Me Papan aesi jali - 9 books and stories free download online pdf in Hindi

मैं पापन ऐसी जली--भाग(९)

सरगम अपने कमरें आई और बिस्तर पर किताबें फैलाकर पढ़ने बैठ गई,लेकिन जैसे ही उसने किताब उठाई तो उसे रह रहकर आदेश और उसकी बातें याद आने लगीं,उसने मन में सोचा कितना साधारण सा व्यक्तित्व है आदेश का,इतने अमीर घराने का होने पर भी उसमें जरा भी घमण्ड नहीं है,देखने में भी बुरा नहीं है,गोरा रंग,सुन्दर नैन-नक्श और अच्छी भली कद-काठी है उसकी,कितना सभ्य,शालीन और विनम्र है,विदेश में रहकर आया है लेकिन अभी तक अपने संस्कार नहीं भूला,अच्छा लगा उससे बात करके और इसी तरह सरगम कुछ देर तक आदेश के ख्यालों में डूबी रही और वो कब सो गई उसे कुछ पता ही नहीं चला....
सुबह की पहली किरण के साथ वो जागी और वो खुद को बहुत तरोताज़ा महसूस कर रही थी,वो अपने बिस्तर से उठी और पहले वो सबके लिए चाय बनाने रसोई में पहुँची,क्योंकि सुबह उठते ही सबसे पहले वो यही काम किया करती थी,इसलिए चाय बनाकर पहले वो चाचा-चाची के कमरें चाय देने पहुँची फिर आदेश के कमरें के दरवाजे पर दस्तक देती हुई बोली....
"आदेश जी!चाय ले लीजिए"
आदेश ने आँखें मलते हुए दरवाजा खोला और सरगम से बोला....
"सरगम!इतना सम्मान देने की कोई जरूरत नहीं है,तुम मुझे आदेश भी कह सकती हो",
"जी!आपका नाम लेकर पुकारना मुझे कुछ अच्छा नहीं लगेगा",सरगम सकुचाते हुए बोली...
"इसमें अच्छा ना लगने वाली कौन सी बात है,सभी तो मेरा नाम पुकारते हैं अगर तुम भी मेरा नाम पुकार लोगी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा",आदेश बोला....
"जी!आप कहते हैं तो कोशिश करूँगी",सरगम बोली....
"और ये आप आप क्या लगा रखा है,तुम बोला करो",आदेश बोला...
"ठीक है"
और इतना कहकर सरगम आदेश के कमरें के पास से चली गई फिर चाय लेकर वो भानूप्रिया के कमरें के पास पहुँची और दरवाजे पर दस्तक देते हुए बोली....
"भानू मैडम!चाय हाजिर है",
"दरवाजा खुला है दीदी!दरवाजे केवल अटके हुए हैं,तुम भीतर आ जाओ",भानू कमरें के भीतर से बोली....
फिर सरगम चाय लेकर भीतर पहुँची तो भानू बिस्तर पर लेटी अभी भी ऊँघ रही थी,भानू को बिस्तर पर लेटा देख सरगम बोली....
"उठ भी जा,कब तक यूँ आलसियों की तरह लेटी रहेगी",?
"बहुत अच्छा सपना देख रही थी दीदी!लेकिन तुमने मेरा सपना तोड़ दिया",भानू बोली...
"ऐसा भी क्या सपना देख रही थी?जो सपना टूटने पर इतना अफसोस कर रही है",सरगम ने पूछा...
"और भला किसका सपना देखूँगीं,एक ही तो शहजादा है जिसके मैं सपने देखती हूँ",भानू बोली...
"अच्छा!तो कमलकान्त बाबू आए थे तेरे सपनों में",सरगम बोली...
"हाँ!दीदी!वो मुझे बाँहों भरने ही वाले थे बस कि तुमने मुझे जगा दिया,कितनी बेरहम हो तुम !",भानू बोली....
"इतनी मौहब्बत करती है उनसे तो कह क्यों नहीं देती",सरगम बोली....
"बस यहीं तो कमबख्त हिम्मत जवाब दे जाती है",,भानू बोली...
"तो फिर तड़पती रह यूँ ही ",सरगम बोली...
"इस तड़प का भी अपना ही मज़ा ही दीदी!जब तुम्हें किसी से मौहब्बत होगी ना!तब तुम्हें इस तड़प का एहसास होगा",भानू बोली....
"बस...बस...रहने दे,मुझे नहीं तड़पना ऐसे और ना ही किसी से मौहब्बत करनी है",सरगम बोली...
"दीदी!मौहब्बत की नहीं जाती ,वो तो हो जाती है और जब तुम्हें किसी से मौहब्बत होगी ना! तब तुम्हें पता चलेगा कि मौहब्बत क्या बला है?",भानू बोली...
"चल..अब ज्यादा बातें ना बना,चाय पी और तैयार होकर नीचे आजा और आज मेरा रसोई में हाथ बँटवा दे",सरगम बोली...
"आज मेरी क्या जरूरत पड़ गई रसोई में,तुम तो हर दिन अकेले सारा काम सम्भालती हो",भानू ने कहा....
"तेरे भइया क्या खाते हैं नाश्ते में , ये मुझे नहीं पता ना!तू होगी रसोई में तो मुझे मुश्किल नहीं होगी",सरगम बोली....
