Me Papan aesi jali - 29 books and stories free download online pdf in Hindi

मैं पापन ऐसी जली--भाग(२९)

राधेश्याम नहाकर आया तो वो रसोईघर में नाश्ते के लिए पहुँचा और सरगम ने उसकी थाली में भी नाश्ता परोस दिया,नाश्ता करके राधेश्याम बोला...
"सच! सरगम जी! बहुत सालों बाद ऐसे नाश्ता किया है रसोईघर में बैठकर,जब से माँ गई है तब से हम बाप बेटे ऐसे ही कच्चा-पक्का कुछ भी पकाकर खा लेते थे,ये नाश्ता करके सच में माँ की याद आ गई"
"चलिए आपको मेरी वजह से अपनी माँ की याद तो आई",सरगम बोली...
"उन्हें तो मैं हमेशा याद करता हूँ,उनके जाने के बाद हम बाप बेटे का जीवन तो जैसे बिखर सा गया है", राधेश्याम बोला...
"बहुत याद आती है आपको अपनी माँ की,",सरगम ने पूछा...
"हाँ! हर तीज-त्यौहार पर तो और ज्यादा",राधेश्याम बोला...
"मुझे भी अपनी माँ की बहुत याद आती है",सरगम बोली...
"तो क्या आपकी भी माँ नहीं हैं"?,राधेश्याम ने सरगम से पूछा...
"नहीं! मेरे तो बाऊजी भी नहीं है और दोनों छोटे भाई भी एक एक्सीडेंट में नहीं रहें",सरगम बोली...
"तो क्या आप इस दुनिया में बिल्कुल अकेली हैं"?,राधेश्याम ने पूछा....
"हाँ! अनाथ हूँ मैं",सरगम बोली....
"ओह...बहुत दुख हुआ ये जानकर कि आपका कोई अपना नहीं रहा",राधेश्याम बोला...
"इसलिए आप अपने बाबा की कदर किया कीजिए,आपके पास अपना कहने को कोई तो है",सरगम बोली...
"मैं उनका बहुत मान करता हूँ सरगम जी! ना जाने क्यों वें ही हमेशा मुझ पर बिगड़े रहते हैं",राधेश्याम बोला...
"आप उनका कहा नहीं मानते ना! शायद इसलिए",सरगम बोली....
"सरगम जी!वें चाहते हैं कि मैं चुटिया रखकर ,माथे में चन्दन लगाकर ,मंदिर का पुजारी बन जाऊँ तो ये मुझसे नहीं हो पाएगा",राधेश्याम बोला...
"राधेश्याम जी!अपनों की खुशी के लिए उनकी बात मान लेने में भला क्या बुराई है?,ऊपर से आपके ये लम्बे बाल ,बढ़ी हुई दाढ़ी आपको आवारा घोषित करती है,अच्छे घर के लड़कों के ऐसे लक्षण नहीं हुआ करते,इसलिए आपके रवैए से बाबा चिढ़े रहते हैं", सरगम बोली.....
"आप कहतीं हैं तो कोशिश करूँगा कि जैसा वें चाहते हैं मैं वैसा बन जाऊँ",राधेश्याम बोला...
"आप कुछ कुछ काम उनके मन का कर लेगें तो उन्हें अच्छा लगेगा",सरगम बोली...
"जी!ठीक है! अब मेरा नाश्ता हो चुका है,अब आप भी नाश्ता कर लीजिए",राधेश्याम नाश्ता करके उठते हुए बोला...
"जरा सुनिए",सरगम राधेश्याम से बोली...
"जी! कहिए",राधेश्याम बोला...
"घर में कोई भी सब्जी नहीं,कुछ राशन का सामान और सब्जियाँ ला दीजिए ",सरगम बोली...
"जी! लिस्ट बना दीजिएगा,दोपहर तक सारा सामान आ जाएगा",राधेश्याम बोला...
"जी!अच्छा!,सरगम बोली...
फिर सरगम भी नाश्ता करने बैठी और नाश्ता करने के बाद उसने रसोई समेटी और तब तक शास्त्री जी के घर की कामवाली बाई आ पहुँची जो कि अधेड़ उम्र की महिला थी उसने सरगम को घर में देखा तो शास्त्री जी से बोली....
