Me Papan aesi jali - 37 books and stories free download online pdf in Hindi

मैं पापन ऐसी जली--भाग(३७)

जब सरगम ने पाण्डेय जी से ये कह दिया कि वो यहाँ पर रहने वाली किराएदार है तो पाण्डेय जी ने उससे पूछा....
"तो बिटिया! यहाँ रहकर पढ़ रही हो क्या?"
"नहीं! चाचा जी! एक संगीत विद्यालय में पढ़ाती हूँ",
"तब तो बहुत अच्छी बात है,नाम क्या है तुम्हारा", पाण्डेय जी ने पूछा....
"जी! सरगम त्रिपाठी",सरगम बोली...
"नाम सरगम ,काम संगीत ,तब तो तुम साक्षात् सरस्वती हो",पाण्डेय जी बोले...
और फिर पाण्डेय जी की बात पर सभी हँस पड़े,तब सरगम बोली...
"मैं अभी आप सभी के लिए चाय नाश्ते का इन्तजाम करती हूँ",
और ऐसा कहकर सरगम रसोईघर में चली गई तो पाण्डेय जी शास्त्री जी से बोले....
"बड़ी प्यारी बच्ची है"
" जी! हाँ! जब से हमारे घर रहने आई है तो मैं घर-गृहस्थी की चिन्ता से बिल्कुल मुक्त हो गया हूँ,हमारे लिए खाना यही बनाती है और पूरा घर भी सम्भाल लेती है",शास्त्री जी बोले...
"तो आपने भी अब तक बहू नहीं बुलाई",पाण्डेय जी ने पूछा...
"ढ़ंग की लड़की नहीं मिली अब तक",शास्त्री जी बोले...
"भाई! आजकल तो अच्छे लड़के और अच्छी लड़कियों का मिलना तो जैसे मुश्किल सा हो गया है,मुझे ही देख लो,दो तीन सालों से विनती के लिए लड़का ढूढ़ रहा हूँ लेकिन अभी तक ढंग का लड़का नहीं मिला, सोचा था कि रिटायर्ड होने के पहले बिटिया के हाथ पीले कर दूँ ,लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है",पाण्डेय जी बोले...
"और आजकल प्रकाश कहाँ है आपका बेटा"?,शास्त्री जी ने पूछा...
"वो अपनी पत्नी और बच्ची के साथ दिल्ली में ही बस गया है,इलाहाबाद बहुत कम ही आता है", पाण्डेय जी बोलें...
"और भाभी जी का स्वास्थ्य तो ठीक है ना!",शास्त्री जी ने पूछा...
"हाँ! ठीक ही है,बस बुढ़ापा है तो कुछ ना कुछ तो लगा ही रहता है",पाण्डेय जी बोले....
"अच्छा हुआ,आप बनारस आए और आपसे मुलाकात हो गई,कितने सालों बाद आए हैं आप ,अच्छा लगा आपसे मिलकर",शास्त्री जी बोलें...
"हाँ! वापस भी तो जाना है,बस चाय पीकर यहाँ से निकलूँगा,शाम सात बजे की ट्रेन है",पाण्डेय जी बोले...
"अरे!इतनी भी जल्दी क्या है यहाँ से जाने की ,रातभर रूक लेते तो अच्छा रहता",शास्त्री जी बोले...
"अरे! परसों का किसी को समय दे रखा है,कहीं और लड़का देखने जाना है,अब यहाँ तो बात बनी नहीं तो वहाँ तो जाना ही पड़ेगा",पाण्डेय जी बोले...
"लगता है विनती की शादी को लेकर आप काफी परेशान हैंं",शास्त्री जी बोले...
तब पाण्डेय जी बोले....
"जी! शास्त्री जी! सच कहा आपने,बेटे का कुछ ठिकाना नहीं है वो तो घर आने की सोचता भी नहीं, तीज-त्यौहार होते हैं तो अपने ससुराल चला जाता है,इसलिए किस पर भरोसा करूँ,सारी जिम्मेदारियाँ खुद ही उठानी है इसलिए ज्यादा चिन्ता है,हम प्रकाश से पैसों की चाह भी नहीं रखते,भगवान का दिया बहुत कुछ है हमारे पास,गाँव की जमीन और घर है और मेरी नौकरी भी ठीक से चल ही रही है,लेकिन पता नहीं प्रकाश हम लोगों के बारें में ऐसी सोच क्यों रखता है कि घर ही नहीं आता",
"तब तो विनती बिटिया की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है आप पर",शास्त्री जी बोले...
" हाँ! यही तो सोचता हूँ कि इस जिम्मेदारी से जल्द ही निपट जाऊँ तो फिर आगें कोई भी चिन्ता नहीं रहेगी,क्योंकि बुढ़ापा आ गया है और जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं", पाण्डेय जी बोले...
"हाँ! सच! इसलिए आप इतने चिन्तित नजर आते हैं",शास्त्री जी बोलें...
"अगर आपकी नज़र में कोई लड़का हो तो बताइए",पाण्डेय जी बोले...
"जी! अभी तो ऐसा कोई लड़का मेरी नज़र में नहीं है",शास्त्री जी बोले....
तभी सरगम चाय और नाश्ता लेकर रसोई घर के बाहर आई और पाण्डेय जी से बोली....
