Hanuman Prasad Poddar ji - 26 books and stories free download online pdf in Hindi

हनुमान प्रसाद पोद्दार जी (श्रीभाई जी) - 26

भगवन्नाम-प्रचार की द्वितीय योजना

कलियुगमें भगवन्नाम ही सर्वोपरि साधन है और भगवान्ने प्रत्यक्ष प्रकट होकर इसी के प्रचारका आदेश भाईजी को दिया था। भाईजी इसे आज के युगमें सर्व-सुलभ एवं सर्वोत्कृष्ट साधन मानते थे। अपने एक प्रेमी के विदा होते समय भगवन्नाम-महिमा के सम्बन्धमें भाईजी ने कहा था कि मेरी तो First, last and latest Discovery (प्रथम, अन्तिम और नवीनतम आविष्कार) यही है कि अपना कल्याण चाहने वाला व्यक्ति नामका आश्रय पकड़ ले। और साधन हो सके तो अवश्य करे, किसी का विरोध नहीं है, परंतु और कुछ भी न हो सके तो केवल जीभ से निरन्तर नाम-जप करता रहे।

पहली योजनामें भाईजी अपने परिकरों के साथ स्थान-स्थान पर स्वयं गये और नाम की महिमा सुनाकर लोगों को नाम-जप में लगाया। इतने से भाईजी को संतोष नहीं हुआ तब योजना बनायी कि जैसे चैतन्य महाप्रभु के भक्त-गण ग्राम-ग्राममें जाकर नाम-प्रचार करते थे, वैसे ही कुछ सच्चे साधक तैयार किये जायँ जो स्थान-स्थान पर जाकर संकीर्तन का आयोजन करके लोगों को नाम-जप-कीर्तनमें लगायें। इसी निमित्तसे सर्वप्रथम श्रीप्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी से पत्र-व्यवहार करके उन्हें समझाकर ऐसे ही साधकों के लिये कुछ नियम बनाकर सं० 1991 (सन् 1935) के अन्तमें झूंसी में छः महीने का अखण्ड-हरिनाम संकीर्तन का अनुष्ठान का आयोजन कराया। लगभग पैंतीस-चालीस साधक उसमें सम्मिलित हुए, किन्तु पूरी तत्परता से साधन करने वाले न मिलने से ब्रह्मचारीजी का उत्साह कम हो गया। उन्हें नवीन उत्साह दिलाने के लिये भाईजी अपने प्रेमी-परिकरों के साथ भाद्र कृष्ण 14 सं० 1992 (27 अगस्त, 1935) को संकीर्तन आयोजनमें सम्मिलित होने झूंसी गये। भाईजी के जाने से उस संकीर्तनमें प्राण आ गये एवं पुनः नवीन उत्साह से ब्रह्मचारीजी ने अखण्ड-संकीर्तन का आयोजन छः महीनों के लिये और बढ़ा दिया। ब्रह्मचारीजी के उत्साह बढ़ाने के लिये भाईजी ने पाँच चुने हुए साधकों को गोरखपुर से भेजने का वचन दिया। भाद्र शुक्ल 4 सं० 1992 (2 सितम्बर, 1935) को गोरखपुर पहुँचकर भाईजी ने पाँच साधकों को झूसी भेजा। ऐसे साधकों के सम्मिलित होने से, अन्य साधकोंमें भी उत्साह की लहर आ गयी। साधकों के लिये प्रमुख नियम थे– छः महीने तक पूर्ण मौन रहना, प्रतिदिन एक लाख नाम-जप करना, चार घंटे अखण्ड-संकीर्तनमें समय देना, हल्का फलाहार करना। इससे साधकों के जीवनमें ठोस आध्यात्मिक प्रगति हुई। सफलतापूर्वक सम्पन्न होने से भाईजी को बड़ी प्रसन्न्ता हुई।

