Ek Yogi ki Aatmkatha - 22 in Hindi Spiritual Stories by Ira books and stories PDF | एक योगी की आत्मकथा - 22

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एक योगी की आत्मकथा - 22

{ पाषाण प्रतिमा का हृदय }

“मैं एक पति-परायणा हिन्दू नारी हूँ। मेरा उद्देश्य अपने पति की शिकायत करना नहीं है, पर मेरी यह तीव्र इच्छा है कि उनके भौतिकतावादी विचारों में परिवर्तन हो। मेरे ध्यान के कमरे में लगी संतों की तस्वीरों का मज़ाक उड़ाने में उन्हें बड़ा आनन्द आता है। मेरे भाई, मुझे पूरा विश्वास है कि तुम उन्हें बदल सकते हो। बोलो, क्या यह काम करोगे ?”

मेरी सबसे बड़ी बहन रमा अनुनयपूर्ण दृष्टि से मुझे देख रही थी। मैं थोड़ी देर उनसे मिलने के लिये कोलकाता के गिरीश विद्यारत्न लेन में स्थित उनके घर गया हुआ था। उनके इस अनुनय ने मेरे हृदय को छू लिया, क्योंकि मेरे बाल जीवन पर उन्होंने गहरा आध्यात्मिक प्रभाव डाला था और माँ की मृत्यु के बाद परिवार में आयी रिक्तता को भी भरने का अत्यंत प्रेमपूर्वक प्रयास किया था।

“प्रिय दीदी ! मुझसे जो कुछ भी हो सकता है, वह सब मैं अवश्य करूँगा।” उनके सदा शान्त और प्रफुल्ल चेहरे पर छायी उदासी को दूर करने के उद्देश्य से मैं मुस्कराया।

ईश्वर के मार्गदर्शन के लिये थोड़ी देर रमा दीदी और मैं प्रार्थना करते हुए मौन बैठे रहे। एक वर्ष पूर्व मेरी दीदी ने मुझसे क्रियायोग की दीक्षा ली थी और वे उसमें अच्छी प्रगति भी कर रही थीं।

अचानक मन में एक प्रेरणा उठी। मैंने कहा: “कल मैं दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में जा रहा हूँ। आप मेरे साथ आइये और अपने पतिदेव को भी आने के लिये राजी कर लीजिये। मुझे ऐसा लग रहा है कि उस पवित्र स्थान के स्पन्दनशील वातावरण में जगन्माता उनके हृदय के तार अवश्य छेड़ देंगी। परन्तु उन्हें वहाँ ले जाने के हमारे इस उद्देश्य के बारे में उन्हें कुछ मत बताना।”

आशान्वित होकर दीदी सहमत हो गयीं। दूसरे दिन तड़के ही रमा दीदी और जीजाजी को दक्षिणेश्वर चलने के लिये तैयार देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। अप्पर सर्क्यूलर रोड से हमारी घोड़ागाड़ी दक्षिणेश्वर की ओर चली जा रही थी, और मेरे जीजाजी सतीश चन्द्र बोस गुरुओं की योग्यता का उपहास करने में आनन्द ले रहे थे। मैंने देखा कि रमा दीदी चुपचाप रो रही थीं।

मैं उनके कान में फुसफुसाया: “दीदी, मुस्कराओ! अपने पति को यह सोचकर खुश मत होने दो कि उनके उपहास से हम चिढ़ते हैं।”

“मुकुन्द! तुम्हें ये निकम्मे पाखण्डी अच्छे कैसे लगते हैं ?” सतीश बाबू बोल रहे थे। “साधुओं को तो देखकर ही घिन आती है। या तो वे एकदम हड्डियों का ढाँचा होते हैं, या फिर हाथी की तरह मोटे !”

मैं हँस-हँस के लोटपोट होने लगा। यह प्रतिक्रिया देखकर सतीश बाबू नाराज हो गये और एकदम गुपचुप बैठे रहे। जैसे ही हमारी घोड़ागाड़ी दक्षिणेश्वर के मन्दिर के अहाते में पहुँची, उन्होंने व्यंग्यभरी मुस्कराहट के साथ कहाः
“लगता है यह दक्षिणेश्वर यात्रा मुझे सुधारने के लिये की जा रही है, है न?”

