Ek Yogi ki Aatmkatha - 21 books and stories free download online pdf in Hindi

एक योगी की आत्मकथा - 21

{ हमारी कश्मीर - यात्रा }

"अब तुम यात्रा करने योग्य स्वस्थ हो गये हो। मैं भी तुम्हारे साथ कश्मीर चलूँगा,” श्रीयुक्तेश्वरजी ने एशियाटिक कॉलरा से मेरे ठीक हो जाने के दो दिन बाद मुझसे कहा।

उसी दिन शाम को छह लोगों का हमारा दल उत्तर की ओर जाने के लिये गाड़ी पर सवार हो गया। हमारा पहला पड़ाव शिमला में हुआ, जो हैमालय के पहाड़ों के सिंहासन पर विराजमान रानीसदृश शहर है। भव्य दृश्यों का आनन्द लेते हुए हम ढलानयुक्त सड़कों पर घूमे।

“विलायती स्ट्राबेरी ले लो,” एक सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करते स्थान में लगे खुले बाजार में बैठी एक वृद्धा चिल्ला रही थी।

छोटे-छोटे लाल-लाल अपरिचित फलों को देखकर गुरुदेव का कौतूहल जागा। उन्होंने एक बड़ी टोकरी भर फल खरीद लिये और पास ही खड़े कन्हाई और मुझे खाने को दिये। मैंने एक फल खाकर देखा पर तुरन्त ही उसे थूक दिया।

“कितना खट्टा है यह, गुरुदेव! मुझे स्ट्राबेरी कभी अच्छी नहीं लग सकती!”

मेरे गुरु हँसने लगे। “अमेरिका में तुम्हें यें खूब अच्छी लगेंगी। वहाँ एक रात्रि-भोज में जिसके घर तुम उस दिन खाना खा रहे होगे, उस घर की गृहिणी तुम्हें मलाई और शक्कर के साथ स्ट्राबेरी देगी। जब वह काँटे से स्ट्राबेरियों को कुचलकर तुम्हें देगी, तब तुम उन्हें खाकर देखोगे और कहोगे: 'कितनी स्वादिष्ट स्ट्राबेरी!' तब तुम्हें शिमला में आज का यह दिन याद आयेगा।”

(श्रीयुक्तेश्वरजी की यह भविष्यवाणी मेरे दिमाग से पूरी तरह निकल गयी थी, परन्तु कई वर्षों बाद मेरे अमेरिका जाने के शीघ्र ही पश्चात् फिर याद आ गयी। मैसाच्युसेटस् प्रान्त के वेस्ट सोमरविल नगर में श्रीमती एलिस टी. हैसी (योगमाता) के घर में एक रात्रिभोज पर मैं निमन्त्रित था। भोजन के अन्त में जब स्ट्राबेरी टेबल पर लाकर रखी गयी, तो श्रीमती हैसे ने एक काँटा उठाकर उससे मेरे सामने रखी गयी स्ट्राबेरियों को अच्छी तरह कुचल दिया और उसमें मलाई एवं शक्कर डाल दी। “यह फल कुछ अधिक ही खट्टा होता है; मुझे लगता है आपको इसे इस तरह खाना पसन्द आयेगा,” उन्होंने कहा। मैंने थोड़ा-सा उठाकर मुँह में डाला। “कितनी स्वादिष्ट स्ट्राबेरी!” मेरे मुँह से अनायास ही निकल पड़ा। उसी क्षण स्मृति की अथाह गुफा से शिमला में की गयी मेरे गुरुदेव की भविष्यवाणी मानस पटल पर उभर आयी। यह ध्यान में आते ही मैं नितान्त आदर और विस्मय से विभोर हो उठा कि बहुत पहले ही उनके ईश्वर-लीन मन ने भविष्य के ईथर में विचरण करने वाले प्रारब्धीय घटनाक्रम को देख लिया था।)

हम लोग शीघ्र ही शिमला छोड़ रावलपिंडी जाने के लिये गाड़ी में बैठ गये। वहाँ से कश्मीर की राजधानी श्रीनगर तक की सात दिन की यात्रा के लिये हमने दो घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली एक बड़ी बग्गी किराये पर ली, जो चारों ओर से बन्द थी और उस पर छत भी थी। हमारी इस उत्तर की ओर यात्रा में दूसरे दिन से हिमालय की सच्ची विस्तीर्णता दृष्टिगोचर होने लगी। जैसे-जैसे हमारी बग्गी के लोहे के पहिये गरम पथरीले मार्गों पर घड़-घड़ करते आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे पर्वत शोभा के बदलते सुन्दर दृश्यों को देखकर हम मुग्ध हो रहे थे।

“गुरुदेव!” आड्डी ने कहा, “आपकी पवित्र संगत में इन वैभवशाली दृश्यों का बहुत आनन्द आ रहा है।”

