नाउम्मीद से आँखें बिछाए बैठी रहे । कान उसके आने की सूचना सुनने के लिए आतुर बने रहे । दिल की धड़कनें थमी रही' । शायद आज आ जाए ? शायद कल कोई सूचना मिल जाए ? यही सोचती रही वह ।
माँझी के प्रति उसकी लापरवाही पर कभी उसे क्रोध भी आता, तो कभी स्वत: ही उसके लिए उदास भी हो जाती थी । कभी-कभी तो उसे स्वयं भी अपनी दशा और अपने सोचने के ढंग पर खीझ-सी हो उठती थी, तब ऐसी दशा में वह खुद से ही पूछने लगती । स्वयं को बार-बार टटोलने का प्रयास करती, और हदय में ही कह लेती, कि यह उसे क्या हो गया है ? क्या उसके होश ठिकाने है' ? उसके मस्तिष्क का सन्तुलन क्यों बिगड़ता जा रहा है ? कहीं वह अत्यधिक भावनाओँ में तो नहीं बही जा रही है ? माँझी जब उसके शहर में था, जब उसके समक्ष बार-बार जाने-अनजाने आ जाता था, तब भी उसे परेशानी थी, और अब जबकि वह उसके शहर से कहीं अन्यत्र जाकर छिप गया है, तब भी वह परेशान होती है । क्यों ? अब वह क्यों परेशान और विचलित होती है ? अब क्यों उसकी अनुपस्थिति में मायूस हो जाती है ? शायद इसलिए कि माँझी का वजूद जैसा भी था उसके लिए अच्छा था- भला था और उसके मन के लिए तसल्ली-भरा भी था । एक विश्वासयुक्त था । चाहे उसने उससे अपने जीवन को कोई भी आशाएँ नहीं जोड़ रखी थीं, पर फिर भी अब उसकी अनुपस्थिति में, उसका वियोग जैसे उसके दिल की निराशाओँ का कारण भी बन गया था । यह बात और इस तथ्य पर कभी-कभी उसे सन्देह-सा होने लगता था कि भले ही माँझी उसके सपनों का राजकुमार नहीं बन सका था, पर उसके यथार्थ का ठोस सत्य अवश्य बन गया था । ऐसा सत्य, ऐसा विश्वास, जिसे वह अपने जीवन की पुस्तक से किसी भी तरह निकाल नहीं सकती थी । चाहे वह उसके दिल का देवता नहीं था, पर उसके मस्तिष्क की स्मृतियों में अपनी उपस्थिति का अच्छा-बुरा एहसास अवश्य ही करा देता था । यह इस तरह से था जैसे कि कोई लड़की अपने पडोसी मित्र लड़के को प्यार नहीं करती है, परन्तु उस लड़के के गले मेँ वह किसी अन्य लड़की की बाँहें भी नहीं देख सकती है । यही हाल सुधा का भी था । वह माँझी से प्यार नहीं कर सकती थी पर अब जैसे वह उससे दूर भी नहीं रहना चाहती थी । वह उसके दिल की धड़कनों का हमराज़ नहीं था, पर ख़यालों में उसकी मौजूदगी का दावेदार अवश्य था । वह उसको अपने जीवन-पथ की राहों का हमसफ़र नहीं बना सकती थी । पर इस सफ़र में उसको अपने साथ ज़रूर देखना चाहती थी... किस उद्देश्य से? किस ध्येय से ? ऐसा वह क्यों चाहने लगी थी ? इन सारे प्रश्नों का उसके पास कोई सपष्ट उत्तर नहीं था । बस वह ऐसा चाहती थी । यही उसके लिए काफी था । इतना ही सोच लेना बहुत था कि न तो वह सागर के बिना रह सकती थी, और न ही माँझी के अस्तित्व को नकार सकती थी । प्यार के मार्गों पर चलते-भटकते हुए आज अनजाने में वह एक ऐसे दोराहे पर आकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई थी कि जहाँ से एक साथ दो समानान्तर रास्ते निकले हुए थे । उनमें से एक मार्ग उसको जीवनभर की खुशियों की मंजिल की ओर जाकर समाप्त होता था और दूसरा मार्ग पहलेवाले के समानान्तर चलता हुआ, उसकी मंजिल के पास जाकर समाप्त तो होता था, पर उसकी अपनी कोई मंजिल, कोई ठिकाना नहीं था । माँझी उसके जीवन की पुस्तक में एक छोटे-से बिन्दु के रूप में उभरा था, और आज उस बिन्दु की स्याही फैलते-फैलते एक बड़ा-सा प्रश्चचिह्र बनकर रह गई थी ।

फिर एक दिन सुधा अपने कमरे में बैठी हुई अपने अध्ययन में लीन थी- परीक्षाओं की तैयारी के कारण कक्षाएँ लगाना बन्द कर दी गई थीं और उसने भी अब संध्या को बाहर निकलना, घूमना और सागर के साथ अपनी शामें बिताना बन्द कर रखा था । सुधा अभी भी बैठी हुई अपनी कोई पुस्तक पढ़ रही थी कि इसी बीच टेलीफोन की घण्टी घनघना उठी । उसने फोन उठाया, दूसरी ओर से आडवाणी बोल रहे थे,

"मैं आडवाणी बोल रहा हूँ । ”
"हां! कहिए कैसे हैं आप ?”
"ठीक हूँ । वह माँझी की कोई ख़बर ?"
"नहीं ! अभी तक तो कुछ भी नहीं । ” सुधा ने निराश मन से कहा ।
"देखो इस लड़के ने कितना हैरान कर रखा है ? ऐसा लापरवाह होगा, मैंने तो सोचा भी नहीं था।"
" आप कहें तो कांट्रेक्ट समाप्त किए लेते हैं । मैं पैसा वापस कर देती हूँ । अपना..॰और माँझी का भी । ” सुधा ने उनकी परेशानी महसूस करते हुए कहा ।
"नहीं...नहीं, मेरा यह मतलब तो नहीं है । काम अगर यह नहीं करेगा तो कोई दूसरा करेगा, लेकिन यह पता तो चले कि आखिरकार वह है कहाँ ? वह यह कार्य करना चाहता है या नहीं भी? मुझे तो यह आश्चर्य है कि इतने बड़े आँफ़र को कोई आसानी से ठुकराता भी नहीं है और ना ही इतनी अधिक लापरवाही बरतता है । आखिर उसे परेशानी क्या है ?" आडवाणी ने पूछा ।
इस पर सुधा ने थोड़ा सोचकर कहा,

"मैं समझती हूँ कि यह उसके कार्य करने का ढंग ही है । वह ऐसे ही अपने सारे कार्य करता होगा । ”
"अरे नहीं भई, मेरे लिए यह उसका कोई पहला काम थोड़े ही है । मेरा मतलब इस संस्था के लिए यह उसका पहला कार्य हो सकता है पर मेरे लिए तो उसने बहुत सारे काम पहले भी किए हैं, परन्तु पहले तो उसने कभी इतनी अरुचि नहीं दिखाईं थी । ”
"इसका मतलब आप उसे बहुत पहले ही से जानते होंगे । "
"हाँ, लेकिन बिज़नेस पॉइंट आँफ़ व्यू से ही । "
" और आपने मुझे कभी बताया भी नहीँ । "
" क्या बताता, कभी मैंने इसकी आवश्यकता ही महसूस नहीं की । "
" आप कितने अरसे से उसे जानते हैँ ?"
सुधा की रुचि बढ़ गई तो उसने आगे पूछ लिया ।
"यहीँ कोई दो…तीन वर्षों से । जब मैं रायगढ़ में पुरातत्त्व बिभाग का निदेशक था, तो वहाँ के म्यूजियम की वस्तुओं आदि की मरम्मत के सिलसिले में यह आया करता था, तभी भेंट हो जाया करती थी । तब मैँने तो उसको स्थायी नौकरी भी देनी चाही थी , लेकिन इस ढीठ ने कोई तवजो ही नहीं दिया था । ”
"बड़ा ही अजीब है... ? " सुधा ने आश्चर्य किया । .
" अजीब ? अरे यह तो बहता हुआ पानी है । आगे निकल गया तो पीछे का पता-ठिकाना ही ज्ञात नहीँ । "
“इतना जानते हुए भी आपको पूरे भारतवर्ष में बस यही एक मिला था । " सुधा ने आश्चर्य से कहा ।
"निगाह में तो और भी थे, पर इसका काम, और इसकी कारीगरी ? बस पूछो ही नही । ईश्वर नही है, वरना इसकी बनाई हुईं कृतियों में केवल जान डालना ही बाकी रह जाता है । "
आडवाणी ने माँझी की इतनी अधिक प्रशंसा की तो वह भी चुप हो गई । तब आडवाणी ने बात आगे बढाई, वे बोले कि,

"ऐसा करो कि उसके घर एक बार चक्कर लगा डालो । पता करो कि बात क्या है ?" आडवाणी ने अपनी राय दी ।
"ठीक है, मैं कोशिश करूँगी । "
यह कहकर दोनों ने बात समाप्त कर दी और सुधा फिर माँझी के विचारों की जाली बुनने में लग गई । उसने सोचा-विचारा, 'क्या करना चाहिए ? कहाँ मिलेगा ? किस तरह इस निर्मोही से सम्पर्क होना चाहिए ? '
यही सब सोचती हुई उसने माँझी के घर का नम्बर डायल कर दिया । थोड़ी देर फोन की घण्टी बजने के पश्चात किसी ने फोन उठाया, तो सुधा को एक राहत-सी मिली ।
"हलो ?" तभी उधर से किसी ने कहा.

"हलो? कौन मंजु ?" सुधा ने आवाज़ पहचानते हुए पूछा ।
"जी हाँ । मैं मंजु बोल रही हूँ । आप कौन ?"
"मैं सुधा ।" .
" ओह… सुधाजी । आप... नमस्ते । कहिए कैसे याद कर लिया ?"
" नमस्ते... और सब कैसे हैं ?" सुधा ने औपचारिकता से पूछा ।
"सब कुशल है... और आप ?" मंजु ने पूछा ।
"मैँ ठीक हूँ बस थोड़ा अधिक ही व्यस्त हो गई हूँ । परीक्षाएँ पास आती जा रही हैं ।"
"मैं जानती हूँ ।"
"और तुम्हारे भाई साहब के क्या हाल हैँ ?" सुधा ने अपनी बात कही ।
"वह भैया... ? वे भी ठीक ही हैं ।"
"इसका मतलब वे वापस आ गए हैं । "
"नही, अभी तक तो नहीं । " मंजु ने कहा ।
"तो फिर तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि वे भी कुशल से हैँ ?" सुधा ने संदिग्ध होकर पूछा ।
"मैं उनकी बहन हूँ मुझे नहीं मालूम होगा तो फिर किसे मालूम होगा ? " मंजु ने उत्तर दिया ।
“मेरा मतलब है कि जब मैंने एक सप्ताह पूर्व पूछा था, तो तुम्हें न तो उनका पता ही मालूम था और न ही कोई फोन नम्बर आदि । अब उनके कुशल-मंगल की सूचना कैसे मिली है तुम्हें ?"
"तब वे प्रवास में दूसरे स्थान पर थे, और अब हमारे अपने घर पर हैं । " मंजु ने कहा ।
" अपने घर पर.. मतलब ?"
" हमारा अपना घर, जहाँ के हम लोग रहनेवाले हैं । " मंजु ने कहा ।
“ इसका मतलब जयपुर में ?"

"तुम्हें वहां का पता और टेलीफोन नंबर मालूम है?"
"क्यों नहीं... लिखिए ?"
"अच्छा ठहरो एक सेर्किंड । " यह कहकर सुधा ने पेपर और पेन्सिल उठाई और नम्बर लिखने लगी । टेलीफोन नम्बर लिखने के बाद सुधा ने मंजु से कुछ सन्देह की भावना से पूछा,

" एक बात पूछूँ... बताओगी... ? "
"क्या ? " '
"देखो झूठ मत बोलना ।"
“सुधाजी, आपने क्या हम लोगों को किसी तुच्छ परिवार का समझ रखा है ? फिर मुझे झूठ बोलने से मिलेगा भी क्या ?"
"मेरा यह आशय नहीं था । ”
“तो फिर ऐसे क्यों पूछ रही हैं आप ? कहिए क्या पूछना चाहती हैं ? “ मंजु बोली ।
"तुम्हारा भाई इतने दिनों के लिए चला गया है और तुम्हें किसी को भी कोई चिन्ता-परवाह नहीं है ? "
"परवाह क्यों नहीं है ? मम्मी तो प्रतीक्षा में सूखकर आधी हो गई हैं । पापा दिन-रांत बक-बक करते रहते हैं, लेकिन कर भी क्या सकते हैं ?"
"तुम सब लोगों का उन पर कोई भी नियन्त्रण नहीं है । "
"नियन्त्रण कौन करे ? घर के सबसे बड़े, इकलौते, बालिग़ लड़के हैं । मम्मी तो कुछ कहती ही नहीं हैं । मुझे भी डाँट-डपटकर शान्त कर देते हैं । एक पापा ही हैं, जो जब-तब कह-सुन लेते हैं। उसका परिणाम यह है कि अपने चेहरे पर एक बेमतलब की खामोशी और उदासी लपेट ली है। " मंजु ने उदास होकर कहा ।
“इतने-इतने दिन को घर से गायब रहना । कभी इस शहर तो कभी कहीं आते-जाते रहना । इन सब बातों के लिए पैसा कौन देता है उसे ? ” सुधा ने आश्चर्य से पूछा ।
“पैसों की उन्हें क्या कमी है ? भगवान का दिया हुआ वरदान उनके पास है । इतने बड़े मूर्तिकार हैं । जानती हैं आप, उनकी बनाईं हुईं एक-एक मूर्ति पचास करोड़ रुपयों तक की बिकी हैं ।”
" आर्टिस्ट तो मैंने भी बहुत-से देखे हैं, लेकिन ऐसे कोई नहीं रहता, जिस तरह से तुम्हारे भाई रहते हैं । तुम्हें तो मालूम ही होगा कि क्या दर्द है उन्हें ? "
"दर्द ? कैसा दर्द ? " मंजु ने कहा ।
"मेरा मतलब, कहीं दिल… वगैरह... किसी से प्यार आदि का कोई चक्कर तो नहीं है ? "
“ यह तो आपको बेहतर मालूम होगा । "
“मुझे ?"
"मेरा मतलब... आप उनकी मित्र हैं, तो ऐसी बातें तो मित्रों को अधिक मालूम होती हैं । " मंजु बोली ।
"तुम भी तो उनकी बहन हो ।"
"हाँ, बहन हूँ लेकिन छोटी । अपने दायरे से आगे बढ़ती हूँ तो डाँट खाकर रुकना भी पडता है, लेकिन आपको इतनी दिलचस्पी क्यों हों गई ?” मंजु ने भेदभरे ढंग से कहा ।
"मेरी नज़रों में तुम्हारे भाई का स्थान साधारण लोगों के समान नहीं है । एक विशिष्ट सम्मानित दर्जा है उनका । वह भी इसलिए, क्योंकि उन्हो'ने मुझे दरिया में डूबने से बचाया था, इसलिए मैं चाहती हूँ कि शायद इस मामले में, मैं उसकी कोई मदद कर सकूँ । " सुधा ने बात स्पष्ट कर दी, तो मंजु ने आगे कहा,

"लेकिन फिर भी आप, क्या उपचार कर लेंगी उनका ?”
“मालूम है तुम्हें कि मैं दिल के रोगियों की डॉक्टर बनने जा रही हूँ ।”
"मालूम है, लेकिन आप दिल का इलाज कर सकती हैं, दिल्लगी का थोड़े ही । "
इस पर सुधा अचानक ही चुप हो गई । फिर थोड़ा सोचकर बोली, एक संशय के साथ,

"कहीं मजाक तो नहीं कर रही हो तुम ?”
"मैं भला आपसे मजाक क्यों करूँगी ?”
“तो फिर तुम्हें ज्यादा अच्छी तरह ज्ञात होगा कि दिल्लगी का इलाज कौन करता है ?"
" यह तो सीधी-सीधी बात है । वही करेगा जिससे दिल लगा हो । ” मंजु बोली ।
"तुम्हें तो मालूम होगा कि तुम्हारे भाई का दिल किससे लगा हुआ है ?" सुधा ने आगे पूछा ।
"मेरे बता देने से आप पर क्या फर्क पड़ेगा ?"
“ यह कैसे कहती हो ? मुझे यदि रोग की जड़ मालूम हो जाए तो इलाज करने में सुविधा हो जाती है । ” सुधा ने उत्तर दिया ।
"तो फिर आप मुझसे ही क्यों पूछना चाहती हैं ? सीधे-सीधे मरीज़ से ही क्यों नहीं पता कर लेती हैं ?" मंजु बोली।
“कभी-कभी मरीज़ अपना रोग छिपा भी तो लेता है ।”
“तो फिर आप डॉक्टर किसलिए हैँ ? रोग पकड़ना और फिर उसका इलाज़ करना तो आपका काम है । " मंजु ने तर्क किया ।
"तुम मुझे सीधे-सीधे क्यों नहीं बता देती हो ?" सुधा ने थोड़ा प्रभाविक भाव से कहा ।
“ आप मुझे इस मामले में क्यों घसीटना चाहती हैँ ? इस घर में और लोग भी तो हैं । उनसे बात कर सकती हैं । आप तो मुझसे काफी बड़ी भी हैं ।"
“इसका मतलब माँझी के टूटे हुए दिल की व्यथा घर में सबको मालूम है । " सुधा ने अनुमान से कहा ।
“ क्यों नहीं, हम सब एक ही छत के नीचे तो रहते हैं । " मंजु बोली ।

"तुम्हारे भाई क्या पहले भी ऐसे ही रहते थे ? ” सुधा ने एक नई बात पूछनी चाही ।
"रहते थे, लेकिन इतना नहीं । यहाँ आने के बाद, और एक्सीडेन्ट होने के पश्चात कुछ अधिक ही बदल-से गए हैँ । बहुत चुप, उदास-से रहने लगे हैं । ”
"तुम मुझे क्यों नहीं बताना चाहती हो, उनके दिल का भेद ? " सुधा ने पूछा ।
"पहली बात तो यह है कि मुझे इस मामले में अपना मुख बन्द रखने की सख्त चेतावनी दी गई है । दूसरी बात, आप इस मामले में इलाज तो कर सकती हैं, लेकिन करेंगी नहीं ।"
" अच्छा" ! "
सुधा यह सुनकर कुछेक क्षणों को सोचती रह गई । फिर गम्भीर होकर आगे बोली,

“तुम यह बात इतने दावे से क्यों कह रही हो ? ”
"इसलिए क्योंकि मुझे सब कुछ ज्ञात है । सब कुछ अपनी आँखों से देखा है और सभी कुछ तो देख भी रही हूँ । ” मंजु भी उसी लहजे में बोली ।
" क्या देखा है, और क्या देख रही हो ? "
" फिर वही बात ? मैंने कहा न कि मैं विवश हूँ । " मंजु ने असमर्थता दिखाई ।
“..... ?”
खामोशी... सुधा को फिर मौन साधना पड़ गया... तब मंजु आगे बोली,

" आप सीधे-सीधे भैया से क्यों नहीँ सब कुछ पूछ लेती हैँ ? "
"मैं उससे कैसे पूछ सकती हूँ । मैं तो दूसरे की पत्नी बनने जा रही हूँ । " सुधा ने मायूस होकर कहा ।
"तो फिर भूल जाइए इस सारी बात को- अपना विवाह कीजिए और सुखी रहिए । क्यों दूसरे का सिरदर्द अपने ऊपर लेती हैं ? एक दिन आएगा कि सारी बातें. आपको स्वत: ही पता चल जाएँगी । आपको तो अब गैर पुरुष के किसी भी मामले में इतनी रुचि लेनी भी नहीं चाहिए ।” "
“तो ठीक है, कोई बात नहीं । माँझी जब आएँ तो मुझे सूचित अवश्य कर देना । हो सका तो मैं उनसे बात अवश्य ही करूँगी । "
यह कहकर सुधा ने बात समाप्त कर दी । उधर से मंजु ने भी टेलीफोन रख दिया तो सुधा पलभर को अपना सिर पकड़कर बैठ गई । उसने सोचा, ' इतनी देर मगज़मारी की और परिणाम कुछ भी नहीं । पता नहीं कैसे लोग हैं ? संदिग्ध-से छिपे-छिपे हुए-से । क्या पूरा परिवार ही एक जैसी मिट्टी से बना हुआ है ? रहने दो जी- जब कोई कुछ बताना ही नहीं चाहता है तो मैं क्या कर सकती हूँ ? सोच रही थी कि अगर हो सका तो माँझी की कुछ सहायता ही कर देती, पर क्या करूँ ? जब कोई नहीं चाहता है तो ऐसे ही बने रहने दो । माँझी अगर मिला भी तो ठीक है । नहीं भी मिला तो मैं क्या कर सकती हूँ ? आडवाणी का कार्य बने या न बने-मेरा क्या जाता है ? वे स्वयं ही सब हल कर लेंगे । '
ऐसा ही कुछ सोच-विचारकर सुधा ने अपने-आपको बाहरी तौर पर तसल्ली तो दे ली थी , परन्तु फिर भी मन के जैसे किसी दूर किनारे से कोई आह-सी उठती, जो धीरे-धीरे अपने दर्द, अपनी तड़प से उसको विचलित-सी कर जाती थी । फिर ऐसे में न जाने क्यों उसे स्वत: ही महसूस होने लगता था कि हो-न-हो, माँझी की समस्त परेशानियों, उसकी छिनी हुई खुशियों का सबब जैसे वह खुद ही है । ये बात और है कि चाहे कोई भी उसे स्पष्ट तौर पर न बताए, पर इतना तो वह भी समझती है, कि है कोई-न-कोई बात ज़रूर ऐसी, कि जिसमें उसका नाम अवश्य ही आता है ? मंजु के यह शब्द कि माँझी पहले इतना अधिक ऐसा नहीं था, जितना अधिक उससे सम्पर्क होने के पश्चात् हुआ है । एक्सीडेंन्ट के पश्चात् ही माँझी के रहन-सहन उसके संदिग्ध व्यक्तित्व और गम्भीरता में परिवर्तन आया है और फिर मान लिया जाए कि अगर ऐसा हुआ भी तो वह क्या कर लेगी ? और इसमें उसका क्या दोष है ? माँझी के दिल में यदि उसके लिए कोई स्थान सुरक्षित है भी तो क्या ये स्थान उसने मुझसे पूछकर बनाया था ? पता नहीं क्यों लोग अपने दिल के एकतरफा फैसले को अपने साथ-साथ दूसरों की जिन्दगी का भी निर्णय समझ लेते हैं ? ये जानते हुए भी कि खोखले और झूठे सपनों के दलदल में वे जो अपने दिल का राजकमल खिलाए हुए हैं, वह सिर्फ हकीकत का एक हल्का -सा स्पर्श पाते ही वास्तविकता के रसातल में जाकर सदा के लिए अपना अस्तित्व ही समाप्त कर देगा । दूसरों की अनुमति लिए बगैर भावुकता में बनाईं हुईं प्यार की पृष्ठभूमि, सत्य का एक कठोर तमाचा पड़ते ही इतनी अधिक काली हो जाएगी कि उसमें दूसरों की तो क्या खुद स्वयं की एक झलक और परछाई भी नज़र नहीं आ सकेगी ।

सुधा बैठी-बैठी बहुत देर तक यही सोचती रही । अपने-आपको कभी दोषी मानकर कभी उस अपराध के बारे में सोचकर प्रायश्चित्त करने लगती, जो उसने किया भी नहीं था- और कभी दूसरे के सिर पर सारा दोष मढ़कर अपने-आपको समझा भी लेती थी । कभी सोचती कि बच्चे यदि ग़लती करें, तो उनकी ग़लती को ग़लती मानकर एक बार को सन्तुष्टि कर ली जाती है, पर यदि वयस्क समझदार लोग ऐसा करें, तो फिर उसको क्या कहा जाए ? समझदार व्यक्ति की एक सूझ-बूझकर की मूर्खता ? तो फिर क्या माँझी भी मूर्ख है ? मूर्ख नहीं भी है लेकिन कोई समझदारी भी तो नहीं कर रहा है वह?