झँसीमें पुनः अखण्ड–संकीर्तन का अनुष्ठान प्रारम्भ करा भाई जी चुपचाप नहीं बैठे। बरहज के परमहंस आश्रम के बाबा राघवदासजी के शिष्य ब्रह्मचारी सत्यव्रतजी को प्रेरणा देकर झँसी की भाँति बरहज में भी अखण्ड-संकीर्तन का आयोजन संगठित कराने के लिये भाईजी स्वयं कार्तिक शुक्ल 5 सं० 1992 (1 नवम्बर, 1935) को बरहज गये। भाईजी के जाने से अखण्ड-संकीर्तन अनुष्ठान प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया। कार्तिक शुक्ल 11 सं० 1992 (7 नवम्बर, 1935) को पुनः बरहज गये एवं अपने ओजस्वी प्रवचन से साधकों का उत्साहवर्धन करते हुए अनुष्ठानका श्रीगणेश कराया।

बरहज से लौटने के बाद भाईजी के मनमें संकल्प हुआ कि सबको उत्साह दिलाने के लिये एवं साधकों को ठोस लाभ प्रदान करने के लिये गोरखपुरमें अपने निवास स्थान वाली वाटिकामें भी एक वर्ष के अखण्ड-संकीर्तन का विस्तृत आयोजन किया जाय। सर्वप्रथम श्रीसेठजी से परामर्श करके निर्णय लिया गया। फिर मुनीलाल जी (स्वामी सनातनदेव जी) को अयोध्या भेजकर श्रीप्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी से इस आयोजन के मुख्य संचालक का भार वहन करने की स्वीकृति ली गयी। तत्पश्चात् वाटिकामें बड़े पंडाल एवं साधकों–अतिथियों के निवास के लिये कुटियाओं का प्रबन्ध किया गया। भाई जी बैसाख कृष्ण पक्ष सं० 1993 (मार्च-अप्रैल 1935) को कानपुर गये और संत एकरसानन्दजी से उनके प्रधान शिष्य स्वामी नारदानन्द जी, स्वामी शुकदेवानन्द जी एवं स्वामी भजनानन्द जी सहित गोरखपुर के अखण्ड-संकीर्तन यज्ञमें सम्मिलित होनेकी स्वीकृति लेकर लौटे।

संकीर्तन–महायज्ञ आषाढ़ शुक्ल 11 सं० 1993 (30 जून, 1936) को प्रारम्भ हुआ। प्रातःकाल श्रीप्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी अपनी मण्डली सहित गोरखपुर पहुँचे। स्टेशन पर स्वागत के लिये भाईजी अपने परिकरों सहित उपस्थित थे। बाहर से और कीर्तन मण्डलियाँ आयीं थी। वहीं से सब लोगों ने उत्साहपूर्वक उद्दाम संकीर्तन करते हुए जुलूस बनाकर वाटिका की ओर प्रस्थान किया। श्रीब्रह्मचारी जी कई वर्षों से मौन रहते थे। आषाढ़ शुक्ल ੧3 सं० 1963 (2 जुलाई, 1936) को मध्याहमें गीताप्रेस से इस महायज्ञ का सज-धज के साथ नगर-संकीर्तन का आयोजन किया गया, जिसमें अपार जनसमूह सम्मिलित हुआ। भाईजी अपने परिकरों सहित मस्तीमें नृत्य करते हुए संकीर्तन के समय अनेक बार बाह्य-ज्ञान शून्य हो गये। जिन भाग्यवान् लोगों ने उस समय भाईजी को संकीर्तनकी मस्तीमें डूबते देखा वे उस मुद्रा को भूल नहीं सकते। वह अपार जनसमूह संकीर्तनमें झूमता हुआ रात्रि के नौ बजे भाईजी के निवास स्थानपर पहुँचा। वाटिकामें प्रसाद-वितरण के पश्चात् उस दिन का आयोजन सम्पन्न हुआ।

