Hanuman Prasad Poddar ji - 51 in Hindi Biography by Shrishti Kelkar books and stories PDF | हनुमान प्रसाद पोद्दार जी (श्रीभाई जी) - 51

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हनुमान प्रसाद पोद्दार जी (श्रीभाई जी) - 51

भारत के गृहमन्त्री श्रीगोविन्दबल्लभ पंत को दिव्य अनुभूति

इस घटना के कुछ दिनों बाद गृहमन्त्री श्रीपंत को भाईजी के सम्बन्ध में अलौकिक अनुभूति हुई। उन्होंने अपने स्वप्न तथा प्रत्यक्ष चमत्कार की बातें विस्तार से भाईजीको पत्रमें लिखी। उन्होंने लिखा आप इतने महान् एवं महामानव हैं कि भारतवर्ष को क्या सारी दुनिया को आप पर गर्व होना चाहिये। साथ ही अपने पत्र को जला देने का अनुरोध किया। भाईजी ने उनकी इच्छानुसार पत्र को जला दिया। उस पत्र का भाईजी ने उत्तर दिया वह प्रस्तुत किया जा रहा है–

माननीय श्रीपन्तजी,
सादर प्रणाम।

आपका कृपा पत्र मिला। आप सकुशल दिल्ली पहुँच गये, यह आनन्द की बात है। आपके नये ढंग के पत्र को पढ़कर बड़ा आश्चर्य हो रहा है। पता नहीं, भगवान् के मंगलमय विधान से क्या होने वाला है ? आपने जो स्वप्न तथा प्रत्यक्ष चमत्कार देखने की बात लिखी है, वह मेरी समझमें तो आयी नहीं। हाँ, आपके अज्ञात मन के किन्हीं संस्कार के ये चित्र हो सकते हैं। मेरे बाबत आपने जो कुछ देखा-लिखा, उसके सम्बन्धमें तो इतना कह सकता हूँ कि मैं न योगी हूँ, न सिद्ध महापुरुष हूँ, न पहुॅचा हुआ महात्मा हूँ, न किसी को दिव्य दर्शन देकर कृतार्थ करने की या वरदान देने की ही मुझमें शक्ति है। मैं साधारण मनुष्य हूँ, मुझमें कमजोरिया भरी पड़ी हैं। भगवान्‌की अहैतुकी कृपा मुझपर अनन्त है, इसमें मेरा विश्वास है। मुझे इस पत्र से पहले आपके स्वप्न तथा जाग्रतमें चमत्कार देखने का कुछ भी पता नहीं था। अतएव मैं क्या कहूँ ? अवश्य ही आपके निकट भविष्य में देहावसान की जो सूचना इसमें मिलती है, उसमें मुझे चिन्ता हो रही है। आप उचित समझें तो स्वयं मृत्युञ्जय मन्त्र का जप कीजिये और किन्हीं विश्वासी शिवभक्त के द्वारा सवा लाख जप करा दीजिये। मैं यह जानता हूँ कि आप आस्तिक हैं। भगवान्‌में और शास्त्रमें आपका विश्वास है। आपने लिखा– 'जवाहरलाल भी ऊपरसे कुछ भी कहे, आस्तिक हैं', सो ठीक है, उनके बारेमें मैं भी यही मानता हूँ।

आपने मेरे लिये लिखा कि आप इतने महान् हैं, इतने ऊँचे महामानव हैं कि भारतवर्ष को क्या, सारी मानवी दुनिया को इसके लिये गर्व होना चाहिये। मैं आपके स्वरूप को, महत्त्व को न समझकर ही आपको भारत रत्न की उपाधि देकर सम्मानित करना चाहता था। आपने इसे स्वीकार नहीं किया, यह बहुत अच्छा किया। आप इस उपाधि से बहुत-बहुत ऊँचे स्तर के हैं, मैं तो आपको हृदय से नमस्कार करता हूँ। आपके इन शब्दों को पढ़कर मुझे बड़ा संकोच हो रहा है। पता नहीं आपने किस प्रेरणा से यह सब लिखा है। मेरे तो आप सदा ही पूज्य हैं। मैं जैसा पहले था, वैसा ही अब हूँ, जरा भी नहीं बदला हूँ। आप सदा मुझपर स्नेह करते आये हैं और मुझे अपना मानते रहे हैं। मैं चाहता हूँ, वैसा ही स्नेह करते रहें और अपना मानते रहें। मैं आपकी श्रद्धा नहीं चाहता, कृपा और प्रीति चाहता हूँ, स्नेह चाहता हूँ। मेरे लायक कोई सेवा हो तो लिखें। आपके आदेशानुसार पत्र जला दिया है। आप भी मेरे इस पत्र को गुप्त ही रखियेगा।