इसी बीच पुन: फोन की घण्टी बज उठी , तो उसकी विचारों की श्रृंखला की कड़ियाँ पलभर में ही बिखर गई । टेलीफोन उठाकर उसने कान से लगाया, और बेमन से कहा,

"हलो !”
"क्या कर रही हो ?" उधर से सागर पूछ रहा था ।
"अपना दिमाग़ खा रही हूँ । " सुधा ने रूखे भाव से कहा ।

“ अच्छा ! बडी किस्मतवाली हो । " सागर भी व्यंग्य से बोला.

"देखो मेरा अभी बहुत मूड ख़राब है । ” सुधा बोली ।

“ अरे तो इसमें मैंने क्या कर दिया ? तुम कहो तो मैं आ जाऊँ ठीक करने ?”
साग़र ने पूछा ।

"नही इसकी कोई ज़रूरत नहीं है । ”
" क्यों, क्या 'शेयर' नहीं करना चाहती हो ? ”
"किस बात के लिए ?"
“तुम अभी-अभी तो कह रही थीं, अपना दिमाग़ चाटने के लिए । "
"तुम्हारे पास अपना भी तो है, वही खा डालो । ”
" अरे, उसमें वह मजा कहाँ, जो तुम्हारे में है ? ”
“ अच्छा, बकवास नहीं, बताओ क्यों किया फोन ?" सुधा ने पूछा । .
“बस, ऐसे ही, सोचा हाल-चाल पूछ लूँ । अध्ययन कैसा चल रहा है आदि ? ”
"कुछ ख़ास नहीं ।"
" क्यों, क्या फेल होने का इरादा है । "
“नहीं तो ।"
"तो फिर क्या बात है ?"
"बस ऐसे ही, कभी-कभी परेशान-सी हो जाती हूँ । "
"किस लिए ? "
"वह आडवाणी का काम । माँझी भी अभी तक लौटकर नहीं आया है । बताओं, मैँ क्या करूँ ? " सुधा ने चिन्तित होकर कहा । '
"तो कांन्ट्रक्ट समाप्त कर दो ।"
"मैंने तो कहा है, पर वह आडवाणी नहीं चाहते हैं । ”
"तो फिर तुम्हें क्या परेशानी है ? ये कार्य कोई तुम्हारे कारण तो टल नहीं रहा है । " सागर ने कहा ।
“वह तो ठीक है, पर होगा कब ? क्या शादी के बाद ? "
"होने दो, तुम्हें क्या अंतर पड्रता है ? माँझी तो तुम्हारी स्टेच्यू तुम्हारी फोटोज़ देखकर बनायेगा?"
" और यदि विवाह के पश्चात उसने कभी सचमुच में पोज़ देने के लिये बुलाया तो ?" सुधा ने कहा ।
"तो कभी नहीँ जाना ।"
"इसीलिए तो चाहती हूँ कि या तो कांट्रेक्ट समाप्त ही हो जाए या फिर ये कार्य विवाह से पूर्व ही हो जाए । सचमुच विवाह के पश्चात केवल अपना क्लीनिक और घर ही देखना चाहती हूँ और कुछ भी नहीं । "
"मैं तुम्हारी परेशानी समझता हूँ लेकिन तुम कर भी क्या सकती हो ? तुम अगर कहो तो मैं माँझी से बात करूँ । " सागर ने पूछा ।
“नहीँ-नहीँ, तुम्हें कोई भी 'राइट' नहीं है, उससे इस विषय में बात करने का । अनुबंध तो मेरे, आडवाणी और माँझी के मध्य ही हुआ है । ” सुधा ने उसे मना कर दिया तो सागर थोड़ा सोचकर बोला,

"तो फिर ऐसा करो... ।
“क्या ? “
" अब की बार जब वह आए तो फिर एक बार कार रौंद देना उसके ऊपर, लेकिन जरा ढंग से ।"
“ अच्छा, बडी अच्छी विचारधारा है तुम्हारी ? ” सुधा ने जैसे उसे टोक दिया ?
"तो फिर क्या करू ? खुद तो परेशान होती ही हो और अपनी परेशानी में मुझे भी सम्मिलित नहीं करती हो ।"

"जब सम्मिलित नहीं किया है, तब तो यह हाल है, और कर लूँगी तो शायद... ? "

"एकाध को मार ही डालूँगा । ” सागर ने बात पूरी कर दी, तो सुधा थोडी हँसकर बोली,

" ताकि बडी आसानी से जेल में भी चले जाओ ? "

" अरे, तुम्हारे लिए जेल तो क्या, नरक में भी चला जाऊँ । वहाँ जाकर दो लाभ भी होंगे ? ” "वे क्या हैँ ? "

" एक तो प्रेम में शहीद होनेवालों की लिस्ट में नाम लिख जाएगा और दूसरा अपने कुछ पाप भी कम हो जाएंगे ।”
" अच्छा, नरक में रहनेवालों के पाप कम होते हैं क्या ? "
“ और नहीं तो क्या ! देखो जो मनुष्य नरक में जीवन काट रहा है, वह अपने पापों की सजा काट रहा है और उससे बदतर है जो दुनिया में रहकर दुष्टों के साथ अपने पापों में बढ़ोतरी कर रहा है और इस प्रकार से नरक में रहनेवाला अपने पाप कम कर रहा है कि नहीं ?”
“ अच्छा, ठीक है, तुम्हें अपने पाप कम करने की अभी फिलहाल आवश्यकता नहीं है । हाँ, फोन पर से हटने की आवश्यकता है । मुझे बहुत काम करना है । ”

"तो ठीक है, मैं बन्द कर देता हूँ ।"

"हां! और अब ज़ल्दी-जल्दी फोन मत करना । ”

“जैसी तुम्हारी मर्जी ।" यह कहकर सागर ने बात बन्द कर दी तो सुधा फिर मेज़ पर अस्त-व्यस्त पड़ी पुस्तकों आदि को निहारने लगी । फिर थोड़ी-ही देर में वह 'व्यावहारिक मनोविज्ञान' की पुस्तक खोलकर उसके पृष्ठ पलटने लगी । अभी उसने पुस्तक को पढ़ना आरम्भ ही किया था, कि अचानक से पुन: फोन की घण्टी बजने लगी । इस पर सुधा क्षणभर को जैसे चौंक पड़ी। फिर ये सोचते हुए कि ' अब कौन हो सकता है ?' टेलीफोन उठाकर बोली,

"हलो ?"

"मैं सागर.. "

" अब क्या है ? मैंने मना किया था ?" सुधा जैसे चिढ़कर बोली ।
"देखो चिल्लाओ नहीं । मैं एक बहुत आवश्यक बात बताना भूल गया था । " सागर बोला ।
”क्या ?”.
“ क्या तुम्हें ज्ञात है कि माँझी के पिताजी का यहाँ से स्थानान्तरण हो गया है ? "
" नहीं तो । " लेकिन अभी-अभी तो वे स्थानान्तरित होकर आए ही थे । मुश्किल से सात-आठ महीने ही हुए होंगे। " सुधा ने अनुमान लगाते हुए कहा ।
“हाँ, लेकिन निलम्बित भी तो कर दिए गए थे और अब जब बहाल हुए हैं, तो उनका स्थानान्तरण भी हो गया है। "
“कहाँ हुआ है उनका स्थानान्तरण ?” सुधा ने पूछा ।
"पिथौरागढ़ । " सागर बोला ।
"तुम्हें ये सब कैसे मालूम हुआ ?"
"मैं एक कार्यं से उनके कार्यालय में गया ' था, तो कुछ लोग वहाँ बातें कर रहे थे । ” सागर बोला ।
“ इसका अर्थ है कि वे यदि जाएँगे तो माँझी भी जाएगा । " सुधा बोली ।
" आशा तो यही करनी चाहिए, पर कौन कह सकता है कि माँझी के पिता के जाने पर माँझी पर भी कोई प्रभाव पड़ेगा ? वह तो यूँ भी बाजार में छुटे हुए ढोर के समान इधर-उधर फिरता ही रहता है । "
“ऐसे फिरने से क्या होता है ? उसकी शिक्षा मालूम है तुम्हें । हम सब से अधिक पढा…लिखा है वह । "
'" अच्छा ! " सागर आश्चर्य से बोला ।
"हाँ, दो बार तो स्नातकोत्तर किया है उसने । हिन्दी और समाजशास्त्र मेँ । इसके अतिरिक्त जीवविज्ञान और रसायन-विज्ञान में स्नातक भी है और साथ में 'मैडिकल लेबोरेटरी' की भी डिग्री है उसके पास । "
" लेकिन क्या फायदा इन डिग्रियों से । सिर तो अपना वह पत्थरों से ही फोड़ता है । "
“वह तो है, लेकिन खुरदरे और भद्दे पत्थरों को तराशकर, चिकना करके ऐसा बना भी देता है कि लोग उनसे प्यार से चिपटने भी लगते हैं । "
“कहीँ ऐसा तो नहीं है कि तुम माँझी की तारीफ़ कर रही हो ? " सागर ने व्यंग्य से पूछा ।
“तारीफ़ नहीं सच्चाई बता रही हूँ । "
"कुछ मेरी भी तारीफ़ कर दिया करो, कभी-कभी । " सागर ने कहा ।
"उसके लिए सारी जिंदगी पड़ी है । "
" पर तारीफें तो विवाह से पहले ही की जाती हैं । विवाह होने के पश्चात तो पति में खामियाँ ही ढूँढी जाती हैं । ” सागर जैसे मुस्कराकर बोला ।

इस पर सुधा ने उसको उत्तर दिया,

“ अपने घर की वस्तुओं की न तो तारीफें की जाती हैं, और न ही कमियाँ ढूँढी जाती हैं । बस जैसी भी हों, उसी को सँभालकर रखा जाता हैं, और सन्तुष्टि की जाती है । "
"हाँ जी ! सच ही कह रही हो । अपनों से बेहतर तो दुश्मन होते हैं; जिनका कम-से-कम जलकर जुबाँ पर नाम तो आता है और फूलों की चोट से पत्थरों की चोट भी, क्योंकि इनसे घायल हुआ व्यक्ति, चोटों के निशानों को देख-देखकर घायल करनेवाले को याद तो करता है । " सागर ने कहा तो सुधा बोली,

" अच्छा ठीक है ! अब बंद भी करो ये सब । मैं पास होऊँ न होऊँ, पर तुम अवश्य ही फेल होगे। ”
यह कहकर उसने बात समाप्त कर दी और फोन अपने स्थान पर रख दिया । फिर घड़ी को देखा । दोपहर के डेढ़ बज रहे थे । समय देखते हुए वह उठ बैठी और किचन में घुस गई । दोपहर के खाने का समय हो चुका था । इसी उम्मीद पर वह वहाँ खाने की चीजें आदि ढूँढ़ने लगी ।
उसके पश्चात् उसने खाना लगाया । अकेले ही बैठकर खाया और खाने के पश्चात अपने पिता को फोन करके उनके कुशल-मंगल के बारे में पूछा और बाद में पुन: अपने कमरे में चली आई ।
कमरे को एक नज़र डालकर देखा- सारी पुस्तकें, कॉपियाँ तथा अन्य लेखन-पठन सामग्री मेज़ पर अस्त-व्यस्त-सी पड़ी थी । यह देखकर वह उन्हें एक ओर से सजाकर ठीक से रखने लगी ।
पुस्तकें आदि ठीक करते समय सहसा ही उसकी दृष्टि उस बड़े से खाकी लिफाफे की और गई जो पिछले कई महीनों से वहाँ पर रखा हुआ जैसे अपनी किस्मत पर रो रहा था । यह वह लिफाफा था जिसमें उसकी विभिन्न मुद्राओं मेँ फोटोग्राफर के द्वारा ली गई उसकी अपनी तस्वीरें थीं, और जो उसने माँझी के अनुरोध तथा निर्देशानुसार खिंचवाई थीं । अपनी मूर्ति बनने के लिए। फिर वह उन तस्वीरों को एक-एक करके निकालकर देखने लगी । सभी तस्वीरें उसकी अपनी थीं, जो उसके जीवन की धूप-छाँव के समान किसी में मुस्करा रही थी -कहीँ हँस रही थी, तो कहीं मायूस-गम्भीर खड़ी हुईं थी । जाने क्यों ? कुछ-कुछ उदास-सी ।

सुधा के कुछेक सप्ताह और इसी ऊहापोह में व्यतीत हो गए । उसकी परीक्षाएँ अत्यधिक पास आ चुकी थीं । उनमें केवल दो सप्ताह ही बाकी रह गए थे । परीक्षाओं के परिणाम घोषित होने के बाद ही उसका अपने विवाह का कार्यक्रम था, परन्तु अभी तक, फिर भी माँझी की कोई भी सूचना उसको प्राप्त नहीं हो सकी थी । एक प्रकार से उसने अपनी मूर्तिवाला कार्यक्रम अपने मस्तिष्क से निकाल ही दिया था । एक आडवाणी ही ऐसे थे, जो उसको अभी तक ये कार्य पूर्ण होने की एक झूठी तसल्ली दिए हुए थे, इसलिए उन्हीं की योजनानुसार उसे माँझी के वापस आने की केवल प्रतीक्षा भर ही थी, अन्यथा उससे उसकी कोई भी ऐसी इच्छाएँ अपेक्षित न थीं, जिनके कारण वह स्वयं को अधूरी या अपूर्ण-सी समझती, लेकिन पता नहीं, फिर भी ऐसी क्या बात थी कि जिसके कारण वह कभी-कभार माँझी के यूँ बिना किसी कारण के चले जाने पर चिंतित अवश्य ही हो जाया करती थी । उसकी एक लम्बे अरसे से चली आ रही अनुपस्थिति के कारण जैसे उसकी कोई परेशानी बढ़ जाती थी ।

इस बीच आडवाणी ने उससे दो-एक बार उसको यह सलाह तो दी थी कि माँझी के आने पर वह उससे थोड़ा नर्मी से पेश आए, अन्यथा क्या भरोसा, कलाकार के मस्तिष्क का ? ज्ररा-सी बात पर ही तुनक जाए और काम भी न करे । माँझी को तो जैसे अपने से ही प्यार नहीं था, तो फिर वह सांसारिक बातों को क्योंकर गले लगाने की ख्वाहिश करता ?

फिर एक दिन सुधा अपने घर में बैठी हुई दिनभर से पुस्तकों से उलझी हुई थी । सारे-सारे दिन पढ़ते हुए वह जैसे बेचैन-सी हो गई थी । उसके अध्ययन में कोई रुकावट या विघ्न न पडे, इसलिए अब सागर भी उसको बार-बार फोन नहीं करता था ।

आज़ दिनभर से सूर्य आकाश में बादलों का लिहाफ ओढ़कर अपना मुख छिपाए रहा था । वातावरण मेँ काफी कुछ ठंडक बस गई थी। चारों ओर एक अजीब-सी खामोशी, एक बिना बात की रिक्तता का जैसे आभास होता था । प्रकृति की किसी भी वस्तु, किसी भी परिंदे में कोई भी महक और चंचलता नज़र नहीं आती थी ।

फिर संध्या ढले जब सूर्य ने भी बिना उदय हुए बादलों की आड़ का सहारा लेते हुए दिनभर का सफ़र पूर्ण कर लिया तो सुधा का मन न जाने क्यों इस शाम में बाहर जाने के लिए बेचैन हो गया । फिर शीघ्र ही वह तैयार भी हो गई । शरीर पर ढलती हुई शाम की तरह उसने स्लैटी रंग की साड़ी लपेटी । बालों को लापरवाही से बाँधते हुए सिर्फ चोटी-भर ही की , और पैरों में चप्पलें डालकर कार लेकर बाहर आ गई । उसके दिल में न तो कोई उमंग ही थी और न ही कोई उतावलापन । बस जैसे कि वह क्षणभर को अथवा थोड़े-से समय के लिए घर से बाहर आना चाहती थी ।
सड़क पर आते ही उसने कार की रफतार को बढ़ा दिया । इस क़दर कि सड़क के किनारे लगे हुए वृक्ष भी कार की रफ्तार से भी तीव्रतर पीछे भागने लगे थे । फिर कुछ ही मिनटों के पश्चात् उसने कार को स्वत: ही मक्रील के पुल के एक किनारे लाकर रोक दिया ।
सुधा ने पलभर को आसपास देखा । कहीं कोई भी नहीं था । बस कभी-कभी कोई मोटर या लॉरी पलभर में ही पुल का सीना दबाती हुई निकल जाती थी । चारों और खामोशी थी । साथ ही ढलती हुई शाम की निस्तब्धता भी । मक्रील नदी का जल भी आज़ बड़े ही शान्ति के साथ धीरे-धीरे जैसे चिकने फ़र्श पर फिसल-सा रहा था । लहरें शांत थीं, और किनारों से पानी घटकर नीचे आ गया था । आज मछली पकड़कर अपना पेट भरनेवाले मछुआरे भी नज़र नहीं आ रहे थे । सुधा को उसमें और आस-पास के वातावरण में एक अजीब-सा अन्तर नज़र आ रहा था । शायद इसलिए क्योंकि वह आज़ काफी दिनों के पश्चात् ही यहाँ आई थी ।

वह धीरे-से कार से उतरी और फिर कार का दरवाजा बंद किए बगैर ही पुल की मुँडेर पर खड़ी होकर नीचे शान्त भाव से अपनी यात्रा को निकली हुईं लहरों की रवानगी को निहारने लगी । शायद बिना मक़सद ही ।

अभी वह चुपचाप नीचे नदी के जल को देख ही रही थी कि अचानक ही उसको एक कठोर, कड़कता हुआ-सा स्वर सुनाई दिया,

"ऐ मेम साहब ?"
" …?"- सुधा ने अचानक ही पीछे मुड़कर देखा- एक पुलिस इन्सपेक्टर उसको बड़ी ही संदिग्धता से देख रहा था ।
पहले तो सुधा ने आस-पास देखा- कहीं कोई नहीं था । केवल वह इन्सपेक्टर और उसकी जीप ही थी । तब उसने उस इन्सपेक्टर से पूछा,

" क्या आपने ही बुलाया था मुझे ? ”
"हाँ !" वह इन्सपेक्टर बोला ।
“क्या मैं पूछ सकती हूँ क्यों ?”
"यह सफेद कार आपकी है ?" उत्तर में इन्सपेक्टर ने पूछा ।
"जी हां, मेरी ही है । क्यों ?"
“यहा अकेली क्या कर रही हैं आप ? ” उसने दूसरा प्रश्न पूछा ।
" देख नहीं रहे, पानी की लहरों से बातें करने की कोशिश कर रही थी । "
"कही बातें करते-करते लहरों मेँ छलाँग लगाने का इरादा तो नहीं है ?"
"होश में तो हैं आप ? मैँ तो ऐसे ही जी बहलाने आ गई हूँ । "
" देखिए, बुरा मत मानिए । मैं अपनी ड्यूटी पर हूँ । यहां आए दिन पुल पर से कूदकर मक्रील में जान देनेवालों की घटनाएँ होती रहती हैँ । इसी सन्देह से पूछ बैठा था ।” इन्सपेक्टर ने कहा। '
"मैँ उनमें से नहीं हूँ और न ही मेरा अभी मरने का कोई इरादा है । " सुधा ने कहा तो इन्सपेक्टर आगे बोला,

"ठीक है, लेकिन ज्यादा देर नही रुकना यहाँ पर । शीघ्र ही घर चली जाइए । वैसे भी यह इलाका सुरक्षा की दृष्टि से अधिक अच्छा नहीं है । ” कहता हुआ वह पुन: अपनी जीप में जाकर बैठ गया और जीप को घुर्र से चालू करके आगे निकल गया ।
' बेवकूफ़ नहीं तो । मुझे बिना बात मारने आए थे । ' इन्सपेक्टर के जाने के पश्चात् सुधा उसकी जीप को जाते देख स्वत: ही बड़बड़ा गई- अच्छा-ख़ासा मूड ख़राब करके चला गया । ' मन में कहती हुई वह अपनी कार की तरफ़ बढने लगी ।

अभी वह अपनी कार में बैठने ही जा रही थी कि अचानक ही नदी के दूसरे तट पर पटरी पर किसी जानी-पहचानी आकृति, एक छाया को खड़े देखकर ठिठक गई । सहसा ही उसकी जिज्ञासा और तीव्र हुई तो वह रुककर उस छाया को देखने लगी- उस पुरुष की पीठ उसकी और थी, लेकिन फिर भी उसका डील-डोल उसे जाना-पहचाना-सा लग रहा था । वह पुरुष छाया खड़ी-खड़ी, दूर-दूर तक मक्रील नदी की लहरों की जैसे लम्बाई माप रही थी । अपने ही में लीन । सारी दुनिया से बेखबर । चुपचाप । मौन और स्थिर खड़ी हुई जैसे किसी अनदेखी आत्मा से वार्तालाप कर रही हो । सुधा की जब समझ में कुछ नहीं आया, तो उसने अचानक ही कार का हॉर्न बजा दिया ।
खामोश वातावरण में जैसे ही कार के हॉर्न के स्वर चीख पड़े तो सहसा ही उस छाया का ध्यान भंग हो गया । उसने तुरन्त मुड़कर पीछे देखा । देखा तो सुधा की आँखों के समक्ष अचानक ही जैसे कोई आतिशबाजी का गोला फूट पड़ा हो । इस प्रकार कि पहले-पहल तो उसे देखकर विश्वास भी नहीं हुआ । वह छाया कोई अनजान न होकर माँझी की थी, जिसने कार के हॉर्न की आवाज़ सुनकर इधर-उधर देखा तो था और फिर कुछ न समझकर पुन: गर्दन फेर ली थी । सुधा की उपस्थिति से बेखबर वह फिर से अपने में खो गया था... ।

माँझी को यूँ अचानक पाकर सुधा को एक बार तो उस पर बड़ा ही क्रोध आया । इस प्रकार कि उसने सोचा, 'इसको अभी यहीं इसी दशा में अकेला खड़ा छोडकर चली जाए और कभी भी बात न करे । जाने क्या समझ रखा है इसने अपने-आपको? बिना बात के उसका चैन खो रखा है इसने ।' परन्तु वह ऐसा नहीं कर सकी । तुरन्त ही वह कार में बैठी और चालू कर सड़क पर ही मोड़कर वह नदी की पटरी पर आ गई और शीघ्र ही माँझी के पीछे कार रोककर उसके हॉर्न पर अपना सिर रखकर बैठ गई । बैठ गई तो कार के हॉर्न पुन: चीखने लगे । लगातार ही- पों... ओँ.... औं.......'
माँझी की अचानक ही कार के लगातार बजते हॉर्नों से तन्द्रा भंग हुईं, तो उसने पहले तो एक बार कार को देखा । फिर कुछ न समझते हुए कार के ड्राइवर वाली ओर आते हुए अन्दर बैठी सुधा के सिर को हिलाते हुए पूछ बैठा,

"मिस !... मिस !... आप खराब हैं, या आपकी कार का हॉर्न .?"
"दोनो ही... ? ” ये कहते हुए सुधा ने अपना मुख ऊपर उठाकर देखा तो माँझी उसको यूँ अचानक ही देखकर सकपका गया । फिर गम्भीर होकर बोला,

“ आप ?"
"जी नहीं ! आप ! " सुधा ने भी उसकी और अँगुली उठाते हुए कहा ।
" मैँ समझा नहीं... ? " माँझी ने अचरजभरी दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए कहा ।
"समझी तो मैं भी नहीं ।" सुधा बोली ।
" आप क्या नहीं समझी ?"