आड्डी के मुँह से सराहना के ये उद्गार मुझे बड़े सुखद लगे, क्योंकि इस यात्रा में मैं संयोजक की भूमिका निभा रहा था। श्रीयुक्तेश्वरजी ने मेरे मन के भाव को पढ़ लिया और मेरी ओर मुड़कर फुसफुसाते स्वर में बोलेः

“मिथ्या आत्म प्रशंसा मत करो; आड्डी को इन दृश्यों से उतना आनन्द नहीं आ रहा है जितना सिगरेट पीने के लिये पर्याप्त समय तक हमसे दूर हो सकने की संभावना से आ रहा है।”

मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने धीमे स्वर में कहा: “गुरुदेव! इन अप्रिय शब्दों से अब कृपया रंग में भंग मत डालिए। मुझे विश्वास नहीं होता कि आड्डी सिगरेट पीने के लिये बेचैन हो रहा है।” पर गुरुदेव कभी ऐसी बातों से दबते नहीं थे, अतः मैंने आशंका से उनकी ओर देखा “ठीक है मैं आड्डी को कुछ नहीं कहूँगा,” गुरुदेव ने हंसते हुए कहा। “परन्तु तुम शीघ्र ही देखोगे कि जैसे ही बग्गी रुकेगी, वह उस अवसर का लाभ उठाने के लिए कितना तत्पर होगा।”

बग्गी एक छोटी सराय पर पहुँच गयी। घोड़ों को पानी पिलाने के लिये ले ही जाया जा रहा था कि आड्डी ने पूछा: “गुरुदेव! जरा ताजी हवा खाने के लिये मैं थोड़ी देर बाहर कोचवान के साथ बैठूं तो आप बुरा तो नहीं मानेंगे ?”

श्रीयुक्तेश्वरजी ने अनुमति तो दे दी, पर मुझसे कहाः “उसे ताता धुआँ चाहिये, ताजी हवा नहीं।”

बग्गी फिर धूल भरी सड़क पर आवास करते हुए चलने लगी। गुरुदेव की आँखों में हँसी की चमक आ गयी थी मुझसे उन्होंने कहाः “बग्गी के दरवाजे से जरा अपनी गर्दन बाहर निकालो और देखो आड्डी कैसी हवा खा रहा है।”

मैंने गर्दन बाहर निकाली और यह देखकर स्तम्भित रह गया कि आड्डी मुँह से सिगरेट के धुएँ के छल्ले छोड़ रहा है। मैंने अपनी हार मानकर गुरुदेव की ओर देखा

“हमेशा की तरह आप ही की बात सच निकली, गुरुदेव! आट्ठी प्रकृति के दृश्यों के साथ-साथ सिगरेट का भी मजा ले रहा है। मैंने अनुमान लगाया कि आड्डी को कोचवान से सिगरेट मिली होगी क्योंकि इतना तो मैं जानता था कि उसने कोलकाता से कोई भी सिगरेट साथ नहीं ली थी।

नदियों, घाटियों, कगार पर बैठी बड़ी-बड़ी शिलाओं और अनेकानेक पर्वतमालाओं के मनोरम दृश्यों का आनन्द उठाते हुए हम घुमावदार रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। हर रात को हम किसी ग्रामीण सराय में ठहरकर अपना खाना बनाते श्रीयुक्तेश्वरजी मेरे पथ्य का विशेष ध्यान रखते और प्रत्येक भोजन में नीबू का रस अवश्य दिलाते। मुझ में अभी भी कमजोरी थी, पर प्रतिदिन उसमें सुधार हो रहा था, हालांकि गड़गड़ाहट करते चलने वाली यह बग्गी उसमें बैठने वालों को सभी ओर से तकलीफ़ देने का विशेष ध्यान रख कर ही बनायी गयी थी।

जैसे-जैसे हम मध्य कश्मीर के निकट पहुँचने लगे, हमारे हृदयों में आनन्दाशाएँ उमड़ने लगीं: कश्मीर कमल पुष्पों से भरे सरोवरों की, तैरते उद्यानों की, सुसज्जित शिकारों की, बहुसेतु-शोभित झेलम नदी की, पुष्पों से युक्त हरियाली की स्वर्ग भूमि और उस पर यह चारों ओर से हिमालय से घिरा हुआ!