कोई उत्तर दिये बिना ही मैं मुड़ कर जाने लगा, तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा: “जनाब संन्यासी महाशय ! मन्दिर के पदाधिकारियों से बात करके दोपहर के भोजन की ठीक से व्यवस्था करना मत भूलना।” सतीश बाबू पुजारियों के साथ स्वयं बात भी नहीं करना चाहते थे।

“मैं अभी ध्यान करने जा रहा हूँ। भोजन की चिंता मत कीजिये,” मैंने तीखे स्वर में कहा। “जगन्माता उसकी व्यवस्था कर देंगी।”

“मुझे तनिक भी विश्वास नहीं है कि जगन्माता मेरे लिये कुछ भी करेंगी। किन्तु मेरे भोजन की जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है।” सतीश बाबू का स्वर काफी उग्र था।

सामने वाले नाट्यमन्दिर में मैं अकेला चला गया। एक खम्भे के निकट छायादार स्थान देखकर मैं पद्मासन में बैठ गया। अभी तो केवल सात ही बजे थे, परन्तु शीघ्र ही धूप तेज़ होने वाली थी।

मैं भक्ति के गहरे भाव में डूब गया। संसार की सुध-बुध खो गयी। मेरा मन माँ काली पर एकाग्र हो गया था। इसी मन्दिर में उनकी यही मूर्ति महान् सन्त श्रीरामकृष्ण परमहंस की इष्ट आराध्य देवी बनी थी। उनकी कातर पुकार पर यही मूर्ति प्रायः जीवन्त रूप धारण कर उनसे बातचीत करती थी।

“हे पाषाणमयी माँ,” मैं प्रार्थना कर रहा था। “अपने प्रिय भक्त रामकृष्ण की पुकार पर तुम सजीव हो उठती थीं; अपने इस पुत्र के उत्कट विलाप को क्यों नहीं सुनतीं ?”

दिव्य शान्ति के साथ-साथ मेरी आकांक्षा और भी अधिकाधिक गहरी होती गयी। पर जब इस प्रकार पाँच घंटे बीत गये और फिर भी जिस देवी का मैं अपने अंतर में ध्यान कर रहा था, उसकी ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला, तो मुझे थोड़ी निराशा हुई। कभी-कभी प्रार्थना पूर्ति में विलम्ब करके भगवान भक्त की परीक्षा लेते हैं, परन्तु आखिर वे ज़िद्दी भक्त को उसके इष्ट देवता के रूप में दर्शन अवश्य देते हैं। एकनिष्ठ ईसाई भक्त को ईसा मसीह के दर्शन होते हैं, हिन्दू को भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन होते हैं या माँ काली के, या यदि उसकी भक्ति निराकार स्वरूप की ओर मुड़ गयी हो तो प्रसारित होती जाती ज्योति के दर्शन होते हैं।

अनिच्छापूर्वक मैंने आँखें खोलीं, तो एक पुजारी दोपहर के नियम के अनुसार मन्दिर का दरवाजा बन्द कर उसमें ताला लगा रहा था। मैं नाट्यमन्दिर के उस एकान्त स्थान से उठकर मन्दिर के प्रांगण में आया। उसका पत्थर का फर्श दोपहर की धूप में अंगारों के समान दहक रहा था; मेरे नंगे पाँवों के तलवे जल उठे।

मैं नाराज होकर मन ही मन कहने लगा: “माँ! तुमने दर्शन नहीं दिया और अब मन्दिर में बन्द दरवाजे के पीछे भी छुप गयी। मैं अपने बहनोई की ओर से तुमसे एक विशेष प्रार्थना करना चाहता था।”

मेरी यह आन्तरिक प्रार्थना तुरन्त स्वीकृत हो गयी। सर्वप्रथम तो मेरी पीठ और मेरे तलवों के नीचे एक आनन्दप्रद शीतल लहर अनुभव हुई और सारी वेदना दूर हो गयी। उसके बाद मैंने आश्चर्य के साथ देखा कि मन्दिर का आकार अत्यंत विशाल हो गया। उसका विशाल द्वार धीरे-धीरे खुला और माँ काली की पाषाण मूर्ति दिखायी देने लगी। फिर धीरे-धीरे पाषाण मूर्ति जीवन्त रूप में बदल गयी और मेरी ओर देखकर उसने मुस्कराते हुए सिर हिलाया। मैं अवर्णनीय आनन्द से रोमांचित हो उठा। मानों किसी अदृश्य पिचकारी से मेरे फेफड़ो से साँस बाहर खींच ली गयी हो; मेरा शरीर एकदम स्थिर हो गया पर उसमें जड़त्व नहीं था।