“यही कि जो मैं देख रही हूँ वह सच है या आपकी बहन मंजु ने जो बोला था वह सच है, अथवा आप जो मुझसे कहकर गए थे वह झूठ था ? ”
“साफ़-साफ़ कहिए कि आप कहना क्या चाहती हैं ?" माँझी पहले से भी अधिक आश्चर्य से बोला।
"या तो आपके इस गम्भीर चुप-चुप चेहरे के पीछे भी कोई अन्य चेहरा है, या फिर आपके मस्तिष्क के तारों को ठीक-ठाक खींचने के लिए किसी मस्तिष्क-विशेषज्ञ को दिखाना पड़ेगा ? " सुधा उसी मुद्रा में बोली तो माँझी भी पलभर को विचलित-सा हो गया । वह एक पल सुधा के गम्भीर, तनावयुक्त मुखड़े को देखता रहा । फिर बोला,

"देखिए सुधा जी न तो मेरा मस्तिष्क ही ख़राब है, और न ही मेरे चेहरे के पीछे कोई अन्य चेहरा छिपा हुआ है और यदि आप मजाक कर ही हैं, तो कृपा करके मुझ गरीब पर रहम खाइए। बताइये, क्या शिकायत है आपको मुझसे? "

"शिकायत ? आप क्या कहते हैं और क्या करते हैं ? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता है ? जाते आप जयपुर हैं । खाना अमृतसर में खाते हैं और टहलने यहाँ मक्रील पर चले आते हैं ? ये क्या तमाशा बना रखा है आपने ? "
"तो आप डाँट लगा रही हैं मुझको । "
“डाँट ! काश, मैं इस लायक होती तो डाँट के स्थान पर पिटाई करती आपकी । "
" लगता है कि आप तो बहुत ही अधिक नाराज़ हैँ मुझसे । लेकिन यकीन मानिए कि मैं कोई भी तफ़रीह इत्यादि करने नहीं गया था । एक बहुत-ही आवश्यक कार्य था, बस उसी को पूरा करने गया था और आज ही दोपहर बाद वापस आया हूँ । ”
" और आते ही यहाँ सुनसान दरिया के बेवफा किनारों का हाल पूछने पहले चले आए । मुझसे तो कोई वास्ता ही नहीं ? क्या आडवाणी के कार्य से भी अधिक कोई ज़रूरी कार्य था ? कम-से-कम अपने आने की सूचना तो दे ही देते ?"
" पहले सोचा भी था, पर ये सोचकर चुप ही रहा कि, ढलती हुई शाम के रंगीन मौसम का मजा आपके लिए क्यों किरकिरा कर दूँ ? इस समय तो आप 'सागर' . . . "
"में डूबने जाती हूँ न ?” सुधा ने बात पूरी कर दी तो माँझी सहसा ही चुप हो गया । फिर कुछेक क्षणों के पश्चात् उसने कहा कि,

" डूब तो आप पहले ही चुकी हैं, और जो डूबकर तल में चला जाता है उसको निकालने से लाभ भी क्या ? केवल लाश ही बाहर आ पाती है । "
'?' - माँझी ने उत्तर दिया तो सुधा आश्चर्य से उसका मुँह देखने लगी । बड़ी ही गम्भीरता से। अपनी बड़ी-बड़ी आँखों के साथ । फिर बोली,

"बस आपको तो अवसर चाहिए लगनेवाली बात कहने के लिए ? खैर ! यह बताइए कि मेरा कार्य होगा या नहीं ?" सुधा ने सीधे ही पूछा ।
" आपका कार्य ?"
"मेरा मतलब आडवाणी का कार्य । मैंने सारी 'फ़ोटोज' बनवा ली हैं । "

" अब देखिए कि आज तो वापस आया हूँ । बस एक-दो सप्ताह में कार्य आरम्भ कर दूँगा । " माँझी ने कहा तो सुधा कार से उतरकर नीचे आ गई । फिर माँझी को आश्चर्य से घूरते हुए बोली,

"एक-दो सप्ताह ? यानी कि साल भर मटरगश्ती करके आज़ सूरत दिखा रहे हैँ, और अब भी छ: महीने और चाहिए यह काम शुरू करने के लिए ? ”
“ आप तो इतनी जल्दी मचा रही हैं कि... ?”
"जल्दी ? मुझे तो अब एक-एक दिन भारी पड़ रहा है । परीक्षाएँ पास आ गई हैँ- विवाह की भी तैयारी करनी है- आपको याद है कि नहीं कि छ: महीने का कान्ट्रेक्ट था, और पूरे छ: महीने समाप्त होने में केवल पाँच हफ़्ते बाकी रह गए हैँ ? कैसे करेंगे आप यह कार्य इतना शीघ्र ही ? वह तो आडवाणी का स्वभाव इतना अच्छा है कि वे कुछ कहते भी नहीं हैं, वरना उनके स्थान पर कोई अन्य होता तो कान्ट्रेक्ट भी समाप्त कर लेता और अग्रिम धनराशि भी वसूल कर लेता मय ब्याज के । "
सुधा ने उसे पूरा-पूरा भाषण-सा दे दिया, तो माँझी पलभर को कुछ कह नहीं सका । बस इधर-उधर देखने लगा । तभी सुधा ने आगे कहा,

" इधर-उधर बगलें झाँकने से काम नहीं चलेगा । अपनी जिम्मेदारियों को क़रीब से देखेंगे, तभी बात बनेगी । एक बात और याद रखिए कि व्यापारिक समझोते विश्वास और कर्त्तव्य जैसी दो दीवारों पर खड़े रहते हैं । इनमें से एक भी दीवार गिरेगी तो सारा खेल ख़राब हो जाता है । ”
“ कोई किसी का खेल ख़राब नहीं होगा । आप तो नाहक ही परेशान होती हैं । फिर भी यदि आप चाहती हैँ तो मैं काम आरम्भ कर ही देता हूँ । आपने फोटोज तो बनवा ही ली हैँ । " माँझी ने उसे ढाँढस बँधाते हुए पूछा ।
"हाँ...हाँ' सुधा ने कहा ।
"तो फिर आप मुझको कल ही मिलिए । उन फ़ोटोज़ के साथ । साथ ही खूब ढंग से तैयार होकर आइएगा । " माँझी ने कहा तो सुधा ने एकदम से पूछा,

"वह क्यों ? ”
“वह इसलिए कि कुछ फोटोज मैं भी उतारूँगा आपकी । ”
" लेकिन आना कहाँ होगा ?"
" कला मन्दिर में । आडवाणी ने पहले ही प्रबन्ध कर दिया है, लेकिन मेरी कुछेक शर्ते होंगी । "
"कैसी शर्तें ? " सुधा ने तुरन्त ही पूछा ।
“काम के समय मैं यदि आपको गौर से, गहराई से देखूँ तो आप इसे अन्यत्र नहीं लेंगी । "
"तो वैसे क्या आप कम गहराई से देखते हैं मुझे ?"
"मतलब ? "

" अपने आपसे पूछिए । खुद पता चल जाएगा ।"
“...... ?”

सुधा ने कहा तो माँझी स्वत: ही झेंप-सा गया । अपने-आपसे ही- जैसे कि कोई चोर चोरी करते हुए पकड़ लिया गया हो । काफी देर तक वह कुछ भी नहीं बोला ।
“दूसरी शर्त क्या है आपकी ? " तभी सुधा ने आगे पूछ लिया ।
“काम के समय आप हर वक्त को ये पटर-पटर नहीं करेंगी । "
“मैं कहाँ बोलती हूँ । आप सुन लेते हैं और बोलने का अवसर देते हैं इसलिए बोलती हूँ । "
" अच्छा चलिए. । मुझमें ही कमी है । मेरी सुनने की आदत है, इसलिए आप बोलती हैं; वरना तो आप निहायत ही ख़ामोशी-पसन्द, शान्तिप्रिय लइकी हैँ ।"
"बडी जल्दी ही हार मान लेते हैं आप ? " सुधा ने कहा ।
"जिनसे हारना चाहिए, उनसे ही हार मान लेता हूँ । वरना तो... ? ”
“बहुतेरे लोग आपसे हार मानकर आपके गले में विजय का हार पहनाते हैं । ” सुधा ने बात पूरी की तो माँझी हल्के- से मुस्कराकर बोला,

"ऐसा ही समझ लीजिए । "
" और भी कोई शर्त है ? " सुधा ने पूछा ।
"जी नहीं । "
" अब मेरी भी शर्ते सुन लीजिए । " सुधा ने कहा तो वह सहसा ही चौंक पड़ा । फिर बोला,

" आपकी शर्तें ? "
" क्यों आपने क्या सोच रखा है, ताली क्या एक हाथ से ही बजेगी ? "
"तो बजाइए न दोनों हाथों से, किसने रोका है आपको ? ”
“पहली बात यह है कि जब तक यह कार्यं पूरा नहीं हो जाता है, तब तक आप आज के बाद इस नदी का रास्ता नहीं नापेंगे । " सुधा बोली ।
"… ?" खामोशी रही । "
माँझी इस पर पहले तो खामोश रहा । फिर थोड़ा सोचते हुए बोला,

"प्रकृति के इस खूबसूरत नजारे से आपको इतनी चिढ़ क्यों हो गई है ? "
" क्योंकि इसने आपको अपने वश में किया हुआ है । ”
"तो इससे क्या होता है, आपने भी तो किसी को अपने वश में किया हुआ है ।"
“मैं तो उससे प्यार करती हूँ । उससे विवाह करने जा रही हूँ । "
"करती होंगी । लेकिन उतना ही जितना यह नदी मुझसे करती है ? हर किसी से करती है । जो भी प्यार से इसकी लहरों को स्पर्श करता है, उसको यह अपने आगोश में भर लेना चाहती है और फिर इतना अधिक प्यार करती है कि अपनी गोद में समेटकर उसे सदा के लिए अपने तल में छिपा भी लेती है, ताकि किसी की नज़र न लग जाए । ”
" यह आप कैसे जाने ? आपने कभी किसी से प्यार थोड़े ही किया है । फिर नदी की चंचल लहरों का तो हर किसी को प्यार से अपने दामन में समेटना एक मज़बूरी है, क्योंकि वे सिर्फ करना जानती हैँ, सोचना नहीँ- आगे बढ़ना जानती हैं, देखना नहीं, लेकिन इन्सान तो समझदार होता है, सोच-समझकर क़दम आगे बढ़ा सकता है । "

“सोच-समझकर आगे बढ़नेवाले ही तो ठोकर खाकर गिरा करते हैं । "
" फिर गिरने के पश्चात् आगे के लिए सँभल भी तो सकते हैं । "
" आपको क्या पता कि किसी-किसी को ठोकर खाकर गिरने के पश्चात् उठना अच्छा ही नहीं लगता है । "
“......... ? “
सुधा इस पर चौंक तो गई, पर अधिक आश्चर्य न कर सकी । फिर जैसे खीझकर बोली,

"तो फिर देर किस बात की है । मक्रील की विशाल लहरें अपना मुँह फाड़े आपको कितने प्यार से पुकार रही हैँ । जाकर कूद पड़िए । "
" अगर कूद पडूं तो क्या आप निकाल लेंगी ? " माँझी ने व्यंग्यभरी मुस्कान से पूछा ।
"इसकी आवश्यकता भी क्या है ? आपको तो गिरने के पश्चात् सँभलना और उठना रास आता ही नहीं है ।”
"बडी बेदर्द हैं आप ।”
"मैं कहा हूँ ? यह तो आपकी विचारधारा है जिसका कि मैं समर्थन कर रही हूँ । फिर जिसने मुझे बचाया है उसको मैं कैसे बचा पाऊँगी ? "
"कोशिश करके तो देखिए । शायद आपके स्पर्शमात्र से ही किसी को मुक्ति मिल जाए । "
“मुक्ति तो भटकी हुई उन आत्माओं को मिला करती है, जो बे-मौत मर जाया करती हैं । आप तो जीते-जागते इन्सान हैं । "
"इसका अर्थ है कि मुझे भी अपने उद्धार के लिए पहले मरना होगा । " माँझी ने कहा ।
"मर तो आप पहले ही चुके हैं' । अब दोबारा सूली चढ़ने की क्या आवश्यकता ' है ?" सुधा बोली।
“ क्या ,? " माँझी फिर से चौंक गया तो सुधा ने आगे कहा,

"घबराइए नहीं । मैंने मंजु से बात की थी । कौन है वह लड़की, जिसने आपकी यह दशा बनाई है ?"
“तो मंजु ने आपको यह भी बता दिया होगा कि वह कौन है ?”
" अगर बताया ही होता तो मैं भला आपसे क्यों पूछती ? क्या आप नहीं बताएँगे कि वह कौन है ? मैं उससे मिलना चाहती हूँ । हो सकता है कि मैँ आपकी कुछ सहायता कर सकूँ । "
सुधा ने कहा तो माँझी थोड़ा सोचकर बोला,

" आपको उससे मिलने के लिए जयपुर चलना होगा । "
"तो ठीक है । विवाह के बाद मैं और सागर अवश्य ही जयपुर आएँगे, तभी मैं मिलूँगी उससे । "
“ लेकिन तब तक तो बहत देर हो चुकी होगी । " माँझी बोला ।

"क्यों ?
"इसलिए कि तब तक तो वह लड़की अपना विवाह भी कर लेगी । " माँझी ने कहा ।
"इसका मतलब है कि वह लड़की आपसे प्यार नहीं करती हैं । ” सुधा ने अनुमान लगाया ।
" क्या पता ? "
" क्या उसको ज्ञात है कि आप उससे विवाह करना चाहते हैं .?" सुधा ने पूछा ।
"शायद ! "
" अगर नहीं, तो फिर आप उसे बता क्यों नहीं देते .?" सुधा ने अगला प्रश्न कर दिया ।
“इससे भी कोई लाभ नहीं । " माँझी मायूस होकर बोला ।
“' क्यों ? "
“ क्योंकि वह लड़की दूसरे लड़के से प्यार करती है ।”
"तो फिर, एक बात बोलूँ मैं ?"
“ क्या ? "
" आप उसके मार्ग से वैसे ही चुपचाप से हट जाइए, जैसे कि आप आए थे । यह सोचकर कि सच्चा प्यार करनेवाले प्यार की कुर्बानी दिया करते हैं । किसी की खुशियों का गला नहीं घोंटा करते हैं । ”
"मैं वही सब तो करने की कोशिश करता हूँ । "
" तो आप कहती हैं कि, मक्रील से ज़न्म-जिन्दगी का नाता जोड़ रखा है । उसकी लहरों का गीत सुनते हो । नदी का पानी पीने की आदत पइ गई है । ' वगैरह... वगैरह... "
" अच्छा... अच्छा... मुझे माफ़ करो । मुझे नहीं मालूम था यह सब । मैं आपका दर्द समझती हूँ। काश:, मैं आपका दर्द बाँट सकती । " सुधा ने हमदर्दी से कहा तो माँझी जैसे एक लम्बी गहरी साँस लेकर बोला,

"काश ! आप मेरा दर्द बाँट सकतीं ?"
" अच्छा, अब बहुत देर हो गई है । देखो, कितना अँधेरा-सा बढ़ने लगा है । चलो, चलते हैँ । ” यह कहकर सुधा कार की ओर बढ़ गई, पर माँझी अपने ही स्थान पर खड़ा रहा । फिर सुधा जैसे ही कार मेँ बैठने को हुई तो माँझी को अपने स्थान पर खड़ा देख वहीं ठिठक गई । उसकी और आश्चर्य से देखते हुए उसने पूछा,

" अब क्यों खडे हैँ आप ? क्या चलने का इरादा नहीं है ? "
" आप चलिए मैं आता हूँ ।"
" आप क्या अपनी गाड़ी लेकर आए हैं ? " सुधा ने आस-पास देखते हुए पूछा ।
"जी नहीं ! यहाँ तो मैं प्राय: पैदल ही आ जाता हूँ । "

"तो फिर मेरे साथ बैठने में क्या डर लगता है ?" सुधा ने प्रश्नात्मक भाव से पूछा ।
"जी नहीं, डर तो नहीं, पर हाँ, झिझक अवश्य ही लगती है । " माँझी ने उत्तर दिया ।
तब सुधा यकायक ही फिर ठिठक गई । वह माँझी के पास आई, फिर उसकी आँखों में आँखे डालकर बोली,

" भई, क्यों लगती है आपको मेरे साथ बैठते हुए शर्म ? "
" दूसरे की वस्तु को तो देखना भी पाप समझा जाता है, फिर यह तो पास बैठनेवाली बात है ।" माँझी ने उत्तर दिया ।
इस पर सुधा ने उसे देखा । गौर से, फिर बोली,

" अभी मैं किसी को भी नहीं हुई हूँ । चलिए आइए ! देर मत कीजिए । कितना अँधेरा बढ़ गया है ?”

तब माँझी उसके साथ कार मैं बैठ गया और फिर थोड़ी ही देर में सुधा की कार सड़क पर दौड़ रही थी । फिर माँझी के घर के द्वार पर उसे छोड़कर सुधा ने पूछा,

"कल कला मन्दिर में आना है मुझको ?”
“जी हाँ । क्या मन डाँवाँडोल हो रहा है ?" माँझी ने कहा ।
“मेरा नहीं, आपका हो सकता है । "
"क्यों, इतना भी विश्वास नहीं रहा मुझ पर? " माँझी ने हल्के-से मुस्कराकर कहा तो सुधा भी हँसते हुए बोली,

" और नहीं तो क्या ? डाल-डाल, फुदक-फुदक कर वृक्ष बदलनेवाले पक्षी का क्या ठिकाना ? आज यहाँ तो कल कहीं और... विश्वास तो आपकी लापरवाह आदतों ने तोड़ने की कोशिश की है। ”
"तो फिर किसी अच्छे-से मज़बूत पिंजरे में कैद करके रख लीजिए इस पक्षी को । कभी भी उड़ ही नहीं पाएगा । " माँझी ने कहा तो सुधा का चेहरा पलभर में ही जैसे सुर्ख हो गया । वह पहले तो मुस्कराई, फिर गम्भीर होकर बोली,

“ शिकारी नहीं हूँ मैं, जो बेमतलब आवारा और आजाद पक्षियों को पकड़ती फिरूँ ।"
“तो क्या घर के पालतू किस्म के जानवर रखने की आदत है आपको ? “ माँझी ने कहा ।
“ऐसा ही समझ लीजिए, मगर जंगली नहीं पालती मैँ ।"
"बडी अच्छी उपाधि दी है आपने मुझे । ”
"बात तो आपने आरम्भ की थी… ! "
"इसलिए तो चुप हो गया ।"
“ चुप्पी तो आपके व्यक्तित्व का ही एक हिस्सा है । वैसे एक बात कहूँ.. ?" सुधा ने कहा । '
“क्या, ?”
" आप उस समय बहुत अच्छे लगते हैं जब ज्यादा चुप रहते हैँ ।"
“बड़ा अच्छा तरीका निकाला है आपने अपने-आपको बचाने का ।"

"डॉक्टर जो हूँ न । अच्छा, अब मैं चलती हूँ । कल भेंट होगी- कला मन्दिर में, लेकिन वहाँ यह कलाकारी मत दिखाइएगा । ”
यह कहकर सुधा कार लेकर आगे बढ़ गई, और माँझी उसे काफी देर तक जाते हुए देखता ही रहा । बुझा-बुझा-सा । ख़ाली-ख़ाली-सा । उस दिये के समान, जो जलने पर जल तो जाता था परन्तु पलभर में ही जरा-सी वायु की लहर आने से बुझ भी जाता था ।

फिर सुधा जब अपने घर वापस आईं, तो रात्रि के साढे आठ बज रहे थे । उसके पिता भी आ चुके थे । बेटी को घर में प्रविष्ट होते देख वे उससे सम्बोधित हुए । बोले,

"अरे बेटी ! कहाँ चली गई थीं तुम ? आडवाणी का फ़ोन आया था । "
" अच्छा, मैं देखती हूँ ।" यह कहकर सुधा ने फोन उठाया और आडवाणी का नम्बर डायल कर दिया । उधर से जैसे ही आडवाणी ने अपना परिचय दिया, तो सुधा ने कहा ,

"मैं सुधा बोल रही हूँ । आपने टेलीफोन किया था ? ” "हाँ तुम्हें बताने के लिए कि माँझी वापस आ गया है । " आडवाणी बोले ।
"हाँ, मुझे मालूम है । मैँ अभी-अभी उसे घर ही छोड़कर आ रही हूँ । "
" अच्छा, तुम्हारी उससे मुलाकात कैसे हो गई ?"
"बस, संयोग ही समझिए । मक्रील के किनारे खड़ा मिल गया था । "
"देखो , अब उसे हाथ से निकलने न देना । यह काम बहुत ज़रूरी है । "
"कोशिश तो मेरी यही होगी । उसने मुझे कल कला मन्दिर में बुलाया है । " सुधा ने कहा ।
" और हाँ, देखो उससे हमें अपना काम निकालना है, इसलिए उससे जरा प्यार से- मुहब्बत से और नर्मी से पेश आना है । पता नहीं क्यों वह तुम्हारा बहुत आदर-सा करता है ? और कहना भी तुम्हारा ही अधिक मानता है ?"॰
"आपकी यह सब कैसे ज्ञात हुआ ?" सुधा ने गम्भीर होकर पूछा ।
"उसकी हरकतों से । उसके कथन से । जब वह इस कार्य के लिए मना कर रहा था तो मैंने उससे यह कहा कि यदि वह यह काम नहीं करेगा तो मैँ भी किसी-न-किसी से करवा ही लूँगा, परन्तु सुधा की विशेष इच्छा है कि वही तुम्हारी मूर्ति बनाए ।"
"फिर क्या हूआ ?"
“ फिर क्या ? वह तो कुछ भी नही बोला । बस इतना ही कहा कि सुधा जी के लिए तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ ।"
“... ?“
सुधा इस पर कुछ भी नहीं बोली । बस चुप ही बनी रही । पलभर को उसको लगा कि जैसे अचानक ही किसी ने उसके दिल की धड़कनों को दबा दिया था । इस तरह कि दबने से एक टीस तो हुई, पर आवाज़ जैसे बाहर न आ सकी हो ।

'?" - सुधा खामोश रही तो आडवाणी ने उसे चिताया. वे बोले,

“ हलो ! "
"जी कहिए !" "कहाँ खो गई थीं आप ? ” आडवाणी ने आश्चर्य से पूछा ।
"बस ऐसे ही..."

