Hanuman Prasad Poddar ji - 34 in Hindi Biography by Shrishti Kelkar books and stories PDF | हनुमान प्रसाद पोद्दार जी (श्रीभाई जी) - 34

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हनुमान प्रसाद पोद्दार जी (श्रीभाई जी) - 34


[श्रीभाईजी के शब्दों में]
“ प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद महामना श्रीमालवीयजी से मेरा परिचय लगभग सन् 1906 से था। उस समय मैं कलकत्तेमें रहता था। वे जब-जब पधारते, तब-तब मैं उनके दर्शन करता। मुझपर आरम्भ से अन्त तक उनकी परम कृपा रही और वह उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी। उनके साथ कुटुम्ब-सा सम्बन्ध हो गया था। वे मुझको अपना एक पुत्र समझने लगे और मैं उन्हें परम आदरणीय पिताजी से भी बढ़कर मानता। इस नाते मैं उन्हें "पण्डितजी" न कहकर सदा "बाबूजी" ही कहता। घर की सारी बातें वे मुझसे कहते। कुछ समय तो मैं उनके बहुत ही निकट-सम्पर्कमें रहा, इसलिये मुझको उन्हें बहुत समीप से देखने-समझने का अवसर मिला। उनकी बहुमुखी प्रतिभा थी और उनका कार्य क्षेत्र भी बड़ा विस्तृत था। वे परम धार्मिक होने के साथ ही बहुत सुलझे हुए राजनीतिक थे। शिक्षा-विस्तार-प्राचीन सनातनधर्म की रक्षा करते हुए जनतामें सत्-शिक्षा का प्रसार तो उनके जीवन का प्रधान कार्य था। यहाँ उनके पवित्र जीवन के कुछ संस्मरण संक्षेपमें लिखकर अपने को पवित्र करता हूँ–

१. वे एक बार गोरखपुर पधारे थे और मेरे पास ही दो-तीन दिन ठहरे थे। उनके पधारने के दूसरे दिन प्रातःकाल मैं उनके चरणों में बैठा था। वे अकेले ही थे। बड़े स्नेह से बोले-"भैया! मैं तुम्हें आज एक दुर्लभ तथा बहुमूल्य वस्तु देना चाहता हूँ। मैंने इसको अपनी मातासे वरदान के रूपमें प्राप्त किया था। बड़ी अद्भुत वस्तु है। किसी को आजतक नहीं दी, तुमको दे रहा हूँ। देखनेमें चीज छोटी-सी दीखेगी, पर है महान् "वरदानरूप"। इस प्रकार प्राय: आधे घंटे तक वे उस वस्तु की महत्तापर बोलते गये। मेरी जिज्ञासा बढ़ती गयी। मैंने आतुरता से कहा-- "बाबूजी ! जल्दी दीजिये, "कोई आ जायेंगे।
तब वे बोले--"लगभग चालीस वर्ष पहले की बात है। एक दिन मैं अपनी माताजी के पास गया और बड़ी विनय के साथ मैंने उनसे यह वरदान माँगा कि "मुझे आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मैं कहीं भी जाऊँ, सफलता प्राप्त करूँ।"

"माताजी ने स्नेह से मेरे सिरपर हाथ रक्खा और कहा--"बच्चा! बड़ी दुर्लभ चीज दे रही हूँ। तुम जब कहीं भी जाओ, तब जाने के समय “नारायण-नारायण” उच्चारण कर लिया करो। तुम सदा सफल होओगे।" मैंने श्रद्धापूर्वक सिर चढ़ाकर माताजी से मन्त्र ले लिया। हनुमानप्रसाद ! मुझे स्मरण है, तबसे अब तक मैं जब-जब चलते समय "नारायण-नारायण" उच्चारण करना भूला हूँ, तब-तब असफल हुआ हूँ। नहीं तो, मेरे जीवनमें--चलते समय "नारायण-नारायण" उच्चारण कर लेने के प्रभाव से कभी असफलता नहीं मिली। आज यह महामन्त्र--मेरी माता की दी हुई परम वस्तु तुम्हें दे रहा हूँ। तुम इससे लाभ उठाना यों कहकर महामना गद्गद हो गये।

मैंने उनका वरदान सिर चढ़ाकर स्वीकार किया और इससे बड़ा लाभ उठाया। अब तो ऐसा हो गया है कि घरमें भी सभी इसे सीख गये हैं। अब कभी घर से बाहर निकला जाता है, तभी बच्चे भी "नारायण-नारायण" उच्चारण करने लगते हैं। इस प्रकार रोज ही, किसी दिन तो कई बार “नारायण” की और साथ ही पूज्य मालवीयजी की पवित्र स्मृति हो जाती है।