इसके बाद मेरी चेतना का परमानन्दमय विस्तार हुआ। मैं बायीं ओर गंगा नदी के ऊपर कई मीलों तक स्पष्ट देख सकता था। उसी तरह मन्दिर के बाहर दक्षिणेश्वर का संपूर्ण क्षेत्र भी मुझे स्पष्ट दिखायी देने लगा। सभी मकानों की दीवारें पारदर्शी होकर झिलमिलाने लगीं और उनमें से मुझे दूर इधर-उधर चलते लोग दिखायी देने लगे।

मैं श्वासरहित अवस्था में था और मेरा शरीर एक विलक्षण शांत अवस्था में, तब भी मैं हाथ-पाँव हिला सकता था। कई मिनटों तक मैंने आँखें बारी-बारी से बन्द कर पुनः खोलकर देखा; परन्तु दोनों ही अवस्थाओं में मुझे पूरा दृश्य उसी प्रकार स्पष्ट दिखायी दे रहा था।

एक्स-रे की भाँति आध्यात्मिक दृष्टि भी सभी पदार्थों को भेद लेती है। दिव्य चक्षु हर जगह केन्द्र होता है, परिधि कहीं नहीं। मैंने उस प्रांगण में धूप में खड़े-खड़े नये सिरे से यह अनुभव किया कि जब मनुष्य ईश्वर की पथभ्रष्ट सन्तान नहीं रह जाता और बुलबुले की भाँति सारहीन स्वप्नमय भौतिक संसार में लिप्त नहीं रहता, तब उसे अपना अनन्त साम्राज्य पुनः प्राप्त हो जाता है। यदि अपने संकीर्ण व्यक्तित्व में सिकुड़ कर बैठे हुए मनुष्य के लिये भाग निकलना आवश्यक ही हो, तो क्या सर्वव्यापकता में भाग निकलने जैसा अन्य कुछ है ?

दक्षिणेश्वर के मेरे पवित्र अनुभव में केवल मन्दिर और माँ काली के रूप ने ही असाधारण बड़ा आकार धारण किया हुआ था। अन्य सब कुछ अपने साधारण आकार में ही दिखायी दे रहा था। हाँ, यह अवश्य है कि वह सब सफेद, नीले और इंद्रधनुषी रंगों के मृदु प्रकाश में आच्छादित लग रहा था। मेरा शरीर आकाशतत्त्व से बना प्रतीत हो रहा था, जो किसी भी क्षण हवा में उठ जाने के लिये तैयार हो। अपने आसपास की भौतिक परिस्थितियों के प्रति मैं पूर्ण सजग था। मैं अपने इर्दगिर्द देख लेता और उस आनन्दमय दिव्य दर्शन में कोई बाधा डाले बिना दो-चार कदम चल लेता।

मन्दिर की दीवारों के पीछे मैंने अचानक अपने जीजाजी को पवित्र बेल वृक्ष की कँटीली शाखाओं के नीचे बैठे देखा। मैं बिना किसी प्रयास के, उनके विचारों को पढ़ सकता था। दक्षिणेश्वर के पवित्र वातावरण के प्रभाव से उनके विचार कुछ उन्नत तो हो गये थे, पर मेरे बारे में उनके विचार अभी भी कुछ ठीक नहीं थे। मैं सीधा कृपामयी माँ काली की ओर मुड़ा और प्रार्थना करने लगाः

“माँ ! क्या तुम मेरे बहनोई में आध्यात्मिक परिवर्तन नहीं लाओगी ?”

अब तक मौन रही वह सुन्दर आकृति आखिर बोल उठी । “तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी!”