"ओहो.....भइया का इतना ख्याल! क्या बात है दीदी!," भानू ने पूछा...
"तू ज्यादा दिमाग मत चला,चुपचाप तैयार होके नीचें आ जइओ,अब मैं भी तैयार होने ही जा रही हूँ",
और ऐसा कहकर सरगम तैयार होने चली गई,कुछ देर बाद वो नहाकर रसोई में पहुँची और नाश्ते की तैयारी में लग गई,तभी शीतला जी रसोई में आकर सरगम से बोलीं....
"सरगम बेटा!आज नाश्ते में क्या बना रही हो?"
"जी!मैं सोच रही थी कि आलू की तरी वाली सब्जी और पूरियाँ बना लूँ",सरगम बोली....
"ना!बेटी!आदेश इतनी ओइली नाश्ता नहीं करेगा,हम सबको तो ऐसा नाश्ता करने की आदत है लेकिन आदेश तो अभी विदेश से लौटा है उसे ये सब खाने की अब आदत ना रह गई होगी,तू ऐसा कर बेसन के चीले और हरी चटनी बना लें,संग में मौसम्बी का चूस देना",शीतला जी बोलीं....
"जी!ठीक है तो फिर मैं बेसन के चीले ही बना लेती हूँ,अच्छा किया जो आपने बता दिया,नहीं तो मैं तो पूरियाँ ही तलने वाली थी",सरगम बोली....
"अच्छा!ठीक है तू नाश्ता बना,मैं जब तक पूजा कर लेती हूँ",
और ऐसा कहकर शीतला जी वहाँ से चली गईं,उनके जाते ही भानूप्रिया भी नहाकर रसोई में चली आई और उसने सरगम से पूछा....
"तो आज क्या बन रहा है नाश्ते में"?
"बेसन के चीले",सरगम बोली....
"तो दीदी!आखिरकार तुमने भइया की पसंद का पता लगा ही लिया",भानूप्रिया बोली....
"मैनें पता नहीं लगाया,अभी चाची जी बताकर गई हैं कि आदेश जी को क्या पसंद है नाश्ते में",सरगम बोली.....
"तो चलो मैं भी तुम्हारी कुछ मदद करवा लेती हूँ",भानूप्रिया बोली...
"ऐसा कर तू किचन गार्डन से हरी मिर्च और हरी धनिया तोड़ ला और इसके बाद मौसम्बी का चूस निकाल ले",सरगम ने भानूप्रिया को काम बताते हुए कहा...
"ठीक है तो मैं अभी धनिया और मिर्च तोड़कर लाती हूँ"
और ऐसा कहकर भानू किचन गार्डन की ओर चली गई,फिर भानू धनिया-मिर्च लेकर वापस लौटी तो मौसम्बी का चूस निकालने लगी और इधर सरगम ने सबके लिए गरमागरम चीले परोसने शुरू कर दिए,सबको नाश्ता करके मज़ा आ गया फिर सबके खाने के बाद भानू और सरगम भी नाश्ता करने बैठे,इसके बाद दोनों काँलेज चली गई और सदानन्द जी आदेश को लिवाकर अपने आँफिस चले गए,क्योंकि अब वें चाहते थे कि आदेश उनका कारोबार सम्भाल लें और वें अब इस झंझट से मुक्त हो जाएं,उनका विचार था कि एकाध साल में आदेश कारोबार ठीक से सम्भालने लगेगा तो एक सुन्दर और सुशील लड़की देखकर वें आदेश की शादी कर देगें और इसके बाद अच्छा सा सभ्य लड़का देखकर वें भानूप्रिया के भी हाथ पीले कर देगें और उसके बाद आदेश और भानूप्रिया के बच्चों को खिलाकर अपना बुढ़ापा काटा करेगें.....
दिन यूँ ही गुजर रहे थे और आदेश के विनम्रतापूर्ण व्यवहार ने सरगम के दिल में जगह बनानी शुरु कर दी थी,वो उसकी हर जरूरत का ख्याल रखने लगी थी और ये बात आदेश ने भी महसूस कर ली थी और एक दिन रात का खाना खाने के बाद जब सब अपने अपने कमरें में सोने चले गए तो आदेश सरगम के कमरें के पास पहुँचा और उसने दरवाजे पर दस्तक दी,दरवाजे पर दस्तक सुनकर सरगम ने पूछा....
"कौन है"?
"मैं हूँ आदेश",आदेश बाहर से बोला....
आदेश का नाम सुनकर सरगम ने फौरन दरवाजा खोला और उससे बोली....
"जी!आप!कोई काम था क्या?"
"जी!नींद नहीं आ रही थी तो सोचा कोई किताब पढ़ लूँ,मेरे पास तो सभी अंग्रेजी के नाँवेल हैं,क्या तुम्हारे पास कोई हिन्दी में प्रेमकहानी वाला नाँवेल होगा",आदेश ने पूछा...
"जी!है तो सही",सरगम बोली...
"सारी बातें यही खड़ी होकर कर लोगी क्या? अंदर आने को नहीं कहोगी",आदेश बोला...
"ओह...साँरी!अंदर आइए ना!",सरगम बोली...
और फिर आदेश सरगम के कमरें के भीतर पहुँचा और कमरें को गौर से देखने लगा...

क्रमशः...
सरोज वर्मा....