श्रीनगर पहुँचने के हमारे मार्ग पर दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे स्वागत करते वृक्ष खड़े थे। जहाँ से ये सुन्दर पहाड़ नजर आते थे, ऐसी एक दुमंजिली धर्मशाला में हमने कमरे लिये। वहाँ नल वगैरह नहीं थे; हम पास के एक कुएँ से पानी निकालकर लाते थे। वहाँ ग्रीष्म ऋतु अत्यंत सुखद थी दिन । साधारण गर्मी और रात में हल्की सी ठंड

हम लोग श्रीनगर में शंकराचार्य के प्राचीन मन्दिर में दर्शनार्थ गये। पर्वत शिखर पर स्थित दूर से ही स्पष्ट दिखायी पड़ने वाले आश्रम पर मेरी दृष्टि पड़ते ही मैं एक परमानन्दमय अवस्था में चला गया। उस अवस्था में एक सुदूर देश में एक पहाड़ी के शिखर पर एक भवन दिखायी देने लगा; शंकराचार्य का भव्य मन्दिर उस भवन में परिवर्तित हो गया, जहाँ मैंने कई वर्षों बाद अमेरिका में सेल्फ़-रियलाइजेशन फेलोशिप के मुख्य आश्रम की स्थापना की। (जब मैं पहली बार कैलिफोर्निया में लॉस ऐजिलिस गया और वहाँ मार्केट वाशिंगटन के शिखर पर स्थित वह विशाल भवन देखा, तो तुरन्त उसे वर्षों पहले कश्मीर और अन्यत्र अपने अंतर में देखे दृश्यों के भवन के रूप में पहचान लिया।)

कुछ दिन श्रीनगर में बिताने के बाद हम लोग आठ हजार पाँच सौ फीट की ऊँचाई पर स्थित गुलमर्ग “पुष्प युक्त पर्वतीय मार्ग” गये। वहाँ मैंने जीवन में पहली बार बड़े घोड़े की सवारी की। राजेन्द्र एक ऐसे टट्टू पर सवार हुआ, जो तेज दौड़ने के लिये अति उत्सुक था हम लोग खिल्लनमर्ग जाने के लिये निकल पड़े। रास्ता एकदम सौधी चढ़ाई का था और घने जंगल में से जाता था जो छातेनुमा वृक्षों से आच्छादित था। कुहरे से ढंकी पगडण्डियाँ प्रायः दिखाई नहीं पड़ती थीं परन्तु इस सब के बावजूद राजेन्द्र के टट्टू ने मेरे बड़े घोड़े को एक पल के लिये भी विश्राम नहीं लेने दिया, यहाँ तक कि खतरनाक मोड़ों पर भी नहीं। प्रतिस्पर्धा के आनन्द के अतिरिक्त अन्य सब बातों से बेखबर राजेन्द्र का टट्टू अथक रूप से पीछे-पीछे आता ही रहा।

यह स्पर्धा कष्टकर तो थी, पर इसके बाद जो विस्मयकारी दृश्य देखने को मिला, उससे यह सारा कष्ट सार्थक हो गया। इस जीवन में पहली बार मैंने चतुर्दिक दृष्टि घुमाकर सब तरफ केवल हिमालय के हिमशिखरों को देखा। पर्वत शिखरों की मालाओं पर मालाएँ, जो ध्रुवप्रदेश के विशालकाय सफेद रीछों की आकृति के समान दिख रही थीं। मेरी आँखें सूर्यकिरणोज्ज्वल नीले आकाश की पृष्ठभूमि में फैले बर्फीले पहाड़ों के विस्तार की शोभा का परमहर्ष से पान कर रही थीं।

मैं अपने युवा साथियों के साथ चमकती श्वेत ढलानों पर इधर से उधर खूब मजे के साथ लोटता रहा। हम सबने ओवरकोट पहन रखे थे। नीचे वापस लौटते समय हमने दूर पीले फूलों का जैसे एक विशाल कालीन देखा, जिससे विवर्ण पहाड़ियों का पूरा रूप ही बदल गया था।

इसके बाद हम बादशाह जहाँगीर के “विलास उद्यान” शालीमार और निशात बाग़ देखने गये निशात बाग़ का प्राचीन राजमहल एक प्राकृतिक जलप्रपात के ही ऊपर बना है। पर्वतों से अत्यंत वेग के साथ नीचे गिरते जलप्रवाह को अत्यंत कौशलपूर्ण यंत्र-योजना के द्वारा नियन्त्रित कर कहीं तो विविधरंगी समतल चट्टानों पर से बहाया गया है, तो कहीं सुन्दर-सुन्दर रंग-बिरंगी पुष्पक्यारियों के बीच फव्वारों के रूप मे निकाला गया है। यह प्रवाहधारा राजमहल के अनेक कमरों में से भी बहती है और अन्त में धरती पर उतरते समय किसी आकाशगामिनी परी के समान नीचे स्थित झील में उतरती है। इन विशाल उद्यानों में रंगों का जैसे उत्सव है – गुलाब, चमेली, लिली, स्नैपड्रैगन, पैनसी, लैवेण्डर, पॉपी चिनार, सरो और चेरी की सुडौल पंक्तियों से पन्ने-सा एक हरा वृत्त बन गया था, जिसके पार हिमालय की उच्च धवल श्रृंखला आकाश को छू रही थी।