मैंने खुश होकर सतीश बाबू की ओर देखा। वे गुस्से में भरे जमीन से उठ खड़े हुए, मानो उन्हें अहसास हो गया था कि कोई आध्यात्मिक शक्ति उन पर कार्य कर रही है। मैंने उन्हें मन्दिर के पीछे दौड़ते देखा; शीघ्र ही वे मुझे मुक्का दिखाते हुए मेरे पास आ पहुँचे।

वह सर्वसमावेशी दर्शन लुप्त हो गया। देवी का तेजस्वी रूप अब मुझे दिखायी नहीं दे रहा था, मन्दिर की पारदर्शिता लुप्त हो गयी और विशाल आकार भी अदृश्य होकर अब अपना मूल आकार धारण कर चुका था। मेरा शरीर पुनः धूप से झुलसने लगा। मैं छलाँग लगाकर नाट्यमन्दिर की छाया में चला गया। सतीश बाबू भी गुस्से में मेरे पीछे वहीं आ गये। मैंने अपनी घड़ी देखी। एक बजा था; दिव्य दर्शन एक घंटे तक चला था।

“अरे मूर्ख!” मेरे बहनोई बरस पड़े, “घंटों पर घंटे बीत गये और तुम वहाँ पालथी मारे आँखें चढ़ाये बैठे रहे। मैंने कई बार आकर तुम्हें देखा और वापस चला गया। कहाँ है हमारा भोजन ? अब मन्दिर भी बन्द हो गया; तुमने मन्दिर के पदाधिकारियों से कुछ कहा भी नहीं; अब तो भोजन की व्यवस्था करने के लिये बहुत देर हो चुकी है !”

देवी के आविर्भाव से अनुभूत परमानन्द अब भी मुझमें विद्यमान था। मैं बोल पड़ाः “ माँ काली हमें भोजन करायेंगी !”

“ मैं भी एक बार देखना चाहता हूँ कि पहले से कोई व्यवस्था न कर रखने पर भी तुम्हारी काली माँ यहाँ हमें भोजन कैसे कराती हैं!” वे चीख पड़े।

उनका चीखना पूरा हुआ ही था कि मन्दिर का एक पुजारी आँगन पार कर हमारे पास आया।

मुझसे उसने कहाः “बेटा! तुम जब ध्यान कर रहे थे, तब तुम्हारे मुख-मंडल पर मैंने दिव्य तेज देखा था। मैंने आज सुबह तुम लोगों को यहाँ आते देखा था और तभी से मेरे मन में इच्छा हो रही थी कि मैं तुम लोगों के लिये भोजन अलग निकाल कर रखूँ। जो लोग पहले से सूचित करके नहीं रखते उन्हें भोजन देना मन्दिर के नियमों के विरुद्ध है, परन्तु तुम पर मैं वह नियम लागू नहीं करूँगा।”

मैंने उसका धन्यवाद किया और सीधे सतीश बाबू की आँखों में आँखें डालकर देखने लगा। पश्चाताप में अपनी आँखें झुकाकर वे भावुक हो उठे। जब हमारे सामने विविध व्यंजनों से युक्त भोजन परोस दिया गया, जिसमें बेमौसमी आम भी शामिल थे, तो मैंने देखा कि मेरे जीजाजी की भूख मर चुकी थी। वे अनमने से होकर विचार सागर में गोते लगा रहे थे।

कोलकाता वापस जाते समय सतीश बाबू नरमाये भावों के साथ यदा-कदा मेरी ओर अनुरोधपूर्ण दृष्टि से देख लेते थे। परन्तु मानो उनकी चुनौति के उत्तर स्वरूप पुजारी ने आकर जब हमें भोजन के लिये आमंत्रित किया था, तब से सतीश बाबू के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला था।

दूसरे दिन दोपहर को मैं अपनी बहन से मिलने उनके घर गया। दीदी ने अत्यंत स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया।

उन्होंने कहाः “मेरे भाई! चमत्कार हो गया! कल शाम को मेरे पति मेरे सामने खुले रूप से रोये।”

“उन्होंने कहाः 'प्रिय देवी! मुझमें परिवर्तन लाने की तुम्हारे भाई की योजना पर मुझे वर्णनातीत आनन्द हो रहा है। मैंने तुम्हारे साथ जो-जो अन्याय किया है, उस प्रत्येक अन्याय का मैं प्रायश्चित्त करूँगा। आज से हम अपने विशाल शयनकक्ष को केवल पूजा के लिये इस्तेमाल करेंगे; तुम्हारे छोटे-से ध्यान के कमरे में अब हम सोयेंगे। मुझे सचमुच गहरा पश्चाताप हो रहा है कि मैंने तुम्हारे भाई का मजाक उड़ाया। जिस लज्जास्पद तरीके से मैंने मुकुन्द के साथ बर्ताव किया, उसके लिये मैं स्वयं अपने को यह सजा दूंगा कि जब तक मैं आध्यात्मिक पथ पर उन्नति नहीं कर लेता, तब तक मैं मुकुन्द से बात नहीं करूँगा। आज से मैं प्रयासों की पूर्ण गहराई के साथ जगन्माता की खोज शुरू कर दूंगा; किसी न किसी दिन तो उन्हें अवश्य पा ही लूंगा!’ ”

