Hanuman Prasad Poddar ji - 20 books and stories free download online pdf in Hindi

हनुमान प्रसाद पोद्दार जी (श्रीभाई जी) - 20

जीवनोपरान्त भगवद्दर्शनों की बातें प्रकट करने से लाभ
जसीडीह में भगवान् के साक्षात् दर्शनों की बातें बहुत ही थोड़े समय में दूर-दूर के स्थानों में पहुँच गई थी– विशेषतया जहाँ श्रीसेठ जी एवं भाई जी के परिचित लोग रहते थे। बम्बई में भी भाईजी के बहुत से व्यापारी मित्रों को भी समाचार मिलने में देरी नहीं लगी। घटना कुछ ऐसी हुई थी जिस पर हर एक को विश्वास होने में भी कठिनता होती थी। कुछ मित्रों से भाईजी की बहुत घनिष्ठता थी। ऐसे मित्रों के भाईजी के पास पत्र आने लगे। कुछ मित्र भाईजी से पूरा विवरण चाहते, कुछ भाईजी की स्वीकारोक्ति चाहते। यह विश्वास तो सभी को था कि भाईजी जरा भी असत्य नहीं लिखेंगे। ऐसे ही एक मित्र थे प्रतिष्ठित व्यावसायी श्री बालकृष्णलाल जी पोद्दार (सर्वश्री ताराचन्द घनश्यामदास) जिन्होंने बम्बई से पत्र दिया एवं भगवान् के साक्षात् दर्शनों के सम्बन्ध में कई प्रश्न किये। भाईजी ने जो उत्तर दिया वह नीचे दिया जा रहा है जिसमें भाईजी ने स्पष्ट लिखा कि ऐसी बातों का जीवनकाल में प्रकाशन अच्छा नहीं रहता, मरने के बाद होने में कोई आपत्ति नहीं बल्कि लोगों को लाभ होता है।
यह बात तो निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि सभी संतों ने नाम एवं रूप को मिथ्या कहा है एवं मिथ्या के प्रचार का विरोध किया है। जो सच्चा संत होगा वह कभी अपने नाम-रूप का प्रचार नहीं चाहेगा। पर यह भी परम सत्य है कि संतों के चरित्र से जीवों का परम कल्याण होता है एवं साधकों को विशेष सहायता एवं प्रेरणा मिलती है। इसीलिये हमारे पुराणों में संतों के चरित्र भरे पड़े हैं एवं गीताप्रेस से श्रीसेठ जी एवं श्रीभाई जी ने विपुल मात्रा में अर्वाचीन संतों के विस्तृत जीवन-चरित्र प्रकाशित किये। वैसे तो स्वयं भाईजी ने अपनी जीवनी लिखने का घोर विरोध किया एवं उनके जीवनकाल में जब-जब उनके मित्र विद्वानों ने ऐसा प्रयास शुरू किया भाईजी ने तत्काल उसे कड़ाई से रोक दिया। यहाँ तक कि अपने अन्तिम दिनों में लिखे वसीयत नामें में भी उन्होंने इस विरोध का उल्लेख किया। पर जीवनोपरान्त ऐसी सत्य घटनाओं से लोगों को लाभ होता है यह इस पत्र से स्पष्ट ही है। श्रीसेठजी ने भी वि०सं० १९८४ मार्गशीर्ष कृ० ६ को अपनी जीवनी के नोट स्वयं बोल-बोलकर भाईजी को लिखाने शुरू किये थे। वे नोट भाईजी के हाथ से लिखे हुए अभी भी सुरक्षित हैं। यह क्रम कई दिन चला। फिर बीच में एक ऐसी दुर्घटना हो गई जिससे यह कार्य सर्वथा बन्द कर दिया गया। इतना ही नहीं एक पत्र स्वयं श्रीसेठजी के हाथ का श्री ज्वाला प्रसाद जी कानोडिया को लिखा मिला जिसमें उनको अपनी (श्रीसेठ जी) फोटो तैयार कराकर बाँकुड़ा भेजने का लिखा था तथा साथ में यह भी लिखा था कि आप भी रखना चाहें तो रख सकते हैं। इससे यह स्पष्ट ही है कि श्रीसेठ जी जो जीवनी एवं फोटो का विरोध करते थे वह उस दुर्घटना के बाद ही करना प्रारम्भ किया। भाईजी का पत्र इस तरह है।