विस्तारभय से इस एक वर्ष के अखण्ड-संकीर्तन यज्ञ का पूरा विवरण यहाँ देना सम्भव नहीं है। भावुक जन अनुमान लगा सकते हैं। बहुत से संत समय-समयपर बाहर से पधारकर इस यज्ञमें सम्मिलित होते रहे। स्वामी एकरसानन्द जी, स्वामी नारदानन्द जी, स्वामी शुकदेवानन्द जी, स्वामी भजनानन्द जी, नागाबाबा, स्वामी अखण्डानन्दजी (अहमदाबादवाले), श्रीजयरामदास 'दीन' रामायणी स्वामी रामदासजी महाराज आदि महात्माओं के पधारने से एवं भाईजी, श्रीसेठजी और श्रीप्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी की उपस्थितिमें यह यज्ञ बहुत ही सफल रहा। पं० जवाहरलाल नेहरू भी संकीर्तन के दर्शन करने वाटिकामें पधारे थे। देवर्षि नारद एवं महर्षि अंगिरा ने भी इसी बीच भाईजी को प्रत्यक्ष दर्शन देकर उनसे वार्तालाप किया। अनेकों संत-महात्मा बिना परिचय के आकर सम्मिलित होकर चले जाते। ऐसे ही एक मौनी महात्मा ज्येष्ठ शुक्ल 2 सं० 1994 (10 जून, 1937) को पधारे और वाटिका के कथाभवनमें विराज गये। किसीने कुछ दे दिया तो प्रसाद पा लिया अन्यथा संकेत आदि भी नहीं करते थे। ऐसा भी हुआ कि साधक आये तो अखण्ड-कीर्तनमें सम्मिलित होनेके लिये पर फिर आजीवन वहीं रह गये। श्रीदौलतरामजी तांबी जो उज्जैन के रहने वाले थे, अखण्ड-कीर्तनमें चार महीने साधक रूपसे सम्मिलित होने आये थे, पर सात्त्विक वातावरणसे प्रभावित होकर आजीवन रह गये।

आषाढ़ कृष्ण 1 सं० 1994 (24 जून, 1937) को इस अखण्ड-संकीर्तन यज्ञ का समापन हुआ। उस दिन नाम-महिमापर बड़ा विलक्षण प्रवचन करते हुए भाईजी ने कहा—“नामने ही इस यज्ञ को एक वर्ष तक चलाया। उनकी कृपासे सारे विध्न टल गये। आग लगी पर किसी को आँच नहीं आयी, प्लेग फैला पर किसी को टीका न लगानेपर भी कुछ नहीं हुआ। आप नाम-जप का नियम लें, यदि यह नियम चलता रहा तो शब्द याद रखिये– ‘भगवान् मिल जायँगे।’ नामसे मेरेको जो लाभ हुआ है, वह मैं कह नहीं सकता। नाम असम्भव को सम्भव कर सकता ही नहीं, करता है। आप नाम-जपकी प्रतिज्ञा कीजिये–निभायेंगे भगवान्।”

इस संकीर्तन-यज्ञ के सम्बन्धमें श्रीप्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी ने अपने संस्मरणमें लिखा–
इसके लिये सारी व्यवस्था भाईजी ने की। किन्तु अपना नाम कहीं भी नहीं दिया, सब मेरे ही नामसे करते रहे। हमारे साथ दस-बारह साधक थे, सबके ठहरने, खाने-पीने और सवारी का जैसा प्रबन्ध किया, वे सब बातें जब याद आती हैं तो हृदयमें हूक-सी उठती है। उन दिनों कैसा सुन्दर सत्संग होता था। न जाने कितने अच्छे-से-अच्छे विद्वान बैठकर भगवत्-चर्चा किया करते थे। 'ते ही नो दिवसा गता'––हाय! वे हमारे दिन चले गये और ऐसे गये कि फिर लौटकर नहीं आने के।