Banzaran - 10 in Hindi Thriller by Ritesh Kushwaha books and stories PDF | बंजारन - 10

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बंजारन - 10

शालिनी की बात सुनकर रितिक का तो रोना ही निकल आता है। लेकिन फिर भी वो जल्दी से किसी फिल्म का डायलॉग सोचता है और फिर से अपनी बात दोहराता है–" आप हाथ मत जोड़िए, आप बड़े है मुझसे और रही बात आपकी इज्जत की तो हर खानदान की इज्जत उसकी मां बेटियां होती है और किसी की मां बेटियों के साथ गलत होते हुए मै कैसे देख सकता हूं? मैं भी इंसान हूं और ये सब मैने इंसानियत के नाते ही कीया है।"

रितिक की बात सुन ठाकुर साहब के चहरे पर एक मुस्कान आ जाती है और उनके मन में रितिक के लिए इज्जत और सम्मान और बड़ जाता है। ठाकर साहब आगे कहते है–" ये तो तुम्हारा बड़प्पन है, तुम जरूर ही किसी इज्जतदार खानदान से होंगे। तुमने हमारे लिए जो किया है उसके लिए हम तुम्हे जुबान देते है, अगर जिंदगी में कभी किसी चीज की जरूरत हो तो बेहिचक हमसे आकर मांग लेना।"

" जी..." रितिक हा में अपना सिर हिला देता है। ठाकुर साहब आगे कहते है–" और हा एक और बात, जिसके साथ तुम्हारी हाथापाई हुई है वो तारपुरा गांव के सरपंच वीरेंद्र चौधरी का बेटा है, इसीलिए संभालकर रहना, वो तुम्हे नुकसान भी पहुंचा सकता है, खैर हमारे होते हुए वो तुम्हे छू भी नहीं सकता लेकिन फिर भी, सावधानी बरतना समझदार लोगो की निशानी होती है।"

सब लोग हा में अपना सिर हिला देते है। ठाकुर साहब कुछ देर रुकते है और फिर रितिक से कहते है–" तुम्हे उस मनोज को जिंदा नही छोड़ना था, वही के वही खत्म कर देना था, खैर कोई बात नही, ये काम मेरे हाथों ही लिखा है।"

ठाकुर साहब की बात सुन उन चारो के तो होश ही उड़ गए। उन्हे अंदेशा हो गया था कि हवेली के बाहर इतनी भीड़ क्यूं जाम थी? फिर भी कन्फर्म करने के लिए अमर उनसे पूछ ही लेता है–" वैसे हवेली के बाहर इतनी भीड़ क्यू जमा है?"

ठाकुर साहब जवाब देते हुए कहते है–" हम अपने आदमियों को लेकर तारपुरा गांव जा रहे है। जब तक वो मनोज का बच्चा मर नही जाता तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे। तुम लोगो को यहां इसीलिए बुलाया है ताकि तुम लोग मेरी गैर मौजूदगी में यहां की रखवाली कर सको। मुझे अंदेशा है उस मनोज ने अपने बाप को सारा किस्सा बता दिया होगा इसीलिए वो भी पूरी तैयारी के साथ बैठा होगा, या ये हो सकता है उसने अपने आदमी पहले से ही यहां भेज दिए हो।"

ठाकुर साहब ने इतना कहा ही था कि तभी मोहन कमरे में भागता हुआ आता है और हाफते हुए कहता है–" लाश...."

मोहन को हड़बड़ाते देख वहा खड़े सभी लोग हैरान हो जाते है और मोहन की ओर देखने लगते है। ठाकुर साहब हैरानी के साथ उससे पूछते है–" क्या हुआ?"

मोहन घबराते हुए कहता है–" कब्र में किसी की लाश है.."

मोहन की बात सुन वहा खड़े सभी लोग शौक हो जाते है।

ठाकुर साहब चिड़ते हुए मोहन से कहता है–" ये क्या बकवास कर रहे हो, कब्र में लाश कहा से आई, कल तक तो वो कब्र खाली थी?"