तथाकथित कश्मीरी अंगूर कोलकाता में मुश्किल से ही मिल सकने वाला और महंगा परन्तु अत्यंत स्वादिष्ट फल माना जाता है। राजेन्द्र रास्तेभर कश्मीर में भरपेट अंगूर खाने की चर्चा करता आ रहा था, परन्तु कश्मीर में अंगूर का कोई बड़ा बाग़ देखने में न आने से उसे घोर निराशा हुई। उसकी निराधार अपेक्षा के लिये मैं उसे यदा कदा चिढ़ाया करता।

“ओह, मेरा पेट अंगूर से इतना भर गया है कि मुझसे चला नहीं जाता!” मैं कहता “इन अदृश्य अंगूरों की मेरे पेट में मद्य भी बन रही है।” बाद में हमने सुना कि मीठे अंगूर कश्मीर के पश्चिम में काबुल में होते हैं। हम पिस्तामिश्रित रवड़ी की आइसक्रीम पर ही तसल्ली कर लेते।

लाल, कशीदाकारी किये हुए छत्र वाले शिकारों में बैठकर हम पानी में मकड़ीजाल के समान वाले अनेकानेक नहरों के जाल से बने डल सरोवर में अनेक बार घूमे यहाँ लठ्ठों और मिट्टी की सहायता से बने अनेक तैरते उद्यान दिखायी देते हैं। वस्तुतः प्रथम दृष्टि में दूर-दूर तक फैले हुए पानी के बीच साग-सब्जियों और तरबूजों की फसल का दृश्य ही इतना विसंगत लगता है कि कोई भी आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहता। “भूमि से बँधे रहना” पसन्द न करने के कारण किसान अपने चौरस “खेत” को उस बहुशाखा प्रशाखा युक्त झील में नाव से रस्सी के सहारे एक जगह से दूसरी जगह खींच कर ले जाते हुए कभी-कभी दिखायी देते हैं।

इस सीढ़ीदार घाटी में पृथ्वी के हर प्रकार के सौन्दर्य का सार दृष्टिगोचर होता है। कश्मीर रूपी सुन्दरी ने पर्वतों का मुकुट पहना है, गले में झीलों की माला और पाँवों में पुष्प पादुकायें पहने हैं। बाद के वर्षों में अनेक देशों की यात्रा करने के बाद मैं समझ गया कि कश्मीर को संसार का सर्वाधिक सुन्दर प्रदेश क्यों कहा जाता है। स्विट्जरलैंड के आल्प्स पर्वत, स्कॉटलैंड की लाँच लोमण्ड झील तथा इंगलैंड की अतिसुन्दर झीलों की कुछ झाँकियाँ यहाँ मिल जाती हैं। कश्मीर की यात्रा पर आये अमेरिकी यात्रियों को यहाँ अलास्का के अकलुषित ऊबड़-खाबड़ सौन्दर्य की और डेनवर के पास स्थित पाईक्स पीक की याद दिलाने वाला बहुत कुछ मिल जायेगा।

प्राकृतिक सौन्दर्य स्पर्धा में पहला पुरस्कार मैं या तो मेक्सिको के जोकिमिल्को के शानदार दृश्य को दूंगा, जहाँ आकाश, पर्वत और पोप्लर वृक्ष पानी की असंख्य धाराओं में अठखेलियाँ करती मछलियों के बीच प्रतिबिम्बित होते हैं या फिर कश्मीर की झीलों को दूंगा जो हिमालय के कठोर पहरे में सुरक्षित सुन्दरियों के समान लगती हैं। ये दो स्थान मेरी स्मृति में पृथ्वी पर सबसे सुन्दर स्थलों के रूप में उभर आते हैं।

फिर भी जब मैंने येलोस्टोन नैशनल पार्क, कोलोरैडो के ग्रैन्ड कैनियन और अलास्का का सौन्दर्य देखा, तो मैं मंत्रमुग्ध हो गया। येलोस्टोन पार्क पृथ्वी पर शायद एकमेव प्रदेश है, जहाँ घड़ी की-सी नियमितता से गरम जल के फव्वारे फूट कर हवा में ऊँचे उठते रहते हैं। इस ज्वालामुखीय क्षेत्र में प्रकृति ने आज भी आरम्भिक सृष्टि का नमूना रख छोड़ा है: गंधकमय गरम जल के झरने, दूधिया और इंद्रनील वर्ण के जलाशय, उग्र गरम फव्वारे, मुक्त रूप से विचरण करते भालू, भेड़िये, जंगली भैंसे और अनेक प्रकार के अन्य जंगली पशु वायोमिंग से बुदबुदाते गरम कीचड़ के "डेविल्स पेन्ट पॉट" की ओर कार से जाते समय रास्ते के किनारों पर कलकल निनाद करते झरने, गरम जल के फव्वारे और बाष्पमय फुहारें देखकर मेरे मन में यह विचार अवश्य आया कि येलोस्टोन को एकमेवाद्वितीयता के लिये विशेष पुरस्कार मिलना चाहिये।

