Seva aur Sahishnuta ke upasak Sant Tukaram - 3 books and stories free download online pdf in Hindi

सेवा और सहिष्णुता के उपासक संत तुकाराम - 3

सेवा मार्ग का पथिक

सांसारिक उलझनों और व्यवसाय संबंधी कुटिलताओं के कारण तुकाराम जी का जीवन दुःखमय हो गया था और इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उनके मन में वैराग्य की भावना सुदृढ़ हो गई। यों तो संसार में अनगिनती लोगों का जीवन अभावपूर्ण और दुःखी होता है, असह्य कष्ट आ पड़ने पर उनको वैराग्य भी हो जाता है, पर यह वैराग्य क्षणिक होता है। ऐसे वैराग्य को ज्ञानियों ने 'श्मशान-वैराग्य' कहा है। ऐसा वैराग्य श्मशान भूमि से बाहर आते ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि वह ऊपरी है। चार आँसू गिरते ही ठंडा पड़ जाता है। तुकाराम जी दुनिया की तिकड़मों से केवल व्यथित ही नहीं हुए, वरन् उन्होंने इन झंझटों की वास्तविकता को समझकर उनकी जड़ ही काट दी। यद्यपि उन्होंने घर गृहस्थी को नहीं छोड़ा क्योंकि कर्तव्य पालन से वे विमुख होना नहीं चाहते थे, पर सांसारिक कार्यों को गौण और अध्यात्म साधन को प्रमुख मानकर जीवन मुक्ति के आदर्श को अपना लिया। सेवा-धर्म के मार्ग पर चलने वाले को इस प्रकार हानि-लाभ, प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख में समत्व-भावना उत्पन्न करना अनिवार्य है।

स्वार्थ भाव के स्थान पर परमार्थ-पथ के पथिक बनने पर उन्होंने सेवाधर्म को ही ईश्वर भक्ति का माध्यम बनाया। उनका सबसे पहला सेवा कार्य था– पूर्वजों द्वारा स्थापित विट्ठल मंदिर का जीर्णोद्धार। यह मंदिर विश्वंभर बुवा ने बनवाया था, जो तुकाराम से आठ पीढ़ी पहले हुए थे। अब यह बहुत कुछ टूट-फूट गया था। तुकाराम के पास धन तो था नहीं, उन्होंने श्रमदान द्वारा इस कार्य को पूरा किया और इसी को भगवान् की 'कायिक सेवा' मान लिया। अपने इस उदाहरण से उन्होंने प्रकट किया कि केवल कीर्तन और नाम जप ही भगवान् की भक्ति के चिह्न नहीं है, वरन् किसी प्रकार की प्रत्यक्ष सेवा भी उसका एक आवश्यक अंग है।

इसलिए तुकाराम जी ने स्वयं पहाड़ से पत्थर लाकर इकट्ठे किये, मिट्टी भिगोकर गारा तैयार किया और दीवारें बनाईं। यह सब काम उन्होंने अपना पसीना बहाकर किया। इस तरह मंदिर का जीर्णोद्धार करने से उन स्वयं का भी जीर्णोद्धार हो गया। हृदय के अंतःस्थल में दबे हुए भाव उभरकर ऊपर आ गये, भक्ति जाग्रत् हुई और फिर इसी भक्ति ने उनको भगवान् के विराट् रूप के दर्शन करा दिये। जिस मनोवृत्ति में भगवान् रहते हैं, जिस भाव से भगवान् मिलते हैं, उसी भाव को उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार द्वारा अपने सामने मूर्तिमान् किया। चित्त में ऐसे भाव का उदय होने पर, गारे और मिट्टी का काम करते हुए भी भगवान् की सेवा कैसे हो सकती है ? इसे सच्चे भक्त ही जान सकते हैं। चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य, आरती, प्रभाती, दंडवत्, भजन, पूजन, कीर्तन–ये सब उपासना के बहिरंग हैं। इनके साथ अगर चित्त में सच्चा भाव न हो तो ये 'बहिरंग' बाहर के बाहर ही रह जाते हैं। चित्त में सच्चा भक्ति भाव होने पर ही ये बहिरंग आध्यात्मिक प्रदेश में पहुँचाने का साधन बनते हैं।

