Me Papan aesi jali - 5 books and stories free download online pdf in Hindi

मैं पापन ऐसी जली--भाग(५)

यूँ ही एक दिन सरगम रसोई में खाना पका रही थी,तभी पीछे से किसी ने उसकी चोटी खींची और पूछा....
ए...पागल ये क्या हो रहा है?
सरगम पीछे घूमी तो एक नवयुवक उसके सामने खड़ा था,उसने जैसे ही सरगम को देखा तो बोल पड़ा...
माँफ कीजिएगा,मुझे लगा भानु है....
तभी पीछे से भानू आई और उस नवयुवक से बोली...
ओह....तो इतने दिनों बाद हमारे घर शायर साहब पधारें हैं....
तब वो नवयुवक बोला....
अब क्या करें?आना ही पड़ा,सोचा अपनी शायरियाँ सुनाकर आप सबको परेशान किया जाएं....
रहने दीजिए कमलकान्त बाबू!ज्यादा बहाने ना बनाइए,कोई काम होगा तभी आप यहाँ आएं है,वरना जबसे भइया पढ़ाई के लिए विदेश गए हैं तो आप तो ईद का चाँद हो गए हैं,आप केवल उनसे मिलने ही आते थे,भानुप्रिया बोली...
ना भानू!ऐसा कुछ नहीं है,कुछ दिनों से ज्यादा मसरूफ़ था,कमलकान्त बोला...
झूठ मत बोलिए,जैसे मुझे कुछ पता नहीं है,भानू बोली....
लो !अब तुम्हें मेरी बात पर भरोसा ही नहीं हो रहा,कमलकान्त बोला....
कैसें भरोसा होगा आपकी बात पर,आप ठहरें शायर और आपको शहद समझकर आपके इर्दगिर्द लड़कियांँ मधुमक्खियों की तरह मँडरातीं हैं,तो चले गए होगें उनमें से किसी के संग रास रचाने,भानू बोली...
तुम भी कैसीं बातें करती हो,भानू!तुमने तो मुझे बिल्कुल लफंगा ही समझ लिया,कमलकान्त बोला...
आप ऐसे ही हैं,भानू बोली....
अच्छा!ये सब छोड़ो, पहले ये बताओ कि ये मोहतरमा कौन हैं,पहले कभी तो मैनें इन्हें यहाँ नहीं देखा,कमलकान्त ने पूछा..
जी!ये मेरी दीदी हैं,मतलब पापा के मित्र की बेटी हैं,यहाँ पढ़ने के लिए आईं हैं,भानू बोली....
ओह....इनका नाम तो तुमने बताया ही नहीं,कमलकान्त ने भानू से कहा....
ओह....हाँ! इनका नाम सरगम है,भानू बोली....
इनका नाम इनकी ही तरह सुन्दर है,कमलकान्त बोला....
कमल बाबू!इन्हें भी लाइन मारने लगे आप! भानू बोली...
ना!तुम तो गलत समझ बैठीं,कमलकान्त बोला....
वैसे मैं बता दूँ कि ये गाना भी बहुत अच्छा गातीं हैं,भानू बोलीं....
ओह....इतनी खूबियाँ....कमाल है....कमलकान्त बोला....
अच्छा!आण्टी कहाँ हैं?मैं उनसे भी मिलकर आता हूँ,कमलकान्त बोला....
वें तो घर पर नहीं हैं,शायद अपनी किसी बीमार सहेली से मिलने गईं हैं,भानू बोली....
तो आज तुमसे ही बात करके काम चलाना पड़ेगा,कमलकान्त बोला....
अब घर आएं हैं तो इतना तो झेलना ही पड़ेगा,भानू बोलीं....
तब सरगम भानू से बोली....
भानू!अपने मेहमान से पूछो,चाय पियेगें...
दीदी!भला ये भी कोई पूछने की बात हैं,ये साथ में पकौडे़ भी खाएंगे और रात के खाने के लिए कहोगी तो भी रुक जाऐगें,ये भुक्खड़ जो ठहरें,भानू बोलीं....
क्यों ख्वामख्वाह में बदनाम कर रही हो भानू!भला तुम्हारी दीदी क्या समझेगी मेरे बारें में,कमलकान्त बोला...
वें कुछ नहीं समझेगी,वें आपकी तरह नासमझ नहीं हैं,भानू बोलीं...
इसका मतलब तुम्हारी दीदी बड़ी समझदार हैं,कमलकान्त बोला.....
और क्या?भानू बोली....
भानू और कमलकान्त के बीच बातें चल ही रहीं थीं कि इसी बीच सरगम चाय और गरमागरम पकौड़े ले आई...और रखकर जाने लगी तो कमल ने पूछा....
आप चाय नहीं पिऐगीं सरगम जी!
जी नहीं!मुझे रसोईं में बहुत काम है,चाची जी मंदिर से आने वालीं होगीं,तब तक रसोईं के काम निपटा लेती हूँ,नहीं तो वें मुझे कुछ करने नहीं देगीं,नौकर करते हैं तो उन्हें नौकरों का काम पसंद नहीं आता और नौकर खामख्वाह में उनसे डाँट खा जाते हैं,सरगम बोलीं...
आप तो इस घर की ऐसे फिकर कर रहीं हैं जैसे कि आप इस घर की बहु हों,कमलकान्त हँसते हुए बोला....
कमल बाबू!ये क्या कह रहे हैं आप?भानू कमल से बोली...
सही तो कह रहा हूँ,कमल बोला....
तब तक सरगम वहाँ से जा चुकी थी,उसे कमलकान्त का यूँ बेबाकी से बात करना पसंद नहीं आया,सरगम को जाता देख भानू बोली...
कमल बाबू!लगता है दीदी को आपकी बातों का बुरा लग गया है,तभी वें यहाँ से चलीं गईं.....
तुम्हारी दीदी तो बड़ी संवेदनशील है,कमल बोला....
वें छोटे से कस्बें से आईं हैं,उन्हें लड़को से बात करना पसंद नहीं है,वें ज्यादा किसी से खुलतीं नहीं,उनका स्वाभाव ही ऐसा है,भानू बोली....
तुम्हारी दीदी तो शरम की दुकान निकली,कमलकान्त बोला....
तो थोड़ी शरम आप उनकी दुकान से अपने लिए खरीद लीजिए ,क्योंकि आप बेशर्म जो ठहरे,भानू बोली....
भानू! बहुत देर से मैं यही सोच रहा था,कमलकान्त बोला...
और कमलकान्त की बात सुनकर भानू हँस पड़ी और साथ साथ कमलकान्त भी हँस पड़ा,तभी भानू बोली...
शायर साहब!कुछ नया लिखा हो तो सुनाइए.....
तब कमलकान्त बोला.....
लीजिए! मोहतरमा तो फिर सुनिए.....
तब भानू बोली...
इरशाद...इरशाद...
कमलकान्त ने एक शेर सुनाया जो कुछ इस प्रकार था...