"तो ठीक है, मैंने इसीलिए फोन किया था । बस, ध्यान रखना उसका । कहीं फिर न ग़ायब हो जाए । "
" अच्छा, ओके . , बाय । " यह कहकर सुधा ने बात समाप्त कर दी ।

बाद में अपने पिता के कहने पर उसने उनके साथ बैठकर शाम का खाना खाया । खाने के मध्य प्रतिदिन के समान दोनों में औपचारिक वार्ता हुईं । फिर एक-दूसरे से शुभरात्रि कहकर, वे सोने के लिए अपने-अपने कमरों में चले आए ।

सुधा अपने कमरे में आ तो गई थी परन्तु अभी तक उसके मस्तिष्क में आडवाणी के स्वर जैसे हल्की-हल्की सुइयों के समान चुभ रहे थे । बार-बार उसे माँझी के कहे शब्द याद आते थे, ' एक अच्छे-से पिंजरे में बन्द करके रख लीजिए इस पक्षी को '- 'मैं सुधा जी के लिए तो कुछ भी कर सकता हूँ'- माँझी के इन कहे हुए वाक्यों में उसके प्रति उसके दिल में क्या भावनाएँ थीं ? क्या उसके कहने का आशय था ? यह वह भली भाँति समझ तो रही थी, परन्तु उसे अब करना क्या चाहिए ? इसके बारे में कोई ठोस निर्णय नहीं कर सकी थी ।
कभी वह सोचती कि मूर्ति के कार्यं के दौरान यदि माँझी ने उसके अत्यधिक क़रीब आना चाहा, या फिर उसे किसी भी बहाने से छूने का प्रयत्न किया, तब क्या वह इन सब बातों का विरोध कर सकेगी ? और यदि विरोध किया भी तो माँझी क्या सोचेगा ? वह तो दीवाना है ही, क्या वह तब उसकी इस दीवानगी को सहन कर सकेगी ? उसके बढ़ते हुए हाथों को क्या वह झटक सकेगी ? पहले तो शायद ऐसा नहीं होगा । माँझी के स्वभाव में इतनी अधिक बदहवासी आ नहीं सकती है । वह बहुत समझदार भी है । अपनी भावनाओँ को अभी तक दबाए हुए है, लेकिन फिर इतना सीधा भी तो नहीं दिखता हैँ कि वह अवसर प्राप्त होने पर अपने हाथ पीछे ही रोक ले । उस स्थिति में जब कि वह उसको सदैव एक हसरत-भरी निगाहों से ताकता रहता है । यदि ऐसी परिस्थिति आई, तो तब उसे क्या करना चाहिए ?
माँझी को अत्यधिक प्यार से टालना और समझने की कोशिश अच्छी तो है, लेकिन वह इन सबका कुछ अलग ही मतलब ले सकता है और इस तरह उसकी दबी-छिपी भावनाओँ को ओठों तक आने में सहायता भी मिल सकती है । फिर क्या होगा यदि उसने भावावेश मेँ आकर अपने दोनों हाथ पसारकर अपने प्यार की भीख माँगी ? तब न तो वह उसे कुछ दे ही पाएगी और न ही आडवाणी का कार्यं पूर्ण हो सकेगा ? इस प्रकार तो दोनों ही डूबेगे । डूबने वाला और डूबाने वाले को बचानेवाला भी ?

यही सबकुछ सोचते-सोचते सुधा को कब नींद आ गई... उसे पता भी नहीं चल सका था ।
फिर जब सुबह उसकी आँख खुली थी, तो धूप निकल आईं थी । उसके पिता कचहरी जाने के लिए तैयार बैठे थे । दुलारे ने सुबह का नाश्ता लगा दिया था । वह भी शायद उसके उठने पर चाय या कॉंफी बनाने की प्रतीक्षा कर रहा था ।
सुधा शीघ्र ही उठी । स्नान किया और फिर नाश्ते की मेज़ पर आ गई । नाश्ते के दौरान ही उसने दीवारघड़ी में समय देखा । नौ बजनेवाले थे । इसी बीच दुलारे ने कॉफी लाकर दी तो सुधा ने उससे कहा,

"मुझे अभी कहीं जाना है । इसलिए हो सकता है कि देर भी हो जाए और आप खाना बनाकर घर बन्द कर के चले जाना । "
"अच्छा बिटिया !"
दुलारे ने हांमी भरी । फिर वह भी किचन में अन्य काम करने लगा ।
इस बीच सुधा ने नाश्ता समाप्त किया और फिर आईने के सामने आकर खड़ी हो गई । आईने में अपने-आपको एक बार निहारा । प्रात: नहाने के कारण उसके चेहरे का रंग-रूप खिल रहा था, जैसे कि पहाड़ों पर कहीँ चाँदनी का भरा-पूरा दूध लुढ़क गया हो !
खड़े-खड़े सुधा ने सोचा कि आज उसकी मूर्ति बनाने के कार्यक्रम का प्रथम दिवस है और यूँ भी उसे माँझी के कथनानुसार काफी बन-सँवरकर जाना होगा । यही सोचते हुए वह अपने-आपको सँवारने के लिए श्रृंगार करने के लिए बैठ गई ।
फिर जब स्वयं को बना-सँवारकर और श्रृंगार करने के उपरान्त उसने आईने में देखा, तो स्वयं से ही इस प्रकार लजा गई कि मानो नईं-नवेली दुल्हन को उसके साजन ने अचानक ही छू लिया हो। आज़ उसने भरपूर चाँदनी के समान स्वच्छ सफेद साड़ी पहनी थी । उसी रंग का ब्लाउज़ और पैरों में सैंडिल भी सफेद ही पहनी हुईं. थी । लगता था कि जैसे आसमान से उतरी हुई अप्सरा गलती से भूमि पर आकर कहीं आश्रय दूँढ़ रही हो ? कानों में लटकते हुए झुमकों से आती हुई झंकारों का स्वर यूँ प्रतीत होता था कि जैसे कहीं रात की तनहाइयों में छोटी-छोटी घंटियों को वायु का कोई झोंका स्पर्श करके चला जाता हो । पतले गुलाबी ओठ ऐसे थे कि मानो फूलों की नई नवीन कलियाँ खिलने से पूर्व ही अचानक से चटक गई हों । ...और आँखे, जैसे गहरी झील का शान्त जल किसी आगन्तुक की छेड़छाड़ की प्रतीक्षा कर रही हों । काले, घने, लम्बे बाल- कूल्हों से भी नीचे, मानो भूमि के एक चुम्बन के लिए बेचैन-परेशान । गालों का गुलाबी रंग पाउडर का मोहताज नहीँ । कुल मिलाकर उसका रंग-रूप और यौवन का निखार यूँ लग रहा था कि जैसे सचमुच ही संगमरमर की सफेद बनी हुई किसी बेजान मूर्ति में दिल की धड़कनों का रक्त-प्रवाह जारी कर दिया गया हो ।

उसके पश्चात वह कला मन्दिर के प्राँगण में पहुँची तो दिन के ठीक ग्यारह बज रहे थे । प्राँगण में एक-दो कारें और भी खड़ी हुईं थीं । सुधा ने अपनी कार पार्क करते समय इधर-उधर निहारा। परन्तु वह अधिक परेशान भी नहीं हुई, क्योंकि वह जानती थी कि माँझी एक मूडी युवक है । यह आवश्यक नहीं कि वह प्रांय: कार से ही आया-जाया करे । बगैर कार अथवा टैक्सी से भी आ सकता है । यही सोचकर वह बाहर आ गई और कला मन्दिर के आगमन कक्ष के मुख्य द्वार पर बैठी हुई किसी आधुनिक महिला रिसेप्शनिस्ट को देखकर उसने अपना नाम व कार्य बताया, और आडवाणी का कार्ड भी दिया । इस पर उस महिला ने उसका नाम इत्यादि लिखा और एक कार्ड पकड़ाते हुए बोली,

" आप कृपया कमरा नम्बर चार सौं पन्द्रह में चली जाएँ । ”
“ धन्यवाद ! " कहती हुईं सुधा अन्दर चली गई ।
फिर जैसे ही उसने कमरा नम्बर चार सौ पन्द्रह का द्वार खटखटाया तो अन्दर से उसे जाना-पहचाना स्वर सुनाईं दिया,

" आइए, अन्दर आ जाइए मिस सुधा वर्मा ! " माँझी ने उसे सम्बोधित किया था ।
अन्दर पहुँचकर सुधा ने जैसे ही क़दम रखा तो माँझी को खड़ा देखकर चौंक तो गई, परन्तु फिर शीघ्र ही सामान्य भी हो गईं । फिर प्रारम्भिक नमस्ते इत्यादि के पश्चात् माँझी ने उसे एक स्थान पर बैठने को कहा ।
"इस कमरे में मूर्ति बनेगी ?"
सुधा ने उस खाली-ख़ाली-से कमरे को देखकर पूछा ।
"जी नहीं ! यहाँ तो प्रारम्भिक कार्यवाही होगी । ”
"मतलब ? "
"ये फॉर्म वगैरह भरिए, और उसके पश्चात् मैं कुछ. पत्रिकाएँ लाता हूँ उंन्हें देखिए ताकि आपको ज्ञान हो जाए कि आपको किन-किन पोज़ में बैठना होगा । " यह कहकर माँझी दूसरे कमरे में चला गया और सुधा फॉर्म आदि भरने में लग गई । .
थोडी ही देर बाद माँझी कुछेक पत्रिकाएँ लेकर आया और सुधा को दिखाते हुए बोला,

" इन पत्रिकाओं को एक नज़र देख लीजिए । ये आपके लिए नई नहीं हैं । हाँ, पुरानी अवश्य ही पड़ चुकी हैं । मुझको ऐसे ही पोज़ चाहिए होंगे । "
"ये कैसी पत्रिकाएँ हैं ? " कहते हुए सुधा ने उन्हें देखा तो अचानक ही उसे लगा कि जैसे कहीं विस्फोट हो गया हो । ये वे पत्रिकाएँ थीं; जिनमें सुधा ने कईं वर्षों पूर्व अपनी फोटो छपवाईं थीं। एक मशहूर माँडलर के रूप में । किसी में वह मुस्करा रही थी । कहीं इठला रही थी, तो कहीँ अर्धनग्न दशा में सागर की लहरों से छेड़-छाड़ कर रही थी ।
"ये तो वही पुरानी पत्रिकाएँ हैं; जिनमें मेरी तस्वीरें छपी थीं । पर ये आपके पास कैसे आईं ? ” सुधा ने भेदभरी दृष्टि से पूछा ।
" आश्चर्य की क्या बात है ? आप माँडलर हैँ, और मेरे पास तो क्या ये पत्रिकाएं किसी के पास भी हो सकती हैं ।" माँझी ने कहा ।
“... ? “ इस पर सुधा निरुत्तर हो गई ।
" पर ये तो काफी पुरानी हैं । मेरे शुरू-शुरू के कैरिअर की । मैं तो इनके बारे में भूल भी चुकी थी । " सुधा ने आश्चर्य से माँझी की तरफ देखते हुए कहा ।
"हाँ , बात तो काफी पुरानी है, और बीती बातें भुलाने की आपकी आदत हो सकती है । पर कुछ लोग अतीत की इन्हीं गुमशुदा बातों को अपने दिल में बसाकर उन्हें सदा के लिए तरोताजा भी रखते हैं ।"

माँझी ने कहा तो सुधा का चेहरा पलभर में ही गम्भीर हो गया । उसने एक प्रश्नात्मक दृष्टि से माँझी को देखा, पर कुछ बोली नहीं । इसी बीच माँझी ने आगे कहा,

"मेरा मतलब आडवाणी भी आपकी इन्हीं तस्वीरों को देखकर प्रभावित हुए होंगे और जिसके फलस्वरूप उन्होंने आपको अपने संस्थान की विशिष्ट माँडलर चुन लिया । ”
पलभर में ही माँझी ने जैसे बात टाल दी, तो सुधा पुन: सामान्य हो गई ।
"ये लीजिए फॉर्म पूर्ण हो गया । अब क्या करना है मुझे ? " सुधा ने पूछा ।
" अब आप मेरे साथ दूसरे कमरे में आइए । " यह कहकर माँझी आगे बढ़ा तो सुधा भी उसके पीछे-पोछे चल दी ।
फिर वह जैसे ही अन्दर पहुँची तो अन्दर देखकर उसे लगा कि वह अचानक ही जैसे किसी रंगमहल में आ गई है । यह एक बड़ा-सा हॉल जैसा कमरा था, जिसमें … विभिन्न प्रकार की सफेद, लाल मूर्तियाँ अपने-अपने स्थान पर खड़ी मानो उसका स्वागत कर रही थीं । एक से बढ़कर एक कृति थी । अपने में बेमिसाल । नाचती... गाती, शर्माती- पनघट को जाती हुईं... और अपने प्रीतम की वापसी में आँखें बिछाए, उसके आने की बाट जोहती हुई । एक से बढ़कर एक ।
"ये सारी मूर्तियाँ आपने ही बनाईं हैं क्या ? " सुधा ने प्रभावित होकर पूछा ।
“जी नहीं ! इनमें से एक भी नहीं । " माँझी ने कहा ।
"फिर ये यहाँ कैसे आई हैं ?"
" यह कला मन्दिर है और ये समस्त बहुमूल्य मूर्तियाँ उसकी धरोहर हैं .। आप इनको देखिए, और इनकी विभिन्न मुद्राओं को 'कैच' करने की कोशिश कीजिए ताकि बाद में, मैं भी इन्हीं मुद्राओं में आपकी फ़ोटोज खींच सकूँ । "
"तो फिर आज आपने क्यों बुलाया है मुझे ? " सुधा ने पूछा ।
" मूर्ति कला के प्रारम्भिक अध्ययन के बारे में, और आपकी कुछेक फोटोज़ लेने के लिए । "
" और मूर्ति आप कहाँ बनाएँगे ? ” सुधा ने पूछा ।
"इरादा तो मेरा जयपुर में, मेरे अपने स्टूडियो में है । और वैसे यहाँ भी बना सकता हूँ । ” माँझी ने कहा तो सुधा बोली,

"एक बात मानेंगे आप मेरी ? "
“ क्या ?”
" यदि आप यह कार्य यहीँ, इसी शहर में, किसी भी स्थान में करें तो बड़ा अच्छा रहेगा । "
"वह क्यों ?"
" ताकि मैं भी देखती रहूँ.. .समय-असमय आपकी कला और पत्थर में अपने बदलते हुए रूप को।"
"चलिए आप कहती हैं तो यहीँ बना लेता हूँ । "
"सच ! "
"जीं हां, बिलकूल सच ! " माँझी ने आश्वासन दिया तो सुधा प्रसन्नता के कारण फूली नही समाई । बड़ी देर तक वह मुस्कराती ही रही । और माँझी भी काफी देर तक धीरे-धीरे मुस्कराते हुए उसे देखता रहा ।
" अच्छा, आप चलिए, मैँ आपकी कुछेक फोटोज़ भी ले लूँ । " माँझी ने कहा तो सुधा अपने को सामान्य करती हुईं बोली,

"चलिए लेकिन कहाँ ? ”
"कहीं अधिक दूर नहीं । बस इसी कमरे में । "
यह कहकर माँझी ने तस्वीरें लेने सें पूर्व कमरे की सारी बत्तियाँ जला दीं । उनके प्रकाश में कमरे की सारी मूर्तियों में जैसे जान-सी आ गई । एक साथ जैसे सभी मूर्तियाँ भी मुस्करा उठी। इस प्रकार मानो नृत्य के लिए तैयार हो गई हों । सफेद पत्थरों के सौन्दर्य में अपने यौवन को सँभालती-ढाँकती हुई ये मूर्तियाँ बिजली के दूधिया प्रकाश में जैसे सराबोर हो चुकी थीं ।
फिर माँझी ने उसे एक स्थान पर लाकर खड़ा किया । ठीक अन्य मूर्तियों के साथ में ही और मूर्ति के समान ही सुधा भी उसी के कहने के अनुसार वैसी ही मूर्ति की मुद्रा में- एक नृत्य करतीं हुईं नृत्यांगना के समान खड़ी हो गई । माँझी ने उसे इस मुद्रा मैं देखा, तो पलभर में ही, उसे देखता ही रह गया । सुधा का यौवन के भार से तराशे हुए बदन का अंग-अंग जैसे थिरकने के लिए आतुर हो रहा था और माँझी अभी तक उसे देख ही रहा था... अपलक... बहुत ख़ामोश-शून्य-सा ।
तब सहसा ही माँझी को ख़याल आया और वह सुधा के पास आकर बोला,

"मैं कैमरे के पास जाता हूँ और आपको कैमरे के लैंस में न देखकर मुझको देखना है- ठीक मेरी "आँखों में । "
इस पर सुधा उसकी आँखो में देखने लगी । साथ ही माँझी भी उसे एकटक देखने लगा- लगातार। जब कुछेक क्षण यूँही व्यतीत हो गए तो सुधा जैसे परेशान होते हुए बोली,

" यह आप क्या कर रहे हैं ? ”
" क्यों क्या हुआ ? ” माँझी सहसा चौंक गया ।
“ आप फ़ोटो खींच रहें हैं या कुछ और कर रहे हैं ? " सुधा ने विस्मय से कहा ।
"मैंने क्या किया ? " माँझी ने आश्चर्य से, जैसे भयभीत होते हुए कहा ।
"मुझे ऐसा लगा कि आप मेरी मुद्रा को नहीं बल्कि जैसे मुझे ही देख रहे हैं । "
"यह आपका भ्रम हो सकता है । खैर ! आप ऐसी ही बनी रहें । ” यह कहकर माँझी कैमरे के पास पहुँच गया और फ़ोटो खींच ली ।

इस प्रकार माँझी ने सुधा की अनेक मुद्राओं में, विभिन्न प्रकार की तस्वीरें खींच लीं । और इसके बाद जब सारा कार्य समाप्त हो गया तो माँझी ने कॉफी मँगाई, जिसके आने पर माँझी स्वयं ही कॉफी बनाने लगा तो सुधा ने उसके हाथ से केतली ओर चम्मच लेते हुए कहा,

"यह आप क्या कर रहे हैं ? ” '
“ क्यों ? “
"शायद आपको ज्ञात नहीं कि स्त्री के सामने यदि पुरुष इस प्रकार का कार्य करे तो उसका अपमान होता है । "

कहकर सुधा खुद ही कॉफी बनाने लगी, तभी उसने पूछा, " आप तो कॉफी पीते नहीं हैं, फिर क्या बनाऊँ ?"
" साधारण दूध मेँ केवल चीनी डाल दीजिए । ” माँझी ने कहा ।
" ...?"
इस पर सुधा ने उसे आश्चर्य से देखते हुए कहा, " आपके जीवन की सारी बातें ही बड़ी अजीब और संदिग्ध-सी रहती हैं । ”
"आपका मतलब ?"
" इस उम्र में इतने बड़े होकर, अभी तक आप बच्चों के समान दूध पीते हैं । "
"सफेद पत्थरों से मुहब्बत करनेवाले यदि दूध के स्थान पर काली कॉफी या चाय पीने लगेंगे तो अपने दिल को साफ-सुथरा कैसे रख पाएँगे ?"

“इसका मतलब तो यह हुआ कि कॉफी पीनेवाले लोगों का हदय भी काला होता है ।”

" यह तो मैं नहीं कह सकता हूँ- पर हाँ, उतना समझदार भी नहीं होता है कि किसी साफ-सुथरे दिल की स्वच्छता को महसूस भी कर सके । ”
“... ? ” तब सुधा पलभर को शान्त हो गई । फिर गम्भीर होकर माँझी को निहारने लगी । तब कुछेक क्षणों के पश्चात् वह माँझी से बोली ,

" आप इतनी गहरी-गहरी बातें मुझसे कहते हैं, इससे फायदा" ?"
“छुई-मुई की संवेदनशील पत्तियों को यदि कोई बार-बार छूता है तो दोष किसका ? यह कोई नहीं सोचता है कि एक बार हाँ के पश्चात् वे कितनी अधिक देर बाद फिर से सामान्य हो सकेंगी।" ॰
“ देखिए ! मैं इतना तो जानती हूँ कि आपकी सारे ज़माने से शिकायत है, पर आपकी शिकायत केवल मुझे देखकर आपके ओठों तक क्यों आ जाती है ? यह बात मै नहीं समझ पाती हूँ ।” सुधा ने कहा ।
इस पर माँझी ने आगे कहा,

" यह भी तो हो सकता है कि आपने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की हो ?"
" और यह नहीं हो सकता कि कभी आपने भी समझाने की आवश्यकता ही नहीं समझी हो !." सुधा ने तुरन्त ही कहा तो माँझी और भी अधिक गम्भीर हो गया । एक-दो पल को वह चुप ही रहा और ऊपर शून्य को निहारने लगा... फिर बोला,

"हाँ…, शायद इस बात का निर्णय मैं अभी तक नहीं कर पाया हूँ कि यात्री के पहुँचने से पहले ही यदि ट्रेन छुट जाए तो दोष किसको दिया जाए ? घड़ी की तीव्र चलती हुईं सूइयों को अथवा यात्री के सुस्तपन या उसकी लापरवाह जिन्दगी के उसूलों को ? ”
" किसी को भी देकर तसल्ली कर लीजिए, क्योंकि जो हानि यात्री की होनी चाहिए थी, वह तो हो ही चुकी है । सिवा इसके अन्य कोई चारा नहीँ है कि वह यात्री दूसरी ट्रेन आने की प्रतीक्षा करे और अपनी यात्रा को पूर्ण करे । "
इस पर माँझी पुन: खामोश होकर आस-पास की वस्तुओं को निहारने लगा । वह चुप हो गया तो सुधा बात बदलते हुए तनिक मुस्कराकर बोली,

" अच्छा छोड़िये अब इस बात को । अभी तो ट्रेन छूट ही गई है । जब पुन: कोई अन्य ट्रेन के आने का समय होगा तो प्लेटफॉर्म पर स्वत: ही चहल-पहल होने लगेगी । अब यह बताइए कि मुझे अब कब और किस समय और आना पडेगा ? "
“ आपको अब आने की आवश्यकता नहीं है । अब. आप तब ही आएँगी, जब मूर्ति पूर्ण हो जाएगी... और हाँ, यदि मैं आवश्यकता समझूँगा तो मध्य में कभी-कभी आपको बुला लिया करूँगा । "
"लेकिन क्या मैं यहाँ कभी-कभार आ सकती हूँ अपनी मूर्ति को बीच-बीच में देखने के लिए ? "
"हाँ, क्यों नहीं । जब आप चाहें । यह दर तो आपके लिए सदा से खुले हैं । ”
"वैसे मैं कब तक आशा रखूँ कि यह पूर्ण हो जाएगी ?" सुधा ने पूछा ।
"इसके लिए मैं कुछ भी नहीं कह सकता हूँ । ”
"वह क्यों ? काम आपका है । आप ही समाप्त करेंगे । कोई अनुमानिक तिथि तो बता ही सकते हैँ ?"
"अनुमान से क्या होता हैं ? वह ग़लत भी तो हो सकता है । ”
“तो ठीक है, लेकिन मैं चाहती हूँ कि यह कार्य हर कीमत पर मेरे विवाह से पहले ही पूर्ण हो जाएं "
"मैं भरपूर कोशिश करूंगा ।"
“और फिर भी यदि पूर्ण नहीं हुआ तो आपको वह सजा दूँगी कि जीवन-भर आप याद रखेंगे । " सुधा ने व्यग्य से कहा तो माँझी उत्सुक होकर बोला,