"पुजारी जी! बहू बुला ली और हम सबको कानोंकान खबर भी ना हुई",
"रामरती! पगला गई है क्या? ये सरगम बिटिया है, हमारी मेहमान,बेचारी अनाथ है यहाँ नौकरी ढूढ़ने आई है",
"कुछ भी हो लड़की तो बड़ी सुघड़ है,इकही दिन में रसोई चकाचक कर दी",रामरती बोली...
"हाँ!आज ही सुबह आई है बेचारी और आते ही रसोई सम्भाल ली,सुघड़ तो है",शास्त्री जी बोले...
"और कइसन हो बिटिया? हम हैं इ घर की कामवाली",रामरती ने सरगम से कहा...
"अच्छी हूँ और चाची तुम कैसीं हो?,सरगम ने पूछा...
"वाह....बिटिया! आते ही रिश्ता भी जोड़ लिया",रामरती बोली...
"तुम मुझे अपनी माँ की उम्र की लगी तो चाची बोल दिया",सरगम बोली...
तब रामरती शास्त्री जी से बोली...
"पुजारी जी !कुछ भी हो बिटिया है बड़ी नेक",
"हाँ!सच!"शास्त्री जी बोलें....
और फिर सरगम ने रामरती के साथ मिलकर पूरे घर की सफाई कर डाली और अब सारा घर चमक रहा था,तब शास्त्री ने घर को देखा तो बोलें....
"बिटिया! आज ये घर ,घर जैसा लग रहा है, शीलवती भी ऊपर से देख रही होगी तो खुश हो रही होगी", शास्त्री जी बोले....
रामरती के जाने के बाद सरगम ने कुछ देर आराम किया और शाम तक राधेश्याम राशन लेकर भी आ पहुँचा और सरगम से बोला...
"सरगम जी ! दोपहर को राशन ना ला पाया,क्योंकि भूल गया था,घर के काम करने की आदत नहीं है ना!"
"कोई बात नहीं",
और फिर ऐसा कहकर सरगम ने सारा सामान निकालकर रसोईघर में व्यवस्थित और फिर राधेश्याम से बोली...
"रात के खाने में क्या बनाऊँ"?,
"कुछ भी बना लीजिए,जो आपको अच्छा लगे,देखिए बहुत सी सब्जियाँ हैं जो अच्छी लगे तो पका लीजिए",राधेश्याम बोला...
"ठीक है"
और फिर इतना कहकर सरगम रसोई में खाने की तैयारी करने लगी,उसने रात के खाने में लौकी के कोफ्ते,करौंदे की चटनी और बैंगन का भरता बनाया,जब खाना तैयार हो गया तो उसने शास्त्री जी को खाने के लिए बुलाया,तब तक राधेश्याम घर ना लौटा था,इसलिए उसने शास्त्री जी को खाना खिलाकर फिर अपनी और राधेश्याम की रोटियाँ भी बनाकर रख दीं और बाद में रसोईघर समेट दिया फिर वो खाने के लिए राधेश्याम का इन्तजार करने लगी,तब शास्त्री जी ने उससे पूछा...
"बिटिया!तुमने खाना खा लिया ना!"
"नहीं! बाबा! राधेश्याम जी को आ जाने दीजिए,उनको खिलाकर खा लूँगी", सरगम बोली...
"बिटिया! वो नालायक ना जाने कब लौटेगा,?तुम कब तक उसकी बाट जोहती रहोगी,जाओ खाना खा लो,वो जब आ जाएगा तो खुद परोसकर खा लेगा,बच्चा थोड़े ही है",शास्त्री जी बोलें...
"बाबा! अभी इतनी भूख नहीं लगी है",आप जाकर सो जाइएं,थोड़ी देर और उनका इन्तज़ार करती हूँ अगर वें नहीं आए तो खा लूँगी",सरगम बोली....
"जैसी तेरी मर्जी बिटिया!"