आत्मानुभव और शास्त्रीय सिद्धांत

आरंभिक जीवन में तुकाराम कुछ पढ़े-लिखे न थे और गृहस्थ हो जाने पर भी केवल दुकानदारी का बहीखाता कर सकने योग्य विद्या प्राप्त कर सके थे। पर उसके पश्चात् जब उनका झुकाव अध्यात्म मार्ग की तरफ हुआ और उन्होंने एकांत में एकाग्र होकर दो-चार धार्मिक ग्रंथों का पारायण तथा मनन किया तो अनेक प्रकार के धार्मिक और शास्त्रीय तत्त्व स्वयमेव उन पर प्रकट हो गये। उनके अभंगों (मराठी कविताओं) में वेद, शास्त्र, पुराण, गीता, भागवत – सबके उपदेशों का आभास मिलता है। एक 'अभंग' में वे कहते हैं–
विश्वीं विश्वंभर बोले वेदांती चा सार।
जगी जगदीश शास्त्र बदती सावकाश।।
व्यापिलें हैं नारायणें ऐसी गर्जती पुराणे।
जनीं जनार्दन संत बोलती वचन।
सूर्याचीया परी, तुका लोकीं क्रीड़ा करी।।
अर्थात्– “वेदांत का सार यही है कि समस्त विश्व में एक ही विश्वंभर व्याप्त है। यह जगत् जगदीशमय है, यह बात शास्त्रों से धीरे-धीरे विदित होती है। पुराण गर्जकर कह रहे हैं कि समस्त दृश्य जगत् नारायण का ही रूप है। जनता में जनार्दन समाया है, यह संतों की वाणी है। इस प्रकार, जैसे भी विचार किया जाय, एक मात्र हरि ही समस्त लोक में क्रीड़ा कर रहे हैं।”

संकीर्ण विचारों के व्यक्ति विभिन्न शास्त्रों के सिद्धांतों को लेकर जिस प्रकार दूसरों पर आक्षेप किया करते हैं, या अपने ही सांप्रदायिक विचारों को सत्य और दूसरों को निराधार बतलाया करते हैं, वह धर्म-संबंधी ज्ञान का नहीं वरन् अज्ञान का द्योतक है। धर्म में सच्ची श्रद्धा भक्ति रखने वाला व्यक्ति तो सबमें एक ही तत्त्व को व्याप्त देखेगा। वेद, शास्त्र, पुराण, संतों की वाणी – यह समस्त साहित्य केवल इसी उद्देश्य से रचा गया है कि मनुष्य परमात्मा का बोध करके संशयरहित हो और जीवन-मरण के चक्र से छुटकारा पावे। जल तो एक ही है। जल, आब, नीर, आदि उसके विभिन्न नाम हैं। कोई नदी के किनारे रहकर उसी जल से काम चला लेता है, कोई सरोवर के जल का व्यवहार करता है और कोई कुएँ के जल को सर्वोत्तम समझकर उसी को काम में लाता है। नदी, कुआँ, सरोवर–इन सबका उद्देश्य एक ही है कि प्यासे जीव उनके द्वारा अपनी पिपासा को शांत करें। पर यदि कोई इस उद्देश्य की पूर्ति के बजाय इनके नामों (उपाधि) पर वाद-विवाद करने लगता है तो यह प्यास लगना नहीं माना जायेगा इसे सच्ची जिज्ञासा नहीं कह सकेंगे। चोखामेला महार, रैदास चमार, सदन कसाई आदि बहुत नीच जाति के कहे जाते थे, पर वे सच्ची प्यास लगने से सत्संग द्वारा ज्ञानरूपी जल को पीकर कृतार्थ हो गये।