कैलिफोर्निया के योसेमिटी पार्क में अत्यंत पुराने, उत्तुंग सिक्वाइया (देवदार जाति के अति ऊँचे बढ़ने वाले) पेड़ जो आकाश में दूर तक उठे भीमकाय स्तम्भों की भाँति दिखते हैं, दिव्य कौशल से निर्मित हरे प्राकृतिक मन्दिर हैं। यूँ तो पौर्वात्य देशों में भी अनेक सुन्दर सुन्दर जलप्रपात हैं, परन्तु इनमें से एक भी न्यू यार्क राज्य में कैनडा की सीमा पर स्थित नैयागरा जलप्रपात के सौन्दर्य की बराबरी नहीं कर सकता। केन्टकी की अति विशालकाय मैमथ गुफा और न्यू मेक्सिको में भूमिगत स्थित अत्यंत विशाल गुफा कार्ल्सबाड़ कैवर्ल्स तो विचित्रताओं से भरपूर परी देश ही हैं। इन गुफाओं की छतों से लटकते, बर्फ के मीनारों के समान दिखते पत्थर के सुओं का प्रतिबिम्ब नीचे भूगर्भस्थ जल में पड़ता है। यह दृश्य परलोकों की मानव की कल्पना की झाँकी प्रस्तुत करता है।

अपने सौन्दर्य के लिये जगविख्यात कश्मीरियों में से अनेक लोग यूरोपियनों के समान ही गोरे हैं और उनका नाक-नक्श तथा शरीर का गठन भी उन्हीं के समान है; अनेक लोग नीली आँखों के भी हैं और सुनहरे बालों के भी। पाश्चात्य पोशाक में ये लोग ठेठ अमेरिकनों की तरह दिखते हैं। हिमालय की ठंड उनका सूर्य के उत्ताप से बचाव करती है और इस प्रकार उनके गौरवर्ण की रक्षा करती है। भारत में हम जैसे-जैसे दक्षिण दिशा में उष्ण कटिबंध की ओर बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे लोगों का रंग अधिकाधिक काला दिखायी देने लगता है।

कश्मीर में कुछ सप्ताह सुखपूर्वक बिताने के पश्चात मुझे बंगाल लौटने की तैयारी करने के लिये विवश होना पड़ा, क्योंकि श्रीरामपुर कॉलेज का नया सत्र आरम्भ होने वाला था। श्रीयुक्तेश्वरजी, कन्हाई और आड्डी कुछ दिन और श्रीनगर में रुकने वाले थे वहाँ से मेरे प्रस्थान से कुछ समय पहले गुरुदेव ने संकेत दिया कि कश्मीर में उनका शरीर अस्वस्थ होने वाला है।

“गुरुदेव परन्तु आप तो पूर्णतः स्वस्थ लग रहे हैं,” मैंने कहा। “ऐसी भी संभावना है कि मैं इस संसार से ही उठ जाऊँ।”

“गुरुजी!” उनके चरणों में गिरकर मैं गिड़गिड़ाने लगा।

“कृपा करके वचन दीजिये कि आप अभी देहत्याग नहीं करेंगे। मैं अभी आपके बिना चल सकने के लिये तैयार नहीं हूँ।”

श्रीयुक्तेश्वरजी चुप रहे, परन्तु मेरी ओर देखकर इतनी अनुकंपा के साथ मुस्कराये कि मैं आश्वस्त हो गया। अनिच्छापूर्वक ही मैं वहाँ से चल पड़ा।

“गुरुदेव अस्वस्थ; स्थिति अत्यंत नाजुक।” आड्डी का यह तार मुझे श्रीरामपुर लौटने के थोड़े ही बाद मिला

दुःख और संताप के अतिरेक में मैंने तुरन्त गुरुदेव को तार भेजा “गुरुदेव! मैंने आपसे देहत्याग न करने का वचन माँगा था। कृपा कर के शरीर मत छोड़िये, नहीं तो मैं भी मर जाऊँगा।”

“तथास्तु!” यह गुरुदेव का कश्मीर से जवाब था।

कुछ ही दिनों में आड्डी का एक पत्र आया जिसमें उसने लिखा था कि गुरुदेव स्वस्थ हो गये हैं। अगले पखवाड़े में जब गुरुदेव श्रीरामपुर वापस आये तो उनका आकार में आधा हुआ शरीर देखकर मुझे अत्यंत दुःख हुआ।