डिबरूगढ़, मार्गशीर्ष शु० ५ सं० १९८४
प्रिय भाई बालकृष्णलाल जी पोद्दार
सप्रेम राम राम। आपका कृपा पत्र गोरखपुर के मार्फत मुझे कल रात को यहाँ मिला। इधर चले आने के कारण समय पर उत्तर नहीं दिया जा सका इसके लिये क्षमा प्रार्थी हूँ। बहुत दिनों बाद आपने पत्र लिखा, परन्तु कृपा पूर्वक स्मरण रक्खा, इसके लिये मैं आपका अभारी हूँ। आपकी स्मृति मुझे बहुत बार हो जाया करती है। आपका सरल स्वभाव स्मरण होने पर मन खिंचता है।
एक और अनुरोध है यथा संभव फैशन तथा पाश्चात्य सभ्यता के बढ़ते हुए अनुराग को घटाने की कृपा
करें ।
भगवत् सम्बन्ध में आपके प्रश्न का मैं इस समय विशेष ब्यौरेवार उत्तर देने में असमर्थ हूँ। यह विषय वास्तव में गोपनीय से भी परम गोपनीय हुआ करता है। ऐसी बातों के विस्तार पाने से उल्टी मर्यादा घटने की संभावना समझी जाती है। ऐसी किसी बात का प्रकाशन और प्रचार उसके जीवनकाल में न होना ही अच्छा है। मरने के बाद हो तो कोई आपत्ति नहीं, बल्कि उससे लोगों को लाभ ही होता है। कई भक्तों की ऐसी विलक्षण बातें तो उनके मरने के बाद भी प्रकाशित नहीं होती। क्योंकि वे अपने जीवनकाल में इसे इतना गुप्त रखते हैं कि सर्वज्ञ परमात्मा और उनके सिवा तीसरा कोई जानता ही नहीं। प्रेमी और प्रेमास्पद की गुप्त क्रीड़ाएँ प्रकाश करने की चीज नहीं हुआ करतीं। जिसको जैसा सौभाग्य प्राप्त हुआ है उसे प्रकाशित करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। प्रकाशन केवल दो कारणों से हो सकता है।
(१) जगत् के लाभ के लिये और
(२) जगत् के मान बड़ाई, पूजा प्राप्त करने के लिये।
इनमें से जो दूसरे उद्देश्य के लिये इस बात का प्रकाश करता है, उसे या तो परमात्मा के दर्शन कभी हुए ही नहीं, वह मिथ्या भाषण करता है अथवा वह उसका महत्त्व नहीं समझता। जिसको ऐसा महान सौभाग्य मिल जाता है वह जगत् से मिलने वाली मान-बड़ाई क्यों चाहेगा। उसे जो ऊँचे-से-ऊँचा मान मिला है, क्या उससे भी ऊँचा कोई मान है? जगत् की मान-बड़ाई तो तुच्छ, अतितुच्छ है, उसकी तरफ तो वह आँख उठाकर भी नहीं ताकता। जगत् के मान-अपमान की जैसे परवा नहीं होती। वह केवल विभोर रहता है अपने प्रेमी के मिलन की मस्ती में। वास्तव में उसकी दृष्टि में केवल उसका एक प्रियतम ही बच रहता है, और कोई रह ही नहीं जाता, तब वह मान-बड़ाई किससे और कैसी चाहे ?
उत्तम के अस बस मनमाहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।।
रही जगत् के लाभ की बात सो यह भी उस गुप्त रहस्य-प्रकाशन से ही नहीं होता। यह तो संभव नहीं कि वह पापी, पुण्यात्मा, तर्की, कुतर्की, बुरे, भले सबको ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन करवा दे क्योंकि ईश्वर कोई उसके इशारे पर नाचने वाली कठपुतली नहीं है। दूसरे ऐसा नियम भी नहीं है कि सबको प्रत्यक्ष हो जाय। और यदि ऐसा हो भी जाय तो मानता कौन है। भगवान् कृष्ण ने दुर्योधन की राजसभा में सबके सामने अपना विराट रूप दिखलाया। जानने वाले उसे देखकर मुग्ध हो गये। अविश्वासी दुर्योधन ने कहा कि यह मायावी की माया है, जादू है उसने विश्वास नहीं किया।
जब साक्षात् भगवान् को ही लोग मानना स्वीकार नहीं करते, तब यदि कोई अपने मुँह से कहे कि मेरे साथ कोई ऐसी घटना हुई है तो उसकी बात कौन माने ? सन्देह, शंका, कुतर्क, व्यंग और खण्डन करने वाले बहुत मिल सकते हैं। यद्यपि उसे सन्देह से लेकर कुतर्क पर्यन्त किसी भी बात का भय या परवाह नहीं है, तथापि इसमें उसके प्राणाधिक प्रियतम का तिरस्कार होता है, ऐसी भावना से भी वह ऐसी गुप्त बातें प्रकाशित नहीं करता। कर दे तो वास्तव में उसका या उसके प्रियतम का वस्तुतः किसी भी काल में कोई नुकसान नहीं होता परन्तु कई कारणों से लोगों को नुकसान पहुँच जाता है। इससे कहना नहीं बन पड़ता और न इन बातों के कहने से जगत् का लाभ ही सब जगह होता है। अधिकांश सुनने और पूछने वाले कौतूहल से ही पूछना चाहते हैं। बात सुनने के बाद कुछ तर्क वितर्क के बाद कौतूहल शान्त हो जाता है। नाटक के ड्राप सीन की भाँति खेल खत्म हुआ, इससे प्रायः ऐसी महान् घटनाओं की अवमानना ही होती है। इस स्थिति में किसी भी साधारण हेतु से उस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जाता। इतनी बातें आपके सन्तोष और विषय का नियम बतलाने के उद्देश्य से लिखी गई है।
੦ ੦ ੦ अभी तो केवल इतना ही आपको लिखा जा सकता है कि यदि आप उचित समझें तो आपको उस बात पर विश्वास करना चाहिये कि तीव्र आकांक्षा और साधना होने पर भगवत् कृपा से किसी के लिये भी ऐसा होना सम्भव है।
एक अनुरोध और वह है जोर के साथ। कृपापूर्वक भगवान् के नाम का स्मरण आप जितना बढ़ा सकें उतना ही बढाना चाहिये। इससे सब कुछ हो सकता है। नाम स्मरण होना चाहिये, विशुद्ध प्रेम भाव से। कहीं कामना का कलंक न रह जाय।
यह पत्र प्राईवेट है इसे पढ़कर या तो लौटा देना चाहिये या अपने पास अलग सुरक्षित रखना चाहिये। अथवा फाड़कर फेंक देना चाहिये, दूसरे लोग नहीं पढ़े तो ठीक हैं।
आपका — हनुमान