२. जब मैं बम्बईमें रहता था, अमृतसरमें कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। लोकमान्य तिलक उसके अध्यक्ष थे। मैं अपने एक तरुण मित्र के साथ बम्बई से अमृतसर पहुँचा। दिसम्बर का महीना था। उस साल कुछ ही दिनों पहले अमृतसरमें भयानक वर्षा हुई थी। पंजाब की सर्दी प्रसिद्ध है और इस वर्षा के कारण वहाँ सर्दी बहुत ही बढ़ी हुई थी। हमलोगों ने बम्बईमें सर्दी देखी नहीं थी, इससे साधारण कपड़े ले गये थे। दोनों के पास ओढ़ने-बिछाने के लिये एक-एक चद्दर और एक-एक हल्का-सा कम्बल था। अमृतसरमें हमलोग महामना मालवीयजी के डेरेपर जाकर ठहरे। एक बड़ी धर्मशालामें वे ठहराये गये थे। शायद महात्मा गाँधी भी उसीमें ठहरे थे। रात को हम दोनों चारपाइयों पर सो गये। शरीर ठिठुर रहा था। छाती पर घुटने किये पड़े थे। कम्बलसे मुँह ढक रक्खा था, पर शरीर काँप रहा था। रातको 9 बजे होंगे। महामना मालवीय जी सबको सँभालते हुए हम लोगों की चारपाइयों के पास आये। मुँह ढके सिकुड़े सोये हुए देखकर उन्होंने पूछा-- "कौन हो, कहाँ से आये हो ? खाया कि नहीं ?" मैंने मुँह पर से कपड़ा हटाया। तुरन्त उठकर खड़ा हो गया और चरणस्पर्श किया। मेरे साथीने उठकर चरणस्पर्श किया। हमलोग काँप रहे थे। उन्होंने मुझे पहचानकर पूछा--"कपड़े कहाँ हैं ?" मैंने कहा-- "बिछा-ओढ़ रक्खे हैं न ?" वे बोले-- “बस, ये कपड़े हैं ? तुम्हें पता नहीं था क्या, यहाँ कितने कड़ाके का जाड़ा पड़ता है ? अमृतसर को बम्बई समझ लिया ?” यह कहते-कहते ही उन्होंने अपने साथ आये हुए एक पंजाबी सज्जन से कहा--"जल्दी आठ कम्बल लाइये।" फिर पूछा-- "खाया कि नहीं ?" मैंने कहा--"खा लिया"। फिर बोले- "देखो, तुमने बड़ी गलती की, जो मुझसे कहा नहीं। यह तो मैं आ गया, नहीं तो तुमलोगों को रात को बड़ा कष्ट होता और पता नहीं, इसका क्या नतीजा होता। क्यों इतना संकोच किया ?" मैं क्या उत्तर देता। इतनेमें दो-तीन आदमी आठ मोटे कम्बल ले आये। दो-दो कम्बल हमारी चारपाइयोंपर बिछा दिये गये। और दो-दो हम लोगों के ओढ़ने के लिये रख दिये गये। गरम चाय मँगवाकर दोनों को पिलायी। जब तक हमलोग चाय पीकर सो नहीं गये, तब तक वे वहीं एक कुर्सी पर बैठे रहे। हम लोग उनके जाने पर ही सोना चाहते थे, पर उन्होंने कहा-- "तुमलोग ओढ़कर सो नहीं जाओगे, तब तक मैं नहीं जाऊँगा।" इसलिये हमें सोना पड़ा। उनकी यह ममता देखकर हमलोगों का हृदय भर आया।

३. मालवीयजी के चार लड़के थे- रमाकान्त, राधाकान्त, मुकुन्द और गोविन्द। इनमेंसे मुकुन्द को मालवीयजी ने मेरे पास बम्बई भेज दिया था— वे वहाँ बहुत दिनों तक रहे। पीछे दूसरे लड़के राधाकान्त भी वकालत को छोड़कर इलाहाबाद से बम्बई चले गये-- सट्टे का व्यापार करने । राधाकान्तजी को एक ज्योतिषी मित्र ने बताया-- "आपको सट्टेमें बहुत पैसा मिलेगा।" मित्र की सलाहपर विश्वास करके राधाकान्त जी सट्टे का व्यापार करने लगे। राधाकान्तजी बरबाद हो गये। इन्हीं दिनों मेरा काशी जाना
हुआ। मैं मालवीयजी से मिलने गया। वे राधाकान्त की बरबादी से दुःखी थे। कारण बहुत जिसमें •

मेरे बम्बई पहुँचने के बाद शीघ्र ही मालवीयजी का एक तार मिला,-- "तुम राधकान्त को कहो, विश्वासपूर्वक आर्तभाव से "गजेन्द्रमोक्षस्तोत्र का पाठ करे, ऋण उतर जायेगा।" मैंने मालवीयजी का यह आदेश राधाकान्त को बतला दिया, किन्तु इन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। पीछे मालवीयजी का एक पत्र भी मिला। उसमें उन्होंने “गजेन्द्रमोक्षस्तोत्र”– पाठ के महत्त्वविषयक अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए लिखा था--"मैं नाकतक ऋणमें डूब गया था। मैंने गजेन्द्रमोक्ष का विश्वासपूर्वक आर्तभाव से पाठ किया और मेरा ऋण उतर गया।"

४. श्रीबालूराम जी "रामनाम के आढ़तिया" के साथ हमलोग गाँधीजी के पाससे मालवीयजी के यहाँ गये थे। मालवीय जी राजा गोविन्दलाल जी पित्ती के मकानमें ठहरे हुए थे । जाकर हम लोगों ने उन्हें प्रणाम किया। मालवीयजी ने पण्डितजी का परिचय पूछा। मैंने उनका पूरा परिचय दिया और उनको साथ लिवा लाने का हेतु बताया। मालवीय जी ने बड़े ही प्यारसे पूरा विवरण सुना, बार-बार पूछा और पण्डितजी की बड़ी प्रशंसा की। पीछे उन्होंने अपने हस्ताक्षर कर दिये, वे बड़े आतुर थे। ठीक उन्हीं के शब्द हैं-- “जब से मैंने होश सँभाला तबसे प्रतिदिन नाम-जप करता हूँ और जब तक होश रहेगा, प्रतिदिन करता रहूँगा।”

मालवीयजीके प्यारकी और भी अनेक स्मृतियाँ हैं।