श्रीयुक्तेश्वरजी के शिष्यों के लिये अच्छी बात यह थी कि श्रीयुक्तेश्वरजी ने कश्मीर में अपने भीषण ज्वर की अग्नि में उनके अनेक पापों को जला डाला था। उच्चकोटि के योगियों को एक शरीर से रोग निकालकर अपने शरीर में ले लेने के आधिभौतिक तरीके का ज्ञान होता है। बलवान मनुष्य भारी वजन ढोने में कमजोर मनुष्य की सहायता कर सकता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक महामानव अपने शिष्यों के कर्मभार के कुछ हिस्से को अपने ऊपर लेकर उनके शारीरिक और मानसिक कष्टों को न्यूनतम स्तर तक कम कर सकता है। जिस प्रकार धनाढ्य मनुष्य अपने अपव्ययी पुत्र के भारी कर्ज को चुकाने के लिये अपने धन के कुछ हिस्से को त्याग कर उसे उसकी गलतियों के भीषण परिणामों से बचा लेता है, उसी प्रकार गुरु अपने शिष्यों की दुर्गति को कम करने के लिये अपनी स्वास्थ्य-संपदा के कुछ हिस्से को तिलांजलि दे देता है।

एक गुप्त योग पद्धति द्वारा संत अपने मन और सूक्ष्म देह को पीड़ित व्यक्ति के मन और सूक्ष्म देह के साथ जोड़ लेता है, और इस प्रक्रिया में रोग पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से योगी के शरीर में संक्रमित हो जाता है। देह भूमि पर ईश्वर साक्षात्कार की फसल काट लेने के बाद सिद्ध पुरुष अपने शरीर की चिंता नहीं करता। फिर वह दूसरों के कष्ट कम करने के लिये अपने शरीर को रोगग्रस्त होने भी देता है, तो भी उसके कभी दूषित न हो सकने वाले मन पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसी सहायता कर पाने के लिये वह अपने आप को भाग्यवान मानता है। ईश्वर में सायुज्य मोक्ष प्राप्त करने में ही मानव देह का उद्देश्य संपूर्ण रूप से पूरा होना अंतर्निहित है; यह हो जाने के बाद सिद्ध पुरुष उसकी जैसी इच्छा हो वैसा अपने देह का उपयोग करता है।

एक गुरु का संसार में कार्य है मानवजाति के दुःख कम करना, चाहे वह आध्यात्मिक उपायों से हो या बौद्धिक उपदेशों से, या इच्छाशक्ति के द्वारा हो या उनके रोगों को अपने ऊपर लेने के द्वारा हो। इच्छा मात्र से अधिचेतन अवस्था में प्रविष्ट होकर सद्गुरु अपने शारीरिक कष्ट से अलिप्त हो सकता है; परन्तु कभी-कभी शिष्यों के लिये उदाहरण स्थापित करने हेतु वह शारीरिक पीड़ा को उदासीन भाव से स्वेच्छा से सहन करता है। दूसरों के रोग अपने ऊपर लेकर योगी उनके लिये कर्मसिद्धान्त के कार्य कारण नियम की पूर्ति कर सकता है। यह नियम गणित की-सी अनिवार्यता से अपने आप कार्य करता है; इस की कार्य विधि में ब्रह्मज्ञानी वैज्ञानिक आधार पर फेरबदल कर सकते हैं।

आध्यात्मिक नियम यह अनिवार्य नहीं बनाता कि कोई गुरु या सिद्ध पुरुष जब-जब दूसरे किसी मनुष्य को रोगमुक्त करें तो वह स्वयं बीमार हो जायें तुरन्त स्वस्थ करने की विभिन्न पद्धतियाँ हैं जो सन्तों को ज्ञात होती हैं, जिनमें आध्यात्मिक तरीके से रोगनिवारण करने वाले को कोई क्षति नहीं होती। सामान्यतः सन्तजन ऐसी ही किसी पद्धति से लोगों को रोगमुक्त कर देते हैं। परन्तु कभी-कभी, हालाँकि यह बहुत विरले ही होता है, कोई गुरु अपने शिष्यों के क्रमविकास में अत्यधिक गति लाना चाहता है, तब वह उनके अवांछनीय कर्मों के बहुत बड़े भाग को अपने ऊपर लेकर उनके परिणामों को अपने शरीर में भोग कर उन्हें निष्फल कर सकता है।