और फिर इतना कहकर शास्त्री जी सोने चले गए और फिर राधेश्याम घर लौटा तो सरगम ने उसकी थाली परोसी और फिर उसने अपनी भी थाली परोसी तो राधेश्याम ने पूछा....
"आपने अब तक खाना नहीं खाया",
"आपका इन्तज़ार कर रही थी",सरगम बोली....
"अब कल से देर नहीं करूँगा,मेरे कारण आप भी भूखी बैठी रहती हैं",
और ऐसा कहकर राधेश्याम खाना खाने लगा और फिर सभी आराम करने चले गए और फिर सुबह सुबह ही जागकर राधेश्याम कहीं चला गया और सुबह की आरती करके जब शास्त्री जी मंदिर से लौटे तो वें घर की भी पूजा की तैयारी करने लगे,तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और उन्होंने दरवाजा खोला तो उनके सामने एक नवयुवक खड़ा था,तब शास्त्री जी ने उस नवयुवक से पूछा....
"कहिए! आपको किससे मिलना है"?
"राधेश्याम",वो नवयुवक बोला...
"वो नालायक घर पर नहीं है",शास्त्री जी बोले...
"बाबा! मैं राधेश्याम,पहचाना नहीं आपने,बाल कटा लिए और दाढ़ी भी बनवा ली",राधेश्याम बोला...
"मेरा बेटा इतना सुन्दर है ये मुझे आज पता चला ,आज तू जानवर से इन्सान लग रहा है राधे.....बिटिया... सरगम देख तो राधेश्याम को ",
और ऐसा कहकर शास्त्री जी ने राधेश्याम को खुशी के मारे अपने सीने से लगा लिया तब राधेश्याम बोला...
"नहाया नहीं है मैने अब तक और आपने मुझे सीने से लगा लिया",
"कोई बात नहीं बेटा! मैं आज बहुत खुश हूँ",शास्त्री जी बोले....
"कल सरगम जी सही कह रही थीं ना!",राधेश्याम बोला...
"क्या कहा था कल सरगम बिटिया ने",शास्त्री जी ने पूछा...
"यही कि कभी कभी बड़ो की खुशी के लिए भी कुछ कर लेना चाहिए इसलिए मैनें आज बाल कटा लिए", राधेश्याम शास्त्री जी से बोला...
"अच्छा!तो चल नहाकर आजा, फिर सभी साथ में पूजा करते हैं आज",शास्त्री जी बोलें...
और फिर राधेश्याम नहाकर आ गया तो आज शास्त्री जी ने खुश मन से पूजा की और सरगम ने अपनी मधुर आवाज़ में भजन गाया,सरगम की आवाज़ बहुत ही मधुर थी ये शास्त्री जी को भी अब पता चल गया था,
फिर सरगम शास्त्री जी के घर पर रहने लगी और अब उसको वहाँ रहते एक हफ्ता होने को आया था लेकिन अभी तक उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिल पाई थी,शास्त्री जी ने दो तीन संगीत विद्यालयों में सरगम की नौकरी के लिए बात भी की थी लेकिन अब तक कहीं भी कोई बात ना बन सकी थी,सरगम को अब शास्त्री जी के घर में रहते अच्छा नहीं लग रहा था,उसे वहाँ रहने पर बहुत संकोच सा लगता था,क्योंकि घर शास्त्री जी की कमाई पर ही चल रहा था,राधेश्याम के पास भी कोई काम ना था,इसलिए सरगम एक दिन शास्त्री जी से बोली....
"बाबा! आप मुझे जल्दी से कहीं नौकरी दिलवा दें तो मैं कोई किराए का कमरा लेकर वहाँ रहने लगूँ,कब तक आपके घर पर रहूँगीं...?
"बेटिया! तू नौकरी भी करने लगेगी ना! तब भी मैं तुझे यहाँ से जाने नहीं दूँगा,तेरे आने से इस घर में रौनक आ गई है और अब मैं इस घर की रौनक को कहीं नहीं जाने दे सकता....
"ठीक है बाबा!",जैसी आपकी मर्जी",सरगम बोली...

क्रमशः....
सरोज वर्मा...