तेरी आँखों के काजल को देखा तो लगा साँझ हुई,
तेरे होठों की लाली छलका हुआ मदमस्त जाम हुई,
अब तू ही दिल की आरजू और तू ही मेरा अरमान हुई,
जिसे ढूढ़ता आया था अब तक,खोज वो तमाम हुई,
तू ही मेरी रात,तू मेरा दिन,तू ही मेरी सुरमई शाम हुई
अब तू ही मेरा गुल,तू ही गुलशन और तू ही गुल्फाम हुई........

कमलकान्त का शेर खतम होते ही भानू बोली.....
वाह....जनाब!क्या शायरी अर्ज की है...बहुत ही उम्दा...बहुत ही बेहतरीन....
पसंद आया आपको,कमलकान्त ने भानुप्रिया से पूछा....
जी बहुत!भानू बोलीं....
धन्य भाग्य हमारे जो आपको हमारी शायरी पसंद आई,कमलकान्त भानू से बोला....
कमलकान्त और भानू के बीच बातें चल हीं रहीं थीं कि तभी भानुप्रिया की माँ शीतला बाहर से वापस आ गई और उन्होंने जब कमलकान्त को घर पर देखा तो उनके चेहरे पर खुशी के भाव आ गए और उन्होंने कमलकान्त से कहा....
कमलकान्त!बेटा!कब आएं?
पहले कमलकान्त ने शीतला जी के चरणस्पर्श किए और उनसे बोला.....
बस!अभी थोड़ी देर पहले आया....
चाय वगैरह पिलाई इस कामचोर भानू ने या नहीं,शीतला ने पूछा....
भानू ने तो नहीं लेकिन सरगम जी ने चाय भी पिलाई और साथ में पकौड़े भी खिलाएं,कमलकान्त बोला...
सरगम तो बहुत प्यारी बच्ची है,कुछ तू भी उससे सीख ले,कल को ससुराल जाएगी तो तेरे काम आएगा, शीतला भानू से बोली....
माँ!मेरा रसोई के कामों में जी नहीं लगता,भानुप्रिया अपनी माँ शीतला से बोली....
एक तू है और एक वो सरगम है जो बिन कहे सबके मन की बात समझ जाती है,शीतला बोली....
मैनें कब कहा कि सरगम दीदी अच्छी नहीं हैं,वें तो बहुत अच्छी हैं,उनके जैसी काबिल लड़की तो ढूढ़ने से नहीं मिलेगी,भानुप्रिया बोली....
आण्टी!आप जब भानू का ब्याह करिएगा तो दहेज में खूब सारे नौकर दीजिएगा ताकि भानू को ससुराल में कोई काम ना करना पड़े,कमलकान्त बोला....
नौकर क्यों ?मैं तो लड़का ही ऐसा ढूढ़ूगी जो मुझे खाना पकाकर खिलाएं,भानू बोली....
तो महारानी जो को पति नहीं गुलाम चाहिए,कमलकान्त बोला....
और क्या अपने लिए गुलाम ही ढूढ़ूगी जो अपनी बेग़म को पकाकर खिलाएं,भानू बोली....
और फिर भानू की बात सुनकर सभी हँसने लगे.....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....


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