Prem Ratan Dhan Payo - 21 in Hindi Fiction Stories by Anjali Jha books and stories PDF | Prem Ratan Dhan Payo - 21

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Prem Ratan Dhan Payo - 21









नाश्ता बनाने के बाद वो परी के कमरे में चली गयी । चारो तरफ टेडी बियर से घिरी हुई गुड़िया आराम से सो रही थी । जानकी मुस्कुराते हुए उसके पास चली आई । वो परी के सिरहाने बैठ गयी और उसका सिर सहलाते हुए बोली " परी अब तो सुबह भी हो चुकी हैं क्या आपको उठना नही हैं । "

परी भला क्यों उठती ? जानकी इतने प्यार से उसका सिर सहला रही थी ऐसे में तो उसकी नींद जाने की वजाय वापस चलीं आएगी ।

जानकी ने फिर से उसे उठाने की कोशिश की ‌‌। परी ने अपनी आंखें खोली , तो उसके सामने एक सुंदर सा मुस्कुराता हुआ चेहरा था । जानकी प्यार से उसके गालों को चूमते हुए बोली ' गुड मॉर्निंग '

परी ने भी उनींदी आवाज में कहा " गुड मॉर्निंग जानू । "

" अगर आप इतनी देर तक सोएगी तो स्कूल जाने में देर हो जाएगी । काफी वक्त हो गया हैं चलिए हम आपको तैयार करते हैं । " ये बोल जानकी ने उसे गोद में उठा लिया और उसे लेकर वाशरूम की तरफ बढ गयी ।

इधर राघव भी तैयार होकर नीचे आ चुका था । करूणा पहले से ही डायनिंग टेबल पर मौजूद थी । संध्या उनके लिए टेबल पर नाश्ता लगा रही थी । आज नाश्ते से एक अलग खुशबू आ रही थी । संध्या ने ट्रे में रखा सामान नीचे रखा तो करूणा ने पूछा " ये सब परी के लिए हैं । क्या वो ये सब खाएगी ? "

संध्या ट्रे से सारा सामान टेबल पर रखते हुए बोली " बस आप देखते जाइए भाभी । हमारी जानू को जादू आता हैं । उसके हाथों में ऐसा टेस्ट हैं कोई भी खाएगा उंगलियां चाटता रह जाएगा । आप देखिएगा परी ये नाशता जरूर करेगी ? "

" लेकिन वो दोनों हैं कहा ? " करूणा ने कहा तो संध्या मुस्कुराते हुए बोली " वो लीजिए आ गए दोनों ।‌" करूणा और संध्या ने सीढ़ियों की ओर देखा जहां से जानकी परी को अपनी गोद में लेकर आ रही थी । राघव की पीठ इस वक्त सीढ़ियों की ओर थी । वो बस चुपचाप अपना नाश्ता कर रहा था । उसके कानों में पायलो की आवाज पहुंची , तो एक पल के लिए उसके हाथ रूक गए । बरसों बाद इस घर में पायलो की गूंज सुनी थी उसने । न चाहकर भी उसने नजरें घुमा ली । जानकी परी को लेकर डायनिंग टेबल के पास आ चुकी थी । लाइट येलो कलर का चूड़ीदार सलवार और सूट पहने जानकी बेहद प्यारी लग रही थी । बालों को गूंथकर चोटी बनाई हुई थी जो की कंधे के एक ओर थी ‌‌चेहरे पर सादगी थी अगर श्रृंगार की बात की जाए तो आंखों में हल्का काजल जो उसकी बडी बडी पलको को ओर लुभावना बना देता । माथे पर छोटी सी बिंदी । इन सबसे प्यारी थी उसकी मुस्कान । राघव की पलके उसके चेहरे पर थम सी गयी थी ।

असली खूबसूरती किसी की तारीफ की मोहताज नहीं होती,

उसके लिये तो बस आंखों की वाह वाही ही काफी होती है ।


जानकी ने परी को चेयर पर बिठाया , तो उसका हाथ राघव के हाथ को छूकर गुजरा जिससे उसका दुपट्टा उसकी घडी में फंस गया । जानकी का ध्यान अब कही जाकर राघव पर गया । मनभावन चेहरा जिस पर कोई भाव नही ।‌‌ अच्छी कद काठी । कानों मे पहना डायमंड स्टड , बैठने का सलीका ऐसा मानो गंभीरता की मुर्त हो । पल भर के लिए नजरे राघव के चेहरे पर ठहरी , लेकिन लज्जा से भरे ये आंखे राघव की नजरों की तपिश ज्यादा समय तक बर्दाश्त नही पर पाई । उन दोनों का ध्यान तब टूटा जब किसी की तालियां बजाने की आवाज उनके कानों तक पहुंची । ये और कोई नही परी थी । वो राघव के हाथ की ओर देख रही थी , जिसमें जानकी का दुपट्टा फंसा था । उसे ये देखकर बहुत खुशी हो रही थी ‌‌। राघव जानकी के दुपट्टे को अपनी घडी से आजाद करने लगा तो परी उसे रोकते हुए बोली " नही चाचू इसे रहने दो ये अच्छा लग रहा हैं । "