शेष भगवत्कृपा।
आपका -- हनुमान प्रसाद पोद्दार


श्रीराधाष्टमी- महामहोत्सव

वैसे तो भाईजी के यहाँ प्रायः सभी अवतारों के प्राकट्य उत्सव मनाये जाते थे, जैसे– नृसिंह चतुर्दशी, वामन द्वादशी, राम-नवमी, जानकी नवमी आदि, परन्तु श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एवं श्रीराधाष्टमीके उत्सव विशेष रूपसे मनाये जाते थे। इनमें भी श्रीराधाष्टमीका स्थान सर्वोपरि रहा। राधाष्टमीको महोत्सव रूपमें मनानेका प्रचार विशेषतया भाईजी के द्वारा ही हुआ। बरसानेमें तो यह उत्सव मनाया ही जाता था पर अन्य स्थानोंमें इसका अधिक प्रचार नहीं था। नित्यलीलालीन होने के लगभग तीस वर्ष पूर्वसे इसका महोत्सव रूप प्रारम्भ हुआ। धीरे-धीरे विस्तार होने लगा एवं बाहरसे सम्मिलित होनेके लिये प्रेमीजन आने लगे। तीर्थ यात्रा के बाद सं० 2012 से इसका रूप बहुत विशाल हो गया और यह महोत्सव, एक साधना का अमर बोधिवृक्ष हो गया। इसकी सघन छायामें सहस्रों नर-नारी आश्रय पाकर शान्ति का अनुभव करने लगे। जो व्यक्ति एक बार इसमें सम्मिलित हो गया उसे दुबारा आने के लिये किसी को कहना नहीं पड़ता।

महोत्सवके लगभग एक मास पूर्वसे इसकी तैयारी प्रारम्भ हो जाती। चित्रकार, राजमिस्त्री, बढ़ई सब दत्तचित्त होकर कार्यमें जुट पड़ते। दो-तीन दिन पूर्वसे ही बाहरसे महानुभावोंके समूह पधारने लगते। सभी के आवास की व्यवस्था भाईजी स्वयं सँभालते सैंकड़ों लोग बाहरसे पधारकर, 'राधा परिवार के सदस्य होने का अनुभव करते। प्रातः एवं सायंकाल पद गायन, संकीर्तन एवं प्रवचनका संचालन भाईजी स्वयं करते। लोग आनन्दमें डूबे रहते।

भाद्रपद शुक्ल को महोत्सव का प्रारम्भ प्रातः साढ़े चार बजे शहनाईवादन से होता। उसके पश्चात् साढ़े पाँच बजेसे प्रभात फेरी प्रारम्भ होती। लोग भाव-विभोर नृत्य करते हुए ऊपर भाईजीके पास जाते एवं भाईजी भी बाहर छतपर आ जाते। लगभग साढ़े आठ बजे विशाल पंडालमें गरिमाके मूर्तिमान रूप भाईजी आकर बैठ जाते। पंडाल में सर्वप्रथम भाईजी का प्रवचन होता। तदुपरान्त भाईजी कुटियासे बाबाको ले आते। दोनों मंचपर विराजमान हो जाते। बाबा भावराज्यमें स्थित रहते। दिनभर पदगायन, संकीर्तन, प्रवचन आदिका क्रम चलता रहता। दिनमें लगभग बारह बजे सभी लोग आँखें बन्द किये पाँच मिनट जन्मकी प्रतीक्षा करते और जन्मके समय शंख, घण्टा, घड़ियाल के स्वरसे दिशायें निनादित हो उठती। लगभग चार बजे कार्यक्रमका समापन होता, फिर प्रसाद वितरण रात्रि में विशिष्ट विद्वानों, संत-महात्माओं के प्रवचनोंके उपरान्त श्रीभाईजी का विशेष प्रवचन होता था। रात्रिमें भावुक भक्तों द्वारा जागरण होता, जिसमें संकीर्तन और पद-गायन होते। दूसरे दिन दधिकर्दमोत्सव होता, जिसमें मनों दहीके साथ हरिद्रा, केसर, कपूर, इत्र, गुलाबजल आदि मिलाकर दधिकीच तैयार किया जाता जिसे श्रीराधाकुमारी को अर्पण करने के पश्चात् उद्दाम-कीर्तनके समय सभीपर उछाला जाता -- सभी रसमें सरोबार हो जाते। बादमें बधाईके पदोंके पश्चात् भाईजी का समापन प्रवचन होता, जिसकी प्रतीक्षा उपस्थित समूह करता रहता। वे कहते- अब यह उत्सव सम्पन्न हो रहा है -- समाप्त नहीं, समाप्त तो यह कभी होता ही नहीं - - यह तो नित्य चलता रहता है। आज के दिन हम कामना करें-- हमें भी श्रीराधाजीकी कृपाका एक सीकर प्राप्त हो जाय। आनेवाले सब कष्ट उठाकर आये हैं, उनका स्नेह है, कृपा है, धन्यवाद किसे दूँ ? सभी तो अपने हैं।

इस दो दिनोंके आनन्दका चित्र, शब्दों के द्वारा प्रस्तुत करना असम्भव है। जो इसमें सम्मिलित हुए हैं, वे ही इसका अनुभव कर सके हैं। किसको भाव राज्यमें क्या मिलता था यह वर्णन का विषय नहीं है। इसका प्रारम्भ एक विशेष उद्देश्य से हुआ था और उस उद्देश्यकी पूर्ति कहाँतक हुई— इसका निर्णय भी वे ही कर सकते हैं। भाईजीके नित्यलीलालीन हो जानेके पश्चात महोत्सव आज भी उसी रूपमें गीतावाटिकामें मनाया जाता है और भाईजी की उपस्थिति का अनुभव कतिपय भाग्यशाली भक्तों को इस अवसर पर होता है। अब यह महोत्सव और भी कई स्थानोंपर मनाया जाने लगा है।