“ क्या पूछ सकता हूँ कि सजा कैसी होगी ?" '
'" क्यों नहीं ! आपका विवाह किसी ऐसी काली-कलूटी कुरूप अमावस्या जैसी लड़की से करां दूँगी कि समस्त जीवन-भर आप उसे पत्थरों के समान तराशते रहेंगे और वह अपना रंग और स्वरूप नहीं बदल सकेगी । "
" ? " इस पर माँझी हल्के-से मुस्करा दिया और हँसते हुए बोला,

“चलिए, इस बहाने कुछ तो देने का निर्णय किया आपने । वरना... ? "
"वरना क्या ? "
"मैं समझता था कि आपके यहाँ से खाली हाथ ही वापस जाना पड़ेगा। "
"कोई बात नहीं । यूनान का बादशाह सिकन्दर भी जब इस लोक से वापस गया था, तो उसके भी दोनों हाथ ख़ाली थे । " सुधा मुस्कराकर बोली ।
"बातें बनाना आप खूब जानती हैं । "
"बच्चों को बहलाने का कोई-न-कोई तरीका तो अपनाना ही पड़ता है । ”
"तो क्या मैं बच्चा हूँ ?"
" बच्चे तो नहीं हैं । पर हाँ , बच्चों के समान ज़रूरत से ज्यादा लालची ज़रूर दिखते हैँ । "
" पर नीयत तो ख़राब नहीं करता मैं । ”
"बस, इतनी ही अच्छाई है आपमें, इसलिए तो मैं कुछ भी नहीं कहती हूँ । ”
" अच्छा, एक बात बताइए आप । ”
" क्या ? " सुधा ने आश्चर्य से पूछा ।
"यदि कभी मैं बीमार पड़ गया और घायल अथवा बीमारी की दशा में आपकी क्लीनिक या अस्पताल में भर्ती हुआ, तो आप क्या करेंगी ?” माँझी ने पूछा ।
" देखिए, अगर मेरी वज़ह से बीमार पड़े तो ऐसा इन्जेक्शन दूँगी कि आँख खुलने पर न मुझे पहचान सकोगे और न ही अपने-आपको- और यदि किसी दूसरी वज़ह से बीमार हुए तो आपकी खूब सेवा करूँगी । देखभाल करूँगी और तब तक कहीं नहीं जाने दूँगी, जब तक कि आप बिलकुल ठीक नहीं हो जाओगे । "
“ यह विरोधाभास कैसे ? यानी न तो किसी को मरने दो और न ही जीने दो । "
“मरने तो आपको मैँ हरगिज़ नहीं दूँगी, और जीने का सलीका या तो आपको आता नहीं है, या आप सीखना नहीं चाहते हैं । "
"तो आप सिखा दीजिए न ।"
"मैं सागर को सिखा रही हूँ और आप तो जानते ही हैँ कि एक समय में एक ही कार्य करना ठीक होता है । पर, हाँ एक कार्य अवश्य ही कर सकती हूँ आपके लिए । "
“वह क्या ? "
" आपको जीना सिखाने के लिए प्रबन्ध कर सकती हूँ । "
"वह कैसे ?”'
"जयपुर जाकर । "
"तो जाइए न... ?"
" कहा न कि जाऊँगी अवश्य, पर विवाह के बाद- एक और सुधा (मूर्ति) के जन्म के पश्चात् । " सुधा ने कहा और खुद ही मुस्करा भी दी । माँझी इस पर कुछ भी नहीं बोला । वह निरुत्तर हो गया । बस ख़ामोश-सा- जैसे फिर शून्य में से कुछ पकड़ने की एक असफल चेष्टा करने लगा था । जिस प्रकार कि भागती हुई परछाइयों और बदलियाँ की छाँव में किसी झूठे जीवन की आस कर ली जाती है.

उसके पश्चात् औपचारिक नमस्ते इत्यादि कहकर सुधा घर वापस आ गई । ज्यादा थकी भी नहीं थी और अपने-आपको अत्यधिक तरोताजा भी महसूस कर रही थी । दिल में आज़ उसको अनेक खुशियों के फूल खिल उठे थे- उसके मॉडलिंग के कैरिअर की शुरूआत से लेकर आज के दिन तक का यह दिन उसके जीवन का विशेष महत्वपूर्ण दिन था । आज चूँकि उसकी मूर्ति बनाने का कार्य का शुभारम्भ हो चुका था । उसके दिल में जैसे सैकड़ों दीप जगमगा उठे थे । उसके जीवन की भरपूर खुशियों के, परन्तु साथ ही जैसे दिल के किसी एकान्त कोने में एक दीप ऐसा भी था जो अभी तक जैसे टिमटिमा ही रहा था । माँझी के साथ की गई वार्तालाप के कुछेक वाक्य उसको अब भी परेशान और विचलित कर जाते थे । माँझी के प्यासे ओठ ! प्यासी और तरसी-तरसी-सी आँखों में छिपी-छिपी उसके दिल की आरजुएँ अब भी उसके द्वार तक आकर टकराती थीं और समाप्त होती थीं । वह यह तथ्य तो समझ चुकी थी, परन्तु इसका क्या विकल्प होना चाहिए ? इस बात का निर्णय वह अभी तक नहीं कर पाईं थी । माँझी के दिल में उसकी अनकही प्यार की हसरतें किस प्रकार एक-एक करके अपना दम तोड़ रही थीं । यह वह अपनी आँखों से देखती थी । सोचती थी । विचलित होती थी , और फिर परेशान होती थी । बस, यहीँ तक जैसे उसकी लक्ष्मणरेखा थी, जिसको पार करना उसके अधिकारों की सीमाओँ से इतना अधिक दूर था कि जिसके विषय में वह अब सोच भी नहीँ सकती थी ।

माँझी को केसे समझाया जाए ? किस प्रकार उसके दिल को विश्वास दिलाया जाए कि जो कुछ वह सोचता है वह महज़ एक कल्पना ही है । ऐसा ख्वाब है कि, जिसकी हकीकत वह देख रहा है, परन्तु देखकर भी विश्वास नहीं कर पा रहा है । जिन भावनाओँ में बहककर वह अपने मन के संसार की दुनिया बसा लेना चाहता है, वे भावनाएँ हकीकत का एक जोरदार तमाचा भी सहन नहीं कर सकेंगी । एक पल भी स्थिर नहीं रह पाएँगी । बालू के ऊपर बनाए हुए आलीशान मकानों की रूप-रेखा, बरसाती पानी के एक बहाव को भी सहन नहीं कर सकेगी... ये समस्त सच्चाइयाँ उसे किस प्रकार समझाई जाएँ ? कैसे उसको समझा-बुझाकर उसे जीवन की सीधी-सीधी रेखाओं के पास लाया जाए ? सुधा कभी सोचती कि समय आने पर वह सब-कुछ सीख जाएगा । सभी कुछ बर्दाश्त कर लेगा । सहन तो करना ही पडेगा, परन्तु फिर यह सोचकर कि जब तक समय आएगा तब तक कहीं वह प्रतिफल टूट-टूटकर बिखर न जाए । अभी तो वह स्थिर है, लेकिन उसके विवाह के पश्चात् कहीं वह बिखरकर विलीन ही न हो जाए । यदि ऐसा हुआ तो क्या वह अपने-आपको माफ़ कर सकेगी ? अपने उस दिल के दर्द को समझा-बुझा सकेगी, जो एक अन्य दिल की तकलीफों को जानते हुए भी, उनका कोई इलाज नहीं कर सकी है?

दिन इसी प्रकार सरक रहे थे..
सुधा की परीक्षाएँ आरम्भ हो चुकी थीं । माँझी के पिता का स्थानान्तरण उत्तर प्रदेश के कुमाऊँ क्षेत्र की एक छोटी-सी तहसील में कर दिया गया था । इसलिए वह भी स्थानान्तरित होकर चले गए थे । केवल एक माँझी ही था जिसको आडवाणी ने अपने कार्य के पूर्ण होने तक की स्थिति में कला मन्दिर के पास ही एक स्थान पर उसके रहने की व्यवस्था करवा दी थी । इसी बीच सुधा भी माँझी से कईं एक बार मिल चुकी थी । आडवाणी के निर्देशानुसार वह उसको प्राय: घुमाने ले जाती । उससे अच्छी-अच्छी, मीठी बातें करती । उसका जी बहलाती, और प्राय: संध्या ढले किसी होटल या रेस्तरां में बैठकर खाना खाती या फिर कॉकटेल या कॉफी इत्यादि पीती थी। यह सब वह इस कारण करती थी ताकि वह अपने को अकेला महसूस न कर सके और किसी भी प्रकार मूर्ति बनने का कार्य भी पूर्ण हो जाए । इस दौरान वह दो-एक बार कला मन्दिर जाकर देख भी आई थी । माँझी ने यद्यपि मूर्ति तो अभी नहीं बनाई थी, परन्तु उसको बनाने का बहुत कुछ सामान आदि अवश्य ही एकत्रित करके रख लिया था । लेकिन जब परीक्षाएँ आरम्भ हो गईं तो वह उसके पश्चात् कला मन्दिर जा नहीं सकी थी, और ना ही माँझी से मिल सकी थी । फिर भी वह फोन पर माँझी से प्राय: ही बात कर लेती थी और माँझी भी उसे भरपूर आश्वासन दे देता था कि जितनी जल्दी हो सकेगा वह यह कार्य पूर्ण कर देना चाहता है। लेकिन, फिर भी उसने माँझी में एक परिवर्तन अवश्य ही देखा था । वह यह था कि जबसे उसने आडवाणी के कहने के अनुसार माँझी को यह जताने की चेष्टा की थी कि वह उसकी हमदर्द है, और-उसका ख़याल रखना चाहती है, तब से माँझी जैसे उसके और भी क़रीब आना चाहता है । माँझी ने उससे कितनी ही बार जयपुर का उसका अपना स्टूडियो देखने की अपनी इच्छा भी जाहिर की थी, परन्तु वहाँ का कार्यक्रम वह विवाह के पश्चात् कहकर टाल गई थी ।
इन दिनों उसकी परीक्षाओं में कोई भी विघ्न न हो इसलिए आडवाणी भी उसको कोई फोन वगैरह नहीं करते थे । सागर के द्वारा उसे बार-बार फोन करने के लिए तो वह यूँ भी उसे मना कर चुकी थी । फिर सागर स्वयं भी परीक्षाएँ दे रहा था, इसलिए वह भी प्राय: फोन बहुत कम ही करता था ।

फिर अपनी परीक्षा के अन्तिम पर्चे के दिन सुधा सुबह ही से काफी प्रसन्न थी । उसकी प्रसन्नता का कारण तो यह भी था कि परीक्षाएँ समाप्त हो गईं थीं । सिर पर से एक बड़ा बोझ उतर चुका था और करीब-करीब सभी पर्चे अच्छे हुए थे । दूसरा कारण उसे अपनी ही शक्ल की बनी हुई मूर्ति देखने की एक तीव्र लालसा भी थी । वह भी इसलिए क्योंकि आडवाणी ने माँझी की कलाकारी के जो पुल बना कर उसे दिखाए थे, उसके कारण भी वह और अधिक सब्र नहीं करना चाहती थी । इसलिए उसने पहले ही से सोच रखा था कि पर्चा समाप्त होते ही घर आकर वह सबसे पहले मूर्ति देखने अवश्य ही जाएगी और अपने उस खूबसूरत चेहरे के साथ-साथ सम्पूर्ण बदन की सुन्दरता को भी देखेगी जो सफेद संगमरमर के पत्थरों में सजी हुई कितनी जीवन्त लगती है ।
यही सब सोचकर और पहले ही से कार्यक्रम की रूपरेखा बनाकर उसने सुबह कॉलेज जाने से पूर्व अपने-आपको विशेष रूप से सँवारा भी था । मौसम के रंगों के अनुसार कपड़े पहनने का शौक़ उसका यूँ भी बहुत पुराना था और आजकल बरसात का मौसम नहीं था, परन्तु फिर भी प्राय: ही पानी बरस जाता था । इसलिए उसने भी काली घनघोर-घटाओं से सजी-धजी साड़ी पहनी थी । लगता था कि जैसे सारे बादल इशारा पाते ही रो देना चाहते हों । काली मटमैली घटाओं जैसी साड़ी में उसका चेहरा यूँ दमक जाता था जैसे कि बदलियों के पीछे से कभी-कभार चन्द्रमा छिपकर चला जाता हो ।

दिन के ग्यारह बजे उसका पर्चा समाप्त हुआ और वह बारह बजे तक घर आ गई थी । फिर घर में जैसे ही घुसी, दुलारे ने उसको बता दिया कि आडवाणी कई-कईं बार उसे फोन कर चुके थे और उन्होंने भी उसको फोन करने को कहा है । तब कला मन्दिर जाने से पूर्व उसने आडवाणी से बात कर लेना उचित समझा । यही सब सोचकर उसने नम्बर डायल किया, तो लगा कि आडवाणी जैसे पहले ही से उसके फोन की प्रतीक्षा कर रहे थे ।
"हलो !” मैँ सुधा बोल रही हूँ ।”
"हाँ, मैं आडवाणी... "
"कहिए, कैसे टेलीफोन किया था ? " सुधा ने संदिग्ध भाव से पूछा ।
“ तुम्हें कुछ ख़बर आदि है ? " आडवाणी ने कहा ।
"कैसी ख़बर ?" सुधा का माथा एक अनजाने भय से स्वत: ही ठनक गया ।
“ अपने तुम्हारे कार्य की... ?"
“वह माँझी ने मुझे आश्वासन दे दिया है कि जितना शीघ्र हो सकेगा वह यह कार्य समाप्त कर देगा और मेरा अनुमान है कि अब तक तो मूर्ति काफी कुछ पूर्ण भी हो चुकी होगी । "
“ये सब बकवास है । न तो उसे इस काम में रुचि ही है, और न ही अब वह शायद यह कार्य पूर्ण करेगा । " आडवाणी का स्वर पहले से भी अधिक तीव्र था ।
"नहीँ, ऐसा नहीं हो सकता है । " सुधा एक संशय से बोली ।
"ऐसा ही हो रहा हैं । मैं तो उससे अनुबन्ध समाप्त कर रहा हूँ । किसी अन्य को अनुबन्धित करूँगा । मैं तो उससे आज ही बात करना चाह रहा था परन्तु फिर सोचा कि पहले तुमसे भी राय ले लूँ ।"
"समझ में नहीं आता है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है ? मैँ इधर पिछले तीन हफ्तों से परीक्षाओं के कारण उससे मिल नहीं सकी थी परन्तु फोन पर अवश्य ही बातें हो गई थीं । तब भी तो वह कुछ और ही कह रहा था । " सुधा को जैसे आडवाणी के कथन पर विश्वास नहीं हो पा रहा था।
“ तुमने कभी सोचा कि वह यह सब कुछ क्यों कर रहा है ? क्यों इस कार्य को लगातार टाल रहा है ? " आडवाणी ने पूछा ।
"शायद उसका स्वभाव हो सकता है । ”
"स्वभाव नहीं, उसका स्वार्थ है । "
“ कैसा स्वार्थ ? ” सुधा और भी अधिक उत्सुक हो गई ।
"सुनोगी तो चौंक अवश्य ही जाओगी, परन्तु यह सत्य है । ”
" कैसा सत्य ? " सुधा ने तुरन्त ही पूछा ।
"उसको मालूम है कि तुम अगले माह अपना विवाह करने जा रही हो । इसी कारण वह इस कार्य में देर कर रहा है । वह सोचता है कि जब तक यह कार्य पूरा नहीं हो जाता है, तब तक तुम अपना विवाह भी नहीं करोगी । इसलिए वह जान-बूझकर देर कर रहा है । " आडवाणी ने जैसे दृढ़ता से कहा ।
"क्या आपने उससे कोई बात की थी और अगर नहीं तो फिर आपको यह सब कैसे ज्ञात हुआ ? और फिर इस कार्य में विलम्ब करने से मेरे विवाह से उसका क्या सम्बन्ध हो सकता है ?"
“ वह इसलिए क्योंकि वह तुमसे विवाह करना चाहता है । वह तुमसे प्यार करता है ।
“.... ?”
सुधा की आँखों के सामनें अचानक ही जल-प्रपात-सा आ गया । कानों में जैसे किसी ने गर्म सलाखों से छेद कर दिए थे । वह इन सब बातों को समझ तो रही थी और उसे माँझी के कार्य-कलापों पर सन्देह भी हो रहा था, लेकिन इतने कड़वे सच को किसी दिन अपने कानों से भी सुन लेगी, ऐसा उसने कभी भी नहीं सोचा था । माँझी उसे पसन्द करता है । उसे चाहता है । मन-ही-मन वह उसकी आरती भी उतारता रहता है । यह सब तो वह पहले भी समझ और देख भी रही थी, इसलिए उसने कभी भी उसको यह अवसर नहीं दिया था कि वह अपने दिल की बात ओठों तक ले आए... और इसी कारण वह जब भी आगे बढ़ने की चेष्टा करता था, तो वह उसको किसी-न-किसी प्रकार टाल भी देती थी, परन्तु आज़ ? आज़ यह सब सुनकर उसे रुष्ट होने में कोई देर नहीं लगी । माँझी पर उसे क्रोध भी आया, परन्तु इससे बढ़कर उसे उसके प्रति एक ग्लानि-सी हो गईं- यही सोचकर कि कैसा युवक है ? जितना सीधा, उतना ही स्वार्थी और मूर्ख भी । सबकुछ जानते, देखते और समझते हुए भी उस बात की आस लगाए हुए है, जो अब कभी भी नहीं हो सकती है ।
" क्या सोचने लगीं ? " सहसा ही आडवाणी ने उसे सचेत किया, तो वह पुन: चैतन्य हो गई । क्या सोचूँगी मैँ ? मेरा तो मस्तिष्क ही दुखने लगा है । " सुधा जैसे परेशान होकर बोली ।
" संयम से काम लो । घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है । तुम ऐसा करो कि एक बार उससे और मिल लो । उसे कतई जाहिर मत करना कि तुम्हें यह सब मालूम है । एक अवसर और देकर देख लो । हो सकता है कि तुम्हारे आग्रह पर उसके दिमाग़ में बात आ जाए । " आडवाणी ने कहा तो सुधा ने उत्तर दिया,

" जब अब तक उसको समझ में बात नहीं आई है, तो अब क्या आएगी ? ”
" फिर भी कोशिश करके तो देख लो लेकिन अपने पर नियंत्रण रखना । अगर मानता है तो ठीक है, वरना फिर मुझे तो कोई दूसरा प्रबन्ध करना ही है । "
"ठीक है जैसा आप कहते हैं ।"
यह कहकर सुधा ने बात समाप्त कर दी और पुन: माँझी के प्रति सोचने लगी, ' अजीब युवक है यह ? बिलकुल पागल हो गया है क्या ? मैं ज़रा-सा ख़याल क्या रखने लगी, उससे हँसकर क्या बोल लेती हूँ कि अब कुछ और ही समझने लगा है । मुझे भी बुद्धू समझता है क्या ? खुद तो गधा है ही... । ठीक है, आने तो बच्चू को । ऐसा सबक दूँगी कि सारे जीवनभर याद रखेगा… ।' यही कुछ सोचते हुए उसने माँझी के घर का नम्बर मिलाया । संयोग की बात थी कि वह उसे फोन पर मिल भी गया;
"हलो कौन ?” उधर से माँझी ने पूछा ।
“ ..;? " सुधा के मन मेँ आया कि कह दूँ, " तुम्हारी मुसीबत 'बोल रही हूँ । ' तभी उधर से माँझी ने पुन: पूछा,

" हलो.॰.हलो...कौन ?"
"मैं सुधा बोलती हूँ ।"
" ओह ! सुधा जी आप ! मैं तो समझा था कि... खैर ! कहिए कैसे याद किया ? ”
" आप क्या समझे थे ?"
"मैं समझा था कि कुमाऊँ' से मम्मी-डैडी, किसी का फोन आया है । " माँझी ने कहा ।
"कैसे हैं आपके मिजाज़ ? " सुधा ने कहा ।
"बस जीवित हूँ मैँ ।"
"जिन्दा तो मैँ भी हूँ ।"
" यह आप क्या कह रही हैं ? ” माँझी ने चौंककर पूछा ।
" और क्या कहूँ ? आप तो कभी फोन करते ही नहीं हैं । सोचा कि चलो मैं ही याद कर लूँ । "
"तो फरमाइए ।

"व्यस्त तो नहीं हैं आप ?"

"मैं क्या व्यस्त हो सकता हूँ ? कमरे से मक्रील और मक्रील से फिर कमरा । बस यही दिनचर्या है मेरी । ”

"दिनचर्या में परिवर्तन भी तो कर सकते हैं । "

“परिवर्तन के लिए किसी का साथ होना बहुत आवश्यक होता है । ”

" इसीलिए तो मैंने आपको फोन किया था । चलो, आज मक्रील पर मिलते हैं हम दोनों । "

“ क्यों, कोई विशेष बात है ?" माँझी ने उत्सुक होकर पूछा । "

" विशेष नहीं होती तो मैं क्यों कहती ? बहुत सारी बातें करनी हैं आज आपसे । ”

"ऐसी क्या बात है ?" माँझी की उत्सुकता और भी बढ़ गई ।

"वहाँ आओगे, तभी तो कुछ कहूँगी... ” सुधा ने कहा ।

" लेकिन आज तो मौसम बहुत ख़राब है । सुबह से बारिश हो रही है । क्या, कहीं और नहीं मिल सकते हैं ?" माँझी ने पूछा ।

“जो बात मैं कहना चाहती हूँ, वह मक्रील पर ही ठीक रहेगी । फिर मक्रील आपको भी तो बहुत प्यारी लगती है । "

"इसमें कोई सन्देह नहीं है ।"

"तो फिर आएँगे आप ?"

" क्यों नहीं ? जीवन में पहली बार आपने मुझसे किसी बात के लिए कहा है । कैसे मना कर सकता हूँ ?”