ईसा मसीह ने पहले ही स्पष्ट संकेत दे दिया था कि उनका जीवन अनेकों के पापों का मूल्य चुकाने के लिये है। उनमें जो दैवी शक्तियाँ¹ थीं, उनके होते हुए ईसा को कभी भी क्रॉस पर मृत्यु नहीं दी जा सकती थी यदि वे स्वेच्छा से कार्य कारण के सूक्ष्म विश्वनियम में सहयोग नहीं करते। इस प्रकार उन्होंने दूसरों के कर्मों के परिणामों को अपने ऊपर ले लिया, खास कर अपने शिष्यों के कर्मों के परिणामों को। इस से शिष्यों को उन्होंने परिशुद्ध किया और इस योग्य बनाया कि वे सर्वव्यापी चैतन्य को या "पवित्र आत्मा" (Holy Ghost) को धारण कर सकें, जो बाद में उनमें अवतरित हुआ।²

केवल आत्म-साक्षात्कार प्राप्त ब्रह्मज्ञानी सिद्ध पुरुष ही अपनी प्राणशक्ति को दूसरों में संचरित कर सकते हैं या उनके रोगों को अपने शरीर में ला सकते हैं। कोई साधारण मनुष्य इस यौगिक पद्धति का अवलम्बन नहीं कर सकता; न ही उसके लिये ऐसा करना वांछनीय है, क्योंकि अस्वस्थ शरीर गहरे ध्यान के लिये बाधा बनता है। हिन्दू शास्त्र कहते हैं कि अपने शरीर को स्वस्थ रखना मनुष्य का अनिवार्य कर्तव्य है³; अन्यथा उसका मन भगवत् ध्यान में एकाग्र नहीं रह सकता।

तथापि अति बलशाली मन सभी शारीरिक बाधाओं को पार कर ईश्वर साक्षात्कार को प्राप्त हो सकता है। अनेक सन्तों ने अपने रोगों की ओर कोई ध्यान न देकर अपने ईश्वरानुसंधान में सफलता प्राप्त की है। असीसी के सेंट फ्रान्सिस स्वयं गम्भीर रोगों से ग्रस्त होने के बावजूद दूसरे लोगों का रोगनिवारण करते थे और मृत लोगों को फिर से जिंदा भी कर देते थे।

मैं एक ऐसे भारतीय संत को जानता था जिनका आधा शरीर कभी फोड़ों से भरा हुआ था। उनका मधुमेह रोग इतना उग्र था कि वे लगातार पन्द्रह मिनट से अधिक स्थिर नहीं बैठ सकते थे। किन्तु उनकी आध्यात्मिक आकांक्षा अटल थी। वे प्रार्थना करते: “प्रभु ! क्या आप मेरे इस भग्न मन्दिर में आयेंगे ?” अविरत प्रचण्ड इच्छाशक्ति के बल से वे आखिर प्रतिदिन अठारह घंटों तक पद्मासन में समाधि लगाकर बैठने लगे। उन्होंने मुझे बतायाः “और तीन साल पूरे होते-होते मैंने ईश्वर के अनंत प्रकाश को अपने भीतर जगमगाते पाया। उसके वैभव के आनन्द में मग्न होकर मैं अपने शरीर को भूल गया। बाद में मैंने देखा कि ईश्वर की दया से मेरा शरीर पूर्णतः स्वस्थ हो गया था।”

रोग निवारण की एक ऐतिहासिक घटना भारत में मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर (१४८३-१५३०) से सम्बन्धित है। उसका बेटा हुमायूँ चिंताजनक रूप से बीमार हो गया। बाबर ने अत्यंत व्यथित हृदय के निश्चय के साथ प्रार्थना की कि बेटे का रोग उस पर आ जाये और बेटे को जीवनदान मिल जाये। हुमायूँ ⁴ ठीक हो गया और बाबर उसी क्षण बीमार होकर बाद में उसी रोग से मर गया जिसने उसके बेटे को ग्रस लिया था।

अनेक लोग सोचते हैं कि सिद्ध पुरुषों को सैन्डो⁵ के समान स्वस्थ और शक्तिवान होना चाहिये। इस सोच का कोई आधार नहीं है। जैसे आजीवन स्वस्थता आंतरिक ज्ञानप्रकाश का द्योतक नहीं है, वैसे ही बीमार शरीर का अर्थ यह नहीं है कि उस महात्मा में शक्तियों का अभाव है। संत की पहचान शारीरिक अवस्था पर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अवस्था पर आधारित होती है।

पाश्चात्य जगत् के अनेक विभ्रान्त जिज्ञासुओं की यह ग़लत धारणा है कि आध्यात्मिक विषय के उत्तम वक्ता या लेखक अवश्य सिद्ध पुरुष होंगे। परन्तु किसी के सिद्ध पुरुष होने का प्रमाण केवल यही है कि उसमें अपनी इच्छा के अनुसार श्वासोच्छ्वास रहित सविकल्प समाधि में जाने की क्षमता हो और उसे अखंड आनन्द (निर्विकल्प समाधि की अवस्था) प्राप्त हो। ऋषियों ने बताया है कि केवल इन उपलब्धियों के द्वारा ही मनुष्य यह प्रदर्शित कर सकता है कि उसने द्वैत के इन्द्रजाल या माया पर अधिकार पा लिया है। केवल वही आत्मज्ञान की गहराईयों से कह सकता है: “एकम् सत” (केवल एक का ही अस्तित्व है)।

