Me Papan aesi jali - 21 books and stories free download online pdf in Hindi

मैं पापन ऐसी जली--भाग(२१)

फिर सरगम ने गनपत से कहा....
"गनपत भइया!कार बस स्टैण्ड की तरफ ले लो,मैं बस से जाऊँगी",
"लेकिन दीदी!बस से क्यों?" गनपत ने पूछा...
"रेलवें स्टेशन यहाँ से काफी दूर है और बस स्टैण्ड पास में है,मैं चाहती हूँ कि कितनी जल्दी मैं इस शहर से दूर चली जाऊँ,दम घुट रहा है यहाँ मेरा",सरगम बोली...
"ठीक है दीदी!",गनपत बोला...
और फिर ऐसा कहकर गनपत कार को बस स्टैण्ड की ओर ले चला,कुछ ही देर में सरगम बस स्टैण्ड पहुँच गई और कार से उतरकर उसने अपना सामान उठाया और गनपत से बोली...
"गनपत भइया! आखिर आपने और सिमकी ने मेरी गुरूदक्षिणा चुका ही दी,आप दोनों ने मेरा बहुत साथ दिया इसके लिए दोनों को दिल से धन्यवाद,अगर कभी भगवान ने चाहा तो दोबारा मुलाकात होगी",
"ऐसा ना कहो दीदी! गुरूदक्षिणा किस बात की,आखिर इन्सान ही इन्सान के काम आता,आपने मुझे अपना भाई माना था तो अपनी बहन के लिए मैं इतना तो कर ही सकता था", गनपत बोला...
"ठीक है ! गनपत भइया तो मैं अब चलती हूँ,सिमकी और अपना ख्याल रखना,कभी मन किया तो चिट्ठी लिखूँगी", सरगम बोली...
"ठीक है दीदी!नमस्ते!अपना ख्याल रखना,!",गनपत बोला...
"ठीक है तो गनपत भइया!आप जाइए,अब मैं चली जाऊँगीं",सरगम बोली...
"ठीक है तो मैं चलता हूँ दीदी!,कभी जरूरत पड़े तो जरूर याद करना",
और इतना कहकर गनपत ने कार स्टार्ट की फिर वो चला गया,इधर सरगम अपनी बस ढूढ़ने के लिए आगें बढ़ने लगी,लेकिन उसका ध्यान बस पर कहाँ था,उस समय उसके दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था,वो उन सबकी कहीं बातें और आदेश के धोखे को भूल नहीं पा रही थी और वही सब सोचकर वो आगें बढ़ रही थीं और उसने ध्यान नहीं दिया एकाएक उसका पैर वहाँ पड़े एक पत्थर से टकराया और वो पेट के बल जमीन पर गिर पड़ी,वहाँ मौजूद दो तीन लोंग दौड़े तब तक सरगम जमीन से उठ कर खड़ी हो चुकी थी और उसने अपना सामान हाथ में भी उठा लिया ,तब वहाँ मौजूद उन लोगों में से एक ने पूछा...
"बहनजी!आप ठीक तो हैं,कहीं लगी तो नहीं",
"मैं बिलकुल ठीक हूँ", सरगम बोली..
और फिर सरगम अपने कपड़ो पर लगी मिट्टी झाड़कर आगें बढ़ गई फिर अपने घर जाने वाली बस ढ़ूढ़कर उसने टिकट लिया और बस में जा बैठी,कुछ ही देर में बस चल पड़ी,सरगम को खिड़की वाली सीट मिली थी और उसके बगल में एक महिला ही बैठी थी,वो महिला एक बूढ़ी सरदारनी थीं,उन्होंने सलवार कमीज पहन रखी थी और अपने बगल में कृपाण भी रख रखी थी,उसने सरगम को देखकर मुस्कुराया तो सरगम ने भी मुस्कुरा दिया,बस थोड़ी दूर ही चली थी कि अचानक सरगम के पेट में भयानक दर्द शुरू हो गया और वो अपना पेट पकड़कर रह गई और जब दर्द असहनीय हो गया तो उसे रोना आने लगा और तभी जहाँ वो बैठी थी उसे कुछ गीला गीला महसूस हुआ,अब तो सरगम का जी सन्न से रह गया ,अब उसे याद आया कि जब वो जमीन पर पेट के बल गिरी थी तो तब शायद उसका बच्चा नहीं रहा और इसलिए उसे ब्लीडिंग शुरु हो गई है,उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो अब क्या करें,जब उसकी हालत खराब होने लगी तो उसके बगल में बैठी बूढ़ी सरदारनी ने सरगम से पूछा...
"क्या हुआ पुत्तर ?तबियत खराब है क्या तेरी"?
तब सरगम उनसे बोली...