"तो ठीक है, अभी एक बजने को है । शाम पाँच बजे मिलते हैँ । मक्रील पर । "

" ओ.के . । " बात समाप्त हो गई तो सुधा ने फोन रख दिया । साथ ही वह पुन: अपने विचारों में लीन हो गई ।"

आज सुबह से मौसम वैसे भी ख़राब था । एक तो जाड़े के दिन । ऊपर से बरसात के बिगड़ते मिजाज । कुल मिलाकर दिन में भी वातावरण को एक ठण्डक दे रखी थी । कभी बरसात हो जाती थी, तो कभी कुछेक क्षणों को थम भी जाती थी । सुधा जब मक्रील पर पहुँची तो शाम के ठीक पाँच ही बज रहे थे । हल्की-हल्की बारिश हो रही थी । रिमझिम-सी वर्षा की महीन-महीन बूँदे हर किसी के सम्पूर्ण चेहरे से लेकर पूरे शरीर के ऊपर एक महीन जाली-सी बुन रही थीं । पानी की बूँदों के ठहराव के कारण वृक्षों की पत्तियाँ भी धीरे-धीरे जैसे सिसक-सिसककर आँसू बहा रही थीं । सारे वृक्ष, सारी आसपास की वनस्पति ऊपर से नीचे तक भीग चुकी थी । मक्रील के जल में आज ठहराव था । लहरें शान्त थीं, परन्तु पिछले दिनों से लगातार होती वर्षा के कारण उसके पानी का स्तर बढ़ गया था । साथ ही पानी में एक गँदलापन भी आ चुका था ।
सुधा ने जैसे ही अपनी कार मक्रील के बड़े-से पुल के ऊपर रोकी, उसे दूर से ही बारिश में भीगता हुआ माँझी दिख गया । मगर आज़ वह चुपचाप और मायूस न था । खामोश भी नहीं । धीरे-धीरे एक-एक करके मक्रील के जल की लहरों में वह पत्थर फेंक रहा था । देखने से ही ज्ञात होता था कि जैसे कुछ पाने की पूर्व आशा में उसके सारे शरीर में जैसे हलचल आ गई थी ।
फिर सुधा ने अपनी कार एक किनारे लगाईं और बाहर निकलकर वह नदी के किनारे की ओर बढ़ गई । पैदल ही । बारिश की परवाह किए बिना माँझी ने उसे अपनी ओर आते हुए देखा तो वह भी दूसरी ओर से उसकी तरफ़ बढ़ने लगा ।

फिर जैसे ही दोनों एक दूसरे के आमने-सामने आए तो स्वत: ही थम गए । सुधा ने माँझी को एक पल निहारा- गौर से । उसके चेहरे को पढ़ना चाहा । वह शायद काफी देर से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था । उसके चेहरे पर टिकी हुईं वर्षा की बूँदें । भीगे-चिपके हुए बाल, और भीगे वस्त्र स्वत: इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह यहाँ काफी देर पहले ही आ चुका था । माँझी अभी भी सुधा को देख रहा था । चुपचाप । खामोश । बहुत गौर से और शायद दिल में छिपी हुई हसरतों का एक भण्डार लिए ।
" क्या देख रहे हो ? " सहसा ही सुधा ने आस-पास के मध्य आईं हुईं खामोशी को तोड़ा ।
"देख नहीं, आश्चर्य कर रहा हूँ । " माँझी ने कहा ।
"किस बात का ?"
" रात्रि में परिवर्तित होती संध्या का प्रत्येक पल । यह नदी का किनारा । यात्रियों के आवागमन से तन्हा होती हुई बारिश में भीगती हुई यह वीरान सड़क । चारों तरफ़ बढ़ता हुई एक संदिग्ध खामोशी... और इस खामोशी के साये में हम दोनों- अकेले- पर कुछ-कुछ चिन्तित-से, परेशान । ऐसी कौन-सी विशेष बात है, जिसे कहने के लिए आपने मुझे यहाँ बुलाया है ?” माँझी ने गम्भीर, पर दिल में छिपी एक उत्सुकता से पूछा ।
" हां, जो बात मैं कहना चाहती हूँ उसको कहने के लिए इस जगह से बेहतर और कोई जगह नहीं हो सकती है ।"
" अच्छा ! कहो, क्या कहना चाहती हो ? "
" क्या आपको मालूम है कि मेरी मँगनी हो चुकी है ?"
"हाँ ! “
" और क्या आपको यह भी मालूम है कि अगले माह की उन्तीस तारीख़ को मेरा विवाह होना भी निश्चित हो चुका है ?"
"हाँ, यह भी जानता हूँ ।”
"तो फिर आप जान-बूझकर 'स्टेच्यू ' बनाने के कार्य में देर क्यों कर रहे हैं ? "
“... ?”
सुधा के इस कथन पर माँझी अचानक ही चौंक पड़ा । इस तरह कि जैसे उसके मन का चोर सुधा ने रँगे हाथों पकड़ लिया हो । पलभर को वह कुछ कह भी नहीं सका और ना ही शायद कुछ सोच भी सका ।
उसको चुप देखकर सुधा ने बात पूरी की । वह बोली,

" क्या आप यह नहीं जानते हैं कि विवाह के पश्चात् किसी भी पति को अपनी नई-नवेली दुल्हन का किसी भी गैर पुरुष के सामने यूँ इस तरह नुमाइश लगाना गवारा न होगा । 'स्टेच्यू' बनाने का अनुबन्ध छ: माह का था और आज़ पूरे सात माह से अधिक हो रहे हैं । मुझे तो लगता है कि 'स्टेच्यू जमाने की नजरों के सामने नहीं, पर कहीं और ही बन रहा है । "
“सुधा ! " माँझी आश्चर्य से बोल पड़ा ।
"सुधा॰.. " - सुधा ने उसके ही शब्द दोहराए फिर आगे बोली,

" यह अधिकार आपको किसने दिया कि 'सुधा' और 'जी' के बीच का फासला भी आप स्वयं ही समाप्त कर लें ? क्या ऐसा करते समय आपको जरा-भी हिचक महसूस नहीं हुई ? कोई भी रास्ता अपने और मेरे मध्य बनाने से पूर्व क्या आपको हम दोनों और सागर के दरम्यान बने हुए त्रिकोण की कोई भी रेखाएँ नज़र नहीं आईं ?”
"सुधा जी ! जब आपने इतनी सारी बातें एक साथ कह डाली हैं, तो आपको इन समस्त बातों की वज़ह भी मालूम होगी, और यदि नहीं मालूम है' तो मैं बताता हूँ ... ”
“ मुझसे कहने की कोई आवश्यकता नहीं है । सिर्फ इतना याद रखिए कि चन्देक मुलाकातों में दो जन एक-दूसरे के दिल की धड़कनें बन जाएँ, ऐसे नसीबवाले कम नही, शायद अपवाद ही हुआ करते हैं ।”
" क्या यही सारी कड़वी-कसैली बातें कहने के लिए आपने मुझे इतने अपनत्व से यहाँ बुलाया था? मुझे पहले ही सन्देह था कि एक दिन आपको यह सब कहने का अवसर मिल जाएगा । इसलिए जब मुझे ज्ञात हुआ था कि मूर्ति आपकी बनानी है तो मैं अस्वीकार कर रहा था, क्योंकि तब मुझे लगा था कि मेरी मृत होती हुई तमन्माओँ को जैसे किसी ने अपनी प्यार-भरी जिन्दगी की एक महीन ज्योति दे दी हो । अपनी उम्मीद को पुन: पनपते देख तब मैं सोचने लगा था कि शायद ऐसा हो सकता है ? शायद ऐसा होने लगा है ? शायद यही प्रतिफल है मेरी उन तमाम इबादतों का, जिनकी अपेक्षा मैं मन-ही-मन आपसे करता रहा था... । "
कहते-कहते माँझी का स्वर बोझिल होने लगा तो सुधा ने बात बीच में ही काटते हुए कहा, “इसका मतलब है कि आपको आस है अपने प्रतिफल की । उन कार्यों के सिलसिले में जिन्हें आप बडी सहजता से मानवता का कर्तव्य बताकर मुझे बहलाते आए हैँ ? ”
सुधा का स्वर फिर तेज़ हुआ तो माँझी पुन: अनुत्तरित हो गया । तब सुधा ने आगे कहा,

" यदि आप मेरी जीवन रक्षा करने का सिला या प्रतिफल ही चाहते हैं, तो मैंने भी आपकी इसी कारण यहाँ मक्रील नदी के किनारे बुलाया भी है । याद है आपको, अब से कई माह पूर्व आपने इसी मक्रील के गर्भ से मुझे निकालकर एक नया जीवनदान दिया था । आपको अपने इस उपकार के बदले में क्या चाहिए ? मैं ? मैं तो नहीं मिल सकती आपको । पर हाँ, अगर आप मुझे एक नई जिन्दगी देने के पश्चात् अपनी कोई धरोहर समझने लगे हैं तो दोबारा फेंक दीजिए मुझे इसी मक्रील की लहरों के बीच में, जहाँ से निकालकर कभी आपने मुझे बचाया था । कम-से-कम आपका सिला तो आपको मिल ही जाएगा । मुझे नहीं चाहिए ऐसा उधार का जीवन, जिसके ऋण का तकाजा मुझसे सारी जिन्दगी-भर होता रहे, और मैं एक पाई भी अदा न कर सकूँ । ”
"सुधा-जी ! खामोश हो जाइए प्लीज़ ! " माँझी से नहीं सुना गया तो वह एकाएक चीख-सा पड़ा। उसे लगा कि जैसे किसी ने उसके कानों में गर्म-गर्म लावा भर दिया हो । दिल के घावों पर गर्म-गर्म अँगारे रख दिए हों । सुधा ने अपने जोश में आकर जैसे उसके मुख पर तड़ातड़ तमाचे जड़ दिए थे । बडी देर तक दोनों के मध्य खामोशी एक तीसरे वजूद के समान अपना स्थान बनाए रही । दोनों चुपचाप मक्रील नदी के जल की धाराओं को ताकते रहे । बिना किसी उद्देश्य के ... निरर्थक ही । दोषियों समान । एक-दूसरे के दोषों से परिचित होते हुए भी मौन रहने के अतिरिक्त उनके पास कोई दूसरा विकल्प था भी नहीं । .
काफी देर के बाद सुधा ने ही मौन को तोड़ा । माँझी की और सहानुभूति और दयाभरी दृष्टि से देखते हुए वह शान्त स्वर में बोली,

"मेरी बातें आपको बुरी अवश्य लगी हैं, मगर वे सत्य हैं । मैं यह भी जानती हूँ कि आप सागर का स्थान लेने का स्वप्न देखने लगे हैँ, पर मैं उसका यह स्थान आपको कभी भी नहीं दे सकती हूँ । मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ, इसलिए आपको आदेश नहीं दे रही हूँ । केवल विनती कर रही हूँ कि 'स्टेच्यू ' बनाने का कार्य जितनी भी जल्दी हो सके समाप्त कर दीजिए, और यहाँ से चले जाइए... इस उम्मीद पर कि फिर कभी आप मेरे व्यक्तिगत जीवन में, मेरी भावनाओं के साथ छेड़छाड़ नहीं करेंगे । शायद आपको ज्ञात नहीं है कि अब तो सागर भी मुझको सन्देह की नज़रों से देखने लगा है । ”
" ...? ” इस पर माँझी ने उसे निहारा । अपनी मायूस और थकी-थकी, उदास दृष्टि से । फिर अपने बोझिल स्वर में बोला,

"शायद आप ठीक कहती हैं ? कितना बेवकूफ़ है वह इन्सान जो सदा उस वस्तु को पसन्द करता है जो बाजार में पहले से ही बिक चुकी होती है । जुबान पर आने से पहले ही दबाई गई मेरी भावनाओँ ने यदि आपको कोई ठेस या आघात पहुँचाया है तो मैं कोशिश करूँगा कि उसकी स्मृति का कोई धूमिल प्रतिबिम्ब भी आपके मानस-पटल पर बाकी न रहे । आज के बाद भूल जाइए कि किसी 'माँझी' ने अपनी अकेली, आवारा और खाली नाव में आपको शरण देने की कोई आरजू भी की थी या कोई भटका हुआ पथिक आपके खुशियों भरे 'सागर ' में चन्द लम्हों के लिए शरणागत भी हुआ था... "
“... ? "

इतना सब-कुछ कहकर माँझी उसके सामने से चला भी गया था । अपने दिल पर एक पहाड़ समान बोझ रखे हुए । सदा के लिए । बहुत उदास । बारिश के थपेड़ों में भीगता हुआ । अपनी बे-दर्दी से कुचली हुई लालसाओँ की गठरी समेत । वह उसकी आँखों से अदृश्य भी हो गया था और वह पत्थर की मूर्ति बनी हुई उसको केवल देखती रह गई थी । अपलक... मौन…सी... ।
...शायद यहीँ तक उसको माँझी के साथ आना भी था । यहीँ तक उसकी यह आखिरी भेंट थी । यही सब सोचकर तब उसने अपने-आपको समझाना चाहा था । यह जानते हुए भी कि आखिरी भेंट में उसने माँझी को जो कुछ भी दिया था, वह उसके लिए उसकी चिता पर रखी हुईं मृत कामनाओं की अर्थी के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था ।
माँझी उसके जीवन से हमेशा के लिए चला गया तो मूर्ति की कहानी अपने-आप ही समाप्त हो गई थी । हालाँकि, उसके जाने से सुधा के जीवन में एक कसैलापन अवश्य ही भर गया था । एक हमेशा की न भूलनेवाली घटना से उसका सम्बन्ध अवश्य जुड़ गया था, परन्तु फिर भी उसने अपने-आपको सामान्य कर लिया था और अपने भविष्य की खुशियों के फूल चुनने और सँवारने में अपने-आपको व्यस्त कर लिया । वह अपने विवाह की तैयारियों में लग गई । सागर को इस सम्बन्ध में उसने कुछ भी नहीं बताया था सिवा इसके कि माँझी ने ही अनुबन्ध समाप्त कर लिया है और उसके पास समय नहीं है, इस कार्य को करने के लिए-ऐसा कहकर उसने बात समाप्त कर… ली थी ।

सुधा ने सोचा था कि माँझी का जिक्र अब सदा के लिए समाप्त हो गया है, पर ऐसा नहीं हुआ था । ठीक विवाह के दिन सारे कार्यक्रमों से निवृत्त होकर वह और सागर जब विवाह में दिए गए उपहारों को खोल रहे थे, तभी एक धमाका-सा उसकी आँखों के सामने हो गया था । उपहारों के मध्य में एक साधारण-सा लिफाफा था, जिसके ऊपर देने या भेजनेवाले का कोई भी नाम व पता नहीं था । सुधा ने वह लिफाफा खोलकर देखा- उसके अन्दर एक पत्र था । जब उसने पढ़ा तो उसे लगा कि माँझी उसके जीवन से दूर नहीं गया है, बल्कि वह खुद जैसे उससे न चाहते हुए भी दूर भागने की एक असफल चेष्टा कर रही है । माँझी ने उसे एक पत्र लिखा था, जो शायद उसका प्रथम और अन्तिम पत्र था । सुधा ने उसको पढ़ना आरम्भ किया । उसमें लिखा था,
" सुधाजी ,
चाहता तो ये था कि जो कुछ भी मैं आपसे कहने जा रहा हूँ वह आपको नहीं बताया जाए, पर अब स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि इतने बड़े भेद का बोझ मैँ कब तक उठा पाता ? शायद अब बिलकुल भी नहीं, क्योंकि मानव सबकुछ बर्दाश्त कर सकता है, परन्तु अपने प्यार की दृष्टि में तुच्छ होना उसे एक पल को भी गवारा नहीं होता है । मैंने तो सोचा था कि अपनी जिन्दगी के इतने बड़े और महत्त्वपूर्ण भेद को मैं जीवन के अन्तिम क्षणों तक अपने पास तक ही सीमित रखता, क्योंकि इसको आप तक पहुँचाने का अधिकार तो मैँ आपको पहली-पहली बार देखने से पूर्व ही खो चुका था । अब इसको मैं अपने भाग्य की विडम्बना ही कहूँगा कि जिसकी मैंने लालसा की, जिसको अपने जीवन से बढ़कर चाहा और जिसको शायद चुपके-चुपके किस्मत की लकीरों से चुराने का एक पाप भी किया । वह मेरे माँगने और हाथ फैलाने से पूर्व ही किसी और को मिल चुकी थी । शायद वह उसको मिली भी है, जिसकी वह थी भी । मैं तो बिना मतलब ही आप पर अपना अधिकार समझ रहा था । यह जानते हुए भी कि आप पर तो उसी का हक़ है, जिसको कि आप चाहें- प्यार करें ।
यह हरेक के हाथ में सज़नेवाली किस्मत की रेखाओं का फल होता है कि तपस्या करने पर उसकी देवी वरदान देती है, तो किसी को मात्र दर्शन देकर लुप्त भी हो जाती है । भीख माँगनेवाले की झोली में छेद किए जाते हैं, या चार पैसे डालकर उसे सन्तुष्ट कर दिया जाता है। उजड़े हुए बाग के माली के रुदन को सुनकर प्रकृति फूलों की बहार दे, अथवा पत्थरों की वर्षा कर दे । फिर भी सब्र तो करना ही पड़ता है । बिना क्षोभ और शिकायत किए बगैर, क्योंकि यही प्रकृति का नियम है और विधाता का भी । मनुष्य तो केवल कर्म ही करता है । उसके किए हुए कार्यों का निर्णय तो किसी अन्य के हाथ में ही है । मैं भी अपने-आपको सन्तुष्ट करने की चेष्टा करूँगा । यही सोचकर कि मेरी तपस्या के बावजूद मेरी देवी मात्र दर्शन देकर लुप्त भी हो गई है तो क्या हुआ ? तपस्या भंग तो नहीं हो जाएगी । वरदान की लालसा मर तो नहीं जाएगी। मेरी झोली में देनेवाले ने यद्यपि छेद कर दिए हैं, तो आगे से अपने दामन का दायरा इतना सीमित रखूँगा कि कोई भी ऐसी वस्तु न माँगूँ जो उन छेदों से बाहर भी निकल जाए । ।
मेरे दिल की तमन्माओँ के प्रतिफल में नियति ने फूलों के स्थान पर काँटे और पत्थरों के नजराने भेंट में दिए हैं तो यही सोचकर अपने-आपको तसल्ली दे रहा हूँ कि पुष्पों की तरह काँटों को सुगन्ध के खो जाने और पत्थरों को सड़ जाने का भय तो नहीं होता । आपने तो शायद कभी इस बात पर इतनी गहराई से विचार भी नहीं किया होगा कि ऐसी वह कौन-सी बात थी कि जिसके फलस्वरूप मैं अस्पताल में अपनी टाँग टूटने के समय आपको पहली ही भेंट में देखकर हैरान हो गया था? ऐसा क्या हुआ था कि आडवाणी के सामने मूर्ति बनाने की स्वीकृति देकर भी अन्त में आपको देखने के पश्चात् अस्वीकार कर दिया था ? सांगर से आपका जन्म-जन्म का रिश्ता जुड़ जाने के उपरान्त भी मैं क्यों सदैव आपके आस-पास मँडराता रहा ? क्यों बार-बार अपने जीवन की परवाह किए बगैर केवल आपके सुरक्षित जीवन की कामनाएँ करता रहा ? आपके द्वारा जिन्दगी की तमाम अच्छी-बुरी बातों का विष उगलने के पश्चात् भी क्यों मैं शिकवा किए बगैर उन्हें अपने हलक से नीचे उतारता रहा ? और अपनी सच्चाई में तनिक भी अपना मुख नहीं खोला ? आपके आग्रह, आडवाणी के निर्देश और अपनी हांमी भरने के उपरान्त भी मैंने क्यों मूर्ति बनाने का कार्य पूर्ण नहीं किया ? और क्यों मैं एक लम्बे समय के लिए आपकी आँखों के सामने से लुप्त भी हो गया था ?

मेरा यूँ ग़ायब हो जाने का केवल एक ही कारण था कि आपकी वह मूर्ति जो मैंने केवल आपकी तस्वीरों के सहारे बनाई थी, आपको देखने के पश्चात् आपके स्वास्थ्य की दृष्टि से उसमें एक कमी नज़र आ रही थी- बस, इसी कमी को पूरा करने के लिए मैं लगभग चार माह आपसे दूर रहकर जयपुर में रहा था । '
अब यह आवश्यक भी नहीं है कि इन समस्त प्रश्नों के उत्तर देने के लिए शब्दों का उपयोग किया जाए, क्योंकि मनुष्य की जिन्दगी में कुछ प्रश्न केवल प्रश्न बनने के लिए ही अपना जन्म लेते हैं । उत्तर उनको मिलते ही नहीं हैं । कुछ प्रश्न अपने उत्तरों के मोहताज नहीं हौते हैं । कुंछेक के उत्तर स्वयं ही मिल जाते हैं । बाकी के प्रश्न मानव-जीवन मेँ एक प्रश्नचिह्न बनकर ही अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं । शायद इसीलिए कि मनुष्य का जीवन भी अपने आपमें एक प्रश्न ही तो है, जिसे वह अपने सारे जीवनकाल तक हल ही करता रहता है, और मरणोपरान्त भी अपने पीछे एक प्रश्नचिह्न ही छोड़ जाता है । '
आपने मुझ पर, मेरी हरकतों पर शक किया, तो ये आपका अधिकार था । मैँने आप में अपना कोई स्वार्थ देखा तो यह मेरी कमजोरी थी । आपने मेरी भावनाओँ की इज्जत की तो आपकी भी सीमा यहीं तक थी । काश ! मैँ इस लायक भी नहीं होता ! सागर को आपका प्यार मिला, तो यह उसका सौभाग्य ही तो था ।
आज आपकी सुहागरात है, जिसका तोहफा आपको अपने पति सागर से मिलेगा । मेरी तरफ से आपको विवाह का उपहार आपकी वह मूर्ति है, जिसे बनाने का वायदा मैंने आपसे किया तो था, पर उसे बनाने के बाद और यह मूर्ति आज भी हमारे पैतृक भवन के उस बन्द कमरे में आपके आने की प्रतीक्षा कर रही है जिसे सबसे पहले देखने की लालसा सिर्फ मैंने आपके लिए की थी । यह और बात है कि मूर्ति मैंने आडवाणी के निवेदन से कई वर्ष पहले ही बना ली थी । आपकी मॉडलिंग की तस्वीरों को देख-देखकर । आपको देखे बगैर ही, लेकिन वैसी अर्द्धनग्न नहीं जैसी आडवाणी चाहते थे । आप चाहें तो अपनी और मेरी इस रचना को आडवाणी की आवश्यकता के रूप में पूरी कर सकती हैँ… यह तो आप समझ ही गई होंगी कि आपकी मूर्ति मैंने क्यों बनाईं थी ? अगर अब भी आप न समझ सकें तो मुझसे बड़ा बदनसीब और कौन हो सकता है ?
मुझे आशा है कि आपको मेरे प्रति अपनी सारी शिकायतों के उत्तर मिल जाएँगे । मेरे दिल में छिपी हुईं खामोशी की वह आवाज़ भी आपको सुनाई देगी, जिसको आज तक मेरे सिवा और कोई नहीं सुन सका है… और आप भी सुनकर या तो समझ नहीं सकी थीं, या फिर समझकर भी अनजान बनने का बहाना बनाकर मुझे टालती आईं थीं ।
आप तो दिल के मरीजों की डॉक्टर बनने जा रही हैँ । डॉक्टर बनने के पश्चात् आपके जीवन में बहुत सारे दिल के रोगी आएँगे । उनका उपचार भी आप करेंगी । उनके स्वस्थ जीवन के लिए उनको तरह-तरह के निर्देश भी देंगी, परन्तु मेरा ख़याल है कि प्यार के मारे अपने दिल के इस रोगी का आप न तो कोई उपचार ही कर पाएँगी और न ही कोई निर्देश दे सकेंगी । आपकी यह मूर्ति जिसे मैंने अपनी जिन्दगी की हर-साँस गिरवी रखकर अपने जिस अथाह प्यार और बेमोल दिल की चाहतों के वशीभूत होकर बनाई थी, वह आपके लिए मेरी मसली हुईं हसरतों की एक टीसभरी यादगार तो ज़रूर बन सकती है, पर आपके जीवन का सुख-चैन नहीं । आपके विवाह के उपलक्ष्य में मेरी और से दिया हुआ, मेरे टूटे हुए प्यार का यह उपहार आपको मेरे और आपके सम्बन्धों की कटु स्मृतियों को समय-असमय दोहरा लेने के अतिरिक्त शायद और कोई सन्तुष्टि भी नहीं दे पाएगा ।
मैंने जो कुछ भी किया- अच्छा या बुरा, उचित अथवा अनुचित, आपके शान्त जीवन में हलचल मचाई । आपकी भावनाओँ को कष्ट दिया । यदि हो सके तो मुझ मनहूस इन्सान को क्षमा कर देना । यही सोचकर कि एक और एकलव्य ने अपनी भावनाओँ और जज्बातों पर अंकुश न रखते हुए, आज्ञा लिए बगैर अपने किसी प्रिय की आराधना की थी और आपने भी द्रोणाचार्य के समान अपने अधिकार का भरपूर उपयोग करते हुए अपनी गुरुदक्षिणा में मुझसे जो कुछ भी माँगा है, उसे मैं अपने जीवन की अन्तिम साँसों तक आपके दामन में भेंट करता रहूँगा । इसलिए मैं आपका शहर, अपना प्यार छोडकर, आपके मार्गो से हमेशा के लिए जा रहा हूँ.. उस अनजान मंजिल की ओर, जिसको कि मैं शायद कभी भी दूँढ़ नहीं सकूँगा और इस वायदे के साथ कि आज के बाद फिर कभी भी आपके जीवन मेँ अपने किसी भी वजूद की परछाई तक नही पड़ने दूँगा ।
यह दुनिया बहुत बडी है, और हम बहुत छोटे । मुझ जैसे न जाने कितने आए और इस दुनियां की भीड़ में खो गए । मैँ भी खो जाऊँगा कहीं-न-कही । ठीक रात्रि के अन्धकार में, आकाश से टूटते हुए उस तारे के समान जिसे गिरते हुए तो लोग देख लेते हैं, परन्तु गिरने के पश्चात् उसके अस्तित्व का क्या हश्र होता है, प्रकृति के इस भेद का ज्ञान शायद किसी को भी नहीं है....? "

- मांझी.