तुकाराम को भी जन्म से शूद्र माना जाता था, इसलिए ब्राह्मण धर्म की परंपरा के अनुसार उनको वेदाध्ययन का अधिकार नहीं था। उन्होंने कई अभंगों में स्पष्ट कहा है कि “मुझे अक्षरों के बाँचने का अधिकार नहीं है।” पर उन्होंने इस संबंध में कभी ब्राह्मणों के साथ झगड़ा नहीं किया। उनका मन इतना क्षुद्र नहीं था कि मूल-तत्त्व को त्यागकर ऐसी निरर्थक बातों पर अपनी शक्ति लगायें। वे जानते थे कि ब्राह्मणों को वेदाधिकार होने पर भी सब ब्राह्मण वेदाध्ययन नहीं करते और जो करते हैं, वे सब संसार-सागर से पार नहीं हो जाते और अगर वे सब पार हो जाते हों तो भी इसमें हमारा क्या नुकसान है ? इससे दूसरे लोगों के लिए ऊँचे उठने का रास्ता तो बंद नहीं हो जाता। भगवान् ने तो गीता 9-3 में स्पष्ट कह दिया है–
स्त्रियो वैश्या स्तथा शूदास्तेऽपि यान्ति परांगतिम् ।
इस शास्त्र वचन के अनुसार वैश्य, शूद्र, स्त्री–सबके लिए मोक्ष का द्वार खुला है, जिनको वेदों का अधिकारी बतलाया जाता है, उनमें से थोड़े उनका अध्ययन करने वाले थे और उनके अनुसार आचरण करने वाले तो नाम मात्र को ही थे। इसके सिवाय वेदार्थ अत्यंत गहन है, शास्त्र अपार है और मनुष्य का जीवन बहुत छोटा है। इसलिए धर्म और अध्यात्म का जो रहस्य पुराणों और भाषाग्रंथों में सुलभ रूप से मिलता है, उसी से लाभ क्यों न उठाया जाय ? जिसके हृदय में सच्ची लगन है, वह विवाद में नहीं पड़ता। उसको तो जो साधन समीप और सुलभ रूप में मिल जायेगा, उसी का अवलंबन लेकर अपना उद्देश्य सिद्ध कर लेगा। इसलिए तुकाराम ने पुराणों और संत-वाणी को ही अपने अध्ययन के लिए पसंद किया। उन्होंने पहले ही कह दिया है–
पुंढिलांचे सोयी माझ्या मना चाली।
मातेची आणिली नाही बुद्धि।।
अर्थात्– “पूर्व समय के संतों के मार्ग पर चलना, यही मेरी प्रवृत्ति है। मैंने अपनी बुद्धि से कोई नया मत ग्रहण नहीं किया है।” आगे चलकर अपनी विनयशीलता का परिचय देते हुए लिखा है– “मेरी वाणी तो मूर्ख की बकवाद है, बालक की तोतली बातों के समान है। आप संतजनों का उचित सेवन करके, आपका आश्रय पाकर ही मेरे मुख से प्रसाद गुणयुक्त वाणी निकली है।” तुकाराम के इन उद्गारों को पढ़कर हमको गोस्वामी तुलसीदास जी की निम्न उक्ति याद आ जाती है–
भाषा भनिति भोरि मति मोरी।
हँसिवे जोग हँसे नहीं खोरी।।
छमहहि सज्जन मोर ढिठाई।
सुनहहिं बाल वचन मन लाई।।

इसमें संदेह नहीं कि तुकाराम ज्ञान के सच्चे आराधक थे, जिन्होंने बिना विशेष शिक्षा प्राप्त किये शास्त्र के मूलतत्त्व को ग्रहण कर लिया और उसे ऐसे लोकोपयोगी रूप में प्रकट किया, जिससे अभी तक लाखों व्यक्ति अध्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।