सबको परी की बात बेहद अजीब लगी । संध्या उसे देखते हुए बोली " हां क्यों नही हम इसकी एक तस्वीर निकलवा लेते हैं और फ्रेम में लगवा देंगे फिर आप आराम से देखते रहना । "

राघव अपनी घडी से जानकी के दुपट्टे को आजाद कर चुका था । जानकी वही परी के पास वाली चेयर पर बैठ गयी । उसने परी के लिए नाशता निकाला । परी ने न में अपना सिर हिला दिया । राघव अपने मन में बोला " जो काम इतनी लड़कियां न कर सकी वो ये क्या करेगी ? "

जानकी खाने की प्लेट अपने हाथों में लेकर बोली " परी आपने कल शाम को डैरी मिल्क चॉकलेट खाई थी न । "

परी ने हां में अपना सिर हिलाया । जानकी आगे बोली " वो टेस्टी भी थी । " परी ने फिर से अपना सिर हां में हिला दिया । जानकी खाने का एक निवाला उसकी ओर बढ़ाकर बोली " इसमें भी वही वाला टेस्ट हैं । अगर आपको लगता हैं मैं झूठ बोल रही हूं तो खाकर देखिए । " परी ने उसके हाथों से खा लिया । जानकी ने दूसरा निवाला बढाया तो परी फिर से न में सिर हिलाने लगी । " नही इसमें तो चॉकलेट हैं ही नही । "

जानकी मासूम सी शक्ल बनाकर बोली " अच्छा इसमें नही हैं तो फिर इसमें होगी ‌‌। " ये बोल उसने दूसरा निवाला भी खिला दिया । कुछ इसी तरीके से जानकी ने उसे पूरा नाश्ता कराया । परी जूस का गिलास खत्म करने के बाद बोली " अरे ये तो खाली हो गया लेकिन मुझे तो अपने चॉकलेट का टेस्ट कही नही मिला । जानकी सर पीटने के नाटक करते हुए बोली " धत् तेरी मैं तो चॉकलेट डालना भूल ही गयी । " जानकी के ये कहते ही करूणा और संध्या को हंसी आ गयी । राघव ने आज बडे दिनों बाद अपनी भाभी मां को इस तरीके से हसते हुए देखा था । उसके चेहरे पर कोई एक्सप्रेसन नही था लेकिन अंदर से वो खुश था ।

करूणा संध्या से बोली " मान गए संध्या आपकी दोस्त को । इस नटखट गुड़िया को संभालने के लिए हमे किसी ऐसे ही समझदार शख्श की जरूरत थी । "

जानकी भी उनकी बातों पर मुस्कुरा रही थी । परी जानकी की ओर देखकर बोली " आप न दूसरे वाले खाने में पक्का चॉकलेट डालना । " जानकी ने मुस्कुराकर हां में अपना सिर हिला दिया ।

" आप यही हमारा वेट कीजिए हम आपका स्कूल बैग लेकर आते हैं । " इतना बोल जानकी उसके कमरे की ओर बढ गई । राघव ने अपना फ़ोन उठाया और परी के माथे पर किस कर ऑफिस के लिए निकल गया । जानकी परी का स्कूल बैग लेकर नीचे चली आई । परी ने करूणा को बॉय कहा और जानकी के साथ चली गई । ड्राइवर बाहर उन्हीं का वेट कर रहा था । उसने जानकी के हाथों से स्कूल बैग लेकर गाडी में रखा और उन दोनों के लिए पीछे का दरवाजा खोला । उनक बैठते ही ड्राइवर ने गाडी स्टार्ट कर आगे बढा दी ।

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दोपहर का वक्त , राघव का ऑफिस




आज ऑफिस का माहौल काफी शांत था । हो भी क्यों न आज राघव का मूड काफी अच्छा था । उसके बिहेवियर में एक चेंज था और वो थी पोलाइटनेस जो बेहद ही कम नज़र आती थी ।

राघव दीपक की दी हुई फाइल्स पर साइन कर रहा था तभी कैबिन का डोर खुला । उन दोनों ने नजरें उठाकर सामने की ओर देखा तो बाहर अमित खडा था । राघव ने फाइल दीपक को देते हुए कहा । " दो फाइलें अभी बाकी हैं । एक घंटे बाद आकर ले जाना । "

दीपक उसके हाथों से फाइल लेकर बाहर चला गया । दरवाज़े पर पहुंचकर उसने अमित को ग्रीट किया । अमित ने भी उसे रिप्लाई दिया । उसके जाते ही अमित अंदर चला आया । वो राघव के सामने वाली चेयर पर बैठते हुए बोला " तो मिल गया वो इंजिनियर । "

" हां , मिल भी गया और उसे उसके अंजाम तक भी पहुंचा दिया । " राघव ने ये कहते हुए पैन का कैप लगाया ।