सुधा ने पढा तो आँखें स्वत: ही छलक आईं । भर आईं । इस कदर कि दिल में एक दर्द उठा । एक अनजानी चाहत का । बेनाम रिश्ते का । उस डोर का, जो चुपचाप बँध तो गई थी, पर समाज के दायरों के भय से अपने नाम का कोई प्रचार नहीं कर सकी थी । माँझी से उसका क्या सम्बन्ध है ? क्या सम्बन्ध था ? क्यों उसकी आँखों में आँसू भर आए हैँ ? क्यों वह अब परेशान होती है ? तब उसकी समझ में आया कि, कैसी होती है, प्यार की कसक । उसका दर्द । अपने चाहनेवालों की अनुपस्थिति का वियोग ? एक मनुष्य जीवन के लम्बे अन्तराल से उसको प्यार करता था । मन-ही-मन उसकी उपासना करता रहा । अपने दिल की देवी समझकर प्रतिदिन उसकी आरती उतारता रहा और उसने उसकी कद्र भी नहीं की । उसे समझ भी नहीं पाई ? वह तो अभी तक माँझी के अपार प्यार को उसकी भावुकता और एक पसन्द समझकर ही टालती आईं थी । फिर टालती भी क्यों नहीं ? माँझी के आने से पूर्व ही तो वह सागर से बँध चुकी थी । शायद इसी कारण माँझी ने भी अपना मुख नहीं खोला होगा । अपने दिल का प्यार जाहिर नहीं कर सका होगा ? बहुत चाहते हुए भी अपने प्यार की मिन्नत नहीं कर सका था, क्योंकि कहा तो उससे जाता है, जो सुनने की स्थिति में हो ।

माँझी के उसके शहर से सदा के लिए कही दूर चले जाने पर सुधा ने सोचा था कि अब सारी बातें स्वत: ही समाप्त हो जाएँगी, परन्तु यह उसका नाहक़ भ्रम ही था । वह उसकी आँखों के सामने से चला अवश्य ही गया था, परन्तु जाने के पश्चात् भी उसके दाम्पत्य-जीवन में एक हलचल ज़रूर मचा गया था । साथ ही सागर के मस्तिष्क में भी सन्देह की एक लकीर अपने -आप ही खिंच गई थी ।

विवाह के पश्चात् सुधा किसी प्रकार सागर को मनाकर जयपुर गई । वहाँ जाने का उसका केवल एक ही आशय था कि उसकी वह मूर्ति जो माँझी ने उसकी अनभिज्ञता में कईं वर्षो पूर्व बनाई थी, वह उसे देखना चाहती थी और यह बहुत स्वाभाविक भी था । किसी ने उसके स्वरूप को बेजान पत्थरों की खूबसूरती में कैद कर दिया हो, और वह न देखे ? ऐसा तो हो ही नहीं सकता था । यह बात अलग थी कि माँझी ने अपने जिस प्यार और भावना में आकर उसकी मूर्ति बनाईं थी, उसको सुधा अपने दिल से फिर भी मान्यता नहीं दे सकी थी क्योंकि अपने दिल का यह अधिकार तो वह सागर को दे चुकी थी । एक किश्ती में बैठने के पश्वात् दूसरी की ओर ताकना और देखना भी उसको जैसे पाप लगता था । इसी कारण वह माँझी को अभी तक अपना एक मित्र, उसके एकतरफा प्यार का दीवाना, और उसकी मूर्ति को बनानेवाला एक अच्छा मूर्तिकार का दर्जा ही दे सकी थी ।

वह मूर्ति को देखना चाहती थी । उसे अपने घर में लाना चाहती थी, इसलिए नहीं कि उसको माँझी ने उसके प्यार में खोकर बनाई थी, बल्कि इस कारण कि वह मूर्ति उसकी अपनी थी । उसका अपना खुद का स्वरूप था और अपनी तस्वीर अपने स्वरूप को कोई भला नकार भी कैसे सकता था ?

हालाँकी, सागर इस बात में बिलकुल भी रुचि नहीं ले रहा था । फिर वह ले भी कैसे सकता था? वह सुधा का पति था । सुधा उसकी जीवन-संगिनी थी । उसकी पत्नी को कोई और व्यक्ति प्यारभरी दृष्टि से देख, इसे वह कैसे सहन कर सकता था ? लेकिन सागर भावुक नहीं था-समझदार और गम्भीर पुरुष था । माँझी ने सुधा को प्यार किया । उसे चाहा, यह बात तो उसने स्वीकार कर ली थी, परन्तु कोई अब उसकी पत्नी को प्यारभरी वृष्टि से देखे, इतना उसको स्वीकार नहीं था, इसलिए सागर ने भी माँझी को कोई दोष नहीँ दिया था, क्योंकि माँझी का प्यार सागर के प्यार से बहुत पहले उपजा था- अनजाने और एक तरफा प्यार में सुधा ने भी माँझी का कोई साथ नहीं दिया था । यह तथ्य भी सागर को ज्ञात था, परन्तु फिर भी अपने दाम्पत्य-जीवन में वह अब माँझी के किसी भी अस्तित्व को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं था । इसी कारण वह जयपुर नहीं जाना चाहता था । परन्तु सुधा के अत्यधिक निवेदन और आग्रह के आगे वह झुक गया और उसके साथ एक दिन जयपुर जाने के लिए अपने-आपको तैयार कर लिया ।

फिर जब वह अपने पति सागर के साथ जयपुर गई तो उसके दिल में न जाने कितनी तरह की बातें थीं ? कैसी-कैसी उमंगें थीं ? खुशी की अथवा रंज की ? कितने सारे प्रश्न थे । बहुत सारी स्मृतियाँ थीं- कटु और सुखद । उपरोक्त सभी बातों का वह कोई निर्णय नहीं कर सकी थी ।
वह समझ नहीं पा रही थी कि माँझी की स्मृति को लेकर वह शोक मनाए अथवा खुशी ? उसकी अनुपस्थिति में अपने-आपको स्वतन्त्र महसूस करे या उसकी कमी का एहसास लिए, अपने-आपसे एक शिकायत करती फिरे ?
इन्हीं झँझावातों में वह जब माँझी के पैतृक-स्थल पर पहुँची, तो वहाँ माँझी और उसके परिवार के अन्य लोगों की अनुपस्थिति देखकर चौक अवश्य गई, परन्तु कोई आश्चर्य नहीं कर सकी । वहाँ केवलं उसके दूर के कोई अन्य रिश्तेदार लोग ही रह रहे थे ।
सुधा और सागर ने अपना परिचय उन लोगों को दिया, तो उन्होंने भी तुरन्त माँझी के स्टूडियो जैसे कमरे में उन्हें सहर्ष ही जाने दिया । शायद उन लोगों को माँझी ने भी उनके बारे मेँ पहले ही से अवगत करा दिया था ।
फिर जैसे ही सागर ने माँझी के कमरे का द्वार खोला, और बत्ती जलाई तो सामने पहले ही से किसी स्त्री को खड़ा देखकर चौंक गया, तुरन्त ही उसके मुख से बेसाख्ता ही निकल पड़ा,

“ ओह ! माफ करिए । ”
“... ?”
साथ ही सुधा भी आश्चर्य कर गई ।
सागर पहले तो चौंक गया था, परन्तु फिर वास्तविकता देखकर स्वयं ही अपने-आप पर उसके हँसी भी आ गई । सामने सुधा की मूर्ति जैसे साकार होकर उन लोगों का स्वागत कर रही थी-सफेद, दूधिया, संगमरमर के पत्थर में सजी-धजी- गुडिया समान । सुधा को उस मूर्ति में एक जीती-जागती सुधा का आभास हो रहा था । क्षणभर को कोई भी उसे देखकर यह नहीं कह सकता था कि यह मूर्ति है या जीवित नारी ?
दोनों चुपचाप खडे हुए, अभी तक बनानेवाले की कारीगरी में खो गए थे और सुधा ? उसकी तो जैसे धड़कनें ही थम जाना चाहती थीं । कितना प्यार किया होगा माँझी ने उसको ? किस कदर उसको चाहा था ? माँझी ने जितना उसे प्यार नहीं किया था, उससे कहीं बढ़कर उसकी पूजा की थी । इस बात की साक्षी सुधा का दूसरा स्वरूप, उसकी बनी हुईं मूर्ति स्वयं ही दे रही थी ।
तब सुधा ने सोचा, फिर स्वयं से पूछा, 'कहीं उसने माँझी को ठुकराकर कोई भूल तो नहीं की है? कोई ऐसा ग़लत कार्य तो वह नहीं कर बैठी है, कि जिसकी सजा माँझी सारी उम्र ही भुगतता फिरे ? कहीँ वह अपने साथ कोई ऐसा-वैसा कार्यं न कर बैठे ? प्यार की दीवानगी का भरोसा भी क्या ? प्यार की ठोकर खानेवाला इन्सान कुछ भी कर सकता है । क्षणभर में ही अपनी हस्ती, अपना अस्तित्व भी वह दाँव पर लगा सकता है । '
फिर किसी तरह वह सागर के साथ अपने घर वापस आ गई । सागर ने उसके अनुरोध पर उसकी मूर्ति मँगवाकर उसके अपने ही घर के एक अलग कमरे में सुरक्षित रख ली थी । इस प्रकार सुधा का जीवन फिर आरम्भ हो गया था । वह अपने-आपको सामान्य बनाने की कोशिश करने लगी थी । घर से कॉलेज जाना, और कॉलेज से घर । बस, यही उसकी दिनचर्या रह गई थी । दिल की समस्त उमंगें, विवाह का नया जोश भी, शायद माँझी की अनुपस्थिति के कारण स्वत: ही ठण्डा पड़ गया था ।
जब भी सुधा अकेली होती, तो माँझी का वजूद स्वत: ही उसके खयालों में आ जाता और फिर आते ही उसके दिल, दिमाग़ के तारों से छेड़खानी आरम्भ कर देता था । वह उसकी याद मेँ रोती नहीं थी । आँसू भी नहीं बहाती थी, परन्तु शायद अपने को दोषी मानकर स्वत: ही एक ठण्डी आग में झुलसती रहती थी । वह शायद इसलिए कि माँझी उसके जीवन में जितने भी दिनों के लिए आया था, उतने ही समय में वह कभी भी न हल होनेवाले प्रश्नचिह्न उसकी नज़रों के सामने छोड़ भी गया था । ये ऐसे सवाल थे कि जिनका उत्तर न तो वह दे ही सकती थी और ना ही इन सवालों को वह अपने जीवन से किसी भी प्रकार नजर अन्दाज्र कर सकती थी ।

उसके दिन इसी प्रकार कट रहे थे । उसकी अपनी उदासी के साथ-मायूसियों का दामन पकड़े हुए और चेहरे पर एक खामोश, अनकही गम्भीरता लिए हुए । दिन में जाने कितनी बार वह अपने चेहरे, अपने स्वरूप को देखती- खुद से कई-एक सवाल पूछती, और फिर कोई भी सन्तुष्ट उत्तर न पाकर स्वयं को ही जैसे दोष देने लगती थी ।
जब भी वह दिन में घर पर होती और सागर घर पर नहीं होता तो घण्टों अपनी मूर्ति के सामने खड़ी रहती । बैठी रहती । बैठी-बैठी खुद ही माँझी को याद करती रहती, जैसे कि वह अपने ही तन में, अपनी ही आँखों में एक और परछाई- एक दूसरी तस्वीर का प्रतिबिम्ब देखती और वह दूसरा बिम्ब माँझी का ख़याल होता कि जिसको उसने अपने ख़याल से सदा निकालने का प्रयत्न तो किया था, परन्तु हमेशा असफल ही रही थी ।

शुरू-शुरू में उसकी खामोशी । खोई हुई चेहरे को खिलखिलाहट और भरपूर गम्भीरता देखकर सागर ने कुछ भी नहीं कहा । वह बस सुधा की दिनचर्या को गम्भीरता से लेने लगा था । उसके चेहरे की खामोशी के पीछे छिपी-छिपी आवाज़ को वह सुनने की कोशिश तो करता था, परन्तु फिर कोई ठोस कारण प्राप्त न होने की स्थिति में खामोश भी रह लेता था, परन्तु जब प्रत्येक समय गुमसुम रहना, अधिक बात न करना, अपने में ही खोए रहना आदि इस प्रकार की बदलती हुई रूपरेखा सुधा की आदत मेँ सम्मिलित होने लगी, तो सागर के सब्र का का बाँध भी टूट गया। इस प्रकार फिर वह प्राय: सुधा से अनेक प्रकार के सन्देह से भरपूर प्रश्न आते-जाते करने लगा ।
समय-असमय वह उसे टोक भी देता था । उससे अपनी खोई हुई मुस्कराहट का कारण पूछता, तो सुधा भी धीरे-से टाल जाती थी । फिर धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आया कि सागर उससे तकरारें भी करने लगा । कोई दिन ऐसा नहीं जाता था कि जिस दिन दोनों में बहस और तकरारें न होती थीं । सागर भी जब आए दिन, परोक्ष रूप से उस पर माँझी की यादों में खोये रहने का दोष मढ़ दिया करता था । आए दिन उससे विभिन्न प्रकार के प्ररन करने लगता था- जैसे कि, 'हर वक्त ये क्या सोचती रहती हो ? खुश क्यों नहीं रहती हो, किसी की याद में क्या आँखें बिछाए बैठी हो ? मुझसे विवाह करके कोई भूल कर बैठी हो ? यदि प्रसन्न नहीं हो तो कहीं भी जा सकती हो । मेरी और से पूरी स्वतन्त्रता है तुम्हें । ' आदि । इसप्रकार की बातें सुधा सुनती तो उसके दिल पर आरे-से चलने लगते । जख्मों पर कोई नमक-मिर्च छिड़क देता था, परन्तु फिर भी वह सहन किए रहती और कोई अधिक बात नहीं करती थी ।फिर धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आया कि उसके दाम्पत्य-जीवन में आग सुलगना आरम्भ हो गई । सागर धीरे-धीरे शराब पीने लगा । सुधा ने उसे शुरू में मना भी किया । समझाने की चेष्टा की । अपने प्यार के कई एक वास्ते भी दिए । परन्तु सागर की यह आदत छूट नहीं सकी । इसके फलस्वरूप वह प्राय: घर से अधिक बाहर ही रहने लगा । बाहर ही खाना खाता, और जब भी वापस आता तो नशे में धुत्त होकर । और तब एक दिन...

सुधा अपने कमरे में बैठी कोई पुस्तक पढ़ रही थी तभी सागर अपनी प्रतिदिन की आदत के अनुसार गई रात देर से घर में आया तो सुधा से नहीं रहा गया । वह उससे पूछ बैठी,

" यह वक्त है तुम्हारा घर आने का ? "
“चलो, आज कम-से-कम पूछ तो लिया । नहीं तो मैं भी समझने लगा था कि मुझे तो अब तक भूल ही गई होंगी, किसी अन्य की याद के कारण । ” सागर ने नशे में ही आश्चर्य करते हुए कहा ।
"मैं किसे याद करूँगी अब ? ” सुधा बोली ।
“क्यों अब वह याद नहीं आता है, जिसने तुम्हारा खूबसूरत-सा पत्थर का शरीर बनाकर दिया है?" सागर ने कहा ।
“ अच्छा ! तुम्हें मैं तो अच्छी लगती हूँ और मेरी पत्थर की बेजान मूर्ति से तुम्हें इतनी चिढ़ क्यों है ?"

" इसलिए कि वह तुम्हारे दीवाने प्रेमी की यादगार बनकर रह गई है । उसे देखकर तुम माँझी को अपनी स्मृतियों में बसाए रहती हो । "
"तो क्या करूँ' ? तोड़ दूँ उसे मैँ ? " सुधा ने पूछा ।
" कर सकती हो ऐसा क्या ? हिम्मत है तुम्हारे अन्दर इतनी ?"
"तुम अपने शरीर को मार-पीट सकते हो क्या ?"
"आवश्यकता पड़ी तो ऐसा भी कर सकता हूँ मैँ । "
"तो फिर तुम खुद ही क्यों नहीं तोड़ देते हो ... । मैं भी तो तुम्हारा ही शरीर हूँ ।" सुधा ने कहा।
"यानी कि तुम ऐसा कर ही नहीं सकती हो । "
"कैसे कर दूँ ? पागल नहीं हूँ तुम्हारी तरह । किसी वस्तु को तोड़ना जितना आसान है उतना ही बनाना मुश्किल भी है । '"
“देखो सुधा ! अगर तुम यह समझती हो कि तुमने मुझसे विवाह करके कोई गलती की है तो अब भी समय है । "
" ...?" सागर ने कहा तो सुधा जैसे उबल पडी । वह बोली,

"शुरू में नहीं लगा था पर अब तुम्हारे बदलते हुए रवैये देखकर लगने लगा है कि विवाह करके कोई ग़लती नहीं की है पर हाँ तुम्हें समझने में जरूर कोई भूल हो गई है । ”
"कैसी भूल ?। “

यही कि तुम इतने शक्की होगे, मैं सोच भी नही सकती थी ।"
" और तुम भी माँझी को इतना अधिक उच्च स्थान दोगी ऐसा मैंने भी नहीं सोचा था । "
"तुमसे अधिक ऊँचा स्थान मैंने उसे कभी नहीं दिया था । अब उसने मुझसे पूछे बगैर मेंरी मूर्ति बनाई । मुझे प्यार किया । मुझे अपने दिल में मान्यता दी, तो इसमें मेरा क्या दोष है ? संयोग की बात है कि दो बार उसने मेरी जान भी बचाई थी । इन हालातों में, मैं उसे नकार भी तो नहीं सकती हूँ और फिर उससे बढकर मैंने सदैव तुम्हें चाहा है. । तुम्हें ही प्यार किया है । अगर ऐसा नहीं होता तो मैं तुमसे कभी भी विवाह नहीं करती । मुझे विवाह से बहुत पहले ही ज्ञात हो गया था कि माँझी मुझे प्यार करता है और आजकल के दिनों से नहीं, बल्कि उन दिनों से वह मुझे चाहता रहा है, जब से मैं मॉडलिंग के कैरिअर में आईं थी और उस समय तक तुमसे तो मेरे किसी प्यार का सिलसिला भी आरम्भ नहीं हो सका था । इतना होने पर भी अगर मेरे दिल में ज़रा भी कोई पाप होता, तुम्हारे प्रति कोई भी खोट होता, तो मैं आज़ तुम्हारे पास नहीं, बल्कि माँझी के पास होती । इतना सब-कुछ जानते-समझते हुए भी तुम मुझको सन्देह-भरी दृष्टि से देखते हो । तुम्हें शर्म आनी चाहिए । ”
सुधा को इतनी लम्बी बात पर सागर जैसे बिफरकर बोला,

"तुम मुझसे बहस कर रही हो ! "
" बहस की गुंजाइश नहीं रही है । यह रोज़-रोज की तकरार मुझे भी अब पसन्द नहीं है ।" सुधा बोली ।
"तो क्या चाहती हो ?"
“फैसला होना चाहिए ! "
”तुम निर्णय चाहती हो ?”
"तुम्हें फैसला करना होगा । " सुधा ने कहा ।
"कैसा फैसला ?" '

“यही कि यदि यह प्रतिदिन की तकरार होगी, तुम शराब पिओगे, तो हम दोनों एक छत के नीचे तब तक नहीं रह सकते, जब तक कि तुम अपनी आदत नहीं सुधारोगे । "
"तो ठीक है, जब तक कि तुम्हारी यह मूर्ति यहाँ रहेगी । तब तक मैं भी यहाँ नहीं रह सकता हूँ।" यह कहकर सागर उल्टे पैर वापस जाने लगा ।
" अब कहाँ चल दिए इतनी रात में ? ” सुधा ने उसे बाहर जाते हुए रोकना चाहा ।
"जहन्नुम में । तुमसे मतलब ? ”
"' रुक जाओ । तुम अभी अपने होश में नहीं हो । "
"होश में तो मैं अब आया हूँ, तुम्हें समझने के बाद । "
" क्या समझ लिया है तुमने ? ” सुधा उसके बीच में आकर मार्ग रोकते हुए बोली ।
"हटो मेरे रास्ते से, वरना... "
"वरना क्या करोगे ? मार डालोगे मुझे ? " सुधा ने पूछा ।
“ तुमको मुझे खुद हटाना पडेगा । "
यह कहकर सागर ने सुधा को धक्का दे दिया, इस प्रकार कि वह अचानक ही छिटककर जैसे दीवार से जा लगी और सागर उसे बुरा-भला कहता हुआ घर से बाहर निकल गया था । रात के अँधेरों में... कहाँ ? किधर ? उसे कुछ भी ज्ञात नहीं था । शराब तो वह यूँ भी पिए हुए ही था । इस कारण नशे में वह कार भी ठीक से नहीं चला पा रहा था । तब सुधा ने सोचा था कि हर दिन के समान वह सुबह तक वापस आ जाएगा, परन्तु जब वह आया तो स्वयं से नहीं आया था । पुलिस की आपात्कालीन गाड़ी उसकी लाश को लेकर आई थी । नशे में ' कार चलाने के कारण, सन्तुलन खोने की वज़ह से उसने कार एक वृक्ष से टकरा दी थी , जिसके कारण घटनास्थल पर ही उसकी मृत्यु हो गई थी ।