इसके अनेक वर्षों बाद (१९३६ में) मैं दिल्ली में सतीश बाबू के घर गया। मुझे यह देखकर अत्यंत खुशी हुई कि उन्होंने आत्म-साक्षात्कार में बहुत उन्नति कर ली थी और जगन्माता ने उन्हें दर्शन देकर धन्य कर दिया था। उनके घर में अपने निवास के दौरान मैंने देखा कि सतीश बाबू प्रत्येक रात्रि का अधिकांश समय गुप्त रूप से ध्यान करने में लगाते थे, जब कि वे एक गम्भीर बीमारी से ग्रस्त हो गये थे और दिन भर अपने ऑफिस के काम में व्यस्त भी रहते थे।

मेरे मन में विचार आया कि मेरे जीजाजी की आयु लम्बी नहीं होगी। रमा दीदी ने अवश्य मेरे मन के विचार को पढ़ लिया होगा।

उन्होंने कहाः “मुकुन्द! मैं स्वस्थ हूँ और मेरे पति बीमार हैं। परन्तु फिर भी तुम यह जान लो कि एक पति-परायणा हिन्दू नारी होने के नाते मैं ही पहले मरूँगी। अब मैं अधिक दिन जीवित नहीं रहूँगी।”

उनके अनिष्टसूचक शब्दों को सुनकर मैं सहम गया, परन्तु उन शब्दों के सत्य के दंश का मुझे अनुभव था। अपनी इस भविष्यवाणी के लगभग अठारह महीने बाद जब मेरी बहन की मृत्यु हुई, तब मैं अमेरिका में था। मेरे सबसे छोटे भाई विष्णु ने मुझे बाद में पूरा विवरण लिखा।

विष्णु ने लिखा था: “दीदी की मृत्यु के समय दीदी और जीजाजी कोलकाता में थे। उस दिन सुबह दीदी ने अपना शादी का जोड़ा पहन लिया।

“ ‘यह विशेष परिधान किसलिये ?” सतीश बाबू ने उनसे पूछा।

“ ‘इस पृथ्वी पर आपकी सेवा का आज मेरा अंतिम दिन है,” दीदी ने कहा। थोड़ी ही देर बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उनका बेटा जब डॉक्टर को लाने के लिये घर से बाहर भागने लगा, तो दीदी ने कहाः

“ ‘बेटा! मुझे छोड़कर मत जाओ। अब उसका कोई उपयोग नहीं। डॉक्टर के आने से पहले ही मैं जा चुकी होऊँगी।’ दस मिनट बाद अपने पति के चरणों को श्रद्धा से पकड़े हुए रमा दीदी ने प्रसन्नता के साथ और बिना किसी कष्ट के सचेत रूप से शरीर त्याग दिया।

“अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद सतीश बाबू बहुत विरक्त हो गये थे,” विष्णु ने लिखा था: “एक दिन वे और मैं मुस्कराती रमा दीदी की फोटो देख रहे थे।

“ ‘क्यों मुस्करा रही हो ?’ सतीश बाबू अचानक कह उठे जैसे रमा दीदी वहाँ मौजूद हो। ‘तुम समझती हो मुझसे पहले जाने की व्यवस्था करके तुमने बड़ी चालाकी की है ? मैं सिद्ध कर दूँगा कि तुम अधिक समय तक मुझसे दूर नहीं रह सकती। जल्दी ही मैं भी तुम्हारे पास आ रहा हूँ।’ ”

“इस समय सतीश बाबू अपनी बीमारी से पूरी तरह ठीक हो गये थे और उनका स्वास्थ्य एकदम अच्छा था, फिर भी फोटो के सामने उनके द्वारा कहे गये उन विचित्र शब्दों के बाद जल्दी ही बिना किसी प्रकट कारण के वे चल बसे।”

इस तरह मेरी बहन रमा और उनके पति सतीश बाबू –जिनका दक्षिणेश्वर में एक अत्यन्त साधारण सांसारिक मनुष्य से एक अप्रकट सन्त में परिवर्तन हो गया था – दोनों ने ही भविष्यवाणी करके देहत्याग किया।