Gagan - 13 in Hindi Moral Stories by Kishanlal Sharma books and stories PDF | गगन--तुम ही तुम हो मेरे जीवन मे - 13

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गगन--तुम ही तुम हो मेरे जीवन मे - 13

"लालाजी उस कमरे में चले जाओ।चौबारा उस कमरे को चौबारा कहते थे।उसके सामने जो छत थी,वह खाली थी।उस पर कोई नही सोया था।जब मैं चौबारे में आया तो देखा वह थक गई है और बाहर चौबारे के सामने छत पर डरी बिछाकर सो रही है।मै कुछ देर तक चौबारे में खड़ा सोचता रहा क्या करूँ?उसे सोने दु या जगाऊँ।
सुहागरात की उत्सुकता और उससे मिलने की उत्कंठा भी मन मे थी। और फिर मै बाहर गया और उसके पास जाकर खड़ा हो गया।और मैं उसका धीरे से हाथ पकड़कर बोला,"सो गई क्या?
और मेरी आवाज सुनते ही वह उठ गई और मेरे साथ अंदर चौबारे में आ गयी।
फिल्मों में आपने सुहागरात देखी होगी।फिल्मों में सुहाग कक्ष को फूलों से सजाया जाता है।सुहाग सेज पर फूल बिछाए जाते हैं।और फिल्मो को ही देखकर आम जिंदगी में भी ऐसा ही होने लगा है।लेकिन हमारे साथ ऐसा कुछ नही था।न तो चौबारे को सजाया गया,न ही पलंग बिछाया गया।बस वो ही खाट थी चौबारे में जो पहले ही बिछी रहती थी।और चोबरर में लेम्प जल रहा था।हमने जमीन पर डरी बिछा ली और वह मेरे पास बैठ गयी थी।मैं पैन उसे देते हुए बोला,"पान खा लो।"
"आप।"वह मुझसे बोली थी।
"मैं खाकर आया हूँ।"
"और खा लो।"
एक ही पान था।वह चाहती थी कि मैं खा लू और मैं उसे खिलाना चाहता था।आखिर में वह बोली,"आधा खा लो।"
और मैने आधा खा लिया और आधा उसने।हम बाते करने लगे।मैं उसकी सुंदरता को लेम्प की रोशनी में निहार रहा था।उसके स्निग्ध सौंदर्य को
वास्तव मे वह बहुत सुंदर थी।हिरनी सी बड़ी बड़ी आंखे।सुंदर नाक उसका हर अंग सांचे में ढला हुआ था।वह धीरे धीरे बोल रही थी।उसके बदन से भीनी भीनी महक उठ रही थी।जो मुझे मंत्रमुग्ध कर रही थी।मदहोश कर रही थी और अपनी तरफ खींच रही थी।
एक बात और पहली बार किसी लड़की से जो अब मेरी पत्नी थी,मैं बात कर रहा था।1हमे रिश्ता होने के बाद पूरे 21 महीने शादी के बंधन में बंधने के लिए इन त जार करना पड़ा था।रिश्ता हुआ तब मैं21 साल का और वह 19 साल की थी।अब हम 23 और 21 साल के हो चुके थे।वह 21 साल की थी लेकिन मुझे देखने मे छोटी लग रही थी।इसकी वजह थी,उसका दुबला पतला शरीर।लेकिन थी तो सुंदर।
अब मुझे याद नही ,हो सकता है उसे भी याद न हो।
रात धीरे धीरे सरक रही थी।चारो तरफ सन्नाटा पसरा पड़ा था।हमारे यहाँ भी सब सो रहे थे।सिर्फ हम दोनों जग रहे थे। बाते जर रहे थे।उससे बाते करना अच्छा लग रहा था।
और जब मैंने उसका हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा तो वह बोली,"यह क्या कर रहे हो।"
"प्यार।"
"ऐसे नही"
"तो?
"पहले लेम्प बुझा दो।"
"क्यो?"
"मुझे शर्म आ रही है।"
"शर्म कैसी?"
और वह चाहती थी,लेम्प बुझा दू
? ? ? ? ? ? ?
शायद हम कुछ देर ही झपकी ले पाए थे कि वह उठ गई,"नीचे जाऊ
"क्यो
"सब जग गए होंगे
"जग जाने दो
लेकिन नई आयी बहू औरतों के बीच हंसी का पात्र नही बनना चाहती थी।उसे अपनी मर्यादा और लोक लाज का पूरा ख्याल था।भारतीय संस्कार और सभ्यता संस्कृति में पली थी।वह बहु की मर्यादा जानती थी।लड़की को शादी होते ही एकदम बदल जाना पड़ता है