महान् अद्वैतवादी आदि शंकराचार्य ने लिखा है:
“जब अज्ञान के कारण द्वैतभाव रहता है, तब सब कुछ आत्मा से अलग दिखायी देता है। जब यह ज्ञान हो जाता है कि सब कुछ आत्मा ही है, तब एक अणु भी आत्मा से अलग दिखायी नहीं देता। सत्य का ज्ञान प्रकट होते ही शरीर के मिथ्यात्व के कारण हुए कर्मों के फल भोगने के लिये शेष नहीं रह सकते, जैसे जागने पर स्वप्न का अस्तित्व नहीं रहता।”

केवल सद्गुरु ही शिष्यों के कर्म अपने ऊपर ले सकते हैं। श्रीनगर⁶ में श्रीयुक्तेश्वरजी कभी कष्ट न भोगते, यदि उन्हें अपने अन्तर में वास करने वाले परमात्मा से अपने शिष्यों की उस विलक्षण ढंग से सहायता करने की अनुमति न मिलती। मेरे ईश्वरमग्न गुरु के अतिरिक्त ऐसे सन्त गिने-चुने ही हुए हैं, जो ईश्वर की आज्ञा के पालन के लिये आवश्यक सूक्ष्म ज्ञान से युक्त थे।

जब मैंने अपने गुरु की क्षीण हुई काया देखकर कुछ सहानुभूति जताने का प्रयास किया तो उन्होंने विनोदपूर्वक कहा:

“इसके कुछ अच्छे पहलू भी हैं; अब मैं उन छोटी बनियानों को भी पहन सकता हूँ, जिन्हें मैंने कई वर्षों से नहीं पहना है !”

गुरुदेव की प्रसन्न हँसी को सुनकर मुझे सेंट फ्रान्सिस डि सेल्स के वे शब्द याद आ गये: “जो सन्त उदास रहता है, वह व्यर्थ संत है!”






¹ क्रॉस पर चढ़ाने के लिये ले जाये जाने के समय ईसामसीह ने कहाः “क्या तुम यह समझते हो कि मैं अब अपने परमपिता से प्रार्थना नहीं कर सकता? और यदि करूं तो वे तुरन्त मुझे देवदूतों की बारह सेनाओं से भी अधिक सेना नहीं भेज देंगे? परन्तु तब यह शास्त्रवचन कैसे पूरा होगा कि यह सब होना आवश्यक है ?” - मत्ती २६:५३-५४ (बाइबिल)

² प्रेरितों के काम १:८; २:१-४ (बाइबिल)

³ शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।

⁴ हुमायूँ अकबर का पिता था आरम्भ में इस्लामी धर्मान्धता के कारण अकबर हिन्दुओं पर अत्याचार किया करता था। बाद में उसने कहा था: “जैसे-जैसे मेरा ज्ञान बढ़ता गया, मैं शर्म में डूब गया। हर धर्म के मन्दिरों में चमत्कार घटित होते हैं।” उसने भगवद्गीता का फ़ारसी अनुवाद करवाया था और अपने दरबार में रोम से कई ईसाई पादरियों को आमन्त्रित किया था। अकबर ने गलत ही सही पर श्रद्धापूर्वक निम्नलिखित कहावत को ईसा मसीह की कृति मानकर फ़तेहपुर सीकरी की फ़तह कमान पर उत्कीर्ण कर दिया: मरियम के पुत्र ईसामसीह (इन्हें शान्ति प्राप्त हो) ने कहा: "यह दुनिया एक पुल है: इस पर से पार हो जाओ, पर इस पर घर मत बनाओ।”

⁵ एक जर्मन पहलवान ( मृत्यु १९२५) जो विश्व के सबसे शक्तिशाली मनुष्य के रूप में प्रसिद्ध है।

⁶ श्रीनगर कश्मीर की राजधानी है, जिसे सम्राट् अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बसाया था। अशोक ने वहाँ ५०० विहार (बौद्ध मठ) बनवाये थे, जिनमें से १०० विहार उस समय भी मौजूद थे जब एक हजार वर्ष बाद चीनी यात्री ह्यून सैंग कश्मीर गया था। एक अन्य चीनी यात्री फा-ह्येन (पाँचवी शताब्दी) ने पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में अशोक के विशाल राजमहल के खंडहरों को देखकर लिखा है कि स्थापत्य कला और शिल्पकला की दृष्टि से इस इमारत का सौन्दर्य इतना अनुपम और भव्य है कि इसे देखकर ऐसा लगता है कि यह मानवी हाथों की कृति नहीं है।