मोहन अपनी सफाई देते हुए कहता है–" मैं झूट नही कह रहा हूं, मैने खुद अपनी आंखो से देखा है।"

" कब देखा था?"

" थोड़ी देर पहले, मैं कब्र के पास से ही आ रहा हूं, पूरे गांव वहा पर इकट्ठा है।"

" अच्छा..." ठाकुर साहब हैरानी के साथ कहते है और फिर कुछ देर सोचते हुए मोहन से कहते है–" ठीक है, हम आते है और फिर रितिक की ओर देखते हुए कहते है–" तुम लोग यही रुको, हम जरा अभी आते है।"

करन ठाकुर साहब से कहता है–" हम अभी आपके साथ आते है।"

" ठीक है.." इतना कहकर ठाकुर साहब वहा से चले जाते है। ठाकुर साहब और मोहन के जाने के बाद शालिनी रितिक के पास आती है और कहती है–" कल रात मैं तुम्हे शुक्रिया नही बोल पाई थी इसीलिए शुक्रिया मेरी जान बचाने के लिए।"

शालिनी की बात सुन रोमियो आगे आता है और मुस्कुराते हुए कहता है–" इसमें शुक्रिया की क्या बात है, ये तो हमारा फर्ज था।"

रोमियो की बात सुन शालिनी उसे घूरने लगती और कहती है–" तुमसे शुक्रिया किसने कहा?, लगता है कमली से तुम्हारी शिकायत करनी पड़ेगी, तुम कुछ ज्यादा ही बोलने लगे हो।"

शालिनी की बात सुन रोमियो घबरा जाता है और हड़बड़ाते हुए कहता है–" अरे वो मैं तो बस..."

शालिनी रोमियो को बीच में टोकते हुए कहती है–" बस बस..." इतना कहकर वो रितिक से कहती है–" शुक्रिया मेरी जान बचाने के लिए।"

इस पर रितिक उससे कहता है–" कोई बात नही, हम दोस्त है, एक दूसरे की मदद करना तो हमारा फर्ज है।"

इतना कहकर वो मुस्कुराने लग जाता है और शालिनी को कुछ इशारे करने लगता है। रितिक का इशारा समझ शालिनी मुस्कुराते हुए उससे कहती है–" हा क्यूं नही?, हम दोस्त है और दोस्त की मदद करना मेरा फर्ज बनता है।"

शालिनी समझ जाती है रितिक उससे क्या कहना चाहता है?, उसे पता था कि रितिक चांदनी को पसंद करता है इसीलिए वो आगे उससे कहती है–" वैसे तुम यहां भंडारा खाने आए थे।"

शालिनी की बात सुन रितिक का मुंह उतर जाता है और उसका चहरा शर्म से लाल हो जाता है। उसने तो सोचा था शालिनी की मदद से वो चांदनी के करीब जा पाएगा लेकिन उसने ये नही सोचा था कि शालिनी उसकी ही बेजजती कर देगी, वो भी चांदनी के सामने।

रितिक मन ही मन शालिनी को कोसने लगता है और इधर शालिनी आगे उससे कहती है–" भंडारा तो यहां नही है, लेकिन हा.. तुम्हे चांदनी के हाथों का खाना जरूर मिल जाएगा, क्यूं चांदनी...?"

इतना कहकर शालिनी चांदनी को छेड़ने लगती है। शालिनी की बात सुन चांदनी के चहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ जाती है और वो रितिक की ओर देखने लगती है। चांदनी कुछ कहना चाह रही थी पर उसके शब्द उसके होंठो से निकल ही नही रहे थे। चांदनी रितिक की ओर देखते हुए हां में अपना सर हिला देती है और वहा से चली जाती है। चांदनी के इस अंदाज से रितिक तो बेचारा मर ही गया था। शालिनी चिड़ते हुए रितिक से कहती है–" तुम कितने भोंदू हो ना.."