सुधा ने सागर की क्षत-बिक्षत लाश को देखा तो फूट-फूटकर रो पड़ी । अपना सिर पटकने लगी। कितना रोईं । किस कदर अपने सैंकडों आँसू उसने सागर के बेजान शरीर पर बहा दिए थे । कोई नहीं जानता था । पलभर में ही यह क्या-से-क्या हो गया था । सारी कहानी की पृष्ठभूमि ही परिवर्तित हो चुकी थी । फिर किसी प्रकार सुधा ने अपने-आपको सँभालने की कोशिश की । अपनी रही-बची पढाई में मन लगाया । माँझी की बनाईं हुईं उसकी मूर्ति को उसने तोड़ डाला था। शायद इसलिए कि सागर की मृत्यु के पश्चात् वह दोनों में से अब किसी को भी याद नहीं रखना चाहती थी । शायद दोनों ने ही उसको, उसके प्यार को, उसके दिल की भावनाओं को समझने में भूल जो की थी । एक ने उसे सन्देह की दृष्टि से देखा था, तो दूसरे ने अपने स्वार्थ को । फिर भी दोनों ने ही उसको प्यार किया था । यह वह जानती थी , परन्तु एक का प्यार सन्देह की दीवारों के बीच में जाकर कैद हो गया था और दूसरा अपने प्यार के अरमानों की चिता में अग्नि देकर गायब हो चुका था । और फिर थोड़े दिनों के अन्तराल के बाद ही उसके पिता भी चल बसे थे । वे शायद इस सदमे को सहन नहीं कर सके थे कि अपने बुढापे में ही उन्होंने अपनी फूलों से भी प्यारी बेटी को विधवा होते देख लिया था । अभी उसकी उम्र ही क्या थी ? दुनिया देखनी आरम्भ ही की थी कि आँखों की ज्योति मिट चुकी थी । '
सुधा का जीवन पिता को मृत्यु के पश्चात् एक बार फिर अँधेरों की शरण में आ गया, तो वह और भी अधिक बुझ गई, लेकिन टूटी नहीं थी । अपने जीवन को इतनी दुखद घटनाओँ को उसने अतीत का विष समझकर कंठ से नीचे उतार लिया था और इन सारी बातों का दोष किसी को भी नहीं दिया था । न तो वह सागर को दोष दे सकी थी और न ही माँझी में कोई ग़लती दूँढ़ सकी थी । वे दोनों उसके जीवन में हवा के एक झाँके के समान आए और कुछ लेकर कुछ देकर चले भी गए थे । बस इतना ही वह सोचती थी .।

इसी तरह धीमे-धीमे काफी समय व्यतीत हो गया । सुधा बहुत कुछ भूली और नही भी । उसकी आँखों के आसू पोंछनेवाला यद्यपि अब कोई भी नहीं था, परन्तु जीवन की व्यस्तता उन्हें मौसमी हवाओं का सहारा लेकर सुखा अवश्य देती थी । प्यार-मुहब्बत के खेल में वह हारी या जीती ? इससे अब उसे कोई भी सरोकार नहीं रहा था… बस जीवन में उसका जो कुछ भी खो गया था, उसके बारे में सोचकर वह कोई मलाल नहीं करना चाहती थी और जो बच गया था, केवल उसी के सहारे जीना सीखना चाहती थी ।

फिर एक दिन जब उसकी पढ़ाई समाप्त हो गई और वह सुधा से डॉक्टर सुधा सागर बन गई तो यहाँ कौसानी चली आई... और तब से वह पिछले चार वषों से अपने इस छोटे-से अस्पताल 'सागर मेडिकल सेन्टर' में बीमार, परेशान, दिल के रोगियों की सेवा कर रही थी । माँझी के बारे में वह एक प्रकार से भूली तो नहीं थी, परन्तु उसे याद भी नहीं करती थी और जिस 'माँझी ' के कारण वह अपनी जीवन 'नैया' को 'सागर' में डुबोकर चली आई थी वही माँझी उसके दर पर यूँ इस प्रकार रहे-बचे जिन्दगी के दिनों की भीख माँग रहा होगा ? ऐसा विचार- ऐसी कल्पना तो उसने कभी भूले से स्वप्न में भी नहीं की थी ।

...सोचते-सोचते सुधा के मस्तिष्क को एक झटका-सा लगा । वह अतीत से हटकर वर्तमान में आ गई । उसने एक बार चारों तरफ़ देखा- कमरे की चारों दीवारों पर एक नज़र फेंकी ... टिक-टिक करती, घूमती हुईं घड़ी की सूइयों को देखा- रात्रि के दस बज रहे थे । अपने आज के विशिष्ट मरीज़ 'माँझी' को निहारा । वह अभी भी बिस्तर पर पड़ा हुआ था । बेहोश । सारी दुनिया से बेख़बर- घायल ।

सुधा उठकर खडी हुईं । बाहर के वातावरण पर एक दृष्टि डाली ! शाम भर से चिंघाड़ता हुआ तूफान अब शान्त हो चुका था । बाहर पहाड़ों पर चाँदनी इठला रही थी और साथ ही खामोश, वर्षा में भीगे हुए चीड़ के वृक्षों की पतली-पतली पत्तियों के मध्य से चन्द्रमा ने भी जाली बुनना आरम्भ कर दिया था ।

सुधा ने फिर एक बार अपनी कलाई में बँधी घड़ी की और देखा । समय का अनुमान लगाया । वह लड़की जो माँझी को साथ लेकर आई थी, अभी भी बाहर गैलरी में बैंच पर बैठी हुई थी... उदास ...चिन्तित और घबराई हुई-सी ।
माँझी को उसने संध्या सात बजे अस्पताल में दाखिल किया था और तब से अब साढ़े दस बजने को थे । इतने समय में सुधा बैठी-बैठी अपने जीवन की कितनी ही सारी घटनाओँ को फिर से दोहरा गई थी । उसके अतीत के वे दिन, वे पल जिनमें उसके जीवन के सुख-दुख थे, एक-एक करके आए, और दिल में एक टीस देकर चले भी गए थे ।

सहसा ही बाहर बैठी हुई लडकी ने घूमकर सुधा के कमरे को ओर खिड़की से देखने की इच्छा से गर्दन घुमाई तो लगा कि जैसे कहीं लटकी हुई छोटी-छोटी मधूर घंटियों के संगीत को किसी ने छेड़ दिया हो । उसके कानों में लटके हुए झुमकों की प्यारी और मधुर आवाज़ ने सुधा का ध्यान आकर्षित किया था, क्योंकि जैसे ही वह लड़की उठती, बैठती या कोई भी हरकत करती थी तो उसके झुमकों का संगीत, उसकी मधुर झनकारें, उसकी उपस्थिति का आभास पहले ही से करा देती थीं ।

सुधा से जब नहीं' रहा गया तो यह कमरे से बाहर आ गई । उसको बाहर आते देख वह लड़की तुरन्त ही खडी हो गई । डाँक्टर के आदर और सम्मान में अथवा अपने साथ लाए हुए मरीज़ का हाल जानने की इच्छा से । सुधा यह देख कोई निर्णय नहीं' ले सकी ।
"नही.. नहीं, बैठी रहे आप । " सुधा ने उससे बैठे रहने को कहा तो वह लड़की चुपचाप, घबराई हूँई-सी सुधा को निहारने लगी ।
"घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है । सब ठीक हो जाएगा ।" सुधा ने उसे तसल्ली देनी चाही। फिर थोड़ी देर बाद वह उसको देखने लगी... पहाडों की सुन्दरता का मोल ही क्या ? चेहरा देखते ही लगता था कि जैसे ढेर सारे जुगनू एक ही स्थान पर बैठ गए हों । गहरी, काली-कजरी आँखे। आँखों में कभी भी न पानेवाली गहराई । देखने का ढंग और अन्दाज ऐसा कि जिधर भी देखें, स्वत: ही एक अनजानी चाहत का रिश्ता जोड़ लें । पहाड़ी वस्त्रों के साथ कमर में घाघरा ऐसा, जब भी वह चले तो पृथ्वी का आँचल चूमता रहे । लम्बे घने, घुंघराले बाल । कमर और कूल्हे से भी नीचे झूमते हुए-से । जब भी वह झुके तो सहर्ष ही धरती को प्यार कर ले । सुधा उसको देखते ही समझ गई कि माँझी के साथ आई यह लड़की कितनी निर्दोष, प्यारी, और भोली है ? इस कदर कि चेहरे का भोलापन ही उसकी सुन्दरता का नगीना है।
" क्या नाम है आपका ? " तब सुधा ने उससे पूछा ।
"जी, नैया । "
"नैया... " सुधा ने उसका नाम दोहराया ।
जी हाँ !”
" और जिनको आप लेकर आईं हैं उनका ? " जानते हुए भी सुधा ने जान-बूझकर अनभिज्ञ बनकर नैया से पूछा ।
“जी, माँझी । " नैया ने सकुचाते हुए, जैसे लाजभरे स्वर में कहा ।
" क्या मेल है ? नैया-माँझी... माँझी और नैया । " सुधा ने हल्के-से मुस्कराते हुए कहा !
"... ? ” इस पर नैया शर्म से लाल हो गई ।
" क्या माँझी आपके पति हैँ ?" सुधा ने आगे पूछा ।
"' जी ... नहीं... " लड़की ने मुख से कुछ नहीं कहा, केवल गर्दन हिलाकर मना कर दिया, तो कानों में पड़े झुमके एक बार फिर मचल गए । इस प्रकार कि चारों तरफ़ एक संगीत की लय सरक गई ।
"... ?“ सुधा भी नैया के मना करने पर आश्चर्य से भर गई, परन्तु फिर वह आगे कुछ बोलती, इससे पूर्व ही नैया ने पूछा, " डाक्टर साहिबा, माँझी ठीक हो जाएँगे न ? "
"हाँ-हाँ, क्यों नहीं । मैंने उन्हें दवाई दे दी है । सिर में चोट तो अवश्य ही आई है लेकिन सब ठीक हो जाएगा । ” सुधा ने कहा तो नैया को जैसे थोड़ी शान्ति मिली । उसकी आँखों में पलभर को खुशी की एक चमक आई और तुरन्त गायब भी हो गई ।
"मैं एक बात पूछूँ ? ” सुधा ने आगे कहा ।
“ क्या ? "
"पता नहीं, मुझे पूछनी भी चाहिए कि नहीं ? लेकिन डॉक्टर हूँ, इसलिए पूछना आवश्यक भी हैं। आपका इन माँझी से क्या सम्बन्ध है ?"
"जी... । हमारा विवाह होनेवाला था ?" नैया ने लजाते हुए कहा ।
“..?”
"' आप इनको जानती कैसे हैं ?"
"जी, बहुत दिनों से । पिछले दो वर्षो से ।"
"मेरा मतलब है कि आपका इनसे सम्पर्क कैसे हुआ था ?”
"जी ! यह बहुत लम्बी कहानी हैं । फिर कभी बता दूँगी । पहले वे... ?”
"वे बिलकुल ठीक हो जाएँगे । मुझ पर विश्वास रखो । " सुधा ने उसे फिर तसल्ली देनी चाही ।
“ फिर भी कुछ अच्छा नहीं लगता है, जब मन ही ख़राब हो । ” नैया ने असमर्थता दिखाईं ।
"मैं आपकी परेशानी समझती हूँ लेकिन अभी माँझी भी होश में नहीं हैं । आप भी इतनी रात अब कहीं जा नहीं सकती हैं, तो अब बताने में क्या हर्ज है ?"
"जी ! मैँ यहाँ एक नृत्यकला कम्पनी के थियेटर में काम करती हूँ ।. मेरी माँ भी वहीं काम करती हैं । अब से दो वर्ष पूर्व ये यहाँ आए थे । बहुत दुखी, परेशान, उदास-से । उस समय मैं अपने नृत्य का अभ्यास कर रही थी । तभी इनसे सम्पर्क हुआ था । " . '
" क्या आपने इनकी उदासी का कारण पूछा था ?”
"हाँ !" "
"वह क्या था ?"
“ये बहुत ही अच्छे मूर्तिकार हैँ । किसी लड़की से प्यार करते थे, और वह लड़की किसी अन्य लड़के से । बस, इतना ही जानती हूँ मैँ । तब से हम दोनों एक-दूसरे को जानते हैं और विवाह भी करना चाहते हैं, पर आज मेरे नृत्य-कला के अभ्यास के दौरान ये नीचे गिर पड़े और घायल हो गए । "
“अभ्यास कहाँ कर रही थीं ?"
"पहाड़ पर । "
“ क्या उस लड़की का नाम भी बताया था इन्होंने जिससे ये प्यार करते थे । " सुधा ने उत्सुक होकर पूछा ।
"जी, कोई सुधा जी हैँ, और वह डॉक्टर बननेवाली थीं । "
" ...? "
सुधा की छाती पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा । इस प्रकार कि वह एकदम तिलमिला-सी गई । पलभर को वह कुछ कह भी नहीं सकी । बस, चुप ही रही... । फिर काफी देर बाद उसने बात आगे बढाई । बोली,

"यह आपके माँझी यहाँ कौसानी में क्या करते हैं ?"
"यहीं मेरे साथ ही नृत्य कला कम्पनी के थिएटर में काम करते हैं । ”
"किस तरह का काम ?"
“नृत्य से सम्बन्धित डिजाइन इत्यादि बनाना... स्टेज की पृष्ठभूमि तैयार करना आदि । "
" माँझी का क्या कोई और भी सम्बन्धी यहाँ रहता है ?”
"यहाँ तो नहीं, परन्तु कुमाऊँ के दूसरे क्षेत्र अल्मोड़ा में इनका पूरा परिवार ही रहता है । "
“मैं इसलिए पूछ रही हूँ कि यहाँ अस्पताल में जब तक माँझी ठीक नहीं हो जाते हैं, तब तक इनके साथ किसी का रहना आवश्यक भी है, इनकी देखभाल के लिए । "
सुधा ने कहा तो नैया तुरन्त बोली,

"मैं बनी रहूँगी । रात-दिन । हर समय । आप कोई चिन्ता न करें । " नैया ने सहर्ष ही कहा ।
“ आप यहाँ रहेंगी, तो वहाँ थिएटर में काम कौन करेगा ?" सुधा ने पूछा ।
"मैँ छुट्टी ले लूँगी । "
“पैसा नहीं कटेगा क्या ? "
“कटेगा तो कटने दो । " माँझी को मैं अकेला थोड़े ही छोड़ दूँगी ।
“बहुत प्यार करती हो अपने माँझी को । " सुधा ने उसके मन की बात जान लेना चाहा ।
" ? " इस पर नैया पुन: लजा गई । मुख से उसने कुछ भी नहीं कहा । केवल नीचे फर्श को देखने लगी ।
"करना भी चाहिए । इसमें शर्माने की कोई बात नहीं है । मैँने तो इसलिए पूछा था कि अगर कोई प्रबन्ध नहीं कर सकता है, तो मैँ कोईं-न-कोईं प्रबंध कर ही लूँगी । " सुधा बोली ।
“नहीं... नहीं, इसकी आवश्यकता नहीं होगी । मैं यहाँ रहूँगी, परन्तु एक बात जानना चाहती थी... ?“ नैया ने कहा।
“ क्या ?”
"इनके ठीक होने में, दवा वगैरह आदि का खर्चा कितना आएगा ? "
"बता दूँ... ?" सुधा बोली ।
“हाँ !”

"कम-से-कम एक लाख रुपया । "
“क्या ?”
नैया का आश्चर्य से मुख खुला-का-खुला रह गया ।
" घबरा गई आप ? ” सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, फिर आगे बोली,

"मैं तो यूँही बोली थी, लेकिन असली बात यह है कि आप ख़र्च की कोई चिन्ता न करें । यह हमारा अस्पताल का नियम है कि यदि कोई पैसा देने की स्थिति में नहीं है, तो उसका इलाज यहाँ नि:शुल्क होता है । "
“ ... ?” तब नैया आनन्द और दुख के समन्वय के कारण जैसे भावविह्ल हो गई । स्वत: ही उसकी आँखें भर आई । वह सुधा के पैरों पर गिरकर, उनसे लिपटकर बोली,

"डॉक्टर साहिबा ! हम लोग बहुत ग़रीब हैं और माँझी वैसे भी बहुत दुखी इन्सान हैं । इनको बचा लीजिए । किसी भी तरह, चाहे इसमें मेरी ही जान क्यों न चली जाए । "
" नहीँ-नहीं, आपको यह सब करने की कोई आवश्यकता नहीं है । मैं हर सम्भव प्रयास करूँगी । माँझी को स्वस्थ करने के लिए और आपको अस्पताल के ख़र्च के लिए भी कोई चिन्ता आदि करने की कोई आवश्यकता नहीं है । "
तब सुधा के उठाने पर नैया उठकर खडी हो गई और अपनी आँखों में भर आए आँसू पोंछने लगी । फिर सुधा ने आगे कहा,

"अच्छा, अब आप घर जाएँ । आराम कर लें । मैं ड्राइवर से कहे देती हूँ वह आपको घर छोड़ देगा । "
"नहीं, मैं यहाँ से कहीं नहीं जाऊंगी । जब तक ये ठीक नहीं हो जाते हैं । " नैया ने कहा ।
"देखिए समझदारी से काम लीजिए । अगर आप भी आराम नहीं करेंगी तो माँझी की देखभाल कैसे करेंगी ? आप जाएँ और सुबह फिर आ जाइए, तब तक मैं यहॉ पर हूँ । घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है ।"
तब नैया सुधा के अत्यन्त प्रयास के कारण वहाँ से चली आई । अस्पताल का ड्राइवर उसे घर तक छोड़ने गया और सुधा पुन: माँझी को देखकर अपने ख़यालों में खो गई ।
वह सोचने लगी कि उसके जीवन में भी अजीबो-ग़रीब और अनहोनी घटनाओँ ने जैसे अपना कोई सम्बन्ध स्थापित कर लिया है । किस्मत का खेल भी अनोखा है । एक समय था कि जबकि यही माँझी उसके पास अपने प्यार की भीख माँगता फिर रहा था और तब उसके पास सबकुछ होते हुए भी उसने उसे खाली हाथ वापस कर दिया था । उसे तिरस्कृत कर दिया था, बल्कि देने के स्थान पर उसके अरमानों की झोली में फूलों के स्थान पर जीवन-भर के काँटे भर दिए थे, परन्तु आज वही माँझी फिर एक बार उसके द्वार पर बेहोशी की दशा में पड़ा हुआ अपनी जिन्दगी के बचे हुए दिनों की जैसे आरजू कर रहा था, लेकिन कल और आज में अन्तर केवल इतना ही है कि कल का अकेला संघर्ष करनेवाला माँझी आज़ अकेला नहीं था । आज उसके साथ क़दम-क़दम पर साथ देनेवाली, कन्धे-से-कन्धा मिलाकर उसका बोझ बांटने वाली , पर्वतों की एक प्यारी, भोली-भाली, खूबसूरत देन- कुंमाऊँ की घाटियों का सारा सौन्दर्यं लिए हुए, उसका प्यार 'नैया' भी उससे वही सबकुछ माँग रही थी, जिसको कि वह माँझी को एक दिन शायद चाहते हुए भी नहीं दे सकी थी ।

कल का गया हुआ वक्त जैसे फिर एक बार लौट आया था । समय की सुइयों ने फिर एक बार उलटा चक्कर ले लिया था । गुजरे हुए दिन फिर दोहराए जा रहे थे... एक दिन था जबकि माँझी ने उससे अपने प्यार की हसरत रखी थी । उससे अपना प्यार माँगा था और आज उसी माँझी के लिए नैया उसके चरणों से लिपट-लिपटकर अपना प्यार माँग रही थी । यह कैसा संयोग था ?
कल के बीते हुए दिनों में उसने माँझी को ख़ाली हाथ वापस लौटा दिया था । चाहकर भी 'वह' सबकुछ नहीं दे सकी थी । कल उसके पास सबकुछ था, लेकिन माँझी को निराश होना पड़ा था और आज उसके पास कुछ भी नहीं है, फिर भी वह माँझी और नैया को निराश नहीं होने देगी-वह आज किसी भी कीमत पर माँझी को ख़ाली हाथ वापस नहीं भेजेगी ।

सोचते-सोचते सुधा ने स्वयं से ही निर्णय ले लिया कि जो कुछ वह माँझी को पिछले दिनों में नहीं दे सकी थी, वही सबकुछ वह आज उसे देगी । उसे हर हाल में खुश रखेगी । आज उसके हाथों में कोई जंजीर भी नहीं है । वह उसकी सेवा करेगी । उसका जी-भर के इलाज करेगी और पूर्ण रूप से स्वस्थ करके नैया को भेंट में दे देगी । इस उम्मीद और लालसा पर कि जो कुछ उसे कल करना चाहिए था, और विवशतावश कर नहीं सकी थी, वही सबकुछ वह आज तो कर सकती है । आज उसके लिए कोई पाबन्दी नहीं है और इस तरह किसे क्या ज्ञात है कि यही उसका प्रायश्चित्त होगा । प्यार का प्रायश्चित्त । प्यार की ठोकर खाया हुआ इन्सान, कैसे-कैसे सदमें बर्दाश्त करता है ? कैसे-कैसे जीवन में परिवर्तन देखता है ? इसके विषय में पहले से कौन क्या कह सकता है '
उसने माँझी को जितने भी दुख-दर्द दिए थे, उन सबके स्थान पर उसकी झोली में खुशियों के चिराग़ जलाने का अवसर आ गया था । यदि वह ऐसा करने में सफल हो जाएगी, तो यही उसका सच्चा प्रायश्चित्त होगा । उसके जीवन का एक सच्चा उपहार । प्यार का । इन्सानियत का । मित्रता का । और उस रिश्ते का जो सामाजिक बन्थनों के कारण अपने समय पर बँध तो जाता है, लेकिन कोई समय आने पर टूटता नहीं है । अन्तर केवल इतना ही होता है कि ऐसे प्यारभरे, अपनत्व लिए, दिल में खामोशी की एक आवाज़ लिए, अपना-अपना दुख-दर्द समेटे हुए-ऐसे बेनाम रिश्तों का कोई नाम नहीं होता है । इस प्रकार के प्यार-भरे रिश्ते कब जुड जाते हैं, इन्सान् महसूस तो कर लेता हैं, परन्तु उनका कोई प्रचार नहीं कर पाता है । शायद ऐसा ही एक रिश्ता उसके और माँझी के बीच में भी है, जिसका सामाजिक कोई नाम नहीं है । केवल इसकी भावनाओँ के ज़रिए दिलों के सहारे महसूस-भर किया जाता है और यह रिश्ता है, प्यार का, मित्रता का, अपनेपन का, मानवता का, एक-दूसरे की शिकायतों से भरा, एक-दूसरे का दुख-दर्द जानने का, बाँटने का- और एक-दूसरे की परिस्थितियों एवं मजबूरियों को समझने का । वह परिस्थितियाँ जिनके वश में आकर मनुष्य वह सबकुछ चाहकर भी नहीं कर पाता है, जिसे वह करना चाहता है ।

शेष अगले अंक मेमें .

माँझी का संसार उजड़ गया...

दिल की सारी हसरतों पर बिजली आग के समान चीख मारकर गिर पड़ी । उसके प्यार का हश्र इतना बुरा भी हो सकता है । ऐसा तो उसने कभी सोचा भी नहीं था ।

......

-आगे अभी और है. तीसरा भाग शीघ्र ही आयेगा.