" चाचाजी! लड़का साक्षात् आपके सामने बैठा है और आप दुनियाभर में लड़का ढूढ़ रहे हैं,ये रहे राधेश्याम जी! आप इन्हें अपना दमाद क्यों नहीं बना लेते",
सरगम की बात सुनकर राधेश्याम के तो जैसे तोते ही उड़ गए और शास्त्री जी भी सन्न रह गए और तब पाण्डेय जी बोले...
"अरे! इतनी देर से ये बात मेरे दिमाग में क्यों नहीं आई"?
"चाचाजी अब तो आ गई ना बात दिमाग में, तो फिर लगे हाथ रिश्ता पक्का कर दीजिए",सरगम बोली...
"तो अब तो पहले मुझे इस शुभ कार्य के लिए शास्त्री जी से इजाजत लेनी पड़ेगी",पाण्डेय जी बोले...
"तो ले लीजिए इजाजत,भला शुभ कार्य में काहे की देरी",सरगम बोली...
"तो फिर पहले ये हमारे घर आकर विनती को देख जाएं तब आगें की बात शुरू हो",पाण्डेय जी बोले....
"तो दो दिन बाद इतवार है ,बाबा और राधेश्याम जी आ जाऐगें आपके घर विनती को देखने",सरगम बोली....
अब राधेश्याम से रहा नहीं गया तो वो सरगम से बोला....
"आप ही सारे फैसले ले लेगीं सरगम जी तो फिर बाबा कौन सा फैसला लेगें,कुछ फैसले बाबा को भी ले लेने दीजिए",
"हाँ! मैनें कब कुछ मना किया,चाचाजी रात को यहीं ठहरने वाले हैं तो बाबा इत्मिनान से उनसे बात कर लेगें और भी चींजें तय हो जाएगी",सरगम बोली...
अब राधेश्याम सरगम की इस हरकत से तिलमिला गया,क्योंकि कहाँ वो सरगम से शादी के सपने देख रहा था और सरगम ने बड़ी चालाकी से राधेश्याम का रिश्ता विनती से जोड़ने की बात कह दी,उस शाम तो वो खून का घूँट पीकर रह गया,क्योंकि फिर उसे समय ही नहीं मिला सरगम से बात करने का,रात में सरगम ने पाण्डेय जी को भी घर में ठहरने को कह दिया तो फिर शास्त्री जी भी सरगम से इस मसले पर कोई बात ना कर सकें,सरगम ने रात का खाना बनाकर सबके सामने परोसा और जब पाण्डेय जी ने सरगम के हाथ का खाना खाया तो वें बोलें....
"बिटिया! खाना तो बड़ा स्वाद बना है,ये आलू-टमाटर की तरी वाली तरकारी ,ये भरवाँ बैंगन और दाल में जो तुमने लहसुन का तड़का लगाया है ना तो उसे खाकर बिल्कुल मजा ही आ गया",
"तो और लीजिए ना!", सरगम बोली...
"हाँ! भाई! मुझे थोड़ी सी दाल और दे दो",पाण्डेय जी बोलें....
राधेश्याम वैसे भी खाना नहीं खा रहा था,उसे सरगम पर बहुत गुस्सा आ रहा था इसलिए सरगम ने राधेश्याम को चिढ़ाने के उद्देश्य से कहा....
"ये क्या राधेश्याम जी?आप तो कुछ और ले ही नहीं रहे हैं,ये लीजिए गरमागरम एक रोटी और ले लीजिए",
"अब और नहीं चाहिए,बस मेरा पेट भर गया"
और ऐसा कहकर राधेश्याम खाना अधूरा ही छोड़कर उठ गया और सरगम उसे जाते हुए देखती ही रह गई,इधर शास्त्री जी को भी सरगम का व्यवहार ठीक नहीं लगा था,उनकी इजाजत के वगैर सरगम ने राधेश्याम की शादी विनती से करने को जो कह दिया था,शास्त्री जी के भीतर भी अन्तर्द्वन्द्व चल रहा था कि वें पाण्डेय जी से कैसें कहें कि वो राधेश्याम की शादी सरगम से करना चाहते हैं विनती से नहीं,सरगम ने उन्हें बहुत बड़ी उलझन में डाल दिया था और फिर खाने के बाद सब सोने चले गए और इधर राधेश्याम और शास्त्री जी को चिन्ता के मारे रातभर नींद ना आई.....
जब सुबह का नाश्ता करने के बाद पाण्डेय जी अपने घर को निकलने लगे तो उन्होंने शास्त्री जी से कहा....
"तो फिर शास्त्री जी इतवार को आप राधेश्याम के साथ विनती को देखने आ रहे हैं ना!",
" जी....अब मैं आप से क्या कहू्ँ",शास्त्री जी सकुचाते हुए बोले...
तो सरगम बीच में ही बोल पड़ी....
"हाँ...हाँ.... आऐगें...जरूर आऐगें",
"तुम भी संग में आना बिटिया",पाण्डेय जी बोले...
" मैं... मेरा आना जरा मुश्किल है चाचाजी", सरगम बोली...
"अरे! आ जाना बिटिया! मुझे भी अच्छा लगेगा",पाण्डेय जी बोले...
"जी! मैं यकीन के साथ तो नहीं कह सकती लेकिन कोशिश करूँगी आने की", सरगम बोली....
और फिर राधेश्याम पाण्डेय जी को छोड़ने स्टेशन तक गया और इधर पाण्डेय जी के जाते ही शास्त्री जी सरगम पर बिफर पड़े....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....