शालिनी की बात सुन रितिक कंफ्यूज हो जाता है और कहता है–" मैं भोंदू हूं... मेरा मतलब मैं तुम्हे भोंदू लगता हूं।"

इस कर रोमियो शालिनी से कहता है–" ये तो बचपन से ही ऐसा है।"

रोमियो की बात सुन शालिनी उसे घूरने लग जाती है। शालिनी को घूरता देख रोमियो इधर उधर देखने लग जाता है। करन चिड़ते हुए रोमियो से कहता है–" तेरा मुंह बंद नही रहता ना।"

रोमियो कहता है–" मैने क्या किया?"

शालिनी दोबारा रितिक से कहती है–" मैं खाना बनाने जा रही हूं, तुम लोग भी खाना खाने आ जाना।"

इतना कहकर वो भी वहा से चली जाती है और इधर रितिक हैरान परेशान सा बस उसे देखता ही रहता है।

रितिक अमर से कहता है–" इसने मुझे भोंदू क्यूं कहा?"

रोमियो कहता है–" क्योंकि तू है भोंदू?"

" मतलब.." रितिक कन्फ्यूजन के साथ पूछता है। रितिक को कंफ्यूज देख अमर उससे कहता है–" वो बस मजाक कर रही थी।"

अमर की बात सुन रितिक करन की ओर देखता है और वो भी हा में अपना सिर हिला देता है।

अमर उन तीनों से कहता है–" ये मोहन क्या कह रहा था, कब्र के पास लाश मिली है?"

करन कहता है–" लेकिन ये कैसे हो सकता है, कल देर रात तक तो हम लोग ही वहा पर आए थे, तब तो वहा कुछ नही था।"

रितिक कुछ सोचते हुए कहता है–" हो सकता है हमारे जाने के बाद कुछ हुआ हो?, चल चलकर देखते है, माजरा क्या है?"

" हा.." सब लोग हा में अपना सिर हिलाते है और हवेली से बाहर आ जाते है। हवेली से बाहर आकर वे लोग सीधे मैदान की ओर जाने लगते है। दूर से ही मैदान में लोगो की भीड़ जमा थी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा गांव वहा पर जमा हो। सब लोग डरे हुए थे और आपस से खुसुर पुसुर कर रहे थे।

वे लोग भीड़ को साइड करते हुए कब्र की ओर जाने लगते है। तभी गांव का एक बुजुर्ग कहता है–" मैने तो पहले ही कहा था, वो आजाद हो गई है, अब मौत का सिलसिला फिर से चालू होगा।"

उस बुजुर्ग की बात सुन रितिक अपनी जगह कर ही रुक जाता है और घबराने लगता है। रितिक को रोका देख अमर उससे कहता है–" रुक क्यू गया, आगे चल ना।"

अमर की बात सुन रितिक वापस से आगे की ओर जाने लगता है। भीड़ को साइड में करके वे लोग कब्र के पास पहुंच जाते है। कब्र के पास ही एक लाश पड़ी हुई थी, जो एकदम सफेद थी। ऐसा लग रहा था जैसे उस लाश में एक भी बूंद खून ना बचा हो। लाश के कपड़े जगह जगह से फटे हुए थे। कब्र से कुछ दूरी पर ही ठाकुर साहब और मोहन खड़े थे, जिनके चहरे पर दहशत के भाव नजर आ रहे थे। लाश का सर एक बुजुर्ग आदमी की गोद में रखा था और वो फूट फूटकर रो रहा था। ये आदमी कोई और नहीं बल्कि " बिरेंद्र " था और जिसकी लाश उसकी गोद में रखी थी वो उसके बेटे " मनोज " की लाश थी।

जब विरेंद को पता चला कि उसके बेटे की लाश अमरपुरा गांव में पड़ी है तो वो तुरंत ही अपने आदमियों को लेकर वहा पहुंच गया। विरेंड खड़ा होता है और गुस्से के साथ चिल्लाता है–" किसने मारा है मेरे बच्चे को?"