" राघव उसने बताया इन सबके पीछे किसका हाथ था ‌। " अमित ने पूछा तो राघव बोला ' अगर उसने सच कहा होता तो जिंदा होता और जेल की सलाखों के पीछे होता । "

" यूं मीन तुमने उसे जान से मार डाला । " अमित ने पूछा ।

राघव न में सिर हिलाते हुए बोला " तडप भरी मौत तो अपने हाथों से ही उसे देना चाहता था , लेकिन एक लडकी बीच में आ गयी और उसे बचाकर हॉस्पिटल ले आयी । मैं तो उसके ठीक होने का इंतजार कर रहा था , ताकी उसे और भयंकर सजा दे सकू लेकिन डाक्टरस ने बताया इलाज के दौरान वो बच नही पाया । "

" एक मिनट क्या कहा तुमने कोई लडकी , अब तेरे काम के बीच में कोई लडकी कहां से आ गयी । " अमित कह ही रहा था की तभी राघव बोला " यही तो जानना है मुझे आखिर कौन है वो लडकी जिसने राघव सिंह रघुवंशी के काम में टांग अड़ाने की कोशिश की हैं । "

" तेरे काम के बीच में आई है , है सकता है वो इस शहर में नयी है और तेरे बारे में जानती न हो ।‌" अमित ने कहा ।

" इसलिए तों मिलना चाहता हूं ताकी अपने बारे में बता सकू जिससे वो दोबारा कभी मेरे रास्ते में न आए । ' राघव ने कहा ।

" अच्छा छोड ये सब मुझे ये बता भाभी मां को कोई केअर टेकर मिली या नहीं । अगर कोई हेल्प चाहिए तो मैं कोशिश करता हूं । " अमित ने कहा ।

" नही उसकी कोई जरूरत नहीं है , भाभी मां ने केअर टेकर रख ली है । "

" चलो अच्छी बात हैं एक बडी टेंशन तो दूर हुई । अच्छा मैं अभी निकलता हूं । शाम को डिनर पर मिलते हैं । " अमित ने उठते ही कहा और राघव को बाय बोल वहां से चला गया ।

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शाम का वक्त , जनकपुर




महेश जानकी से मिलने के लिए उसके घर आया हुआ था । दरवाज़े पर लगे ताले को देखकर महेश खुद से बोला " कहां हैं ये ? कोई दूसरी जॉब मिल गयी हैं क्या ? कम से कम मुझे बताना तो चाहिए था । "

" महेश तुम यहां । " पीछे से मैथिली की आवाज आई तो महेश ने पलटकर देखा ।। " मैथिली तुम्हें पता है जानू कहां गयी हैं । दो दिन से इसी वक्त आता हूं तो हर बार मुझे दरवाजे पर ताला लगा दिखता है । "

मैथिली उसके पास आकर बोली " बेवकूफ कही के मेरे घर आ जाते पूछने के लिए । जानू अयोध्या गयी हैं । उसकी वहां जॉब लग गयी ‌। " मैथिली की बात सुन महेश चौंकते हुए बोला " क्या ..... ? अयोध्या चली गई ऐसे अचानक । '

" हां सबकुछ अचानक ही हुआ । संध्या आई थी , उसी के साथ जानकी अयोध्या गयी हैं । जहां संध्या काम करती हैं वही उसकी जॉब लगी है । तुम शहर से बाहर गए हुए थे इसलिए तुम्हें ये बात नही पता चली । " महेश कुछ नही बोला , उसे अंदर से एक चुभन महसूस हो रही थीं । जानकी का इस तरीके से जाना उसे बिल्कुल अच्छा नही लगा ।‌‌ महेश जाने लगा तो मैथिली बोली ' कहां जा रहे हो ? "

महेश बिना पलटे बोला " जरूरी काम हैं बाद में मिलता हूं । " इतना कहकर वो अपनी बाइक लेकर वहां है निकल गया । मैथिली भी अपने घर चली गई ।

महेश को जानकी के साथ बिताए पल याद आ रहे थे । उसने पुल साइड बाइक रोकी और पुल के किनारे खडा होकर नीचे बह रही नदी की ओर देखने लगा । उसने खुद से कहा " जाने से पहले एक कॉल तो कर लिया होता जानू । मैंने तो सोचा था इस बार की होली हमारी स्पेशल होगी । मैं तब तक तुम्हें अपने दिल की बात बता दूगा , लेकिन देखो न सब ख्वाब बनकर ही रह गया । कम से कम एक फोन कर दिया होता जानू । " महेश ने अपने दोनों हाथ पुल की दीवार पर टिका लिया और अपनी दोनों आंखें बंद कर ली ।

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‌क्या महेश जानकी से अपने दिल की बात करने लाला था लेकिन सचमुच ये एक ख्वाब बनकर रह गया ।

राघव और जानकी की मुलाकातें इन्हें पास लाएगी या फिर एक सच इनके बीच कड़वाहट को जन्म देगा ये हमे आगे पता चलेगा । तब तक के लिए पढ़ते रहिए मेरी नोवल

प्रेम रत्न धन पायो

( अंजलि झा )


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