"आण्टी जी! मैं प्रेगनेन्ट थी,बस स्टैण्ड पर पेट के बल गिर पड़ी थी,तब पता नहीं चला लेकिन अब लग रहा कि जैसे ब्लीडिंग शुरू हो गई है,पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा है",
"घबरा मत पुत्तर!मैं हूँ ना!,सरदारनी बोली...
और फिर उन बूढ़ी सरदारनी ने अपने बैग में से एक बड़ी सी चादर निकाली और उसकी तहें बनाकर सरगम की सीट पर रख दी और सरगम से उस पर बैठने को कहा,सरगम उस चादर पर बैठ गई,फिर उन्होंने सरगम से कहा...
"पुत्तर!कोई बात नहीं! तू अपने शहर बाद में चली जाना,मेरा कस्बा पास ही है और आने वाला ही है वहाँ मेरा घर है,तेरी हालत बहुत खराब है,तू मेरे घर चल,मेरी नातिन नर्स है,वो तेरा इलाज कर देगी ,जब तू ठीक हो जाना तो चली जाना अपने घर",
"लेकिन आप मुझे जानती भी नहीं",सरगम बोली...
"पुत्तर!मुसीबत के वक्त अपना पराया नहीं देखा करते,केवल इन्सानियत दिखाया करते हैं",बूढ़ी सरदारनी बोली...
"जैसा आप ठीक समझें",सरगम बोली....
"और तू मेरी नातिन की उम्र की है तो मुझे तू भी नानी कह कर पुकार सकती है",सरदारनी बोली...
"जी!",सरगम अपना पेट पकड़ते हुए बोली...
"बहुत तकलीफ हो रही है पुत्तर!",बूढ़ी सरदारनी ने सरगम से पूछा...
"हाँ!",सरगम बोली...
"बच्चा कितने दिनों का था",बूढ़ी सरदारनी ने पूछा...
"यही कोई लगभग दो महीने का रहा होगा",सरगम बोली...
"तेरा पति नहीं आया साथ में,तुझे अकेली इतनी रात को भेज दिया",बूढ़ी सरदारनी ने पूछा....
"जी!वें बाहर रहते हैं",सरगम ने झूठ बोला...
"तो तेरे घर में और कोई नहीं था", बूढ़ी सरदारनी ने पूछा...
"जी !नहीं! माँ की तबियत ठीक नहीं थी इसलिए मायके जा रही थी",सरगम बोली...
"कोई बात नहीं पुत्तर! मेरे घर में टेलीफोन है ,नातिन नर्स है ना तो क्या पता कब किस मरीज को उसकी याद आ जाएँ इसलिए घर में टेलीफोन लगवा रखा है,तू टेलीफोन से अपनी माँ को बता देना कि तू मेरे घर पर है",बूढ़ी सरदारनी बोली...
"लेकिन मेरी माँ बहुत गरीब है,उनके घर पर टेलीफोन नहीं है",सरगम बोली...
"कोई बात नहीं पुत्तर!,तो ख़त लिख देना",बूढ़ी सरदारनी बोली...
"जी!ठीक है",सरगम बोली...
अब सरगम की पीड़ा असहनीय हो चली थी और बूढ़ी सरदारनी बार बार उसे दिलासा दे रही थी और उसके सिर पर हाथ फेर कह रही थी...
"घबरा मत पुत्तर!बस हम पहुँचने ही वाले हैं",
और बीच बीच में वो बस के ड्राइवर से भी कहती जाती...
"ड्राइवर साब!गड्डी जल्दी जल्दी बढ़ाओ ना!"
"बढ़ा तो रहे हैं ना माता जी! बस है हवाई जहाज थोड़े ही है जो उड़ाकर ले चलें", ड्राइवर बोलता...
सरगम की ऐसी हालत में बूढ़ी सरदारनी भगवान के रूप में उसकी मदद करने आई थी,कहते हैं ना कि जिसका कोई नहीं होता उसका ऊपरवाला होता है....
और फिर कुछ ही देर में उनके गाँव के बस स्टैण्ड पर बस आकर खड़ी हो गई,बूढ़ी सरदारनी सरगम को सावधानीपूर्वक पकड़कर बस से नीचे लाने लगी और बस के कण्डक्टर से दोनों का सामान नीचे उतारने कहा,उससे बोली कि लड़की की तबियत ठीक नहीं है हम दोनों का सामान बस से नीचे उतारने में थोड़ी मदद कर दे और फिर कण्डक्टर ने दोनों का सामान बस के नीचे उतरवा दिया,इधर सरदारनी ने एक रिक्शा रोका और उसी चादर को सीट पर रखते हुए सरगम से बोली...
"ले पुत्तर,इस पर बैठ जा"
फिर सरगम रिक्शे पर बैठ गई और रिक्शेवाले ने सामान रखा और फिर रिक्शेवाला बूढ़ी सरदारनी के बताए हुए रास्ते पर चल पड़ा....

क्रमशः...
सरोज वर्मा...