इस पर ठाकुर साहब हस्ते हुए उससे कहते है–" अच्छा हुआ ये खुद व खुद मर गया, बरना आज तो मैं इसे जिंदा ही नही छोड़ता।"

" जवान संभाल कर बात करो रणवीर..." वीरेंद्र गुस्से के साथ ठाकुर साहब से कहता है। इस पर ठाकुर साहब भी गुस्से के साथ जवाब देते है–" तुम शायद भूल रहे हो, ये तुम्हारा नही हमारा गांव है और हमारे एक इशारे पर तुम्हारे सौ टुकड़े हो जाएंगे। तुम्हारे इस नलानक बेटे ने हमारे गांव की इज्जत पर हाथ डाला है, इसका तो यही हाल होना था, चाहे हम करते या कोई और।"

ठाकुर साहब की बात सुन वीरेंद्र हैरान हो जाता है और हैरानी के साथ ठाकुर साहब से कहता है–" ये क्या बकवास कर रहे हो?"

" हम सही कह रहे है। तुम्हारे इस नालायक बेटे ने हमारे गांव की एक अबला स्त्री के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की है। क्या यही परवरिश दी है तुमने अपने बेटे को?, अरे मां बेटी तो घर की लक्ष्मी होती है, उनकी पूजा करते है, सम्मान देते है, उनका अनादर नही करते, लेकिन तुम्हारे लड़के ने..."

ठाकुर साहब बोलते जा रहे थे और वीरेंद्र सुनता जा रहा था। आखिर सुने भी क्यों ना, गलती खुद के लड़के की जो थी। ठीक ही कहा है जमाने ने, गलती बच्चे करते है और नाम मां बाप का खराब होता है।

वीरेंद्र अपने आंसू पूछते हुए कहता है–" मैं मानता हूं मेरे बेटे ने एक घिनौना अपराध किया है लेकिन इस अपराध की सजा मौत तो नही हो सकती।"

इस पर ठाकुर साहब कहते है–" इतिहास गवाह रहा है, जब जब भी किसी स्त्री के मान सम्मान को ठेस पहुंची है, तब तब रामायण और महाभारत जैसे युद्ध हुए है। मौत तो बस एक छोटी सी सजा है, इस अपराध के लिए तो भगवान भी कभी माफ नहीं करेंगे।"

" अगर तुमने नही तो फिर किसने मारा है मेरे बेटे को, एक बार उस इंसान का नाम बता दो, मां भवानी की सौगंध, मैं उसका नामोनिशान मिटा दूंगा।"

इतना कहकर वीरेंद्र ठाकुर साहब की ओर देखने लगता है। वीरेंद्र को अपनी ओर देखता देख ठाकुर साहब अपने कंधे उचकाते हुए कहते है–" हमे इस बारे में कुछ नही पता।"

इधर रितिक और उसके दोस्त काफी ज्यादा हैरान थे। करन धीरे से रितिक के कान में कहता है–" तूने सच में इसे जान से मार दिया।"

रितिक ना में अपना सिर हिलाते हुए कहता है–" नही.. मैने इसे नही मारा, मैने तो बस इसे बेहोश किया था।"

करन आगे कहता है–" तो फिर किसने मारा है इसे।"

करन का सवाल सुन रितिक एक पल को मौन हो जाता है और पलटकर कुछ नही कहता है।

तभी अमर को कुछ ध्यान आता है और वो रितिक से कहता है–" क्या कल कुछ और भी ऐसा हुआ था जो नही होना चाहिए था?"

अमर का सवाल सुन रितिक हा में अपना सिर हिला देता है। अमर आगे कहता है–" क्या हुआ था?"

रितिक उसे शांत करते हुए कहता है–" यहां नही, घर चलकर बताता हूं।"